Sunday, 27 August 2017

आस्था और राजनीति का आपराधिक गठजोड़


क्या आज भी एक वर्ग की सोच आदिम सभ्यता वाली ही है ? 

डेरा सच्चा सौदा के मुखिया बाबा राम रहीम के खिलाफ बलात्कार के मामले में फैसला आने के मात्र २४ घंटे पहले हरियाणा के शिक्षा मंत्री राम बिलास शर्मा ने मीडिया को बताया "जाब्ता फौजदारी (सी आर पी सी) की धारा १४४ डेरा के अनुयाइयों पर लागू नहीं होती. वे तो हमारी सरकार के अतिथि हैं जिनके लिए भोजन-पानी की व्यवस्था हमारा दायित्य है. ये तो इतने शांतिप्रिय लोग हैं कि ये एक पत्ता भी नहीं तोड़ सकते ”. मंत्री ने सन २०१४ में हुए विधान-सभा चुनाव में जीत के बाद मंत्री पद की शपथ में कहा था “मैं भारत के संविधान में सच्ची श्रद्धा व निष्ठा रखूंगा”. १५६ साल पुरानी इस धारा में “किसी भी व्यक्ति” (अर्थात किसी को छूट नहीं) लिखा है. राज्य सरकार इस केंद्र के कानून में कोई संशोधन नहीं कर सकती. इस मंत्री सहित राज्य के तीन मंत्रियों ने डेरा को कुल एक करोड रुपये का अनुदान दिया है जिसमें इस मंत्री द्वारा पिछले माह दिया गया ५० लाख का अनुदान भी शामिल है. प्रजातंत्र का दुर्भाग्य यह है कि अदालत द्वारा बाबा को बलात्कारी करार देने के कोर्ट के फैसले से गुस्साये लाखों “शांतिप्रिय अनुयाइयों” द्वारा की गयी हिंसा रोकने में असफलता के आरोप में पंचकुला के पुलिस उपाधीक्षक को निलंबित किया गया.  

बताया जाता है कि जब विधान सभा का चुनाव हो रहा था तो उस दौरान भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेताओं ने बाहों पर टैटू बनवाये इस आधुनिक बाबा से मदद मांगी और बाबा ने सार्वजनिकरूप से आशीर्वाद के रूप में समर्थन की घोषणा की. इसके पहले कांग्रेस और इनेलो रात के अँधेरे में यह सब करती थी और बाबा भी गुपचुप रूप से अनुयाइयों को आदेश देते थे. यह २०१४ के चुनाव में पहली बार हुआ कि किसी राजनीतिक दल ने सार्वजानिक रूप से इस डेरा से मदद माँगी और बलात्कार और हत्या के आरोपी इस मॉडर्न बाबा ने उतने हीं सार्वजनिकरूप से मदद का ऐलान भी किया. इसके बाद पार्टी के एक केन्द्रीय नेता के साथ ४४ पार्टी प्रत्याशी बाबा के यहाँ मदद के मदद की औपचारिक याचना के लिये गए. जीतने वाले ४४ प्रत्याशियों में १९ बाबा के मदद के बगैर शायद न जीत पाते लिहाज़ा ये सभी सार्वजानिक रूप से बाबा के यहाँ सजदा करने जाने लगे. इनमें पार्टी के राज्य इकाई के अध्यक्ष भी हैं. मंत्रियों में होड़ लगी कि कौन कितना अनुदान दे सकता है. इसकी परिणति मंत्री के इस बयान से हुई कि बाबा के अनुयाई पर दफा १४४ लागू हीं नहीं होती. जाहिर है यह दफा निष्प्रभ रही और लाखों लोग (अनुयाइ) पंचकुला में हिंसा का तांडव कर सके. उन्हें मालूम था बाबा के हाथ कितने लम्बे हैं. देश के ३६ वी आई पी लोगों में राम रहीम भी है जिसे “जेड” केटेगरी की सुरक्षा हमारे –आपके पैसों से दी गयी है और हमारे आप के पैसों से हीं बाबा अपनी प्राइवेट आर्मी भी रखता है.  

बाबा जब अपनी गुफा में किसी साध्वी” से बलात्कार करता था और वह विरोध करती थी तो बाबा इसी “लम्बे हाथ” से डराता था. यह बात उस साध्वी ने अदालत को बताई. जाहिर है अगर मंत्री से लेकर मुख्यमंत्री बाबा के यहाँ जा कर सजदा करेंगे तो उस बाबा को यह बात बताने की ज़रुरत भी नहीं है. राज्य और जिले का प्रशासन घास खाए नहीं बैठा रहता है उसे मालूम है नए माहौल में कानून के नहीं बाबा के हाथ लम्बे हैं और उन हाथों की पहुँच ऊपर याने दिल्ली तक है. आरोप लगाने की हिम्मत ( या हिमाक़त ) करने वाली यह साध्वी क्यों नहीं समझ पाई इस बात को जो बड़े बड़े आई ए एस और आई पी एस हीं नहीं मंत्री और मुख्यमंत्री सरकार बदलने के २४ घंटों में हीं समझ गए?
  
लेकिन इस साध्वी को वह “ब्रह्मज्ञान” नहीं था जो अन्य को था. लिहाज़ा उसने सन २००२ में प्रधानमंत्री और हाई कोर्ट को एक गुमनाम चिट्ठी लिख कर बाबा द्वारा बलात्कार की बात लिखी. हाई कोर्ट ने संज्ञान लिया और पहले जिला जज से जांच कराई जिसमें बाबा की इन हरकतों की तरफ काफी संकेत थे. हाई कोर्ट ने इस रिपोर्ट के बाद सी बी आई जांच के आदेश दिए. हाई कोर्ट को मालूम था कि राज्य सरकार के लोगों का “ब्रह्मज्ञानं” कैसा है जो वोट के लालच में दफा १४४ को भी पुनर्परिभाषित कर देता है.    
लेकिन इन ब्रह्मज्ञानियों के प्रभाव के कारण (जिसमें कांग्रेस और इनेलो के सरकारें थीं) अगले पांच साल याने सन २००७ तक सी बी आई को केस में जांच करने से रोक रखा था. लेकिन अदालत का फिर दबाव आया और तब सी बी आई के जिस अधिकारी को यह केस दिया गया वह भी साध्वी की तरह “ब्रह्मज्ञान” में कमज़ोर था. इस अधिकारी एम् नारायणन का (जो अब रिटायर्ड हो चुके हैं) कहना था कि जैसे हीं यह केस मुझे सौंपा गया मेरे एक अधिकारी मेरे पास आ कर बोले “यह केस तुम्हें इसलिए दिया जा रहा कि तुम क्लोज़र रिपोर्ट लगा दो (अर्थात बाबा को क्लीनचिट). यही दबाव कई ऊपर के अफसरों और राजनेताओं की तरफ से भी आया। अधिकारी ईमानदार था लिहाजा ब्रह्मज्ञान की कमी थी. उसने अगले दो सालों में जबरदस्त छानबीन करके इस केस को अंजाम तक पहुँचाया. इस बीच बाबा पर इस बात का भी मुकदमा चलने लगा कि इसके गुर्गों ने अपने मैनेजर को जो गवाह था मरवा दिया है.

बाबा के बलात्कार की शिकार दो आरोपी महिला भक्तों ने अदालत में अपने बयान में कहा कि “बाबा के गुफे की खुफिया दुनिया में औरतें (भक्तिन) हीं सुरक्षा गार्ड होती हैं और बाबा के बलात्कार को उस दुनिया में “पिता जी की माफी” कही जाती है. याने जिस औरत से अमुक दिन बलात्कार करना होता था उस दिन उस औरत से कहा जाता था कि आज तुम्हे “पिता जी की माफी मिलेगी”. इस आरोपी साध्वी के साथ तीन दिन “पिता जी की माफी” चलती रही और चलते-चलते बाबा ने अपने प्रभावी लम्बे हाथ की धमकी भी दी और साथ हीं अपने को भगवान् बताया. याने आरोपी को लालच और डर दिया गया कि पिता जी की माफी लेती रहो और पिताजी रुपी भगवान् तुम्हे इस माफी के साथ कहाँ से कहाँ पहुंचा देंगे नहीं. कुछ भक्तों और भक्तिनों को शायद यह ब्रह्ज्ञान भा गया. यह अलग बात है कि इस ५० वर्षीय मॉडर्न जीवन और फिल्म बनाने  के शौक़ीन बाबा ने अदालत में आरोप को निराधार बताते हुए कहा कि वह नपुंसक है हालांकि वह शादी –शुदा है और उसकी दो बेटियां हैं.  

