Tuesday, 1 August 2017

दोष राजनीतिक वर्ग का नहीं, हमारा है !


“उसकी खता नहीं है, ये मेरा कुसूर था”  !


“जनता को वैसा हीं शासन (सरकार) मिलता है जिसकी वह पात्र होती है”. यह कथन दुनिया के जाने-माने  फ्रांसीसी राजनीति –शास्त्र के विद्वान टोक्विल के नाम पर उदृत किया जाता है. बिहार की घटना ने यह सिद्ध कर दिया कि गलती राजनीतिक वर्ग की नहीं, उन्हें पैदा करने वाले मतदाताओं के सोच की है.

लेकिन आदतन एक बार फिर निरपेक्ष विश्लेषकों ने हीं नहीं, समाज के एक तार्किक व ईमानदार सोच वाले  बड़े वर्ग ने बिहार के  राजनीतिक घटनाक्रम और उसकी परिणति पर किसी नीतीश कुमार , किसी लालू यादव या किसी सुशील  मोदी की निंदा की, मौकापरस्त बताया या भ्रष्ट करार दिया या नैतिक मानदंडों से गिरा बताया।  यह काम हम पिछले ६७ साल से कर रहे हैं. अगर ये गलत है या थे तो हमने इन्हें बदला क्यों नहीं? भारत में तो शुद्ध प्रजातंत्र है और इसके संविधान की उद्देशिका की पहली पंक्ति हीं “हम भारत के लोग.....” से शुरू होती है. अगर हमें लालू पसंद नहीं और नीतीश मौकापरस्त लगते थे तो पिछले ३० सालों में ये लोग राजनीति में जिंदा कैसे हैं? कैसे ये भांति- भांति के चोलों में हमारे कल्याण करने का विश्वास दिला कर हमारे वोट ले जाते हैं और फिर अपनी अट्टालिकाएं खडी करते हैं या उन सिद्धांतों से समझौता कर लेते हैं जिनके खिलाफ इनकी उद्घोषणाओं से हम इनसे प्रभावित हो जाते हैं?

लगभग दो साल पहले याने सन २०१५ में बिहार विधान सभा चुनाव में जनता ने ४२ प्रतिशत मत दे कर महागठबंधन को सरकार बनाने का जनादेश दिया. पिछले सप्ताह वह गठबंधन टूट गया और नीतीश कुमार ने जिस भारतीय जनता पार्टी की नेतृत्व वाली एन डी ए के खिलाफ “नो-होल्ड्स-बार्ड” (कोई भी दांव वर्जित नहीं) के भाव में चुनाव लड़ा उसी के साथ हाथ मिला कर मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के मात्र १६ घंटे में फिर उसी पद के लिए भारत के “संविधान में निष्ठा की शपथ ले ली”. विश्लेषण की तकनीकियों के अनुसार यह प्रजातंत्र के साथ सबसे बड़ा धोखा है क्योंकि बिहार की जनता ने ४२ प्रतिशत वोट महागठबंधन को दिए थे जबकि एन डी ए को मात्र ३४ प्रतिशत याने उसने तो महागठबंधन को सरकार चलाने को कहा था. लेकिन ़तब क्या २०१५ का जनमत राजनीतिक नैतिकता के मानदंडों पर सही था? क्या तब जातिवाद और अल्पसंख्यकवाद का अपवित्र तांडव नहीं हुआ था? साम्प्रदायिकता का फ़ायदा भारतीय जनता पार्टी को मिले तो ग़लत लेकिन ६७ साल से कोई और दल सत्ता मे बैठे  और बेटे -बीवी के नाम माल बनवाये तो वह सही!


हम विश्लेषकों और प्रबुद्ध वर्ग ने इसे नीतीश की मौका परस्ती कहा क्योंकि वही इस १६ घंटे के घटनाक्रम के मुख्य लाभभोगी रहे. नीतीश का कहना है कि यह सब उन्होंने बिहार की जनता के “हित “ के लिए किया. पिछले ६७ साल में हर नेता अनैतिकता या भ्रष्टाचार के आरोप के जवाब में यही कहता है. कोई ताज्जुब नहीं कल लालू यादव बताएं कि कैसे बिहार की जनता के हित के लिए हीं चारा घोटाला किया और कैसे उसी ग़रीब लोगों के लिये दिल्ली में फार्म हाउस और खूबसूरत अट्टालिकाएं बनवाई, पटना में माल बनाना शुरू किया. लालू यह भी कह सकते हैं कि इन संपत्तियों को भ्रष्टाचार से उपजी संपत्ति मान कर और उन्हें जब्त कर सी बी आई और टैक्स अधिकारियों ने बिहार की जनता के हित को बाधित किया. उनका आरोप यह तो हैं हीं कि भारतीय जनता पार्टी की केंद्र की सरकार के कहने पर सी बी आई यह सब कुछ कर रही है. इसी तर्क को आगे बढ़ाते हुए लालू यह भी आरोप लगा सकते हैं कि चूंकि भारतीय जनता पार्टी और नीतीश बिहार की जनता का हित नहीं चाहते इसलिए हमारी संपत्ति जब्त की जा रही है. उनके बेटे तेजस्वी ने सत्ता जाने के बाद मीडिया से कहा भी कि वह और उनकी पार्टी बिहार की जनता , खासकर गरीबों का, दबे कुचलों के हित में "पहले की तरह" काम करती रहेगी चाहे कितनी मुसीबतें खडी की जाएँ. 

