Sunday, 6 September 2015

शीना हत्या केसः उन्मुक्तता के नाम पर ऐय्याशी-जनित 'लिव-इन' संबंधों को खत्म करें

 
 
 




तो अब डी एन ए टेस्ट से पता लगाया जाएगा कि किस बेटे-बेटी का बाप कौन है क्योंकि कन्फ्यूजन यह है कि किसी लिव-इन रिलेशन को भी धोखा देते हुए किस भावी लिव –इन पार्टनर के साथ "ट्रायल के दौरान" कोई संतान दुनिया में आयी यह माँ को भी नहीं पता है. लिहाज़ा वह क्यों अगले १८ साल के लिए ढोए यह जिम्मेदारी और अपना "करियर" खराब करे. उधर पहला और दूसरा लिव-इन पार्टनर अपने को मुक्त कर सकते हैं यह कहते हुए कि पहले पता करो कि "किसका है". लिहाज़ा अब डी एन ए से पता चलेगा बच्चा किस की जिम्मेदारी है. आज जेल में बंद इन्द्रानी पहले कई "शादियाँ" "बना" चुकी है. उसके पैत्रिक बंगले को देख कर हीं लगता है कि समाज के काफी ऊपर के वर्ग की रही है. उसके अनुसार उसके पिता ने उसकी माँ और उसे छोड़ दिया और उसके चाचा ने उसकी माँ को रखा और इन्द्रानी से भी शारीरिक सम्बन्ध बनाये. पुलिस को दिए बयान में जो मीडिया ने बताया, की पुष्टि देश के एक बड़े पत्रकार वीर संघवी ने भी की. "इन्द्रानी ने मुझसे भी यह बात बताई थी", संघवी ने एक न्यूज चैनल को पिछले हफ्ते बताया. संघवी इन्द्रानी के पति के टीवी चैनल में सम्पादक रह चुके हैं. खैर, यहाँ मकसद किसी इन्द्रनी के खानदान का वंश-वृक्ष दिखाने का नहीं ही बल्कि यह बताने का है कि रोटी जीत चुका एक वर्ग किस संस्कृति का है और किस तरह उसके लिए शाश्वत मूल्य भी कोई मायने नहीं रखते. साथ हीं चूंकि समाज का निचला वर्ग उसी ऊपरी वर्ग की नक़ल करता है लिहाज़ा ऊपर क्या हो रहा है और इसका ख़तरा कहाँ तक बढ़ गया है.



उधर ब्रिटेन में पैदा हुआ लिहाज़ा वहीं की नागरिकता रखने वाला पीटर मुखर्जी व रातों-रात धनी हुआ संजीव खन्ना भी कई शादियाँ "बना" चुके हैं. ये शादियाँ करते नहीं बल्कि "बनाते हैं". इनकी शादियाँ "जन्म-जन्म" के रिश्ते वाले फॉर्मेट में नहीं थी बल्कि "जब तक पटा ठीक, नहीं तो अपने-अपने रास्ते" वाले पाश्चात्य फॉर्मेट में थीं. इस फॉर्मेट की अनौपचारिक (जो अब कुछ पश्चिमी वैल्यू सिस्टम से प्रभावित भारतीय बुद्धिजीवी निर्बाध उन्मुक्तता के नाम पर औपचारिक बनाने में लगे हैं) परिणति है -- "लिव-इन-रिलेशन". अपनी जिस बेटी शीना को माँ इन्द्रानी ने अपने नंबर २ "पति" के साथ मिलकर मारा वह इसी आधुनिक "लिव-इन" रिलेशनशिप की पैदाइश है. शीना का पिता अचानक एक दिन अवतरित होता है और चैनलों को बताता है कि इन्द्रानी किस तरह बच्चे को छोड़ किसी धनी "पति" की तलाश में निकल गयी. "लिव-इन" नाम की गैर-परम्परागत अनैतिक, अस्थाई और समाज को पतन के दिशा में ले जाने वाली पश्चिमी प्रैक्टिस को भारत में भी धीरे-धीरे सामाजिक अभिमति मिलने लगी है और यहाँ तक की सर्वोच्च न्यायालय ने भी हाल के तमाम फैसलों में इसे मान्यता दे दी है. मूल रूप से भारत का कानून पहले वाले याने पारंपरिक विवाह के फॉर्मेट के प्रति बहुत सख्त है. हिन्दू रीति के मुताबिक "जन्म-जन्म" का रिश्ता अव्वल तो टूट हीं नहीं सकता फिर भी आज़ाद भारत में इसे कोई तोड़ना चाहे तो उसे तोड़ने के लिए अदालत में "तलाक" (हिंदी में इसके लिए कोई एक शब्द नहीं है समासन के जरिये हम "विवाह विच्छेद" गढ़ते हैं) की दुरूह प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है. इस्लामिक रीति में भी इसकी ज़रुरत नहीं पड़ती. तीन बार कहा और हो गया. समस्या हिन्दू और ईसाई विवाह पद्यति की ज्यादा है. यही वज़ह है कि "लिव-इन-रिलेशन" विवाह के मामले में सभी धार्मिक रीतियों से ज्यादा "पोपुलर" हो रहा है. इसके तहत "मॉडर्न" महिला बच्चे पैदा कर सकती है और फिर अगर "मूड" बदला तो फिर किसी संपन्न खन्ना की तलाश में बच्चों को कुत्ते का जीवन व्यतीत करने के लिए सड़क पर (या हर महीने कुछ पैसे दे कर आर्थिक रूप से कमज़ोर रिश्तेदार के घर) छोड़ सकती है. बच्चे का "बैगेज" साथ नहीं होगा तो उम्र मेक-अप से छिपा सकते है किसी खन्ना को फंसाने के लिए. खन्ना भी जानता है कि मेक-उप उतरने की बाद का चेहरा कैसा है. लेकिन वह भी जितनी नई –नई महिलाओं से "शादी बनाता" है उतनी हीं उसकी मार्किट वैल्यू होती है.



खन्ना इन्द्रानी को शादी न करते हुए भी रखता है, फिर छोड़ता है , फिर दोनों "आवश्यकतानुसार" के एक -दूसरे के साथ आ जाते हैं. इन्द्रानी भी यही करती है. इन्द्रानी और खन्ना उस नयी संस्कृति की अभिव्यक्ति है जो पश्चिमी उदारवाद, व्यक्ति स्वातंत्र्य, नारी उन्मुक्ति के नाम पर भारत के समाज को न केवल घायल कर रहा है बल्कि उसके जख्मों में मवाद पैदा कर रहा है. वैश्विक समाजशास्त्रीय सिद्धांत है कि माँ का अपनी कोख से पैदा बच्चे के प्रति ममत्व सबसे प्राकृतिक, प्रगाढ़ और अटूट होता है और उसके लिए माँ अपनी जान हंसते –हंसते दे देती है (अभी –कभी बेटा या बेटी भी) . इन्द्रानी भी अपनी बेटी शीना और बेटे मिखाइल की माँ है पर वह यह रिश्ता छिपाती है. छिपाने के लिए पैसे देती है और फिर जब उसे डर लगता है कि छिप नहीं पायेगा और ये औलादें संपत्ति में हिस्सा मांग सकती हैं या ब्लैकमेल कर सकती हैं तो वह अपनी हीं संतान को अपने तीन में से एक पति के साथ मिल कर मार देती है. मिखाइल कहता है कि अगर उस दिन वह भी वहां होता तो उसकी माँ उसे भी मार देती याने बच्चे का बैगेज हमेशा के लिए "डंप" कर देती है.



शरीर संरचना की ईश्वरीय या भौतिक व्यवस्था है कि शारीरिक सम्बन्ध होगा तो बच्चे पैदा होंगे दाम्पत्य सम्बन्ध का फॉर्मेट चाहे कोई भी हो. लेकिन इसकी काट भी है. बच्चे न होने के उपादान हैं. लिहाज़ा अगर किसी को जिन्दागी भर खन्ना तलाशना है और दाम्पत्य-जीवन को फैशन डिज़ाइनर के साप्ताहिक रूप से बदले जाने वाले ड्रेस की तरह जीना है तो इन उपादानों का इस्तेमाल कर सकता है ताकि न शीना पैदा होगी न मातृत्व की मजबूरियों के कारण शरीर शौष्ठव (फिगर) पर असर पडेगा.



आज प्रश्न यह है कि क्या किसी इन्द्रनी को या किसी खन्ना को यह अधिकार दिया जा सकता है कि शादी –दर शादी करता हुआ बच्चे पैदा करे और फिर उन्हें सडकों पर छोड़ दे और खुद दूसरी पार्टी में किसी इन्द्रानी पर डोरे डालता रहे या इन्द्रानी किसी और खन्ना या संपन्न पीटर की तलाश करती रहे.



पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित हो कर हमने कानून नहीं बनाये. आज दम्पत्ति में से कोई भी एक चाहे तो किसी अन्य व्यक्ति से शारीरिक सम्बन्ध बना सकता है अगर दूसरे को ऐतराज नहीं है. याने इन्द्रानी भी स्वतंत्र और खन्ना भी. लेकिन जहाँ पाश्चात्य देशों में राज्य के अभिकरण इन संबंधों से पैदा बच्चे की हिफाज़त का ज़िम्मा लेता है लिहाज़ा कोई इन्द्रानी किसी खन्ना से मिलकर अपने हीं कोख से पैदा बच्चे को नहीं मारती.



