Saturday, 15 April 2017

मीडिया की जड़ता: क्या ऐसे बनेगा “नया” भारत?



पिछले सप्ताह एक अजीब घटना हुई. उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में जंगलों से सटे हाईवे पर एक १०-वर्षीय लडकी लगभग नीम-बेहोशी की हालत में पाई गयी. पुलिस गश्ती दल को इस बात की सूचना किसी राहगीर ने दी. और पुलिस ने उसे उठा कर पास के अस्पताल में भर्ती कराया. गैर-ज़िम्मेदार मीडिया ने फ़ौरन “एक्सक्लूसिव” खबर चलायी कि यह लडकी जंगलों में बंदरों द्वारा पाली गयी, इसके शरीर पर कपडे नहीं थी और यह बंदरों की तरह चार अंगों (दो हाथ और दो पैर ) पर चलती है और खाना (तरल) भी दिया जा रहा है तो बंदरों की तरह सीधे मुंह बर्तन में लगा कर पी रही है. मीडिया की इस खबर की बाद अगले २४ घंटों में कल्पना के पर लग जाती हैं और दूसरी खबर आती है कि वह वन देवी है. बस फिर क्या था चढ़ावा और पूजा का  समान ले कर सैकड़ों  श्रद्धालु इस देवी के दर्शन को इकठ्ठे हो जाते हैं. देश में गरीब सबसे से ज्यादा भक्त होता है लिहाज़ा आस-पास के गाँव  के लोग अपने खलिहान में गेंहू की व्यवस्था “बड़े ईश्वर” पर छोड़ कर वन देवी की अर्चना में  व्यस्त हो जाते हैं.
तीन दिन बाद जिस पुलिस गश्ती दल के सिपाही ने इस लडकी को जंगले से सटे हाईवे से उठाकर पास के अस्पताल में भर्ती कराया था उसने इस ख़बर को पढ़ा और पब्लिक में आकर बताया कि इस लडकी को जब उसने देखा तो उसके  शरीर पर कपडे भी थे और वह हाँ और ना में कुछ बोल भी रही थी. वह बेहद कमज़ोर हो गयी थी. इस खुलासे की बाद राज खुला कि वह मानसिक रूप से पूर्ण विकसित नहीं थी और शायद घर वालों ने उसे पालने की जहमत न उठाते हुए सड़क पर भगवान भरोसे छोड़ दिया था.

जरा गैर कीजिये मीडिया का गैर-प्रोफेशनल व्यवहार. किसी एडिटर ने अपने रिपोर्टर से पहली खबर देने से पहले यह नहीं पूछा कि जिसने सबसे पहले उस लडकी को देखा था याने पुलिस कर्मी उससे हकीकत पता करे. एडिटर को मात्र इस बात में दिलचस्पी थी कि हैडिंग में लिखा जाये “मोगली गर्ल जिसे बंदरों ने पाला”.
डेस्क की बुलन्द्परवाजी (कल्पनाशीलता) का यह आलम था कि सभी लोकल अख़बारों और चैनलों ने यह बताना शुरू किया कि बंदरों में कितनी दया होती है और वे कितने “मानवीय” होते हैं कि जंगल में भी उस बच्ची के भरण-पोषण का इन्तेजाम इतने सालों  से करते रहे हैं.  यह है भारतीय मीडिया. 
  
किसी भी समाज में बदलाव की  दो मूल शर्तें होती हैं. एक: वह बेहतरी के लिए हो और दो: वह बुद्धि-सम्मत हो. भारत में हाल के आंकड़े जो संयुक्त राष्ट्र संघ ने या अन्य विश्वसनीय संस्थाओं ने  जारी किये हैं चीख-चीख कर बताते हैं कि भ्रष्टाचार, भूख सूचाकांक, खुशहाली सूचकांक या मानव विकास सूचकांक में भारत पिछले २७ सालों में या तो वहीं का वहीं है या नीचे गिरा है. यहाँ तक कि गरीब-अमीर के बीच खाई लगातार बढ़ती जा रही और आज देश के मात्र एक प्रतिशत अभिजात्य वर्ग के पास देश की  कुल संपत्ति का ५८.६ प्रतिशत सिमट गया है जो कि सन २००० में ३७ प्रतिशत हुआ करता था.  लेकिन क्या कभी आपने इन मुद्दों पर लोगों को  सड़क पर आते देखा है? क्या कभी सत्ता में बैठे लोगों को इन मुद्दों पर किसी भी प्रकार के जन-आन्दोलन का सामना करना पड़ा है? इस देश में पिछले २७ सालों से हर ३७ मिनट पर एक किसान आत्महत्या करता रहा है और प्रतिदिन २०५२ किसान खेती छोड़ कर श्रमिक बन कर बड़े शहरों में रिक्शा चलने को मजबूर हो रहा है. लेकिन क्या कभी टी वी स्टूडियो में ये मुद्दे चर्चा का सबब बन पाए हैं? अशिक्षित, गैर-प्रोफेशनल और गैर-जिम्मेदाराना मीडिया भी भावनात्मक मुद्दों को हवा देने में ज्यादा दिलचस्पी रखता है बजाय जनता को असली मुद्दों पर शिक्षित करने या मुद्दों पर जनमत बनाने के़़। 

जी हाँ? हम उत्सव धर्मी हैं और मुद्दे तलाशना हमारा शगल है. यही वजह है कि हम गौ-मांस, वन्दे मातरम का अपमान और राष्ट्रभक्ति की नयी परिभाषा और प्रतिमान गढ़ने लगे हैं. दिल्ली से सटे नॉएडा में घर में घुस कर जो हाथ अखलाक को मार देते हैं वे कभी भी इस बात के खिलाफ नारे नहीं लगाते कि कैसे एक अधिकारी इंजिनियर की संपती दो  हज़ार करोड रुपये की हो जाती है. वे हाथ अलवर में गाय का व्यापर करने वाले ५५ वर्षीय पहलू खान को सरे राह पीट-पीट कर मार देते हैं लेकिन कभी यह नहीं देखते कि बगल के किसान का अनाज सरकारी खरीद केन्द्रों पर नहीं लिया जाता जबकि आढ़ती उन्हीं से सस्ते  दाम पर वही अनाज लेकर उसी क्रय केन्द्रों  के भ्रष्ट लोगों  को बेंच देते है और मुनाफे का हिस्सा बाँट लिया जाता है.

मोदी सरकार ने नयी फसल बीमा योजना शुरू की. यह एक बेहद उपादेय योजना है जिसमें पिछली तीन योजनाओं की खामियों को लगभग पूरी तरह दूर  कर दिया गया है. लेकिन आजतक किसी भी न्यूज़ चैनल ने इसे डिस्कशन  का मुद्दा बना  कर जन-विमर्श के धरातल पर नहीं रखा लेकिन अगर ओवैसी ने  राम मंदिर को लेकर  कुछ भी कह दिया तो वह गेरुआ पहने बाबाओं और दाढ़ी रखे मुल्लाओं को हाफ-हांफ कर "तेरा धर्म-मेरा धर्म " की बांग देने का सबब बन जाता है.

भारतीय मीडिया में इतनी गिरावट पहले कभी नहीं देखी गयी थी. विकास के पैरामीटर्स को लेकर रिपोर्टरों की बीट होती थी और कोई भी रिपोर्टर "गौ-हत्या" या "तीन –तलाक" को फुल टाइम  बीट के रूप में नहीं देखता था. इस साल गेंहू की बम्पर फसल हुई है और देश में करीब ८५ मिलियन टन अनाज के भण्डारण की बड़ी समस्या बनी हुई है. आज देश में मात्र ३२ मिलियन टन अनाज के भण्डारण की क्षमता है. सरकार ने अगर तत्काल कुछ व्यवस्था नहीं की  तो किसानों की कड़ी मेहनत से उपजा गेंहू सड़कों पर फैला रहेगा और चूहे या चूहेनुमा अफसर इसे हज़म कर जायेंगे पर क्या आपने कोई चर्चा इस पर देखी है?

