Tuesday, 9 May 2017

आतंक के लिए कुतर्क का सहारा




“अगर कोई सैनिक अपने देश के लिए जान देता है तो उसे शहीद कहते हैं लेकिन अगर कोई धर्म के लिए कुर्बान होता हो तो  उसे आतंकवादी कहते हैं ? मान लीजिये, कोई भारत के सरकार  के खिलाफ हो जाता है तो सरकार उसे दण्डित करती है , कि नहीं?”. ये सवाल केरल के इस्लाम कबूल करने वाले याहिया ( जो पहले ईसाई था) का है जो अपने २१ साथियों के साथ देश छोड़ कर आई एस आई एस के अफगानिस्तान में सक्रिय संगठन से जुड़ गया. अपने तमाम पत्रों को एक एनक्रिप्टेड वेवसाइट “टेलीग्राम” के जरिये पिछले काफी समय से एक अंग्रेज़ी अखबार को भेजता रहा है. हाल हीं में उसके एक साथी  ने खबर दी कि याहिया एक अमरीका सैनिकों  के ऑपरेशन  में मारा गया.

तर्क याहिया का हो या आई एस आई एस का, यह प्रदर्शित करता है किस तरह विश्व के इस्लामिक आतंकी संगठन अपने कुतर्कों से आज पूरी दुनिया के लिए ख़तरा बन गये हैं, किस तरह ये संगठन ग़रीब , अशिक्षित या नीम शिक्षित मुसलमान युवाओं को कुतर्क के सहारे गुमराह कर रहे है और उनमें एक उन्माद पैदा कर रहे हैं.  आज ज़रुरत है कि या तो  इस्लाम के वास्तविक अलमबरदार इस धर्म के उन्माद से दुनिया को बचाने के लिए आगे आये और इसे पुनर्परिभाषित करें या  दुनिया संगठित हो कर इसका  प्रतिकार करे. याहिया को यह नहीं बताया गया कि “धर्म के लिए मरना और धर्म के  लिए मारना” में कितना अंतर है ना हीं यह कि दुनिया में ख़ून बहा कर खलीफा का शासन स्थापित करना अगर धर्म है तो वह पूरी  मानवता, समाज की स्थापना के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है. जो सैनिक देश के  लिए जान देता है वह अपने वतन की सुरक्षा के लिए ऐसा करता है ताकि पूरा समाज (जिसमें याहिया ऐसे लोग भी होते  हैं) महफूज रहे. उसे  यह भी नहीं बताया गया कि दुनिया में खलीफा का शासन (एक अवधारणा जिसे स्वयं दर्ज़नों इस्लामिक देश नकार चुके है) लाने के लिये बेगुनाह लोगों को मारना धर्म नहीं हो सकता। उसे यह  भी नहीं बताया गया कि खून बहा कर धर्म का  प्रसार एक बर्बरतापूर्ण  आदिम सभ्यता का द्योतक  है और इसे विश्व समाज काफ़ी अर्से पहले ख़ारिज कर चुका है.  देश की सुरक्षा में करने वाले सैनिक या हमला करने वाले सैनिक भी मानवता के दुश्मन माने जाते है जब वे निहत्थे और निर्दोष पर हमला करते है। जब एक  आतंकी धर्म के नाम पर यह सब कुछ करता है तो वह उस देश के हीं नहीं पूरे विश्व समाज के और  मानवता के लिए ख़तरा माना जाता है.

याहिया ने आगे  लिखा  है “जेहाद बाज़ार  का एक सौदा है अल्लाह के साथ. एक ऐसा सौदा जिसमें हम अपना जीवन और पूँजी अल्लाह को देकर बदले में जन्नत  हासिल करते  हैं.  कितना फायदे का सौदा है! " . याहिया कुरआन के उस आयत (अल तौबा सूरा  ९ आयत १११) को उधृत कर रहा था जिसमें  कहा गया है “ अल्लाह ने इस्लाम में  विश्वास  करने वालों से उनका जीवन और उनकी संपत्ति खरीद  ली है और बदले में उन्हें जन्नत देने  का वादा किया है.........ये  अनुयायी अल्लाह के मार्ग में  लड़ते  हैं और  या तो मारते  हैं या मर जाते  हैं”.

पाकिस्तान जाने-माने पत्रकार अारिफ जमाल ने अपनी किताब  “द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ़ जेहाद इन कश्मीर” में करीब ६०० जेहादियों के अंतिम पत्र (मरने  के  पहले के)  का अध्ययन करके लिखा  कि “शायद हीं कोई  पत्र हो जिसमें जिहाद में  मरने के बाद  इनाम –स्वरुप जन्नत  में मिलने वाली  ७२ हूरों का जिक्र न हो. मरते वक्त इसका उल्लेख यह बताता  है कि जन्नत की हूरें उनका मुख्य आकर्षण होती हैं.” हालांकि कुरआन की कई आयातों में (अल तुर ५२-२६) और (अल वकियाह ५६-२२, ३५, ३६) हूरों (पुरुष और स्त्री) का जिक्र तो है, उनकी खूबसूरती और उनके शरीर सौष्ठव की चर्चा भी लेकिन ७२ की संख्या हदीस  सुनन अत-तिरमिदिह वॉल्यूम ४, अध्याय २१ हदीस २६८७ में मिलता है. दुनिया के जाने-माने इस्लाम के स्कॉलर शेख जब्रिल हद्दाद  ने जिन्हें परंपरागत इस्लाम का सबसे बड़ा जानकार माना जाता है , सन २००५ में एक फतवा जारी करके के अल्लाह के नाम पर शहीद हुए लोगों के लिए जन्नत में मिलने वाली छः नियामतों का जिक्र किया है उनमें से पांचवां ७२ हूरों के उपलब्ध होने की तस्दीक करता है.

अफगानिस्तान में यू एन मिशन की आधिकारिक रिसर्चर क्रिस्टिनी जेहादी मानव बमों का अध्ययन करने पर पाया कि लगभग सभी आत्मघाती जेहादी इस विश्वास से प्रेरित होते हैं कि “काफ़िर (जो इस्लाम की जगह किसी और धर्म को मानता है) को मारना हमारा धार्मिक कर्तव्य है”.

जम्मू क्षेत्र के नगरोटा आर्मी कैंप पिछले २९ नवम्बर को हुए आतंकी हमले में मरे फिदाइन के पास से मिले सामान में एक असाल्ट राइफल और कुछ कारतूस के अलावा जो चीज़ मिली वह थी सस्ते इत्र की एक बोतल. तमाम पिछले सबूतों के आधार पर पाया गया कि फिदायीन जान देने के पहले नहाता है फिर दूल्हे की तरह श्रृंगार करता है, आँखों में काजल लगता है और शरीर पर इत्र. इसका आशय यह निकला गया कि ऐसे फिदायीन की यह मान्यता होती  है कि जब वह मरने के बाद जन्नत के दरवाजे पर पहुंचे तो वहां हूरों को उसके शरीर से खुशबू आये और वह खूबसूरत दिखे.    

९/११ के हमले (वर्ल्ड ट्रेड टावर) के मास्टरमाईंड मुहम्मद अट्टा ने भी अपने अंतिम  पत्र में धर्म के नाम पर कुर्बान होने का हवाला  दिया था. १९९५ में ओसामा बिन  लादेन ने सऊदी शाह फहद को गुस्से में लिखे गए पत्र में बताया था कि सारा झगडा कुरआन के मुताबिक चलने और  न चलने वालों के बीच  है. उसने उस लम्बे पत्र में २० बार कुरआन की आयातों को उधृत करते हुए कहा कि हम अल्लाह के मजहब पर विश्वास न करने वालों से बदला लेंगे”.



शायद इस्लाम का एक कट्टर वर्ग है जो सही परिभाषा और उदार व्याख्या की जगह अपनी दूकाने चलने के लिए पूरी दुनिया में आतंक फैलाना  चाह रहा है और उधर इसका और विद्रूप चेहरा आई एस आई  एस के रूप में उभरा है. दुनिया में अमन के लिए दो हीं रास्ते हैं या तो इस्लाम स्वयं इन तत्वों को ख़त्म करे या पूरी दुनिया  एकजुट हो कर इस खतरे से लड़े.

