Friday, 20 June 2014

राज्यपाल को संविधान ने हीं फुटबॉल बना दिया था !



महामहिम राज्यपाल” को लेकर जरा विरोधाभास देखिये. देश में केवल दो हीं संस्थाएं हैं जो संविधान के संरक्षण, परिरक्षण और प्रतिरक्षण (प्रेसर्व, प्रोटेक्ट और डिफेंड) की शपथ लेती है ---राष्ट्रपति और राज्यपाल. यहाँ तक कि उप-राष्ट्रपति या सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश भी संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ लेते हैं. लेकिन “संविधान की रक्षा” करने वाले इस राज्यपाल को केंद्र सरकार मात्र एक चिट्ठी भेजकर जब चाहे निकाल सकती है. जबकि इसी संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ लेने वाले तमाम पदों पर आसीन लोगों को जैसे न्यायाधीश, मुख्य चुनाव आयुक्त या लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष को निकालने के लिए जटिल प्रक्रियाएं हैं. यहाँ तक कि सरकारी अफसरों को भी सेवा से हटाने से बचाने के लिए संविधान में अनुच्छेद ३११ में अलग व्यवस्था है.
राज्यपाल की संस्था को लेकर बहस एक बार फिर गर्मा गयी है. केंद्र की नयी सरकार पुरानी यू पी ए-२ की सरकार द्वारा नियुक्त राज्यपालों को बाहर कर अपने लोग लाना चाहती है. एक वर्ग इस कदम को गलत बता रहा है और कुछ फैसलों या संस्तुतियों का हवाला दे रहा है. दूसरा वर्ग पिछली सरकारों ने क्या किया यह बता कर अपने को उचित ठहरा रहा है.
आखिर आज संविधान के बनने और अमल में आने के ६५ साल बाद भी यह भ्रमद्वन्द क्यों? दरअसल इसे समझने के लिए संविधान निर्माताओं की तत्कालीन परिस्थितियों के मद्दे नज़र बनी सोच का अध्ययन करना होगा. राज्यपाल की संस्था को लेकर संविधान सभा के सलाहकार बी एन राव ने सलाह डी थी कि राज्य की विधायिका द्वारा एकल संक्रमनीय पध्यती से राज्यपाल का चुनाव हो. दूसरी सलाह थी कि राज्य विधायिका चार नाम भेजे जिनमें से एक पर राष्ट्रपति का अनुमोदन हो सके. तीसरा और सबसे प्रभावशाली विकल्प था राज्यपाल को राज्य की जनता द्वारा सीधे चार साल के लिए चुनाव करना. संविधान सभा की दो प्रस्तावना समितियां थी –एक राज्य के संविधान के लिए और दूसरी केंद्र के लिए. सरदार पटेल ने सभा को बताया कि दोनों समितियां इस बात पर सहमत हैं कि राज्यपाल राज्य की जनता द्वारा सीधे चुना जाना चाहिए. सभा में इस मुद्दे पर जबरदस्त बहस हुई और तीसरा विकल्प लगभग पारित होने की स्थिति में था. लेकिन उसी समय कुछ घटनाएँ हुई. गाँधी की हत्या, सांप्रदायिक दंगे, तेलंगाना का आन्दोलन और हैदराबाद के निजाम का भारत के खिलाफ हथियार खरीदने का प्रयास और कश्मीर में तनाव. निर्माताओं को लगा कि मज़बूत केंद्र होने का सन्देश देना जरूरी है.
इन सब के मद्दे नज़र नेहरु व कुछ अन्य सदस्यों का मानना था कि अगर राज्यपाल को जनता सीधे चुनती है तो वह बेहद शक्तिशाली होगा और मुख्यमंत्री जो परोक्ष चुनाव से बनेगा (विधायकों के द्वारा चुने जाने के कारण) गौण हो जाएगा और दूसरा अगर दोनों एक साथ मिल जाते हैं तो इससे पृथकतावादी भावों को बल मिल सकता है. लिहाज़ा एक मज़बूत केंद्र का सन्देश जाना ज़रूरी है. इस तरह राज्यपाल केंद्र का एजेंट मात्र हो कर रह गया.
लेकिन निर्माताओं का भ्रम्द्वंद बना रहा. नतीजा यह हुआ कि संविधान के अनुच्छेद १५६ में एक अजीब विरोधाभास देखने को मिलता है. अनुच्छेद के खंड () में कहा गया है कि राज्यपाल राष्ट्रपति के प्रसाद पर्यंत काम करेगा. लेकिन वहीं खंड () में बताया गया है कि उसका कार्यकाल पांच साल का होगा. राष्टपति के प्रसाद पर्यंत काम करने का तात्पर्य है जब भी चाहे केंद्र की सरकार उसे हटा सकती है. यही वजह है कि जब भी केंद्र में कोई नयी पार्टी या नया गठबंधन आता है वह राज्यपालों बाहर कर अपने लोग इस पद पर लाता है. निर्माताओं का भ्रम्द्वंद इस संस्था को लेकर इतना ज्यादा था कि इस पद को महिमा मंडित -करने के लिए अनुच्छेद १५९ में एक अलग प्रावधान किया गया जिसके तहत इस संस्था को राष्ट्रपति की हीं तरह संविधान का संरक्षक के रूप में शपथ का प्रावधान किया गया. क्या संविधान का संरक्षक इतना निरीह होना चाहिए कि जिसे जब चाहे कोई केंद्र सरकार बाहर कर दे?
यहाँ तक की इस संस्था को इतना कमज़ोर करने का बाद भी निर्माताओं को डर बना रहा. नतीज़तन अनुच्छेद ३५६ में जहाँ राष्ट्रपति शासन लगने की शक्ति केंद्र ने अपने पास रखी है वहीं यह भी व्यवस्था है कि ऐसा करने के लिए भी वह राज्यपाल के रिपोर्ट की हीं मोहताज़ ना रहे. इस अनुच्छेद में कहा गया है कि राष्ट्रपति राज्यपाल या अन्य रूप से हासिल रिपोर्ट से संतुष्ट है कि ऐसी स्थिति आ गयी है कि राज्य सरकार संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप शासन नहीं चल सकती है ..... “. याने संविधान के संरक्षण की शपथ लेने वाले राज्यपाल पर हीं पूर्ण भरोषा नहीं किया गया है.
इन सब का नतीजा यह हुआ कि राज्यपाल एक कमज़ोर संस्था बनी रही और केंद्र के इशारों पर काम करती रही. बूटा सिंह और सिब्ते रजी इसके ताज़ा उदाहरण रहे. राज्यपाल को लेकर विवाद तब शुरू हुआ जब पहली बार १९६७ में दस राज्यों में गैर-कांग्रेस सरकारें आयीं. फिर नरसिंहराव ने प्रधानमंत्री बनते हीं अपने पूर्ववर्ती चन्द्रशेखर व विश्वनाथ प्रताप सिंह द्वारा नियुक्त १४ राज्यपालों को निकाल दिया.
इन तमाम स्थितियों के बीच सरकारिया आयोग, संविधान पर बने वेंकटचेलैया आयोग, प्रशानिक सुधार आयोग और सर्वोच्च न्यायलय सभी ने कहा कि राज्यपाल संस्था का कार्यकाल सुनिश्चित होना चाहिए. आयोगों ने राज्यपाल को हटाने के लिए एक प्रक्रिया का अनुमोदन किया. लेकिन किसी भी केंद्र सरकार को यह गवारा नहीं था.
संविधान निर्माताओं का और सरकारिया आयोग, वेंकटचेलैया आयोग का मानना था कि इस पद पर निर्विवाद और सम्मानित लोग आसीन किये जाने चाहिए. खासकर ऐसे लोग जो राजनीति से अपने को काफी पहले अलग कर चुके हैं. लेकिन केंद्र सरकारों ने इस पद को राजनीति में घिसे-पिटे लोगों, एक पार्टी में निष्ठां रखने वाले अफसरों, जनरलों, न्यायाधीशों और साथ हीं पार्टी के भीतर हीं विरोध करने वालों को ठिकाने लगने के लिए एक चारागाह बना दिया. दिल्ली की पूर्वमुख्यमंत्री शीला दीक्षित को चुनाव हारने के बाद राज्यपाल बनाना इसका ताज़ा उदाहरण है.

