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Friday, 4 March 2016

भूलभुलैय्या में फंसी देश की सामूहिक सोच




आजादी का बाद से शायद पहली बार देश में जबरदस्त कंफ्यूजन है. तीन स्पष्ट खेमे में समाज बँटा है। कुछ व्यक्ति या तो इस खेमे में है या उस। सामूहिक सोच या तो राष्ट्रवाद की नयी परिभाषा के साथ खडी है या देश को “बहुमत के आतंक” से निजात दिलाने वालों के साथ. एक लकीर खींच दी गयी है यह कहते हुए कि रेखा के उस पार तुम्हरा और इस पार हमारा. तलवारें खींची हुई हैं.  इसके बीच एक बड़ा वर्ग जो न तो “इस” के साथ है ना “उसके”. वह दाल के बढे दाम और बढ़ती महंगाई, आसमान छूती शिक्षा और स्वास्थ्य व्यय से जूझ रहा है. वह ठगा सा यह पूछ रहा है कि ७० साल की आज़ादी की यह परिणति? क्या विकास इसी को कहते हैं? कभी उसे “यह” ठीक लगता है तो कभी “वह”. लेकिन इस “यह” और “वह” के बीच में उसकी मूल समस्या का निदान कहीं नज़र नहीं आ रहा. “लव जेहाद”, “भारत विरोधी नारे” , “अवार्ड वापसी” , “राष्ट्रवाद” या “देश द्रोह” की बीच किसान आज भी पेड़ से लटक कर आत्म हत्या कर रहा है और विधायक आज भी बहला-फुसला कर लाई गरीब किशोरी का बलात्कार कर रहा है. दूसरी ओर उसी राज्य बिहार में सत्ताधारी दल का एक विधायक जन सभा में धमकी देता है कि मेरे लोगों को “कुछ” किया तो गर्दन काट दिया जाएगा. “मैं तो अपराध करके के जेल गया तो नेता बन गया और चुनाव जीत गया. मेरा तो एक पैर जेल में हीं रहता है” इस विधायक की यह घोषणा थी. इसी विधायक के मत से विधान सभा में कानून बनते हैं.    




एक ओर दिल्ली से सटे नॉएडा में घर से खींच कर सैकड़ों गाँव के हीं लोगों द्वारा “गौ मांस पकाने के शक पर अख़लाक़ मार दिया जाता है तो दूसरी ओर आगरा में विश्व हिन्दू परिषद् के कार्यकर्त्ता को मांस का व्यापार करने वाले लोगों के गुर्गों द्वारा गोली मार कर हत्या कर दी जाती है. अख़लाक़ मरता है तो बुद्धिजीवियों का एक वर्ग वैचारिक क्रांति का आह्वान करता है और अवार्ड वापस करने लगता है. जबकि स्थानीय सांसद और देश का सांस्कृतिक कार्य मंत्री घटना स्थल से ऐलान करता है कि यह सामान्य आपराधिक घटना है. आगरा की घटना पर देश का एक अन्य मंत्री जो स्थानीय सांसद भी है आग उगलता है और उस मंच से “बदला” लेने की बात कही जाती है. पूरे देश में अचानक “गौ माता” के प्रति श्रद्धा उमड़ती है. संगठन बनते है  इस “माँ” को बचने के लिए. “गौ रक्षक दल” के स्थानीय लम्पट दिया लेकर रातों में ट्रक रोकते हैं माता की रक्षा के लिए. शक के आधार पर हिमाचल प्रदेश में एक ड्राईवर का नाम पूछा जाता है और फिर यह मान कर कि यह गौ-हन्ता है, उसे दुनिया से विदा कर दिया जाता है.

      
पिछले एक साल से हर मुद्दा “वह” और “यह” के आधार पर तय हो रहा है. जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के छात्र संघ का अध्यक्ष कन्हैया कुमार “वह” है क्योंकि भारत विरोधी नारे लगने वालों के साथ मंच पर रहा. जो विधायक “वह” वर्ग के कार्यकर्ता को जमीन में गिरा कर मारता है सैकड़ों कैमरे के सामने वह यह भी कहता है “मेरे पास बन्दूक नहीं था वरना इन देशद्रोहियों को गोली मार देता”. एक वकील दिन-दहाड़े कोर्ट-रूम में घुस कर कन्हैया, मीडिया और “वह” के लोगों को मारता हीं नहीं है बल्कि जेल में घुस कर कन्हैया को जान से मारने का टीवी चैनलों के सामने ऐलान करता है वह “यह” वर्ग का है और उसे उम्मीद है कि “राष्ट्रभक्तों” का “यह” समुदाय उसे बचा लेगा और अगले दिन हीं उसे “यह” वर्ग सच में महिमा मंडित करता है. विधायक को भी उम्मीद होगी कि उसकी “राष्ट्रभक्ति” देखा कर उसे “यह वर्ग” लोक सभा का टिकट दिला देगा.  

इन सब के बीच एक मूल प्रश्न उभरता है कि क्या “वह” वर्ग का “देश द्रोह” मात्र पिछले दो साल में उभरा है और क्या “राष्ट्रप्रेम” की भावना आज क्यों अपनी अस्मिता की लड़ाई लड़ने के भाव में “दो-दो हाथ “ करने पर उतारू है? यह सब पिछले ७० साल में कहाँ था? शायद जबाव साफ़ है. तब “यह” सत्ता में नहीं था. याने “यह” वर्ग की राष्ट्रभक्ति भी तब परवान चढ़ती है जब बगल में पुलिस खडी हो या विधायक या सांसद भी “यह वर्ग” का हो. “लव जेहाद” भी इन्हें ख़तरा तब लगता है जब स्थानीय पुलिस पार्कों से लड़के –लड़कियों को भगाती है. गाय देश में ७० साल से कचरे से प्लास्टिक खा कर मर रही हैं पर “गौ माता” तब याद आती है जब एक पार्टी राज्य या केंद्र में शासन करने लगती है.

ऐसे में डर यह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का “स्वच्छ भारत” कहीं “हम के मोहल्ले में तो हो लेकिन “वह” के मोहल्ले उसे गन्दा करने पर आमादा हों. स्वच्छ भारत पाक्षिक नहीं हो सकता. यह समाज के चिंतन को बदलने का काम है. ३० प्रतिशत हम सफाई करे (हालाँकि वह भी अन्य कार्यों में व्यस्त है), ५० प्रतिशत उदासीन रहे और २० प्रतिशत इसलिए गन्दगी फैलता रहे कि यह तो “यह” का अभियान है तो मोदी समझ सकते हैं कि देश कैसे साफ़ होगा. स्किल इंडिया , स्टार्ट अप इंडिया , स्किल इंडिया अपने आप मे  बेहद अच्छे प्रयास हैं लेकिन क्या ३० प्रतिशत के भरोसे ये सफल हो पाएंगे?

उधर “वह” वर्ग अख़लाक़ के मरने पर देश में वैचारिक क्रांति का बिगुल फूंकने के लिए अवार्ड वापस करने लगता है लेकिन इनमें से एक भी भारत विरोधी नारे को गलत नहीं बताता न हीं आगरा की घटना पर वहां जा कर वी एच पी के मारे  गए कार्यकर्ता के परिवार से सहानुभूति प्रदर्शित करने के लिए दिल्ली में कैंडल मार्च करता है.  
  