डेरा सच्चा सौदा के वेबसाइट पर इस संगठन को “आध्यात्मिक” बताया गया है. 

समझ में नहीं आता कि अध्यात्म गलत है कि “पिता जी की माफी” देने की उदारता; या फिर राजनेताओं और अधिकारियों का “ब्रह्मज्ञान” या फिर उन दो साध्वियों सहित सी बी आई जांच अधिकारी की बगावत जिसने "माफी" के घिनौना क्रृत्य के खिलाफ आवाज़ उठाई और फिर जांच में हकीकत बताई या या फिर हाई कोर्ट जज जिसने जाँच के आदेश दिये और सी बी आई कोर्ट जिसने बाबा को बलात्कारी करार दिया या अंत में वे लाखों भक्त जो आज भी सत्य को न समझ कर हिंसा के जरिया जाने –अनजाने में “पिता जी की माफी” प्रक्रिया को बहाल रख कर अपनी हीं परिवार के बेटियों और पत्नियों को उस कामुक गुफे की आग में झोंकना चाहते हैं.  

lokmat

Saturday, 26 August 2017

क्यों न समाज अपने हीं भीतर से सुधार का भाव पैदा करे ?


९० साल पहले भी महिलाएं बाल विवाह के खिलाफ खडी हुई थी
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“अगर आज तुम इस विधेयक (सारदा बिल) का विरोध करते हो तो पूरा विश्व तुम पर हंसेगा”. कोई ८८ साल पहले तख्ती हाथ में लिए और नारे लगाते सैकड़ों औरतें भारत में बाल विवाह की कुप्रथा के खिलाफ धर्मं के पोंगापंथी और कट्टर ठेकेदारों को जगा रही थी. जगह थी सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली (आज का संसद) भवन का गेट. ये महिलाएं जिनमें मुसलमान औरतें भी थी,अखिल भारतीय महिला संगठनों ---आल इंडिया वीमेंस कांफ्रेंस, वीमेन’स इंडियन एसोसिएशन और नेशनल कौंसिल ऑफ़ वीमेन इन इंडिया) ---- के बैनर के तले सदियों पुरानी बाल विवाह की कुप्रथा के खिलाफ आन्दोलन कर रही थी. इन्हीं महिलाओं ने उसी साल जून माह में भी जोशी समिति के सामने उपस्थित होकर अपनी बात रखी थी. उधर पिछले पांच साल से असेंबली के कट्टरपंथी सदस्य बाल विवाह की उम्र (और शारीरिक सम्बन्ध के सहमती की उम्र) को मात्र १४ साल करने के लिए ब्रिटिश हुकूमत और प्रगतिशील सोच वाले हिन्दू नेताओं के प्रयासों को यह कह कर ख़ारिज कर रहे थे कि इससे धर्म की मूल भावनाएं आहत होंगी.  

अगर मुसलमान नारी शक्ति आज इस्लाम में १४०० साल में पहली बार सुधार (रिफॉर्म्स) की प्रक्रिया के लिए तन कर खडी हुई है और सफलता हासिल की है तो आज से ९० साल पहले भी इसी नारी शक्ति ने बाल विवाह की कुप्रथा के खिलाफ कुछ ऐसा हीं कर दिखाया था नतीजतन ब्रिटिश सरकार को पोंगापंथी हिंदुवादियों और कट्टर मुल्लाओं के भारी विरोध के बावजूद बाल विवाह निरोधक अधिनियम जिसे सारदा एक्ट के नाम से जाना जाता है, २८ सितम्बर, १९२९ को पारित किया. लेकिन प्रश्न यह है कि क्या बाकि समाज को इसमें पहल नहीं करनी चाहिए थी? बड़ा अजीब लगता है जब देश की सर्वोच्च अदालत धर्म, उससे जुड़े परम्पराओं और पद्धतियों के सत्य और औचित्य को दो के मुकाबले तीन से निर्णित करती है. क्या धर्म के अनुयायियों में वह कूवत नहीं है कि वे और धार्मिक अधिष्ठान खुद ये फैसले लें? अगर देश की न्यायपालिका और विधायिका को यह काम करना पड़े तो कमी किसकी मानी जायेगी ? क्या इससे यह सिद्ध नहीं होता कि धर्म के ठेकेदार आदतन यथास्थितिवादी होते हैं (चाहे वे परंमपराएंं ईश्वरीय मूल सिद्धांतों के खिलाफ हो और कई मामलों में अमानवीय हो) क्योंकि बदलाव से उनकी दूकाने खतरे में आ जाती हैं?

बात २३ मार्च, सन १९२५ की है. सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली में बाल विवाह को कट्टरपंथियों के डर से न छेड़ते हुए शादी -शुदा दंपत्ति की शारीरिक संबंधों की उम्र न्यूनतम १४ साल करने संबंधी विधेयक पर विचार हो रहा था. दक्षिण राज्य के एक ब्राह्मण सदस्य ने धमकी भरे स्वर में कहा : हमारे धर्म और सामाजिक परम्पराओं के तहत जो स्थान महिलाओं का है वह दुनिया के किसी धर्म , सभ्यता और संस्कृति में नहीं है. हमारी महिलाओं को जब वे दूधमुंही बच्ची होती हैं बताया जाता है कि उनके लिए उनका पति धरती पर उनका भगवान् होता है. अगर दुनिया के सभी समाज-सुधारकों को एक गठरी में बांध कर उनके महिला कल्याणकारी योजनाओं को तौला जाये तो पति का अकेला कार्य उस भारतीय पत्नी के लिए बड़ा होता है. आपको (याने अंग्रेजों शासकों को) क्या अधिकार है कि शादी के पवित्र बंधन रुपी हमारी इस उत्तम और प्राचीन परम्परा में हस्तक्षेप करें? इस कानून का उद्देश्य क्या है? क्या अाप हमारी महिलाओं को मजबूत और बच्चों को बेहतर व्यक्तित्व देना चाहते हैं? ध्यान रखिये कि ऐसा प्रयोग करने में आप और बुराइयों को जन्म देंगें. मैं प्रार्थना करता हूँ कि आप कृपया हिन्दुओं के घरों को बर्बाद न करें. लगभग ऐसा हीं भाव अन्य दर्जनों सदस्यों ने व्यक्त किया और तब विधेयक पारित नहीं हो सका था। 

उस समय के आंकड़ें बताते हैं कि हर साल देश में ३२ लाख औरतें प्रसव पीड़ा में मर जाती थी क्यों कि दस या १२ साल में उनका शरीर बच्चे पैदा करने के लिए तैयार नहीं होता था. यह संख्या प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटेन, फ़्रांस , बेल्जियम , इटली और अमेरिका में मारे गए लोगों से ज्यादा थी. दूसरा नतीजा यह था अधिकांश बच्चे जन्म के दौरान या कुछ दिनों में या तो मर जाते थे या पूरी जिन्दगी कमजोर रहते थे और देश की नस्ल की नस्ल खराब हो जाती थी. पति भी कम उम्र में सेक्स के अाधिक्य  के कारण जल्दी हीं काल के ग्रास बनते थे. औसत आयु मात्र २८ साल होती थी. स्वयं गाँधी ने अपने पत्र यंग इंडिया में
और अपनी आत्म-कथा में बड़े हीं दुःख से जिक्र किया है. स्वयं गाँधी की शादी १४ साल की अवस्था में हुई थी और बक़ौल उनके वह दाम्पत्य क्रियायों में शामिल हो गए थे.

                  धर्म में सुधार के तत्व
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इसके ठीक विपरीत ईसाई धर्म में सुधार को लेकर कठमुल्लाओं के खिलाफ आवाज उठी. सन १५१७ में मार्टिन लूथर ने अपने ९५ प्रश्नों के जरिये  धार्मिक आर्डर --पादरी से लेकर पोप तक--को चुनौती दी. उनका कहना था ईसाई खुद बाइबिल पढ़े न कि पादरी के जरिये धर्म को समझें. नतीजा यह हुआ कि धार्मिक पदों पर बैठे लोगों और परिवर्तन के हिमायतियों के बीच भयंकर मार-काट करीब १५० साल चली. ईसाई धर्म अनेक और परस्पर विरोधी शाखाओं में बंटा. और आज धर्म ने एक उदारवादी सोच अख्तियार किया क्योंकि अनुयायियों ने स्वय धर्म ग्रन्थ पढ़ कर जो अंश समय के अनुरूप नहीं था उसे नज़रअंदाज किया और जो समयानुकूल था उसे ग्रहण किया.  