नरेन्द्र मोदी सरकार का पुराने राज्यपालों को बाहर का रास्ता दिखाना और अपने लोगों को लाना उसी की अगली कड़ी है जिसमें कुछ भी नया नहीं.     

jagran

Sunday, 15 June 2014

पाठ्यक्रमों में भ्रष्टाचार का पाठ: मोदी सरकार की एक अद्भुत पहल


 “जानामि धरमं न च मे प्रवृति, जानाम्यधर्मम न च में निवृति,

                                             (प्रपन्न गीता -५७)  

(हे इन्द्रियों के अधिष्ठाता (भगवान् कृष्ण), मुझे धर्मं ज्ञान है पर मेरी प्रवृति उस ओर नहीं है और मुझे अधर्म भी मालूम है पर मुझे उससे छुटकारा नहीं है ) .

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के जवाब में बोलते हुए महाभारत के इस श्लोक के प्रथम पंक्ति का पूर्व अंश यू पी ए -२ की सरकार पर तंज कसते हुए उद्धृत किया था. सन्दर्भ था कृष्ण ने जब दुर्योधन से पूछा कि जब तुम यह जानते हो क्या धर्म है और क्या अधर्म तो धर्म का आचरण क्यों नहीं करते? इस पर उक्त श्लोक में दुर्योधन ने अपनी स्थिति बतायी.

मोदी के जन समर्थन की पीछे जो सबसे बड़ा कारण था वह था जनता का विश्वास कि यह व्यक्ति भ्रष्टाचार से निजात दिलाएगा. मोदी की सरकार का इस दिशा में पहला कदम है मानव संसाधन मंत्रालय के ताज़ा आदेश पर यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (यू जी सी) का देश के सभी कुलपतियों को एक पत्र जिसमे भष्टाचार को उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रमों में शामिल करने की सलाह. यह भी कहा गया है कि इस विषय को कानून, लोक-प्रशासन और मानवाधिकार के पाठ्यक्रमों में शामिल हीं नहीं किया जाये बल्कि इस पर शोध भी कराया जाये.

भ्रष्टाचार को शुद्ध रूप से कानूनी समस्या समझना शायद अभी तक की सबसे बड़ी भूल रही है, यह जितना कानूनी समस्या है उससे ज्यादा सामाजिक और नैतिक. इस समस्या का हल मात्र कानून और कानूनी संस्थाओं में ढूढना बालू में से तेल निकालने की तरह है. और मोदी सरकार शायद इस गूढ़ तथ्य को आते हीं समझ गयी है.

ऐसा नहीं है कि पिछली सरकार इस तथ्य को नहीं जानती थी. सन २००७ में जारी  द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग की चौथी रिपोर्ट में भ्रष्टाचार पर बृहद और सार्थक विश्लेषण किया गया. भ्रष्टाचार को दो वर्गों में बाँट कर उसके निदाल की बात भी की गयी है. ये दो वर्ग है – कोएर्सिव (सत्ता व कानून का भय दिखाकर लोगों से लाभ लेना) और कोल्यूसिव (सता और जनता में से भ्रष्ट लोगों के बीच एक समझौते के तहत किया गया भ्रष्टाचार). रिपोर्ट के पृष्ठ ६३ में दोनों किस्म के भ्रष्टाचार से निपटने के लिए अलग-अलग कानून बनाने की संस्तुति की गयी है और दूसरे किस्म के भ्रष्टाचार (जो यू पी ए -२ के कार्यकाल में व्यापक रूप से नजर आयी ) के लिए कठोरतम कानून की बात कही गयी है. इस किस्म के भ्रष्टाचार के आरोपी पर हीं ओनस प्रोबेन्डी (अपने को निर्दोष सिद्ध करने की जिम्मेदारी) डालने की सलाह है.

दरअसल श्लोक की प्रथम पंक्ति के पूर्वार्ध का भाग (धर्म पर चलने की प्रवृति का न होना) सीधे समाज से जुड़ा है जबकि उत्तरार्ध का भाग (अधर्म जानते हुए भी मेरी उससे निवृति नहीं है) सत्ता में बैठे लोगों से. रेड लाइट जम्प करने से लेकर टी टी को घूस दे कर ट्रेन में बर्थ पाना उसी श्रेणी में आते हैं. मोदी सरकार ने पाठ्यकर्म इसे शामिल करने के आदेश से भ्रष्टाचार के खिलाफ इससे सामाजिक व व्यक्तिगत चेतना को जगाने का सूत्रपात किया है. बेहतर हो कि प्राथमिक शिक्षा से हीं इसका आगाज हो क्योंकि उच्च शिक्षा तक पहुंचते-पहुंचते युवा अपनी संस्कृति और नैतिकता परिभाषित कर चुका होता है और उसे आत्मसात भी कर चुका होता है. अगर प्रवृति हो जायेगी नैतिक आचरण की तो अधर्म से निवृति की ज़रुरत हीं नहीं पड़ेगी. दरअसल कोल्यूसिव किस्म के भ्रष्टाचार में मंत्री और उद्योगपति दोनों हीं शामिल होते हैं या इंजिनियर और ठेकेदार संझौता कर लेते हैं. नुकसान किसी एक व्यक्ति का नहीं पूरे समाज का होता है जब देश के राजस्व को १.७६ लाख करोड़ का चुना लग जाता है या जब १५ साल बाद पुल गिरता है. लेकिन तब तक यह इंजिनियर इंजिनियर-इन-चीफ बन चुका होता है और ठेकेदार मंत्री, सांसद या विधायक या फिर उनको खरीदने वाली. इन दोनों में सिस्टम को दबाने की जबरदस्त ताकत आ चुकी होती है.

दरोगा का ट्रक वालों से सड़क पर वसूली करना कोएर्सिव किस्म का भ्रष्टाचार है जिसे बेहतर कानून और मज़बूत कानूनी संस्था बना कर रोका जा सकता है पर जिन जैसे –जैसे राज्य विकास का काम अपने हाथ में लेती है या संसाधनों का नियंत्रण करती है मक्कार शासक वर्ग को उतने हीं मक्कार ठेकेदार का वर्ग संझौता कर लेता है. चूंकि यह समझौता सत्ता के गिलियारे में या पांच तारा होटलों में होते है जहाँ परिंदा भी पर नहीं मार सकता लिहाज़ा ना तो गवाही मिलता है न कोई साक्ष्य (क्योंकि जनकल्याण के नाम पर कानून में लचीलापन जानबूझ कर लाया जाता है – २-जी स्पेक्ट्रम के “पहले आओ, पहले पाओ” के नियम की तरह). जिस समाज में कोल्यूसिवे किस्म का भ्रष्टाचार घर कर जाता है उसे ख़त्म करना बेहद मुश्किल होता है हालांकि नामुमकिन नहीं--- सिंगापुर और हांगकांग इसके उदाहरण हैं.

