Sunday, 15 June 2014

पाठ्यक्रमों में भ्रष्टाचार का पाठ: मोदी सरकार की एक अद्भुत पहल


 “जानामि धरमं न च मे प्रवृति, जानाम्यधर्मम न च में निवृति,

                                             (प्रपन्न गीता -५७)  

(हे इन्द्रियों के अधिष्ठाता (भगवान् कृष्ण), मुझे धर्मं ज्ञान है पर मेरी प्रवृति उस ओर नहीं है और मुझे अधर्म भी मालूम है पर मुझे उससे छुटकारा नहीं है ) .

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के जवाब में बोलते हुए महाभारत के इस श्लोक के प्रथम पंक्ति का पूर्व अंश यू पी ए -२ की सरकार पर तंज कसते हुए उद्धृत किया था. सन्दर्भ था कृष्ण ने जब दुर्योधन से पूछा कि जब तुम यह जानते हो क्या धर्म है और क्या अधर्म तो धर्म का आचरण क्यों नहीं करते? इस पर उक्त श्लोक में दुर्योधन ने अपनी स्थिति बतायी.

मोदी के जन समर्थन की पीछे जो सबसे बड़ा कारण था वह था जनता का विश्वास कि यह व्यक्ति भ्रष्टाचार से निजात दिलाएगा. मोदी की सरकार का इस दिशा में पहला कदम है मानव संसाधन मंत्रालय के ताज़ा आदेश पर यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (यू जी सी) का देश के सभी कुलपतियों को एक पत्र जिसमे भष्टाचार को उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रमों में शामिल करने की सलाह. यह भी कहा गया है कि इस विषय को कानून, लोक-प्रशासन और मानवाधिकार के पाठ्यक्रमों में शामिल हीं नहीं किया जाये बल्कि इस पर शोध भी कराया जाये.

भ्रष्टाचार को शुद्ध रूप से कानूनी समस्या समझना शायद अभी तक की सबसे बड़ी भूल रही है, यह जितना कानूनी समस्या है उससे ज्यादा सामाजिक और नैतिक. इस समस्या का हल मात्र कानून और कानूनी संस्थाओं में ढूढना बालू में से तेल निकालने की तरह है. और मोदी सरकार शायद इस गूढ़ तथ्य को आते हीं समझ गयी है.

ऐसा नहीं है कि पिछली सरकार इस तथ्य को नहीं जानती थी. सन २००७ में जारी  द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग की चौथी रिपोर्ट में भ्रष्टाचार पर बृहद और सार्थक विश्लेषण किया गया. भ्रष्टाचार को दो वर्गों में बाँट कर उसके निदाल की बात भी की गयी है. ये दो वर्ग है – कोएर्सिव (सत्ता व कानून का भय दिखाकर लोगों से लाभ लेना) और कोल्यूसिव (सता और जनता में से भ्रष्ट लोगों के बीच एक समझौते के तहत किया गया भ्रष्टाचार). रिपोर्ट के पृष्ठ ६३ में दोनों किस्म के भ्रष्टाचार से निपटने के लिए अलग-अलग कानून बनाने की संस्तुति की गयी है और दूसरे किस्म के भ्रष्टाचार (जो यू पी ए -२ के कार्यकाल में व्यापक रूप से नजर आयी ) के लिए कठोरतम कानून की बात कही गयी है. इस किस्म के भ्रष्टाचार के आरोपी पर हीं ओनस प्रोबेन्डी (अपने को निर्दोष सिद्ध करने की जिम्मेदारी) डालने की सलाह है.

