खुफिया तंत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन जरूरीताज़ा आतंकी घटना (भोपाल –उज्जैन ट्रेन ब्लास्ट) के बाद के रहस्योद्घाटन से स्पष्ट हो गया है कि भारत में आतंकवाद ने एक नया आयाम ले लिया है. यह स्वस्फूर्त है और वैचारिक प्रतिबद्धता के लिए वह आई एस आई एस की वेव साइटों का सहांरा लेता है. अगर कोई मेंटर या हैंडलर हैं भी तो वह सामने नहीं आता बल्कि वेव के जरिया या एन्क्रिप्टेड सन्देश के प्लेटफार्म के जरिये बात करता है. लिहाज़ा भारत की केन्द्रीय हीं नहीं राज्य की खुफिया संस्थाओं को भी अपनी तरीके में क्रांतिकारी परिवर्तन करना होगा. तेलंगाना के एंटी –टेररिस्ट स्क्वाड (ए टी एस जिसमें खुफिया तंत्र भी समाहित है) की तर्ज़ पर. दरअसल इस ब्लास्ट के खुलासे और धरपकड़ का श्रेय भी मात्र इसी संस्था को जाता है. लेकिन इस संस्था का प्रोफेशनलिज्म देखिये कि ये अपनी सफलता कहीं भी नहीं बता रहे हैं जब कि भारत की तमाम एजेंसियां श्रेय लेने की होड़ में रोज मीडिया को अधकचरी जानकारी दे रही हैं.भारत का दूसरा संकट यह है कि यह उदार प्रजातंत्र है जहाँ नागरिक स्वातंत्र्य काफी संवेदनशील माना जाता है. ऐसे में अगर भारत में शांति का माहौल बरकरार रखना है तो पहली शर्त होगी इस लड़ाई को वैचारिक धरातल पर लड़ना और दूसरा सख्त न्यायिक प्रतिकार व्यवस्था जिसमें आतंकियों को दहशत रहे अपने शत-प्रतिशत पकडे जाने का. खुफिया को अपनी कार्य-पद्यति तेलेंगना के ए टी एस के पैटर्न पर विकसित करनी होगी, राज्य खुफिया अभिकरणों की मजबूती के बिना यह संभव नहीं और साथ हीं केन्द्रीय संस्था – नेशनल इंटेलिजेंस एजेंसी – को राज्य की समतुल्य संस्थाओं पर कार्यकारी नियंत्रण रखने के कानून बनाने होंगे ताकि वे राजनीतिक दबाव में न आयें. कुछ राज्य इस प्रयास को संघीय ढाँचे के खिलाफ बताते हुए विरोध करेंगे पर यह समय की मांग है अन्यथा भारत भी एक अशांत देश बनने के कगार पर खड़ा है.भोपाल –उज्जैन ट्रेन-ब्लास्ट में शामिल आरोपियों में से एक –आरिफ – ने बताया कि उसने कानपुर में अपनी छोटी जायदाद बेंच कर दो पिस्तोलें एक हथियार बेंचने वाले से खरीदी और उनकी क्षमता टेस्ट करने के लिए एक बजुर्ग रिटायर्ड प्रिंसिपल को मार दिया. कानपुर पुलिस के रिकॉर्ड में यह हत्या इस खुलासे से पहले “अज्ञात” व्यक्ति के खिलाफ लिखी गयी. यह ट्रेन ब्लास्ट भी बमों की क्षमता टेस्ट करने के लिए किया था. और मध्य प्रदेश की पुलिस भी इसे दबाना चाहती थी एक सामान्य आपराधिक घटना बताकर. लेकिन धन्यवाद है तेलंगाना ए टी एस की उस टीम का जो साये की तरह कई महीने से इस आतंकी गुट के साथ लगी थी. ग़लती से आतंकियों ने ब्लास्ट करने की तत्काल बाद टेलीग्राम (नेट पर एन्क्रिप्टेड सन्देश भेजने का प्लेटफार्म) पर जब अपने “आका” को अपनी सफलता के बारे में बताया जो हैदराबाद ए टी एस का मुख्यालय कई महीनों से ट्रैक कर रहा था. मुख्यालय ने जब अपनी टीम को जो इन आतंकियों के पीछे साये की तरह लगी थी इस ब्लास्ट की बात बतायी तो उन्हें अपनी चूक का अहसास हुआ. बहरहाल मध्य प्रदेश के पुलिस प्रमुख को इन आतंकियों की लोकेशन बताई गयी. दरअसल तेलंगाना की टीम ब्लास्ट के पहले भी इनको गिरफ्तार कर सकती थी पर उनके नज़दीक रहते हुए वह हैंडलर पर हाथ डालना चाहती थी. साये की तरह महीनों पीछे लगे रहने के बावजूद और साथ हीं ब्लास्ट के समय भी ट्रेन में एक कोच छोड़ कर बैठने के साथ हीं ए टी एस टीम के सदस्य समझ नहीं पाए कि तीनों आतंकियों की पीठ पर लादे पिट्ठुओं में से एक का वजन ट्रेन से उतरने के बाद कम हो गया है.जब ठीक दो साल पहले मार्च, २०१५ में ग्रैमी वुड ने अटलांटिक टाइम्स में “आई एस आई एस दरअसल चाहता क्या है” (व्हाट आई एस आई एस रियली वांट्स” शीर्षक एक बड़ा लेख लिखा तो उसके बाद पूरी दुनिया में इस लेख के चर्चा रही. वुड ने बताया कि इस संगठन को परम्परागत आतंकवादी संगठन समझना और तदनुसार इसे परम्परागत तरीके से निष्प्रभ करने की कोशिश मूर्खतापूर्ण प्रयत्न हीं नहीं विश्व के लिए विनाशकारी भी हो सकता है. लेखक ने अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति ओबामा के कथन “यह संगठन अल कायदा का जॉइंट वेंचर (संयुक्त उपक्रम) है” को बचकाना और नासमझी भरा करार दिया। -उज्जैन ट्रेन धमाके की घटना और पकडे गए आतंकियों के रहस्योद्घाटन की गंभीरता को भी शायद देश की प्रमुख एजेंसियां नए तरीके से समझना होगा. राज्य पुलिस और खुफिया तंत्रों (एक राज्य के ए टी सी को छोड़ कर) को भी बेहद प्रोफेशनल बनाना होगा, तेलंगाना ए टी एस की तर्ज़ पर. इस घटना के आरोपी भी तेलंगाना ए टी एस के महीनों के जबरदस्त प्रयास से हीं गिरफ्तार हुए या मारे जा सके. यह अलग बात है कि अब कुछ केन्द्रीय एजेंसियां और साथ हीं कई राज्यों की के खुफिया विभाग के लोग मीडिया में हांफ –हांफ के रोज अपनी उपलब्धि बता रहे हैं. यह समय दरअसल श्रेय लेने से ज्यादा अपनी गलतियों को सुधारने और इंटेलिजेंस के पुराने पैटर्न को बदलने का है. गौर कीजिये. यह घटना किसी दूसरे देश से मिले हथियार या पैसे से नहीं हुआ था. न हीं इन गुमराह युवाओं को कट्टरता के लिए या हथियार के चलने या बम बनाने की ट्रेनिंग कराची, नेपाल या बांग्लादेश में हुई थी. इनमें स ए एक ने अपनी जायदाद बेंच कर ९ एमएम के दो पिस्तौल खरीदे थे और वह भी किसी सामान्य गैर-कानूनी हथियार बेंचने वाले गैंग से. बम बनाना इन्होने इन्टरनेट पर उपलब्ध “ज्ञान” से सीखा था. पूछ-ताछ में मालूम हुआ कि ये स्वयं हीं आई एस आई एस से प्रभावित थे और उनकी वेव साइट्स देखते थे. इसी प्रभाव के तहत दस युवाओं ने कानपुर में आरिफ के फ्लैट पर इस आतंकी संगठन के मंसूबे ---इस्लामी खलीफा शासन—को मुकम्मल करने के लिए कसम खाई थी. इस कांड में चार आतंकी शामिल थे. इनमें एक –सैफुल्लाह मारा गया और तीन—सैयद मेरे हुसैन, दानिश और आरिफ -- घटना स्थल के कई किलोमीटर दूर पिपरिया (होशंगाबाद) से पकडे गए. गॉस मुहम्मद इनका बौधिक मेंटर था.वैचारिक रूप से एक नए युद्ध की ज़रुरत है इस्लामिक आतंकवाद के खात्मे के लिए. और यह युद्ध इस्लाम के अनुयायियों जो अमन पसंद हैं द्वारा हीं लड़ा जा सकता है. राज्य अभिकरणों की भी बेहद चुस्त –दुरुस्त करने की ज़रूअर्ट है और सबसे बड़ी ज़रुरत न्याय-व्यवस्था को बदलने की है जिसमें मानवता के अपराधियों के प्रति कोई भी उदारता न दिखाई जाये अन्यथा देर हो जायेगी और तब भारत में शांति बहाल करना मुख्किल होगा. अटलांटिक टाइम्स के लेखक वुड का लेख इसी खतरे के प्रति विश्व को आगाह करता है.lokmat