नूनन ने अपने किताब “ब्राइब” में कहा है “भ्रष्टाचार की सीमा वहां तक जाती हैं जहाँ तक समाज इसे लेकर सहिष्णु रहता है”. याने अगर समाज इसे नज़रअंदाज करता रहे तो भ्रष्टाचारी सांस लेने का भी पैसा लेने लगेगा. लिहाजा समाज को भ्रष्टाचार के प्रति असहिष्णु (इनटोलेरेंट) बनाना होगा और यह होगा बाल मस्तिष्क को बदल कर जो शुरूआती दौर में अगर घरों में नहीं तो कक्षा में तो हो हीं. बस एक डर है. ५५ साल पहले बेसिक शिक्षा की किताबों में एक पाठ था जिसमें तोते को सिखाया गया था “शिकारी आयेगा, दाना डालेगा , पर लोभी से उसमें फंसना नहीं”. पर जब एक बार शिकारी ने दाना डाला तो तोता यह रटता तो रहा लेकिन दाना खाने के चक्कर में शिकारी के जाल में फंस गया क्योंकि उसे उसका मतलब नहीं मालूम था.     

यूनानी कहावत है “मछली पहले सिर से सड़ना शुरू होती है”. भ्रष्टाचार के बारे में कहा जा सकता है यह भ्रूण से हीं शुरू हो जाता है. लिहाज़ा मोदी सरकार के प्रयासों के अलावा एक व्यापक जन चेतना की ज़रुरत भी होगी ताकि एक माँ उसे पालने में हीं (आजकल क्रेश में) नैतिकता का पाठ पढ़ाये ना कि यह बताये कि उस बच्चे का बाप भ्रष्टाचार करके कितनी बड़ी गाड़ी पर चलता है. जिस दिन बेटा या पडोसी भ्रष्टाचारी की लम्बी गाड़ी को हिकारत से देखने लगेंगे उसी दिन दिन से भ्रष्टाचार अंतिम सांसे गिनने लगेगा. दुर्योधन की प्रवृति धर्म पर चलने की हो जायेगी. 
jagran/lokm

Tuesday, 27 May 2014

परिणाम को मोदी की सुनामी कहना मोदी व जन-विवेक का अपमान ?


 


सन २०१४ के आम चुनाव परिणाम देश की जनता की सोच में प्रतीकात्मक बदलाव (पैराडाइम शिफ्ट) का संकेत दे रहे हैं. बढ़ती प्रति-व्यक्ति आय, ७४.४ प्रतिशत साक्षरता , मीडिया के जरिये तथ्यों का निर्बाध प्रवाह, स्टूडियो डिस्कशन से हासिल तर्क-शक्ति और सोशल मीडिया के माध्यम से अपने को अभिव्यक्त करने की सुविधा ने देश की जनता की सामूहिक चेतना को बेहतर किया है. वह “कोऊ नृप होहिं हमें का हानि“ की उदासीन –अवसाद की मानसिकता से निकल कर अब राज्य से सही अपेक्षा करने लगी हैं.

यह जनता पिछले तीन वर्षों में सभी राजनीतिक दलों को इस परिवर्तन का सिगनल भेज रहीं थीं. कभी भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना आन्दोलन में शरीक हो कर तो कभी बलात्कार के खिलाफ इंडिया गेट में खड़े हो कर. यह सन्देश सत्ताधारी कांग्रेस व उसके अगुवा राहुल गाँधी के लिए भी उतना हीं था जितना भारतीय जनता पार्टी और उसके संकटमोचन नरेन्द्र मोदी के लिए. राहुल और कांग्रेस ये संकेत नहीं समझ पाए या समझना नहीं चाहते थे जबकि मोदी ने ना केवल समझा बल्कि जनता से यह विश्वास भी हासिल कर लिया कि मोदी इन अपेक्षाओं को पूरा करेंगे. मोदी का कमल मात्र इतना था कि वह संकेतों के अनुरूप अपने व्यक्तित्व को उभर पाए.

जनता ने मोदी में पाया एक ऐसा नेता जो सक्षम विकासकर्ता है, कुशल प्रशासक है, भ्रष्टाचार के खिलाफ उन्हीं की तरह “शून्य सहिष्णुता” (जीरो टॉलरेंस) रखता है और जो अपने “छप्पन इंच छाती का इस्तेमाल आतंकवाद से लेकर पाकिस्तान के कुचक्रों से निपटने के लिए करेगा. यहीं चार अपेक्षाएं तो देश की जनता में थी. और इनमें से एक भी ना तो दकियानूसी सोच से विकसित है ना हीं अतार्किक रूप से भावनात्मक है जैसा मंदिर या मंडल काल में हुआ था. राजनीति-शास्त्र के सिद्धांत के अनुसार अर्ध- या अशिक्षित समाज में भावनात्मक मुद्दे वास्तविक मुद्दों पर भरी पड़ते हैं. १९९० तक समाज कम शिक्षित था, अतार्किक था लिहाज़ा मंडल-कमंडल उसकी जेहन को बदलते थे लेकिन आज स्थिति पूरी तरह  बदली है.

नये प्रधानमंत्री कैसे इन सपनों को पूरा करेंगे इसका पूरे देश को बेसब्री से इन्तेजार है. मोदी सरीखे सक्षम नेता को जनता ने निर्द्वंद ताकत (पूर्ण बहुमत) दे कर भेजा है ताकि कोई अवरोध ना रहे. हम ने देखा कि २-जी स्पेक्ट्रम घोटाले ने सरकार को १.७६ लाख  करोड़ रुपये का चुना लगाया. इस पूरे देश को अगर मुफ्त भर पेट अनाज सरकार दे तो मात्र १.५० लाख करोड़ रुपये का खर्च आएगा. यानि अगर प्रधानमंत्री मोदी मात्र एक ऐसा भ्रष्टाचार रोक सकें तो पूरे देश को बगैर किसी अतिरिक्त खर्च के १४ महीने तक मुफ्त भोजन दिया जा सकता है. और ऐसा करने में ना तो किसी फिस्कल डेफिसिट (वित्तीय घाटा ) नाधने का दर रहेगा ना कोई निवेश का माहौल बिगड़ेगा जिसकी दुहाई पिछली सरकार कॉर्पोरेट घराने और विदेशी निवेशक के कहने पर देती थी.

लेकिन इस चुनाव की विवेचना कुछ गलत ढंग से की जा रही है. हम भारत के लोग शब्दों को खर्ज करने में खुला दिल रखते हैं. होना यह चाहिए जहाँ दो शब्दों की ज़रुरत हो वहां एक से काम चलायें पर हम चार शब्दों का इस्तेमाल करने में नहीं हिचकते. भावना का भी अतिरेक हमारे डी एन ए में है. लिहाज़ा कई बार तार्किक सोच की बलि चढ़ जाती है. इसका आदत का समाजशास्त्रीय विश्लेषण यह है कि हम सम्बन्ध-आधारित समाज हैं न कि यूरोप या अमरीका की तरह संविदा-आधारित. भाई के रूप में भारत, पुत्र के रूप में श्रवण कुमार , मित्र के रूप में कृष्ण को आदर्श मानते हैं. लिहाज़ा वर्तमान चुनाव परिणाम आने के पहले और बाद में हमने “मोदी की लहर” या “मोदी की सुनामी” के विशेषण से जनमत को नवाजा.

अब जरा तथ्य देखें. इस चुनाव में हर दस लोग जो मतदान देने गए उनमें से तीन ने हीं भारतीय जनता पार्टी को वोट दिया जबकि २००९ के चुनाव में पार्टी को दो लोगों ने मत दिया था. क्या इसे किसी व्यक्ति-विशेष के पक्ष की लहर माना जा सकता है? कोई ८२ करोड़ मतदाताओं में ५४ करोड़ ने मतदान किया और भारतीय जनता पार्टी को मत मिले १७.२० करोड़. याने हर पांच लोगों में जिन्हें मतदान का अधिकार था मात्र एक ने इस पार्टी को वोट दिया. क्या इसे सुनामी की संज्ञा दी जा सकती है?