तो लब्बो-लुआब यह कि नीतीश ने भी बिहार की जनता के हित में पहले लालू से रिश्ता जोड़ा फिर तोड़ा और अब लालू का इरादा  भी इस घटना के बाद “बिहार की जनता के हित में” एक बार फिर पक्का हो गया.

तो क्या ये नीतीश या ये लालू हीं गलत हैं और जनता के हित के नाम पर बेवकूफ बना रहे हैं? नीतीश पर आरोप हैं कि अगर आज वह लालू के बेटे और बिहार के तत्कालीन उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी के भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस (शून्य-सहिष्णुता) रखते हैं और गद्दी तक छोड़ने का संकल्प रखते हैं तो जब लालू की पार्टी से मिलकर महागठबंधन बनाया और जनता के पास “सांप्रदायिक ताकतों को देश के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बताया” तो लालू यादव में उन्हें क्या “धर्मराज युधिष्ठिर” दिखाई दे रहे थे? क्या उन्हें नहीं मालूम था कि चारा घोटाले में लालू सजायाफ्ता हैं और चुनाव लड़ने से कानून-बाधित हैं? क्या नीतीश कुमार यह भी नहीं जानते थे कि लालू के बेटे या बेटों की सलाहियत क्या है और बिहार की जनता का हित घटिया “परिवारवाद” से कैसे संभव है.

लेकिन क्यों हम विश्लेषक या बुद्धिजीवी केवल किसी नीतीश या लालू को दोषी क़रार दे कर अपनी तार्किक अक्षमका परिचय देते हैं. क्यों नहीं हम यह कहने की हिम्मत करते कि दोष इन राजनीतिक वर्ग के लोगों का नहीं, बल्कि दोष बिहार में जाति और सम्प्रदाय के रंग में सराबोर जनता का है. क्या वोटरों को ये सारी बातें नहीं मालूम थीं? अगर जनता का मतलब यादव, जनता का मतलब कुर्मी , जनता का मतलब हिन्दू –मुसलमान , जनता का मतलब  दलित और जनता का मतलब  “नीतीश-कृत” “महादलित” है तो जाहिर है सामाज को ऐसे हीं नेता मिलेंगे. वर्ना दुनिया के किसी भी सभ्य, तार्किक और समुन्नत समाज में चारा घोटाले में फंसने के बाद और अदालत से सजा पाने के बाद कैसे कोई नेता अपनी पत्नी को मुख्यमंत्री बना देगा और बेटे को उप-मुख्यमंत्री और वह भी “जनता “ के वोट से?

गलती समाज की है, जनता की है और वोटरों की है. अगर खतरनाक अपराधी शहाबुद्दीन संसद की चौखट को “माननीय” के रूप में पांच बार लाँघ सकता है जनता के वोटों के बल पर, तो शहाबुद्दीन नहीं हम गलत हैं. समस्या राजनीति या राजनीतिक वर्ग की नहीं है. अगर कांग्रेस सेकुलरिज्म के नाम पर एक वर्ग को संतुष्ट और दूसरे को रुष्ट करेगी तो सन १९८४ में राम मंदिर आन्दोलन होगा और अगर मंदिर के नाम पर जनता गुमराह होगी तो अगले पांच साल में कोई नेता मंडल आयोग को भी अलमारी से झाड-पोंछ कर निकालेगा और तब सामजिक न्याय की ताकतों के रूप में कोई लालू , मुलायम , मायावती, ममता, पैदा होंगा. कोई नीतीश इसकी भी काट निकालने के लिए एक महादलित पहचान समूह पैदा करेगा.

लेकिन सवाल यह है कि हम क्यों नहीं समझ पा रहे हैं कि लालू के फार्म हाउस सालों –दर-साल कैसे बढ़ते  जा रहे हैं? सामजिक न्याय का यह कौन सा मकाम है जिसे लोहिया नहीं समझ पाए पर लालू –मुलायम समझ जाते हैं. क्या कभी हमने बिहार में रोजगार के लिए कोई आन्दोलन किया? क्या कभी भ्रष्टाचार के खिलाफ तन कर खड़े हुए? बिहार आज भी आन्दोलन कर रहा है और फिर इस बार लालू और उनके बेटे का दावा है कि वह इस आन्दोलन के जरिये पिछड़ों, गरीबों और मजलूमों के लिए आवाज़ उठाते रहेंगे. हम यह कह कर नहीं बच सकते कि विकल्प क्या है? दरअसल अगर शहाबुद्दीन वोटरों की पसंद है तो कोई आदर्शवादी राजनीति में कैसे जाएगा. लिहाज़ा अपनी पसंद बदलें.      

lokmat

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