इसी दौरान समाज के मानसिक भ्रमद्वन्द के बीच एक नया मामला आता है. इशरत जहाँ आतंकवादी थी या नहीं, उसका एनकाउंटर फर्जी था या नहीं अब यह प्रश्न इतना महत्वपूर्ण नहीं रहा जितना कि यह कि क्या सत्ता का खेल इतना घिनौना होता है? और अगर ऐसा है तो किस पर विश्वास किया जाये? क्या भारत में संविधान के अनुरूप काम हो रहा है ? क्या देश में कानून का शासन है? क्या ७० साल के प्रजातंत्र के बाद भी हम उसी राजशाही में हैं जिसमें “राजमहलों के षड्यंत्र” से एक राजा को मार कर दूसरा बैठा करता था फिर उसको मार कर तीसरा और प्रजा केवल एक मूकदर्शक हुआ करती थी.  


lokmat/patrika
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Monday, 22 February 2016

अभिव्यक्ति: एक बोले तो देशद्रोह, दूसरा बोले तो देशप्रेम


प्रख्यात न्यायविद फाली नारीमन ने अपने एक लेख में एक घटना का बयान किया. “कुछ साल पहले कुआलालम्पुर में अंतर्राष्ट्रीय बार एसोसिएशन के तत्वावधान में आयोजित एक कांफ्रेंस में मलेशिया के हीं एक जाने-माने रिटायर्ड जज ने देश-विदेश से आये लगभग ५०० से ज्यादा कानून के जानकारों से भरे हाल में अपनी तक़रीर की शुरुआत में कहा --- हमारे लिखित संविधान ने हमें बोलने “की” आज़ादी (फ्रीडम ऑफ़ स्पीच) दी है (तालियाँ बजीं). थोडा रुकने के बाद उन्होंने आगे कहा “लेकिन बोलने “के बाद” की आज़ादी (फ्रीडम आफ्टर स्पीच) नहीं दी है”. पूरे हाल में सन्नाटा छा गया. भारत में इस समय कुछ को बेलगाम बोलने की आज़ादी दी गयी है लेकिन कुछ का बोलना राजद्रोह बन जा रहा है.

नतीजतन सरकार का इक़बाल घट रहा है। देश में तनाव का माहौल है। जाति आरक्षण को लेकर हिंसा, गौमांस को ले कर बवाल और छात्रों में रोष इस बात की तस्दीक़ हैं।
पिछले दो हफ्ते में भारत में कुछ घटनाएँ हुई.  कई वीडियो जो साफ़ नहीं है और जिनमें अँधेरे में खींचे गए दृश्य भी हैं, सोशल मीडिया में हीं नहीं औपचारिक मीडिया –न्यूज़ चैनलों और अखबारों—रिपोर्ट किये जाते हैं. इनमें जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में भारत विरोधी नारे लगते दिखाए गए हैं. और वामपंथ से जुड़े छात्र संगठनों के युवा दिखाई दे रहे हैं. विश्वविध्यालय यूनियन का अध्यक्ष कन्हैया भी कथित रूप से इसमें शामिल है. एक हफ्ते तक पूरे भारत में “राष्ट्र भक्तों” का गुस्सा फूट पड़ता है, मीडिया दिन-रात बताता है कि देश की अखंडता पर बड़ा ख़तरा है. सरकार अभूतपूर्व तत्परता दिखाते हुए कन्हैया को गिरफ्तार कर लेती है.



लेकिन वहीं दो दिन बाद भारतीय जनता पार्टी का एक विधायक अपने आधा दर्ज़न गुर्गों के साथ एक वामपंथी कार्यकर्त्ता को पटक कर मारता है. स्थान –पटियाला कोर्ट, समय दोपहर, भीड़ की संख्या एक हज़ार, कैमरे –उत्तम क्वालिटी के प्रोफेशनल और मीडिया के. बगल में कोर्ट रूम के भीतर मीडिया कर्मी जिसमें पुरुष और महिला रिपोर्टर हैं की जमकर पिटाई होती है. पीटने वाले काले कोट में होते हैं और उनका चेहरा साफ़ नज़र आता है. उनमें से सभी वकीलों के चेहरे कैमरे में आते हैं मारते हुए. लेकिन पुलिस अगले ९६ घंटे तक कोई मुकदमा नहीं करती और जब मीडिया सस्थाएं आन्दोलनात्मक रूप लेती है तो पुलिस ऍफ़ आई आर लिखती है लेकिन वह भी अनाम लोगों के खिलाफ. इस बीच घटना के अगले दो दिन यह विधायक चैनलों के कैमरे पर घूम-घूम कर कहता है “मेरे पास बन्दूक होता तो मैं गोली मार देता. भारत के खिलाफ जो भी बोलेगा उसका ऐसा हीं हश्र होगा”. पांचवें दिन वह थाने में बुलाया जाता है कुछ घंटें पूछताछ के नाम पर बैठाया जाता है और फिर थाने से हीं जमानत मिल जाती है. एक वकील अपने फेसबुक पर फरवरी ११ से १६ तक ट्वीट करके वकीलों आह्वान करता है कि “समय आ गया है इनको सबक सिखाना का”. फिर पुलिस अभिरक्षण में लाये गए कन्हैया पर भरी भीड़ में दिनदहाड़े हमला करता है. और फिर मीडिया पर बताता है कि अगर यह सब गुंडई है तो वह गुंडा है”. पुलिस खडी नपुंसकता की पराकाष्ठा तक देखती रहती है. यह वकील इसी दौरान अपने उन फोटो का मुज़ाहरा करता है जिनमें वह भारतीय जनता पार्टी के नेता और मंत्री राजनाथ सिंह, जे पी नड्डा और विजयवर्गीय के साथ नज़र आता है. विधायक भी कुछ साल पहले तक केंद्र के एक बेहद ताकतवर मंत्री का पी ए रहा है.  बताया जाता है कि आज भी इस मंत्री के वरदहस्त के कारण पुलिस ने हाथ डालने की हिम्मत नहीं दिखाई.



याने कन्हैया पर आरोप शक के दायरे में है और एक वर्ग का कहना है वीडिओ से छेड़ छाड की गयी है। कन्हैया मन्च पर थे लिहाज़ा ज़िम्मेदारी अपराध न्याय शास्त्र के अनुसार बनती है, लेकिन चूंकि वह छात्र नेता वाम विचारधारा से जुड़ा है इसलिए देश के लिए ख़तरा लेकिन जो अपील कर के सरेआम देश को सन्देश दे रहा है कि ऐसे “भारत-विरोधियों” (यह उसकी अपनी परिभाषा है) को मारो, वह देश भक्त.



प्रश्न यह नहीं है कि कन्हैया पर राजद्रोह का मुकदमा होना चाहिए या नहीं. राज्य को जन-व्यवस्था को बिगाड़ने वाले किसी भी कुप्रयास पर अपने दंड का इस्तेमाल करना राजधर्म है लेकिन यही दंड तब कहाँ चला जाता है जब पार्टी के विधायक या नेताओं के करीबी लम्पट सरे आम उसी व्यवस्था को भंग करते हुए सुप्रीम कोर्ट द्वारा भेजे गए प्रमुख वकीलों के जांच दल के साथ गाली गलौच करते हैं? जब गौमांस खाने के शक पर गाँव के बहुसंख्यक अख़लाक़ की हत्या करने के लिए पार्टी के स्थानीय नेताओं के संरक्षण में हमला करते हैं तो देश का एक मंत्री इसे सामान्य आपराधिक घटना बताता है और एक पार्टी विधायक कहता है कि अगर एक वर्ग विशेष अपनी आदतों से बाज नहीं आयेगा तो मुजफ्फरनगर दंगे की पुनरावृत्ति की जायेगी. इस दंगे में हुए हमले में सकदों अल्पसंख्यकों को अपने घर और गाँव छोड़ कर शिविर की शरण लेनी पडी थी. आज भी वहां मुस्लिम बाहुल्य वाले गाँव उजाड़ पड़े हैं. गौमांस मुद्दे से उत्साहित लम्पट युवाओं ने देश में कम से कम एक दर्ज़न स्थानों पर ट्रकों को रोक कर ड्राइवरों का धर्म पोछ कर मार-पीट की और कुछ में हत्या तक. शायद “सब का साथ. सबका विकास” पिछले १६ महीनों के शासन में “कुछ का हाथ , कुछ के गर्दन पर” में बदल गया है.    