भारत के संविधान की प्रस्तावना में कहा गया है “हम भारत के लोग ---------धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी , प्रजातान्त्रिक गणतंत्र अंगीकार करते हैं”. अब एक अन्य उदाहरण लें. भारत के हीं उत्तर प्रदेश में रहने वाले २.३० करोड़ मतदाताओं ने मायावती की बहुजन समाज पार्टी को वोट दिया लेकिन इस पार्टी को एक भी सीट लोक सभा में नहीं मिली लेकिन इसी देश के तमिलनाडु में जयललिता की ए डी एम् के को कुल १.७० लाख वोट मिले और सीटें आयीं ३७. क्या इन २.३० करोड़ लोगों के वोटों की कीमत वह नहीं जो तमिलनाडु के वोटरों की है? दरअसल हमारी चुनाव पद्धति फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट (ऍफ़ पी टी पी) है यानी जो एक वोट से भी आगे वह विजयी. यह दोष उसका है.

एक अन्य उदाहरण देखें. इस चुनाव में कांग्रेस को करीब ११ करोड़ वोट मिले. लेकिन सीटें आयी ४४. लेकिन २००९ के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को आठ करोड़ से भी कम वोट मिले थे और सीटें मिली थीं १४४. इस तरह की चुनाव पद्धति का सबसे बड़ा दोष है मत और जीती सीटों में विसंगति. नतीजा यह होता है कि संसद प्रतिनिधि चरित्र का नहीं होता.

अब बात “मोदी की सुनामी की”. दरअसल इसे मोदी की सुनामी कह कर प्रधानमंत्री –नियुक्त नरेन्द्र मोदी का जितना अपमान किया जा रहा है उतना हीं जनता के विवेक का भी. अति-उत्साह में भारतीय जनता पार्टी या उसके समर्थक मोदी को महिमा-मंडित करने में यह भूल जा रहे हैं कि इस प्रचार से यह सन्देश जा रहा है कि मोदी कोई जादूगर हैं और चूंकि जादू छलावा होता है लिहाज़ा यह आभास होता है कि मोदी ने जनता को छल लिया है अपने वायदों से और अपनी वाक्-पटुता हे. किसी इतने बड़े देश के नेता के लिए यह अनुचित और दीर्घकाल में हानिकारक प्रशंसा है.
 
nai duniya

 

Thursday, 15 May 2014

क्या हम जैसे मोदी के आलोचक “बायस्ड” थे ?


प्रजातान्त्रिक सिस्टम में शासन की एक दिक्कत है. यह सर्वमान्य सत्य है कि जनता के मौलिक अधिकारों के प्रति अदालतों की बढ़ती प्रतिबद्धता और राज्य के फैसले लेने के दौरान दबाव समूहों की बढ़ती भूमिका और उतनी हीं बड़ी मीडिया की (जो शासन की गलतियों के खिलाफ जनमत बनाता है) नकारात्मक भूमिका कई बार शासक वर्ग की दिक्कत बढाते हैं और विकास की रफ़्तार को बाधित करते हैं. लेकिन यह तीनों पहलू अपरिहार्य भी माने जाते हैं. शासक वर्ग के लिए इन्हीं के बीच रास्ता निकालने की शर्त होती है.
अब यह कहने में कोई गुरेज नहीं हो सकता कि भाजपा के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार बनाने जा रही है और यह भी उतना हीं सत्य है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री होंगे. उनके लिए चुनौती होगी विकास करना, स्वच्छ प्रशासन देना याने भ्रष्टाचार पर अंकुश लगना और तमाम पहचान समूहों में बंटे और आपसी वैमनष्यता पूर्ण समाज में बगैर वोट की राजनीति को ध्यान में रखे शासन करना. इन सबसे बड़ी दो और चुनौतियाँ होंगी ---बाजारी ताकतों का हित साधन बनाम गरीबी –उन्मूलन के कार्यक्रम और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की हिंदूवादी सोच, जिसे संघ राष्ट्रवाद के सादृश्य (को-टर्मिनस) मानता है याने जहाँ हिंदुत्व की सीमा ख़त्म होती है वहीं राष्ट्र की भी.
प्रजातंत्र में जन धरातल पर आलोचना का अधिकार मिला है. लेकिन इसकी शर्त यह है कि वह आलोचना जनहित को ध्यान में रख कर की जाये और अगर वह आलोचना व्यक्तिगत है तो ऐसा किये जाने के पीछे बड़ा जनहित हो.  मोदी के आलोचकों का एक बड़ा समूह है (जिसमें मैं भी हूँ) लगभग उतना हीं बड़ा जितना बड़ा उनकी हिमायत करने वालों का.  
किसी कई बार जब हम किसी की आलोचना करते हैं तो संदर्भिता बदल जाती है. मोदी को लेकर आलोचना में यह दोष रहा है. आज के परिप्रेक्ष्य में मोदी की सार्थकता हम किस बात से स्थापित करते हैं यह व्यक्तिगत सोच पर निर्भर करता है. एक तर्क वाक्य है “मोदी अपनी आलोचना को लेकर सहिष्णु नहीं हैं”. इस तर्क का विस्तार करते हुए उनके आलोचक (मैं स्वयं भी) कहते हैं “लिहाज़ा मोदी अहंकारी हैं या मीडिया आलोचना को लेकर सहनशील नहीं हैं”. इन आलोचकों में से हीं एक वर्ग (मैं नहीं) तर्क का और विस्तार करता हुआ यह भी कहता है “ लिहाज़ा मोदी का प्रजातंत्र में विश्वास नहीं है लिहाज़ा एक डिक्टेटर की तरह शासन चलाएंगे”. कुछ अतिवादी आलोचक मूल तर्क को खींच कर यहाँ तक ले जाते हैं कि उन्हें मोदी में “हिटलर” नज़र आने लगता है.