दरअसल इस्लाम के प्रसार के लिए और काफिरों (जो इस्लाम में विश्वास न कर किसी और धर्म में करते हैं) से लड़ने के लिए
आत्मघाती दस्ते तैयार करने का इतिहास ११वीं सदी के उत्तरार्ध से शुरू होता है और इसका जनक हसन इब्न अत-सब्बह को माना जाता है. ये फिदायीन सेल्जुक तुर्की साम्राज्य से लड़ने के लिए तैयार किये गए थे. आज भी फिदायीन को (जिसमें कम उम्र के बच्चों को शुरू से हीं मानसिक रूप से तैयार किया जाता है) यही बताया जाता है कि उसका जन्म हीं अल्लाह के काम के लिए हुआ है और फिदायीन का उद्देश्य अल्लाह के लिए अपनी कुर्बानी (इस दुनिया में ) देते हुए जन्नत में वह सब कुछ हासिल करना होता है जो यहाँ उसे नहीं मिलता. इसे उन्माद की हद तक ले जाने में धर्म  की खाल ओढ़े आतंकवादी संगठन इतने सफल हो जाते हैं कि आतंकी इमरान माजिद भट्ट के जम्मू में सन २०१३ में आत्मघाती हमले के  बाद उसकी माँ के एक कविता लिखी जिसमें उसने कहा “ऐ अल्लाह , तू कब ये आवाज़ देगा कि इस खून में लतपथ पड़े गुलाब की  माँ कहाँ है”. पेशवर में २०१४ के सैनिक स्कूल में आत्मघाती हमले मैं तहरीक-ए-तालिबान ने विदेशी आत्मघाती दस्तों जिनमें  अफ़ग़ान, अरब और चेचन्या के आतंकी थे, बच्चों के मारे जाने को भी “अल्लाह का काम” बता कर अपने को न्यायोचित ठहराया. यह अलग बात है कि पूरे पीकिस्तान के धार्मिक स्चोलारों ने इसकी आलोचना की और  इस संगठन के कृत्य को गैर-इस्लामिक करार दिया.    
ऐसा नहीं है कि इस्लाम में एक बड़ा वर्ग कठमुल्लाओं के इस गैर मानवीय प्रयास के खिलाफ आवाज नहीं उठता परन्तु
इस्लाम के इस कठमुल्ले वर्ग के  रहनुमाओं की परिभाषा का नतीजा यह रहा कि एबीसी न्यूज़ के पत्रकार बिल रेडेकर  जब पेशावर के एक मदरसे में दरी पर पढ़ रहे ६० बच्चों की कक्षा में सवाल किया कि जो बच्चे इंजीनियर  या डॉक्टर बनाना चाहते हैं वे हाथ उठायें. केवल दो हाथ उठे. लेकिन जब  उन्होंने पूछा कि कितने  बच्चे जेहाद लड़ना चाहते हैं तो सारे  हाथ उठे.

आज दुनिया को और साथ हीं इस्लाम की सही शिक्षा को मानने वालों को इस नए खतरे से लड़ना होगा क्योंकि  गरीबी और अज्ञानता में पल रहे करोड़ों बच्चों को “जन्नत की ७२ हूरों” के लालच में गुमराह कर निर्दोषों की हत्या करने वालों को इस देश या उस देश का सामान्य अपराधी समझना अपने को और आने वाली पढ़ी को शुतुर्मुर्गी छलावे में  डालना होगा.

१९  वीं सदी के  उत्तरार्ध  में ब्रिटेन के चार बार प्रधानमत्री रहे दुनिया के मशहूर स्टेट्समैन ग्लेडस्टोन ने अनायास हीं नहीं कहा था कि जब तक धार्मिक ग्रंथें में कट्टरता रहेगी दुनिया में शांति नहीं रह पायेगी.      

lokmat

Tuesday, 2 May 2017

हम मोदी आलोचकों की समस्या


किसी भी देश या समाज के इतिहास में ऐसा कम हीं होता है कि किसी एक व्यक्ति पर समाज का एक बड़ा वर्ग न केवल विश्वास करने लगे बल्कि उसमें हर कष्ट का निवारक देखने लगे और उसके व्यक्ति के खिलाफ बोलने वाले स्वरों को व्यक्तिगत अपना, समाज का या देश का दुश्मन मानने लगे। प्रधानमंन्त्री नरेन्द्र दामोदर मोदी धीरे-धीरे नेतृत्व का वह मकाम हासिल कर रहे हैं जहाँ हम निरपेक्ष विश्लेषकों के लिए भी एक समस्या खडी हो रही है कि आलोचना के लिए कौन से बिंदु तलाशें या कौन से तर्क-वाक्य लायें. प्रजातंत्र के समुचित सञ्चालन में आलोचना एक बड़ा पहलू है और इसका जन-विमर्श से विलुप्त होना खतरनाक संकेत हैं. तो फिर क्या  हम तथ्य-विहीन , हठधर्मी और अतार्किक आलोचना शुरू करें और वह भी  इसलिए कि हम निरपेक्ष दिखें और प्रोफेशनल रूप से जिंदा रहें? क्या  यह स्वयं प्रजातंत्र के लिए उचित होगा? आज मोदी की जन-स्वीकार्यता उस स्तर पर है जहाँ स्वयं मोदी को शायद एक समान्तर विरोधी स्वर पैदा करने पड़ें.

किस बात  पर  मोदी का विरोध  करे? इस बात पर कि कोई अख़लाक़ मार दिया  जाता  है? या कुछ लम्पट हिन्दुवादी हिन्दू धर्म का नीम  ज्ञान लिये गौ रक्षा के नाम पर किसी पहलू खान को मार देते हैं? पिछले तीन  साल के शासन में ऐसा कब देखने में आया कि कभी मोदी ने इस तरह के भाव को प्रश्रय दिया है? हम विश्लेषक भूल जाते हैं कि  मोदी  तो पहले दिन से हीं “स्वच्छ भारत”, नशे के खिलाफ अभियान, किसानों को मृदा  परिक्षण, यूरिया पर नीम की  परत,  अद्भुत फसल बीमा योजना, टेक्नोलॉजी का गवर्नेंस  में तेज और भ्रष्टाचार मुक्त डिलीवरी के लिए प्रयोग में लगे हुए हैं. लेकिन शायद विश्लेषण के निरपेक्ष चश्में के राडार पर यह नज़र नहीं आता. अगर फसल बीमा योजना को                                                                    पूर्णरूप से अमली जामा पहनने  के लिए  बटाईदार और जमींदार के  बीच शंका की खाई ख़त्म करने के लिए ताकि बटाईदार खेती में निवेश कर सके और जमींदार उससे जमीन एक समय सीमा के भीतर न ले  सके आदि के  लिए मोदी सरकार कानून बना रही है तो क्या यह विश्लेषण का विषय नहीं है? मध्य प्रदेश में पिछले दस साल से नौ प्रतिशत कृषि विकास दर रही है पर यह निरपेक्ष विश्लेषण का बिंदु नहीं  बन पाता. इसी दौरान कृषि क्षेत्र में राष्ट्रीय विकास दर ३.७ प्रतिशत रहा जबकि उत्तर प्रदेश में मात्र ३.२ प्रतिशत. लेकिन अगर हम निरपेक्ष विश्लेषक उसकी  आलोचना करें तो हमें अपना हीं वर्ग “भाजपाई” मानने लगेगा. उज्जवला योजना ने भारतीय ग्रामीण गरीब महिलाओं का जीवन बदल दिया  (वाम और अंग्रेज़ीदां विश्लेषक  शायद उस अभाव-जनित यातना-ग्रस्त जीवन से बावस्ता नहीं रहे हैं) लेकिन क्या वह किसी निरपेक्ष विश्लेषक की बौधिक जुगाली का सबब  बन सका? अगर हम यह समझ लेंगे तो यह भी जान जायेंगे कि क्यों मोदी की जन-स्वीकार्यता  लगातार बढ़ती जा  रही है.                        