भारत में भी हिन्दुओं ने अपने को बदला. सती- प्रथा जैसी कुरीति के खिलाफ लार्ड विलियम बेंटिंक ने १८२९ में राजा राम मोहन राय की मदद से कानून पारित किया हालाकिं कट्टर पंथी हिन्दू राजस्थान में अगले डेढ़ सौ वर्षों तक इस कुप्रथा पर टिके रहे और हिन्दू औरतें पति के मरने पर चिता पर जलती रही या जलाई जाती रहीं.

सर्वोच्च न्यायलय के ताज़ा फैसले से देश में पहली बार इस्लाम के नाम पर जारी एक बेहद अमानवीय कुप्रथा –एक बार में मुसलमान पति द्वारा तीन तलाक कह कर औरत को घर से बाहर का रास्ता दिखाना --ख़त्म हुआ है. और इसका भी श्रेय मुस्लिम महिलाओं को जाता है जो इस कुप्रथा के दंश को झेल रहीं थीं. लेकिन अभी इस लड़ाई में और लोगों को खासकर आधुनिक और मानवीय सोच वाले पुरुषों को भी शामिल होना होगा. जाहिर हैं धर्म के ठेकेदारों को यह नागवार गुजरेगा जैसे बाल विवाह और सती –प्रथा को लेकर हिन्दू कठमुल्लाओं ने प्रारंभिक दौर में किया था.

lokmat

Thursday, 17 August 2017

हमने प्रजातंत्र माने "अपना" समझा, सबका नहीं !


१५ अगस्त, १९४७ के सुबह की बात है. देश आजादी का जश्न मना रहा था. हल्की बारिश हो रही थी. वाराणसी के पास एक छोटा रेलवे स्टेशन था ---कोढ़ रोड, जिसे आज ज्ञानपुर कहते हैं. उस स्टेशन के सहायक स्टेशन मास्टर फुन्नन सिंह भी अति-उत्साह में टेबल पर बैठे थे. ट्रेन आने का टाइम हो गया था. लेकिन एक भी आदमी टिकट लेने नहीं आया. फुन्नन सिंह अचम्भे में कार्यालय से बाहर निकले तो देखा कि सैकड़ों लोग प्लेटफार्म पर खड़े हैं. उन्होने चिल्लाकर कहा,”अरे भाई टिकट ले लो ट्रेन आने वाली है”. भीड़ का जवाब था, “अरे, अब किस बात का टिकट. अब ये अंग्रेजों की ट्रेन थोड़े ना है. आज से ये हमारी ट्रेन है”.  

दरअसल ७० साल की आज़ादी और तज्जनित प्रजातंत्र में हमने “अपना ट्रेन तो समझा हीं, ट्रेन में लगे गद्दे की रेक्सीन भी काट कर अपने लिए झोले बनाना शुरू किया. सार्वजानिक सड़क के किनारे लगी ईंटों को घर में ला कर दीवार खडी की इस भाव से “सर्व” तो “स्व” का हीं विस्तार मात्र है. फिर “अपनी जाति” और “अपने”  समुदाय के लोगों को अपने पर शासन करने भेजा. चूंकि सबकुछ “अपना” था तो किसी लालू यादव ने उसी “जनभावना” को आगे बढाते हुए “अपने” लोगों को ठेका दिया. फिर उन “अपनों” ने उन्हें जमीन लिख डाली. और फिर शुरू हुआ अब्राहिम लिंकन के मशहूर सिद्धांत का अमल -- “अपनों” का, “अपनों” के लिए , “अपनों” द्वारा नाभि-नाल भ्रष्ट रिश्ता जिसने प्रजातंत्र की स्थापित अवधारणाओं की चूल हिला दी. प्रजातंत्र के भारतीयकरण के मूल में लिंकन के पीपुल (जनता) और भारत के “अपनों” का मूल अंतर यह रहा कि हम “अपनों” का क्रमशः विस्तार किया. हमारा “अपना” सबसे पहले स्वयं, फिर बेटा-बेटी-पत्नी फिर रिश्तेदार से शुरू होता हुआ जाति और फिर समुदाय तक पहुंचा. नेता के लिए “अपना” माने उसकी जाति (कई बार उप-जाति भी) के लोग जो वोट देते हों, था. फिर चूंकि “फर्स्ट-पास्ट-द –पोस्ट” (ऍफ़ पी टी पी) चुनाव पद्धति में जीत के लिए मात्र जाति के लोगों से कई बार चुनाव वैतरणी पार नहीं होती तो किसी और जाति, उप-जाति को साधा जैसे नीतीश कुमार ने बिहार में महादलित नाम से एक नया पहचान समूह पैदा किया जो भारत के संविधान में तसव्वुर नहीं किया गया था, फिर अगर उससे भी मामला नहीं बना तो रमजान के दौरान दो-पल्ली टोपी पहन कर इफ्तार पार्टी देना शुरू किया. “अपनों” का विस्तार एक बार फिर हुआ जब साम्प्रदायिकता को हमने धर्मनिरपेक्षता का चोला पहनाया. लेकिन यह दुधारी तलवार थी, ७० साल में आधा समय बीतने के बाद जाति के विस्तार की परिणति रिवर्स साम्प्रदायिकता में हुई. बड़ा सम्प्रदाय जाति को लगभग समाहित करने लगा और तब उदय हुआ एक नए राजनीति का. पांसा पलटा. आज वही बड़ी साम्प्रदायिकता का भाव राष्ट्रवाद के साथ समेकित हो गया है. हालांकि उसे हमने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की संज्ञा दी. इन सब के बीच हमने कभी यह नहीं देखा कि पिछले ७० साल में हमारा विकास रेंगता रहा जबकि छोटे-छोटे देश मानव विकास सूचकांक पर हमसे काफी आगे निकल गए. देश का बाल मृत्यु दर, कुपोषण, गरीब-अमीर खाई, बेरोजगारी, अशिक्षा हमें शाश्वत भाव से घेरे रहा जबकि सत्ता पर बैठे लोग घोटाले पर घोटाला याने लाख रुपये के १९५० के जीप स्कैंडल से हमारे  “अपने” का विस्तार आज दो लाख करोड़ रुपये तक पहुँच गया.                  
प्रजातंत्र मानव संगठन को लेकर हुए सार्थक चिंतन का सबसे बेहतरीन उत्पाद है. लेकिन इसके सफल होने की कुछ शर्तें हैं. पहली और अपरिहार्य शर्त है : समाज के लिए कुछ व्यक्तिगत हितों की तिलांजलि और वह भी इसलिए कि समाज के हित में हीं व्यक्तिगत हित निहित है. एक व्यक्ति रात के अँधेरे में अपने घर का कूड़ा सड़क पर फेंक कर आगे बढ़ जाएगा यह सोचता हुआ कि उसका घर साफ़ हो गया. उसे यह नहीं मालूम कि उसी सोच का दूसरा व्यक्ति उसके घर के आगे उसी अँधेरे में अपने घर का कूड़ा फेंक चुका है. धीरे –धीरे हम भ्रष्टाचार के प्रति सहिष्णु होते गए. और यह मानने लगे कि हम जाति के नेता को वोट दें तो सही पर दूसरा सम्प्रदाय के नाम पर दे तो गलत.

“जनता को वैसा हीं शासन (सरकार) मिलता है जिसकी वह पात्र होती है”. यह कथन दुनिया के जाने-माने  फ्रांसीसी राजनीति –शास्त्र के विद्वान टोक्विल के नाम पर उदृत किया जाता है.

क्या आज यह सोचने की जरूरत नहीं है कि अगर इतने बड़े परमाणु हादसे के बाद जापान उभर सकता है, अगर एक ज़माने में अफीम के नशे में धुत रहने वाला चीन अपने ६९ साल के कम्युनिस्ट शासन के बाद आज दुनिया की दूसरे नंबर की अर्थ-व्यवस्था बन सकता है, अगर मात्र ४५ साल पहले पैदा हुआ बांग्लादेश मानव-विकास के तमाम परा-मीटर्स पर आगे हो सकता है तो हमें एक बार अपने सिस्टम, संविधान, समाज और संस्थाओं पर गौर करना होगा.
  