Saturday, 1 April 2017
ट्रेन ब्लास्ट: भारत में आतंक का नया आयाम
Wednesday, 22 February 2017
यू पी चुनाव: जाति-धर्म की राजनीति कम होने के संकेत
जन-संख्या के आधार पर देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश का विधान सभा चुनाव लगभग आधा रास्ता पार कर चुका है. भारत के इतिहास में यह एक अलग किस्म के परिवर्तन का संवाहक बनाने जा रहा है, बशर्ते राजनीतिक वर्ग बाकि के अगले चार चरणों में फिर इसे जाति, उप-जाति या धर्म की ओर न मोड़ दे. जब समाजवादी पार्टी के अगुवा पिछड़े वर्ग के नाम पर वोट न मांगे बल्कि सड़कें बनवाने और मेट्रो चलवाने की दुहाई दें, जब बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती तिलक-तराजू से बहुजन और फिर बहुजन से सर्व-जन तक की बात करने लगें और जब कोई भारतीय जनता पार्टी का अध्यक्ष राम मंदिर छोड़ कर प्रदेश की सरकार पर केंद्र के कार्यक्रमों को अमल में न लाने का आरोप लगाये तो यह भारत में जन विमर्श बदलने की दस्तक है. पिछले 65 साल के चुनावों के इतिहास में पहली बार यह देखने में आ रहा है कि प्रदेश का युवा यादव, जाट, कुर्मी या अन्य जाति समूह में नहीं बंटा है. साथ हीं यह वर्ग हिन्दू-मुसलमान में न बंट कर बेरोजगार के वर्ग में शामिल हो गया है, आम मतदाता जाति और धर्म के ओछे संदेशों की हकीकत जान कर शासन के अपेक्षित या भोगी हुई गुणवता पर वोट दे रहा है.
यही वजह है कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने एक करिश्मा किया है. छः माह पहले जो सत्ताधारी पार्टी –समाजवादी पार्टी— खराब कानून व्यवस्था, बढ़ते अपराध और सत्ताधारी दल के अपराधीकरण और लम्पटवाद के चलते भयंकर सत्ता-विरोधी लहर के भंवर में फंसी थी, अचानक अच्छी दीखने लगी. जनता की उदारता देखिये कि साढ़े चार साल के कुशासन के बाद भी जब मुख्यमंत्री अखिलेश ने इस लम्पवाद, भ्रष्टाचार और अपराधीकरण के खिलाफ अपने चाचा शिवपाल और पिता मुलायम सिंह यादव को चुनौती दी तो जनता में उसमें वही छवि देखनी शुरू की जो वह चाहती थी ---- एक बेदाग़ चेहरा, कुछ करने का जज्बा और न करने की बेचारगी. जनता ने क्षमा हीं नहीं किया बल्कि व्यापक स्वीकार्यता भी दिखाई. यही स्वीकार्यता सन २०१४ में नरेन्द्र मोदी के प्रति भी थी.
सन २०१४ और उसके बाद बिहार और उत्तर प्रदेश के राज्य विधान सभा चुनाव देश भर में मोदी की छवि और उनकी नीतियों को लेकर प्रतिनिधि चुनाव माने जा रहे हैं. इसका कारण यह है कि ये दोनों राज्य भारत की २६ प्रतिशत जनसँख्या लेकिन मात्र ११ प्रतिशत भूभाग रखते हैं. जाहिर है गरीब हैं और मानव विकास के किसी भी पैमाने पर सबसे नीचे के पायदान पर ज़माने से अपनी जगह बनाये हैं. ऐसे में जब देश के जनसँख्या के हिसाब से सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में चुनाव हो और इसमें न कहीं बाल मृत्यु दर , मातृ मृत्यु दर, स्कूल- और सड़क-आबादी अनुपात, साक्षरता या प्रति व्यक्ति आय, रोजगार की स्थिति के बारे में चर्चा न होकर भावनात्मक “नेता-प्रजा” संबंधों के बचकाने रिश्तों की बात होने लगे तो राजनीतिक वर्ग की जड़ता पर चिंता होने लगती है.
ऐसे में जब देश के प्रधानमंत्री भी उसी सांचे में ढल जाएँ और अपने भाषणों में “मैं इस प्रदेश की गोद लिए बेटा हूँ” कह कर सभा में ताली बजवाएं, या अगले दिन मुख्या मंत्री अखिलेश यादव अपनी पत्नी डिंपल यादव को प्रदेश की जनता की भाभी बताएं, मायावती शाश्वत “बहेन जी” बनी रहें और कांग्रेस की प्रियंका गाँधी अपने को उस प्रदेश की बेटी करार दें यह कहते हुए कि उत्तर प्रदेश को किसी को बाहर से गोद लेने की जरूरत नहीं है तो यह सोचना पड़ता है एक गरीब राज्य में कब तक हम मुद्दों पर चुनाव लड़ने के बजाय जनता को तथ्यों से अलग रखेंगे.
लेकिन जैसा शुरू में बताया गया जन विमर्श को सकारात्मक, विकासपरक , वैज्ञानिक सोच वाला और दकियानूसी मुद्दों से दूर करने का जिम्मा राजनीतिक वर्ग का और साथ हीं मीडिया का होता है. आज प्रदेश के चुनाव में यह राजनीतिक वर्ग जाति और धर्म से ऊपर तो उठा है (वह भी इसलिए कि स्वयं जनता ने इन मुद्दों को ख़ारिज करना शुरू किया है) लेकिन उसे स्वयं विकास के पैरामीटर की जानकारी नहीं है. अगर किसी बड़े नेता या मंत्री से पूछें कि मानव विकास सूचकांक पर प्रदेश की स्थिति क्या है या बाल मृत्यू दर क्यों कम नहीं हो रहा है तो अधिकांस बगलें झांकने लगेंगे. दरअसल उनकी ट्रेनिंग में विकास कभी भी जनमत हासिल करने का मन्त्र रहा हीं नहीं है. इसका दो उदाहरण हैं --- प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी में संगीत सोम (मुज़फ्फरनगर दंगों में चर्चित) टाइप उम्मीदवारों को टिकट मिलना या मुख़्तार अंसारी को अखिलेश की पार्टी में जगह न मिलने पर मायावती द्वारा हाथों हाथ लेना. मुख़्तार जैसे कुख्यात अपराधी को टिकट हीं नहीं दिया गया बल्कि मायावती ने उसके परिवार को “बहुत हीं सम्मानित” परिवार बताया. यह सब कुछ करने के पीछे एक हीं सोच थी पूर्वी उत्तर प्रदेश के कम से कम दस विधान सभा क्षेत्रों में मुसलमान मतों की चाहत. बसपा सुप्रीमो की सोच अगर इससे ऊपर जाती तो वह यह जान पातीं कि युवाओं का एक बड़ा वर्ग जो संप्रदाय की सोच से ऊपर उठ चुका है उनकी पार्टी को इसलिए भी वोट देता कि उनके शासन काल में लम्पटों का सत्ता में इतना बोलबाला नहीं था जितना अखिलेश के साढ़े चार साल के शासन काल में.