यह अजीब कुतर्क है कि कब्रिस्तान के लिए जमीन दिया जाये तो वह अखिलेश सरकार की धर्म-निरपेक्ष राजनीति होती है लेकिन वहीं अगर चुनाव सभा में मोदी उसका जिक्र  भर भी कर दें तो उससे साम्प्रदायिकता की बू आने लगती है. मोदी को शायद यह चर्चा नहीं करनी पड़ती अगर हम निरपेक्ष विश्लेषक इस बात को  लेकर पिछले ७० साल में किसी दिग्विजय, किसी ओवैसी , किसी अाजम खान या किसी मायावती, मुलायम या  लालू की आलोचना कर रहे  होते. चुनाव के ठीक पहले कोई कांग्रेस मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी जब मुसलमानों को आरक्षण दे देता है (यह पूरी तरह से जानते हुए कि अदालत में यह आदेश  नहीं ठहरेगा) तो क्या हमें उसे धर्म-निरपेक्षता का चोला पहनते हुए निरपेक्षता के नाम  पर  चुप रहना  चाहिए था? तीन तलाक की इस्लामी व्यवस्था सभ्य समाज पर एक बदनुमा दाग है लेकिन क्या किसी वाम चिन्तक को इसके खिलाफ तलवार ताने देखा गया? अगर वर्तमान सरकार इसके खिलाफ  कानून लाये तो उसे साम्प्रदायिकता की राजनीति कह कर हम विश्लेषकों को मोदी की आलोचना करनी चाहिए? तत्कालीन राजीव गाँधी की कांग्रेस सरकार सन १९८६ में मुसलमान पुरुषों को ख़ुश करने के लिये मुस्लिम महिला विरोधी क़ानून बनाती है ताकि सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला निषप्रभ हो सके। सर्वोच्च अदालत ने तलाक शुदा शाहबानो के गुजरा भत्ता के  लिए अपराध प्रक्रिया  संहिता की धारा  १२५  के तहत आदेश किया था जो मौलवियों को नागवार लगा। मुसलमानों के वोट के लिए इस आदेश को निष्प्रभ करते हुए मुस्लिम  पर्सनल लॉ को बहाल रखते हुए तत्कालीन राजीव सरकार एक नया कानून बनाती है जिसका नाम “मुस्लिम महिला (तलाक अधिकार अभिरक्षण ) कानून लाती  है –जो महिलाओं  के खिलाफ है लेकिन जिसका नाम मुस्लिम  महिला अभिरक्षण रखा गया) तो वह धर्मनिरपेक्षता का प्रतीक हो जाता है. याने  राजीव गाँधी या अखिलेश यादव कानून बदलें ताकि मुस्लिम पुरुष समाज खुश हो कर वोट दे  तो वह धर्मनिरपेक्षता लेकिन मोदी तीन तलाक के खिलाफ कानून लायें तो वह घोर साम्प्रदायिकता.    
    
मोदी या गाँधी की जन-स्वीकार्यता और धर्म गुरुओं या बाबाओं की स्वीकार्यता में अंतर को भी समझना होगा. निरपेक्ष विश्लेषण की एक मूल शर्त होती है कि विश्लेषणकर्ता जिस व्यक्ति के वर्तमान मकाम से याने उसकी सम्प्रति उपलब्धियों से रंचमात्र भी प्रभावित न  हो. वह यह नहीं कह सकता  कि जब समाज का एक  बड़ा वर्ग उस व्यक्ति को मान्यता दे रहा  है तो वह सही हीं होगा. इस लिहाज़ से न तो गाँधी की आलोचना हो सकती थी न हीं कार्ल मार्क्स की और न हीं धर्म गुरुओं या  “बाबाओं” की क्योंकि समाज तात्कालिक कारकों से, भावनात्मक अतिरेक के कारण और कई बार अर्ध-सत्य के आधार पर हीं अपने विचार  बन लेता है. गाँधी  अपनी व्यापक जन-स्वीकार्यता के दौरान इस खतरे को समझ गये थे. असहयोग आन्दोलन  के दौरान चौरी-चौरा में जब अहिंसक भीड़ अचानक थाने पर हमला करने लगी तो उस उग्रता के  पीछे कहीं लोगों में अपने नेता (गाँधी) में ईश्वरीय तत्व दिखाई देने लगा. गाँधी ने इस  खतरे को  समझते हुए आन्दोलन स्थगित किया. धर्म की दुनिया में यह अक्सर  पाया जाता है. धार्मिक नेताओं में ईश्वरीय रूप देखना भारतीय समाज का एक शगल रहा है. यहाँ तक कि एक समय था कि शीबू सोरेन (गुरु जी) में झारखण्ड के एक आदिवासी समाज का इतना विश्वास रहा कि उनके बारे में किस्से हुआ करते थे कि “गुरु जी तो एक हीं समय में कई जगह  पर मौजूद रहते हैं”. सोरेन आदिवासियों में यह स्पष्ट मत  था कि गुरु जी के दर्शन मात्र से लोग धन्य हो  जाते थे. आसाराम बापू जब किसी परिवार की युवा लडकी को आश्राम में छोड़ जाने की बात कहते थे तो अनुयायी माँ-बाप उसे बाबा का उपकार मानकर उस बालिका को आश्रम में “पढने”  के लिए छोड़ जाते थे. आसाराम आज बलात्कार के आरोप में वर्षों से जेल में है. शिबू सोरेन मुख्यमंत्री और केंद्र में मंत्री बनने के बाद भ्रष्टाचार के आरोप झेलते हुए आज राजनीतिक गुमनामी की भेंट चढ़ चुके हैं.

लेकिन मोदी की जन स्वीकार्यता उस भरोसे की वजह से है जो जनता को काफी अरसे बाद हुआ है. और वह भरोसा  इस बात का नहीं है कि वह राम  मंदिर बनवायेंगे बल्कि  इसका कि इस व्यक्ति में भारत को बदलने की क्षमता है ,  इसका व्यक्तित्व भ्रष्टाचार या सत्ता-जनित दोषों से परे है. यही वजह है कि अरविन्द केजरीवाल को विकास छोड़ कर को मोदी के  खिलाफ अभियान छेड़ना महंगा  पड़ा.      

lokmat

Saturday, 22 April 2017

अपराध न्यायशास्त्र के लिए नयी चुनौती

सर्वोच्च न्यायलय के फैसले से उपजे छ: बिंदु
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बाबरी मस्जिद-राम मंदिर विवादस्पद दांचे के गिराए जाने के २५ साल बाद सर्वोच्च अदालत के ताज़ा  फैसले ने छः नए प्रश्नों को जन्म दिया है. अदालत ने कहा  कि इस मामले में दायर दो ऍफ़ आई आर ( एक कार सेवकों के खिलाफ और दूसरा २१ बड़े नेताओं के  खिलाफ) को  संयुक्त रूप से समयबद्ध तरीके से दो साल के अन्दर सुन कर फैसला दिया जाये और तब  तक मामले को सुनने वाले जज का तबादला न हो. फैसले का तात्पर्य यह कि भारतीय जनता  पार्टी के पितामह लालकृष्ण आडवाणी (८९ वर्ष) , पूर्व अध्यक्ष मुरलीमनोहर जोशी (८३ वर्ष) के खिलाफ ढांचा गिराने  की साजिश का मुकदमा लखनऊ की अदालत में फिर से शुरू होगा. और साथ हीं अभियुक्त चाहें  तो सभी ६५६ गवाहों से फिर से जिरह की जा सकती  है.  अदालत के पास मात्र ५६४ कार्य दिवस हैं। 

इस फैसले से उपजे प्रश्न हैं: (१) क्या आडवाणी अब राष्ट्रपति पद के  प्रत्याशी बनने के लिए योग्य रहेंगे?; (२) धार्मिक-राजनितिक-सामाजिक आंदोलनों को लेकर किसी राजनेता के बयानों से उपजे जनांदोलन की परिणति के आधार पर क्या साजिश के अंश देखना या अपराध-शास्त्र के “मेंस रिया”  के सिद्धांत के  तहत दोष के अंश (कल्पेबिलिटी) निर्धारित करना आसान होगा? (३) क्या घटना के २५ साल बाद गवाहों को याद होगा कि उन्होंने क्या देखा था और पिछली (१५ साल पहले) जिरह  में क्या कहा था?; (४) क्या सुप्रीम कोर्ट  को सन २००२ और सन २००७ में  इसी अदालत द्वारा लिए  गए  फैसले को देखने की ज़रुरत नहीं थी जिसमे इसी अदालत ने दोनों मामलों को संयुक्तरूप से लखनऊ में सुने जाने की याचिका  को ख़ारिज करने वाले हाई कोर्ट के फ़ैसले को बहाल रखा था और वह भी तीन सदस्यीय  बेंच द्वारा?; (५) (यह प्रश्न न्यायिक प्रक्रिया में नैतिकता का ज्यादा  है कानून का कम) पिछले २५ सालों में अदालतें और अभियोजन संस्थाएं ढिलाई करती रहीं लिहाज़ा इन २१ नेताओं में (जिनके खिलाफ रायबरेली की अदालत  में मुकदमा चल रहा था, आठ मर चुके हैं और एक के खिलाफ इसलिए मुकदमा नहीं चल सकता कि वह वर्तमान में राज्यपाल है)  से १३ आज जीवित हैं. क्या अच्छा स्वास्थ्य और दीर्घकालीन जीवन होना अभिशाप है और साथ  हीं अगर राष्ट्रपति पद का चुनाव इस फैसले  के दो माह पूर्व होता और अगर अडवाणी राष्ट्रपति बन जाते तो क्या यह मुकदमा चल सकता था ? (६) सर्वोच्च  न्यायलय ने अपने इस फैसले में पैरा १९ में न्याय का एक  सिद्धांत उधृत किया है  जिसके तहत कहा गया  है कि चाहे आसमान गिर जाये न्याय किया  जाना चाहिए. ऐसे  में इसी अदालत की बड़ी बेंच द्वारा इस फैसले से इतर  फैसला दिया जाना (सन २००२ और सन २००७) इस सिद्धांत से परे था?      