अब आते हैं भारत में प्रजातन्त्र के उदय (और अवसान) पर. ब्रिटिश प्रजातंत्र की अवधारणा तभी फलीभूत हो सकती है जब प्रजा की समझ बेहद संवर्धित हो. यही कारण था कि तमाम तत्कालीन ब्रिटिश शासकों और राजनीतिशास्त्र के पंडितों ने हीं नहीं गाँधी ने भी इस वेस्टमिनस्टर सिस्टम शासन पद्धति का विरोध किया पर अंग्रेज़ीदां नेहरु को ग्राम पंचायतों की बुनियाद पर सर्वोच्च संसदीय बुर्ज तैयार करना दकियानूशी सोच लगी. उनका यह गलत फैसला आज पूरे भारत के लिए नासूर बन गया़।

लोहिया के नाम पर दुकान चलने वाले लालू, मुलायम का समाजवाद अंत में भ्रष्टाचार का पर्याय बनते हुए अंत में हार के बाद फिर “अपनों” पर आ जाता है. याने मुलायम सिंह के उत्तर प्रदेश चुनाव में पराजित और सत्ताच्युत बेटे अखिलेश यादव को समाजवाद की नयी परिभाषा गढ़ने के लिए नारा देना पड़ता है “ जिसकी जितनी हिस्सेदारी उसकी उतनी भागीदारी” याने आबादी के अनुरूप आरक्षण लालू के बेटे ने भी सत्ता से हटाने के बाद कहा कि वह “अपनों “ के बीच जायेंगे.
आज ७० साल बाद जरूरत है कि हमारी सामूहिक चेतना में “अपनों” की परिभाषा बदले और वही समाज के हित में समाहित हो लेकिन यह सब तब तक नहीं होगा जब तक हम जाति, धर्म और अन्य संकुचित सोच से नहीं उबरते.

हाल की कुछ घटनाओं के विश्लेषण से समझा जा सकता है कि ७० साल की आज़ादी और ६७ साल के गणतंत्र में हम कहाँ तक पहुंचे हैं, या फिसले हैं. गुजरात कांग्रेस के ४४ विधायकों को एक स्पेशल जहाज से पार्टी-शासित कर्णाटक में ले जा कर एक रिसोर्ट में छिपाया गया जैसे हिंसक जानवर से मेमनों को बचाने के लिए बाड़े की चौकीदारी की जाती है. डर था कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) उन विधायकों को  करोड़ों रुपये का लालच दे कर या डरा-धमका कर अपने पक्ष में वोट करवायेगी. कांग्रेस ने सार्वजनिकरूप से यह आरोप लगाया भी. याने औसत लगभग तीन लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाले विधायक की नैतिकता इतनी कमजोर है कि कुछ करोड या किसी इनकम टैक्स अफसर की या थानेदार की धमकी से टूट सकती है. तो फिर प्रश्न यह खडा होता है कि ये विधायक जनता को किसी अतिवादी शासन से या असामाजिक तत्वों के खिलाफ कैसे खड़े रहेंगे? फिर कोई अम्बानी या अडानी इनसे कोई भी कानून बनवा सकता है और उनके द्वारा दिया गया पैसा तो किसी को पता भी नहीं चलेगा. कांग्रेस गाँधी-नेहरु-पटेल-मौलाना-राजेंद्र की पार्टी रही है और देश को आजादी दिला चुकी है. दूसरी ओर अगर यह आरोप सही है तो अगला सवाल उठता है कि मोदी के “नोटबंदी” के कसीदे काढ़ने वाली पार्टी के पास नंबर दो के पैसे आये कहाँ से? अगर यह कांग्रेस का मात्र आरोप है तो क्या राजनीति में आरोपों का स्तर इतना गिर गया है? क्या ज़रूरी नहीं था कि बजाय आरोप लगाने के या डर के मारे अपने “ढोर” बचाने के लिए ६०० किलोमीटर दूर छिपाने की जगह कांग्रेस “स्टिंग ऑपरेशन” करती या विधायक पैसे ऑफर करने वाले के खिलाफ जन-आन्दोलन करते और तब भाजपा को कहीं मुंह छिपाने की जगह न मिलती? क्या विधायकों की नैतिकता “गरीब की लुगाई, पूरे गाँव की भौजाई” टाइप की थी जो कभी भी पतित हो सकती थी.            

दूसरी घटना थी हरियाणा की, जिसमें राज्य भाजपा के अध्यक्ष का बेटा तथाकथित नशे की हालत में किसी अधिकारी की लडकी का पीछा कर रहा था और अगवा करना चाहता था. राज्य के एक मंत्री ने अपनी तर्क शक्ति का परिचय देते हुए काउंटर-क्वेश्चन (प्रति-प्रश्न) किया , “ वह लडकी रात में सड़क पर कर क्या रही थी?” लालुओं और मुलायमों की तरह भाजपा प्रवक्ता ने कहा, “इससे नेता का कुछ लेना-देना नहीं है और कानून अपना काम करेगा”. अब यह जुमला इतना पुराना हो चुका है कि जनता फोरम समझ जाती है कि “अब तो कम से कम कानून काम नहीं हीं करेगा. वैसे प्रवक्ता और मंत्री ने शीर्ष नेतृत्व में अपने नंबर जरूर बढा लिए होंगे अगर नेतृत्व “शुतुर्मुर्गी भाव” रखता होगा.

क्यों बनाते है हम इतने कमजर्फ और अनैतिक लोगों को अपना रहनुमा। क्या महज़ इसलिये कि वह हमारा ग़लत या सही काम कराता है, इसलिये कि वह हमारी जाति का है या फिर इसलिये कि वह इतना बड़ा अपराधी है कि हमें कोई छोटा गुंडा या मुहल्ले की पुलिस हमें परेशान नहीं करेगी? तब फिर हम अपने लिये अच्छी सड़क या बेटे के लिये अच्छे स्कूल की अपेक्षा क्यों करते हैं क्योंकि टेकेदार और भ्रष्ट स्कूल प्रबंधनन भी तो उसी अपराधी-नेता की ढ्योढी पर मत्था टेकता है और वह भी मोटी थैली के साथ। 

jagran/ lokmat

Friday, 4 August 2017

विलुप्त होता विपक्ष शुभ संकेत नहीं

राजनीतिक परिदृश्य से उठते खतरनाक संकेत  
  


सुदर्शन की अमर कहानियों में एक था “हार की जीत”. उसमें बाबा भारती एक पुजारी संत थे जिनके पास एक बलशाली घोड़ा था. एक दिन बाबा घोड़े पर हवा से बाद करते हुए जा रहे थे कि कान में आवाज़ आयी ,” बाबा , इस दुखियारे को भी लेता चल, बीमार हूँ डॉक्टर को दिखने जाना है”. बाबा ने दया करते हुए उसे बैठा लिया. लेकिन चंद मिनटों में हीं बाबा को धक्का दे कर वह दुखायारा तन कर लगाम ताने घोड़े पर बैठा था और कह रहा था “बाबा , तुम संतों को ऐसे बलवान घोड़े से क्या लेना देना, यह तो हम डाकुओं के इस्तेमाल के लिए है”. तब बाबा को अहसास हुआ कि दुखियारा कोई और नहीं, डाकू खड्ग सिंह है. डाकू घोड़े को लेकर अभी चंद कदम बढ़ा हीं था कि बाबा कि आवाज आयी. जिस पर डाकू ने कहा “बाबा कुछ भी मांग लो , दे दूंगा पर, अब यह घोड़ा नहीं दूंगा”. बाबा ने घोड़े  की ओर से मुंह मोड़ते हुए कहा, “घोडा अब तुंहारा हुआ मैं कभी इस ओर देखूँगा भी नहीं, पर एक प्रार्थना है और वह यह कि इस घटना का ज़िक्र किसी से न करना”. खडक सिंह चंका, “बाबा मैं तो स्वयं हीं आप से कहना चाहता था क्योंकि इस इलाके में आप का सम्मान है और लोगों को मेरा यह घोडा आप से छीनना अच्छा नहीं लगेगा पर आप स्वयं यह बात क्यों कह रहे हैं ?”. बाबा ने कहा , “अगर लोगों को यह पता लगा तो वे आज से किसी दुखियारे की मदद नहीं करेंगे “.

बिहार की ताज़ा राजनीतिक घटनाओं के बाद आब देश में राजनीतिक वर्ग से जनता का विश्वास हमेशा –हमेशा के लिए उठ गया. यह विश्वास पहले हीं से काफी कम हो गया था और राजनीति में सिद्धांत और विचारधारा  एक मजाक हो चुका था लेकिन फिर भी एक झीना पर्दा था और कई बार लगता था कि कभी यह पर्दा पूरी तरह पारदर्शी नहीं होगा. जिस देश में आजादी के लिए गाँधी ने लाखों लोगों के साथ एक अहिंसक आन्दोलन किया (जिसमें जबरदस्त नैतिक साहस की दरकार होती थी) उस देश में आज कोई लालू यादव २० साल तक चारा घोटाले में कानूनी प्रक्रिया को धता बताते हुए सत्ता में रह सकता है और यही नहीं लगातार अद्भुत हिमाकत दिखाते हुए भ्रष्टाचार पर भ्रष्टाचार कर सकता है. कोई तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व्यक्तिगत सुचिता की नयी परिभाषा गढ़ते हुआ इसे सिर्फ अपने तक महदूद करता हुआ दूसरों के भ्रष्टाचार को मौन स्वीकृति दे सकता है. कोई वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी “पत्ता भी नहीं हिलेगा मेरी मर्जी के बगैर” के भाव में अपने मंत्रिमंडल पर ऐसा लगाम कस सकता है कि वह मंत्री महज सांस भर ले सकता है, लेकिन जब पूरे देश में एक नए राष्ट्रवाद के अलमबरदार के रूप में लम्पट तत्व किसी अखलाक को घर में घुस कर गौमांस तलाशते हुए उसे जान से मारते हैं या जब कुछ ऐसे हीं तत्व किसी कारोबारी पहलू खान को सरे –राह दिनदहाड़े पीट-पीट कर मार देते हैं और उसका विडिओ भी उपलब्ध होता है तो वही मोदी कुछ नहीं करते.