चीनी दार्शनिक कन्फ़्यूशियस ने कहा था: “एक अच्छे राजा को तीन चीज़ों की ज़रुरत होती है--रसद, हथियार और प्रजा का विश्वास. अगर एक ऐसी परिस्थिति उत्पन्न हो जाये कि उसे ये तीनों उपलब्ध न हो सकें और चुनाव करना हो तो उसे पहले रसद छोड़ना चाहिए, उसके बाद हथियार और आखिर में प्रजा का विश्वास.” आज इस विश्वास का संकट साफ़ दिखाई दे रहा है.



केंद्र की वर्तमान मोदी सरकार शायद यह भूल गयी है कि जनता का विश्वास इस पर से उठाता जा रहा है. उसे यह भी विश्वास हो चला है कि भारतीयता और राष्ट्रवाद के नाम पर लम्पटवाद का बोलबाला बढ़ रहा है. उधर गुंडई करने वाले विधायक या वकील को यह विश्वास ज़रूर है कि आज वह अगर दूसरे विचारधारा के लोगों को मारते है तो अगले चुनाव में उसका टिकट पक्का। इस “कु-विश्वास” का हीं प्रभाव है कि भाजपा का एक विधायक कांग्रेस के उपाध्यक्ष को चौराहे पर सजा देने की बात कहता है तो दूसरा किसानों की आत्महत्या को फैशन बताता है.



और यही वजह है कि जिस दिन देश के प्रधानमंत्री बेहद अच्छी फसल बीमा योजना का आगाज़ कर रहे दे देश की मीडिया में भाजपा के इन लम्पटों द्वारा मार-पीट की खबर छाई रही. नुकसान किसका हुआ यह मोदी, भाजपा और संघ को सोचना है.  


lokmat
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Tuesday, 16 February 2016

अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य तो ठीक पर कुतर्क से देश की हानि न करें


देश की अजीब स्थिति है. अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के मौलिक अधिकार का सटोरिये से सांसद तक, गाँव के घुरहू से घंटाघर के घनश्याम सेठ तक और चौपाल से चर्चगेट तक खुल कर इस्तेमाल हो रहा है. हर मुद्दे पर हर एक की अपनी राय है. सही राय बनाने की पहली शर्त होती है कि सम्पूर्ण तथ्यों की जानकारी न भी हो तो इतनी हो जिससे तर्क-वाक्य से निष्कर्ष तक पहुंचा जा सके, तर्क –वाक्यों को निरपेक्ष भाव से गढ़ने की बौद्धिक सलाहियत हो और सोच में दुराग्रह न हो. अगर इन सबके बगैर अपना मत बनाने लगें तो निष्कर्ष हमेशा गलत होगा. आज अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को पंख लग गए जब से सोशल मीडिया मोबाइल के जरिये सबके पास पहुँच गया और हर व्यक्ति अद्वैतवाद से अवमूल्यन तक हर टॉपिक पर अधकचरा और दुराग्रहपूर्ण राय रखने लगा. नतीजा यह कि पूरे देश में कंफ्यूजन का माहौल है. देश में शाम को टी वी चैनल स्टूडियो में चार राजनीतिक पार्टियों के तथाकथित घोषित या स्वयंभू प्रवक्ता बैठा कर “मुंहचोथौव्वल” करने लगे. ये प्रवक्ता न तो तथ्य समझते हैं न हीं सत्य के प्रति कोई प्रतिबद्धता है. उसे सिर्फ एक बात मालूम है कि अगर किसी दूसरे प्रवक्ता ने उसके नेता और पार्टी को कुछ कहा तो फेफड़े की पूरी ताकत से दूसरे पक्ष के नेता और पार्टी की लानत-मलानत करनी है. नहीं तो उसके नंबर कट जायेंगे. एडिटर-एंकर भी कभी राष्ट्रभक्ति के नए भाव में सबको चुप करते हुए अपनी बात खड़ी करता है तो कभी देश के खिलाफ मानवाधिकार का अलमबरदार बन जाता है.

जिस समाज में तर्क-शक्ति अच्छी न हो और सत्य की खोज के प्रति आदतन प्रतिबद्धता क्षीण हो उसमें जन-संवाद तूफ़ान से घिरी नाव की तरह इधर-उधर डोलता रहता है कई बार डूब भी जाता है. इसकी एक बानगी देखिये. एक चैनल पर हेडली की इशरत जहाँ को फिदायीन बताने पर चर्चा हो रही थी. जनता दल (यू) का एक प्रवक्ता का तर्क था : हेडली खुद एक आतंकवादी और अपराधी है और केंद्र सरकार उस अपराधी की बात पर इतना विश्वास कर रही है लेकिन वहीं उत्तर प्रदेश कैबिनेट के दूसरे नंबर के मंत्री आज़म खान के इस आरोप पर कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के घर पर गुप्त रूप से दाउद इब्राहिम से मिले थे, पर विश्वास नहीं कर रही है. अब इस कुतर्क का क्या कोई जवाब हो सकता है?

तर्क शास्त्र का मूल सिद्धांत है कि तर्क-वाक्य यूनिवर्स ऑफ़ डिस्कोर्स (संवाद की दुनिया) की सीमा में होना चाहिए. तर्क-सदृश्यता (लॉजिकल पैरिटी) रखने की भी कुछ शर्तें हैं. अगर क़त्ल के आरोपी से पूछा जाये कि हत्या के दिन वह मृतक के मोहल्ले में क्यों गया था तो उसका जवाब यह नहीं हो सकता क्योंकि जज साहेब उस दिन लाल कमीज़ पहने थे.  अगर मुद्दा पाकिस्तान से भारत में किये जा रहे आतंकवाद को लेकर है तो उसमें जो लोग लिप्त रहे हैं उन्हीं की गवाही ली जा सकती है उन्हीं गवाहियों पर सत्य के खोज की बुनियाद खडी की जा सकती है. इशरत जहाँ की हकीकत लखनऊ में बैठे किसी फिजिक्स के प्रोफेसर की गवाही कर के नहीं हासिल की जा सकती. फिर पिछले २५ सालों से पाकिस्तान के आई एस आई द्वारा भारत में कराई जा रही आतंकी घटनाओं पर उस संस्था के पैसे पर आतंकवाद में भूमिका अदा करने वाले ने अगर यह बात कही है (जो पहले भी कह चुका है पर तब इस पर कोई विवाद नहीं हुआ था क्योंकि यूपी ए -२ की सरकार थी ) तो अपराध न्याय शास्त्र में इसका साक्ष्य –मूल्य तो बढ़ हीं जाती है कॉमन सेंस से भी लगता है कि २५ साल से कही बात एक बार फिर पुख्ता हुई. लेकिन भारत में एक बड़ा वर्ग है तथाकथित वाम बुद्धिजीवियो का और एक वर्ग –विशेष के वोट पाने को लालायित राजनीतिक दलों का कुनबा डिनायल मोड़ में आ जाता है बगैर यह सोचे हुए कि वह जाने-अनजाने में पाकिस्तान के घिनौने कृत्य को समर्थन दे रहा है.