                      राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी
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देश में केवल दो पद हैं जिन पर बैठने के पहले व्यक्ति संविधान  के अभिरक्षण, परिरक्षण व संरक्षण की शपथ लेता है. ये पद हैं राष्ट्रपति और राज्यपाल. अन्य  सभी यहाँ तक कि प्रधानमंत्री , उप  राष्ट्रपति , भारत के मुख्य-न्यायाधीश संविधान में निष्ठा की शपथ लेते हैं. कोई व्यक्ति सविधान के अनुच्छेदों के तहत बनाये गए कानूनों का अगर उल्लंघन  करने का आरोपी  है तो इसका  मतलब होता है  कि उस संविधान  की रक्षा की शपथ नहीं  ले सकता. यही कारण है  कि भारत जनता पार्टी के ८९ – वर्षीय पितामह लालकृष्ण आडवाणी या पार्टी के पूर्व अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी अब राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी नहीं हो सकते.

इसमें कोई दो राय नहीं  कि सर्वोच्च  अदालत के फैसले से न केवल न्याय के  इस  मंदिर के  प्रति जनता का विश्वास बढा है बल्कि इस फैसले ने कानून की दुनिया में चर्चित यह ब्रह्म वाक्य भी सत्य साबित किया “चाहे आप कितने भी ऊपर हों , कानून आप से ऊपर रहेगा”. इस फैसले के बाद अब लखनऊ में सी बी आई की अदालत ऍफ़ आई आर संख्या १९७  और १९८ (पहला सभी कार सेवकों के खिलाफ और दूसरा २१ विशिष्ठ व्यक्तियों –जिनमें आठ मर चुके हैं) एक साथ सुना जाएगा. साथ हीं दुनिया  में अपराध न्यायशास्त्र के लिए सी बी आई कोर्ट का भावी फैसला एक नया आयाम  होगा. इसमें कोई दो राय नहीं है कि ६ दिसम्बर, १९९२ के प्रस्तावित कार –सेवा के पूर्व देश के हिन्दुओं में राम मंदिर को लेकर एक जबरदस्त उन्माद पैदा किया गया था. यह भी सच है कि आडवाणी, जोशी ने देश भर में यात्रायें निकाली थी. उमा भारती और साध्वी ऋतंभरा के तत्कालीन भाषणों ने  इस उन्माद को हवा देने का काम किया था. अदालत के सामने ये सारे प्रश्न होंगे. पर मूल प्रश्न होगा --क्या विवादास्पद ढाँचा गिराये जाने में इन आरोपियों की साज़िश के स्तर पर भी कोई संलिप्तता थी? इन नेताओं पर मुकदमा आई पी सी की धारा १२० (बी) के तहत है अर्थात आपराधिक साजिश करने का.

यह बात स्पष्ट है (और जिसका जिक्र वर्तमान फैसले में किया भी  गया है) कि हाई कोर्ट ने टेक्निकल आधार पर दोनों मामलों को एक साथ चलाने का राज्य सरकार की दूसरी अधिसूचना ख़ारिज  की थी क्योंकि सरकार ने इस अधिसूचना के लिए उच्च न्यायलय की सहमति नहीं ली  थी. लेकिन फिर अगर अगले चार से छः सालों में सर्वोच्च न्यायलय ने पुनरीक्षण याचिका, रिविजन याचिका हीं नहीं क्यूरेटिव याचिका के दौरान भी हाई कोर्ट के आदेश को बहाल रखा तो क्या आरोपी इसका खामियाजा भुगतें यह न्यायोचित है?
इस फैसले के तत्काल बाद केंद्र में सत्तानशीन भारतीय जनता पार्टी का शीर्ष नेतृत्व प्रधानमंत्री के आवास  पर बैठा और यह फैसला लिया गया कि इन वयोवृद्ध नेताओं को मुक़दमा लड़ना चाहिए और बेदाग़ निकलने की कोशिश की जानी चाहिए. जाहिर है पार्टी को जब दो साल में फैसला आयेगा तो जो भी फैसला हो २०१९ के चुनाव में इसका राजनीतिक  लाभ मिलेगा. यह अलग बात है  कि अगर स्पेशल कोर्ट से सजा होती भी है तो इसकी अपील फिर  हाई कोर्ट में हो सकती है लेकिन भारतीय समाज के एक सम्प्रदाय विशेष में इन नेताओं के प्रति और साथ हीं पार्टी के प्रति सहानुभूति रहेगी.

एक प्रश्न और भी अनुत्तरित रहेगा और वह यह कि दो साल बाद जब कल्याण सिंह राज्यपाल के पद से हटेंगे और उन पर मुकदमा चलेगा तो क्या वह भी  यह अपेक्षा नहीं  करेंगे कि सभी गवाहों से फिर से जिरह हो जो कि उनका मौलिक अधिकार है? और तब क्या एक हीं मामले में तीन बार गवाहों का जिरह और वह भी लगभग ३० साल बाद न्याय  की प्रक्रिया के लिए उपयुक्त होगा?            

lokmat                                                                                                                                                                                                            

Saturday, 15 April 2017

मीडिया की जड़ता: क्या ऐसे बनेगा “नया” भारत?



पिछले सप्ताह एक अजीब घटना हुई. उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में जंगलों से सटे हाईवे पर एक १०-वर्षीय लडकी लगभग नीम-बेहोशी की हालत में पाई गयी. पुलिस गश्ती दल को इस बात की सूचना किसी राहगीर ने दी. और पुलिस ने उसे उठा कर पास के अस्पताल में भर्ती कराया. गैर-ज़िम्मेदार मीडिया ने फ़ौरन “एक्सक्लूसिव” खबर चलायी कि यह लडकी जंगलों में बंदरों द्वारा पाली गयी, इसके शरीर पर कपडे नहीं थी और यह बंदरों की तरह चार अंगों (दो हाथ और दो पैर ) पर चलती है और खाना (तरल) भी दिया जा रहा है तो बंदरों की तरह सीधे मुंह बर्तन में लगा कर पी रही है. मीडिया की इस खबर की बाद अगले २४ घंटों में कल्पना के पर लग जाती हैं और दूसरी खबर आती है कि वह वन देवी है. बस फिर क्या था चढ़ावा और पूजा का  समान ले कर सैकड़ों  श्रद्धालु इस देवी के दर्शन को इकठ्ठे हो जाते हैं. देश में गरीब सबसे से ज्यादा भक्त होता है लिहाज़ा आस-पास के गाँव  के लोग अपने खलिहान में गेंहू की व्यवस्था “बड़े ईश्वर” पर छोड़ कर वन देवी की अर्चना में  व्यस्त हो जाते हैं.
तीन दिन बाद जिस पुलिस गश्ती दल के सिपाही ने इस लडकी को जंगले से सटे हाईवे से उठाकर पास के अस्पताल में भर्ती कराया था उसने इस ख़बर को पढ़ा और पब्लिक में आकर बताया कि इस लडकी को जब उसने देखा तो उसके  शरीर पर कपडे भी थे और वह हाँ और ना में कुछ बोल भी रही थी. वह बेहद कमज़ोर हो गयी थी. इस खुलासे की बाद राज खुला कि वह मानसिक रूप से पूर्ण विकसित नहीं थी और शायद घर वालों ने उसे पालने की जहमत न उठाते हुए सड़क पर भगवान भरोसे छोड़ दिया था.