किसी भी प्रजातंत्र में, खासकर के भारत के सन्दर्भ में जहाँ द्वंदात्मक प्रजातंत्र है, विपक्ष की बड़ी भूमिका होती है. लेकिन जिस तरह सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस मृतप्राय सड़क के कोने में पडी है और कभी कभी पूंछ हिलाकर अपने जीने का संकेत दे रही है उससे साफ़ है कि युवाओं को अपना भविष्य भारतीय जनता पार्टी में या राष्ट्रवादी बनकर गौ के नाम पर एक समुदाय विशेष के लोगों को मार कर भारतीय जनता पार्टी में अपनी उपादेयता सिद्ध करने पर लगी है, यही वजह है कि आज भारतीय जनता पार्टी देश के ६८ प्रतिशत जनसंख्या पर अपनी राज्य सरकारों के जरिये शासन कर रही है और कांग्रेस मात्र पांच प्रतिशत पर सिमट गयी है. कोई ताज्जुब नहीं कि राष्ट्रवाद की एक झूठी किन्तु अति बलशाली चेतना में बहते हुए पूरे देश याने ७९.५ प्रतिशत बहुसंख्यक इसी दल को अपना मुखिया बना ले.
और शायद यही वजह है कि अन्य पार्टियों के तमाम नेता और मकबूल कार्यकर्ता अपनी पार्टियों को अलविदा कह कर भजपा की शरण में आ रहे हैं. इसमें दोष भाजपा का नहीं बल्कि दोष कांग्रेस जैसी पूर्व की बड़ी पार्टी के नेतृत्व का है जो लड़ने की क्षमता खो चुकी है और अपनी राजनीतिक मौत के प्रति आश्वस्त है.

हम विश्लेषक क्यों दोष देते हैं किसी अमित शाह या प्रकारांतर से किसी मोदी को. कांग्रेस के नेता राहुल गाँधी अगर हर आम-ओ-ख़ास मौके पर सीन से नदारत रहेंगे और कभी –कभी उल्का पिंड की तरह नज़र आयेंगे और वह भी क्षण मात्र में रात के आकाश के समुन्दर में विलीन होने के लिए तो कौन कार्यकर्ता या विधायक या संसद ज्यादा दिन “मोदी-अमित” ब्रांड “फाइट –टु- फिनिश” युद्ध में टिका रह सकता है. इस ब्रांड की राजनीति में “साम-दाम-दंड-भेद” सभी कुछ तो अपनाये जा रहे हैं. चूंकि राजनीति में आज के दौर में ज्यादातर लोग या तो अपराध की दुनिया से आये हैं या अपराधी को संरक्षण दे कर वहां तक पहुंचे हैं या भ्रष्टाचार में लिप्त रहते हैं और अगर यह सब भी नहीं तो टैक्स की चोरी तो आम बात है. मुलायम के पास जो खेती है उसमें औसतन एक हेक्टेयर में कुछ करोड की पैदावार होती है. फिर मुलायम –मायावती आदि पर तो आय से अधिक संपत्ति के मामले फिर से चलाये जा सकते हैं. लिहाज़ा  विपक्ष के किसी भी नेता  की आज हिम्मत नहीं है कि तन कर खडा हो फिर अगर  समाजवादी पार्टी का भुक्कल नवाब सरीखा व्यक्ति पाला बदलता है और मोदी-अमित शाह के गुणगान करता हुआ भाजपा में जाता है तो इसमें थानेदार की क्षमता या आयकर अधिकारी की पारखी नज़रों का हीं तो कमाल है.

आरोप मीडिया पर लग रहे हैं. मीडिया की भूमिका हमेशा द्वितीयक रही है प्राथमिक नहीं. जब ८० प्रतिशत एक समुदाय विशेष की सोच एक खास दिशा में जा रही हो, जब विपक्ष का मुद्दों को लेकर दूर-दूर तक नमो-निशाँ न मिले तो मीडिया उस भावनात्मक आंधी के खिलाफ ज्यादा दूर नहीं जा सकती. सन १९७५ में जब इंदिरा गाँधी ने आपातकाल लगाया तो जनमत, विपक्ष और नैतिकता का पूर्ण संबल इसकी ओर था. फिर भी आपने देखा कि मीडिया का कुछ वर्ग हीं नहीं सर्वोच्च न्यायलय का एक धडा भी इंदिरा गाँधी के साथ हो चला.

आज जरूरत है कि एक सबल विपक्ष और जन-स्वीकार्यता वाला नेता सामने आये. वरना मोदी-अमित ब्रांड “फाइट- तु-फिनिश” वार में कोई भी नहीं बचेगा. मीडिया भी नहीं, विपक्ष भी नहीं और ना हीं तर्क-आधारित जनमत.


lokmat

Tuesday, 1 August 2017

दोष राजनीतिक वर्ग का नहीं, हमारा है !


“उसकी खता नहीं है, ये मेरा कुसूर था”  !


“जनता को वैसा हीं शासन (सरकार) मिलता है जिसकी वह पात्र होती है”. यह कथन दुनिया के जाने-माने  फ्रांसीसी राजनीति –शास्त्र के विद्वान टोक्विल के नाम पर उदृत किया जाता है. बिहार की घटना ने यह सिद्ध कर दिया कि गलती राजनीतिक वर्ग की नहीं, उन्हें पैदा करने वाले मतदाताओं के सोच की है.

लेकिन आदतन एक बार फिर निरपेक्ष विश्लेषकों ने हीं नहीं, समाज के एक तार्किक व ईमानदार सोच वाले  बड़े वर्ग ने बिहार के  राजनीतिक घटनाक्रम और उसकी परिणति पर किसी नीतीश कुमार , किसी लालू यादव या किसी सुशील  मोदी की निंदा की, मौकापरस्त बताया या भ्रष्ट करार दिया या नैतिक मानदंडों से गिरा बताया।  यह काम हम पिछले ६७ साल से कर रहे हैं. अगर ये गलत है या थे तो हमने इन्हें बदला क्यों नहीं? भारत में तो शुद्ध प्रजातंत्र है और इसके संविधान की उद्देशिका की पहली पंक्ति हीं “हम भारत के लोग.....” से शुरू होती है. अगर हमें लालू पसंद नहीं और नीतीश मौकापरस्त लगते थे तो पिछले ३० सालों में ये लोग राजनीति में जिंदा कैसे हैं? कैसे ये भांति- भांति के चोलों में हमारे कल्याण करने का विश्वास दिला कर हमारे वोट ले जाते हैं और फिर अपनी अट्टालिकाएं खडी करते हैं या उन सिद्धांतों से समझौता कर लेते हैं जिनके खिलाफ इनकी उद्घोषणाओं से हम इनसे प्रभावित हो जाते हैं?

लगभग दो साल पहले याने सन २०१५ में बिहार विधान सभा चुनाव में जनता ने ४२ प्रतिशत मत दे कर महागठबंधन को सरकार बनाने का जनादेश दिया. पिछले सप्ताह वह गठबंधन टूट गया और नीतीश कुमार ने जिस भारतीय जनता पार्टी की नेतृत्व वाली एन डी ए के खिलाफ “नो-होल्ड्स-बार्ड” (कोई भी दांव वर्जित नहीं) के भाव में चुनाव लड़ा उसी के साथ हाथ मिला कर मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के मात्र १६ घंटे में फिर उसी पद के लिए भारत के “संविधान में निष्ठा की शपथ ले ली”. विश्लेषण की तकनीकियों के अनुसार यह प्रजातंत्र के साथ सबसे बड़ा धोखा है क्योंकि बिहार की जनता ने ४२ प्रतिशत वोट महागठबंधन को दिए थे जबकि एन डी ए को मात्र ३४ प्रतिशत याने उसने तो महागठबंधन को सरकार चलाने को कहा था. लेकिन ़तब क्या २०१५ का जनमत राजनीतिक नैतिकता के मानदंडों पर सही था? क्या तब जातिवाद और अल्पसंख्यकवाद का अपवित्र तांडव नहीं हुआ था? साम्प्रदायिकता का फ़ायदा भारतीय जनता पार्टी को मिले तो ग़लत लेकिन ६७ साल से कोई और दल सत्ता मे बैठे  और बेटे -बीवी के नाम माल बनवाये तो वह सही!