शीना हत्या के मामले ने भारतीय समाज को झकझोर दिया है. क्या उन्मुक्तता का अर्थ यहाँ तक बदल जाएगा कि हम लिव-इन रिलेशन के तहत हम नाजायज बच्चे पैदा करते रहेंगे और बगैर कोई जिम्मेदारी लिए उन्हें कुत्ते-बिल्ली का जीवन जीने को मजबूर करते रहेंगे. भारत के जींस में यह नहीं है नहीं राज्य के पास इन्टने संसाधन हैं कि दलित घुरहू या बैकवर्ड पतावारू के जीवन को बेहतर बनाने का प्राण छोड़ कर किसी धनी ऐय्यास इन्द्रानी और खन्ना की नाजायज पैदाइस को झेले. लिहाज़ा कानून बनाने की ज़रुरत है कि बचे पैदा किया तो दूसरी शादी तब तक नहीं जब तक बच्चे को पढ़ाने का खर्च और १४ साल तक पूर्ण मातृत्व नहीं देते. अन्यथा भारतीय समाज कुछ वर्षों में नाजायज औलादों का बसेरा बन जाएगा जिसमें न शिक्षा होगी न नैतिकता और तब हम उस फिसलन की राह पर होंगे जहाँ से गर्त हीं दीखता है ठहराव नहीं.
 
lokmat

शीना हत्या केसः उन्मुक्तता के नाम पर ऐय्याशी-जनित 'लिव-इन' संबंधों को खत्म करें

 
 
 




तो अब डी एन ए टेस्ट से पता लगाया जाएगा कि किस बेटे-बेटी का बाप कौन है क्योंकि कन्फ्यूजन यह है कि किसी लिव-इन रिलेशन को भी धोखा देते हुए किस भावी लिव –इन पार्टनर के साथ "ट्रायल के दौरान" कोई संतान दुनिया में आयी यह माँ को भी नहीं पता है. लिहाज़ा वह क्यों अगले १८ साल के लिए ढोए यह जिम्मेदारी और अपना "करियर" खराब करे. उधर पहला और दूसरा लिव-इन पार्टनर अपने को मुक्त कर सकते हैं यह कहते हुए कि पहले पता करो कि "किसका है". लिहाज़ा अब डी एन ए से पता चलेगा बच्चा किस की जिम्मेदारी है. आज जेल में बंद इन्द्रानी पहले कई "शादियाँ" "बना" चुकी है. उसके पैत्रिक बंगले को देख कर हीं लगता है कि समाज के काफी ऊपर के वर्ग की रही है. उसके अनुसार उसके पिता ने उसकी माँ और उसे छोड़ दिया और उसके चाचा ने उसकी माँ को रखा और इन्द्रानी से भी शारीरिक सम्बन्ध बनाये. पुलिस को दिए बयान में जो मीडिया ने बताया, की पुष्टि देश के एक बड़े पत्रकार वीर संघवी ने भी की. "इन्द्रानी ने मुझसे भी यह बात बताई थी", संघवी ने एक न्यूज चैनल को पिछले हफ्ते बताया. संघवी इन्द्रानी के पति के टीवी चैनल में सम्पादक रह चुके हैं. खैर, यहाँ मकसद किसी इन्द्रनी के खानदान का वंश-वृक्ष दिखाने का नहीं ही बल्कि यह बताने का है कि रोटी जीत चुका एक वर्ग किस संस्कृति का है और किस तरह उसके लिए शाश्वत मूल्य भी कोई मायने नहीं रखते. साथ हीं चूंकि समाज का निचला वर्ग उसी ऊपरी वर्ग की नक़ल करता है लिहाज़ा ऊपर क्या हो रहा है और इसका ख़तरा कहाँ तक बढ़ गया है.



उधर ब्रिटेन में पैदा हुआ लिहाज़ा वहीं की नागरिकता रखने वाला पीटर मुखर्जी व रातों-रात धनी हुआ संजीव खन्ना भी कई शादियाँ "बना" चुके हैं. ये शादियाँ करते नहीं बल्कि "बनाते हैं". इनकी शादियाँ "जन्म-जन्म" के रिश्ते वाले फॉर्मेट में नहीं थी बल्कि "जब तक पटा ठीक, नहीं तो अपने-अपने रास्ते" वाले पाश्चात्य फॉर्मेट में थीं. इस फॉर्मेट की अनौपचारिक (जो अब कुछ पश्चिमी वैल्यू सिस्टम से प्रभावित भारतीय बुद्धिजीवी निर्बाध उन्मुक्तता के नाम पर औपचारिक बनाने में लगे हैं) परिणति है -- "लिव-इन-रिलेशन". अपनी जिस बेटी शीना को माँ इन्द्रानी ने अपने नंबर २ "पति" के साथ मिलकर मारा वह इसी आधुनिक "लिव-इन" रिलेशनशिप की पैदाइश है. शीना का पिता अचानक एक दिन अवतरित होता है और चैनलों को बताता है कि इन्द्रानी किस तरह बच्चे को छोड़ किसी धनी "पति" की तलाश में निकल गयी. "लिव-इन" नाम की गैर-परम्परागत अनैतिक, अस्थाई और समाज को पतन के दिशा में ले जाने वाली पश्चिमी प्रैक्टिस को भारत में भी धीरे-धीरे सामाजिक अभिमति मिलने लगी है और यहाँ तक की सर्वोच्च न्यायालय ने भी हाल के तमाम फैसलों में इसे मान्यता दे दी है. मूल रूप से भारत का कानून पहले वाले याने पारंपरिक विवाह के फॉर्मेट के प्रति बहुत सख्त है. हिन्दू रीति के मुताबिक "जन्म-जन्म" का रिश्ता अव्वल तो टूट हीं नहीं सकता फिर भी आज़ाद भारत में इसे कोई तोड़ना चाहे तो उसे तोड़ने के लिए अदालत में "तलाक" (हिंदी में इसके लिए कोई एक शब्द नहीं है समासन के जरिये हम "विवाह विच्छेद" गढ़ते हैं) की दुरूह प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है. इस्लामिक रीति में भी इसकी ज़रुरत नहीं पड़ती. तीन बार कहा और हो गया. समस्या हिन्दू और ईसाई विवाह पद्यति की ज्यादा है. यही वज़ह है कि "लिव-इन-रिलेशन" विवाह के मामले में सभी धार्मिक रीतियों से ज्यादा "पोपुलर" हो रहा है. इसके तहत "मॉडर्न" महिला बच्चे पैदा कर सकती है और फिर अगर "मूड" बदला तो फिर किसी संपन्न खन्ना की तलाश में बच्चों को कुत्ते का जीवन व्यतीत करने के लिए सड़क पर (या हर महीने कुछ पैसे दे कर आर्थिक रूप से कमज़ोर रिश्तेदार के घर) छोड़ सकती है. बच्चे का "बैगेज" साथ नहीं होगा तो उम्र मेक-अप से छिपा सकते है किसी खन्ना को फंसाने के लिए. खन्ना भी जानता है कि मेक-उप उतरने की बाद का चेहरा कैसा है. लेकिन वह भी जितनी नई –नई महिलाओं से "शादी बनाता" है उतनी हीं उसकी मार्किट वैल्यू होती है.



खन्ना इन्द्रानी को शादी न करते हुए भी रखता है, फिर छोड़ता है , फिर दोनों "आवश्यकतानुसार" के एक -दूसरे के साथ आ जाते हैं. इन्द्रानी भी यही करती है. इन्द्रानी और खन्ना उस नयी संस्कृति की अभिव्यक्ति है जो पश्चिमी उदारवाद, व्यक्ति स्वातंत्र्य, नारी उन्मुक्ति के नाम पर भारत के समाज को न केवल घायल कर रहा है बल्कि उसके जख्मों में मवाद पैदा कर रहा है. वैश्विक समाजशास्त्रीय सिद्धांत है कि माँ का अपनी कोख से पैदा बच्चे के प्रति ममत्व सबसे प्राकृतिक, प्रगाढ़ और अटूट होता है और उसके लिए माँ अपनी जान हंसते –हंसते दे देती है (अभी –कभी बेटा या बेटी भी) . इन्द्रानी भी अपनी बेटी शीना और बेटे मिखाइल की माँ है पर वह यह रिश्ता छिपाती है. छिपाने के लिए पैसे देती है और फिर जब उसे डर लगता है कि छिप नहीं पायेगा और ये औलादें संपत्ति में हिस्सा मांग सकती हैं या ब्लैकमेल कर सकती हैं तो वह अपनी हीं संतान को अपने तीन में से एक पति के साथ मिल कर मार देती है. मिखाइल कहता है कि अगर उस दिन वह भी वहां होता तो उसकी माँ उसे भी मार देती याने बच्चे का बैगेज हमेशा के लिए "डंप" कर देती है.



शरीर संरचना की ईश्वरीय या भौतिक व्यवस्था है कि शारीरिक सम्बन्ध होगा तो बच्चे पैदा होंगे दाम्पत्य सम्बन्ध का फॉर्मेट चाहे कोई भी हो. लेकिन इसकी काट भी है. बच्चे न होने के उपादान हैं. लिहाज़ा अगर किसी को जिन्दागी भर खन्ना तलाशना है और दाम्पत्य-जीवन को फैशन डिज़ाइनर के साप्ताहिक रूप से बदले जाने वाले ड्रेस की तरह जीना है तो इन उपादानों का इस्तेमाल कर सकता है ताकि न शीना पैदा होगी न मातृत्व की मजबूरियों के कारण शरीर शौष्ठव (फिगर) पर असर पडेगा.



आज प्रश्न यह है कि क्या किसी इन्द्रनी को या किसी खन्ना को यह अधिकार दिया जा सकता है कि शादी –दर शादी करता हुआ बच्चे पैदा करे और फिर उन्हें सडकों पर छोड़ दे और खुद दूसरी पार्टी में किसी इन्द्रानी पर डोरे डालता रहे या इन्द्रानी किसी और खन्ना या संपन्न पीटर की तलाश करती रहे.



पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित हो कर हमने कानून नहीं बनाये. आज दम्पत्ति में से कोई भी एक चाहे तो किसी अन्य व्यक्ति से शारीरिक सम्बन्ध बना सकता है अगर दूसरे को ऐतराज नहीं है. याने इन्द्रानी भी स्वतंत्र और खन्ना भी. लेकिन जहाँ पाश्चात्य देशों में राज्य के अभिकरण इन संबंधों से पैदा बच्चे की हिफाज़त का ज़िम्मा लेता है लिहाज़ा कोई इन्द्रानी किसी खन्ना से मिलकर अपने हीं कोख से पैदा बच्चे को नहीं मारती.



शीना हत्या के मामले ने भारतीय समाज को झकझोर दिया है. क्या उन्मुक्तता का अर्थ यहाँ तक बदल जाएगा कि हम लिव-इन रिलेशन के तहत हम नाजायज बच्चे पैदा करते रहेंगे और बगैर कोई जिम्मेदारी लिए उन्हें कुत्ते-बिल्ली का जीवन जीने को मजबूर करते रहेंगे. भारत के जींस में यह नहीं है नहीं राज्य के पास इन्टने संसाधन हैं कि दलित घुरहू या बैकवर्ड पतावारू के जीवन को बेहतर बनाने का प्राण छोड़ कर किसी धनी ऐय्यास इन्द्रानी और खन्ना की नाजायज पैदाइस को झेले. लिहाज़ा कानून बनाने की ज़रुरत है कि बचे पैदा किया तो दूसरी शादी तब तक नहीं जब तक बच्चे को पढ़ाने का खर्च और १४ साल तक पूर्ण मातृत्व नहीं देते. अन्यथा भारतीय समाज कुछ वर्षों में नाजायज औलादों का बसेरा बन जाएगा जिसमें न शिक्षा होगी न नैतिकता और तब हम उस फिसलन की राह पर होंगे जहाँ से गर्त हीं दीखता है ठहराव नहीं.
 
lokmat

शीना हत्या केसः उन्मुक्तता के नाम पर ऐय्याशी-जनित 'लिव-इन' संबंधों को खत्म करें

 
 
 




तो अब डी एन ए टेस्ट से पता लगाया जाएगा कि किस बेटे-बेटी का बाप कौन है क्योंकि कन्फ्यूजन यह है कि किसी लिव-इन रिलेशन को भी धोखा देते हुए किस भावी लिव –इन पार्टनर के साथ "ट्रायल के दौरान" कोई संतान दुनिया में आयी यह माँ को भी नहीं पता है. लिहाज़ा वह क्यों अगले १८ साल के लिए ढोए यह जिम्मेदारी और अपना "करियर" खराब करे. उधर पहला और दूसरा लिव-इन पार्टनर अपने को मुक्त कर सकते हैं यह कहते हुए कि पहले पता करो कि "किसका है". लिहाज़ा अब डी एन ए से पता चलेगा बच्चा किस की जिम्मेदारी है. आज जेल में बंद इन्द्रानी पहले कई "शादियाँ" "बना" चुकी है. उसके पैत्रिक बंगले को देख कर हीं लगता है कि समाज के काफी ऊपर के वर्ग की रही है. उसके अनुसार उसके पिता ने उसकी माँ और उसे छोड़ दिया और उसके चाचा ने उसकी माँ को रखा और इन्द्रानी से भी शारीरिक सम्बन्ध बनाये. पुलिस को दिए बयान में जो मीडिया ने बताया, की पुष्टि देश के एक बड़े पत्रकार वीर संघवी ने भी की. "इन्द्रानी ने मुझसे भी यह बात बताई थी", संघवी ने एक न्यूज चैनल को पिछले हफ्ते बताया. संघवी इन्द्रानी के पति के टीवी चैनल में सम्पादक रह चुके हैं. खैर, यहाँ मकसद किसी इन्द्रनी के खानदान का वंश-वृक्ष दिखाने का नहीं ही बल्कि यह बताने का है कि रोटी जीत चुका एक वर्ग किस संस्कृति का है और किस तरह उसके लिए शाश्वत मूल्य भी कोई मायने नहीं रखते. साथ हीं चूंकि समाज का निचला वर्ग उसी ऊपरी वर्ग की नक़ल करता है लिहाज़ा ऊपर क्या हो रहा है और इसका ख़तरा कहाँ तक बढ़ गया है.



उधर ब्रिटेन में पैदा हुआ लिहाज़ा वहीं की नागरिकता रखने वाला पीटर मुखर्जी व रातों-रात धनी हुआ संजीव खन्ना भी कई शादियाँ "बना" चुके हैं. ये शादियाँ करते नहीं बल्कि "बनाते हैं". इनकी शादियाँ "जन्म-जन्म" के रिश्ते वाले फॉर्मेट में नहीं थी बल्कि "जब तक पटा ठीक, नहीं तो अपने-अपने रास्ते" वाले पाश्चात्य फॉर्मेट में थीं. इस फॉर्मेट की अनौपचारिक (जो अब कुछ पश्चिमी वैल्यू सिस्टम से प्रभावित भारतीय बुद्धिजीवी निर्बाध उन्मुक्तता के नाम पर औपचारिक बनाने में लगे हैं) परिणति है -- "लिव-इन-रिलेशन". अपनी जिस बेटी शीना को माँ इन्द्रानी ने अपने नंबर २ "पति" के साथ मिलकर मारा वह इसी आधुनिक "लिव-इन" रिलेशनशिप की पैदाइश है. शीना का पिता अचानक एक दिन अवतरित होता है और चैनलों को बताता है कि इन्द्रानी किस तरह बच्चे को छोड़ किसी धनी "पति" की तलाश में निकल गयी. "लिव-इन" नाम की गैर-परम्परागत अनैतिक, अस्थाई और समाज को पतन के दिशा में ले जाने वाली पश्चिमी प्रैक्टिस को भारत में भी धीरे-धीरे सामाजिक अभिमति मिलने लगी है और यहाँ तक की सर्वोच्च न्यायालय ने भी हाल के तमाम फैसलों में इसे मान्यता दे दी है. मूल रूप से भारत का कानून पहले वाले याने पारंपरिक विवाह के फॉर्मेट के प्रति बहुत सख्त है. हिन्दू रीति के मुताबिक "जन्म-जन्म" का रिश्ता अव्वल तो टूट हीं नहीं सकता फिर भी आज़ाद भारत में इसे कोई तोड़ना चाहे तो उसे तोड़ने के लिए अदालत में "तलाक" (हिंदी में इसके लिए कोई एक शब्द नहीं है समासन के जरिये हम "विवाह विच्छेद" गढ़ते हैं) की दुरूह प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है. इस्लामिक रीति में भी इसकी ज़रुरत नहीं पड़ती. तीन बार कहा और हो गया. समस्या हिन्दू और ईसाई विवाह पद्यति की ज्यादा है. यही वज़ह है कि "लिव-इन-रिलेशन" विवाह के मामले में सभी धार्मिक रीतियों से ज्यादा "पोपुलर" हो रहा है. इसके तहत "मॉडर्न" महिला बच्चे पैदा कर सकती है और फिर अगर "मूड" बदला तो फिर किसी संपन्न खन्ना की तलाश में बच्चों को कुत्ते का जीवन व्यतीत करने के लिए सड़क पर (या हर महीने कुछ पैसे दे कर आर्थिक रूप से कमज़ोर रिश्तेदार के घर) छोड़ सकती है. बच्चे का "बैगेज" साथ नहीं होगा तो उम्र मेक-अप से छिपा सकते है किसी खन्ना को फंसाने के लिए. खन्ना भी जानता है कि मेक-उप उतरने की बाद का चेहरा कैसा है. लेकिन वह भी जितनी नई –नई महिलाओं से "शादी बनाता" है उतनी हीं उसकी मार्किट वैल्यू होती है.



खन्ना इन्द्रानी को शादी न करते हुए भी रखता है, फिर छोड़ता है , फिर दोनों "आवश्यकतानुसार" के एक -दूसरे के साथ आ जाते हैं. इन्द्रानी भी यही करती है. इन्द्रानी और खन्ना उस नयी संस्कृति की अभिव्यक्ति है जो पश्चिमी उदारवाद, व्यक्ति स्वातंत्र्य, नारी उन्मुक्ति के नाम पर भारत के समाज को न केवल घायल कर रहा है बल्कि उसके जख्मों में मवाद पैदा कर रहा है. वैश्विक समाजशास्त्रीय सिद्धांत है कि माँ का अपनी कोख से पैदा बच्चे के प्रति ममत्व सबसे प्राकृतिक, प्रगाढ़ और अटूट होता है और उसके लिए माँ अपनी जान हंसते –हंसते दे देती है (अभी –कभी बेटा या बेटी भी) . इन्द्रानी भी अपनी बेटी शीना और बेटे मिखाइल की माँ है पर वह यह रिश्ता छिपाती है. छिपाने के लिए पैसे देती है और फिर जब उसे डर लगता है कि छिप नहीं पायेगा और ये औलादें संपत्ति में हिस्सा मांग सकती हैं या ब्लैकमेल कर सकती हैं तो वह अपनी हीं संतान को अपने तीन में से एक पति के साथ मिल कर मार देती है. मिखाइल कहता है कि अगर उस दिन वह भी वहां होता तो उसकी माँ उसे भी मार देती याने बच्चे का बैगेज हमेशा के लिए "डंप" कर देती है.