जरा गैर कीजिये मीडिया का गैर-प्रोफेशनल व्यवहार. किसी एडिटर ने अपने रिपोर्टर से पहली खबर देने से पहले यह नहीं पूछा कि जिसने सबसे पहले उस लडकी को देखा था याने पुलिस कर्मी उससे हकीकत पता करे. एडिटर को मात्र इस बात में दिलचस्पी थी कि हैडिंग में लिखा जाये “मोगली गर्ल जिसे बंदरों ने पाला”.
डेस्क की बुलन्द्परवाजी (कल्पनाशीलता) का यह आलम था कि सभी लोकल अख़बारों और चैनलों ने यह बताना शुरू किया कि बंदरों में कितनी दया होती है और वे कितने “मानवीय” होते हैं कि जंगल में भी उस बच्ची के भरण-पोषण का इन्तेजाम इतने सालों  से करते रहे हैं.  यह है भारतीय मीडिया. 
  
किसी भी समाज में बदलाव की  दो मूल शर्तें होती हैं. एक: वह बेहतरी के लिए हो और दो: वह बुद्धि-सम्मत हो. भारत में हाल के आंकड़े जो संयुक्त राष्ट्र संघ ने या अन्य विश्वसनीय संस्थाओं ने  जारी किये हैं चीख-चीख कर बताते हैं कि भ्रष्टाचार, भूख सूचाकांक, खुशहाली सूचकांक या मानव विकास सूचकांक में भारत पिछले २७ सालों में या तो वहीं का वहीं है या नीचे गिरा है. यहाँ तक कि गरीब-अमीर के बीच खाई लगातार बढ़ती जा रही और आज देश के मात्र एक प्रतिशत अभिजात्य वर्ग के पास देश की  कुल संपत्ति का ५८.६ प्रतिशत सिमट गया है जो कि सन २००० में ३७ प्रतिशत हुआ करता था.  लेकिन क्या कभी आपने इन मुद्दों पर लोगों को  सड़क पर आते देखा है? क्या कभी सत्ता में बैठे लोगों को इन मुद्दों पर किसी भी प्रकार के जन-आन्दोलन का सामना करना पड़ा है? इस देश में पिछले २७ सालों से हर ३७ मिनट पर एक किसान आत्महत्या करता रहा है और प्रतिदिन २०५२ किसान खेती छोड़ कर श्रमिक बन कर बड़े शहरों में रिक्शा चलने को मजबूर हो रहा है. लेकिन क्या कभी टी वी स्टूडियो में ये मुद्दे चर्चा का सबब बन पाए हैं? अशिक्षित, गैर-प्रोफेशनल और गैर-जिम्मेदाराना मीडिया भी भावनात्मक मुद्दों को हवा देने में ज्यादा दिलचस्पी रखता है बजाय जनता को असली मुद्दों पर शिक्षित करने या मुद्दों पर जनमत बनाने के़़। 

जी हाँ? हम उत्सव धर्मी हैं और मुद्दे तलाशना हमारा शगल है. यही वजह है कि हम गौ-मांस, वन्दे मातरम का अपमान और राष्ट्रभक्ति की नयी परिभाषा और प्रतिमान गढ़ने लगे हैं. दिल्ली से सटे नॉएडा में घर में घुस कर जो हाथ अखलाक को मार देते हैं वे कभी भी इस बात के खिलाफ नारे नहीं लगाते कि कैसे एक अधिकारी इंजिनियर की संपती दो  हज़ार करोड रुपये की हो जाती है. वे हाथ अलवर में गाय का व्यापर करने वाले ५५ वर्षीय पहलू खान को सरे राह पीट-पीट कर मार देते हैं लेकिन कभी यह नहीं देखते कि बगल के किसान का अनाज सरकारी खरीद केन्द्रों पर नहीं लिया जाता जबकि आढ़ती उन्हीं से सस्ते  दाम पर वही अनाज लेकर उसी क्रय केन्द्रों  के भ्रष्ट लोगों  को बेंच देते है और मुनाफे का हिस्सा बाँट लिया जाता है.

मोदी सरकार ने नयी फसल बीमा योजना शुरू की. यह एक बेहद उपादेय योजना है जिसमें पिछली तीन योजनाओं की खामियों को लगभग पूरी तरह दूर  कर दिया गया है. लेकिन आजतक किसी भी न्यूज़ चैनल ने इसे डिस्कशन  का मुद्दा बना  कर जन-विमर्श के धरातल पर नहीं रखा लेकिन अगर ओवैसी ने  राम मंदिर को लेकर  कुछ भी कह दिया तो वह गेरुआ पहने बाबाओं और दाढ़ी रखे मुल्लाओं को हाफ-हांफ कर "तेरा धर्म-मेरा धर्म " की बांग देने का सबब बन जाता है.

भारतीय मीडिया में इतनी गिरावट पहले कभी नहीं देखी गयी थी. विकास के पैरामीटर्स को लेकर रिपोर्टरों की बीट होती थी और कोई भी रिपोर्टर "गौ-हत्या" या "तीन –तलाक" को फुल टाइम  बीट के रूप में नहीं देखता था. इस साल गेंहू की बम्पर फसल हुई है और देश में करीब ८५ मिलियन टन अनाज के भण्डारण की बड़ी समस्या बनी हुई है. आज देश में मात्र ३२ मिलियन टन अनाज के भण्डारण की क्षमता है. सरकार ने अगर तत्काल कुछ व्यवस्था नहीं की  तो किसानों की कड़ी मेहनत से उपजा गेंहू सड़कों पर फैला रहेगा और चूहे या चूहेनुमा अफसर इसे हज़म कर जायेंगे पर क्या आपने कोई चर्चा इस पर देखी है?

अमर्त्य सेन ने  भारत में १९४३ में होने वाले दुर्भिक्ष जिसमें २० लाख लोग मारे गए थे का विश्लेषण करते हुए कहा था कि अगर उस समय प्रजातंत्र होता तो लाखों लोगों की जानें न जाती क्योंकि उस समय भी सरकार के पास वहीं पास के सैनिक बैरकों में काफी अनाज था. उनका मानना था कि मीडिया की ताकत सरकार को मजबूर कर देती है कि वह रसद तत्काल दुर्भिक्ष वाले इलाके में पहुंचाए चाहे उसकी  जो भी  कीमत हो. लेकिन आज भारत में अनाज भी इफरात है , मीडिया भी है लेकिन विश्व भूखमरी सूचकांक पर भारत बेहद पीछे है और करींब २० करोड लोग रोजाना रात को भूखे पेट सोते हैं. क्या भारतीय मीडिया की अब भी अपने को संविधान के अनुच्छेद १९(१) (अ) से परिरक्षित रखने की जिद सही है?  

lokmat

Friday, 7 April 2017

किसान क़र्ज़ माफ़ी: कैंसर का दर्द की गोली से इलाज



सही अमल हो तो यूपी अन्य राज्यों के लिये नज़ीर 


"उम्मीद तो बांध जाती,तस्कीन तो हो जाती,  
वादा न वफ़ा करते, वादा तो किया होता"
            
शायर की इस भावना को पूरी तरह अमल में लाते  हुए पिछले ७० साल से राजनेता चुनाव के दौरान घोषणा पत्र में या जनमंचों से वादे करते हैं  और परिणाम आने के तत्काल बाद उन्हें भूल जाते हैं. इस पैमाने को बदलते हुए उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की योगी आदित्य नाथ के नेत्ृत्व वाली नयी सरकार का 2.30 करोड़ लघु व सीमान्त किसानों के एक लाख रुपये तक क़र्ज़ माफी का फैसला क्रांतिकारी कहा जा सकता है. प्रदेश का बजट  लगभग ३.७५ लाख करोड रुपये का होने की उम्मीद है  और ऐसे में लगभग ३६,००० करोड रुपये का क़र्ज़ माफ़ कर देना जो कि बजट परिव्यय  का  दस प्रतिशत हो अपने आप में बड़ा कदम माना जा सकता है. अन्य राज्य भी आने वाले दिनों  में इस तरह की मांग करने लगे हैं. भारतीय जनता पार्टी को तमाम अन्य राज्यों में जहाँ  आने वाले समय में चुनाव हैं इस चुनौती को झेलना पड़ सकता है.