हम विश्लेषकों और प्रबुद्ध वर्ग ने इसे नीतीश की मौका परस्ती कहा क्योंकि वही इस १६ घंटे के घटनाक्रम के मुख्य लाभभोगी रहे. नीतीश का कहना है कि यह सब उन्होंने बिहार की जनता के “हित “ के लिए किया. पिछले ६७ साल में हर नेता अनैतिकता या भ्रष्टाचार के आरोप के जवाब में यही कहता है. कोई ताज्जुब नहीं कल लालू यादव बताएं कि कैसे बिहार की जनता के हित के लिए हीं चारा घोटाला किया और कैसे उसी ग़रीब लोगों के लिये दिल्ली में फार्म हाउस और खूबसूरत अट्टालिकाएं बनवाई, पटना में माल बनाना शुरू किया. लालू यह भी कह सकते हैं कि इन संपत्तियों को भ्रष्टाचार से उपजी संपत्ति मान कर और उन्हें जब्त कर सी बी आई और टैक्स अधिकारियों ने बिहार की जनता के हित को बाधित किया. उनका आरोप यह तो हैं हीं कि भारतीय जनता पार्टी की केंद्र की सरकार के कहने पर सी बी आई यह सब कुछ कर रही है. इसी तर्क को आगे बढ़ाते हुए लालू यह भी आरोप लगा सकते हैं कि चूंकि भारतीय जनता पार्टी और नीतीश बिहार की जनता का हित नहीं चाहते इसलिए हमारी संपत्ति जब्त की जा रही है. उनके बेटे तेजस्वी ने सत्ता जाने के बाद मीडिया से कहा भी कि वह और उनकी पार्टी बिहार की जनता , खासकर गरीबों का, दबे कुचलों के हित में "पहले की तरह" काम करती रहेगी चाहे कितनी मुसीबतें खडी की जाएँ. 

तो लब्बो-लुआब यह कि नीतीश ने भी बिहार की जनता के हित में पहले लालू से रिश्ता जोड़ा फिर तोड़ा और अब लालू का इरादा  भी इस घटना के बाद “बिहार की जनता के हित में” एक बार फिर पक्का हो गया.

तो क्या ये नीतीश या ये लालू हीं गलत हैं और जनता के हित के नाम पर बेवकूफ बना रहे हैं? नीतीश पर आरोप हैं कि अगर आज वह लालू के बेटे और बिहार के तत्कालीन उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी के भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस (शून्य-सहिष्णुता) रखते हैं और गद्दी तक छोड़ने का संकल्प रखते हैं तो जब लालू की पार्टी से मिलकर महागठबंधन बनाया और जनता के पास “सांप्रदायिक ताकतों को देश के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बताया” तो लालू यादव में उन्हें क्या “धर्मराज युधिष्ठिर” दिखाई दे रहे थे? क्या उन्हें नहीं मालूम था कि चारा घोटाले में लालू सजायाफ्ता हैं और चुनाव लड़ने से कानून-बाधित हैं? क्या नीतीश कुमार यह भी नहीं जानते थे कि लालू के बेटे या बेटों की सलाहियत क्या है और बिहार की जनता का हित घटिया “परिवारवाद” से कैसे संभव है.

लेकिन क्यों हम विश्लेषक या बुद्धिजीवी केवल किसी नीतीश या लालू को दोषी क़रार दे कर अपनी तार्किक अक्षमका परिचय देते हैं. क्यों नहीं हम यह कहने की हिम्मत करते कि दोष इन राजनीतिक वर्ग के लोगों का नहीं, बल्कि दोष बिहार में जाति और सम्प्रदाय के रंग में सराबोर जनता का है. क्या वोटरों को ये सारी बातें नहीं मालूम थीं? अगर जनता का मतलब यादव, जनता का मतलब कुर्मी , जनता का मतलब हिन्दू –मुसलमान , जनता का मतलब  दलित और जनता का मतलब  “नीतीश-कृत” “महादलित” है तो जाहिर है सामाज को ऐसे हीं नेता मिलेंगे. वर्ना दुनिया के किसी भी सभ्य, तार्किक और समुन्नत समाज में चारा घोटाले में फंसने के बाद और अदालत से सजा पाने के बाद कैसे कोई नेता अपनी पत्नी को मुख्यमंत्री बना देगा और बेटे को उप-मुख्यमंत्री और वह भी “जनता “ के वोट से?

गलती समाज की है, जनता की है और वोटरों की है. अगर खतरनाक अपराधी शहाबुद्दीन संसद की चौखट को “माननीय” के रूप में पांच बार लाँघ सकता है जनता के वोटों के बल पर, तो शहाबुद्दीन नहीं हम गलत हैं. समस्या राजनीति या राजनीतिक वर्ग की नहीं है. अगर कांग्रेस सेकुलरिज्म के नाम पर एक वर्ग को संतुष्ट और दूसरे को रुष्ट करेगी तो सन १९८४ में राम मंदिर आन्दोलन होगा और अगर मंदिर के नाम पर जनता गुमराह होगी तो अगले पांच साल में कोई नेता मंडल आयोग को भी अलमारी से झाड-पोंछ कर निकालेगा और तब सामजिक न्याय की ताकतों के रूप में कोई लालू , मुलायम , मायावती, ममता, पैदा होंगा. कोई नीतीश इसकी भी काट निकालने के लिए एक महादलित पहचान समूह पैदा करेगा.

लेकिन सवाल यह है कि हम क्यों नहीं समझ पा रहे हैं कि लालू के फार्म हाउस सालों –दर-साल कैसे बढ़ते  जा रहे हैं? सामजिक न्याय का यह कौन सा मकाम है जिसे लोहिया नहीं समझ पाए पर लालू –मुलायम समझ जाते हैं. क्या कभी हमने बिहार में रोजगार के लिए कोई आन्दोलन किया? क्या कभी भ्रष्टाचार के खिलाफ तन कर खड़े हुए? बिहार आज भी आन्दोलन कर रहा है और फिर इस बार लालू और उनके बेटे का दावा है कि वह इस आन्दोलन के जरिये पिछड़ों, गरीबों और मजलूमों के लिए आवाज़ उठाते रहेंगे. हम यह कह कर नहीं बच सकते कि विकल्प क्या है? दरअसल अगर शहाबुद्दीन वोटरों की पसंद है तो कोई आदर्शवादी राजनीति में कैसे जाएगा. लिहाज़ा अपनी पसंद बदलें.      

lokmat

Monday, 24 July 2017

देश में सब कुछ सही नहीं है !



देश में जी डी पी –आधारित विकास की गलत अवधारणा के कारण अक्सर हम मूल समस्या नज़रंदाज़ करते जा रहे हैं जिसकी वजह से समाज आज बारूद के ढेर पर खडा हो चुका है. हाल की चार घटनाएँ यह बात चीख-चीख कर बता रहीं हैं लेकिन ये चीख कई बार मोदी-नेतन्याहू गले मिलने के या मोदी द्वारा कोविंद को लड्डू खिलाने के टी वीं चैनलों  के 24x7 विसुअल्स –मिश्रित अलाप में दब जा रही हैं. इसके चार ताज़ा उदाहरण देखिये.