मूल तर्क-वाक्य के इस तरह के विस्तार को स्वयं तार्किक दोष का शिकार होना पड़ता है क्योंकि इसमें संदर्भिता कहीं दूर छूट जाती है.
लेकिन क्या यह कहना गलत होगा कि आज देश में राजनीतिक वर्ग में शायद हीं कोई व्यक्ति होगा जिसने विकास की बारीकियों, इस सन्दर्भ में राज्य की भूमिका और सकल घरेलू उत्पाद और मानव विकास के विरोधाभास को इतनी गहराई से समझा हीं नहीं नहीं हो बल्कि अमल में लाया हो जितना मोदी ने? गुजरात माडल में सब कुछ अच्छा हो यह कहना गलत होगा लेकिन अगर कोई मुख्यमंत्री यह सुनिश्चित करे कि उसका तंत्र विकास की योजनाओं को शत प्रतिशत अमल में लाये और भ्रष्टाचार करने के पहले उसकी रूह काँप उठे तो यह शुरूआती दौर में एक बड़ी उपलब्द्धि है. गुजरात में ऐसा हुआ है. अगर मोदी चाहते हैं कि अमुक परियोजना अमुक समय में पूरी ही जाये तो ना तो कोई भ्रष्ट विधायक ना हीं कोई चालाक या कामचोर अफसर उस परियोजना से छेड़ –छाड़ करने की जुर्रत कर सकता है. शायद इसी को हम मोदी का “आलोचना के प्रति शून्य सहनशीलता” मानते हैं. और फिर उन्हें तर्क-वाक्य के विस्तार दोष के ज़रिये “हिटलर” की संज्ञा दे देते हैं.
सामान्यजन मोदी के साथ है. अगर भारतीय जनता पार्टी का लगातार गिरता मत प्रतिशत १८.६ (२००९) से बढ़ कर इस चुनाव में ३० (२०१४ में अनुमानित) या उससे अधिक हो जाता है तो इसका मलतब २००९ के चुनाव के ७.९ करोड़ मतों के मुकाबले पार्टी को इस चुनाव में १८ करोड़ मत मिलेंगे. यह जनता मोदी से विकास की अपेक्षा करती है. भ्रष्टाचार-शून्य प्रशासन की अपेक्षा करती है. और साथ हीं आतंक -रहित वातावरण की अपेक्षा करती है. चौथा मोदी से उसकी यह भी अपेक्षा है कि साम्प्रदायिक सौहार्द्र मजबूत हो. इस जनता को यह परेशानी (जो आलोचकों में है) नहीं है कि मोदी आलोचनाओं के प्रति कितना प्रतिक्रियावादी हैं और यह प्रतिक्रिया उन्हें “आलोचकों की नज़र में कब हिटलर बना देती है”.
एक सामान्य विवेक का व्यक्ति भी यह जानता है कि आज मोदी देश के सर्व-मान्य नेता हैं. मोदी को भी यह भान है. लिहाज़ा कोई बच्चा भी यह समझ सकता है कि उनकी प्राथमिकता होगी कि मुसलमान भय –मुक्त वातावरण में रहे. ताकि मोदी भारत में हीं नहीं विश्व में अपनी छवि एक “वास्तविक सेक्युलर नेता” के रूप में बना पायें. संघ भी उनकी इस राय से इत्तेफाक रखेगा क्योंकि संघ में भी सोच-परिमार्जन का मंथन चल रहा है. लेकिन चूंकि कानून –व्यवस्था राज्य सरकारों के हाथ में है लिहाज़ा मोदी सम्यक विकास के रास्ते हीं मुसलमानों के दिल का भय निकाल सकते हैं. उन्हें इसके लिए “एक्स्ट्रा माइल “ भी जाना पड़ सकता है. अब यह संघ की जिम्मेंदारी होगी कि विचारधार के अतिरेक में डूबे संघ के निचले स्तर के कार्यकर्ता कोई गलती ना करें. मेरे मानना है कि संघ में भी नयी सोच वाला वर्ग मोदी को फ्री हैण्ड देगा मुसलमानों के दिल भय निकालने के प्रयासों को.
मोदी के लिए असली समस्या होगी बाजारी ताकतें , कॉर्पोरेट समूह का और विदेशी पूंजी निवशकों से  जो गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों में खर्च होने वाले धन को वित्तीय घाटा (फिस्कल डेफिसिट) बढाने वाला मान कर विरोध करते हैं. शायद मोदी को यह अहसास है. लेकिन इसकी काट भी उनके पास है. अगर भ्रष्टाचार अंकुश लगा सके तो बगैर अतिरिक्त व्यय के डिलीवरी अंतिम लक्षित व्यक्ति तक पहुँच सकती है. इसके लिए सोशल सेक्टर और नॉन-स्टेट एक्टर्स (राज्येतर संस्थाएं) को शामिल करना होगा गरीबी उन्मूलन के कार्यक्रमों के डिलीवरी पक्ष को भ्रष्ट राज्य सरकारों के चंगुल से लिकालने के लिए.
अगर यह सब कुछ ऐसा हीं रहा तो मोदी देश में एक “शांत क्रांति “ का आगाज़ करेंगे. एक साल के कार्य के बाद हीं मोदी और उनकी जनोपादेयता का चीड-फाड़ करना समीचीन होगा.