इधर मीडिया को भी अपना ज्ञान , अपनी समझ और अपने विश्लेषण के तरीके को बदलना होगा. जितना राजनीतिक वर्ग विकास की समझ से अछूता है उतना हीं भारतीय मीडिया भी. रिपोर्ट शुरू हीं होती है किस चुनाव क्षेत्र में कितने मुसलमान , कितने दलित और कितने पिछड़े जाति के लोग हैं और किस प्रत्याशी को कौन जाति वोट नहीं दे रही है.
भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों राष्ट्रीय पार्टियों पर यह जिम्मेदारी ज्यादा है क्योंकि इनमें जन-विमर्श बदलने की क्षमता है , नेटवर्क है और यह इनके फायदे में भी है. जाति और सांप्रदायिक अपील धीरे-धीरे अपनी ताकत खो रहे हैं क्योंकि जनता की प्रति व्यक्ति आय , साक्षरता , तर्क-शक्ति और स्थिति को आंकने का तरीका बदल रहा है. दलित भी अब पूछ रहा है कि ज़िले मे एस पी और थानेदार तो दलित वर्ग से मिला पर सड़क और रोजगार क्यों नहीं ? सशक्तिकरण की झूठी चेतना जगा कर जातिवादी दलों ने १९९० से उत्तर भारत में समाज को जाति और संप्रदाय में तो बांटा लेकिन अब जो सवाल कांग्रेस और मोदी से पूछे जा रहे हैं वही मायावती और अखिलेश से भी. हाँ एक बात अभी भी बदस्तूर कायम है और वह है मुसलमानों में अपनी सुरक्षा को लेकर चिंता. भारतीय जनता पार्टी और खासकर उसके अगुवा और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को यह देखना होगा कि जब देश की सोच बदल रही है तो अल्प-संख्यकों में यह डर भी ख़त्म करना उनका काम है. “सबका साथ और सबका विकास” किसी वर्ग में डर रहेगा तो संभव नहीं होगा.
patrika
Wednesday, 28 December 2016
ये ‘लान्जेरी” बनाम ‘लंगोट’ की लड़ाई है पी सी साहेब !
डिजिटल भुगतान पर सरकार के जोर देने के खिलाफ कांग्रेस नेता और भूतपूर्व वित्तमंत्री पी चिदंबरम (पी सी ) का कहना है कि सरकार का यह जानना कि कोई युवती कौन सा अधोवस्त्र (अमेरिका और यूरोप और भारत के अभिजात्य वर्ग में इसे लांजेरी कहते हैं) खरीदती है या कोई पुरुष कौन सी दारू पीता है, उनके मौलिक अधिकारों का हनन है. बोफोर्स घोटाले के दौरान विश्वनाथ प्रताप सिंह ने वाराणसी की एक जनसभा में विन चड्ढा के दलाली पर बोलते हुए अपभ्रंश यमक और अनुप्रास अलंकार का मिश्रित प्रयोग करते हुए लाक्षणिक रूप से कहा था “तुम बिन चड्ढा हम बिन चड्ढी”. चिदंबरम साहेब को “लान्जेरी” प्रयोग करने वालों के मौलिक अधिकार की चिंता जायज है पर उन गरीबों के मौलिक अधिकारों का क्या जिनकी लंगोट भी काला धन की भ्रष्ट व्यवस्था के कारण पिछले ७० सालों से छीन गयी है.
अजीब है संपन्न वर्ग का तर्क. पूर्व मंत्री ने एक सारिणी दे कर समझना चाहा है कि अमरीका, जर्मनी फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा सरीखे संपन्न देशों में भी नकद का प्रयोग लगभग आधे से ज्यादा काम-काज में होता है. वह यह बताना भूल गए कि स्विट्ज़रलैंड का प्रधानमंत्री बस में कंडक्टर से टिकट लेकर संसद में आता है और सन १९२४ में कैम्पबेल काण्ड में प्रधानमंत्री की सरकार इसलिए चली गयी कि राजनीतिक कारणों से सरकार ने कुछ लोगों के खिलाफ मुकदमे उठा लिए थे (यह घटना भी यू पी ए के शासन काल में बनी प्रशासनिक सुधार आयोग की चौथी रिपोर्ट पेज संख्या ९ में ऊधृत की गयी है) जबकि भारत में बेटे पर भ्रष्टाचार के मुकदमें के बाद भी लोग मंत्री बने रहते हैं. जिन पश्चिमी देशों का हवाला पी सी साहेब ने दिया है वहां भ्रष्टाचार इस तरह लोगों के जीवन को नहीं खा रहा है कि सकल घरेलू उत्पाद (जी डी पी ) का ६६ प्रतिशत काली संपत्ति में बदल जाता हो.
पी सी का एक और तर्क देखिये. उनके अनुसार नोटबंदी से भ्रष्टाचार ख़त्म नहीं होगा. इसके लिए उनका कहना है कि इस घोषणा के बाद नए नोट लेते हुए जो लोग रँगे हाथ पकडे गए उनमें रिज़र्व बैंक, अन्य बैंक , पोस्ट ऑफिस , कांडला पोर्ट आदि तमाम सरकारी विभाग के अधिकारी हीं नहीं सेना के इंजीनियरिंग सेवा के अभियंता भी थे. यह कुछ ऐसा हीं तर्क है कि अगर ७० साल में अपराध बढे हैं तो न तो भारतीय दंड संहिता जी जरूरत है न हीं अदालतों या जजों की. और शायद यही सोच कर कांग्रेस सरकार ने ७० साल में से ५० साल से ज्यादा के अपने शासन काल में भ्रष्टाचार पर कभी अंकुश नहीं लगाया और नतीजा यह रहा कि काला धन सुरसा की तरह मुंह बढ़ाता चला गया.
कांग्रेस ने शायद नोटबंदी के खिलाफ तर्क जुटाने का काम अपने इस सबसे प्रतिभाशाली नेता और पूर्व वित्त मंत्री को दिया है पर उनके तर्क बचकाने हीं नहीं भ्रष्टाचार के प्रति सहिष्णुता का भाव रखते दिखाई देते है। इस कांग्रेस नेता ने यह बताने की कोशिश की कि कि सरकार ने अपना “गोलपोस्ट” (लक्ष्य) बदला है. उनके अनुसार प्रधानमंत्री ने अपने ८ नवम्बर के राष्ट्र के नाम संबोधन में १८ बार “काला धन” शब्द का इस्तेमाल किया और पांच बार “जाली नोट” का लेकिन एक बार भी “कैशलेस” (नोट-विहीन आदान-प्रदान) का नहीं जबकि नवम्बर २७ के दो भाषणों में २४ बार “नोट-विहीन” (कैशलेस) शब्द का प्रयोग किया और “काला धन” शब्द का केवल नौ बार.
कोई नीति (या कानून) सही है या गलत समझाने का सर्वमान्य तरीका होता है यह प्रश्न करना कि इस नीति के न होने से क्या नुकसान हो रहा था या होता. दूसरा इस नीति से नीति निर्माता को लाभ क्या मिलता --- परोक्ष रूप से या प्रत्यक्ष रूप से. जिस शाम मोदी ने नोटबंदी की घोषणा की एक सामान्य ज्ञान का बच्चा भी बता सकता था कि आम जनता को जबरदस्त दिक्कत होगी. शायद सरकार को भी इतनी समझ तो है हीं. दूसरा काला धन इस देश को ७० साल से खा रहा है और यह धन भ्रष्टाचार की स्थूल परिणति भी है और कारण भी. भ्रष्टाचार सामाजिक व्याधि है जो मूलरूप से समाज में नैतिकता के ह्रास से पैदा होता है. इसे ख़त्म करने में राज्य अभिकरण की भूमिका सीमित होती है. और अगर होती भी है तो धन के सञ्चालन पर नियंत्रण के माध्यम से हीं. लिहाज़ा पहला कदम हीं इस धन पर अंकुश लगने का था जो नोटबंदी के जरिए सभी काले नोट को वापस लाने के प्रथम उपक्रम के रूप में हो सकता था. लिहाज़ा पहले नोटबंदी पर जोर दिया गया फिर कैशलेस आदान-प्रदान पर. इस में यह गारंटी नहीं होती कि भ्रष्ट और अनैतिक अफसर या नेता या सेठ कल से साधू हो जाएगा और बैंक, आर बी आई और थाने का दरोगा माला ले कर जपा करेगा. उसके लिए कैशलेस अर्थ व्यवस्था को न केवल रियल एस्टेट में बल्कि चड्ढी खरीदने में प्रयुक्त करना होगा ताकि भष्टाचारी “मौलिक अधिकार” के नाम पर चड्ढी में सोना न छिपाए.