भारत की राजधानी दिल्ली में एक पूरा का पूरा मोहल्ला कई वर्षों से बिजली की चोरी करता रहा है. पिछले रविवार को जब बिजली विभाग की टीम छापा मारने गयी और साक्ष्य के लिए इस चोरी का विडिओ बनाने लगी तो लोगों ने लाठी-डंडे लेकर हमला कर दिया. जब टीम का प्रमुख  इंजिनियर गाड़ी से भगा तो बाइक से कुछ लोगों ने पीछा करके हमला किया़। हडबडी में गाडी एक पोल से टकरा गयी और इंजिनियर की मौत हो गयी. हम ७० साल के स्व-शासन में यहाँ तक आ गए हैं कि चोरी करते हैं और कोई सरकारी अमला अगर पकड़ने आया तो हमला कर उसे मारने का दम भी रखते हैं. ध्यान रहे कि बिजली की चोरी छिप कर नहीं और न हीं रात के अँधेरे में बल्कि खुले में ओवरहेड तार में कटिया फंसा कर दिनदहाड़े की जाती है. एक अन्य घटना लें. मध्य प्रदेश में एक महिला आई ए एस अधिकारी ने हाल हीं में जब खनन  माफिया का अवैध धंधा बंद करने के लिए उसकी ट्रकें पकड़ी तो उस पर हमला हुआ और अगले कुछ हफ्ते में उसने गुहार लगाई कि उसकी जान खतरे में है और उसे कहीं अन्यत्र तबादला कर दिया जाये. कुछ दिनों पहले मथुरा जा रही लोकल ट्रेन में एक सम्प्रदाय के युवक को दूसरे सम्प्रदाय के डेली यात्रियों ने मार डाला और जब पुलिस मारने वालों को गिरफ़्तार करने  पहुँची तो गाँव के  संप्रदाय विशेष के लोगों ने पुलिस टीम पर हमला कर के हत्यारोपी को छुड़ा लिया. लगभग वैसे हीं जैसे पश्चिम उत्तर प्रदेश के सहारनपुर मे जब एक खूंखार अपराधी को पकड़ने पुलिस उसके गाँव गयी तो उसके सम्प्रदाय के ग्रामीड़ों ने पत्थरों और लाठियों से हमला कर पुलिस को बैरंग वापस कर दिया.

इन सब से अलग एक चौथी घटना हुई. अब कि बार शिव-भक्त कावड़ियों के जत्थों ने न केवल भगवा चोला पहना व भगवा ध्वज फहराया बल्कि उनकी गाड़ियों के आगे राष्ट्रीय ध्वज भी लगा था. अर्थात लाखों शिव-भक्तों द्वारा निकली जा रही यात्रा का राष्ट्रीयकरण हो गया. राष्ट्र और शिव-भक्त समतुल्य हो गए. नतीज़तन जब एक शिव-भक्त को किसी बाइक ने हल्की टक्कर मार दी तो सैकड़ों उन्मादी भक्तों ने घटना की तफ्तीश और यात्रा नियंत्रित करने में दिन-रात लगी पुलिस के एक सिपाही को सड़क पर पटक-पटक कर मारा. याने राष्ट्र ने बदला लिया. किसी एक भी जत्थे को इस बात के लिए गिरफ्तार नहीं किया गया कि उसने फ्लैग कोड और संबंधित कानून का उल्लंघन क्यों किया. राष्ट्रवाद का यह नया स्वरुप था. अगले कुछ वर्षों में यह सर्वमान्य हो जाएगा कि शिव-भक्ति और राष्ट्रवाद एक हैं और जो शिव भक्त नहीं वह राष्ट्रद्रोही और राष्ट्रद्रोही की जगह पाकिस्तान में है.  

इन चार ताज़ा घटनाओं से यह साफ़ सिद्ध होता है कि ७० सालों में हम अब न तो कानून से डरते हैं न उनके तथाकथित रखवालों (?) से  बल्कि इसके उलट कानून और पुलिस हमसे डरने लगी है. आज़ादी और गणतंत्र की यह भारतीय परिभाषा है जिसे अगर रोका न गया तो दुनिया में यह एक मिसाल बन सकती है.

इन चारों घटनाओं को अगर गौर से देखें तो साफ़ समझ में आयेगा कि देश में कानून , राज्य और उसके अभिकरणों का भय ख़त्म हो गया है. देश में कानून -व्यवस्था बनी रहे इसकी पहली शर्त है कि लोग उस संविधान और तज्जनित कानून और उसके अभिकरणों के प्रति आदतन निष्ठा रखें. चौराहे पर ट्रैफिक पुलिस के एक सिपाही के हाथ देने पर बड़ी बड़ी गाड़ियों में सैकड़ों लोग इसी आदतन निष्ठा की वजह से रूक जाते हैं. अगर एक आई ए एस अधिकारी को कानून का पालन करवाने में किसी खनन माफिया से अपनी सुरक्षा को लेकर इतना डर लगे कि वह सुरक्षा हीं न मांगे बल्कि तबादला भी तो हमारा जी डी पी कितना भी हो जाये माफिया का परोक्ष या अपरोक्ष शासन कोई रोक नहीं सकता. और गौर कीजिये कि अब अगर आम बिजली चोर गाँव को या अपराधी बचाने  वाले ग्रामीणों को इतनी तकता आ सकती है तो सत्ता में बैठे लोग क्या-क्या कर सकते हैं?

यही वजह है कि लालू यादव के परिवार के नाम जिस दिन उनके मित्र होटल मालिक ने पटना शहर की अपनी तीन एकड कीमती जमीन रजिस्ट्री की ठीक उसी दिन रेलवे बोर्ड ने आई आर सी टी सी को अपने दो होटलों के प्रबंधन और रखरखाव का जिम्मा उस होटल मालिक की कम्पनी को सौपने का आदेश दिया. लालू ने इतनी भी चिंता नहीं की कि कम से कुछ दिन बाद इस गोरख-धंधे को अंजाम दें ताकि आदान-प्रदान इतना स्पष्ट न दिखे. लालू के बताये मार्ग पर हीं ये ग्रामीण और बिजली चोर भी जा रहे हैं. अभी यह समझ में नहीं आ रहा है कि लालू या ऐसे राजनीतिज्ञ इसी जनता की उपज हैं या यह बिजली चोर जनता लालू की उपज.

लेकिंन यहाँ गौर करने की एक बात और भी है. सन २००४ मे नागपुर में करीब दो सौ महिलाओं ने भरी अदालत में हमला कर एक बलात्कारी को पीट-पीट कर मार डाला. उनका क्रोध यह था कि पुलिस उससे मिली हुई है और हर बार बलात्कार करने के बाद उसे अदालत से जमानत मिल जाती है और वह फिर झुग्गी-झोपड़ियों की महिलाओं को धमका कर बलात्कार करता है. इस काम में उसके गुर्गे हीं नहीं पुलिस के लोग भी साथ होते हैं. सन २०१६ में वाराणसी में एक १२ साल की बच्ची से बलात्कार और फिर हत्या की घटना मे  साक्ष्य और वैज्ञानिक जांच के आधार पर एक युवक को गिरफ्तार किया. यह ३० वर्षीय युवक मात्र दो माह पहले हीं बलात्कार के आरोप में दस साल की सजा काट कर आया था. जब पुलिस ने उससे पूछा कि बलात्कार के बाद उसने उस बच्ची की हत्या क्यों की तो उसका जवाब चौंकाने वाला था. उसने बताया कि पिछली बार बलात्कार के बाद उसने शिकार महिला को ज़िंदा छोड़ दिया था जिसके कारण उस महिला की गवाही पर उसे १० साल की सजा हुई लिहाज़ा अब उसने तय किया कि बलात्कार के बाद “शिकार” को वह जिन्दा नहीं छोड़ेगा.  

इस बीच हमारी देश की न्याय प्रणाली , अदालतें “बड़े-बड़े मुद्दों” पर फैसला देती रहीं जैसे हाल हीं में देश की सबसे बड़ी अदालत इस बात पर फैसला देने जा रही है कि “निजता की अधिकार मौलिक अधिकार का अंश है या नहीं”.    

lokmat

Sunday, 16 July 2017

क्यों नहीं बन पाती विपक्षी एकता ?


किसी भी शासन –पद्धति में, जो “एड्वर्सेरियल डेमोक्रेसी” (द्वंदात्मक प्रजातंत्र) की अवधारणा पर आधारित हो –जैसा कि भारत में है-- विपक्ष की अहम् भूमिका होती है. अगर जन-धरातल में विपक्ष का यह स्थान कम होता जाये तो उससे प्रजातंत्र की गुणवत्ता पर असर पड़ता है. चूंकि सत्ता की प्रकृति हीं इस पर काबिज़ लोगों को भ्रष्ट करने की और अधिनायकवादी बनाने की होती है इसलिए विपक्ष और मजबूत मीडिया अच्छे शासन को सुनिश्चित करने के लिए अपरिहार्य कारक हैं. इनके विलुप्त होने का एक अन्य ख़तरा होता है कि शासक समूह के भीतर से हीं कई बार विरोध के स्वर उठने लगते हैं लिहाज़ा शासन करने वाले को भी विपक्ष और मीडिया को अपने हित में अपने खिलाफ मुखर होने की चाह रखनी चाहिए. 