शरीर संरचना की ईश्वरीय या भौतिक व्यवस्था है कि शारीरिक सम्बन्ध होगा तो बच्चे पैदा होंगे दाम्पत्य सम्बन्ध का फॉर्मेट चाहे कोई भी हो. लेकिन इसकी काट भी है. बच्चे न होने के उपादान हैं. लिहाज़ा अगर किसी को जिन्दागी भर खन्ना तलाशना है और दाम्पत्य-जीवन को फैशन डिज़ाइनर के साप्ताहिक रूप से बदले जाने वाले ड्रेस की तरह जीना है तो इन उपादानों का इस्तेमाल कर सकता है ताकि न शीना पैदा होगी न मातृत्व की मजबूरियों के कारण शरीर शौष्ठव (फिगर) पर असर पडेगा.



आज प्रश्न यह है कि क्या किसी इन्द्रनी को या किसी खन्ना को यह अधिकार दिया जा सकता है कि शादी –दर शादी करता हुआ बच्चे पैदा करे और फिर उन्हें सडकों पर छोड़ दे और खुद दूसरी पार्टी में किसी इन्द्रानी पर डोरे डालता रहे या इन्द्रानी किसी और खन्ना या संपन्न पीटर की तलाश करती रहे.



पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित हो कर हमने कानून नहीं बनाये. आज दम्पत्ति में से कोई भी एक चाहे तो किसी अन्य व्यक्ति से शारीरिक सम्बन्ध बना सकता है अगर दूसरे को ऐतराज नहीं है. याने इन्द्रानी भी स्वतंत्र और खन्ना भी. लेकिन जहाँ पाश्चात्य देशों में राज्य के अभिकरण इन संबंधों से पैदा बच्चे की हिफाज़त का ज़िम्मा लेता है लिहाज़ा कोई इन्द्रानी किसी खन्ना से मिलकर अपने हीं कोख से पैदा बच्चे को नहीं मारती.



शीना हत्या के मामले ने भारतीय समाज को झकझोर दिया है. क्या उन्मुक्तता का अर्थ यहाँ तक बदल जाएगा कि हम लिव-इन रिलेशन के तहत हम नाजायज बच्चे पैदा करते रहेंगे और बगैर कोई जिम्मेदारी लिए उन्हें कुत्ते-बिल्ली का जीवन जीने को मजबूर करते रहेंगे. भारत के जींस में यह नहीं है नहीं राज्य के पास इन्टने संसाधन हैं कि दलित घुरहू या बैकवर्ड पतावारू के जीवन को बेहतर बनाने का प्राण छोड़ कर किसी धनी ऐय्यास इन्द्रानी और खन्ना की नाजायज पैदाइस को झेले. लिहाज़ा कानून बनाने की ज़रुरत है कि बचे पैदा किया तो दूसरी शादी तब तक नहीं जब तक बच्चे को पढ़ाने का खर्च और १४ साल तक पूर्ण मातृत्व नहीं देते. अन्यथा भारतीय समाज कुछ वर्षों में नाजायज औलादों का बसेरा बन जाएगा जिसमें न शिक्षा होगी न नैतिकता और तब हम उस फिसलन की राह पर होंगे जहाँ से गर्त हीं दीखता है ठहराव नहीं.
 
lokmat

Friday, 28 August 2015

“वे गरीब होते रहे हम “हार्दिक” खड़ा करते रहे”



आरक्षण इलाज नहीं बीमारी है निदान कहीं और है    

एक हार्दिक पटेल और. अगर सिलसिला जारी रहा तो आने वाले कुछ दिनों में हर राज्य में कई और हार्दिक और इन हार्दिकों के खिलाफ कुछ अन्य जातियों के और हार्दिक. नहीं तो कुछ और राजीव गोस्वामी. अगर मंडल कमीशन की रिपोर्ट माने तो अभी ३७४३ हांर्दिकों की गुंजाइश साफ़ तौर पर है और फिर भी अगर कुछ कमी होगी कोई नीतीश कुमार कोई “महा” उपसर्ग लगा कर एक नया सामजिक पहचान समूह खड़ा कर सकता है याने कुछ और  हार्दिक. फिर प्रतिक्रिया में कुछ और राजीव गोस्वामी. हमने ७० साल में भारतीय समाज को हजारों टुकड़ों में तोड़ने की व्यवस्था को एक बार फिर हवा देनी शुरू की है.  

इस बीच ताज़ा आंकड़ों के अनुसार सन २००० में एक प्रतिशत ऊपर के वर्ग का देश की ३७ प्रतिशत संपत्ति पर कब्जा था जो सन २००५ में ४३ प्रतिशत, सन २०१० में ४८.६ प्रतिशत और पिछली साल तक याने २०१४ में बढ़ कर ४९ प्रतिशत हो गया. मतलब देश की आधी संपत्ति मात्र एक प्रतिशत के पास खींच कर चली गयी. सिलसिला जारी रहा तो बाकी ९९ प्रतिशत के पास अपनी चड्डी भी नहीं बचेगी. और हम हार्दिक पैदा करते रहेंगे. एक और तथ्य पर गौर करें. देश के सबसे गरीब १० प्रतिशत और सबसे अमीर दस प्रतिशत के बीच की खाई जो सन २००० में १८४० गुना थी वह २००५ में २१५० गुना , २०१० में २४३० गुना और २०१४ में २४५० गुना हो गयी है. लेकिन हम नेहरु से लेकर आज तक यह कहते रहे कि इस खाई को कम करना है. सामजिक न्याय के आन्दोलन की राजनीतिक उपज लालू, मुलायम, नीतीश, या उसके कोई पांच छः साल पहले आये कांशीराम (१९८४) और बाद में मायावती सभी पहले हार्दिक बन कर आते हैं फिर सत्ता में आ कर उसी एक प्रतिशत में शामिल हो जाते है किसी नए हार्दिक के लिए जगह बना कर. सत्ता इन वोटों के सौदागरों के हाथ ब्लैकमेल होती रही है वर्ना हार्दिक का बेहद समृद्ध पटेलों ले लिए आरक्षण और उसकी रैली में इतनी भीड़ और क्या प्रदर्शित करती है? “हमें बलपूर्वक लेना भी आता है” यह उदगार २२ साल के हार्दिक के “बलपूर्वक लेने” के अनुभव का नहीं बल्कि उस सामूहिक ब्लैकमेल के नए ज़ज्बे का परिचायक है. ख़तरा देश -व्यापी हो सकता है.     

आइन्स्टीन के कहा था “महत्वपूर्ण समस्याओं का समाधान सोच के उसी स्तर पर रहने से नहीं हो सकता जिस सोच के स्तर से हमने उन्हें पैदा किया था”. शायद पिछले ७० साल में हमने सोच का स्तर वही २५०० साल पुराना रखा जब हमने समाज को पहचान समूहों में बांटा था और उनका स्तरीकरण करके शोषण का कभी न ख़त्म होने वाला सिलसिला शुरू किया. शोषण आज भी हो रहा है, शोषक भी वही हैं और शोषित भी वही. सिर्फ काल-विशेष में या खंड-विशेष में हम कोई हार्दिक पैदा करते हैं जो कुछ दिनों बाद उसी एक प्रतिशत में शामिल हो जाता है.

आधुनिक भारत में सत्ता –नीत आरक्षण के “धंधे” परे नज़र डालें. सुनने में यह बेहद खुशनुमा शब्द है. इस के प्रयोग के औचित्य को लेकर कुछ सिद्धांत बनाये गए मसलन : सकारात्मक विभेद (पॉजिटिव डिस्क्रिमिनेशन)” “ प्रति-पूर्ति (कम्पेंसेटरी का सिद्धांत” “उर्ध्व-सञ्चालन का सिद्धांत (अपवार्ड मोबिलिटी” या “सकारात्मक उपक्रम (एफरमेटिव एक्शन) आदि आदि. माने चूंकि कुछ अभावग्रस्त पहचान समूह सामाजिक विकास में पीछे रह गए (याने हार्दिक एक प्रतिशत में शामिल नहीं हो पाए ) लिहाज़ा समाज को इन्हें मुआवजा के सहित बराबर पर लाना होगा. यहाँ तक तो ठीक था पर इसका आगाज़ा कैसे हुआ यह सुन कर आप चौंक जायेंगे. 

इसका इतिहास है. ब्रिटेन के विदेश मंत्री (भारतीय मामलों के) वुड ने लार्ड एल्गिन को १८६२ में वे सरे प्रयास करने को कहा जिससे भारत टूट सकता हो और इसका फायदा ब्रिटेन को मिले. इसे २६ मई ,१८८६ के पत्र में जॉर्ज हेमिल्टन ने लार्ड कर्ज़न को आगे बढ़ने को कहा और १४ जनवरी, १८८७ को  क्रोस ने लार्ड डफरिन को. शुरूआत अंग्रेजों ने की थी १९३२ में “कम्युनल अवार्ड” के जरिये. ब्रिटिश प्रधानमंत्री रामसे मकडोनाल्ड ने १६ अगस्त , १९३२ को इस पर हस्ताक्षर किया इसके तहत पूरे भारत कोई हजारों टुकड़ों में बांटने की योजना थे तमाम जातियों, धर्मों को अलग मतदान करने और साथ हीं सरकारी पदों पर आरक्षण पाने के लिए. और उस समय भी मकडोनाल्ड ने ब्रिटिश संसद में इन्हीं सिद्धांतों की दुहाई दी  थी. गाँधी ने इस कुत्सित प्रयास का जबरदस्त विरोध शुरू किया था लेकिन तत्कालीन मुसलमान नेताओं ने एवं डॉ अम्बेदकर ने इसकी हिमायत की थी.