प्रदेश में क़रीब ५००० क्रय केन्द्र खोल कर आधार कार्ड के आधार पर केवल असली किसानों से गेहूँ की ख़रीद करने का फ़ैसला एक बड़ा क़दम है। अगर राज्य सरकार गंभीरता से इस फ़ैसले को अमल में ला सके तो देश के अन्य राज्यों के लिये अनाज ख़रीद में व्याप्त भ्रष्टाचार पर अंकुश का उदाहरण बन सकता है। 
इसी तरह क़र्ज़ माफ़ी से बढ़े ३६ हज़ार करोड़ की रक़म जुटाने के लिये दीर्घकालीन बांड जारी करना भी आर्थिक समझदारी (साँप भी मरे और लाठी भी न टूटे ) का बेहतरीन नमूना है़। 


लेकिन आखिर क्या क़र्ज़ माफ़ी समस्या का समाधान है. क्यों २००८ में यू पी ए-१ की मनमोहन सरकार को भी देश भर के किसानों का ७१,०००  करोड क़र्ज़ माफ़ करना पड़ा. क्या इस क़दम से किसानों का संकट हमेशा के लिये ख़त्म हो गया था?  क्या इससे यह ख़तरा नहीं है कि हर किसान खूब क़र्ज़ लेगा, बेटे-बेटी की शादी में पैसे उडाएगा और चुनाव आने का इंतज़ार करेगा. राजनीतिक पार्टियों में होड़ लगेगी कि कैसे इस तरह के “ऋणम् कृत्वा घृतं पिवेत” (क़र्ज़ ले कर घी पीना चाहिए) की  संस्कृति को विकसित कर वोट लिया जाये. नैतिक रूप से देखें तो इस तरह की नीति से वोटरों को रिझाने और दारू 
बाँट कर वोट लेने में कोई ख़ास अन्तर नहीं है। 

किसानों की समस्या समझना और उसका स्थाई निदान निकलना कोई राकेट साइंस नहीं है, न हीं इसे समझने या समाधान निकालने के लिए आइंस्टीन का दिमाग चाहिए. उदाहरण के तौर पर,  प्रमुख फसल ---गेहूं ----  के लिए प्रति हेक्टेयर करीब ४०,००० से ४५,००० रुपये खर्च होते हैं. देश में औसत पैदावार ३२ कुंतल है जो कि पंजाब, हरियाणा में ४२ से ४८ कुंतल तक और बिहार, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में मात्र २५ से ३० कुंतल तक है. इसका कारण यह है कि इन प्रदेशों में अधिकांस किसान (७५ से ८८ प्रतिशत) सीमान्त या लघु किसान है याने २ हेक्टेयर से कम जोत वाला. वर्तमान में गेंहूं की न्यूनतम समर्थन मूल्य १६२५ रुपये प्रति कुंतल है. याने एक किसान को (अगर  अपना भूसा भी बेंच देता है) ६०,००० रुपये  की आय हुई. उत्तर प्रदेश या हिंदी पट्टी के राज्यों  में लगभग ७० प्रतिशत सीमान्त किसान (एक  हेक्टेयर से कम) हैं और १५  प्रतिशत लघु (याने दो हेक्टेयर से कम) . एक सीमान्त किसान जो रबी  और खरीफ दोनों हीं पैदा करता है की कुल वार्षिक आमदनी अधिक से अधिक ४०,००० रुपये हो सकती है अर्थात मात्र ३३०० रूपये प्रति माह. इस पर अगर मौसम की मार पड़ गयी तो अगले दस साल तक उसके उभरने के आसार ख़त्म हो जाते हैं. क़र्ज़ पर ब्याज चढता रहता है और अंत में वह जमीन  बेंच कर बड़े शहरों में मजदूरी करने को मजबूर हो जाता है. लिहाज़ा क़र्ज़ माफ़ करना एक कैंसर के मरीज़ को दर्द रोकने वाली मोर्फिन की सुई लगाने के सिवा कुछ नहीं है. व्याधि के जड़ में जाना होगा.    

मैंने जो ऊपर किसान के आय का गणना की है वह आदर्श स्थिति को लेकर है. लेकिन हकीकत बिलकुल उलट है. किसी भी गरीब किसान को सरकारी क्रय केंद्र पर अपना उत्पाद बेंचना संभव नहीं होता  क्योंकि आढ़तियों और भ्रष्ट सरकारी क्रय केंद्र के कर्मचारियों के बीच एक “अलिखित” समझौता होता है कि गरीब और बेपढ़े-लिखे किसानों को  इतना  तंग करो कि वे अढतियों को औने-पौने बेचने पर मजबूर हो जाएँ. फिर आढ़तिया वही गेंहू उन्हीं क्रय केन्द्रों पर बेच देता है. सरकारी कागजों  में दर्ज होता है कि अमुक  क्रय  केंद्र ने अपने क्रय कोटे से ज्यादा गेंहूं  खरीदा. मुख्यमंत्री और देश के नेता भी हांफ –हांफ कर जनता को बताते हैं कि किसानों को कितना “समर्थन” दिया गया. मध्य प्रदेश में नाफेड का क्रय केंद्र खुला और यह  माना  गया कि राज्य सरकारों के क्रय केंद्र भ्रष्ट होते हैं लिहाज़ा केन्द्रीय एजेंसी कुछ बेहतर होगी। पर बाद में पता  चला कि भ्रष्टाचार किसी राज्य के कर्मचारियों की “बपौती” नहीं है. उत्तर प्रदेश सरकार को इस भ्रष्टाचार को तोड़ना होगा। 

सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत में पिछले २५ सालों से लगातार हर ३६ मिनट पर एक किसान आत्म-हत्या कर रहा है और हर रोज़ २०५२ किसान खेती छोड़ देते है. दो दिन पहले महाराष्ट्र में एक किसान ने अरहर की खडी फसल में आग लगा दी क्योंकि उसे फसल का लागत मूल्य तो छोडिये ट्रक से मंडी ले जाने के पैसे नहीं मिल रहे थे. अगर गहराई में जाये तो पता चलेगा अरहर का समर्थन मूल्य तो सरकार ने ४८५० रुपये प्रति कुंतल कर रखा है (जबकि बाज़ार  में अरहर की दाल पिछले साल २५०  रुपये और वर्तमान में ८०  रुपये है) परन्तु न तो सरकारी क्रय केंद्र में कोई खरीद हो रही है न हीं खुले बाज़ार में मूल्य बढ़ रहा है. कहने की ज़रुरत नहीं कि किसान ने पहली बार दलहन के उत्पादन की प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अपील पर रिकॉर्ड २५  मिलियन टन की पैदावार की है. लेकिन सरकार को यह समझ में नहीं आ रहा है कि इस स्थिति के बाद अगले कई दशकों तक कोई किसान दलहन पैदा करने की सोचेगा भी नहीं.                        

आज ज़रुरत है कि किसान के उत्पादों का समर्थन मूल्य कम से कम २५  प्रतिशत बढ़ाया जाये और साथ हीं नए कानून ला  कर सुनिश्चित किया जाये  कि उनकी पूरी पैदावार अगर वह किसान चाहे तो सरकार स्वयं खरीदे. फसल बीमा योजना लागू करने में कोताही करने वाले राज्यों को अनुदान में कटौती करे. कृषि विस्तार की नेहरूवियन मॉडल को पूरी तरह बदले क्योंकि पिछले ७० सालों में ब्लाक (खंड  विकास कार्यालय) और कृषि विस्तार से जुड़ा सरकारी तंत्र भ्रष्टाचार और अकर्मण्यता के अड्डे बन कर रह गए हैं.     

lokmat                            

Saturday, 1 April 2017

यू एन ओ की रिपोर्ट: क्यों नहीं हैं हम भारतीय खुश ?





संयुक्त राष्ट्र संघ (यू एन ओ) की ताज़ा और पांचवीं विश्व खुशहाली  रिपोर्ट (वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट) के अनुसार पाकिस्तान हमसे ज्यादा खुश मुल्क  है. वह चीन से मात्र एक अंक पीछे याने (८०) पर है और यहाँ तक कि उसने भूटान (९७ ), नेपाल (९९), बांग्लादेश (११०) और श्रीलंका (१२०) को भी काफी पीछे छोड़ दिया है. भारत इन सबसे पीछे १२२वें अ्ंक  पर है. दरअसल हैप्पीनेस का हिंदी तर्जुमा गलत हुआ है. खुशहाली  की जगह इसे “प्रसन्नता” कहना चाहिए जो कि व्यक्तिगत अनुभव है. जिन छः पैमानों पर इसे नापा जाता हैं वे हैं : प्रति-व्यक्ति सकल घरेलू आय, स्वस्थ जीवन प्रत्याशा, स्वतंत्रता, उदारता , संकट के दौरान इष्ट-मित्रों से मदद का भरोसा और सरकार या व्यापार में भ्रष्टाचार की स्थिति से पैदा होने वाला विश्वास. प्रसन्नता नापने की प्रक्रिया सन २०१२ में इस विश्व संस्था ने  शुरू की थी. और हर साल इसमें कई देशों की स्थिति बदलती रहती है. भारत इस साल चार अंक पीछे हो गया है. लेकिन चिंता की बात नहीं है अमेरिका भी १६ अंक गिर कर एक साल में तीसरे स्थान से १९ वें स्थान पर आ गया है और चीन भी जहाँ २५ साल पहले था वही पहुँच गया है.  