पी सी का एक और अतार्किक उदहारण लें. उनके अनुसार पहले सभी रियल एस्टेट, बड़े ठेके ऊँचे मूल्य वाले गहने को डिजिटल पेमेंट की सीमा में लाना चाहिए. क्या वह आज भी नहीं है. क्या कानून बन जाएगा तो मकान की खरीद मात्र सफ़ेद धन में हीं होगी और पीछे से लिए जाने वाली काला धन बंद हो जाएगा. उसके लिए सामान्य खरीद और उपभोग के ठिकानों पर अंकुश लगाना पहला कदम है अन्यथा ओवर- इन्वोइसिन्ग और अंडर- इन्वोइसिन्ग के जरिया काला धन पैदा होने का स्रोत बना रहेगा.
और फिर अगर पी सी ऐसा मानते हैं कि बड़े सौदे डिजिटल माध्यम से हों तो उन्होंने कार्यकाल में यह “जादुई” छडी क्यों नहीं घुमाई?
मोदी सरकार को अगले कदम में मजबूत कानून श्रृंखला और संस्थागत सपोर्ट की ज़रुरत है. जिसे अगले कुछ महीनों में करना होगा ताकि न तो आयकर अधिकारी भष्टाचार का तांडव कर सके न हीं भ्रष्टाचारी बच के निकल सके. लेकिन इन सबके बाद अभी कई संस्थागत चिदंबरम पैदा होंगे जो मौलिक अधिकार की दुहाई दे कर बचना चाहेंगे बगैर यह देखे हुए कि ७० साल में करोड़ों गरीबों के मौलिक अधिकार को किसने हडपा. भ्रष्टाचारी से जब इनकम टैक्स अधिकारी पूछेगा कि नौकर ने तीन करोड का फ्लैट कैसे लिया तो वह अदालत में संविधान के अनुच्छेद १९ (१) (छ) की दुहाई दे कर बचना चाहेगा यह कहते हुए कि व्यवसाय के मौलिक अधिकार का हनन हो रहा है. भारत जैसे उदार प्रजातंत्र में अदालतें भी चश्मा लगा कर इस भ्रष्टाचारी को राहत देती नज़र आयेंगी. लिहाज़ा सरकार तो अपना काम कर रही है लेकिन एक व्यापक जन आन्दोलन की ज़रुरत है भ्रष्टाचार के इस कोढ़ के खिलाफ जैसा कि २०११ में अन्ना के आन्दोलन के समय नज़र आया था. और यह तब तक संभव नहीं जब तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सरीखे बड़े संगठन, राजनीतिक दल एक स्वर में इस भारत को बदलने के यज्ञ में शामिल न हों.
jagran
Sunday, 27 November 2016
काला धन: विपक्ष का कुतर्क
अद्भुत है इस देश के एक वर्ग की तर्क शक्ति जो सकारात्मक को नकारात्मक बना कर जन विमर्श में डालने की जबरदस्त सलाहियत रखता है. पूर्व-वित्त मंत्री और कांग्रेस नेता चिदंबरम के सवाल-जवाब के प्रारूप में लिखे गए ताज़ा लेख में यह बताने की कोशिश की गयी है कि काला धन कोई बड़ी समस्या नहीं है और दुनिया के सभी देशों में यह कमोबेश है. इस बात को सिद्ध करने के लिए उन्होंने वर्ल्ड बैंक के एक अध्ययन को लिया है जिसके अनुसार अमेरिका में छाया अर्थ-व्यवस्था (काले धन की अर्थव्यवस्था) सकल घरेलू उत्पाद (जी डी पी ) का ८.६ प्रतिशत, चीन में १२.७ प्रतिशत जापान में ११ प्रतिशत और भारत में २२.२ प्रतिशत है. उनका कहना है कि ब्राज़ील , रूस और दक्षिण अफ्रीका में तो यह भारत से भी ज्यादा है. याने पूर्व वित्त मंत्री के हिसाब से यह कोई खास समस्या नहीं है जिसके लिए जनता को इतने कष्ट में डाला जाये.
तर्क-शास्त्र में एक दोष का वर्णन है --- अपने मतलब के तर्क वाक्य छांट लेना और बाकि छोड़ देना. चिदाम्बरम ने अपने लेख में इसका खूब इस्तेमाल किया. वह भूल गए कि उनके शासन काल में हीं देश के एक प्रख्यात अर्थ-शास्त्री प्रोफेशन अरुण कुमार ने यह आंकड़ा गलत बताया और कहा कि भारत में काली अर्थ-व्यवस्था जी डी पी ६० प्रतिशत याने १.४० ट्रिलियन डॉलर है. विश्व बैंक के आंकडे का आधार गलत है और दूसरे चार अन्य अध्यनों में भी इसे ४० प्रतिशत से ७० प्रतिशत बताया गया है. कांग्रेसी कुतर्क का यह आलम है कि यू पी ए -२ में २०१२ में इस मुद्दे पर जारी श्वेत पत्र में श्नेडर गणना (गत्यात्मक बहु-संकेतक बहु-कारक आंकलन पद्यति ) को आधार माना गया जिसके अनुसार श्री लंका में भारत से तीन गुना काली अर्थ-व्यवस्था है । इसके उलट यह देश मानव विकास सूचकांक में भारत से काफी आगे है. चिदंबरम अपने तर्क के आधार पर यह भी कह सकते हैं कि श्री लंका की तरह भारत में भी काली अर्थ-व्यवस्था को दूना किया जाना चाहिए क्योंकि इससे मानव विकास बेहतर होता है.
चिदंबरम के अन्य खुद हीं पैदा किये गए सवाल और उनके खुद हीं दिए गए जवाव देखिये. प्रशन :क्या नोटबंदी से भ्रष्टाचार रुकेगा? जवाब: नहीं. भ्रष्टाचारी नए नोट में घूस लेंगे? क्या इससे नकली नोट छपना बंद होंगे? नहीं, अगर वो पुराने नोटों की नक़ल कर सकते हैं तो नए की भी कर लेंगे. प्रश्न: क्या इससे काला धन बंद होगा ? जवाब : नहीं, क्योंकि ऐसा करने वाले जिन क्षेत्रों – जैसे निर्माण, चुनाव या सोना की खरीद में यह सब करते रहेंगे. ये जवाब जितने सहज हैं उतना हीं बचकाने भी. इन सब जवाबों से यह निकलता है कि” लिहाज़ा यह कोई समस्या नहीं है और काला धन की समान्तर अर्थ व्यवस्था चलती रहनी चाहिए. और शायद यही कारण रहा कि ७० साल में इसे पाल-पोस कर दैत्याकार बना दिया कांग्रेस सरकार ने. यू पी ए -२ के शासन काल में काला धन पर एक श्वेत पत्र जारी किया गया उसमें भी यही आंकड़े दिए गए. और यहाँ तक बताया गया कि एशिया के अन्य देशों में तो यह समस्या दूनी ज्यादा है. कांग्रेस के ४५ साल के शासन में कभी कोई सार्थक प्रयास नहीं हुआ.