इस प्रवक्ता का यह कहना कि आज़म खान का प्रधानमंत्री पर दाऊद से मिलने का आरोप भी ज्यादा बड़ा सत्य है एक बीमार मानसिकता दिखता है. आज़म खान तब भी प्रदेश शासन में दूसरे नंबर के मंत्री थे जब उन्होंने कहा था कि समाजवादी पार्टी नेता मुलायम सिंह का जन्म दिन मनाने के लिए उन्हें दाऊद इब्राहिम से पैसे मिले थे. इस प्रवक्ता ने तब यह मांग नहीं की कि इसको आपराधिक कॉन्फेशन माना जाये और मुकदमा चलाया जाये. आज़म खान के दो स्टेटमेंट हैं. एक में कैमरे पर स्पष्ट कथन है और दूसरे में मात्र आरोप (जो प्रशानिक अज्ञानता का या राजनीति में हल्केपन का ध्योतक है) लगाया गया है.
लेकिन जनता दल (यू) के इस प्रवक्ता को भौंडी तार्किक सदृश्यता दे कर अपने नेता को खुश करना था.

कुतर्क की एक अन्य बानगी देखिये. एक अन्य स्टूडियो डिस्कशन में एन सी पी के एक प्रवक्ता ने कहा “मुंबई के खालसा कॉलेज के रिकॉर्ड में, जहाँ इशरत जहाँ बी एस सी की छात्रा थे, कभी भी क्लास में अनुपस्थित नहीं थी, लिहाज़ा वह आतंवादी तो हो हीं नहीं सकती फिदायीन होना तो दूर की बात है”. हम सब जानते हैं कि अपराधी यह सुनिश्चित करता है कि घटना के समय वह अपनी उपस्थिति कहीं और दिखाए. यह सामान्य एलबाई –अपराध करके बचने का एक खास किस्म का बहाना) है. फिर हेडली उर्फ़ दाऊद गिलानी से सरकारी वकील उज्जवल निकम ने पूछा “महिलाओं आतंकवादियों में किसी का नाम याद है” तो हेडली ने कहा नहीं लेकिन जब यह पूछा गया “कोई नाम जैसे नुसरत, इशरत या मुमताज़” तो उसने कहा शायद दूसरा नाम. यह बयान इतना नेचुरल था कि कोई भी इसकी विश्वसनीयता पर प्रश्न-चिन्ह नहीं लगाएगा.

एक तीसरा उदहारण देखें. एक टीवी चैनल पर जे एन यू का छात्र यूनियन का नेता बैठा था. इस विश्वविद्यालय में भारत –विरोधी और कश्मीर की आज़ादी के समर्थन में नारे लगे और वह भी यूनियन के तत्वावधान में. उस छात्र नेता से पूछा गया कि क्या वह कश्मीर की आजादी के समर्थन में भारत के टुकडे करने के पक्ष में है और क्या यह राष्ट्र-द्रोह नहीं है? उसका जवाब के रूप में प्रति-प्रशन था “कश्मीर में जनमत (प्लेबिसाईट) की बात क्या बाबा साहेब अम्बेडकर और जवाहर लाल नेहरु ने नहीं कही थी. उन पर भी राष्ट्र –द्रोह का मुकदमा चलाइये? उसने अधकचरे ज्ञान के आधार पर यह नहीं जानने की कोशिश की कि नेहरु ने हीं अपने शासन काल में चीन युद्ध के दौरान जब ऐसे हीं कुछ धुर मार्क्सवादी कम्युनिस्टों ने भारत छोड़ चीन की हिमायत करनी शुरू की तो संविधान में १६ वाँ संशोधन करते हुए अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता रोकने के लिए “भारत की संप्रभुता और अखंडता “ जोड़ा.

आज भारत की सरकार को उसी संविधान के इस प्रावधान को सख्ती से अमल में लाने की ज़रुरत है. इन गुमराह छात्रों को यह भी नहीं मालूम को भारत के टुकडे होंगे तो जे एन यू नाम की केन्द्रीय यूनिवर्सिटी भी नहीं रहेगी और नहीं इन देश के दुश्मनों की पौध खडी हो पायेगी. 
jagran
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Sunday, 14 February 2016

जे एन यू विवाद: खतरा और बड़ा है !


भारत –विरोधी और पाकिस्तान समर्थक या कश्मीर की “आजादी” के लिए जवाहर लाल यूनिवर्सिटी (जे एन यू) के कुछ छात्रों द्वारा खुले-आम लगाये गए नारे देश की अखण्डता और संप्रभुता” के लिए ख़तरनाक हैं. कश्मीर में कुछ युवाओं द्वारा राज्य के श्रीनगर या कुपवाड़ा में भारत –विरोधी नारे लगना, और देश की राजधानी दिल्ली के केन्द्रीय विश्वविध्यालय परिसर में खुले-आम  समूह बना कर ऐसे नारे लगाना--- दोनों में गुणात्मक फर्क है. पहली घटना का कारण पिछले ६८ साल से कुछ किलोमीटर दूर बैठे पाकिस्तान का नापाक मंसूबा रहा है लेकिन देश की राजधानी के प्रमुख विश्वविद्यालय में हुई घटना का गलत सन्देश देश और वैश्विक स्तर पर जाता है जिसे किसी भी संप्रभु राज्य को बर्दाश्त नहीं करना चाहिए. जे एन यू की  इस घटना ने अब यह ज़रूरी कर दिया है कि भारत “सॉफ्ट स्टेट” की अपनी छवि तत्काल ख़त्म करे खासकर आई एस आई एस सरीखे संगठनों के मंसूबों के मद्दे नज़र. अगर इसे अप्रतिम सख्ती से नहीं निपटा गया तो देश में विघटनकारी शक्तियों को बढ़ावा तो मिलेगा हीं पूरी दुनिया में सन्देश जाएगा कि भारत में राज्य शक्ति की क्षमता घटी है और संप्रभुता पर कहीं प्रश्न चिन्ह लगेगा.

प्रश्न यह नहीं है कि जो गिरफ्तार किया गया वह अपराध में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से था या नहीं. अगर नहीं था तो गिरफ्तारी का कोई कारण हीं नहीं है और इसकी खिलाफत ज़रूर हो. आज के दौर में फुटेज देखने के बाद इस तरह की गलतियों की गुंजाइश कम हीं रहती है. लेकिन हमारे देश का राजनीतिक वर्ग शायद आपराधिक रूप से जडवत या दुराग्रही हो गया है. बानगी के रूप में सी पी एम् नेता सीताराम यचूरी को वामपंथी ए आई एस ऍफ़ से सम्बद्ध छात्र यूनियन के अध्यक्ष की गिरफ्तारी में आपातकाल की याद आ गयी लेकिन इसी शिद्दत से उस घटना की निंदा करना वह भूल गए. इस छात्र यूनियन के अध्यक्ष को अपनी गिरफ्तारी के बाद “न्यायपालिका पर पूरा भरोसा” हो गया लेकिन जब देश की संप्रभुता के खिलाफ नारे लगे तो संविधान पर विश्वास नहीं जगा. न हीं यचूरी को और ना हीं इस छात्र नेता को यह याद आया कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने हीं अपने शासन काल में चीन युद्ध के दौरान जब ऐसे हीं कुछ धुर मार्क्सवादी कम्युनिस्टों ने भारत छोड़ चीन की हिमायत करनी शुरू की तो संविधान में १६ वाँ संशोधन करते हुए अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता रोकने के लिए “देश की संप्रभुता और अखंडता “ जोड़ा. आज उन संगठनों ने, जिन्होंने अखलाक के मरने पर “असहिष्णुता” के नाम पर सड़कों पर प्रदर्शन के रूप में अपनी आमद दर्ज की और कई बुद्धिजीवियों ने अपने पुरस्कार लौटाए, क्या एक बार भी कहा कि राज्य को असली “असहिष्णुता” और “जीरो टॉलरेंस “ अब दिखानी चाहिए? 

आज भारत की सरकार को उसी संविधान के प्रावधान को सख्ती से अमल में लाने की ज़रुरत है. इन गुमराह छात्रों को यह भी नहीं मालूम को भारत के टुकडे होंगे तो जे एन यू नाम की केन्द्रीय यूनिवर्सिटी भी नहीं रहेगी और नहीं इन देश के दुश्मनों की पौध खडी हो पायेगी. 