आज देश की ६२ प्रतिशत आबादी पर भारतीय जनता पार्टी का अपनी राज्य सरकारों के जरिये शासन है और यह बढ़ता जा रहा है।  देश की सबसे पुरानी पार्टी –कांग्रेस—आज सिमट कर मात्र आठ प्रतिशत जनसँख्या पर शासन में है. राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति के चुनाव में क्या परिणाम होंगे यह सबको मालूम है. विपक्ष और उसकी एकता मात्र एक छलावा बन कर रह गयी है और इस एकता का मुजाहरा गाहे-ब-गाहे संसद में हंगामा करने तक हीं महदूद रह गया है.  

भारत में पिछले कुछ वर्षों में विपक्ष कमजोर हीं नहीं हुआ बल्कि लकवाग्रस्त सा लग रहा है. दुनिया के अन्य प्रजातान्त्रिक देशों जैसे अमेरिका और ब्रिटेन से अलग भारत के सन्दर्भ में इसका मतलब बिलकुल अलग होता है. इन दोनों देशों में मूल रूप से द्वि-दलीय व्यवस्था है (हाल में ब्रिटेन में भले हीं एक तीसरा दल भी राजनीतिक धरातल पर काबिज हुआ है). भारत में समाज के सैकड़ों पहचान –समूह में बंटे होने के कारण यह संभव नहीं है.  लेकिन मुश्किल यह है कि ये पहचान समूह किसी कल्याण के तार्किक भाव के कारण नहीं पैदा हुए बल्कि जाति, सम्प्रदाय, क्षेत्रीयता और भावनात्मक अतिरेक की उपज हैं. भारत में फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट (जिसको ज्यादा वोट वहीं जीता ) चुनाव –पध्यति के कारण राजनीतिक वर्ग को यह आसन लगता है कि समाज को इसी तरह के पहचान समूहों में बाँट कर वोट हासिल करे. इसके कारण मुख्य दल –कांग्रेस – सिकुड़ने लगा क्योंकि उसके पास जातिवाद की कोई काट नहीं थी. धर्म-निरपेक्षता कांग्रेस के लिए महज मुसलमानों के वोट की ख़ातिर  एक नारा था। इस वोट बैंक मे भी इन जातिवादी पार्टियों ने सेंध लगाई. होना तो यह चाहिए था कि पार्टियाँ अपनी विचारधारा बनायें और उनसे जनता को प्रभावित करें पर इसकी जहमत कौन लें. लिहाज़ा जब भारतीय जनता पार्टी ने १९८४ में अपने सहोदर धार्मिक संगठन विश्व हिन्दू परिषद् के जरिये राम मंदिर का मुद्दा उठाया और जब उसी साल कांसीराम ने दलितों के नाम पर बहुजन समाज पार्टी बनाई तो अगले चार वर्षों मे भारतीय समाज को तोड़ने के लिए तत्कालीन सत्ता पक्ष (विश्वनाथ प्रताप सिंह के प्रधानमंत्रित्व में) पिछड़ी जातियों के लिए मंडल आयोग की सिफारिशें लाया जिसमे आरक्षण के ज़रिये सरकारी नौकरियों में पिछड़ों को भी शामिल करने की अनुशंसा थी.

अगले दो साल में तमाम राज्यों में सामाजिक न्याय की ताकतों के रूप में कोई लालू यादव और कोई मुलायम सिंह यादव उभरने लगे. कारण यह था कि उत्तर भारत के इन दो राज्यों—उत्तर प्रदेश और बिहार-- में यादव का प्रतिशत क्रमशः १० और १६ और मुसलमानों का १८.६ और १०.२ प्रतिशत है और यादव अन्य पिछड़ी जातियों के मुकाबले आक्रामक भी अधिक था.        

जब भी किसी मायावती, स्वर्गीय जयललिता, मुलायम सिंह यादव या लालू यादव पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा तो अगले चुनाव में उनके वोट बढ़ गए और अधिकांश अवसरों पर ये सत्ता पर काबिज़ हो गए. दरअसल भारत में प्रजातंत्र की नियति हीं उल्टी है. वोटर के संकीर्ण पहचान समूहों में बंटे रहने के कारण अपने भ्रष्ट नेता में उसे “अपना असली रॉबिनहुड” नज़र आता है. ऐसा इसलिए होता है कि अर्ध-शिक्षित, अभाव-ग्रस्त और “कोऊ नृप होहीं हमें का हानि” के शाश्वत भाव से अर्ध-मूर्छा की स्थिति में जीने वाले  भारतीय समाज के बड़े तबके की तर्क-शक्ति क्षीण होती है और वह इतने से संतुष्ट हो जाता है कि उनकी जाति का  व्यक्ति भी सदियों से शोषक रहे उच्च वर्ग की भाषा बोलता है और वैसा हीं भ्रष्टाचार भी करता है. शहाबुद्दीन सरीखे अपराधियों को भी (आज भी भारतीय संसद में लगभग एक-तिहाई माननीयों पर आपराधिक मुकदमें हैं) इसलिए चुनता है कि राज्य, उसके अभिकरणों या कानून-व्यवस्था पर उसका विश्वास कम होता जा रहा है और अपराधियों में उस “न्याय” की उम्मीद दिखती है. मर्डर के दर्ज़नों मामले में जेल में बंद बिहार के खतरनाक अपराधी शहाबुद्दीन का लोक सभा में पांच बार चुना जाना इसी के संकेत हैं.      

बिहार का राजनीतिक परिदृश्य देश के प्रजातंत्र के इसी बिगड़ते स्वास्थ्य का परिचायक है. राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि जनता के सामने उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव अपनी बेगुनाही सिद्ध करें. संवैधानिक स्थिति यह है कि अनुच्छेद १६४(२) के “सामूहिक जिम्मेदारी” के सिद्धांत के तहत मुख्यमंत्री को अपने मंत्री से यह कहना था कि आप मुझे अपनी बेगुनाही के सबूत दें. जनता अदालत होती तो इस उप-मुख्यमंत्री के पिता लालू यादव २० साल तक देश की छाती पर मूंग दलते हुए हर चुनाव में जीत के बाद संविधान में निष्ठा और विश्वास की शपथ लेते हुए भ्रष्टाचार में लिप्त न रहते.

बहरहाल बिहार की राजनीतिक परिणति जो भी हो दो परिणाम अवश्यम्भावी हैं. पहला : नीतीश अपनी राजनीतिक निष्ठा को लेकर पाला बदलने की क्षमता की धमक से सत्ता में बने रहेंगे और दूसरा: तेजस्वी का जाना तय है. खबर यह है कि लालू यादव “गरीबों व मजलूमों की आवाज को उठाये रखने के लिए” अपनी सात बेटियों में से मुंबई-स्थित तीसरी बेटी को मंत्री पद की शपथ दिलाएंगे याने संविधान में निष्ठा व् विश्वास की एक बार फिर शपथ. इस प्रक्रिया से लालू के हाथ में राज्य की सत्ता भी बनी रहेगी और नीतीश की इमेज भी.  

राजनेताओं पर भ्रष्टाचार के मामले प्रजातंत्र के घाव से बहते उस मवाद का संकेत देते हैं जिसकी सडांध चीख-चीख कर समाज के कैंसर के “मेटास्टेसिस” स्टेज (जब यह बीमारी शरीर के तमाम हिस्सों में फ़ैलने लगती है) के खतरे की ओर इंगित करती है. अगर ऐसे राजनेता दसियों साल तक वोट भी हासिल करते रहते है तो ग़लती नेता की नहीं जनता की समझ की है। 

अगर विपक्ष को मजबूत होना है तो कांग्रेस को सौर –मंडल के उस मुख्य सूर्य की तरह बनना पडेगा जिसके इर्द –गिर्द ग्रह की तरह तमाम क्षेत्रीय दल रहते हैं. उसे अपने कैडर को वैचारिक रूप से मजबूर करना होगा ताकि दिग्विजत सिंह ब्रांड छद्म धर्मनिरपेक्षता से हट कर वास्तविक मुद्दे पर जन चेतना जगाये जो कि भारतीय जनता पार्टी और इसके अनुसांगिक संगठनों की व्यापक सांप्रदायिक अपील की काट बन सके. यह तब तक नहीं हो सकता जबतक जाति समूहों में बंटे लोगों की चेतना में यह बात नहीं बैठेगी ये लालू-मुलायम-मायावाती उनके कल्याण से ज्यादा अपने और अपने परिवार के कल्याण में लगे हैं. और यह काम भी या तो कांग्रेस कर सकती है या भारतीय जनता पार्टी. अभी तक भारतीय जनता पार्टी हीं इसमें भी आगे दीख रही है. और यही वजह है कि बिहार और उत्तर प्रदेश में भी इस “सांप्रदायिक” पार्टी को यादवों और अन्य पिछड़ों के वोट मिलने  लगे हैं जबकि “सेक्युलर” कांग्रेस को नहीं.

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