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नोटबंदी के ऐलान के बाद पहले २४ घंटों में देश की प्रतिक्रिया बेहद सकारात्मक रही. “सेठ फंसा”, “घूसखोर अफसर अब क्या करेगा” या “नेतवा की रात की नींद उड़ी” का ७० साल पुराना घुन लगा भाव अचानक मुखर हुआ. लेकिन उसके बाद यह प्रतिक्रिया नकारात्मकता में बदली और बढ़ती चली गयी. कमज़ोर वर्ग इस फैसले से दिक्कत में रहा और अभी भी है. इस दिक्कत को बेहतर ऐलान-पूर्व रणनीति के तहत कम किया जा सकता है. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी इसे माना.
लेकिन इसी बीच अर्थशात्रियों का एक वर्ग इस प्रयास के औचित्य पर प्रश्न उठाने लगा. उस का कहना था कि नोटबंदी मुख्य समस्या का समाधान नहीं है क्योंकि धन के रूप में काली कमाई और उससे उपजी संपत्ति का बहुत कम हिस्सा हीं नकदी के रूप में रहता है. उनका मानना है कि हमला कहीं और करना होगा. इस हमले से एक तो कुछ चोर हीं पकडे जायेंगे और दूसरा इस प्रयास के अनुषांगिक क्षति के रूप में कमज़ोर तबके की दिक्कतें अचानक बढ़ जायेंगी. यह भी तर्क है कि इससे अगर कुछ चोर पकडे भी गए तो इससे आगे चोरी न हो इसकी कोई गारंटी नहीं है. यह आखिरी तर्क कुछ ऐसा है जैसे यह कहना कि चोर को जेल भेजने से यह सुनिश्चित नहीं होता कि अब कोई चोर पैदा नहीं होगा लिहाज़ा चोर पकड़ना छोड़ कर समाज में नैतिकता का प्रचार –प्रसार किया जाना चाहिए. दरअसल अव्वल तो यह राज्य का कार्य नहीं है. उसके लिए दूसरी सामाजिक –नैतिक संस्थाएं और गैर-राज्य प्रक्रियाएं होती हैं (जो भारत में विलुप्त-प्राय हैं) और दूसरे अगर राज्य को कहीं से शुरू करना है तो आखिर किस मुकाम से शुरू करे, खासकर उस स्थिति में जब पूरा “आवां का आवां” हीं खराब हो. जिस देश में सिपाही से लेकर मंत्री तक और ठेकेदार से लेकर जज तक भ्रष्ट पाए जाते हों उसमें काला धन पर अंकुश लगाना किसी क्रांति से कम नहीं और वह भी न केवल राज्य-नीत क्रांति बल्कि सामाजिक –नैतिक –व्यक्तिगत –आध्यात्मिक क्रांति.
एक बात जो इस प्रयास को नाकाफी बताने वाले अर्थशास्त्री भूल रहे हैं वह यह कि मोदी सरकार ने यह कदम उस समय उठाया है जब टेक्नोलॉजी ने समाज के हर व्यक्ति की एक –एक गतिविधि पर नज़र रखना बेहद सहज कर दिया है. आप माल जाते है उसका टीवी फुटेज है, आप के घर पर सेठ की कार दिवाली का गिफ्ट लेकर आती है उसका फुटेज मिल सकता है (सी बी आई के डायरेक्टर के घर कौन दलाल कब कब गया यह आज भी एक बड़ा मामला है), आप अब ज्यादा दिन बेनामी संपत्ति नहीं रख सकते क्योंकि जिसके नाम संपत्ति ली है उसे रजिस्ट्री आफिस में हीं फोटो खिंचवाना है. आपसे उसका रिश्ता पता लगाना मुश्किल नहीं होगा. उन सभी सोने बेचने वालों से सीसीटीवी फुटेज ली जा रहीं हैं जिन्होंने नोटबंदी की रात सोना बेंचा.
सात दशक तक समाज कान में तेल डालकर सोता रहा “कोई नृप होहिं हमें का हानि” के भाव में और लोग अपनी जाति के कुख्यात छवि वाले लम्पट को भी प्रतिनिधि के रूप में प्रजातंत्र के मंदिरों –विधान सभाओं और संसद--को दूषित करने के लिए भेजता रहा. समाज की सोच की जड़ता यहाँ तक बढ़ी कि गाँव में बूढ़ी माँ बेटे की नौकरी लगने पर यह पूछने लगी कि “ऊपर की आमदनी कितनी है?”. भष्टाचार पूरे समाज में आत्मसात हो गया, जीवन पद्यति का भाग बन गया और महिमा-मंडित होने लगा. शादी के बाज़ार में एक सप्लाइ इंस्पेक्टर की कीमत इंटरमीडिएट के शिक्षक से ज्यादा होने लगी.
ऐसा नहीं था कि सरकारों को काला धन के बारे में आज पता चला है. अंग्रेज़ी शासन में भी इस व्याधि से मुक्ति के लिए अनेक समितियां बनी. सन १९३६ में अय्यर समिति ने सिफारिश की कि कर कानून में आमूलचूल बदलाव लाये जाएँ ताकि कम से कम कर –वंचना रोग की तरह न फैले. लेकिन इच्छा-शक्ति का नितांत अभाव रहा. आज जरूरत है कि भारतीय समाज इसे एक जन अभियान के रूप में ले और भ्रष्टाचार की ताबूत में आखिरी कील ठोके स्वयं को बदल कर और दूसरों पर बदलने का दबाव बना कर. केवल राज्य अभिकरण यह काम नहीं कर सकते.
jagran
Thursday, 3 November 2016
औपचारिक संस्थाएं बनाम अतार्किक जन सोच
एक खबर के अनुसार उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब चुनाव के मद्दे नज़र चुनाव आयोग उन दलों पर शिकंजा कसेगा जो मतदातों से बड़े –बड़े और लुभावने वादे करते हैं. ऐसे दलों को एक शपथ पत्र देने होगा कि वे इन वादों को पूरा करेंगे और अपने घोषणा-पत्रों में भी उन वादों को पूरा करने के लिए अपेक्षित वित्त की व्यवस्था के बारे में विस्तार से देना होगा. अब मान लीजिये किसी दल ने कहा “सब छात्रों को मुफ्त लैपटॉप” और दावा किया कि इसके लिए वित्त जुटाने के लिए भ्रष्टाचार दूर करके कर वसूली बढाया जाएगा. क्या चुनाव आयोग यह कह सकता है कि उसे भ्रष्टाचार ख़त्म करने के पार्टी के दावे पर विश्वास नहीं और क्या वह इस आधार पर पार्टी का चुनाव चिन्ह रद्द कर सकता है. उधर सर्वोच्च न्यायालय की सात सदस्यीय संविधान पीठ के समक्ष एक बार २५ साल जन प्रतिनिधि कानून की धारा १२३ (३) के तहत आने वाला पुराना विवाद उस खडा हुआ है. अदालत ने सरकार सहित सभी पक्षों से पूछा है कि “क्या धर्म, जाति या जन-जाति के नाम पर यह कहते हुए कि अगर वोट मिलेगा तो उस समुदाय की रक्षा और विकास किया जाएगा, वोट माँगा गया तो इसे "भ्रष्ट आचरण की संज्ञा दी जा सकती है"?, मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली इस संविधान पीठ ने इसी तरह के अन्य कई सवालों का जवाब जानना चाहा है। शायद हम नैतिकता और वैज्ञानिक सोच के प्रति जन-उदासीनता से जन्मे सवालों का समाधान औपचारिक संस्थाओं व प्रक्रियाओं के माध्यम से खोज रहे हैं.
