क्या लालू-नितीश पिछड़ी जातियों को एक धरातल पर ला सकेंगे ?
बिहार विधान सभा के आगामी चुनाव कई सामाजिक कारकों, उनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और युवाओं की बदलती अपेक्षाओं पर आधारित होगी और यही वजह है चुनाव की पारंपरिक युद्ध-शैली को जो जितना बदल सकेगा वही विजयी होगा. सामाजिक प्रश्न है: क्या पिछले छः दशकों के पिछड़े वर्ग की एकता के अनुत्पादक प्रयास अबकी बार फलीभूत हो सकेंगे? दूसरा : क्या सशक्तिकरण की झूठी चेतना जगाने का पारंपरिक खेल अभी भी पिछड़ी जाति के रोजगार के अभाव में नाराज युवाओं को लुभा पायेगा? तीसरा : क्या विकास (जिसमें रोजगार के अवसर भी शामिल हैं) आपस में वैमनस्यतापूर्ण जाति समूहों में बंटे बिहार समाज की सदियों की सोच को बदल पायेगा याने क्या लालू के मतदाता नीतीश के उम्मीदवार को वोट देंगे ? और चौथा क्या बिहार गौरव या “यादव गरिमा” जैसी कोई सोच बिहार में विकसित की जा सकती है ?
लालू यादव और नीतीश कुमार जिन जातियों या जाति समूहों का प्रतिनिधित्व करते हैं वे अलग-अलग हीं नहीं हैं बल्कि उनमें द्वंदात्मक सम्बन्ध हैं ऐसे में इन सदियों की सामजिक वैमनस्यता को ख़त्म करने के लिए जो नेतृत्व का बडप्पन चाहिए क्या वह लालू यादव में या नीतीश में हैं और वह भी तब जब पिछले १५ साल से दोनों एक-दूसरे की लानात –मलानत करते रहे हों? सांप, चन्दन, जहर आदि का ताज़ा प्रयोग क्या यह विश्वास दिला पायेगा कि सत्ता में आने के बाद फिर झगड़े परवान नहीं चढ़ेंगे ? यहाँ एक प्रश्न और भी इसी से जुड़ा है : क्या गैर-यादव जातियां यह भूल जायेंगी कि पिछले दो दशकों से जमीन की बढ़ती कीमतों के कारण सबसे ज्यादा यादव अपराधियों ने कमजोरों की जमीन हथियाई है और क्या उनके हौसले जीतने के बाद और बुलंद नहीं होंगे?
इतिहास पर नज़र डालें तो पिछड़ी जाति की पहली एकता बिहार के इतिहास पर नज़र डालें तो कुंवर सिंह की अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई का नेतृत्व रणजीत सिंह यादव ने किया था. सन १९११ में कांग्रेस नेता और पार्टी के संस्थापक सदस्य रास बिहारी यादव ने पहली बार यादवों को एक जुट करने के लिए मदेपुरा के महरो गाँव में गोप जातीय महासभा बनाई जिसे साल भर मैं हीं अखिल भारतीय यादव महासभा का नाम दिया गया. पटना, सारण और पूर्णिया में इसकी वार्षिक सभाएं हुईं. परन्तु उनका यह प्रयास उनकी मृत्यु के साथ हीं जाता रहा. इसके बाद के लगभग ५० सालों में कोई प्रयास पिछड़ी जातियों को इकट्ठा करने का नहीं हुआ.
यह सही है कि भारत की राजनीति में बिहार पहला राज्य है जहाँ कांग्रेस के शासन को ख़त्म करके पिछड़ी जातियों ने अपना दमखम दिखाया और १९६७ में पहली गैर-कांग्रेस संयुक्त विधायक दल की सरकार बनी, लेकिन हुआ क्या? अगले कुछ महीनों में राष्ट्रपति शासन और मुख्यमंत्री बदलने की प्रक्रिया के बीच यह प्रयोग असफल रहा. कांग्रेस फिर शासन में आयी. सन १९७७ में एक बार फिर गैर कांग्रेस पिछड़े वर्ग की एकता दिखाई दी पर वह भी दो सालों में हीं झलावा साबित हुई. लालू के शासन काल में भैंस की पीठ पर बैठना, “उड़नखटोले से पिछड़ी जाति के बाहुल्य वाले गाँव में उतरना, चरवाहा स्कूल से ऊपर नहीं बढ़ पाई. याने सशक्तिकरण की झूठी चेतना पर खेलने की अलावा लालू यादव नहीं सोच पाए और इस बीच परिवारवाद और अपराधीकरण ने लालू के शासन काल को “जंगल राज की संज्ञा दे दी. याने पिछड़ी जाति की एकता में गैर-यादव जातियां पिसती रही कोई लाभ नहीं मिला.
