खुफिया तंत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन जरूरीताज़ा आतंकी घटना (भोपाल –उज्जैन ट्रेन ब्लास्ट) के बाद के रहस्योद्घाटन से स्पष्ट हो गया है कि भारत में आतंकवाद ने एक नया आयाम ले लिया है. यह स्वस्फूर्त है और वैचारिक प्रतिबद्धता के लिए वह आई एस आई एस की वेव साइटों का सहांरा लेता है. अगर कोई मेंटर या हैंडलर हैं भी तो वह सामने नहीं आता बल्कि वेव के जरिया या एन्क्रिप्टेड सन्देश के प्लेटफार्म के जरिये बात करता है. लिहाज़ा भारत की केन्द्रीय हीं नहीं राज्य की खुफिया संस्थाओं को भी अपनी तरीके में क्रांतिकारी परिवर्तन करना होगा. तेलंगाना के एंटी –टेररिस्ट स्क्वाड (ए टी एस जिसमें खुफिया तंत्र भी समाहित है) की तर्ज़ पर. दरअसल इस ब्लास्ट के खुलासे और धरपकड़ का श्रेय भी मात्र इसी संस्था को जाता है. लेकिन इस संस्था का प्रोफेशनलिज्म देखिये कि ये अपनी सफलता कहीं भी नहीं बता रहे हैं जब कि भारत की तमाम एजेंसियां श्रेय लेने की होड़ में रोज मीडिया को अधकचरी जानकारी दे रही हैं.भारत का दूसरा संकट यह है कि यह उदार प्रजातंत्र है जहाँ नागरिक स्वातंत्र्य काफी संवेदनशील माना जाता है. ऐसे में अगर भारत में शांति का माहौल बरकरार रखना है तो पहली शर्त होगी इस लड़ाई को वैचारिक धरातल पर लड़ना और दूसरा सख्त न्यायिक प्रतिकार व्यवस्था जिसमें आतंकियों को दहशत रहे अपने शत-प्रतिशत पकडे जाने का. खुफिया को अपनी कार्य-पद्यति तेलेंगना के ए टी एस के पैटर्न पर विकसित करनी होगी, राज्य खुफिया अभिकरणों की मजबूती के बिना यह संभव नहीं और साथ हीं केन्द्रीय संस्था – नेशनल इंटेलिजेंस एजेंसी – को राज्य की समतुल्य संस्थाओं पर कार्यकारी नियंत्रण रखने के कानून बनाने होंगे ताकि वे राजनीतिक दबाव में न आयें. कुछ राज्य इस प्रयास को संघीय ढाँचे के खिलाफ बताते हुए विरोध करेंगे पर यह समय की मांग है अन्यथा भारत भी एक अशांत देश बनने के कगार पर खड़ा है.भोपाल –उज्जैन ट्रेन-ब्लास्ट में शामिल आरोपियों में से एक –आरिफ – ने बताया कि उसने कानपुर में अपनी छोटी जायदाद बेंच कर दो पिस्तोलें एक हथियार बेंचने वाले से खरीदी और उनकी क्षमता टेस्ट करने के लिए एक बजुर्ग रिटायर्ड प्रिंसिपल को मार दिया. कानपुर पुलिस के रिकॉर्ड में यह हत्या इस खुलासे से पहले “अज्ञात” व्यक्ति के खिलाफ लिखी गयी. यह ट्रेन ब्लास्ट भी बमों की क्षमता टेस्ट करने के लिए किया था. और मध्य प्रदेश की पुलिस भी इसे दबाना चाहती थी एक सामान्य आपराधिक घटना बताकर. लेकिन धन्यवाद है तेलंगाना ए टी एस की उस टीम का जो साये की तरह कई महीने से इस आतंकी गुट के साथ लगी थी. ग़लती से आतंकियों ने ब्लास्ट करने की तत्काल बाद टेलीग्राम (नेट पर एन्क्रिप्टेड सन्देश भेजने का प्लेटफार्म) पर जब अपने “आका” को अपनी सफलता के बारे में बताया जो हैदराबाद ए टी एस का मुख्यालय कई महीनों से ट्रैक कर रहा था. मुख्यालय ने जब अपनी टीम को जो इन आतंकियों के पीछे साये की तरह लगी थी इस ब्लास्ट की बात बतायी तो उन्हें अपनी चूक का अहसास हुआ. बहरहाल मध्य प्रदेश के पुलिस प्रमुख को इन आतंकियों की लोकेशन बताई गयी. दरअसल तेलंगाना की टीम ब्लास्ट के पहले भी इनको गिरफ्तार कर सकती थी पर उनके नज़दीक रहते हुए वह हैंडलर पर हाथ डालना चाहती थी. साये की तरह महीनों पीछे लगे रहने के बावजूद और साथ हीं ब्लास्ट के समय भी ट्रेन में एक कोच छोड़ कर बैठने के साथ हीं ए टी एस टीम के सदस्य समझ नहीं पाए कि तीनों आतंकियों की पीठ पर लादे पिट्ठुओं में से एक का वजन ट्रेन से उतरने के बाद कम हो गया है.