अब आइये संविधान निर्माताओं के भाव पर. उन्हें जाति- या धर्म -–आधारित आरक्षण कतई मंजूर नहीं था. इसीलिये अनुच्छेद १५ (१) में स्पष्ट रूप से राज्य को जाति, धर्म, नस्ल या जन्म स्थान को लेकर भेदभाव न करने का प्रावधान बना. अनुच्छेद १६(४) आरक्षण के कानों बनाने के अधिकार तो राज्य को दिए गए लेकिन वहां शब्द “पिछड़े वर्ग” का प्रयोग किया गया न कि जाति का. गणतंत्र बनाने के एक साल में हीं तत्कालीन मद्रास सरकार ने एक आदेश कर जाति आधारित आरक्षण किया जिसे अपने मशहूर फैसले में उच्चतम  न्यायलय ने दोरैराजन केस में उपरोक्त अनुच्छेदों का हवाला देते हुए गलत करार दिया. लेकिन नेहरु को यह फैसला नागवार गुजरा और तत्काल संविधान संशोधन किया गया जिसके तहत अनुच्छेद (१५(४) जोड़ा गया ताकि राज्य को सक्षम किया जा सके. यहाँ भी जाति शब्द न ला कर “वर्ग” लाया गया. गनीमत रही कि बारह साल बाद १९६३ में  सुप्रीम कोर्ट ने एम् आर बालाजी केस में ५० प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण किसी भी कीमत पर न करने की मुमानियत कर दी वर्णमा सत्ता के सौदागर इसे ९९ प्रतिशत तक ले जा कर छोड़ते. बहरहाल जाति आधारित आरक्षण (अनुसूचित जाति/ जनजाति छोड़ कर) अगले २६ वर्षों तक राष्ट्रीय नीति के रूप में नहीं आ सकी.

सन १९७९ जनता पार्टी की सरकार में मंडल आयोग बना क्योंकि उस समय तक पिछड़ी जातियों का कांग्रेस से मोह भंग हुआ था और जनता पार्टी इस वोट बैंक को शाश्वत समर्थन की रूप में चाहती थी. दो साल में रिपोर्ट आयी. लेकिन कांग्रेस सरकार की हिम्मत नहीं हुई इसे लगो करने की. विश्वनाथ प्रताप सिंह के शासन काल में इसे झाड-पोंछ कर लिकला गया उद्देश्य पिछड़ों का भला करने से ज्यादा कांग्रेस को ख़त्म कर एक गैर-कांग्रेस वोट बैंक बनाना था.

यानी लबो-लुआब यह कि जो अँगरेज़ १९३२ में चाहते थे वह इन सत्ताधारियों ने पिछले ६५ साल में कर दिया. भारत बांटता रहा. सम्पन्नता देश के एक प्रतिशत के हाथ में सिमटती रही.

आज ज़रुरत यह सोचने की है कि क्या लगातार कम होती सरकारी नौकरियों में आरक्षण इस समस्या का समाधान है या समस्या की जड़ है. अगर ६५ साल में खाई बढ़ती रही है तो क्या यह साबित नहीं होता कि आरक्षण सही समाधान नहीं है.

अगर आरक्षण जाति-विभेद का समाधान होता तो आज भी पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षित पदों में से आधी खाली क्यों रह रहे हैं? क्यों आज भी ग्रामीण भारत में हर दस में से नौ दलित बगैर जमीन मजदूर है जो कुपोषण का , अशिक्षा का , हर तरह के अभाव का शिकार है.

दरअसल सत्ताधारियों की इच्छा इनके जीवन को बेहतर करने से ज्यादा इन्हें पहचान समूह में बाँट कर हर चुनाव में इनसे वायदे कर के वोट लेने की रही है. और प्रतीक के तौर पर कोई एक हार्दिक खड़ा कर यह बताने की रही है कि “देखो तुम्हारी चिंता थी तभी तो हार्दिक खड़ा किया”.

आज ज़रुरत इस बात को रोकने की है कि बांटने वाली आरक्षण में जिसमें अपेक्षाकृत समृद्ध मीना जनजाति अपनी हीं दबी कुचली जनजातियों का हिस्सा खा कर पुश्त-दर-पुश्त मोटी ना होते हुए एक प्रतिशत में शामिल ना होती रहे. कोई यादव किसी कोइरी का आरक्षण में मिलाने वाला लाभ शाश्वत भाव से न हड़पता रहे और कोई दलित आई ए एस अधिकारी अपने बच्चे को अभिजात्य एक प्रतिशत वाले अंग्रेज़ी स्कूल में पढ़ा कर भी उसे प्रेमचंद की गोदान वाली “झुनिया” और “गोबर” का या दलित सिलिया का हिस्सा न हड़पता रहे.

क्यों न हम पहला प्रयास करें कि गाँव में अब ७० साल बाद जाति एक पहचान समूह न हो बल्कि  अभाव का पैमाना तय करे कि विकास के फल का सही पात्र कौन है. और यह पैमाना इस आधार पर बने कि किस क्षेत्र में नौकरी, स्कूल, बच्चों का पोषण, चिकिस्ता की सुविधा कितनी है और अगर उसे उपलब्ध करा दिया गया तो सरकारी नौकरियां जो कि हर साल पैदा होने वाली नौकरियों का मात्र दो प्रतिशत हैं कोई देखेगा भी नहीं. बस एक और शर्त कि सरकारी नौकरियों से हासिल भ्रष्टाचार की शक्ति और सत्ता शक्ति को ऐसा बांध दिया जाये कि कोई सरकारी नौकर पद का बेजा फायदा उठाने की जुर्रत न कर सके. ज़रुरत है एक ऐसे व्यवस्था कि जो प्रेमचंद के पंडित “मातादीन” की औलादों के लिए भी लागू हो और पिछड़ी जाति के गोबर के वंशजों के लिए भी और फिर दलित सिलिया किसी मातादीन की कामुक दृष्टि को भस्म करने की स्व-विकसित क्षमता रखे. तब किसी “हार्दिक” की शायद हीं ज़रुरत पड़े.   


लेकिन शायद यह सब इसलिए न हो पाए कि किसी राजनीतिक दल में वह ताकत नहीं है कि आरक्षण की जगह असली इलाज को तरजीह दे क्योंकि उसे डर रहेगा कि दूसरी पार्टी अपने हार्दिक पैदा कर के वोट बटोर लेगी. लिहाजा हम इसे गोल-गोल घोमाते रहेंगे और समाज विखंडित होता रहेगा और एक प्रतिशत बाकि ९९ प्रतिशत की अंतिम सांस पर भी कब्ज़ा जमाना चाहेगा. 

jagran

Sunday, 23 August 2015

बिहार विधान सभा चुनाव: कुछ अनुत्तरित प्रश्न


क्या लालू-नितीश पिछड़ी जातियों को एक धरातल पर ला सकेंगे ?  