भारत जैसे द्वान्द्दत्मक प्रजातंत्र में हम सरकार की खिलाफत किसी हद तक (संविधान की सीमा में रहते हुए) कर सकते हैं. पर संप्रभुता को चुनौती नहीं दे सकते ना हीं उस अखंडता को जो हमारे संविधान की उद्देशिका का मूल है.

भारत के संविधान की उद्देशिका में प्रारंभ में हीं लिखा है “हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व संपन्न समाजवादी पंथ निरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए... एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं”. अर्थात भारत की एकता और संप्रभुता अक्षुण्ण है”. साथ हीं इस अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के मौलिक अधिकार (अनुच्छेद १९ (१) को बाधित करने वाले आठ युक्तियुक्त निर्बंध (अनुच्छेद १९ (२) में एक है “भारत की संप्रभुता और अखण्डता के हितों में”. अर्थात इस छात्रों ने जो कुछ किया वह देश के साथ संभवतः सबसे बड़ा अपराध है. ये छात्र गुमराह नहीं है और तथाकथित रूप से “पढ़े –लिखे” वर्ग में आते हैं (परास्नातक और पी एच डी के छात्र थे) और जो कुकृत्य इन्होने किया वह होशो-हवाश में किया. भारत को तोड़ने की कोई भी अभिव्यक्ति अशोचनीय और अकल्पनीय है.

लिहाज़ा “राज्य अगर इसे प्रभावी रूप से हमेशा-हमेशा के लिए ख़त्म करने के लिए जो भी कदम उठाये वह उचित होगा, इसलिए नहीं कि इन मुट्ठी भर छात्रों का कृत्य संविधान सम्मत नहीं है बल्कि इसलिए कि आई एस आई एस भारत में युवाओं को गुमराह करने का जबरदस्त कुचक्र शुरू कर चुका है और राज्य की तरफ से किसी किस्म की ढिलाई से एक वर्ग –विशेष के कुछ गुमराह युवाओं को एक बौद्धिक वैधानिकता का सन्देश जा सकता है और वे यह सोच सकते हैं  कि जब आम छात्र भी भारत की अखंडता के खिलाफ हीं नहीं पाकिस्तान और कश्मीर के समर्थन में नारे लगा कर आराम से रह सकते हैं तो हम भी यह सब कुछ कर सकते हैं जो आई एस चाहता है.  और आई एस चाहता क्या है --- भारत और अन्य देशों में “खालिफा शासन” स्थापित करना.

देश या समाज के जीवन काल में ऐसे क्षण आते हैं जब उन्मुक्तता और उसकी सीमाओं में एक द्वन्द होता है. उन्मुक्तता, समय के साथ समाज के सोच की उत्कृष्टा को देखते हुए बढ़ायी जा सकती है लेकिन उसकी भी एक शाश्वत शर्त है और वह है --- देश की सम्प्रभ्ता अक्षुण्ण बनाये रखने की. अगर देश टूट गया तो न तो संविधान रहेगा, न हीं अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य. और तब हम फिसल कर एक आदिम युग में जा चुके होंगे. पाकिस्तान, सीरिया और विश्व के तमाम अन्य मुल्क इसके गवाह हैं. 
 
nai duniya
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Wednesday, 10 February 2016

मोदी की कृषि योजनाएं - एक सार्थक प्रयास



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योजनाओं को समग्रता में देखने की ज़रुरत
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किसी भी देश में समग्र विकास के लिए अच्छी नीति और योजनाएं तब सफल होती हैं जब वे दिक्- व काल सापेक्ष हों और उन पर अमल करने में राज्य अभिकरण अपनी पूरी प्रतिबद्धता दिखाए. भारत में इस प्रतिबद्दता के आड़े एक तो भ्रष्टाचार आता है और दूसरा लाभार्थियों को लेकर सही पहचान के लिए विश्वसनीय दस्तावेजों का अभाव. संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यू एन डी पी) ने दो सप्ताह पहले अपने आंकलन में बताया कि रोजगार गारंटी की विश्व भर में जारी योजनाओं में मनरेगा , जो सन २००६ में यू पी ए-२ शासन काल में शुरू की गयी थी, सबसे बेहतरीन है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सत्ता में आने के साथ इस योजना को "यूपीए सरकार की यादगार असफलता " बताया था लेकिन अब इसके तारीफ़ में क़सीदे काढ़ रही है। मोदी की इस माह चार राज्यों मे होने वाली किसान रैलियाँ मनरेगा और नयी फ़सल बीमा योजना को ले कर होगी।  इस योजना का अगर कोई कमी थी तो वह यह कि कार्यक्रम में राज्य सरकारों के तंत्र में इच्छा –शक्ति का अभाव था और अमल के स्तर पर यह कुछ हद तक भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ता रहा. सालों पहले मरे हुए व्यक्ति के नाम पर काम दिखा कर राज्य अभिकरणों के भ्रष्ट कर्मचारियों ने पैसा हड़प लिया.

मोदी सरकार की नयी योजनाओं का अगर निरपेक्ष आंकलन किया जाये तो पाएंगे कि कोई आधा दर्ज़न नयी योजनाओं, जिसमें पुरानी योजनाओं का विस्तार भी है, एक दूसरे की पूरक हैं. साथ हीं तकनीकी के सामाजिक स्तर पर फैलाव व प्रयोग के कारण भ्रष्टाचार पर भी काफी हद तक अंकुश लग सकता है. लगभग २० करोड बैंक खाते खुलवाना, यूरिया पर नीम की परत चढाने से इसे नाइट्रोजन-आधारित उद्यमों के गैर –वाजिब इस्तेमाल से रोकना ताकि इस मद की सब्सिडी का लाभ सिर्फ किसानों को हीं मिले, मृदा –स्वास्थ्य कार्ड का अभियान ताकि किसान जरूरत के मुताबिक हीं नाइट्रोजन, फास्फेट और पोटाश का प्रयोग करे, नयी फसल बीमा योजना जिसमें पहले की तीन योजनाओं की अधिकांश कमियों को दूर किया गया है यह सब उसी व्यापक कृषि नीति पर सरकार के वैज्ञानिक, तार्किक और क्रियात्मक सोच का परिणाम है. इनमें से कोई भी कड़ी हटा ली जाये तो हर योजना अमल की दहलीज़ पर दम तोडती दिखाई देगी.

इनमें से कोई भी योजना ऐसी नहीं है जिसको बनाने में राकेट साइंस के ज्ञान की ज़रूरत है. अगर जरूरत है तो समस्या के सही समझ की और उसे दूर करने की इच्छा –शक्ति की. यह इसी इच्छा –शक्ति का प्रतीक था कि बैंकों के तमाम ना-नुकुर करने की बावजूद प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी के दबाव के चलते घुरहू-पतवारू के खाते खुले. इसका लाभ उस समय तो नहीं समझ में आया पर अब जब अन्य योजनाओं का लाभ सीधे इनका खाते में पहुंचेगा राज्य के भ्रष्ट अभिकरणों को धता बताते हुए तब समझा जा सकता है कि “डायरेक्ट कैश  बेनिफिट” (नकद धन लाभ) क्या है.