अमर्त्य सेन ने  भारत में १९४३ में होने वाले दुर्भिक्ष जिसमें २० लाख लोग मारे गए थे का विश्लेषण करते हुए कहा था कि अगर उस समय प्रजातंत्र होता तो लाखों लोगों की जानें न जाती क्योंकि उस समय भी सरकार के पास वहीं पास के सैनिक बैरकों में काफी अनाज था. उनका मानना था कि मीडिया की ताकत सरकार को मजबूर कर देती है कि वह रसद तत्काल दुर्भिक्ष वाले इलाके में पहुंचाए चाहे उसकी  जो भी  कीमत हो. लेकिन आज भारत में अनाज भी इफरात है , मीडिया भी है लेकिन विश्व भूखमरी सूचकांक पर भारत बेहद पीछे है और करींब २० करोड लोग रोजाना रात को भूखे पेट सोते हैं. क्या भारतीय मीडिया की अब भी अपने को संविधान के अनुच्छेद १९(१) (अ) से परिरक्षित रखने की जिद सही है?  

lokmat

Friday, 7 April 2017

किसान क़र्ज़ माफ़ी: कैंसर का दर्द की गोली से इलाज



सही अमल हो तो यूपी अन्य राज्यों के लिये नज़ीर 


"उम्मीद तो बांध जाती,तस्कीन तो हो जाती,  
वादा न वफ़ा करते, वादा तो किया होता"
            
शायर की इस भावना को पूरी तरह अमल में लाते  हुए पिछले ७० साल से राजनेता चुनाव के दौरान घोषणा पत्र में या जनमंचों से वादे करते हैं  और परिणाम आने के तत्काल बाद उन्हें भूल जाते हैं. इस पैमाने को बदलते हुए उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की योगी आदित्य नाथ के नेत्ृत्व वाली नयी सरकार का 2.30 करोड़ लघु व सीमान्त किसानों के एक लाख रुपये तक क़र्ज़ माफी का फैसला क्रांतिकारी कहा जा सकता है. प्रदेश का बजट  लगभग ३.७५ लाख करोड रुपये का होने की उम्मीद है  और ऐसे में लगभग ३६,००० करोड रुपये का क़र्ज़ माफ़ कर देना जो कि बजट परिव्यय  का  दस प्रतिशत हो अपने आप में बड़ा कदम माना जा सकता है. अन्य राज्य भी आने वाले दिनों  में इस तरह की मांग करने लगे हैं. भारतीय जनता पार्टी को तमाम अन्य राज्यों में जहाँ  आने वाले समय में चुनाव हैं इस चुनौती को झेलना पड़ सकता है.

प्रदेश में क़रीब ५००० क्रय केन्द्र खोल कर आधार कार्ड के आधार पर केवल असली किसानों से गेहूँ की ख़रीद करने का फ़ैसला एक बड़ा क़दम है। अगर राज्य सरकार गंभीरता से इस फ़ैसले को अमल में ला सके तो देश के अन्य राज्यों के लिये अनाज ख़रीद में व्याप्त भ्रष्टाचार पर अंकुश का उदाहरण बन सकता है। 
इसी तरह क़र्ज़ माफ़ी से बढ़े ३६ हज़ार करोड़ की रक़म जुटाने के लिये दीर्घकालीन बांड जारी करना भी आर्थिक समझदारी (साँप भी मरे और लाठी भी न टूटे ) का बेहतरीन नमूना है़। 


लेकिन आखिर क्या क़र्ज़ माफ़ी समस्या का समाधान है. क्यों २००८ में यू पी ए-१ की मनमोहन सरकार को भी देश भर के किसानों का ७१,०००  करोड क़र्ज़ माफ़ करना पड़ा. क्या इस क़दम से किसानों का संकट हमेशा के लिये ख़त्म हो गया था?  क्या इससे यह ख़तरा नहीं है कि हर किसान खूब क़र्ज़ लेगा, बेटे-बेटी की शादी में पैसे उडाएगा और चुनाव आने का इंतज़ार करेगा. राजनीतिक पार्टियों में होड़ लगेगी कि कैसे इस तरह के “ऋणम् कृत्वा घृतं पिवेत” (क़र्ज़ ले कर घी पीना चाहिए) की  संस्कृति को विकसित कर वोट लिया जाये. नैतिक रूप से देखें तो इस तरह की नीति से वोटरों को रिझाने और दारू 
बाँट कर वोट लेने में कोई ख़ास अन्तर नहीं है। 

किसानों की समस्या समझना और उसका स्थाई निदान निकलना कोई राकेट साइंस नहीं है, न हीं इसे समझने या समाधान निकालने के लिए आइंस्टीन का दिमाग चाहिए. उदाहरण के तौर पर,  प्रमुख फसल ---गेहूं ----  के लिए प्रति हेक्टेयर करीब ४०,००० से ४५,००० रुपये खर्च होते हैं. देश में औसत पैदावार ३२ कुंतल है जो कि पंजाब, हरियाणा में ४२ से ४८ कुंतल तक और बिहार, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में मात्र २५ से ३० कुंतल तक है. इसका कारण यह है कि इन प्रदेशों में अधिकांस किसान (७५ से ८८ प्रतिशत) सीमान्त या लघु किसान है याने २ हेक्टेयर से कम जोत वाला. वर्तमान में गेंहूं की न्यूनतम समर्थन मूल्य १६२५ रुपये प्रति कुंतल है. याने एक किसान को (अगर  अपना भूसा भी बेंच देता है) ६०,००० रुपये  की आय हुई. उत्तर प्रदेश या हिंदी पट्टी के राज्यों  में लगभग ७० प्रतिशत सीमान्त किसान (एक  हेक्टेयर से कम) हैं और १५  प्रतिशत लघु (याने दो हेक्टेयर से कम) . एक सीमान्त किसान जो रबी  और खरीफ दोनों हीं पैदा करता है की कुल वार्षिक आमदनी अधिक से अधिक ४०,००० रुपये हो सकती है अर्थात मात्र ३३०० रूपये प्रति माह. इस पर अगर मौसम की मार पड़ गयी तो अगले दस साल तक उसके उभरने के आसार ख़त्म हो जाते हैं. क़र्ज़ पर ब्याज चढता रहता है और अंत में वह जमीन  बेंच कर बड़े शहरों में मजदूरी करने को मजबूर हो जाता है. लिहाज़ा क़र्ज़ माफ़ करना एक कैंसर के मरीज़ को दर्द रोकने वाली मोर्फिन की सुई लगाने के सिवा कुछ नहीं है. व्याधि के जड़ में जाना होगा.    

मैंने जो ऊपर किसान के आय का गणना की है वह आदर्श स्थिति को लेकर है. लेकिन हकीकत बिलकुल उलट है. किसी भी गरीब किसान को सरकारी क्रय केंद्र पर अपना उत्पाद बेंचना संभव नहीं होता  क्योंकि आढ़तियों और भ्रष्ट सरकारी क्रय केंद्र के कर्मचारियों के बीच एक “अलिखित” समझौता होता है कि गरीब और बेपढ़े-लिखे किसानों को  इतना  तंग करो कि वे अढतियों को औने-पौने बेचने पर मजबूर हो जाएँ. फिर आढ़तिया वही गेंहू उन्हीं क्रय केन्द्रों पर बेच देता है. सरकारी कागजों  में दर्ज होता है कि अमुक  क्रय  केंद्र ने अपने क्रय कोटे से ज्यादा गेंहूं  खरीदा. मुख्यमंत्री और देश के नेता भी हांफ –हांफ कर जनता को बताते हैं कि किसानों को कितना “समर्थन” दिया गया. मध्य प्रदेश में नाफेड का क्रय केंद्र खुला और यह  माना  गया कि राज्य सरकारों के क्रय केंद्र भ्रष्ट होते हैं लिहाज़ा केन्द्रीय एजेंसी कुछ बेहतर होगी। पर बाद में पता  चला कि भ्रष्टाचार किसी राज्य के कर्मचारियों की “बपौती” नहीं है. उत्तर प्रदेश सरकार को इस भ्रष्टाचार को तोड़ना होगा। 

सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत में पिछले २५ सालों से लगातार हर ३६ मिनट पर एक किसान आत्म-हत्या कर रहा है और हर रोज़ २०५२ किसान खेती छोड़ देते है. दो दिन पहले महाराष्ट्र में एक किसान ने अरहर की खडी फसल में आग लगा दी क्योंकि उसे फसल का लागत मूल्य तो छोडिये ट्रक से मंडी ले जाने के पैसे नहीं मिल रहे थे. अगर गहराई में जाये तो पता चलेगा अरहर का समर्थन मूल्य तो सरकार ने ४८५० रुपये प्रति कुंतल कर रखा है (जबकि बाज़ार  में अरहर की दाल पिछले साल २५०  रुपये और वर्तमान में ८०  रुपये है) परन्तु न तो सरकारी क्रय केंद्र में कोई खरीद हो रही है न हीं खुले बाज़ार में मूल्य बढ़ रहा है. कहने की ज़रुरत नहीं कि किसान ने पहली बार दलहन के उत्पादन की प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अपील पर रिकॉर्ड २५  मिलियन टन की पैदावार की है. लेकिन सरकार को यह समझ में नहीं आ रहा है कि इस स्थिति के बाद अगले कई दशकों तक कोई किसान दलहन पैदा करने की सोचेगा भी नहीं.                        