जब ठीक दो साल पहले मार्च, २०१५ में ग्रैमी वुड ने अटलांटिक टाइम्स में “आई एस आई एस दरअसल चाहता क्या है” (व्हाट आई एस आई एस रियली वांट्स” शीर्षक एक बड़ा लेख लिखा तो उसके बाद पूरी दुनिया में इस लेख के चर्चा रही. वुड ने बताया कि इस संगठन को परम्परागत आतंकवादी संगठन समझना और तदनुसार इसे परम्परागत तरीके से निष्प्रभ करने की कोशिश मूर्खतापूर्ण प्रयत्न हीं नहीं विश्व के लिए विनाशकारी भी हो सकता है. लेखक ने अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति ओबामा के कथन “यह संगठन अल कायदा का जॉइंट वेंचर (संयुक्त उपक्रम) है” को बचकाना और नासमझी भरा करार दिया। -उज्जैन ट्रेन धमाके की घटना और पकडे गए आतंकियों के रहस्योद्घाटन की गंभीरता को भी शायद देश की प्रमुख एजेंसियां नए तरीके से समझना होगा. राज्य पुलिस और खुफिया तंत्रों (एक राज्य के ए टी सी को छोड़ कर) को भी बेहद प्रोफेशनल बनाना होगा, तेलंगाना ए टी एस की तर्ज़ पर. इस घटना के आरोपी भी तेलंगाना ए टी एस के महीनों के जबरदस्त प्रयास से हीं गिरफ्तार हुए या मारे जा सके. यह अलग बात है कि अब कुछ केन्द्रीय एजेंसियां और साथ हीं कई राज्यों की के खुफिया विभाग के लोग मीडिया में हांफ –हांफ के रोज अपनी उपलब्धि बता रहे हैं. यह समय दरअसल श्रेय लेने से ज्यादा अपनी गलतियों को सुधारने और इंटेलिजेंस के पुराने पैटर्न को बदलने का है. गौर कीजिये. यह घटना किसी दूसरे देश से मिले हथियार या पैसे से नहीं हुआ था. न हीं इन गुमराह युवाओं को कट्टरता के लिए या हथियार के चलने या बम बनाने की ट्रेनिंग कराची, नेपाल या बांग्लादेश में हुई थी. इनमें स ए एक ने अपनी जायदाद बेंच कर ९ एमएम के दो पिस्तौल खरीदे थे और वह भी किसी सामान्य गैर-कानूनी हथियार बेंचने वाले गैंग से. बम बनाना इन्होने इन्टरनेट पर उपलब्ध “ज्ञान” से सीखा था. पूछ-ताछ में मालूम हुआ कि ये स्वयं हीं आई एस आई एस से प्रभावित थे और उनकी वेव साइट्स देखते थे. इसी प्रभाव के तहत दस युवाओं ने कानपुर में आरिफ के फ्लैट पर इस आतंकी संगठन के मंसूबे ---इस्लामी खलीफा शासन—को मुकम्मल करने के लिए कसम खाई थी. इस कांड में चार आतंकी शामिल थे. इनमें एक –सैफुल्लाह मारा गया और तीन—सैयद मेरे हुसैन, दानिश और आरिफ -- घटना स्थल के कई किलोमीटर दूर पिपरिया (होशंगाबाद) से पकडे गए. गॉस मुहम्मद इनका बौधिक मेंटर था.वैचारिक रूप से एक नए युद्ध की ज़रुरत है इस्लामिक आतंकवाद के खात्मे के लिए. और यह युद्ध इस्लाम के अनुयायियों जो अमन पसंद हैं द्वारा हीं लड़ा जा सकता है. राज्य अभिकरणों की भी बेहद चुस्त –दुरुस्त करने की ज़रूअर्ट है और सबसे बड़ी ज़रुरत न्याय-व्यवस्था को बदलने की है जिसमें मानवता के अपराधियों के प्रति कोई भी उदारता न दिखाई जाये अन्यथा देर हो जायेगी और तब भारत में शांति बहाल करना मुख्किल होगा. अटलांटिक टाइम्स के लेखक वुड का लेख इसी खतरे के प्रति विश्व को आगाह करता है.lokmat
Saturday, 1 April 2017
ट्रेन ब्लास्ट: भारत में आतंक का नया आयाम
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