फौरी तौर पर और अलग-अलग देखने पर “स्किल इंडिया”, “मेक इन इंडिया” और “स्टार्ट उप इंडिया” समझ में नहीं आ सकता. इन्हें समग्रता में और समेकित करके देखना होगा. एक ओर ग्रामीण बेरोजगार युवाओं के लिए यह वरदान हो सकता है वहीं नए उद्यमियों के लिए यह जबरदस्त उत्प्रेरक भी होगा. इसमें कोई दो राय नहीं है कि ३६५ व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर के आबादी घनत्व वाले भारत में कृषि से युवाओं को निकलना सबसे जरूरी कार्य है. अगर वे निकल कर अन्य रोजगार में लगें तो कृषि पर दबाव कम होगा निवेश ज्यादा होगा और कृषि का अपेक्षित किफायती मशीनीकरण सार्थक होगा. किसानों के जेब में ज्यादा पैसा होगा तो खपत बढ़ेगी और उद्योग बढेंगे. लेकिन जब हम पाते हैं कि देश में ३२ प्रतिशत स्किल्ड (प्रशिक्षित ) ड्राइवरों की कमी है जिससे वाहनों में ईंधन अधिक लगता है और दुर्घटनाएँ होती हैं तो समस्या का अहसास होता है. एक तरफ बेरोजगारी और दूसरी तरह ड्राइवरों का टोटा. अजीब विरोधाभास. आपके घर में जो बिजली ठीक करने इलेक्ट्रीशियन आता है उसे सही पेंचकश घुमाना नहीं आता (हर एक पेंच के लिए एक खास साइज़ का स्क्रू ड्राइवर चाहिए और वह भी एक खास कोण पर निश्चित बल की ज़रुरत होती है) लिहाज़ा गलत पेंच घुमाने से खांचे कट जाते हैं और पूरा उपकरण दो-चार बार में खराब हो जाता है. अगर इन ग्रामीण युवाओं को स्किल इंडिया के तहत गाँव से कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्किल (दक्षता) की ट्रेनिंग मिले और फिर ये “स्टार्ट अप इंडिया” कार्यक्रम के तहत नए उद्यमियों के छोटे-छोटे उद्यमों से लेकर “मेक इन इंडिया” के बड़े उद्योगों में नियोजित हों तो क्या यह क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं लायेगा? दुनिया की सभी अर्थ-व्यवस्थाओं में विकास के विभिन्न स्तर पर योजनाएं बनती हैं. भारत की समस्या हीं ग्रामीण युवाओं को कृषि से बाहर निकल कर उन्हें उद्योगों में नियोजित करने की योग्यता/दक्षता मुहैया कराने की हैं.    

बात सिर्फ सत्ता में बैठ कर सही सोचने की है. देश में पिछले ३० सालों से किसान कृषि शिक्षा के अभाव में पागलपन की हद तक यूरिया (नाइट्रोजन) का इस्तेमाल करता रहा है. नतीज़तन जमीन का पी एच (हाइड्रोजन आयन कंसंट्रेशन) बदलता रहा है और उर्वरता घटती रही है. ७० साल पुराने कृषि विस्तार अभिकरण जैसे खंड विकास कार्यालय किसानों को यह नहीं बता पाए. उनकी नज़र किसानों के दिए जाने वाले फण्ड पर हीं रही. नतीजा यह रहा कि सन १९७० तक जहाँ भारत में प्रति हेक्टेयर १२ क्विंटल गेहूं पैदा होता था वहीं चीन में १० क्विंटल जबकि आज भारत में ३२ क्विंटल गेहूं होता है और चीन में ६० क्विंटल. मृदा स्वास्थ्य कार्ड बनाने के साथ हीं केंद्र सरकार सस्ती किटें बनवा रही है ताकि हर फसल के पहले किसान को यह जानकारी मिल सके कि रासायनिक खादों में से कौन सा और कितना इस्तेमाल करना है. सहीं फसल बोने की जानकारी न होने और कमज़ोर फसलों को लेकर सर्व-स्वीकार्य फसल बीमा के अभाव का नतीजा यह रहा कि देश में दलहन का रकबा घटता रहा , उत्पादन कम होता रहा. सन १९७० में जहाँ भारत में प्रति-व्यक्ति दाल की उपलब्धता ६४ ग्राम थी आज ३६ ग्राम है. दाल गरीबों के लिए प्रोटीन का एक मात्र सस्ता साधन था लेकिन वह २०० रुपये प्रति किलो से ऊपर जा ठहरा.

दरअसल इन कार्यक्रमों से तो यह साफ़ झलकता है कि देश की वर्तमान सरकार को समस्याओं की सही पकड़ है, उनका हल निकालने की लगन और सलाहियत भी है और उन्हें अमल में लाने की क्षमता भी है. परन्तु तीन दुश्वारियां अभी भी हैं. अर्ध-संघीय संवैधानिक ढांचे की वजह से राज्य की सरकारें केंद्र की योजनाओं को सफल बनाकर वोट लेने के बजाय उन्हें असफल कर केंद्र में बैठी सरकार का वोट कम करने की नीति अपनाती हैं. यू पी ए -२ के साथ भी यही हुआ और आज भी यही हो रहा है. राज्य सरकारों का तंत्र भी शासकीय प्रतिबद्धता न होने से खुले आम भ्रष्टाचार करता है और स्कीमें असफल हो जाती हैं. रेवेन्यु रिकॉर्ड राज्य सरकारें ठीक नहीं कर रहीं हैं लिहाज़ा जिस फसल बीमा का लाभ बटाईदार को मिलना चाहिए वह नॉएडा और दिल्ली में ए सी कमरे में बैठे जमीन के मालिक को मिल जाता है. मोदी सरकार ने इस का समाधान कुछ हद तक ड्रोन और स्मार्ट फ़ोन का इस्तेमाल करने की योजना बना कर किया है.

केंद्र की वर्तमान योजनाएं तभी सफल होंगी जब सामाजिक स्तर पर जनता की सकारात्मक सोच हो. लेकिन हर तीसरे दिन अगर कोई एक या दूसरा भावनात्मक मुद्दा देश के जन-संवाद के धरातल पर छाया रहेगा तो सामूहिक सोच सार्थक और विकासपरक नही हो सकेगी. यही कारण है कि नयी क्रांतिकारी फसल बीमा योजना जन संवाद के धरातल पर आयी हीं नहीं जबकि रोहित वेमुरी की आत्महत्या एक सप्ताह तक देश के चेतना को झकझोरता रहा.


lokmat
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Friday, 5 February 2016

और उसने फांसी लगा ली, क़ानून देखता रहा


किसे दोष दे? बलात्कारी डॉक्टर और सिपाहियों को, कानून को , पुलिस को, न्यायपालिका को या फिर सारी व्यवस्था को. और अंत में समाज को. मनोविज्ञान में आत्महत्या एक मानसिक बीमारी है. पर अगर एक ऐसी स्थिति अपरिहार्य है जिसमें लड़ाई लड़ने पर हारना हीं है, जिसमें तिल –तिल कर अपमानित जीवन केवल खुद ताउम्र नहीं जीना है बल्कि पूरे परिवार को भी वह जीवन जीने के लिए मजबूर होना है, तो विकल्प क्या है?

यह सुसाइड नोट पीडित छात्रा ने अदालती कारवाई चलने के एक साल बाद (जब पुलिस फिर उसके घर सम्मन लेकर पहुँची) खुद पंखे से लटक कर जान देने के पहले लिखा. मामला जून , २०१४ का है जब छात्रा अपने चेहरे के इलाज के लिए भिलाई –स्थिति लाल बहादुर शास्त्री अस्पताल गयी थी. आरोप है कि नशे का इंजेक्शन दे कर उसके साथ पहले डॉक्टर ने और फिर वहां तैनात दो सिपाहियों ने बलात्कार किया. और तब से लगातार अगले छः माह तक उससे विवस्त्र फोटो को सार्वजनिक करने के खौफ दिखा कर ये तीनों बलात्कार करते रहे. छात्रा का बाप किसी संस्थान में गार्ड के रूप हाल हीं में में सेवा-निवृत हुआ है. दो कमरे के किराये के मकान में यह परिवार रहता है. जब बालिका को यह सब बर्दाश्त नहीं हुआ तो अपने परिवार को बताया.  छात्रा के भाई के अनुसार थाने में पीडिता को मार गया लेकिन जब मामला दबाना मुश्किल हो गया तो येनकेन प्रकारेण ऍफ़ आई आर लिखी गयी. चूंकि मामला और तूल पकड़ गया लिहाज़ा पुलिस ने डॉक्टर और दोनों सिपाहियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा और अदालत ने भी जमानत नहीं दी. एक साल की पेशी के दौरान हर तारीख पर छात्रा और उसका भाई मौजूद रहे लेकिन जब मरने की बाद अदालत का रिकॉर्ड देखा गया तो ये हमेशा अनुपस्थित दिखाए गए.