jagran/lokmat

Thursday, 8 May 2014

मोदी को व्यापक व्यक्तित्व का स्वामी होना पडेगा


अगर मीडिया मैं हिम्मत हो तो राहुल गाँधी से अमेठी के विकास के बारे में सवाल पूछे”. “ये तो न्यूज़ ट्रेडर” हैं”. “चुनाव आयोग की निष्पक्षता संदिग्ध है” . “जितने दिग्गज पत्रकार बैठे थे निहथ्थे होगये जब मेरी छोटी बहन स्मृति ईरानी ने अमेठी के बारे में तथ्य देना शुरू किया”. “आपकी गलती नहीं है ये न्यूज़ ट्रेडर की मानसिकता है”.
उपरोक्त कुछ वक्तव्य भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रधानमंत्री के प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी के हैं. इनमें मोदी ने देश की दो संस्थाओं --मीडिया और चुनाव आयोग – की नीयत पर कीचड़ उछाला और उन्हें बौना दिखाया.
भाषण और वितंडावाद (डेमागागी) में अंतर होता है. चौराहे पर मदारी का खेल दिखने वाला “पापी पेट के वास्ते” का इमोशनल तर्क दे कर जमूरे की नाच का औचित्य ठहराता है. और दर्शकों ना केवल बंधे रहता है बल्कि खेल के बाद पैसे भी लेता है. मोदी ने अमेठी में कहा “ मैं यहाँ किसी को बुरा –भला कहने नहीं आया हूँ. अमेठी का ऐसा विकास करूंगा कि गुजरात के इंस्टिट्यूट यहाँ सीखने आयेंगे”. “भाइयों और बहनों , क्या गरीब माँ के गर्भ में पैदा होना गुनाह है?”. “अरे, अमेठी के लोगों को कम से कम एक शौचालय तो दे देते”. “चालीस साल से तीन की तीन पीढियां बर्बाद हो गयी और उनके सपनों को चूर-चूर करदिया”. “कहती हिं स्म्मृति कौन है?” भारत माँ के लाल से यह पूछने का तुम्हें किसने दिया अधिकार”?”
तर्क -शास्त्र में दो तरह के दोष होते हैं –औपचारिक और अनौपचारिक. मोदी ने दोनों का बखूबी इस्तेमाल किया अपने भाषणों में. अमेठी में एक दर्ज़न से ज्यादा देश के प्रमुख संस्थान और कारखाने केंद्र की मंज़ूरी और धन से लगाए गए हैं पर मोदी एक शौचालय को लेकर जार-जार रोये. उन्होंने कहा कि वह किसी की बुराई करने नहीं आये पर ४५ मिनट के वितंडावाद रुपी भाषण में ३० मिनट तक सोनिया, राहुल, प्रियंका और स्वर्गीय राजीव गाँधी की लानत-मलानत करते रहे.
संस्थाओं को ढाहना और उन पर इतनी कालिख पोत देना कि उसका असली चेहरा नज़र ना आये यह तथाकथित सामाजिक न्याय की बांग देने वाली पार्टियों का शगल रहा है. इस किस्म की राजनीति का अभ्युदय सन १९९० मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू होने का बाद या यू कहिये कि १९८४ में कांशी राम के बहुजन समाज पार्टी बनाने के बाद हुआ. दरअसल इससे एक झूठी सशक्तिकरण की चेतना उस वर्ग में अचानक विकसित होती है जो सदियों से दबा –कुचला रहा है. इसके लिए पार्टियों को ना तो सिद्धांत पर टिकने की प्रतिबद्धता की दरकार होती है ना हीं कैडर –सृजन के लिए मेहनत करने की जहमत लेनी होती है. लालू यादव का चरवाहा स्कूल, ज़िला पुलिस कप्तान को सार्वजनिकरूप से अपमानित करना, मुख्य सचिव स्तर के अधिकारी से अपने कार्यकर्ताओं के बीच खैनी बनाने की फरमाइश करना इसी श्रेणी में आते हैं. मायावती का उच्च जाति के अफसरों से पैर छुवाना भी इसी किस्म की राजनीति है. दलित वर्ग या पिछड़ा समूह यह समझता है कि हमारा नेता सामाजिक न्याय दिला रहा है कप्तान को अपमानित कर के . एक नशा सा इस वर्ग में छ जाता है. वह भूल जाता है कि इस नौकरी, विकास , सड़क, शिक्षा उसकी पहली ज़रुरत है. नेता राज करता रहता है.
परन्तु जब भारतीय जनता पार्टी के नेता, गुजरात के मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री पद के सबसे प्रबल दावेदार नरेन्द्र मोदी दिन में चार बार मीडिया को “न्यूज़ ट्रेडर” कह कर या चुनाव आयोग ऐसी सफल संस्था की निष्पक्षता को सार्वजनिकरूप से चुनौती देते हैं तब डर लगता है. कांशी राम , मायावती या लालू प्रसाद देश के प्रधानमंत्री नहीं हैं. पूरे देश की जनभावनाओं के किसी काल खंड में संबल भी नहीं रहे हैं. उनके बारे में मालूम है कि दोषपूर्ण फर्स्ट-पास्ट--पोस्ट चुनाव पध्यती के कारण वह दलित-मुस्लिम या दलित-ब्राह्मण या फिर यादव-मुस्लिम या कुर्मी-उच्च जाति या कुर्मी-मुस्लिम गठजोड़ बना कर २० से ३० प्रतिशत वोटों पर कब्ज़ा ज़माने के कारण सीट हासिल करते हैं और हर बार चुनाव में यही आसन खेल फिर शुरू कर देते हैं. लेकिन जब मोदी मीडिया को न्यूज़ ट्रेडर कहते हैं ---वह मीडिया जिसके बारे में कांग्रेस सहित अन्य दलों का आरोप हैं कि वह मोदी की गोद मैं बैठा है—तब लगता है कि लालू, माया या मुलायम ब्रांड की राजनीति और मोदी की राजनीति में कोई मौलिक भेद नहीं है.
मीडिया में सब कुछ अच्छा हो यह कहना गलत होगा. लेकिन क्या कोई व्यक्ति यह कह सकता है कि सत्ताधारी कांग्रेस को मीडिया ने कभी भी बक्शा है? आज सत्ता पक्ष के खिलाफ अगर जनमत बना है तो यह केवल मोदी के तथाकथित और अतिशय प्रचारित गुजरात माडल का कमाल नहीं है. लेकिन कांग्रेस ने तो कभी भी मीडिया को “खबरों के सौदागर” (न्यूज़ ट्रेडर) नहीं कहा. मीडिया के बारे में चाहे जो भी आरोप लगे यह ना तो मोदी ना हीं राहुल गांधी या अन्य कोई यह आरोप लगा सकता है कि वह किसी को बक्श देता है. यह भारतीय मीडिया के डी एन ए के खिलाफ है. किसी को ज्यादा , किसी को कम हाईलाइट करना यह मीडिया के व्यक्तिगत पसंद- नापसंद पर ज़रूर होता है पर मीडिया किसी की खबर जो नकारात्मक और गंभीररूप से जनसरोकार वाली हो, ना दिखाए यह संभव नहीं है क्योंकि दर्शक या पाठक अगले दिन हीं उसे ख़ारिज कर देगा.
न्यूज़ ट्रेडर है कह कर मोदी यह बताना चाहते हैं कि मीडिया का उद्देश्य जन सरोकार नहीं सौदागरी है. ब्राडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन या न्यूज़ ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन की लगभग पांच साल के जीवन काल में शायद हीं कभी इतना घिनौना आरोप सत्ता पक्ष ने लगाया हो.
अभी तक भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री के प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी का व्यक्तित्व का आक्रामक होना स्थितियों को देखते हुए समीचीन था. उनकी व्यग्यात्मक शैली, उनका संस्थाओं पर प्रहार और “शहजादा”, माँ-बेटे “ की सरकार, “दामाद श्री” “दिल मांगे मोरे” और “न्यूज़ ट्रेडर्स” के फॉर्मेट में हमला भी प्रतिद्वान्दात्मक प्रजातंत्र का अपरिहार्य कारक मान कर नज़रंदाज़ किया जा सकता था. इसकी भी अनदेखी की जा सकती है कि देश के प्रधानमंत्री पद के प्रबलतम दावेदार ने चुनाव आयोग पर जबरदस्त आरोप लगाये हैं निष्पक्षता को लेकर. लेकिन इतने बड़े राष्ट्र को सक्षमरूप से चलाने के लिए एक ऐसे व्यक्तित्व की ज़रुरत है जो सर्व-समाहन का भाव रखता हो. जिसमें प्रतिशोध की जगह सर्व-समाहन की व्यापकता हो.
मीडिया में हिम्मत हो तो गाँधी परिवार से सवाल करें अमेठी और रायबरेली के विकास को लेकर”. पूरा देश जानता है कि मीडिया ने किस तरह यूपीए-२ और मनमोहन सरकार को एक क्षण भी नहीं बक्शा. और शायद मोदी के राष्ट्री परिदृश्य में उभरने का यह एक बड़ा कारण रहा है. लिहाज़ा मीडिया की हिम्मत को चुनौती देने और उसे “न्यूज़ ट्रेडर” बताना उसी वितंडावाद का हिस्सा है.

हाल के दो हफ़्तों में मोदी ने इंटरव्यू देना शुरू किया. इस दौरान जब भी उनकी प्रशस्ति के अलावा असहज करने वाले सवाल कुछ पत्रकारों ने पूछे तो मीडिया को लेकर उनकी जुगुप्सा और पत्रकारों के प्रति घृणा छलक कर बाहर आ जाती थी. शायद भविष्य में मीडिया पर अंकुश लगाने के लिए एक ऐसा वातावरण मोदी की स्कीम में है.

lokmat
 

Monday, 28 April 2014

“दामाद श्री” बनाम “टाफी” --- भ्रष्टाचार को लेकर पार्टियाँ कितनी गंभीर ?


कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी के दामाद, पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गाँधी के जीजा और प्रियंका के पति रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ भूमि की खरीद में करोड़ों रुपये अर्जित करने का मामला भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने चुनाव के नौ चरणों में से छटवें चरण के ख़त्म हो जाने के बाद पुरजोर तरीके से उठाया. उधर कांग्रेस के प्रधानमंत्री के दावेदार राहुल गाँधी ने भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी पर किसानों की ४५,००० एकड़ जमीन कौड़ियों के भाव (टाफी की कीमत पर) उद्योगपति अडानी को देने का दावा किया.
दरअसल जनता के मन में इन दोनों प्रतिस्पर्धी आरोपों को लेकर कई शंकाएं जन्म ले रही हैं. वाड्रा को जमीन देने का मामला दो साल पहले उठा था और पाया गया कि हरियाणा और राजस्थान में भारत के सबसे ताकतवर गाँधी परिवार के दामाद को वहां की तत्कालीन कांग्रेस सरकारों ने किसानों की जमीन “लैंड यूज “ में परिवर्तन कर के दे दिया. यह मामला सबसे पहले आप पार्टी के संयोजक अरविन्द केजरीवाल ने उठाया था. कुछ दस्तावेज भी दिए थे जिसमें किसानों की जमीन को हरियाणा सरकार ने जनहित में अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए अस्पताल के लिए अधिग्रहित किया और वाड्रा की कंपनी को सौंप दिया. रातों रात सैकड़ों करोड़ रुपये वाड्रा ने कमा लिए. लैंड सीलिंग कानून की अवहेलना भी की गयी.
उसी तरह कांग्रेस के आरोप के मुताबिक अडानी को कुछ वर्षों में मोदी ने ४५,००० एकड़ खेती वाली किसानों की जमीन एक रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से दी और वह वह भी किसानों के विरोध के बावजूद हालांकि अडानी ने इसे गलत बताया है और कहा है कि सबसे सस्ती जमीन तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने उन्हें दी थी).
प्रश्न यह है कि क्या इतने बड़े भ्रष्टाचार (उद्योगपतियों को सरकारी पक्षपात कर लाभ देना भी उसी श्रेणी में आता है) के दोनों मामले पहले नहीं उठाये जा सकते थे? क्या आरोप लगने वाली दोनों पार्टियाँ वाकई भ्रष्टाचार को लेकर गंभीर हैं? अगर हैं तो क्या ये मामले दो साल पहले हीं किसी राजनीतिक दल को सड़कों पर उतरने के लिए प्रयाप्त नहीं थे?
राजनीतिक वर्ग ने भ्रष्टाचार ऐसे गंभीर मुद्दे को भी फुटबाल का खेल बना दिया है. लगता नहीं है कि इन दोनों राष्ट्रीय दलों में भ्रष्टाचार को लेकर “शून्य सहिष्णुता” का भाव कहीं दूर –दूर तक भी है. वाड्रा का मामला तब भाजपा के जेहन में आता है जब राहुल गाँधी अडानी-मोदी संबंधों आरोप लगाते हैं. भाजपा की गैरजिम्मेदारी का एक अन्य उदाहरण लें. राजस्थान में कुछ महीने से इस पार्टी की सरकार है. “दामाद श्री “ शीर्षक फिल्म और किताब जारी कर भाजपा ने यह आरोप लगाया कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने “दामाद श्री: “ रोबर्ट वाड्रा को गैरकानूनी रूप से जमीन दे कर करोड़ों कमवाया. लेकिन क्या यह आज कुछ माह से इसी पार्टी की राज्य सरकार के होते हुए यह नहीं कर सकती थी कि जांच कराये और अगर वाड्रा और तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने भ्रष्टाचार किया था और, कानून तोड़े गए थे तो “दामाद श्री” को लाभ पहुंचाने के लिए तो उनके और तत्कालीन सरकार के लोगों के खिलाफ कार्रवाई करे.
क्या कांग्रेस पार्टी से अपेक्षा नहीं थी कि गुजरात में अगर “किसानों की जमीन जबरदस्ती कौड़ियों के भाव किसी अडानी को दी गयी थी तो पिछले एक साल में जबरदस्त आन्दोलन करे और सडकों पर आये.
दरअसल दोनों ने ये मुद्दे भ्रष्टाचार के खिलाफ किसी “जोरे टालरेंस” के भाव में आकर नहीं उठाये हैं बल्कि उन्हें यह पता चला है कि यह मुद्दा चुनाव के दौरान जनता में “बिकता” है. अगर मोदी टाफी बाँटते हैं तो सोनिया के दामाद भी टाफी के भाव हीं जमीन खरीदते हैं फर्क इतना है कि वह खरीदने के तुरंत बाद करोड़ों का फायदा लेकर बेंच देते हैं जबकि अडानी जमीन अपने पास रखते हैं , कुछ उद्योग लगाते हैं. जमीन का भाव दोनों ओर बढ़ता है.
कहा जाता है कि चाकू खरबूजे पर चले या खरबूजा चाकू पर, कटता खरबूजा हीं है. ना तो वाड्रा की जमीन ने रातों-रात सोना उगलना शुरू किया ना हीं अडानी और टाटा के हजारों एकड़ जमीन ने अनाज की जगह हीरे उगले. पर नुकसान उन किसानों का हुआ जिनके जीविका का एक मात्र साधन जन हित के नाम पर सरकारों ने छीन लिया. गुजरात में भले हीं कृषि क्षेत्र में पिछले ११ सालों में १० प्रतिशत विकास दर लगातार रहां हो पर एन एस एस ओ की रिपोर्ट के मुताबिक़ गरीब किसानों में रोजगार के अवसर कम हुए हैं क्योंकि वे जी डी पी बढ़ने वाले नकद फसल (कैश क्रॉप) बोने की हिम्मत नहीं कर सकते थे जो संपन्न किसान कर सकते थे. नतीजतन , ग्रामीण क्षेत्र में बेरोजगारी बढ़ी, गरीब –अमीर के बीच का अंतर बढा हालांकि मोदी ने जी डी पी दिखा कर अपने को विकासकर्ता के रूप में देश भर में सफलतापूर्वक प्रतिस्थापित कर लिया.
जनता का इन दोनों राष्ट्रीय दलों की संजीदगी पर शक होने का एक अन्य कारण भी है. वाड्रा पर फिल्म व किताब निकालने वाली भारतीय जनता पार्टी वोट के लिए येद्दीयुरुप्पा को या श्रीरामलू को पार्टी में वापस लेने में रंच मात्र भी गुरेज नहीं करती जिन्हें पार्टी ने हीं भ्रष्टाचार के आरोप में निकाला था. उधर मोदी को भ्रष्ट बताने वाली कांग्रेस रेल मंत्री के रूप में भ्रष्टाचार के हीं आरोप में हटाये गए पवन बंसल को फिर टिकट देने में और आदर्श घोटाले में आकंठ डूबे और हटाये मुख्यमंत्री पद से हटाये गए अशोक चह्वाण को फिर वापास लेने में किसी शर्म का इज़हार नहीं करती.
ऐसे में आम-जनता यह समझ में नहीं आ रहा है कि वह वाड्रा जमीन घोटाले में कांग्रेस से नाराज हो या मोदी-अडानी दुर्गठजोड़ को लेकर भाजपा से . उसे यह भी विश्वास नहीं हो पा रहा है कि सत्ता में आने पर क्या वाकई इन में कोई भी भ्रष्टाचार के खिलाफ अपने वाड्रा और येद्दीयुरुप्पा को बचाएगा या दूसरे पार्टी के अशोक चह्वाण और रेड्डी बंधुओं को जेल भेजेगा. कहीं ऐसा तो नहीं कि चुनाव के बाद दोनों प्रमुख दल “हम्माम में दोनों” के भाव में जनता को भ्रष्टाचारियों का भोजन बनाते रहेंगे.

rajsthan patrika


Tuesday, 8 April 2014

जो सपने अच्छे बेंचेगा वही राजा बनेगा


तो फिर से एक बार घोषणा-पत्र की बाढ़ आयी. १६ वीं लोक सभा का चुनाव है तो ज़ाहिर है १६वीं बार दोनों प्रमुख राष्ट्रीय दलोंकांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (दोनों के काल विशेष में नाम क्या रहे हैं यह महत्वपूर्ण नहीं है)--- ने सपने बेंचे. पांच साल ये सपने पैदा करते रहे हैं और चुनाव आने पर उन्हें अमल में लाने का वादा करते हैं मसलन सबको नहीं तो गरीबों को तो शर्तिया) घर, सबको रोजगार , सबको स्वास्थ्य या सबको सुरक्षा, विकास, किसान, गरीब, अल्पसंख्यक, अन्तर-संरचना, विनिवेश आदि कुछ जुमले हैं जो ६४ साल से हमें बेंचे जाते हैं. हम पांच साल उन्हीं सपनों की आगोश में फिर सो जाते हैं दुष्यंत कुमार के "न हो कमीज़ तो पावों से पेट ढक लेंगे" की मानिंद.