आज ज़रुरत है कि किसान के उत्पादों का समर्थन मूल्य कम से कम २५  प्रतिशत बढ़ाया जाये और साथ हीं नए कानून ला  कर सुनिश्चित किया जाये  कि उनकी पूरी पैदावार अगर वह किसान चाहे तो सरकार स्वयं खरीदे. फसल बीमा योजना लागू करने में कोताही करने वाले राज्यों को अनुदान में कटौती करे. कृषि विस्तार की नेहरूवियन मॉडल को पूरी तरह बदले क्योंकि पिछले ७० सालों में ब्लाक (खंड  विकास कार्यालय) और कृषि विस्तार से जुड़ा सरकारी तंत्र भ्रष्टाचार और अकर्मण्यता के अड्डे बन कर रह गए हैं.     

lokmat                            

Saturday, 1 April 2017

यू एन ओ की रिपोर्ट: क्यों नहीं हैं हम भारतीय खुश ?





संयुक्त राष्ट्र संघ (यू एन ओ) की ताज़ा और पांचवीं विश्व खुशहाली  रिपोर्ट (वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट) के अनुसार पाकिस्तान हमसे ज्यादा खुश मुल्क  है. वह चीन से मात्र एक अंक पीछे याने (८०) पर है और यहाँ तक कि उसने भूटान (९७ ), नेपाल (९९), बांग्लादेश (११०) और श्रीलंका (१२०) को भी काफी पीछे छोड़ दिया है. भारत इन सबसे पीछे १२२वें अ्ंक  पर है. दरअसल हैप्पीनेस का हिंदी तर्जुमा गलत हुआ है. खुशहाली  की जगह इसे “प्रसन्नता” कहना चाहिए जो कि व्यक्तिगत अनुभव है. जिन छः पैमानों पर इसे नापा जाता हैं वे हैं : प्रति-व्यक्ति सकल घरेलू आय, स्वस्थ जीवन प्रत्याशा, स्वतंत्रता, उदारता , संकट के दौरान इष्ट-मित्रों से मदद का भरोसा और सरकार या व्यापार में भ्रष्टाचार की स्थिति से पैदा होने वाला विश्वास. प्रसन्नता नापने की प्रक्रिया सन २०१२ में इस विश्व संस्था ने  शुरू की थी. और हर साल इसमें कई देशों की स्थिति बदलती रहती है. भारत इस साल चार अंक पीछे हो गया है. लेकिन चिंता की बात नहीं है अमेरिका भी १६ अंक गिर कर एक साल में तीसरे स्थान से १९ वें स्थान पर आ गया है और चीन भी जहाँ २५ साल पहले था वही पहुँच गया है.  


लेकिन चिंता यह है कि आतंकवाद और जहालत का दंश झेलने वाले पाकिस्तान के लोग हमसे ज्यादा खुश कैसे हैं. हमारी जी डी पी (सकल घरेलू उत्पाद) भी पाकिस्तान से करीब नौ गुना ज्यादा है जबकि आबादी मात्र छः गुना. हम ७० साल से प्रजातंत्र की छाँव (?) में जीने का दावा कर रहे हैं जबकि वहां ७० साल में ३२ साल फ़ौजी शासन रहा है. इस सवाल को जानने के पहले कुछ और तथ्य जानना जरूरी है. रिपोर्ट इस बात पर जोर देता है कि प्रसन्नता मूल रूप से सामाजिक और व्यक्तिगत अहसास होता है. अपनी “एग्जीक्यूटिव समरी” (क्रियात्मक सारांश) में रिपोर्ट कहता है कि अधिकांशतः यह  अहसास देश के भीतर पैदा होने वाली विसंगतियों पर निर्भर करता  है. खासकर गरीब मुल्कों में गरीब-अमीर की खाई से यह प्रसन्नता ज्यादा कम होती है. धनी देशों में यह खाई इतनी अधिक नहीं है लिहाज़ा वहाँ शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य और व्यक्तिगत सम्बन्ध इस  प्रसन्नता को कम या ज्यादा करने के बड़े कारक हैं. 


गौर कीजिये. एक अन्य ताज़ा विश्व सम्पदा सूचकांक के अनुसार भारत में सन २००० में संपन्न ऊपरी एक प्रतिशत के पास देश की ३७ प्रतिशत संपत्ति होती थी जो २००५ में बढ़ कर ४२ प्रतिशत, २०१० में ४८ प्रतिशत, २०१२ में ५२ प्रतिशत और २०१६ में ५८.५ प्रतिशत हो  गयी है. लिहाज़ा एक बड़ा वर्ग खुश नहीं है क्योंकि एक बहुत छोटा वर्ग संपत्ति पर लगातार कब्ज़ा करता जा रहा है. यह खामी इस नयी अर्थ-व्यवस्था के कारण  है. विकासशील देशों में बढ़ती बेरोजगारी (जो नयी टेक्नोलॉजी की अपरिहार्य उपज है) भी एक बड़ा कारण है लोगों के अप्रसन्न रहने का. 

एक और ताज़ा विरोधाभास पर ग़ौर करें। एक हीं दिन अख़बार एक हीं पृष्ठ पर दो ख़बरें छपती हैं। पहले में फ़ोर्ब्स मैगज़ीन के अनुसार भारत में "अति -धनी अरबपतियों का संख्या बढ़ कर १०१ हो गयी है। और इन धनवानों की संख्या में भारत दुनिया में चौथे नम्बर पर आ गया है। दूसरी ख़बर है कि देश के ६•३० करोड़ ग्रामीण आज भी स्वच्छ पानी से वंचित है। क्या इन दोनों ख़बरों को पढ़ने के बाद ग़रीबों में ख़ुशी की उम्मीद की जा सकती है?

हमें यह जानना होगा कि प्रति-व्यक्ति आय की गणना स्वयं में दोषपूर्ण है. नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन की अगुवाई में फ्रांस के तत्कालीन राष्ट्रपति ने १०० –अर्थ-शास्त्रियों  की टीम गठित की जिसका उद्देश्य यह जानना था कि क्या जी डी पी की गणना सही होती है और क्या इसका सीधा  सम्बन्ध समाज की खुशहाली से होता है? सेन टीम की रिपोर्ट में भारत का उदाहरण देते हुए बताया गया कि अगर दिल्ली के कनाट  प्लेस में ट्रैफिक जाम हो जाये या किसी चीनी मिल के धुंवे                    से कुछ सौ गाँव के लोगों में फेफ़ड़े की बीमारी हो जाये तो देश का जी डी पी बढ़ जाएगा. इसी दोषपूर्ण जी डी  पी के आधार पर हम प्रति-व्यक्ति आय तय करते हैं और गलती से उसे समाज का विकास मानते हैं. 