यहाँ यह नहीं देखा गया कि अदालत, कानून, पुलिस की औपचारिकता के बीच कुछ अनौपचारिक भी होता है. वह है पैसे और ताकत का खौफ. पुलिस लगातार इस परिवार को धमकाती रही. लेकिन इसकी कोई लिखा –पढी नहीं होती. उसे वैश्या कह कर कह सरे आम अपमानित करती रही अदालत में भी और मोहल्ले में भी. इसकी भी कोई सनद नहीं होती. पीड़ित व्यक्ति अदालत में है लेकिन फ़ाइल में लिखा जा रहा है कि वे अनुपस्थित हैं. एक दिन इसी आधार पर “दूध-पानी “ (नीर-क्षीर) विवेक का इस्तेमाल करते हुए अदालत या तो आरोपियों को छोड़ देती या नाराज़ हो कर पीडिता को गैर-जमानती वारंट जारी करती हुए पुलिस से पकड़वायेगी. कोई ताज्जुब नहीं कि पुलिस रास्ते में फिर वही करती जो पहले उसके साथ हो चुका था. पीडिता इन सब का कोई सबूत नहीं दे पाती. चूंकि अदालत सबूत के बिना कुछ नहीं करती लिहाज़ा पीडिता हीं अंत में “पानी” ले कर आ जाती दूध आरोपियों के हाथ लगता. सिस्टम यथावत चलता रहता और डॉक्टर और सिपाही किसी और मरीज पर यही नुस्खा आज़माते.    
    
और किसी भी संभ्रांत बौद्धिकता वाले व्यक्ति की तरह राज्य के मुख्यमंन्त्री ने इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए मनोवैज्ञानिक व्याख्या का हीं सहारा लिया. उनका भी कहना था “लगता है वह बालिका मानसिक अंतर्द्वंद में थी वर्ना पुलिस ने आरोपियों को बंद कर दिया. वे जेल में हैं. मामला अदालत के विचाराधीन है”. याने पीडिता को सिस्टम पर भरोसा रखना चाहिए वैसे हीं जैसे नक्सालियों के शिकार लोग पीढी दर पीढी रखते हैं. और नक्सली रक्त बीज की तरह बढ़ते जाते हैं.  

तकनीकी रूप से देखें तो सब ने अपना काम किया भले हीं देर से. पुलिस ने ऍफ़ आई आर लिखा. आरोपियों को जिनमें दो सिपाही भी थे, गिरफ्तार भी किया. अदालत ने भी अपना काम किया उनकी जमानत की अर्जी ख़ारिज कर जेल में रखते हुए. कानून और सिस्टम तो इतना हीं कर सकता है. पर अगर साथ के सिपाही उसे रास्ते में “वेश्या” कहते है या मोहल्ले में इस बात को अन्य को बताते हैं ताकि पूरा मोहल्ला सिपाहियों पर विश्वास करते हुए उसे वैश्या मान ले तो इसमें कानून क्या करेगा? अगर जेल से या जेल के बाहर आरोपियों के गुर्गों द्वारा मोबाइल पर धमकी मिल रही है तो इसमें कौन सा गुनाह एक कमजोर परिवार लगा सकता है?  

कितना सहज है संप्रभु सत्ता की गोद में पूर्ण सुरक्षा का कवच पहने कमजोरों के लिए काल बने सिस्टम पर भरोसा रखने की ताकीद करना. यह नहीं देखा गया कि किसी थानेदार का पहले उस पीडिता से मार-पीट करना, फिर बमुश्किल तमाम ऍफ़ आई आर लिखना फिर हर तीसरे दिन आरोपियों से मिलकर पीडिता को पुलिस द्वारा धमकाना, उसके पेशी के दिन अदालत जाने पर उसे “वैश्या” कहना. सबने नज़रंदाज़ किया कि आरोपी भले हीं जेल में हों, उनके गुर्गे जिनमें पुलिस भी थी किस तरह से उसे पिछले एक साल से केस वापस लेने के लिए धमकाते रहे. ये तथ्य जो छात्रा ने सुसाइड नोट में लिखा है सत्ता में बैठे लोगों के लिए गौण हो जाता है अगर वे खूबसूरती से यह स्थापित कर सकें कि “पीडिता मानसिक अंतर्द्वंद की शिकार थी” याने मेंटल केस थी. सत्ता के प्रतिनिधियों का सीधा जवाब है “पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार किया, याने कानून ने अपना काम किया, न्यायपालिका में केस सुना जा रहा है. अंत में “दूध का दूध” वाला जुमला फेंकते हुए सत्ता उस दूध से मलाई निकालने लगता है.            

सुसाइड नोट में बी एस सी की इस छात्रा ने मौत को गले लगने के पहले लिखा था “ मम्मी, पापा, मुझे माफ़ करना. मुझे न्याय नहीं मिलेगा और आगे जिन्दगी जीना मुश्किल होगा. अगर मैं मर गयी तो आगे कोई भी हमें वैश्या नहीं कहेगा......... मैं जब भी तारीख पर अदालत जाती थी मुझसे कहा जाता था कि मजिस्ट्रेट साहेब नहीं हैं. मुझे न्याय प्रणाली पर भरोसा नहीं है”.  

पूरा केस देखने पर साफ़ दिखाई देता है कि भारतीय अपराध न्याय-शास्त्र में जबरदस्त कमियां हैं जो पीड़ित की अनौपचैरिक (साक्ष्य-विहीन) प्रताड़ना या उसका भय संज्ञान में नहीं लेता क्योंकि न्याय की देवी के आँखों पर पट्टी है. वह यह भी नहीं देख पाती कि कोर्ट क्लर्क हाज़िर को गैर-हाज़िर बना देता है.
    
lokmat
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Sunday, 31 January 2016

क्यों नहीं मिटता भारत से भ्रष्टाचार !

हर साल की तरह इस साल भी २७ जनवरी को ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट आयी. भ्रष्टाचार के वैश्विक पैमाने पर भारत अंकों के आधार पर वहीं खड़ा है. पिछले हफ्ते ऑक्सफैम सहित दुनिया की तीन आर्थिक विश्लेषण संस्थाओं ने बताया कि भारत में  विगत २५ सालों में गरीब –अमीर की खाई खतरनाक रूप से बढ़ती जा रही है. गरीब और गरीब होता जा रहा है और अमीर और अमीर. विश्वास नहीं होता कि बापू के देश में यह सब कैसे. हमने तो बापू के सम्मान में अपने नोटों पर उनकी तस्वीर भी छापी फिर आखिर क्या वजह है कि वे नोट भ्रष्टाचार के रास्ते धन-पशुओं की तरफ जाते रहे. हमने कानून बनाये. हमने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सरकारें गिरायीं और सरकारें बनायी. अन्ना ने आन्दोलन किया. पूरा देश उससे प्रभावित होकर कई दिन अनशन –स्थल पर गया या अपने-अपने जिलों में जलूस निकाला. यहाँ तक कि भ्रष्ट लोग भी आन्दोलन में नज़र आये. लगा कि देश की सामूहिक चेतना में गुणात्मक परिवर्तन हो गया और अब भ्रष्टाचार आखिरी सांस लेगा.
 