बिहार विधान सभा के आगामी चुनाव कई सामाजिक कारकों, उनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और युवाओं की बदलती अपेक्षाओं पर आधारित होगी और यही वजह है चुनाव की पारंपरिक युद्ध-शैली को जो जितना बदल सकेगा वही विजयी होगा. सामाजिक प्रश्न है: क्या पिछले छः दशकों के पिछड़े वर्ग की एकता के अनुत्पादक प्रयास अबकी बार फलीभूत हो सकेंगे? दूसरा : क्या सशक्तिकरण की झूठी चेतना जगाने का पारंपरिक खेल अभी भी पिछड़ी जाति के रोजगार के अभाव में नाराज युवाओं को लुभा पायेगा?  तीसरा : क्या विकास (जिसमें रोजगार के अवसर भी शामिल हैं) आपस में वैमनस्यतापूर्ण जाति समूहों में बंटे बिहार समाज की सदियों की सोच को बदल पायेगा याने क्या लालू के मतदाता नीतीश के उम्मीदवार को वोट देंगे ? और चौथा क्या बिहार गौरव या “यादव गरिमा” जैसी कोई सोच बिहार में विकसित की जा सकती है ? 
लालू यादव और नीतीश कुमार जिन  जातियों या जाति समूहों का प्रतिनिधित्व करते हैं वे अलग-अलग हीं नहीं हैं बल्कि उनमें द्वंदात्मक सम्बन्ध हैं ऐसे में इन सदियों की सामजिक वैमनस्यता को ख़त्म करने के लिए जो नेतृत्व का बडप्पन चाहिए क्या वह लालू यादव में या नीतीश में हैं और वह भी तब जब पिछले १५ साल से दोनों एक-दूसरे की लानात –मलानत करते रहे हों? सांप, चन्दन, जहर आदि का ताज़ा प्रयोग क्या यह विश्वास दिला पायेगा कि सत्ता में आने के बाद फिर झगड़े परवान नहीं चढ़ेंगे ? यहाँ एक प्रश्न और भी इसी से जुड़ा है : क्या गैर-यादव जातियां यह भूल जायेंगी कि पिछले दो दशकों से जमीन की बढ़ती कीमतों के कारण सबसे ज्यादा यादव अपराधियों ने कमजोरों की जमीन हथियाई है और क्या उनके हौसले जीतने के बाद और बुलंद नहीं होंगे?         
इतिहास पर नज़र डालें तो पिछड़ी जाति की पहली एकता बिहार के इतिहास पर नज़र डालें तो कुंवर सिंह की अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई का नेतृत्व रणजीत सिंह यादव ने किया था. सन १९११ में कांग्रेस नेता और पार्टी के संस्थापक सदस्य रास बिहारी यादव ने पहली बार यादवों को एक जुट करने के लिए मदेपुरा के महरो गाँव में गोप जातीय महासभा बनाई जिसे साल भर मैं हीं अखिल भारतीय यादव महासभा का नाम दिया गया. पटना, सारण और पूर्णिया में इसकी वार्षिक सभाएं हुईं. परन्तु उनका यह प्रयास उनकी मृत्यु के साथ हीं जाता रहा. इसके बाद के लगभग ५० सालों में कोई प्रयास पिछड़ी जातियों को इकट्ठा करने का नहीं हुआ. 
यह सही है कि भारत की राजनीति में बिहार पहला राज्य है जहाँ कांग्रेस के शासन को ख़त्म करके पिछड़ी जातियों ने अपना दमखम दिखाया और १९६७ में पहली गैर-कांग्रेस संयुक्त विधायक दल की सरकार बनी, लेकिन हुआ क्या? अगले कुछ महीनों में राष्ट्रपति शासन और मुख्यमंत्री बदलने की प्रक्रिया के बीच यह प्रयोग असफल रहा. कांग्रेस फिर शासन में आयी. सन १९७७ में एक बार फिर गैर कांग्रेस पिछड़े वर्ग की एकता दिखाई दी पर वह भी दो सालों में हीं झलावा साबित हुई. लालू के शासन काल में भैंस की पीठ पर बैठना, “उड़नखटोले से पिछड़ी जाति के बाहुल्य वाले गाँव में उतरना, चरवाहा स्कूल से ऊपर नहीं बढ़ पाई. याने सशक्तिकरण की झूठी चेतना पर खेलने की अलावा लालू यादव नहीं सोच पाए और इस बीच परिवारवाद और अपराधीकरण ने लालू के शासन काल को “जंगल राज की संज्ञा दे दी. याने पिछड़ी जाति की एकता में गैर-यादव जातियां पिसती रही कोई लाभ नहीं मिला.   
इस बीच जहाँ नीतीश कुमार नरेन्द्र मोदी के हर भाषण ( “डी एन ए और “कितना पैसा दूं”) के खिलाफ हर बार “बिहार सम्मान” जगाने की कोशिश कर रहें हैं जो दरअसल अस्तित्व में कभी नहीं रहा है वहीं लालू यादव गरिमा को सतह पर लेन का प्रयास कर रहे हैं.     
अगर शुद्ध चुनावी आंकड़ों खासकर २०१४ के लोक सभा चुनाव में राजनीतिकी दलों को मिले मत प्रतिशत के आधार पर विश्लेषण करे तो बिहार चुनाव में नीतीश-लालू –कांग्रेस गठबंधन को छः प्रतिशत की स्पष्ट बढ़त रही है. और जिन मतदातों ने नरेन्द्र मोदी की उस समय की जबरदस्त जन-स्वीकार्यता के बावजूद लालू प्रसाद की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (राजद), नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल (यू) और कांग्रेस को क्रमशः २०.१, १५.८ और ८.४ प्रतिशत (याने कुल ४४.३ प्रतिशत) मत दिए थे यह जानते हुए कि इनमें से कोई भी केंद्र में सरकार बनाने नहीं जा रहा है, वे आज राज्य विधान सभा के चुनाव में ऐसा नहीं करेंगे यह समझ से परे है. 
इसके बरअक्स भारतीय जनता पार्टी को २९.४ प्रतिशत, सहयोगी राम बिलास पासवान की पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) को ६.४ प्रतिशत और उपेन्द्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (आर एल एस पी) को ३.१ प्रतिशत (याने कुल ३८.१ प्रतिशत ) मत मिले थे.  
                            कुछ नए चौंकाने वाले तथ्य 
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चुनाव आयोग के बिहार इकाई द्वारा जारी ताज़ा आंकड़ों के अनुसार बिहार में कुल एक करोड़ दस लाख कुल मुसलमान मतदाता हैं. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को २०१४ के लोक सभा में कुल एक करोड़ पांच लाख ४३ हज़ार २४ वोट मिले थे और सीटें ४० में से २२. केन्द्रीय खुफिया विभाग और राज्य खुफिया इकाई के सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार चुनाव से पहले सांप्रदायिक उन्माद भड़काने की साजिश का स्पष्ट अंदेशा है.   
इस के साथ कुछ और चौंकाने वाल्रे तथ्य देखें जो पुलिस रिकॉर्ड और थानों की प्रविष्टियों पर आधारित हैं और जिनका खुलासा एक अंग्रेज़ी अखबार ने किया है. रिपोर्ट के अनुसार १८ जनवरी, २०१३ को नीतीश –भाजपा गठबंधन टूटने  के बाद से अब तक के ढाई साल में राज्य में सांप्रदायिक झगड़ों में इसके पहले की तीन साल के मुकाबले चार गुना वृद्धि हुई है. इन झगड़ों की प्रकृति भी उतनी हीं दिलचस्प है. इनमें से अधिकांश धार्मिक जुलूसों के मार्ग को लेकर है और कई अन्य मामलों में दोनों धर्मों के पूजा –स्थलों पर किसी जानवर के शरीर का भाग रख कर अपवित्र करने की कोशिश की गयी है. 
राज्य के चारों कोनोँ में स्थित जिलों --औरंगाबाद, मुजफ्फरपुर, नवादा और भागलपुर--- के चार हनुमान मंदिरों एक हीं रात में (नवम्बर ४, २०१४), जिस दिन मुहर्रम था, तोड़-फोड़ की गयी, उन्हें अपवित्र करने की कोशिश की गयी.     
इस बात में कोई दो राय नहीं हो सकती कि याने सारे मुसलमान मतदाता (१.१० करोड़) नीतीश -लालू-कांग्रेस गठबंधन को वोट देंगे क्योंकि कांग्रेस के शामिल होने से इस गठबंधन की सेक्युलर विश्वसनीयता स्वतः बढ़ जाती है. लेकिन इस बात को भूलना नहीं चाहिए कि जैसे हीं अल्पसंख्यक एकता बढ़ती है उसकी प्रतिक्रया में बहुसंख्यक भी अपने विरोधों को भुलाने लगता है. 
हाल के दो वर्षों में सांप्रदायिक संघर्षों की घटना तीन गुना वृद्धि इस बात का संकेत हैं और कहना न होगा कि जैसे जैसे चुनाव आगे बढेगा इस उन्माद को और हवा देने की कोशिश भी बढ़ेगी. 