इस बीच जहाँ नीतीश कुमार नरेन्द्र मोदी के हर भाषण ( “डी एन ए और “कितना पैसा दूं”) के खिलाफ हर बार “बिहार सम्मान” जगाने की कोशिश कर रहें हैं जो दरअसल अस्तित्व में कभी नहीं रहा है वहीं लालू यादव गरिमा को सतह पर लेन का प्रयास कर रहे हैं.
अगर शुद्ध चुनावी आंकड़ों खासकर २०१४ के लोक सभा चुनाव में राजनीतिकी दलों को मिले मत प्रतिशत के आधार पर विश्लेषण करे तो बिहार चुनाव में नीतीश-लालू –कांग्रेस गठबंधन को छः प्रतिशत की स्पष्ट बढ़त रही है. और जिन मतदातों ने नरेन्द्र मोदी की उस समय की जबरदस्त जन-स्वीकार्यता के बावजूद लालू प्रसाद की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (राजद), नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल (यू) और कांग्रेस को क्रमशः २०.१, १५.८ और ८.४ प्रतिशत (याने कुल ४४.३ प्रतिशत) मत दिए थे यह जानते हुए कि इनमें से कोई भी केंद्र में सरकार बनाने नहीं जा रहा है, वे आज राज्य विधान सभा के चुनाव में ऐसा नहीं करेंगे यह समझ से परे है.
इसके बरअक्स भारतीय जनता पार्टी को २९.४ प्रतिशत, सहयोगी राम बिलास पासवान की पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) को ६.४ प्रतिशत और उपेन्द्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (आर एल एस पी) को ३.१ प्रतिशत (याने कुल ३८.१ प्रतिशत ) मत मिले थे.
कुछ नए चौंकाने वाले तथ्य
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चुनाव आयोग के बिहार इकाई द्वारा जारी ताज़ा आंकड़ों के अनुसार बिहार में कुल एक करोड़ दस लाख कुल मुसलमान मतदाता हैं. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को २०१४ के लोक सभा में कुल एक करोड़ पांच लाख ४३ हज़ार २४ वोट मिले थे और सीटें ४० में से २२. केन्द्रीय खुफिया विभाग और राज्य खुफिया इकाई के सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार चुनाव से पहले सांप्रदायिक उन्माद भड़काने की साजिश का स्पष्ट अंदेशा है.
इस के साथ कुछ और चौंकाने वाल्रे तथ्य देखें जो पुलिस रिकॉर्ड और थानों की प्रविष्टियों पर आधारित हैं और जिनका खुलासा एक अंग्रेज़ी अखबार ने किया है. रिपोर्ट के अनुसार १८ जनवरी, २०१३ को नीतीश –भाजपा गठबंधन टूटने के बाद से अब तक के ढाई साल में राज्य में सांप्रदायिक झगड़ों में इसके पहले की तीन साल के मुकाबले चार गुना वृद्धि हुई है. इन झगड़ों की प्रकृति भी उतनी हीं दिलचस्प है. इनमें से अधिकांश धार्मिक जुलूसों के मार्ग को लेकर है और कई अन्य मामलों में दोनों धर्मों के पूजा –स्थलों पर किसी जानवर के शरीर का भाग रख कर अपवित्र करने की कोशिश की गयी है.
राज्य के चारों कोनोँ में स्थित जिलों --औरंगाबाद, मुजफ्फरपुर, नवादा और भागलपुर--- के चार हनुमान मंदिरों एक हीं रात में (नवम्बर ४, २०१४), जिस दिन मुहर्रम था, तोड़-फोड़ की गयी, उन्हें अपवित्र करने की कोशिश की गयी.
इस बात में कोई दो राय नहीं हो सकती कि याने सारे मुसलमान मतदाता (१.१० करोड़) नीतीश -लालू-कांग्रेस गठबंधन को वोट देंगे क्योंकि कांग्रेस के शामिल होने से इस गठबंधन की सेक्युलर विश्वसनीयता स्वतः बढ़ जाती है. लेकिन इस बात को भूलना नहीं चाहिए कि जैसे हीं अल्पसंख्यक एकता बढ़ती है उसकी प्रतिक्रया में बहुसंख्यक भी अपने विरोधों को भुलाने लगता है.
हाल के दो वर्षों में सांप्रदायिक संघर्षों की घटना तीन गुना वृद्धि इस बात का संकेत हैं और कहना न होगा कि जैसे जैसे चुनाव आगे बढेगा इस उन्माद को और हवा देने की कोशिश भी बढ़ेगी.
lokmat
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