लेकिन ताज़ा खबर के मुताबिक देश की सेना के दो मेजर –जनरल के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति को लेकर सी बी आई जांच के आदेश दिए गए हैं. यह भी खबर है कि सेना में प्रमोशन के लिए घूस देने की आशंका है. इसके पहले दो लेफ्टिनेंट –जनरल के खिलाफ भी कुछ ऐसा हीं मामला चला था. प्रधानमंत्री ने हाल में अधिकारियों की मीटिंग में कस्टम्स और उत्पाद कर विभाग में भ्रष्टाचार को लेकर सख्त ताकीद की. याने देश के राजस्व को चुना लगाया जा रहा है. कहने की जरूरत नहीं कि अगर सेना के शीर्ष अधिकारियों को भी यह बीमारी है तो हम कितने महफूज़ रह सकते हैं. अगर देश की सर्वोच्च अफसरशाही –आई ए एस – जिसे सिस्टम पलक –पांवड़े बिछा कर ताउम्र “माई-बाप” मानता है--- भी कफनचोर निकले तो समाज की चिंता बचैनी में बदल जाती है. मीडिया के खिलाफ आरोप आम जन की जुबान पर लगातार रहा है. हाई कोर्ट तो छोडिये सुप्रीम कोर्ट के कुछ मुख्य न्यायाधीशों भी इस आंच से नहीं बचे. हाई कोर्ट के एक मुख्य न्यायाधीश ने सुप्रीम कोर्ट के एक जज पर अपनी बहन को जज बनाने का दबाव डालने का आरोप लगाया और भारत के मुख्य न्यायाधीश को भेजा गया अपना शिकायत पत्र मीडिया को दे कर सार्वजनिक किया. कुल मिलकर प्रजातंत्र की तीनों औपचारिक संस्थाएं और चौथी अनौपचारिकसंस्था –मीडिया—सभी हम्माम में दिखे.
 
आखिर जाता क्यों नहीं हमारे देश से यह रोग. ट्रांस्पैरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट के अनुसार हमेशा क्यों पूरा यूरोप इस बीमारी से लगभग अछूता है. अमरीका में भी यह आम जन को प्रभावित नहीं करता. अगर सम्पन्नता इसका कारण है तो हमने पिछले २५ सालों में जबरदस्त छलांग लगाई है सकल घरेलू उत्पाद में. और ५० वें नंबर से नवें नंबर पर आ गए हैं. यह अलग बात है कि मानव विकास सूचकांक पर हम इस दौरान वहीं के वहीं रहे.
 
सोशल मीडिया में एक फोटो वाइरल हुआ जिसमें इजराइल के प्रधानमंत्री और उनकी पत्नी अपने बेटे को सेना में भर्ती होने पर भाव-भीनी बिदाई दे रहे थे. कभी भारत के किसी बड़े नेता के बेटे को आपने सेना में भर्ती होते सुना है. वह भी देश की सेवा करता है पर पार्टी का टिकट लेकर या पिछले दरवाजे से राज्य सभा में आ कर या फिर पिता के नाम पर चुनाव जीतकर और अगर पिता या पति ज्यादा दमदार हुआ तो मुख्यमंत्री या उप-मुख्य मंत्री बन कर. एक अन्य चित्र भी वाइरल हुआ जिसमें स्वीडेन के प्रधानमंत्री बस में टिकट लेकर संसद के गेट पर उतरते हुए. भारत में क्या यह संभव है?
 
लेकिन नेता का आचरण व्याधि का कारण नहीं अभिव्यक्ति है. अगर लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव के माध्यम से हम अपने रहनुमा चुनते हैं तो दोष हमारा है. अगर कानून है पर काम नहीं कर रहा है, अगर अफसर और सेना में भी यह भ्रष्टाचार व्याप्त है तो शायद हमने अच्छे इंसान पैदा करने बंद कर दिए हैं. लोकपाल (याने एक और संस्था)  इस का इलाज़ नहीं है. इस दुनिया में तीन करोड तीस लाख कानून हैं. परन्तु हत्या , बलात्कार और भ्रष्टाचार के आंकड़े बढ़ते गए.
 
दरअसल भ्रष्टाचार नैतिकता और मूल्यों से जुड़ा प्रश्न है और इसका समाधान कानून और औपचारिक संस्थाओं में ढूढना हीं गलत है. समाज के इकाई के रूप में व्यक्ति कानून के डर से नहीं अपने स्वयं के डर से नैतिक बनता है. और व्यक्ति को नैतिक बनाने वाली संस्थाएं कानून या कोर्ट नहीं होतीं. व्यक्ति नैतिक बनाता है माँ की गोद में, स्कूल में अपने अध्यापक के आचरण को देख कर. पडोसी के बच्चे को देख कर. पास के लोगों के नैतिकता के प्रति निष्ठा और प्रतिबद्धता को देख कर. अपने प्रतिमानों को देख कर. दुर्भाग्यवश हमने प्रतिमान बनाने बंद कर दिए और अगर बनाये भी तो बाजारी ताकतों की वजह से गलत प्रतिमान. सब्जी बेचने वाले की बेटी देश की सबसे कठिन आई आई टी की प्रवेश परीक्षा में पास करती है लेकिन वह आइकॉन नहीं बनती परन्तु “डांस इंडिया डांस” में प्रथम आने वाला लड़का देश के शहरों में घुमाया जाता है और जनता उसे देखने के लिए टूट पड़ती है.      
      
अगर हम आत्ममुग्ध होने के लिए “गिलास आधा भरा है” भाव से देखना चाहें तो कह सकते हैं कि भ्रष्टाचार पिछले एक साल में  बढा नहीं. हम यह भी कह सकते हैं कि पाकिस्तान तो छोडिये चीन भी हमसे बदतर है. पर यह “सुतुर्मुर्गी भाव” उस समय टूट जाता है जब रिपोर्ट यह कहता है कि कि पाकिस्तान पिछले एक साल में अंकों के आधार पर बेहतर हुआ है यानी भ्रष्टाचार कम हुआ है. चीन के विकास के अन्य हमें हमेशा शर्मिंदा करते रहे है.
 
एक गैर सरकारी संस्थान ने कुछ माह पहले अपने अध्ययन में पाया कि एक औसत ग्रामीण
राशन,स्वास्थ्य,शिक्षा और जलापूर्ति जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए औसतन
164
रुपए घूस हर साल देता है। यानि हर एक ग्रामीण परिवार से लगभग एक हजार
रुपए सालाना। अध्ययन में ये भी पता लगा कि सबसे ज्यादा घूस बगैर कागज़ के
फर्ज़ी बी.पी.एल कार्ड बनाने के मद में जा रहा है,लगभग 800 रुपया। लेकिन यह वह भ्रष्टाचार नहीं जो देश को खा रहा है. असल भ्रष्टाचार गरीब या विकास के नाम पर बहने वाले फण्ड को लेकर है जो हमारी बजट का बड़ा हिस्सा है. इसी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक तीखी टिप्पड़ी में सरकारी वकील से पूंछा था “क्या नौकरशाहों को मसूरी(जहां आई.ए.एस प्रोवेशनर्स की ट्रेनिंग होती है)में दिए जाने वाले प्रशिक्षण में यह भी शामिल होता है कि भ्रष्टाचार पर कैसे लीपापोती करें और कैसे अपने साथी को बचाएं ?  
एक ग्रीक कहावत है- “फिश राट्स फ्राम द हेड फर्स्ट” यानि  मछली पहले सिर से सड़ना शुरू होती है। भारत का तंत्र भी शीर्ष से सड़ना शुरू कर रहा है। मुश्किल ये है कि हम इसमें पूंछ के पास सड़ांध महक रहे हैं।
 
lokmat
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