lokmat

Sunday, 16 August 2015

“ललितगेट” , मोदी के वायदे और जनता के सवाल

राजनीति-शास्त्र के सिद्धांत के अनुसार अर्ध-शिक्षित, नीम –तार्किक और मूल रूप से प्राथमिक संबंधों पर आधारित समाज में भावनात्मक मुद्दे संवैधानिक व्यवस्था द्वारा प्रदत्त वैज्ञानिक, तार्किक और नैतिक मुद्दों पर अक्सर इतने भारी पड़ जाते हैं कि अचानक हमें “भारत बदलता “ दिखाई देने लगता है. नेहरु नए भारत के निर्माता बने, तो जयप्रकाश नारायण में सम्पूर्ण क्रांति दिखी तो अन्ना हजारे में भ्रष्टाचार –मुक्त भारत. डेढ़ साल पहले नरेन्द्र मोदी का राष्ट्रीय राजनीतिक क्षितिज पर आना और तत्काल जन-स्वीकार्यता हासिल कर लेना इस भाव की तस्दीक है. लेकिन चूंकि इस तरह की जन-स्वीकार्यता में ठहराव नहीं होता इसलिए “सक्षम” नेता या तो नए नए भावनात्मक मुद्दे पैदा करता है और उन्हें बेचता रहता है या सपनों को साकार करने के लिए तत्पर रहता है. चूंकि सपने साकार करना दुरूह हीं नहीं काल –भक्षी (टाइम –कनज्यूमिंग) भी होता है लिहाज़ा अधिकांस नेता पहले वाले विकल्प का सहारा लेते हैं.
“छप्पन इंच छाती” से हम देशवासियों का सामूहिक (भारतीय जनता पार्टी के शब्दों में राष्ट्रीय) पौरुष जागता है और हम सपना देखते हैं पाकिस्तान को इस छाती में दबाकर चूर-चूर करने की. “न खायेंगे, न खाने देंगे” के जुमले से हम फिर खुश होते हैं. इस जुमले से चार बाते स्वयं सिद्ध होती हैं ---पहला, मैं नहीं खाता; दूसरा, हमारे बीच भी खाने वाले हैं; तीसरा, वे खाना चाहेंगे; और चौथा, लेकिन मैं उन्हें खाने नहीं दूंगा”. जनता खुश होती है यह सोच कर कि प्रधानमंत्री के बगल में बैठे और लोग यह सब कुछ करेंगे और मोदी जी उन्हें पकड़ लेंगे.
जाहिर है जब इतने वादों और इतने सपनों की (और वह भी इतने बड़े और वैविध्यपूर्ण देश में) बुनियाद पर जन-स्वीकार्यता की इमारत खडी होगी तो उसे ढहाना भी मुश्किल नहीं होगा. विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का “क्रिकेट के अंतर्राष्ट्रीय व्यापारी?” ललित मोदी से सम्बन्ध और उस सम्बन्ध के तहत  “करुनाजनित” मदद करना प्रधानमंत्री के वायदे से निकले दो स्वयं- सिद्ध तर्क वाक्यों पर जनता का ध्यान आकर्षित करता है. पहला यह कि यह “खाने का मामला तो नहीं है ”  और दूसरा “क्या वो खाना चाहते हैं”. और तब जन-मानस में तत्काल चौथा तर्क-वाक्य “न खाने देंगे”  कौंधने लगता है. फिर जनता अपने मन मैं सवाल करती है “अगर वर्तमान या भूत-काल में  खा लिया गया है तो फिर “न खाने देंगे “ तो गलत साबित हुआ? लिहाज़ा जनता को प्रधानमंत्री से एक्शन की अपेक्षा थी “जीरो टालरेंस” के वायदे के मुताबिक, जड़वत चुप्पी की नहीं.    
न्याय शास्त्र के हिसाब से नैतिकता का पतन एक सीढी हो या हज़ार बहुत अंतर नहीं पड़ता. अर्थात अगर आप मंत्री हैं और आप नैतिक भी हैं तो आप के पति देश के कानून से बचने के लिए लन्दन में बैठे ललित मोदी के मुकदमें नहीं लड़ेंगे और आप की बेटी के लिए “सवा सौ करोड़ की टीम इंडिया “ में बहुत से मुवक्किल मिल जायेंगे. दूसरा करुणा-जनित मदद की भी कीमत चुकानी होती है. अगर करुणा उभरी तो मंत्रिमंडल में स्पष्टरूप से यह मुद्दा ला कर कहा जा सकता था  कि ललित मोदी की पत्नी की बीमारी कैंसर की है और पति का ऐसे में अस्पताल रहना मानवीय मूल्यों के अनुरूप होगा लेकिन चूंकि मेरी बेटी और पति ललित मोदी के रोल पर हैं लिहाज़ा मैं नैतिकता के आधार पर इस बैठक से बाहर जाती हूँ आप फैसला करें.
जब मोदी ने “न खाने देंगे” कहा तो देश खुश हुआ पर साथी सशंकित. ऐसे में टीम नहीं बन पाती अगर बनी भी तो किसी एक या दो लोंगों की जैसे किसी अमित शाह और किसी अरुण जेटली की. बाकि सजदा करने वाले होंगे. लिहाज़ा संसद में इतने बहुमत के बावजूद क्राइसिस मैनेजमेंट या फ्लोर कोआर्डिनेशन नहीं दिखेगा. अगर कोई अन्य बोला भी वह मोदी के गुणगान से ऊपर नहीं बढ़ पाता. यही वजह है कि टेलीविज़न चैनलों के डिस्कशन में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के कुछ युवा प्रवक्ता अहंकार और बद्ज़ुबानी की प्रतिमूर्ति बन जाते हैं.  
कांग्रेस की मुसीबत यह है कि उसके नेता राहुल गाँधी के पास गंभीर समझ हीं नहीं तथ्यों की भी कमी है और लोक सभा में नेता नेता मल्लिकार्जुन खड्गे के पास प्रवाहपूर्ण भाषा के ज्ञान की. लिहाज़ा संसद में आरोप –प्रत्यारोप का स्तर “मोदी में गट्स नहीं “ और “..... की मौसी के पास कितना पैसा है” तक गिरता गया. इसी दौरान भाजपा की एक साध्वी सांसद को विरोध करने वाले सांसदों पर एक दिन इतना गुस्सा आया कि पत्रकारों से बोली “संसद में भी एक दो आतंकवादी हैं”. पार्टी में इस तरह एक अमर्यादित आचरण का बोल बाला महज़ इसलिए बढ़ रहा है कि वह मोदी को “डिफेंड” करने में अति –उत्साह दिखाने लगे हैं. हालाँकि मोदी को ऐसे भौंडे “डिफेन्स” से फायदे की जगह नुक्सान हो रहा है. उसी तरह राहुल का आरोप कि  “मोदी में गट्स (साहस) नहीं हैं” बचकाना लगता है. मोदी में मात्र गट्स हीं तो है और यही जनता का मोह-भंग कर रहा है.
   कौन सा मुद्दा जन-भावनाओं को उद्वेलित करता है और कौन ४८ घंटे में उबाऊ हो जाता है , इस बात की समझ राजनीति में जरूरी है. दूसरा इन मुद्दों को कैसे उठाया जाये और किस माध्यम का इस्तेमाल किया जाये इस बात की समझ भी होनी चाहिए. तीसरा समाज का तत्कालीन शिक्षा स्तर और  तर्क-शक्ति से उपजी जन -चेतना इस बात को सुनिश्चित करती है कि कौन सा मुद्दा किस खंड- व् काल-विशेष में कितना प्रभावित करता है. चौथा: अगर मुद्दे में चौंकाने वाला तत्व नहीं है याने “स्टनिंग वैल्यू” नहीं है और “घिसे-पिटे तथ्य” पर हीं आधारित है तो मुद्दा दूर तक जन-मानस में घर नहीं कर पाता. साथ हीं अगर कुछ विधेयकों खासकर जी एस टी के बारे में आम धारणा है कि इससे सुधार और विकास होगा. जब जनता को यह पता चलता है कि ये बिल विपक्ष की हठधर्मिता के कारण पारित नहीं हो रहे हैं तो विपक्ष को अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती है यह बताने में कि उसका मुद्दा विकास से भारी है. कांग्रेस यह नहीं कर पाई. नतीज़तन कहीं यह सन्देश भी गया कि सोनिया-राहुल की पार्टी विकास –विरोधी है और मोदी सरकार के विकास के कार्यों को रोकना चाहती है.         
कांग्रेस के रणनीतिकार इस बात में फर्क नहीं कर पाए कि क्रूड (स्थूल) भ्रष्टाचार और नैतिकता के प्रश्न में अंतर होता है. लिहाज़ा २-जी स्पेक्ट्रम घोटाला, कोयला घोटाला या बोफोर्स घोटाला उसी पायदान पर नहीं रखे जा सकते जिस पर नैतिक आचरण के मुद्दे. इस का कारण यह है कि पहले किस्म के भ्रष्टाचार कम पढी –लिखी जनता को भी तत्काल समझ आ जाते है क्योंकि उनको परिमाणात्मक तराजू पर देखा जा सकता है जैसे २-जी घोटाले में जनता का १.७६ लाख करोड़ का नुकसान. “यह इतना पैसा है कि देश की अति-गरीब जनता को पांच साल तक मुफ्त राशन दिया जा सकता है” विपक्ष यह कह कर जन-भावनाओं को उभार सकता है. बोफोर्स के मामले ने जनाक्रोश के कारण कांग्रेस सरकार हारी क्योंकि मामला सेना की तोपों का था, क्वात्रोकी इटली का और तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की पत्नी सोनिया भी वहीं की थीं.          
इधर भारतीय जनता पार्टी ने और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हाल के भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर “खूंटा  वहीं गड़ेगा” का भाव ओढ़े रहे. ललित मोदी कैसे रातों-रात क्रिकेट की दुनिया का बेताज बादशाह बादशाह बन जाता है , किस तरह एक काल विशेष में राजस्थान की सत्ता का नंबर -२ बन कर शासन चलाता है , किस तरह चेन्नई के थाने में सन २०१० में बी सी सी आई को मुकदमा लिखवाना पड़ता है जिसे पढ़ कर एक बच्चा भी कहेगा कि यह शुद्ध र्रूप से मनी लौंडरिंग का मामला है, और किस तरह तत्कालीन यू पी ए -२ की सरकार चार साल तक मात्र टैक्स का मामला बता कर उसे शिकंजे में कसने से बचाती रही और किस तरह भाजपा नेता , केन्द्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री उस व्यक्ति पर “करुणा “ उंडेलते रहे? इन तमाम प्रश्नों के उत्तर तो देना तो दूर बल्कि यह कहा गया कि कोई नहीं हटेगा. व्यापम घोटाले से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की छवि खराब हो या न हो मोदी का चौथा वादा “न खाने देंगे” ज़रूर शंका पैदा करने लगा है.

लिहाज़ा जनता के मन में मुद्दा यह नहीं रह गया कि “वे भी खाते हैं या वो खायेंगे” बल्कि प्रश्न यह रहा  “ क्या खाने देंगे” . खैर अभी तक पहले तर्क वाक्य की विश्वसनीयता पर कोई आंच नहीं आयी है. मोदी की व्यक्तिगत ईमानदारी अक्षुण है.      

patrika                     

Friday, 14 August 2015

कांग्रेस को “न खुदा हीं मिला न विसाल-ए-सनम”


“न खुदा हीं मिला न विसाल-ए-सनम.
न इधर के रहे न उधर के रहे”