अब जनता किस दल को वोट करेगी यह इस बात पर निर्भर करता है कि कोई दल कैसे ज्यादा सपने बेंचता है. उदाहरण के तौर पर कांग्रेस ने हाई स्पीड ट्रेन देने की बात कही लेकिन मोदी के भारतीय जनता पार्टी ने "हाई स्पीड स्वर्ण चतुर्भुज बुलेट ट्रेन". है ना अन्तर? एक में शब्दों की चुस्ती नहीं है जो बसों में पुदीने के अर्क से बड़ी से बड़ी बीमारी ठीक करने का नुस्खा बेंचने वाले सेल्समेन में होती है क्योंकि उसे दूसरी बस में जाना होता है. लेकिन दूसरे में स्वर्ण, बुलेट और चतुर्भुज जैसे लुभावने शब्द हैं.

कांग्रेस ने पहले से हीं राष्ट्रीय विकास परिषद् बनाया है जिसमें सारे मुख्मंत्री हैं पर भारतीय जनता पार्टी इसे "टीम इंडिया " का नया नाम देते हुए एक संगठन बनायेगी जिसमें सभी मुख्यमंत्रियों से विकास के बारे में राय ली जायेगी. हालांकि यही काम परिषद् का भी था. भाजपा ने इसे संघीय ढांचे के लिए ओर विकास को राज्य की ज़रूरतों के अनुरूप बनाने की संज्ञा दे कर सपनों को और आकर्षक बनाया. कांग्रेस ने वायदा किया कि वह सबको मकान का अधिकार देगी जबकि भाजपा ने सबको सीधे घर देने का सपना दिया. ज़ाहिर है अधिकार फलीभूत हो हो इस पर उनींदी जनता को शंका हो सकती है पर सीधे घर मिलेगा का वायदा अपील करता है.

सपनों की पैकेजिंग में भी कांग्रेस में वह धार नहीं थी जो भाजपा के पैकेजिंग में. कांग्रेस महंगाई ख़त्म करने का वायदा करती है जो उसके पांच साल के वर्तमान शासन काल में बढ़ती रही वहीं भाजपा ने महगाई के लिए एक फण्ड बनाने की बात कही. जनता को लगा कि महंगाई रुके रुके पर फण्ड कोई ऐसे चीज होगी जो दिखा कर सब्जी वाले से , दूध वाले से , किराना वाले से सस्ता माल लिया जा सकता है.

पैकेजिंग का हीं कमाल है कि भाजपा ने प्रशासनिक सुधार , पुलिस सुधार , -गवर्नेंस , बहु-राष्ट्रीय स्टूडेंट आदान-प्रदान प्लान की बात की है. कांग्रेस ने भी करों में छूट की बात की पर वह उतनी विश्वसनीय नहीं थी जितना यह वायदा कि भाजपा का "टैक्स टेररिज्म" (कर आतंकवाद) ख़त्म करेगी . यह अपील करता है कि राज्य कोई आतंक करता है और कोई दल सत्ता में आने पर इसे ख़त्म कर देगा. भाजपा शब्दों के गढ़ने और उसे जन-भावना से सीधे जोड़ने में विशेष दक्षता रखती है और हो भी क्यों . मातृ संस्था राष्ट्री स्वयंसेवक संघ की ट्रेनिंग में हिंदी पर जोर जो रहता है.

कांग्रेस के घोषणा-पत्र के पेज संख्या २५ के १४ वें बिंदु में भी "पूर्ण शक्ति केंद्र " को ब्लॉकस्तर पर स्थापित करने की बात है ताकि जनता को "एकल खिड़की" के जरिये जागरूकता, सूचना और सरकारी योजनाओं को और कार्यक्रमों को अमल में लाने की बात मालूम हो सके. लेकिन इसी सपने को भाजपा के कुछ इस तरह पेश किया है " हर गाँव को ऑप्टिक फाइबर से जोड़ा जाएगा ". सन्देश यह है कि गरीब ओड़िसा के गाँव का चावल अमीर महाराष्ट्र और केरल में अच्छे दाम पर किसान बेंच सकेगा. इस वादे में सपने को और पुख्ता किया गया है.

अगर सपने पुराने हों तो कुछ नए सपने बेचना भी एक कला होती है लिहाज़ा भाजपा एक और नारा है "कम पानी से ज्यादा उत्पादन". जिस देश में ६५ साल के "स्वप्न की सौदागरी" में ३५ प्रतिशत हीं सिंचित जमीन किसानों को मिल पाई हो उसके किसान को लगेगा कि अब जिस खेत में किराये पर पम्पिंग सेट लगा कर अनाज पैदा करता था अब बगैर पानी के हीं अनाज पैदा करेगा और अच्छे दामों पर केरल का कोई व्यापारी कर ले जायेगा.

इस देश में आर्थिक विषमता एक शाश्वत भाव है. "एक धनवान की बेटी ने निर्धन का दमन छोड़ दिया " का गुस्सा आज ६५ साल बाद भी भी गरीब के सपनों को तोड़ता है लिहाज़ा भाजपा ने गरीब और शहरी क्षेत्र की खाई को पाटने का संकल्प किया है. पार्टी अगर शासन में आयी तो गरीब का युवा भी अपनी लम्बी कार अमीर की बड़े बंगले के सामने खडी कर "चाँद सितारों की बात कर सकेगा". हालाँकि आई एच डी एस (इंडिया ह्यूमन डेवेलपमेंट सर्वे ) के ताज़ा आंकडे बताते हैं यह शाश्वत खाई कांग्रेस के नेतृत्व वाली यू पी शासन में कम हुई है और राष्ट्रीय नमूना सुर्वेक्षण संगठन (एन एस एस ) के आंकडे भी इस बात की तस्दीक है कि ग्रामीड़ भारत में शहरी भारत के मुकाबले खर्च के प्रतिशत में ज्यादा वृद्धि है.

भाजपा जानती है कि लगभग नौ करोड नए युवा जिनकी उम्र १८ से २३ है पहली बार वोट देंगे और उनमें से अधिकांश -मेल, ट्विटर , व्हाट्स एप " से जुड़े हैं वह नयी हवा में नए सपने देखना चाहते है और उसे अपने पिताजी, दादा जी और दादा के पिता जी के अपूर्ण सपनों से ज्यादा नए सपनों की चिंता है. लिहाज़ा भाजपा ने "ब्रांड इंडिया " का नारा दिया है. जिसमें एक्सपोर्ट (निर्यात) पर जोर होगा. भारत के युवाओं को अमरीका या तो नौकरी देगा नहीं तो सर्विसेज एक्सपोर्ट (सेवा निर्यात ) के नाम पर अमरीका यहीं कर मोटी तनख्वाहों पर बेरोजगार युवकों को रखेगा. बिहार के शिक्षित युवा को इस किस्म के नए सपने बेंचने के लिए भाजपा की रेसिपी (पाकशास्त्र ) में "टीम इंडिया " "गाँव तक ऑप्टिकल फाइबर" , गोल्डन क्वाड्रीलेटरल बुलेट ट्रेन" , "ईगवर्नेंस" और "सागर माला " आदि हैं तो.

लेकिन भारत जैसे धर्मं- भीरु देश में अगर भगवान् का नाम नहीं आया तो बात नहीं बनती. लिहाज़ा घोषणा-पत्र जरी करने के अवसर पर पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने अपने भाषण में कहा कि "ईश्वर कुछ अच्छा काम करवाना चाहता है इसलिए उसने मोदी जी को चुना है". राजा को दैवीय अभिमत से पुख्ता कर प्रजा पर संप्रभुता देने की चालाकी के पीछे भी यही तर्क था और तब से आज तक शोषण होता रहा.

lokmat