आज से २० साल पहले विख्यात समाजशास्त्री रोबर्ट पुटनम ने “सोशल कैपिटल” (सामाजिक पूंजी) का  सिद्धांत अमरीकी समाज में अपनी दस साल की मेहनत के बाद लिखी अपनी पुस्तक “बोलिंग अलोन” में प्रतिपादित किया था और अमेरिका को आगाह किया था कि उनकी सामाजिक पूंजी बुरी तरह स्खलित हो रही है। उन्होने आगाह किया कि कैसा भी आर्थिक विकास इससे बढ़ने वाले असंतोष को रोक नहीं पायेगा. “अमेरिका एक बड़े सामजिक संकट की ओर बढ़  रहा है” यह कहना था पुटनम का. अमेरिका में ट्रम्प का राष्ट्रपति के रूप में चुना जाना इसी बात के संकेत हैं. 


भारत में यह संकट बिलकुल अलग किस्म का है. एक सामाजिक सर्वे के अनुसार आज से २० साल पहले तक एक भारतीय प्रतिदिन ३० मिनट सामाजिक रूप से सम्बद्ध रहता था याने किसी मित्र के घर विवाह में या बीमारी में जाता था या अन्य सामाजिक अवसरों पर जुड़ा रहता था. आज वह मात्र                                ८ मिनट जुड़ा रहने लगा है. (इन्टरनेट पर जुड़ा होना उस सामाजिकता का भान नहीं देता). पाश्चात्य मूल्यों और जीवन शैली ने विवाह ऐसी पवित्र संस्था को बेहद कमज़ोर किया है. बैंगलोर में विवाह विच्छेद के बढ़ते मामलों के लिए तीन नयी अदालतें बनाई गयी हैं. विवाह एक पवित्र बंधन न होकर संविदा (कॉन्ट्रैक्ट) हो गया है. बल्कि उससे आगे बढ़ते हुए “लिव-इन” संबंधों  की बाढ़ आ गयी है. एक शादी करने वाला (या वाली) दकियानूस माना जाने लगा है. पाकिस्तान में आज भी पाश्चात्य संस्कृति उस तरह अपने विद्रूप-चेहरे का साथ नहीं आयी है कठमुल्लेपन की वजह से.


कार्ल मार्क्स ने सभी सामाजिक सबंधों व सामाजिक संस्थाओं की उत्पत्ति उत्पादन के तरीके और संसाधनों पर अधिकार के आधार पर होना बताया था. लेकिन बाद में पाया गया कि यह आंशिक रूप से हीं सही है. आज जरूरत है कि पाश्चात्य टेक्नोलॉजी तो अंगीकार की जाये पर उनसे पैदा होने वाले नकारात्मक सामाजिक प्रभाव को रोकने की जबरदस्त कोशिश भी जारी रहे. पति-पत्नी कमायें पर बेटे का भविष्य क्रेश के पालने में नहीं बल्कि बूढ़े-माँ-बाप की ममतामयी छाया में मिले। इससे न तो बूढ़े माँ-बाप वृद्धाश्रम  में या दवा के आभाव में गुमनामी में दम तोड़ेगे, न हीं बच्चे मूल्यविहीन होंगे. प्रसन्नता मात्र आर्थिक विकास से नहीं आती. मनुष्य को अन्य बहुत अपेक्षाएं होती हैं.  आज एक संतुलन की जरूरत है ताकि पाकिस्तान ऐसे कट्टरपंथ से बचें लेकिन साथ हीं अमेरिका सरीखे मूल्य-शून्यता से भी।


jagran

ट्रेन ब्लास्ट: भारत में आतंक का नया आयाम


खुफिया तंत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन जरूरी 

ताज़ा आतंकी घटना (भोपाल –उज्जैन ट्रेन ब्लास्ट) के बाद के रहस्योद्घाटन से स्पष्ट हो गया है कि भारत में आतंकवाद ने एक नया आयाम ले लिया है. यह स्वस्फूर्त है और वैचारिक प्रतिबद्धता  के लिए वह आई एस आई एस की वेव साइटों का सहांरा लेता है. अगर कोई मेंटर या हैंडलर हैं भी तो वह सामने नहीं आता बल्कि वेव के जरिया या एन्क्रिप्टेड सन्देश के प्लेटफार्म के जरिये बात करता है. लिहाज़ा भारत की केन्द्रीय हीं नहीं राज्य की खुफिया संस्थाओं को भी अपनी तरीके में क्रांतिकारी परिवर्तन करना होगा. तेलंगाना के एंटी –टेररिस्ट स्क्वाड  (ए टी एस जिसमें खुफिया तंत्र भी समाहित है) की तर्ज़ पर. दरअसल इस ब्लास्ट के खुलासे और धरपकड़ का श्रेय भी मात्र इसी संस्था को जाता है. लेकिन इस संस्था का  प्रोफेशनलिज्म देखिये कि ये अपनी सफलता कहीं भी नहीं बता रहे हैं जब कि भारत की तमाम एजेंसियां श्रेय लेने की होड़ में रोज मीडिया को अधकचरी जानकारी  दे रही हैं.                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                          
भारत का दूसरा संकट यह है कि यह उदार प्रजातंत्र है जहाँ नागरिक स्वातंत्र्य काफी संवेदनशील माना जाता है. ऐसे में अगर भारत में शांति का माहौल बरकरार रखना है तो पहली शर्त होगी इस लड़ाई को वैचारिक धरातल पर लड़ना और  दूसरा सख्त न्यायिक प्रतिकार व्यवस्था जिसमें आतंकियों को दहशत रहे अपने शत-प्रतिशत पकडे जाने का. खुफिया को अपनी कार्य-पद्यति तेलेंगना के ए  टी एस  के पैटर्न पर विकसित करनी होगी, राज्य खुफिया अभिकरणों की मजबूती के बिना यह संभव नहीं और साथ हीं केन्द्रीय संस्था – नेशनल इंटेलिजेंस एजेंसी – को राज्य की समतुल्य संस्थाओं पर कार्यकारी नियंत्रण रखने के कानून बनाने होंगे ताकि वे राजनीतिक दबाव में न आयें. कुछ राज्य इस प्रयास को संघीय ढाँचे के खिलाफ बताते हुए  विरोध करेंगे पर यह समय की मांग है अन्यथा  भारत भी  एक अशांत देश बनने  के कगार पर खड़ा है.        
भोपाल –उज्जैन ट्रेन-ब्लास्ट में शामिल आरोपियों में से एक –आरिफ – ने बताया कि उसने कानपुर में अपनी छोटी जायदाद बेंच कर दो पिस्तोलें एक हथियार बेंचने वाले से खरीदी और उनकी क्षमता टेस्ट करने के लिए एक बजुर्ग रिटायर्ड प्रिंसिपल को मार दिया. कानपुर पुलिस के रिकॉर्ड में यह हत्या इस खुलासे से पहले “अज्ञात” व्यक्ति के खिलाफ लिखी गयी. यह ट्रेन ब्लास्ट भी बमों की क्षमता टेस्ट करने के लिए किया था. और मध्य प्रदेश की पुलिस भी इसे दबाना चाहती थी एक सामान्य आपराधिक घटना बताकर. लेकिन धन्यवाद है तेलंगाना ए टी एस की उस टीम का जो साये की तरह कई महीने से इस आतंकी गुट के साथ लगी थी. ग़लती से आतंकियों ने ब्लास्ट करने की तत्काल बाद टेलीग्राम (नेट पर एन्क्रिप्टेड सन्देश भेजने का प्लेटफार्म) पर जब अपने “आका” को अपनी सफलता के बारे में बताया जो हैदराबाद ए टी एस का मुख्यालय कई महीनों से ट्रैक कर रहा था. मुख्यालय ने जब अपनी टीम को जो इन आतंकियों के पीछे साये की तरह लगी थी इस  ब्लास्ट की बात बतायी तो उन्हें अपनी चूक का  अहसास हुआ. बहरहाल मध्य प्रदेश के पुलिस प्रमुख को इन आतंकियों की लोकेशन बताई गयी. दरअसल तेलंगाना की टीम ब्लास्ट के पहले भी इनको गिरफ्तार कर सकती थी पर उनके  नज़दीक रहते हुए वह हैंडलर पर हाथ डालना चाहती थी. साये की तरह महीनों पीछे लगे रहने के बावजूद और साथ हीं  ब्लास्ट के समय भी ट्रेन  में एक कोच छोड़ कर बैठने के साथ हीं ए टी एस टीम  के सदस्य समझ नहीं पाए कि तीनों आतंकियों की पीठ पर लादे  पिट्ठुओं में से एक का वजन ट्रेन से उतरने के बाद कम हो  गया है.      
जब ठीक दो साल पहले मार्च, २०१५ में ग्रैमी वुड ने अटलांटिक टाइम्स में “आई एस आई एस दरअसल चाहता क्या है” (व्हाट आई एस आई एस रियली वांट्स” शीर्षक एक बड़ा लेख लिखा तो उसके बाद पूरी दुनिया में इस लेख के चर्चा रही. वुड ने बताया कि इस संगठन को परम्परागत आतंकवादी संगठन समझना और तदनुसार इसे परम्परागत तरीके से निष्प्रभ करने की कोशिश मूर्खतापूर्ण प्रयत्न हीं नहीं विश्व के लिए विनाशकारी भी हो सकता है. लेखक ने अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति ओबामा के कथन “यह संगठन अल कायदा का जॉइंट वेंचर (संयुक्त उपक्रम) है” को बचकाना और नासमझी भरा करार दिया। -उज्जैन ट्रेन धमाके की घटना और पकडे गए आतंकियों के रहस्योद्घाटन की गंभीरता को भी शायद देश की प्रमुख एजेंसियां नए तरीके से समझना होगा.  राज्य पुलिस और खुफिया तंत्रों (एक राज्य के ए टी सी को छोड़ कर) को भी बेहद प्रोफेशनल बनाना होगा, तेलंगाना ए टी एस की तर्ज़ पर. इस घटना के आरोपी भी तेलंगाना ए टी एस के महीनों के जबरदस्त प्रयास से हीं गिरफ्तार हुए या मारे जा सके. यह अलग बात है कि अब कुछ केन्द्रीय एजेंसियां और साथ हीं कई राज्यों की के खुफिया विभाग के लोग मीडिया में हांफ –हांफ के रोज अपनी उपलब्धि  बता रहे हैं. यह समय दरअसल श्रेय लेने से ज्यादा अपनी गलतियों को सुधारने और इंटेलिजेंस के पुराने पैटर्न को बदलने का है.     गौर कीजिये. यह घटना किसी दूसरे देश से मिले हथियार या पैसे से नहीं हुआ था. न हीं इन गुमराह युवाओं को कट्टरता के लिए या हथियार के चलने या बम बनाने की ट्रेनिंग कराची, नेपाल या बांग्लादेश में हुई थी. इनमें स ए एक ने अपनी जायदाद बेंच  कर ९ एमएम के दो पिस्तौल खरीदे थे और वह  भी किसी सामान्य गैर-कानूनी हथियार बेंचने वाले गैंग से. बम बनाना इन्होने इन्टरनेट पर उपलब्ध “ज्ञान” से सीखा था. पूछ-ताछ में मालूम हुआ कि ये स्वयं हीं आई एस आई एस से प्रभावित थे  और उनकी वेव साइट्स देखते थे. इसी प्रभाव के तहत दस युवाओं ने कानपुर  में आरिफ के फ्लैट पर इस आतंकी संगठन के मंसूबे ---इस्लामी खलीफा शासन—को मुकम्मल करने के लिए कसम खाई थी. इस कांड में चार आतंकी शामिल थे. इनमें एक –सैफुल्लाह मारा गया और तीन—सैयद मेरे हुसैन, दानिश और आरिफ -- घटना स्थल के कई किलोमीटर दूर पिपरिया (होशंगाबाद) से पकडे गए. गॉस मुहम्मद इनका बौधिक  मेंटर था.        
वैचारिक रूप से एक नए युद्ध की ज़रुरत है इस्लामिक आतंकवाद के खात्मे के लिए. और यह युद्ध इस्लाम के अनुयायियों जो अमन  पसंद हैं द्वारा हीं  लड़ा जा सकता है. राज्य अभिकरणों की भी बेहद  चुस्त –दुरुस्त करने की ज़रूअर्ट है और सबसे बड़ी ज़रुरत न्याय-व्यवस्था को बदलने की है जिसमें मानवता के अपराधियों के प्रति कोई भी उदारता न दिखाई जाये अन्यथा देर हो  जायेगी और तब भारत में शांति बहाल करना मुख्किल होगा. अटलांटिक टाइम्स के लेखक वुड का लेख इसी खतरे के प्रति  विश्व को आगाह करता है.      
lokmat