दरअसल अदालत की मजबूरी यह है कि सामाजिक या विश्वास के मुद्दे जब उसके पास आते हैं तो उन्हें तर्क और कानून की कसौटी पर कसा जाता हैं. अगर वह मुद्दा एक व्यापक समाज में विश्वास का मक़ाम हासिल कर चुका है तो चाहे वह कितना भी गलत क्यों न हो औपचारिक संस्थाओं या व्यवस्थाओं या क़ानूनों द्वारा उस विश्वास को ख़त्म नहीं किया जा सकता. याने कोई भी अदालत यह नहीं कह सकती कि यह मुद्दा कानून से परे है और इसे सुलझाना निरपेक्ष और विश्वसनीय समाज सुधारकों का काम है. वास्तव में आज भारत में इस तरह के समाजसुधारकों की नस्ल लगभग विलुप्त हो गयी है. अब कबीर, दादू या रहीम पैदा नहीं होते. अदालत के प्रश्न काफी गहरे हैं. दलित और आदिवासियों पर आज भी अत्याचार हो रहे हैं जब कि कानून दर कानून बनते गए और हर संशोधन में प्रावधानों को और सख्त किया जाता रहा. संविधान ने तो ७० साल पहले हीं छूआछूत ख़त्म कर दिया था.
अदालत की चिंता को और अधिक विस्तार दिया जाये तो कई नए प्रश्न खड़े होते हैं. कुछ अन्य उदाहरण लें. अगर मायावती दलितों से वोट मांगे और वह कानून-सम्मत है तो फिर लालू यादव या मुलायम सिंह का यादवों की रक्षा और विकास के लिए वोट मांगना गलत क्यों? भारत में व्यक्ति की जाति या समुदाय के बारे में उसके नाम से और कई बार परिधान से पता चल जाता है. जब कोई ओवैसी ऊँचे पायचे का पाजामा और दुपल्ली टोपी लगाये या खास सलीके से कटी दाढी के साथ बिहार के किसनगंज में जहाँ एक सम्प्रदाय विशेष की आबादी ७० प्रतिशत है जा कर उनके हिफाजत का वायदा करते हुए वोट माँगता है तो क्या इसे समझने के लिए कि यह “धर्म के नाम पर वोट मांगना है” किसी आइन्स्टीन के दिमाग की ज़रुरत है? जन प्रतिनिधि कानून की धारा १२३ (३) के तहत कोई भी प्रत्याशी या उसका एजेंट या उसकी सहमति पाया व्यक्ति अपने धर्म, नस्ल, जाति, समुदाय या भाषा अथवा धार्मिक चिन्हों का इस्तेमाल करके उस प्रत्याशी के चुने जाने के अवसर को आगे बढ़ाता है या किसी अन्य प्रत्याशी के अवसर को प्रभावित करता है तो वह भ्रष्ट आचरण माना जाएगा.
भारत कुछ अलग किस्म का देश है जिसमें अनगिनत पहचान समूह है. सिर्फ़ इतना हीं रहता तो कोई बात नहीं थी. ७० साल में “फर्स्ट-पास्ट –द- पोस्ट “ सिस्टम की दोषपूर्ण चुनाव पद्यति के कारण राजनीतिक वर्ग ने इसे और धार दी है और कई बार नए पहचान समूह पैदा किये है जैसे “महादलित”. खास बात यह है कि राजनीतिक वर्ग इन पहचान समूहों को एक दूसरे से लड़ाता रहता है. अब समाजशास्त्र के नियमों को ध्यान दें तो अगर कोई मायावती (स्वर्गीय कांसी राम को न भूलें) होगा तो कोई लालू या मुलायम भी होगा, कोई कम्मा नेता होगा तो कोई कापू भी और कोई वोक्कालिगा होगा तो कोई लिंगायत भी. ऐसे में यह कैसे कह सकते हैं कि ओवैसियों के खिलाफ कोई वेदांती नहीं खड़ा होगा? कोई राम मंदिर नहीं राष्ट्रव्यापी मुद्दा बनेगा और राजनीतिक संवाद इसके इर्द-गिर्द नहीं घूमेगा. एक ऊँचे पायचे का पजामा पहन कर वोट मांगे तो ठीक लेकिन दूसरा तिलक लगा कर या गेरुआ पहन कर प्रत्याशी के पक्ष में खड़ा हो और धर्म विशेष के नाम पर वोट मांगे तो गलत !
एक और प्रश्न लें जो शायद सर्वोच्च अदालत के संज्ञान में होगा. एक व्यक्ति जिसकी स्वीकार्यता उस धर्म, जाति या अन्य पहचान समूह के अनुयाइयों के बीच है चुनाव मंच पर आता है लेकिन वह अपने प्रत्याशी के लिए विकास के नाम पर वोट माँगता है. लक्षित वोटर उसके कट्टर अनुयायी हैं लिहाज़ा वे प्रभावित हो कर वोट करते हैं. क्या इसे कानून सम्मत माना जा सकता है. उदाहरण के तौर पर कोई जैन मुनि या कोई लामा अपने अनुयाइयों को यह कहता है कि उसी पहचान समूह के अमुक व्यक्ति को वोट तो वह तुम्हारा विकास करेगा, तो क्या यह उचित ठहराया जा सकता है. ध्यान रहे कि मतदाता ने वोट इस आधार पर नहीं दिया कि उन्हें विकास को लेकर प्रत्याशी में विश्वास है बल्कि वोट देने की वजह मुनि या लामा के प्रति धार्मिक विश्वास है.
lokmat
इस कानून के उपरोक्त प्रावधान का मूल उद्देश्य यह था कि चुनाव के दौरान मतदाता के स्व –विवेक पर कोई भी अतार्किक भावनात्मक मुद्दे भारी न पड़ें. परन्तु अगर मतदाता जाति, धर्म , भाषा या नस्ल में हीं अपना भविष्य सुनिश्चित पाता है तो कानून उसे कैसे रोक सकता है? कानून तो बलात्कारियों और हत्यारों को भी फांसी की सजा देता है. फिर अगर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मौलिक अधिकार है और अगर अच्छे प्रजातंत्र के लिए डिबेट और जन-संवाद अपरिहार्य है तो रास्ता एक हीं बचताहै और वह है – मतदाताओं की सोच अर्थात् उन वास्तविक मुद्दों के प्राथमिकता जो वोटरोँ के अपने सम्यक विकास को सुनिश्चित करते हों.
Thursday, 20 October 2016
तीन तलाक और उलेमाओं के एक वर्ग का पूर्वाग्रह
शायद हमने गलत समझ की वजह से पिछले ७० सालों में प्रजातंत्र को मजाक बना दिया है. या यूं कहें कि प्रजातंत्र मानसिक ऐय्यासी का अखाडा बन गया है जिसमें अभिजात्य वर्ग बौद्धिक जुगाली करते हुए देश की शांति, विकास और जीवन के गुणवत्ता को बाधित कर रहा है. समान नागरिक संहिता का विरोध, भारत –विरोधी और पाकिस्तान-समर्थक नारे देश की छाती दिल्ली के जे एन यू में लगाने वालों में भी “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देखना”, एक साथ केंद्र और राज्य के चुनाव कराने की अवधारणा की कुछ क्षेत्रीय दलों द्वारा मुखालफत, आतंकवाद के खिलाफ प्रभावी कदम उठाने के लिए केंद्र को अधिक शक्ति देने के खिलाफ राज्यों का खड़ा होना, केंद्र के तमाम जन कल्याण के कार्यक्रमों के प्रति राज्य सरकारों का इस लिए उदासीन होना कि इसका श्रेय केंद्र की सरकार को मिलेगा कुछ उदाहरण है. गौर करें, भारत जिस किस्म का आतंकवाद पिछले ३० सालों से झेल रहा है उसका आयाम न केवल देश-व्यापी है बल्कि मूल रूप से वैश्विक है. आतंकवादी बाहरी मुल्कों से आते हैं, देश में भी पाकिस्तानी कुप्रयासों से उनकी पौध लगाई जाती है. हाल के दौर में पाकिस्तानी एजेंसियों ने बांग्लादेश और नेपाल को नर्सरी के रूप में विकसित किया है. लेकिन जैसे हीं केंद्र सरकार ने कुछ साल पहले कानून में बदलाव करके आतंकवाद –निरोधक राष्ट्रीय इकाई को राज्यों में स्थापित कर उन्हें राज्यों की पुलिस के समान अधिकार देने चाहे कई राज्य तन कर खड़े हो गए इस तर्क के साथ कि यह अर्ध-संघीय ढांचे के खिलाफ है और इससे उनकी स्वायत्तता बाधित होती है. अमरीका हमसे बड़ा संघीय संविधान है और जहाँ राज्यों को बेहद अधिक अधिकार हैं लेकिन जब ९/११ को वर्ल्ड ट्रेड टावर पर हमला हुआ उसके एक साल में वहां केंद्र ने निर्बाध शक्तियां होमलैंड सिक्यूरिटी एक्ट के तहत अपने पास ले लीं. किसी राज्य ने चूं भी नहीं किया.