दरअसल श्लोक की प्रथम पंक्ति के पूर्वार्ध का भाग (धर्म पर चलने की प्रवृति का न होना) सीधे समाज से जुड़ा है जबकि उत्तरार्ध का भाग (अधर्म जानते हुए भी मेरी उससे निवृति नहीं है) सत्ता में बैठे लोगों से. रेड लाइट जम्प करने से लेकर टी टी को घूस दे कर ट्रेन में बर्थ पाना उसी श्रेणी में आते हैं. मोदी सरकार ने पाठ्यकर्म इसे शामिल करने के आदेश से भ्रष्टाचार के खिलाफ इससे सामाजिक व व्यक्तिगत चेतना को जगाने का सूत्रपात किया है. बेहतर हो कि प्राथमिक शिक्षा से हीं इसका आगाज हो क्योंकि उच्च शिक्षा तक पहुंचते-पहुंचते युवा अपनी संस्कृति और नैतिकता परिभाषित कर चुका होता है और उसे आत्मसात भी कर चुका होता है. अगर प्रवृति हो जायेगी नैतिक आचरण की तो अधर्म से निवृति की ज़रुरत हीं नहीं पड़ेगी. दरअसल कोल्यूसिव किस्म के भ्रष्टाचार में मंत्री और उद्योगपति दोनों हीं शामिल होते हैं या इंजिनियर और ठेकेदार संझौता कर लेते हैं. नुकसान किसी एक व्यक्ति का नहीं पूरे समाज का होता है जब देश के राजस्व को १.७६ लाख करोड़ का चुना लग जाता है या जब १५ साल बाद पुल गिरता है. लेकिन तब तक यह इंजिनियर इंजिनियर-इन-चीफ बन चुका होता है और ठेकेदार मंत्री, सांसद या विधायक या फिर उनको खरीदने वाली. इन दोनों में सिस्टम को दबाने की जबरदस्त ताकत आ चुकी होती है.

दरोगा का ट्रक वालों से सड़क पर वसूली करना कोएर्सिव किस्म का भ्रष्टाचार है जिसे बेहतर कानून और मज़बूत कानूनी संस्था बना कर रोका जा सकता है पर जिन जैसे –जैसे राज्य विकास का काम अपने हाथ में लेती है या संसाधनों का नियंत्रण करती है मक्कार शासक वर्ग को उतने हीं मक्कार ठेकेदार का वर्ग संझौता कर लेता है. चूंकि यह समझौता सत्ता के गिलियारे में या पांच तारा होटलों में होते है जहाँ परिंदा भी पर नहीं मार सकता लिहाज़ा ना तो गवाही मिलता है न कोई साक्ष्य (क्योंकि जनकल्याण के नाम पर कानून में लचीलापन जानबूझ कर लाया जाता है – २-जी स्पेक्ट्रम के “पहले आओ, पहले पाओ” के नियम की तरह). जिस समाज में कोल्यूसिवे किस्म का भ्रष्टाचार घर कर जाता है उसे ख़त्म करना बेहद मुश्किल होता है हालांकि नामुमकिन नहीं--- सिंगापुर और हांगकांग इसके उदाहरण हैं.

नूनन ने अपने किताब “ब्राइब” में कहा है “भ्रष्टाचार की सीमा वहां तक जाती हैं जहाँ तक समाज इसे लेकर सहिष्णु रहता है”. याने अगर समाज इसे नज़रअंदाज करता रहे तो भ्रष्टाचारी सांस लेने का भी पैसा लेने लगेगा. लिहाजा समाज को भ्रष्टाचार के प्रति असहिष्णु (इनटोलेरेंट) बनाना होगा और यह होगा बाल मस्तिष्क को बदल कर जो शुरूआती दौर में अगर घरों में नहीं तो कक्षा में तो हो हीं. बस एक डर है. ५५ साल पहले बेसिक शिक्षा की किताबों में एक पाठ था जिसमें तोते को सिखाया गया था “शिकारी आयेगा, दाना डालेगा , पर लोभी से उसमें फंसना नहीं”. पर जब एक बार शिकारी ने दाना डाला तो तोता यह रटता तो रहा लेकिन दाना खाने के चक्कर में शिकारी के जाल में फंस गया क्योंकि उसे उसका मतलब नहीं मालूम था.     

यूनानी कहावत है “मछली पहले सिर से सड़ना शुरू होती है”. भ्रष्टाचार के बारे में कहा जा सकता है यह भ्रूण से हीं शुरू हो जाता है. लिहाज़ा मोदी सरकार के प्रयासों के अलावा एक व्यापक जन चेतना की ज़रुरत भी होगी ताकि एक माँ उसे पालने में हीं (आजकल क्रेश में) नैतिकता का पाठ पढ़ाये ना कि यह बताये कि उस बच्चे का बाप भ्रष्टाचार करके कितनी बड़ी गाड़ी पर चलता है. जिस दिन बेटा या पडोसी भ्रष्टाचारी की लम्बी गाड़ी को हिकारत से देखने लगेंगे उसी दिन दिन से भ्रष्टाचार अंतिम सांसे गिनने लगेगा. दुर्योधन की प्रवृति धर्म पर चलने की हो जायेगी. 
jagran/lokm

1 comment:

  1. The moment we start looking upon properties earned out of corruption with hatred it shall wither away.High Court judges are posted for major bail bench before retirement to earn the benefit is an example of collusive corruption accepted at highest level.

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