Wednesday, 22 February 2017

यू पी चुनाव: जाति-धर्म की राजनीति कम होने के संकेत



जन-संख्या के आधार पर देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश का विधान सभा चुनाव लगभग आधा रास्ता पार कर चुका है. भारत के इतिहास में यह एक अलग किस्म के परिवर्तन का संवाहक बनाने जा रहा है, बशर्ते राजनीतिक वर्ग बाकि के अगले चार चरणों  में फिर इसे जाति, उप-जाति या धर्म की ओर न मोड़ दे. जब समाजवादी पार्टी के अगुवा पिछड़े वर्ग के नाम पर वोट न मांगे बल्कि सड़कें बनवाने और मेट्रो चलवाने की दुहाई दें, जब बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती तिलक-तराजू से बहुजन और फिर बहुजन से सर्व-जन तक की बात करने लगें और जब कोई भारतीय जनता पार्टी का अध्यक्ष राम मंदिर छोड़ कर प्रदेश की सरकार पर केंद्र के कार्यक्रमों को अमल में न लाने का आरोप लगाये तो यह  भारत में जन विमर्श बदलने की दस्तक है. पिछले 65 साल के चुनावों के इतिहास में पहली बार यह देखने में आ रहा है कि प्रदेश का युवा यादव, जाट, कुर्मी या अन्य जाति समूह में नहीं बंटा है. साथ हीं यह वर्ग हिन्दू-मुसलमान में न बंट कर बेरोजगार के वर्ग में शामिल हो गया है, आम मतदाता जाति और धर्म के ओछे संदेशों की हकीकत जान कर शासन के अपेक्षित या भोगी हुई गुणवता पर वोट दे रहा है.                              

यही वजह है कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने एक करिश्मा किया है. छः माह पहले जो सत्ताधारी पार्टी –समाजवादी पार्टी— खराब कानून व्यवस्था, बढ़ते अपराध और सत्ताधारी दल के अपराधीकरण और लम्पटवाद के चलते भयंकर सत्ता-विरोधी लहर के भंवर में फंसी थी, अचानक अच्छी दीखने लगी. जनता की उदारता देखिये कि साढ़े चार साल के कुशासन के बाद भी जब मुख्यमंत्री अखिलेश ने इस लम्पवाद, भ्रष्टाचार और अपराधीकरण के खिलाफ अपने चाचा शिवपाल और पिता मुलायम सिंह यादव को चुनौती दी तो जनता में उसमें वही छवि देखनी शुरू की जो वह चाहती थी ---- एक बेदाग़ चेहरा, कुछ करने का जज्बा और न करने की बेचारगी. जनता ने क्षमा हीं नहीं किया बल्कि व्यापक स्वीकार्यता भी दिखाई. यही स्वीकार्यता सन २०१४ में नरेन्द्र मोदी के प्रति भी थी.

सन २०१४ और उसके बाद बिहार और उत्तर प्रदेश के राज्य विधान सभा चुनाव देश भर में मोदी की छवि और उनकी नीतियों को लेकर प्रतिनिधि चुनाव माने जा रहे हैं. इसका कारण यह है कि ये दोनों राज्य भारत की २६ प्रतिशत जनसँख्या लेकिन मात्र ११ प्रतिशत भूभाग रखते हैं. जाहिर है गरीब हैं और मानव विकास के किसी भी पैमाने पर सबसे नीचे के पायदान पर ज़माने से अपनी जगह बनाये हैं. ऐसे में जब देश के जनसँख्या के हिसाब से सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में चुनाव हो और इसमें न कहीं बाल मृत्यु दर , मातृ मृत्यु दर, स्कूल- और सड़क-आबादी अनुपात, साक्षरता या प्रति व्यक्ति आय, रोजगार की स्थिति के बारे में चर्चा न होकर भावनात्मक “नेता-प्रजा” संबंधों के बचकाने  रिश्तों की बात होने लगे तो राजनीतिक वर्ग की जड़ता पर चिंता होने लगती है.  