हमारे देश में ताज़ा चर्चा है समान नागरिक संहिता को लेकर. याने क्या देश में “तीन तलाक” , “निकाह हलाला” और बहु-विवाह प्रथा बनी रहनी चाहिए या संविधान के अनुच्छेद १४, १९ और २१ के अनुरूप हर नागरिक को चाहे वह किसी भी धर्म का हो या किसी भी लिंग का, समान अधिकार होने चाहिए? और यह बात देश की सर्वोच्च अदालत ने पूछी है किसी राजनीतिक पार्टी ने नहीं या किसी धार्मिक-सामाजिक संगठन ने नहीं. देश की लॉ कमीशन ने १६ सवाल बना कर जनता से उनकी राय जाननी चाही है. अचानक आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड तन कर खडी हो जाती है तमाम उन बातों की दुहाई देते हुए जिनकी वजह से संविधान निर्माताओं को मजबूरी में कुछ प्रावधान करने पड़े (जैसे अनुच्छेद २५ में धर्म का प्रोपोगेशन”। लेकिन फिर इस दबाव को निष्क्रीय करने के लिए नीति निर्देशक तत्वों में फिर से एक बार समान नागरिक संहिता बनाना राज्य का कर्तव्य बताया. संविधान सभा की अल्प-संख्यक समिति के इसी दबाव की नतीजा था कि शिक्षा के लिए , संस्कृति के लिए और धर्म-आधारित व्यक्ति के सामूहिक अधिकार और धर्म-आधारित समूह के अधिकार का प्रावधान अनुच्छेद २६ से ३० तक में देखने को मिलता है. पाकिस्तान बनने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी, हर दूसरे दिन अल्प-संख्यक समिति अपने को अलग करने की धमकी देती थी. सत्ताधारी दल उनका मान-मनौव्वल करता रहता था.
अब वर्तमान स्थिति पर. धर्म का मूल भाग और उस धर्म के अनुयाइयों द्वारा प्रयोग में लाये जाने वाली परम्परों में अंतर होता है. परम्पराएं धर्म का मूल भाग नहें होती. लिहाज़ा अनुच्छेद २५ में मिलने वाला मौलिक अधिकार परम्पराओं पर लागू नहीं होता. सर्वोच्च अदालत में दो माह पहले इसी मामले में दायर एक प्रति-हलफनामे में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने स्पष्ट रूप से कहा कि “तीन तलाक और बहु-विवाह अवांछित हैं”. अगर यह इस्लाम धर्म का मूल भाग होता तो अवांछित न होता. सर्वोच्च न्यायलय ने पहले भी कई फैसलों में यह स्पष्ट किया है.
फिर अगर पाकिस्तान और बांग्लादेश सहित दुनिया के २२ देश जिसमें अधिकांस इस्लामिक राज्य हैं, इस शोषक और पुरुष-प्रधान कुप्रथा को छोड़ चुके हैं तो भारत में क्यों बनाये रखने पर मुसलमान उलेमाओं का एक वर्ग जोर दे रहा है? मधु किश्वर बनाम बिहार राज्य में इसी अदालत ने कहा था कि अगर कोई प्रथा या कस्टम मौलिक अधिकारों को बाधित करता है तो गैर-कानूनी है. सबसे पहले मिस्र ने इस तीन तलाक की प्रथा से निजात पाई और वह भी आज से ८७ साल पहले सन १९२९ में कानून संख्या २५ बना कर. दरअसल इस्लाम के चार स्कूलों में से एक –हन्बली --के विद्वान् इब्न तैमियह ने १३ वीं सदी में पहली बार तीन तलाक़ के व्याख्या करते हुए कहा था कि एक बैठक में तीन बार तलाक कहना मुकम्मल नहीं माना जाएगा और इसे एक बार कहा हुआ तलाक समझा जाएगा. मिस्र ने यह बदलाव इसी के मद्दे नज़र किया था. लेकिन इसके बाद पूरी दुनिया के इस्लामिक देशों में इसे माना जाने लगा और तदनुरूप कानून बनाए गए. सूडान ने इसे १९३५ में लागू किया. कालान्तर में धुर इस्लामिक राष्ट्र जैसे इराक, जोर्डन , इंडोनेशिया , संयुक्त अमीरात और क़तर भी तैमियाह की व्याख्या के अनुरूप कानून लाये।
टर्की और पाकिस्तान
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उधर एक अन्य धारा का प्रतिनिधित्व करते हुए मुस्तफा कमाल के शासन में टर्की में सन १९२६ में स्विस नागरिक संहिता को अंगीकार किया गया. यह संहिता पूरे यूरोप की सबसे प्रगतिशील संहिता मानी जाते थी. लेकिन किसी मुसलमान ने नहीं कहा कि यह इस्लाम के खिलाफ है. पाकिस्तान में १९५५ में तत्कालीन प्रधानमंत्री मुहम्मद अली बोगरा ने पहली पत्नी को तलाक दिए बगैर अपनी सेक्रेटरी से शादी कर ली। पूरे पाकिस्तान में गुस्से का सैलाब आ गया. महिला संगठनों ने प्रदर्शन शुरू किये. मजबूरन एक कमीशन बनाया गया जिसने १९५६ में व्यवस्था दी कि एक बैठक में तीन बार कहा गया तलाक एक बार माना जाएगा. और तब से सुधार शुरू हुआ.
आखिर क्या वजह है कि भारत के उलेमाओं का एक वर्ग इस्लाम को इतना कमज़ोर मानता है कि स्त्रियों को समान अधिकार देने की व्यवस्था में उसे खतरा नज़र आ रहा है ? दरअसल कमज़ोर भारतीय इस्लाम नहीं है बल्कि देश के उलेमा हैं जिन्हें अपनी संस्था के अस्तित्व पर खतरा नज़र आने लगा है.
पूरी दुनिया की न्याय व्यवस्था में माना जाता है कि जीने का अधिकार तब तक सम्पूर्ण नहीं हो सकता जब तक जीने का विश्वास और गरिमा के साथ जीना शामिल न हो. प्रश्न यह भी नहीं है कि कितनी मुसलमान औरतें इस प्रथा की शिकार हैं. अगर एक भी है तो वह प्रथा सभी समाज पर दाग है.
आधुनिक धर्म-निरपेक्षता के सिद्धांत के जनक होल्याके ने नैतिकता की परिभाषा देते हुआ कहा “नैतिकता व्यक्ति के उन्नयन पर आधारित होती है और उसका किसी भगवान् या भविष्य की दुनिया के वादे से कोई मतलब नहीं होता. लिहाज़ा इसे कभी भी भगवान और धर्म से परे रखना चाहिए. भारत एक धर्म-निरपेक्ष देश है जिसमें व्यक्ति स्वातंत्र्य सर्वोपरि है. इसे बनाये रखने में मुस्लिम उलेमाओं के सभी वर्ग मदद करे तो शायद यह इस्लाम की भी बड़ी सेवा होगी.
jagran
Thursday, 14 July 2016
संवैधानिक प्रावधानों का सम्मान ज़रूरी
“मन की बात” मात्र आकाशवाणी से माह में एक बार कुछ पलों के लिये भले हीं हो यह माना जाता है कि मन निर्मल होता है और वह काल- और स्थिति –सापेक्ष नहीं होता बल्कि व्यक्ति का शाश्वत आभूषण होता है. देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी “मन की बात “ करते हैं. एक निर्मल सन्देश का भाव होता है और देश भी उसे यथावत ग्रहण हीं नहीं करता अपितु अमल में लाता है. लेकिन जब देश के हीं दो राज्यों में छल करके सत्ता में आने का कुचक्र किया जाता है और उसे सुप्रीम कोर्ट “असंवैधानिक” करार देता है तो शंका होती है कि “निर्मल मन” से यह कैसी “गंगा” ?