कोई १३० साल पुरानी कांग्रेस पार्टी में दूरदर्शिता की कमी साफ़ दिखाई देती है. संसद के मानसून सत्र को पूरी तरह बाधित रखना फिर अंतिम दो दिनों में अन्य विपक्षी दलों द्वारा साथ छोड़े जाने से मजबूर हो कर उसी मुद्दे पर बहस में शामिल होना और अंत में पूरी तैयारी को उन्हीं तथ्यों तक महदूद करना जो पहले से हीं मीडिया द्वारा दिए जा चुके थे, ने कांग्रेस को नुकसान हीं पहुँचाया है. आज जनता पूछ रही है कि यही करना था तो पहले दिन हीं क्यों नहीं ? क्यों पानी में बहाया जनता की गाढ़ी कमाई के करोड़ों रुपये ? वैसे भी भ्रष्टाचार के आरोप अगर तथ्यों से समर्थित न हों तो कई बार आरोपकर्ता के गले पड़ जाते है.
कौन सा मुद्दा जन-भावनाओं को उद्वेलित करता है और कौन ४८ घंटे में उबाऊ हो जाता है , इस बात की समझ राजनीति में जरूरी है. दूसरा इन मुद्दों को कैसे उठाया जाये और किस माध्यम का इस्तेमाल किया जाये इस बात की समझ भी होनी चाहिए. तीसरा समाज का तत्कालीन शिक्षा स्तर और  तर्क-शक्ति से उपजी जन -चेतना इस बात को सुनिश्चित करती है कि कौन सा मुद्दा किस खंड- व् काल-विशेष में कितना प्रभावित करता है. चौथा: अगर मुद्दे में चौंकाने वाला तत्व नहीं है याने “स्टनिंग वैल्यू” नहीं है और “घिसे-पिटे तथ्य” पर हीं आधारित है तो मुद्दा दूर तक जन-मानस में घर नहीं कर पाता. साथ हीं  कुछ विधेयकों खासकर जी एस टी के बारे में आम धारणा है कि इससे सुधार और विकास होगा. जब जनता को यह पता चलता है कि ये बिल विपक्ष की हठधर्मिता के कारण पारित नहीं हो रहे हैं तो विपक्ष को अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती है यह बताने में कि उसका मुद्दा विकास से भारी है. कांग्रेस यह नहीं कर पाई. नतीज़तन कहीं यह सन्देश भी गया कि सोनिया-राहुल की पार्टी विकास –विरोधी है और मोदी सरकार के विकास के कार्यों को रोकना चाहती है. विकास को लेकर वैसे भी कांग्रेस का ट्रैक रिकॉर्ड जन – अभिमत में अच्छा नहीं रहा है.      
कांग्रेस के रणनीतिकार इस बात में फर्क नहीं कर पाए कि क्रूड (स्थूल) भ्रष्टाचार और नैतिकता के प्रश्न में अंतर होता है. लिहाज़ा २-जी स्पेक्ट्रम घोटाला, कोयला घोटाला या बोफोर्स घोटाला उसी पायदान पर नहीं रखे जा सकते जिस पर नैतिक आचरण के मुद्दे. इस का कारण यह है कि पहले किस्म के भ्रष्टाचार कम पढी –लिखी जनता को भी तत्काल समझ आ जाते है क्योंकि उनको परिमाणात्मक तराजू पर देखा जा सकता है जैसे २-जी घोटाले में जनता का १.७६ लाख करोड़ का नुकसान. “यह इतना पैसा है कि देश की अति-गरीब जनता को पांच साल तक मुफ्त राशन दिया जा सकता है” विपक्ष यह कह कर जन-भावनाओं को उभार सकता है. बोफोर्स के मामले ने जनाक्रोश के कारण कांग्रेस सरकार हारी क्योंकि मामला सेना की तोपों का था, क्वात्रोकी इटली का और तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की पत्नी सोनिया भी वहीं की थीं. आजादी के चंद महीने बाद सन १९४८ में  तत्कालीन भारतीय उच्चायुक्त वी के कृष्णामेनन ने सारे नियमों की धज्जी उड़ाते हुए एक ब्रितानी कंपनी से भारतीय सेना के लिए ८० लाख रुपये का नकद भुगतान करते हुए २०० जीपें खरीदी. इनमें भारत पहुँची १५५ और वे भी चलने लायक नहीं. लेकिन तब देश आजादी के जश्न में डूबा था नेहरू जनता के दुलारे (डार्लिंग ऑफ़ इंडियन मासेज) थे लिहाज़ा संसद में जब अयंगर  समिति ने मेनन के खिलाफ मुकदमा चलाने की सिफारिश की तो प्रधानमंत्री नेहरु ने उसे ख़ारिज हीं नहीं किया बल्कि मेनन को भारत बुला कर रक्षा-मंत्री बना दिया. उस समय मीडिया सिर्फ प्रिंट तक हीं सीमित थी, साक्षरता ३० प्रतिशत थी.
सुषमा स्वराज को लेकर जो मुद्दा उठा वह नैतिक पैरामीटर्स पर तौलने वाला था आर्थिक लाभ का मामला कभी भी नहीं बन पाया. उसके बरअक्स किसी कैंसर –पीडिता के पति को इलाज के लिए यात्रा दस्तावेज दिलाने के लिए विदेश के राजदूत से फोन पर बात करना आचार के पैमाने पर आता है. “आदान-प्रदान (क्विड- प्रो- को) का आरोप जो कांग्रेस ने लगाया वह इतना हल्का था कि जन-मानस ने इस आधार पर ख़ारिज किया कि कोई किसी का जूनियर वकील हो कर कितना कमा लेगा.  फिर अगर कांग्रेस प्रतीक भाव से एक या दो दिन का व्यवधान करती तो जनता के लिए यह उबाऊ न होता या फिर हर रोज इस मुद्दे पर नए तथ्य लाती जो जन मानस को झकझोरते तो भी समझ में आता. पर मीडिया द्वारा पहले से हीं दिए तथ्यों पर हफ्ते-दर-हफ्ते संसद रोकना बेहद बचकाना लगा.
सबसे बड़ी गलती कांग्रेस के यह थी कि इस मुद्दे पर खुद भी कटघरे में थी. भ्रष्टाचार के आरोप के जन मुद्दे के रूप में विकसित होने की पहली शर्त है कि आरोपकर्ता कम से कम उसी आरोप में शामिल न दिखाई दे. ललित मोदी के खिलाफ बी सी सी आई ने २०१० में हीं संस्था से धोखेबाजी का मुकदमा चेन्नई के एक थाने में दायर किया था. ऍफ़ आई आर पढ़ने के बाद एक बच्चा भी कह सकता है कि यह मात्र कर अपवंचना का मामला नहीं बल्कि मॉरिशस के रास्ते धन विदेश ले जाने का (मनी लान्ड़रिंग) का केस है. आखिर कांग्रेस के नेतृत्व वाली यू पी ए -२ की सरकार ने क्यों चार साल तक मनी लान्ड़रिंग का आपराधिक मामला दर्ज कर अपने अधिकार के तहत ब्रिटेन भाग गए मोदी को वापस बुलाने का प्रयास नहीं किया. चर्चा के दौरान न तो राहुल गाँधी ने न हीं पार्टी के किसी अन्य नेता ने इस आरोप का जबाव दिया.
व्यवधान के दौरान कांग्रेस लगातार घिसे -पिटे रिकॉर्ड की तरह बजती रही उन्हीं तथ्यों को लेकर जिन्हें मीडिया दे चुका था और जिनमें कोई “स्टनिंग वैल्यू) नहीं थी. “हमला करो और भाग जाओ” की हल्की रणनीति अपनाई गयी, फ्लोर कोआर्डिनेशन गायब था. राहुल तथ्यों से खाली थे तो सदन के नेता मल्लिकार्जुन खड्गे अभिव्यक्ति के लिए प्रवाहपूर्ण - भाषा से.
साथ हीं राहुल का यह कहना कि सुषमा जी ने एक दिन मुझे रोक कर मेरा हाथ पकड़ कर कहा “बेटा, क्यों नाराज़ हो मुझसे”. मैंने उनकी आँखों में आँखें डाल कर देखा तो उनकी नज़रें झुक गयी” . राहुल का सदन में इस किस्से को बयां करना नैतिक रूप से गलत था क्योंकि वह एक अनौपचारिक बातचीत थी साथ हीं “नज़रें झुक गयी “ खोखला, अतार्किक और निहायत व्यक्तिगत अहसास था जिसे सत्य की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता. इस तरह का वितंडावाद तब किया जाता है जब आरोपकर्ता में अपने तर्क-शक्ति की कमी होती है.              
राहुल गाँधी अक्सर बाँझ –उत्साह के शिकार हो जाते हैं. सदन में उनकी एक अन्य टिपण्णी लीजिये. आर एस पी के सदस्य प्रेमचंद्रन ने संविधान के अनुच्छेद ७५ (३) और तत्संबंधित अनुसूची ३ में मंत्री के शपथ “बिना पक्षपात” के का जिक्र किया और शपथ भंग करने का आरोप लगाते हुए इस्तीफे की मांग की. अब जरा भारतीय जनता पार्टी के नेताओं का कौशल्य और क्षमता देखिये. अगले हीं क्षण सुषमा स्वराज ने वह पत्र पढ़ना शुरू कर दिया जिसमें इसी सांसद ने विदेश मंत्री से एक अपराधी माधवन पिल्लई जो ओमान के जेल में कैद है को बीमार माँ को देखने के लिए आने और सजा कम करने के लिए ओमान सरकार को पत्र लिखने का आग्रह किया था. प्रेमचंद्रन इस हमले के लिए तैयार नहीं थे. इस झटके के बाद भी राहुल गाँधी नहीं सतर्क हो पाए और अति-उत्साह सुषमा स्वराज से पूछा  “तो इस मामले में क्या किया सरकार ने”. सुषमा ने नहीं लेकिन वित्त मंत्री ने इसका जवाब दिया “जी हाँ, उस पर भी विदेश मंत्रालय ने ओमान सरकार को लिखा”. प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी को भी “गट्स” (साहस) नहीं है “ जैसे आरोप लगाना हल्का लगा. शायद जनता के बीच मोदी के खिलाफ यह आरोप तो नहीं हीं चल सकता.  
किसी भी संसद के चार कार्य होते हैं—कानून बनाना, सरकार को खर्च करने की अनुमति देना, सरकार के कार्यों की समीक्षा करना और राष्ट्रीय मुद्दों पर बहस करना. इन चार कार्यों में से एक भी यह इजाज़त नहीं देता  कि अगर मुद्दा गंभीर हो तो संसद की कार्यवाही भी रोकी जा सकती है.
कुल मिलकर कांग्रेस के लिए यह  “....... भी और प्याज भी खाने “ की तरह रहा.