ऐसे में जब देश के प्रधानमंत्री भी उसी सांचे में ढल जाएँ और अपने भाषणों में “मैं इस प्रदेश की गोद लिए बेटा हूँ” कह कर सभा में ताली बजवाएं, या अगले दिन मुख्या मंत्री अखिलेश यादव अपनी पत्नी डिंपल यादव को प्रदेश की जनता की भाभी बताएं, मायावती शाश्वत “बहेन जी” बनी रहें और कांग्रेस की प्रियंका गाँधी अपने को उस प्रदेश की बेटी करार दें यह कहते हुए कि उत्तर प्रदेश को किसी को बाहर से गोद लेने की जरूरत नहीं है तो यह सोचना पड़ता है एक गरीब राज्य में कब तक हम मुद्दों पर चुनाव लड़ने के बजाय जनता को तथ्यों से अलग रखेंगे.

लेकिन जैसा शुरू में बताया गया जन विमर्श को सकारात्मक, विकासपरक  , वैज्ञानिक सोच वाला और दकियानूसी मुद्दों से दूर करने का जिम्मा राजनीतिक वर्ग का और साथ हीं मीडिया का होता है. आज प्रदेश के चुनाव में यह राजनीतिक वर्ग जाति और धर्म से ऊपर तो उठा है (वह भी इसलिए कि स्वयं जनता ने इन मुद्दों को  ख़ारिज करना शुरू किया है) लेकिन उसे स्वयं विकास के पैरामीटर की जानकारी नहीं है. अगर किसी बड़े नेता या मंत्री से पूछें कि मानव विकास सूचकांक पर प्रदेश की स्थिति क्या है या बाल मृत्यू दर क्यों कम नहीं हो रहा है तो अधिकांस बगलें झांकने लगेंगे. दरअसल उनकी ट्रेनिंग में विकास कभी भी जनमत हासिल करने का मन्त्र रहा हीं नहीं है. इसका दो उदाहरण हैं --- प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी में संगीत सोम (मुज़फ्फरनगर दंगों में चर्चित) टाइप उम्मीदवारों को टिकट मिलना या मुख़्तार अंसारी को अखिलेश की पार्टी में जगह न मिलने पर मायावती द्वारा हाथों हाथ लेना. मुख़्तार जैसे कुख्यात अपराधी को टिकट हीं नहीं दिया गया बल्कि मायावती ने उसके परिवार को “बहुत हीं सम्मानित” परिवार बताया. यह सब कुछ करने के पीछे एक हीं सोच थी पूर्वी उत्तर प्रदेश के कम से कम दस विधान सभा क्षेत्रों में मुसलमान मतों की चाहत. बसपा सुप्रीमो की सोच अगर इससे ऊपर जाती तो वह यह जान पातीं कि युवाओं का एक बड़ा वर्ग जो संप्रदाय की सोच से ऊपर उठ चुका है उनकी पार्टी को इसलिए भी वोट देता कि उनके शासन काल में लम्पटों का सत्ता में इतना बोलबाला नहीं था जितना अखिलेश के साढ़े चार साल के शासन काल में.

इधर मीडिया को भी अपना ज्ञान , अपनी समझ और अपने विश्लेषण के तरीके को बदलना होगा. जितना राजनीतिक वर्ग विकास की समझ से अछूता है उतना हीं भारतीय मीडिया भी. रिपोर्ट शुरू हीं होती है किस चुनाव क्षेत्र में कितने मुसलमान , कितने दलित और कितने पिछड़े जाति के लोग हैं और किस प्रत्याशी को कौन जाति वोट नहीं दे रही है.

भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों राष्ट्रीय पार्टियों पर यह जिम्मेदारी ज्यादा है क्योंकि इनमें जन-विमर्श बदलने की क्षमता है , नेटवर्क है और यह इनके फायदे में भी है. जाति और सांप्रदायिक अपील धीरे-धीरे अपनी ताकत खो रहे हैं क्योंकि जनता की प्रति व्यक्ति आय , साक्षरता , तर्क-शक्ति और स्थिति को आंकने का तरीका बदल रहा है. दलित भी अब पूछ रहा है कि ज़िले मे एस पी और थानेदार तो दलित वर्ग से मिला पर सड़क और रोजगार क्यों नहीं ? सशक्तिकरण की झूठी चेतना जगा कर जातिवादी दलों ने १९९० से उत्तर भारत में समाज को जाति और संप्रदाय में तो बांटा लेकिन अब जो सवाल कांग्रेस और मोदी से पूछे जा रहे हैं वही मायावती और अखिलेश से भी. हाँ एक बात अभी भी बदस्तूर कायम है और वह है मुसलमानों में अपनी सुरक्षा को लेकर चिंता. भारतीय जनता पार्टी और खासकर उसके अगुवा और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को यह देखना होगा कि जब देश की सोच बदल रही है तो अल्प-संख्यकों में यह डर भी ख़त्म करना उनका काम है. “सबका साथ और सबका विकास” किसी वर्ग में डर रहेगा तो संभव नहीं होगा.  


patrika
        

Wednesday, 28 December 2016

ये ‘लान्जेरी” बनाम ‘लंगोट’ की लड़ाई है पी सी साहेब !


डिजिटल भुगतान पर सरकार के जोर देने के खिलाफ कांग्रेस नेता और भूतपूर्व वित्तमंत्री पी चिदंबरम (पी सी ) का कहना है कि सरकार का यह जानना कि कोई युवती कौन सा अधोवस्त्र (अमेरिका और यूरोप और भारत के अभिजात्य वर्ग में इसे लांजेरी कहते हैं) खरीदती है या कोई पुरुष कौन सी दारू पीता है, उनके मौलिक अधिकारों का हनन है. बोफोर्स घोटाले के दौरान विश्वनाथ प्रताप सिंह ने वाराणसी की एक जनसभा में विन चड्ढा के दलाली पर बोलते हुए अपभ्रंश यमक और अनुप्रास अलंकार का मिश्रित प्रयोग करते हुए लाक्षणिक रूप से कहा था “तुम बिन चड्ढा हम बिन चड्ढी”. चिदंबरम साहेब को “लान्जेरी” प्रयोग करने वालों के मौलिक अधिकार की चिंता जायज है पर उन गरीबों के मौलिक अधिकारों का क्या जिनकी लंगोट भी काला धन की भ्रष्ट व्यवस्था के कारण पिछले ७० सालों से छीन गयी है.

अजीब है संपन्न वर्ग का तर्क. पूर्व मंत्री ने एक सारिणी दे कर समझना चाहा है कि अमरीका, जर्मनी फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा सरीखे संपन्न देशों में भी नकद का प्रयोग लगभग आधे से ज्यादा काम-काज में होता है. वह यह बताना भूल गए कि स्विट्ज़रलैंड का प्रधानमंत्री बस में कंडक्टर से टिकट लेकर संसद में आता है और सन १९२४ में कैम्पबेल काण्ड में प्रधानमंत्री की सरकार इसलिए चली गयी कि राजनीतिक कारणों से सरकार ने कुछ लोगों के खिलाफ मुकदमे उठा लिए थे (यह घटना भी यू पी ए के शासन काल में बनी प्रशासनिक सुधार आयोग की चौथी रिपोर्ट पेज संख्या ९ में ऊधृत की गयी है) जबकि भारत में बेटे पर भ्रष्टाचार के मुकदमें के बाद भी लोग मंत्री बने रहते हैं. जिन पश्चिमी देशों का हवाला पी सी साहेब ने दिया है वहां भ्रष्टाचार इस तरह लोगों के जीवन को नहीं खा रहा है कि सकल घरेलू उत्पाद (जी डी पी ) का ६६ प्रतिशत काली संपत्ति में बदल जाता हो.