लेकिन चिंता यह है कि आतंकवाद और जहालत का दंश झेलने वाले पाकिस्तान के लोग हमसे ज्यादा खुश कैसे हैं. हमारी जी डी पी (सकल घरेलू उत्पाद) भी पाकिस्तान से करीब नौ गुना ज्यादा है जबकि आबादी मात्र छः गुना. हम ७० साल से प्रजातंत्र की छाँव (?) में जीने का दावा कर रहे हैं जबकि वहां ७० साल में ३२ साल फ़ौजी शासन रहा है. इस सवाल को जानने के पहले कुछ और तथ्य जानना जरूरी है. रिपोर्ट इस बात पर जोर देता है कि प्रसन्नता मूल रूप से सामाजिक और व्यक्तिगत अहसास होता है. अपनी “एग्जीक्यूटिव समरी” (क्रियात्मक सारांश) में रिपोर्ट कहता है कि अधिकांशतः यह  अहसास देश के भीतर पैदा होने वाली विसंगतियों पर निर्भर करता  है. खासकर गरीब मुल्कों में गरीब-अमीर की खाई से यह प्रसन्नता ज्यादा कम होती है. धनी देशों में यह खाई इतनी अधिक नहीं है लिहाज़ा वहाँ शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य और व्यक्तिगत सम्बन्ध इस  प्रसन्नता को कम या ज्यादा करने के बड़े कारक हैं. 


गौर कीजिये. एक अन्य ताज़ा विश्व सम्पदा सूचकांक के अनुसार भारत में सन २००० में संपन्न ऊपरी एक प्रतिशत के पास देश की ३७ प्रतिशत संपत्ति होती थी जो २००५ में बढ़ कर ४२ प्रतिशत, २०१० में ४८ प्रतिशत, २०१२ में ५२ प्रतिशत और २०१६ में ५८.५ प्रतिशत हो  गयी है. लिहाज़ा एक बड़ा वर्ग खुश नहीं है क्योंकि एक बहुत छोटा वर्ग संपत्ति पर लगातार कब्ज़ा करता जा रहा है. यह खामी इस नयी अर्थ-व्यवस्था के कारण  है. विकासशील देशों में बढ़ती बेरोजगारी (जो नयी टेक्नोलॉजी की अपरिहार्य उपज है) भी एक बड़ा कारण है लोगों के अप्रसन्न रहने का. 

एक और ताज़ा विरोधाभास पर ग़ौर करें। एक हीं दिन अख़बार एक हीं पृष्ठ पर दो ख़बरें छपती हैं। पहले में फ़ोर्ब्स मैगज़ीन के अनुसार भारत में "अति -धनी अरबपतियों का संख्या बढ़ कर १०१ हो गयी है। और इन धनवानों की संख्या में भारत दुनिया में चौथे नम्बर पर आ गया है। दूसरी ख़बर है कि देश के ६•३० करोड़ ग्रामीण आज भी स्वच्छ पानी से वंचित है। क्या इन दोनों ख़बरों को पढ़ने के बाद ग़रीबों में ख़ुशी की उम्मीद की जा सकती है?

हमें यह जानना होगा कि प्रति-व्यक्ति आय की गणना स्वयं में दोषपूर्ण है. नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन की अगुवाई में फ्रांस के तत्कालीन राष्ट्रपति ने १०० –अर्थ-शास्त्रियों  की टीम गठित की जिसका उद्देश्य यह जानना था कि क्या जी डी पी की गणना सही होती है और क्या इसका सीधा  सम्बन्ध समाज की खुशहाली से होता है? सेन टीम की रिपोर्ट में भारत का उदाहरण देते हुए बताया गया कि अगर दिल्ली के कनाट  प्लेस में ट्रैफिक जाम हो जाये या किसी चीनी मिल के धुंवे                    से कुछ सौ गाँव के लोगों में फेफ़ड़े की बीमारी हो जाये तो देश का जी डी पी बढ़ जाएगा. इसी दोषपूर्ण जी डी  पी के आधार पर हम प्रति-व्यक्ति आय तय करते हैं और गलती से उसे समाज का विकास मानते हैं. 


आज से २० साल पहले विख्यात समाजशास्त्री रोबर्ट पुटनम ने “सोशल कैपिटल” (सामाजिक पूंजी) का  सिद्धांत अमरीकी समाज में अपनी दस साल की मेहनत के बाद लिखी अपनी पुस्तक “बोलिंग अलोन” में प्रतिपादित किया था और अमेरिका को आगाह किया था कि उनकी सामाजिक पूंजी बुरी तरह स्खलित हो रही है। उन्होने आगाह किया कि कैसा भी आर्थिक विकास इससे बढ़ने वाले असंतोष को रोक नहीं पायेगा. “अमेरिका एक बड़े सामजिक संकट की ओर बढ़  रहा है” यह कहना था पुटनम का. अमेरिका में ट्रम्प का राष्ट्रपति के रूप में चुना जाना इसी बात के संकेत हैं. 


भारत में यह संकट बिलकुल अलग किस्म का है. एक सामाजिक सर्वे के अनुसार आज से २० साल पहले तक एक भारतीय प्रतिदिन ३० मिनट सामाजिक रूप से सम्बद्ध रहता था याने किसी मित्र के घर विवाह में या बीमारी में जाता था या अन्य सामाजिक अवसरों पर जुड़ा रहता था. आज वह मात्र                                ८ मिनट जुड़ा रहने लगा है. (इन्टरनेट पर जुड़ा होना उस सामाजिकता का भान नहीं देता). पाश्चात्य मूल्यों और जीवन शैली ने विवाह ऐसी पवित्र संस्था को बेहद कमज़ोर किया है. बैंगलोर में विवाह विच्छेद के बढ़ते मामलों के लिए तीन नयी अदालतें बनाई गयी हैं. विवाह एक पवित्र बंधन न होकर संविदा (कॉन्ट्रैक्ट) हो गया है. बल्कि उससे आगे बढ़ते हुए “लिव-इन” संबंधों  की बाढ़ आ गयी है. एक शादी करने वाला (या वाली) दकियानूस माना जाने लगा है. पाकिस्तान में आज भी पाश्चात्य संस्कृति उस तरह अपने विद्रूप-चेहरे का साथ नहीं आयी है कठमुल्लेपन की वजह से.


कार्ल मार्क्स ने सभी सामाजिक सबंधों व सामाजिक संस्थाओं की उत्पत्ति उत्पादन के तरीके और संसाधनों पर अधिकार के आधार पर होना बताया था. लेकिन बाद में पाया गया कि यह आंशिक रूप से हीं सही है. आज जरूरत है कि पाश्चात्य टेक्नोलॉजी तो अंगीकार की जाये पर उनसे पैदा होने वाले नकारात्मक सामाजिक प्रभाव को रोकने की जबरदस्त कोशिश भी जारी रहे. पति-पत्नी कमायें पर बेटे का भविष्य क्रेश के पालने में नहीं बल्कि बूढ़े-माँ-बाप की ममतामयी छाया में मिले। इससे न तो बूढ़े माँ-बाप वृद्धाश्रम  में या दवा के आभाव में गुमनामी में दम तोड़ेगे, न हीं बच्चे मूल्यविहीन होंगे. प्रसन्नता मात्र आर्थिक विकास से नहीं आती. मनुष्य को अन्य बहुत अपेक्षाएं होती हैं.  आज एक संतुलन की जरूरत है ताकि पाकिस्तान ऐसे कट्टरपंथ से बचें लेकिन साथ हीं अमेरिका सरीखे मूल्य-शून्यता से भी।