सुप्रीम कोर्ट ने मात्र दो महीने के भीतर दो फैसले दिए और दोनों में केंद्र और राज्यपाल की भूमिका पर प्रश्न चिन्ह लगा और दोनों राज्यों में कांग्रेस की सरकारें पुनर्प्रतिष्ठापित की गयीं. ताज़ा फैसला जो कि अरुणाचल प्रदेश के बारे में है एक तरह से राज्यपाल को “दोषी” ठहराने की तरह है. विश्वास नहीं होता कि राज्यपाल की संस्था “दिल्ली दरबार” को खुश करने के लिए इस हद तक गिर सकती है. संविधान निर्माताओं ने इस संस्था को बेहद सम्मानित स्थिति देने चाहा था और इसी वजह से देश की दो संस्थाओं --- राष्ट्रपति और राज्यपाल – के शपथ का प्रारूप अनुच्छेद में रखा जबकि बाकि सभी संस्थाओं का ---- प्रधानमंत्री से लेकर विधायक तक और सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश से लेकर हाई कोर्ट के जज तक --शपथ-प्रारूप अनुसूची में रखा. और साथ हीं जहाँ राष्ट्रपति व राज्यपाल संविधान के परिरक्षण, संरक्षण और अभिरक्षण की शपथ लेते हैं वहीं बाकि लोग यहाँ तक कि भारत के प्रधान न्यायाधीश को भी संविधान में निष्ठा की शपथ लेनी होती है.
लेकिन यहाँ सवाल सिर्फ राज्यपाल की भूमिका का नहीं है. संविधान के अनुच्छेद ३५६ में स्पष्टरूप से लिखा गया है कि “राज्यपाल की रिपोर्ट पाने या अन्यथा (याने किसी भी अन्य रिपोर्ट या सूचना के आधार पर) अगर राष्ट्रपति इस बात से संतुष्ट है कि राज्य संवैधानिक प्रावधानों ....... “ . अर्थात केंद्र सरकार (१) राज्यपाल की बात मानने को बाध्य नहीं है और (२) वह अन्य साधनों से भी तथ्यों व स्थिति का पता लगा सकती है. इसलिए राज्यपाल के फैसले पर अगर राष्ट्रपति शासन लगाया गया है तो इस कृत्य का आरोप मात्र राज्यपाल पर नहीं बल्कि केंद्र पर लगता है. दूसरा १९९४ में सुप्रीम कोर्ट के नौ–सदस्यीय संविधान पीठ का फैसला आज भारत में राज –काज (ऐसे मामलों) में बोम्मई जजमेंट के नाम से ध्रुव तारे की तरह दिशा बताता है. उस फ़ैसलै में स्पष्टरूप से राज्यपाल को क्या करना चाहिए और क्या नहीं, केंद्र को किस बात का संज्ञान लेना चाहिए और कितना यह सब दिया गया है. लिहाज़ा केंद्र जब भी चाहे राज्यपाल (अगर वह केंद्र के इशारे पर काम नहीं कर रहा है) के फैसले को नज़रंदाज़ कर सकता है.
मान लीजिये कि केंद्र में शासन कर रही भारतीय जनता पार्टी का यह तर्क मान भी लिया जाये कि अगर कोई पार्टी अपनी आतंरिक कलह के कारण टूट भी रही है तो क्यों न उसका फायदा उठाते हुए सरकार बनायी जाये, तो क्या यह देखना जरूरी नहीं कि दल-बदल विरोधी कानून, २००३ के प्रावधानों को ठेंगा न दिखाया जाये. इस कानून के अनुसार दल-बदल तभी वैध होगा जब किसी दल के दो-तिहाई विधायक पार्टी छोड़ें और किसी दूसरे दल में शामिल हों. इन दोनों राज्यों में टूटने वाले कांग्रेस विधायको की संख्या क़ानूनी सीमा से काफी कम थी. लिहाज़ा इसे किसी भी किस्म का समर्थन देना अनैतिक हीं नहीं गैर-कानूनी भी था. लेकिन भारतीय जनता पार्टी के कुछ उत्साही नेताओं ने न केवल इन्हें भड़काया बल्कि इन्हें अपने होटलों में ठहराया और बाद में अपनी पार्टी में शामिल किया.
शायद पार्टी के शीर्ष नेताओं में संवैधानिक मर्यादाओं के प्रति अपेक्षित निष्ठा नहीं है जिसका नतीजा यह होता है कि आरोप की आंच सीधा प्रधानमंत्री मोदी तक पहुँच जाती है. कोई भी “सक्षम” प्रधानमंत्री यह नहीं चाहेगा कि देश को नयी उंचाइयों तक ले जाने के वायदे के लिए जनता में सरकार और उसके मुखिया के प्रति एक अपेक्षित विश्वास कहीं कम हो. राज्यों में चुनी हुई कांग्रेस सरकारों को असंवैधानिकरूप से हटाने के मामले में तो मोदी को इस तर्क का भी लाभ नहीं मिल सकता कि “भारत माता की जय बोलने” या गौ मांस खाने वालों को पाकिस्तान ्भेजने के संघीय दुराग्रह से प्रधानमंत्री मजबूर हैं. फिर इस तरह के फैसले लेने का प्रयोजन भी क्या था – दो छोटे-छोटे राज्यों में छल करके सरकार बनाना? उत्तराखंड में तो वैसे भी कुछ माह में चुनाव होने वाले हैं. शायद प्रधानमंत्री को छोटी सोच वाले पार्टी व सरकार के रणनीतिकारों से बचना होगा.
फिर सुप्रीम कोर्ट के दोनों फैसलों से देश भर में जो सन्देश गया वह यह कि राज्य की गैर-भाजपा सरकारों के प्रति केंद्र का अनैतिक हीं नहीं दमनकारी और वैमंस्य्तापूर्ण रवैया है. ऐसे में “सहकारी संघवाद” (को-ऑपरेटिव फेड़ेरालिस्म) के मोदी डॉक्ट्रिन का क्या होगा? विकास के लिए राज्यों का सहयोग अपरिहार्य है. क्या मोदी के तमाम जनोपयोगी कार्यक्रमों पर उसी शिद्दत से राज्य सरकारें अमल करेंगी? क्या मोदी को यह नहीं मालूम कि केंद्र अधिकांश कार्यक्रम उदासीनता की चौखट पर दम तोड़ देंगे अगर राज्यों का साथ न मिला? पर यह ओछी हरकत क्यों?
अगले हफ्ते प्रधानमंत्री ने अंतर-राज्यीय परिषद् की बैठक बुलाई है. शायद मकसद है फिर से एक बार केंद्र –राज्य संबंधों में दुराव कम करना और विकास को आगे बढ़ने के लिए उनकी मदद मांगना जिसमें जी एस टी बिल के लिए राज्य सभा में समरथन हासिल करना भी शामिल है.
भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति के आर नारायणन ने सन २०० में गणतंत्र दिवस की स्वर्णजयंती समारोह के अवसर पर देश की संसद से राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा था “आज हमें विचार करना होगा कि संविधान ने हमें असफल किया है या हमने संविधान को”. आगे उन्होने देश के प्रथम राष्ट्रपति डर राजेंद्र प्रसाद के कथन को उधृत किया --- अगर लोग जो चुने जा रहे हैं चरित्रवान और ईमानदार व्यक्तित्व वाले सक्षम (लोग) हैं तो वे एक खराब संविधान से भी बहुत कुछ हासिल कर सकते हैं लेकिन अगर उनमें ये कमियां हैं तो एक बेहतरीन संविधान भी देश की मदद नहीं कर सकता”.
lokmat
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