पी सी का एक और तर्क देखिये. उनके अनुसार नोटबंदी से भ्रष्टाचार ख़त्म नहीं होगा. इसके लिए उनका कहना है कि इस घोषणा के बाद नए नोट लेते हुए जो लोग रँगे हाथ पकडे गए उनमें रिज़र्व बैंक, अन्य बैंक , पोस्ट ऑफिस , कांडला पोर्ट आदि तमाम सरकारी विभाग के अधिकारी हीं नहीं सेना के इंजीनियरिंग सेवा के अभियंता भी थे. यह कुछ ऐसा हीं तर्क है कि अगर ७० साल में अपराध बढे हैं तो न तो भारतीय दंड संहिता जी जरूरत है न हीं अदालतों या जजों की. और शायद यही सोच कर कांग्रेस सरकार ने ७० साल में से ५० साल से ज्यादा के अपने शासन काल में भ्रष्टाचार पर कभी अंकुश नहीं लगाया और नतीजा यह रहा कि काला धन सुरसा की तरह मुंह बढ़ाता चला गया.

कांग्रेस ने शायद नोटबंदी के खिलाफ तर्क जुटाने का काम अपने इस सबसे प्रतिभाशाली नेता और पूर्व वित्त मंत्री को दिया है पर उनके तर्क बचकाने हीं नहीं भ्रष्टाचार के प्रति सहिष्णुता का भाव रखते दिखाई देते है।  इस कांग्रेस नेता ने यह बताने की कोशिश की कि कि सरकार ने अपना “गोलपोस्ट” (लक्ष्य) बदला है. उनके अनुसार प्रधानमंत्री ने अपने ८ नवम्बर के राष्ट्र के नाम संबोधन में १८ बार “काला धन” शब्द का इस्तेमाल किया और पांच बार “जाली नोट” का लेकिन एक बार भी “कैशलेस” (नोट-विहीन आदान-प्रदान) का नहीं जबकि नवम्बर २७ के दो भाषणों में २४ बार “नोट-विहीन” (कैशलेस) शब्द का प्रयोग किया और “काला धन” शब्द का केवल नौ बार.

कोई नीति (या कानून) सही है या गलत समझाने का सर्वमान्य तरीका होता है यह प्रश्न करना कि इस नीति के न होने से क्या नुकसान हो रहा था या होता. दूसरा इस नीति से नीति निर्माता को लाभ क्या मिलता --- परोक्ष रूप से या प्रत्यक्ष रूप से. जिस शाम मोदी ने नोटबंदी की घोषणा की एक सामान्य    ज्ञान का बच्चा भी बता सकता था कि आम जनता को जबरदस्त दिक्कत होगी. शायद सरकार को भी इतनी समझ तो है हीं. दूसरा काला धन इस देश को ७० साल से खा रहा है और यह धन  भ्रष्टाचार  की स्थूल परिणति भी है और कारण भी. भ्रष्टाचार सामाजिक व्याधि है जो मूलरूप से  समाज में नैतिकता के ह्रास से पैदा होता है. इसे ख़त्म करने में राज्य अभिकरण की भूमिका सीमित होती है. और अगर होती भी है तो धन के सञ्चालन पर नियंत्रण के माध्यम से हीं. लिहाज़ा पहला कदम हीं इस धन पर अंकुश लगने का था जो नोटबंदी के जरिए सभी काले नोट को वापस लाने के प्रथम उपक्रम के रूप में हो सकता था. लिहाज़ा पहले नोटबंदी पर जोर दिया गया फिर कैशलेस आदान-प्रदान पर. इस में यह गारंटी नहीं होती कि भ्रष्ट और अनैतिक अफसर या नेता या सेठ कल से साधू  हो जाएगा और बैंक, आर बी आई और थाने का दरोगा माला ले कर जपा करेगा. उसके लिए कैशलेस अर्थ व्यवस्था को न केवल रियल एस्टेट में बल्कि चड्ढी खरीदने में प्रयुक्त करना होगा ताकि भष्टाचारी “मौलिक अधिकार” के नाम पर चड्ढी में सोना न छिपाए.

पी सी का एक और अतार्किक उदहारण लें. उनके अनुसार पहले सभी रियल एस्टेट, बड़े ठेके ऊँचे मूल्य वाले गहने  को डिजिटल पेमेंट की सीमा में लाना चाहिए. क्या वह आज भी नहीं है. क्या कानून बन जाएगा तो मकान की खरीद मात्र सफ़ेद धन में हीं होगी और पीछे से लिए जाने वाली काला धन                                                                          बंद हो जाएगा. उसके लिए सामान्य खरीद और उपभोग के ठिकानों पर अंकुश लगाना पहला कदम है अन्यथा ओवर- इन्वोइसिन्ग और अंडर- इन्वोइसिन्ग के जरिया काला धन पैदा होने का स्रोत बना रहेगा.
और फिर अगर पी सी ऐसा मानते हैं कि बड़े सौदे डिजिटल माध्यम से हों तो उन्होंने कार्यकाल में यह “जादुई” छडी क्यों नहीं घुमाई?

मोदी सरकार को अगले कदम में मजबूत कानून श्रृंखला और संस्थागत सपोर्ट की ज़रुरत है. जिसे अगले कुछ महीनों में करना होगा ताकि न तो आयकर अधिकारी भष्टाचार का तांडव कर सके न हीं भ्रष्टाचारी बच के निकल सके. लेकिन इन सबके बाद अभी कई संस्थागत चिदंबरम पैदा होंगे जो मौलिक अधिकार की दुहाई दे कर बचना चाहेंगे बगैर यह देखे हुए कि ७० साल में करोड़ों गरीबों के मौलिक अधिकार को किसने हडपा. भ्रष्टाचारी से जब इनकम टैक्स अधिकारी पूछेगा कि नौकर ने तीन करोड का फ्लैट कैसे लिया तो वह अदालत में संविधान के अनुच्छेद १९ (१) (छ) की दुहाई दे कर बचना चाहेगा यह कहते हुए कि व्यवसाय के मौलिक अधिकार का हनन हो रहा है. भारत जैसे उदार प्रजातंत्र में अदालतें भी चश्मा लगा कर इस भ्रष्टाचारी को राहत देती नज़र आयेंगी. लिहाज़ा सरकार तो अपना काम कर रही है लेकिन एक व्यापक जन आन्दोलन की ज़रुरत है भ्रष्टाचार के इस कोढ़ के खिलाफ जैसा कि २०११ में अन्ना के आन्दोलन के समय नज़र आया था.  और यह तब तक संभव नहीं जब तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ  सरीखे बड़े संगठन, राजनीतिक दल एक स्वर में इस भारत को बदलने के यज्ञ में शामिल न हों.  

jagran

Sunday, 27 November 2016

काला धन: विपक्ष का कुतर्क




अद्भुत है इस देश के एक वर्ग की तर्क शक्ति जो सकारात्मक को नकारात्मक बना कर जन विमर्श में डालने की जबरदस्त सलाहियत रखता है. पूर्व-वित्त मंत्री और कांग्रेस नेता चिदंबरम के सवाल-जवाब के प्रारूप में लिखे गए ताज़ा लेख में यह बताने की कोशिश की गयी है कि काला धन कोई बड़ी समस्या नहीं है और दुनिया के सभी देशों में यह कमोबेश है. इस बात को सिद्ध करने के लिए उन्होंने वर्ल्ड बैंक के एक अध्ययन को लिया है जिसके अनुसार अमेरिका में छाया अर्थ-व्यवस्था (काले धन की अर्थव्यवस्था) सकल घरेलू उत्पाद (जी डी पी ) का ८.६ प्रतिशत, चीन में १२.७ प्रतिशत जापान में ११ प्रतिशत और भारत में २२.२ प्रतिशत है. उनका कहना है कि ब्राज़ील , रूस और दक्षिण अफ्रीका में तो यह भारत से भी ज्यादा है. याने पूर्व वित्त मंत्री के हिसाब से यह कोई खास समस्या नहीं है जिसके लिए जनता को इतने कष्ट में डाला जाये.