jagran

ट्रेन ब्लास्ट: भारत में आतंक का नया आयाम


खुफिया तंत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन जरूरी 

ताज़ा आतंकी घटना (भोपाल –उज्जैन ट्रेन ब्लास्ट) के बाद के रहस्योद्घाटन से स्पष्ट हो गया है कि भारत में आतंकवाद ने एक नया आयाम ले लिया है. यह स्वस्फूर्त है और वैचारिक प्रतिबद्धता  के लिए वह आई एस आई एस की वेव साइटों का सहांरा लेता है. अगर कोई मेंटर या हैंडलर हैं भी तो वह सामने नहीं आता बल्कि वेव के जरिया या एन्क्रिप्टेड सन्देश के प्लेटफार्म के जरिये बात करता है. लिहाज़ा भारत की केन्द्रीय हीं नहीं राज्य की खुफिया संस्थाओं को भी अपनी तरीके में क्रांतिकारी परिवर्तन करना होगा. तेलंगाना के एंटी –टेररिस्ट स्क्वाड  (ए टी एस जिसमें खुफिया तंत्र भी समाहित है) की तर्ज़ पर. दरअसल इस ब्लास्ट के खुलासे और धरपकड़ का श्रेय भी मात्र इसी संस्था को जाता है. लेकिन इस संस्था का  प्रोफेशनलिज्म देखिये कि ये अपनी सफलता कहीं भी नहीं बता रहे हैं जब कि भारत की तमाम एजेंसियां श्रेय लेने की होड़ में रोज मीडिया को अधकचरी जानकारी  दे रही हैं.                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                          
भारत का दूसरा संकट यह है कि यह उदार प्रजातंत्र है जहाँ नागरिक स्वातंत्र्य काफी संवेदनशील माना जाता है. ऐसे में अगर भारत में शांति का माहौल बरकरार रखना है तो पहली शर्त होगी इस लड़ाई को वैचारिक धरातल पर लड़ना और  दूसरा सख्त न्यायिक प्रतिकार व्यवस्था जिसमें आतंकियों को दहशत रहे अपने शत-प्रतिशत पकडे जाने का. खुफिया को अपनी कार्य-पद्यति तेलेंगना के ए  टी एस  के पैटर्न पर विकसित करनी होगी, राज्य खुफिया अभिकरणों की मजबूती के बिना यह संभव नहीं और साथ हीं केन्द्रीय संस्था – नेशनल इंटेलिजेंस एजेंसी – को राज्य की समतुल्य संस्थाओं पर कार्यकारी नियंत्रण रखने के कानून बनाने होंगे ताकि वे राजनीतिक दबाव में न आयें. कुछ राज्य इस प्रयास को संघीय ढाँचे के खिलाफ बताते हुए  विरोध करेंगे पर यह समय की मांग है अन्यथा  भारत भी  एक अशांत देश बनने  के कगार पर खड़ा है.        
भोपाल –उज्जैन ट्रेन-ब्लास्ट में शामिल आरोपियों में से एक –आरिफ – ने बताया कि उसने कानपुर में अपनी छोटी जायदाद बेंच कर दो पिस्तोलें एक हथियार बेंचने वाले से खरीदी और उनकी क्षमता टेस्ट करने के लिए एक बजुर्ग रिटायर्ड प्रिंसिपल को मार दिया. कानपुर पुलिस के रिकॉर्ड में यह हत्या इस खुलासे से पहले “अज्ञात” व्यक्ति के खिलाफ लिखी गयी. यह ट्रेन ब्लास्ट भी बमों की क्षमता टेस्ट करने के लिए किया था. और मध्य प्रदेश की पुलिस भी इसे दबाना चाहती थी एक सामान्य आपराधिक घटना बताकर. लेकिन धन्यवाद है तेलंगाना ए टी एस की उस टीम का जो साये की तरह कई महीने से इस आतंकी गुट के साथ लगी थी. ग़लती से आतंकियों ने ब्लास्ट करने की तत्काल बाद टेलीग्राम (नेट पर एन्क्रिप्टेड सन्देश भेजने का प्लेटफार्म) पर जब अपने “आका” को अपनी सफलता के बारे में बताया जो हैदराबाद ए टी एस का मुख्यालय कई महीनों से ट्रैक कर रहा था. मुख्यालय ने जब अपनी टीम को जो इन आतंकियों के पीछे साये की तरह लगी थी इस  ब्लास्ट की बात बतायी तो उन्हें अपनी चूक का  अहसास हुआ. बहरहाल मध्य प्रदेश के पुलिस प्रमुख को इन आतंकियों की लोकेशन बताई गयी. दरअसल तेलंगाना की टीम ब्लास्ट के पहले भी इनको गिरफ्तार कर सकती थी पर उनके  नज़दीक रहते हुए वह हैंडलर पर हाथ डालना चाहती थी. साये की तरह महीनों पीछे लगे रहने के बावजूद और साथ हीं  ब्लास्ट के समय भी ट्रेन  में एक कोच छोड़ कर बैठने के साथ हीं ए टी एस टीम  के सदस्य समझ नहीं पाए कि तीनों आतंकियों की पीठ पर लादे  पिट्ठुओं में से एक का वजन ट्रेन से उतरने के बाद कम हो  गया है.      
जब ठीक दो साल पहले मार्च, २०१५ में ग्रैमी वुड ने अटलांटिक टाइम्स में “आई एस आई एस दरअसल चाहता क्या है” (व्हाट आई एस आई एस रियली वांट्स” शीर्षक एक बड़ा लेख लिखा तो उसके बाद पूरी दुनिया में इस लेख के चर्चा रही. वुड ने बताया कि इस संगठन को परम्परागत आतंकवादी संगठन समझना और तदनुसार इसे परम्परागत तरीके से निष्प्रभ करने की कोशिश मूर्खतापूर्ण प्रयत्न हीं नहीं विश्व के लिए विनाशकारी भी हो सकता है. लेखक ने अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति ओबामा के कथन “यह संगठन अल कायदा का जॉइंट वेंचर (संयुक्त उपक्रम) है” को बचकाना और नासमझी भरा करार दिया। -उज्जैन ट्रेन धमाके की घटना और पकडे गए आतंकियों के रहस्योद्घाटन की गंभीरता को भी शायद देश की प्रमुख एजेंसियां नए तरीके से समझना होगा.  राज्य पुलिस और खुफिया तंत्रों (एक राज्य के ए टी सी को छोड़ कर) को भी बेहद प्रोफेशनल बनाना होगा, तेलंगाना ए टी एस की तर्ज़ पर. इस घटना के आरोपी भी तेलंगाना ए टी एस के महीनों के जबरदस्त प्रयास से हीं गिरफ्तार हुए या मारे जा सके. यह अलग बात है कि अब कुछ केन्द्रीय एजेंसियां और साथ हीं कई राज्यों की के खुफिया विभाग के लोग मीडिया में हांफ –हांफ के रोज अपनी उपलब्धि  बता रहे हैं. यह समय दरअसल श्रेय लेने से ज्यादा अपनी गलतियों को सुधारने और इंटेलिजेंस के पुराने पैटर्न को बदलने का है.     गौर कीजिये. यह घटना किसी दूसरे देश से मिले हथियार या पैसे से नहीं हुआ था. न हीं इन गुमराह युवाओं को कट्टरता के लिए या हथियार के चलने या बम बनाने की ट्रेनिंग कराची, नेपाल या बांग्लादेश में हुई थी. इनमें स ए एक ने अपनी जायदाद बेंच  कर ९ एमएम के दो पिस्तौल खरीदे थे और वह  भी किसी सामान्य गैर-कानूनी हथियार बेंचने वाले गैंग से. बम बनाना इन्होने इन्टरनेट पर उपलब्ध “ज्ञान” से सीखा था. पूछ-ताछ में मालूम हुआ कि ये स्वयं हीं आई एस आई एस से प्रभावित थे  और उनकी वेव साइट्स देखते थे. इसी प्रभाव के तहत दस युवाओं ने कानपुर  में आरिफ के फ्लैट पर इस आतंकी संगठन के मंसूबे ---इस्लामी खलीफा शासन—को मुकम्मल करने के लिए कसम खाई थी. इस कांड में चार आतंकी शामिल थे. इनमें एक –सैफुल्लाह मारा गया और तीन—सैयद मेरे हुसैन, दानिश और आरिफ -- घटना स्थल के कई किलोमीटर दूर पिपरिया (होशंगाबाद) से पकडे गए. गॉस मुहम्मद इनका बौधिक  मेंटर था.        
वैचारिक रूप से एक नए युद्ध की ज़रुरत है इस्लामिक आतंकवाद के खात्मे के लिए. और यह युद्ध इस्लाम के अनुयायियों जो अमन  पसंद हैं द्वारा हीं  लड़ा जा सकता है. राज्य अभिकरणों की भी बेहद  चुस्त –दुरुस्त करने की ज़रूअर्ट है और सबसे बड़ी ज़रुरत न्याय-व्यवस्था को बदलने की है जिसमें मानवता के अपराधियों के प्रति कोई भी उदारता न दिखाई जाये अन्यथा देर हो  जायेगी और तब भारत में शांति बहाल करना मुख्किल होगा. अटलांटिक टाइम्स के लेखक वुड का लेख इसी खतरे के प्रति  विश्व को आगाह करता है.      
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