तर्क-शास्त्र में एक दोष का वर्णन है --- अपने मतलब के तर्क वाक्य छांट लेना और बाकि छोड़ देना. चिदाम्बरम ने अपने लेख में इसका खूब इस्तेमाल किया. वह भूल गए कि उनके शासन काल में हीं देश के एक प्रख्यात अर्थ-शास्त्री प्रोफेशन अरुण कुमार ने यह आंकड़ा गलत बताया और कहा कि भारत में काली अर्थ-व्यवस्था जी डी पी ६० प्रतिशत याने १.४० ट्रिलियन डॉलर है. विश्व बैंक के आंकडे का आधार गलत है और दूसरे चार अन्य अध्यनों में भी इसे ४० प्रतिशत से ७० प्रतिशत बताया गया है. कांग्रेसी कुतर्क का यह आलम है कि यू पी ए -२ में २०१२ में इस मुद्दे पर जारी श्वेत पत्र में श्नेडर गणना (गत्यात्मक बहु-संकेतक बहु-कारक आंकलन पद्यति ) को आधार माना गया जिसके अनुसार श्री लंका में भारत से तीन गुना काली अर्थ-व्यवस्था है । इसके उलट यह देश मानव विकास सूचकांक में भारत से काफी आगे है. चिदंबरम अपने तर्क के आधार पर यह भी कह सकते हैं कि श्री लंका की तरह भारत में भी काली अर्थ-व्यवस्था को दूना किया जाना चाहिए क्योंकि इससे मानव विकास बेहतर होता है.  

चिदंबरम के अन्य खुद हीं पैदा किये गए सवाल और उनके खुद हीं दिए गए जवाव देखिये. प्रशन :क्या नोटबंदी से भ्रष्टाचार रुकेगा? जवाब: नहीं. भ्रष्टाचारी नए नोट में घूस लेंगे? क्या इससे नकली नोट छपना बंद होंगे? नहीं, अगर वो पुराने नोटों की नक़ल कर सकते हैं  तो नए की भी कर लेंगे. प्रश्न: क्या इससे काला धन बंद होगा ? जवाब : नहीं, क्योंकि ऐसा करने वाले जिन क्षेत्रों – जैसे निर्माण, चुनाव या सोना की खरीद में यह सब करते रहेंगे. ये जवाब जितने सहज हैं उतना हीं बचकाने भी. इन सब जवाबों से यह निकलता है कि” लिहाज़ा यह कोई समस्या नहीं है और काला धन की समान्तर अर्थ व्यवस्था  चलती  रहनी चाहिए. और शायद यही कारण रहा कि ७० साल में इसे पाल-पोस कर दैत्याकार बना दिया कांग्रेस सरकार ने. यू पी ए -२ के शासन काल में काला धन पर एक श्वेत पत्र जारी किया गया उसमें भी यही आंकड़े दिए गए. और यहाँ तक बताया गया कि एशिया के अन्य देशों में तो यह समस्या दूनी ज्यादा है. कांग्रेस के ४५ साल के शासन में कभी कोई सार्थक प्रयास नहीं हुआ.

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नोटबंदी के ऐलान के बाद पहले २४ घंटों में देश की प्रतिक्रिया बेहद सकारात्मक रही. “सेठ फंसा”, “घूसखोर अफसर अब क्या करेगा” या “नेतवा की रात की नींद उड़ी” का ७० साल पुराना घुन लगा भाव अचानक मुखर हुआ. लेकिन उसके बाद यह प्रतिक्रिया नकारात्मकता में बदली और बढ़ती चली गयी. कमज़ोर वर्ग इस फैसले से दिक्कत में रहा और अभी भी है. इस दिक्कत को बेहतर ऐलान-पूर्व रणनीति के तहत कम किया जा सकता है. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी इसे माना.

लेकिन इसी बीच अर्थशात्रियों का एक वर्ग इस प्रयास के औचित्य पर प्रश्न उठाने लगा. उस का कहना था कि नोटबंदी मुख्य समस्या का समाधान नहीं है क्योंकि धन के रूप में काली कमाई और उससे उपजी संपत्ति का बहुत कम हिस्सा हीं नकदी के रूप में रहता है. उनका मानना है कि हमला कहीं और करना होगा. इस हमले से एक तो कुछ चोर हीं पकडे जायेंगे और दूसरा इस प्रयास के अनुषांगिक क्षति के रूप में कमज़ोर तबके की दिक्कतें अचानक बढ़ जायेंगी. यह भी तर्क है कि इससे अगर कुछ चोर पकडे भी गए तो इससे आगे चोरी न हो इसकी कोई गारंटी नहीं है. यह आखिरी तर्क कुछ ऐसा है जैसे यह कहना कि चोर को जेल भेजने से यह सुनिश्चित नहीं होता कि अब कोई चोर पैदा नहीं होगा लिहाज़ा चोर पकड़ना छोड़ कर समाज में नैतिकता का प्रचार –प्रसार किया जाना चाहिए. दरअसल अव्वल तो यह राज्य का कार्य नहीं है. उसके लिए दूसरी सामाजिक –नैतिक संस्थाएं और गैर-राज्य प्रक्रियाएं होती हैं (जो भारत में विलुप्त-प्राय हैं) और दूसरे  अगर राज्य को कहीं से शुरू करना है तो आखिर किस मुकाम से शुरू करे, खासकर उस स्थिति में जब पूरा “आवां का आवां” हीं खराब हो. जिस देश में सिपाही से लेकर मंत्री तक और ठेकेदार से लेकर जज तक भ्रष्ट पाए जाते हों उसमें काला धन पर अंकुश लगाना किसी क्रांति से कम नहीं और वह भी न केवल राज्य-नीत क्रांति बल्कि सामाजिक –नैतिक –व्यक्तिगत –आध्यात्मिक क्रांति.    

एक बात जो इस प्रयास को नाकाफी बताने वाले अर्थशास्त्री भूल रहे हैं वह यह कि मोदी सरकार ने यह कदम उस समय उठाया है जब टेक्नोलॉजी ने समाज के हर व्यक्ति की एक –एक गतिविधि पर नज़र रखना बेहद सहज कर दिया है. आप माल जाते है उसका टीवी फुटेज है, आप के घर पर सेठ की कार दिवाली का गिफ्ट लेकर आती है उसका फुटेज मिल सकता है (सी बी आई के डायरेक्टर के घर कौन दलाल कब कब गया यह आज भी एक बड़ा मामला है), आप अब ज्यादा दिन बेनामी संपत्ति नहीं रख सकते क्योंकि जिसके नाम संपत्ति ली है उसे रजिस्ट्री आफिस में हीं फोटो खिंचवाना है. आपसे उसका रिश्ता पता लगाना मुश्किल नहीं होगा. उन सभी सोने बेचने वालों से सीसीटीवी फुटेज ली जा रहीं हैं जिन्होंने नोटबंदी की रात सोना बेंचा.  

सात दशक तक समाज कान में तेल डालकर सोता रहा “कोई नृप होहिं हमें का हानि” के भाव में और लोग अपनी जाति के कुख्यात छवि वाले लम्पट को भी प्रतिनिधि के रूप में प्रजातंत्र के मंदिरों –विधान सभाओं और संसद--को दूषित करने के लिए भेजता रहा. समाज की सोच की जड़ता यहाँ तक बढ़ी कि गाँव में बूढ़ी माँ बेटे की नौकरी लगने पर यह पूछने लगी कि “ऊपर की आमदनी कितनी है?”. भष्टाचार पूरे समाज में आत्मसात हो गया, जीवन पद्यति का भाग बन गया और महिमा-मंडित होने लगा. शादी के बाज़ार में एक सप्लाइ इंस्पेक्टर की कीमत इंटरमीडिएट के शिक्षक से ज्यादा होने लगी.

ऐसा नहीं था कि सरकारों को काला धन के बारे में आज पता चला है. अंग्रेज़ी शासन में भी इस व्याधि से मुक्ति के लिए अनेक समितियां बनी. सन १९३६ में अय्यर समिति ने सिफारिश की कि कर कानून में आमूलचूल बदलाव लाये जाएँ ताकि कम से कम कर –वंचना रोग की तरह न फैले. लेकिन इच्छा-शक्ति का नितांत अभाव रहा. आज जरूरत है कि भारतीय समाज इसे एक जन अभियान के रूप में ले और भ्रष्टाचार की ताबूत में आखिरी कील ठोके स्वयं को बदल कर और दूसरों पर बदलने का दबाव बना कर. केवल राज्य अभिकरण यह काम नहीं कर सकते.    

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