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Sunday, 14 February 2016

जे एन यू विवाद: खतरा और बड़ा है !


भारत –विरोधी और पाकिस्तान समर्थक या कश्मीर की “आजादी” के लिए जवाहर लाल यूनिवर्सिटी (जे एन यू) के कुछ छात्रों द्वारा खुले-आम लगाये गए नारे देश की अखण्डता और संप्रभुता” के लिए ख़तरनाक हैं. कश्मीर में कुछ युवाओं द्वारा राज्य के श्रीनगर या कुपवाड़ा में भारत –विरोधी नारे लगना, और देश की राजधानी दिल्ली के केन्द्रीय विश्वविध्यालय परिसर में खुले-आम  समूह बना कर ऐसे नारे लगाना--- दोनों में गुणात्मक फर्क है. पहली घटना का कारण पिछले ६८ साल से कुछ किलोमीटर दूर बैठे पाकिस्तान का नापाक मंसूबा रहा है लेकिन देश की राजधानी के प्रमुख विश्वविद्यालय में हुई घटना का गलत सन्देश देश और वैश्विक स्तर पर जाता है जिसे किसी भी संप्रभु राज्य को बर्दाश्त नहीं करना चाहिए. जे एन यू की  इस घटना ने अब यह ज़रूरी कर दिया है कि भारत “सॉफ्ट स्टेट” की अपनी छवि तत्काल ख़त्म करे खासकर आई एस आई एस सरीखे संगठनों के मंसूबों के मद्दे नज़र. अगर इसे अप्रतिम सख्ती से नहीं निपटा गया तो देश में विघटनकारी शक्तियों को बढ़ावा तो मिलेगा हीं पूरी दुनिया में सन्देश जाएगा कि भारत में राज्य शक्ति की क्षमता घटी है और संप्रभुता पर कहीं प्रश्न चिन्ह लगेगा.

प्रश्न यह नहीं है कि जो गिरफ्तार किया गया वह अपराध में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से था या नहीं. अगर नहीं था तो गिरफ्तारी का कोई कारण हीं नहीं है और इसकी खिलाफत ज़रूर हो. आज के दौर में फुटेज देखने के बाद इस तरह की गलतियों की गुंजाइश कम हीं रहती है. लेकिन हमारे देश का राजनीतिक वर्ग शायद आपराधिक रूप से जडवत या दुराग्रही हो गया है. बानगी के रूप में सी पी एम् नेता सीताराम यचूरी को वामपंथी ए आई एस ऍफ़ से सम्बद्ध छात्र यूनियन के अध्यक्ष की गिरफ्तारी में आपातकाल की याद आ गयी लेकिन इसी शिद्दत से उस घटना की निंदा करना वह भूल गए. इस छात्र यूनियन के अध्यक्ष को अपनी गिरफ्तारी के बाद “न्यायपालिका पर पूरा भरोसा” हो गया लेकिन जब देश की संप्रभुता के खिलाफ नारे लगे तो संविधान पर विश्वास नहीं जगा. न हीं यचूरी को और ना हीं इस छात्र नेता को यह याद आया कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने हीं अपने शासन काल में चीन युद्ध के दौरान जब ऐसे हीं कुछ धुर मार्क्सवादी कम्युनिस्टों ने भारत छोड़ चीन की हिमायत करनी शुरू की तो संविधान में १६ वाँ संशोधन करते हुए अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता रोकने के लिए “देश की संप्रभुता और अखंडता “ जोड़ा. आज उन संगठनों ने, जिन्होंने अखलाक के मरने पर “असहिष्णुता” के नाम पर सड़कों पर प्रदर्शन के रूप में अपनी आमद दर्ज की और कई बुद्धिजीवियों ने अपने पुरस्कार लौटाए, क्या एक बार भी कहा कि राज्य को असली “असहिष्णुता” और “जीरो टॉलरेंस “ अब दिखानी चाहिए? 

आज भारत की सरकार को उसी संविधान के प्रावधान को सख्ती से अमल में लाने की ज़रुरत है. इन गुमराह छात्रों को यह भी नहीं मालूम को भारत के टुकडे होंगे तो जे एन यू नाम की केन्द्रीय यूनिवर्सिटी भी नहीं रहेगी और नहीं इन देश के दुश्मनों की पौध खडी हो पायेगी. 

भारत जैसे द्वान्द्दत्मक प्रजातंत्र में हम सरकार की खिलाफत किसी हद तक (संविधान की सीमा में रहते हुए) कर सकते हैं. पर संप्रभुता को चुनौती नहीं दे सकते ना हीं उस अखंडता को जो हमारे संविधान की उद्देशिका का मूल है.

भारत के संविधान की उद्देशिका में प्रारंभ में हीं लिखा है “हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व संपन्न समाजवादी पंथ निरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए... एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं”. अर्थात भारत की एकता और संप्रभुता अक्षुण्ण है”. साथ हीं इस अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के मौलिक अधिकार (अनुच्छेद १९ (१) को बाधित करने वाले आठ युक्तियुक्त निर्बंध (अनुच्छेद १९ (२) में एक है “भारत की संप्रभुता और अखण्डता के हितों में”. अर्थात इस छात्रों ने जो कुछ किया वह देश के साथ संभवतः सबसे बड़ा अपराध है. ये छात्र गुमराह नहीं है और तथाकथित रूप से “पढ़े –लिखे” वर्ग में आते हैं (परास्नातक और पी एच डी के छात्र थे) और जो कुकृत्य इन्होने किया वह होशो-हवाश में किया. भारत को तोड़ने की कोई भी अभिव्यक्ति अशोचनीय और अकल्पनीय है.

लिहाज़ा “राज्य अगर इसे प्रभावी रूप से हमेशा-हमेशा के लिए ख़त्म करने के लिए जो भी कदम उठाये वह उचित होगा, इसलिए नहीं कि इन मुट्ठी भर छात्रों का कृत्य संविधान सम्मत नहीं है बल्कि इसलिए कि आई एस आई एस भारत में युवाओं को गुमराह करने का जबरदस्त कुचक्र शुरू कर चुका है और राज्य की तरफ से किसी किस्म की ढिलाई से एक वर्ग –विशेष के कुछ गुमराह युवाओं को एक बौद्धिक वैधानिकता का सन्देश जा सकता है और वे यह सोच सकते हैं  कि जब आम छात्र भी भारत की अखंडता के खिलाफ हीं नहीं पाकिस्तान और कश्मीर के समर्थन में नारे लगा कर आराम से रह सकते हैं तो हम भी यह सब कुछ कर सकते हैं जो आई एस चाहता है.  और आई एस चाहता क्या है --- भारत और अन्य देशों में “खालिफा शासन” स्थापित करना.

देश या समाज के जीवन काल में ऐसे क्षण आते हैं जब उन्मुक्तता और उसकी सीमाओं में एक द्वन्द होता है. उन्मुक्तता, समय के साथ समाज के सोच की उत्कृष्टा को देखते हुए बढ़ायी जा सकती है लेकिन उसकी भी एक शाश्वत शर्त है और वह है --- देश की सम्प्रभ्ता अक्षुण्ण बनाये रखने की. अगर देश टूट गया तो न तो संविधान रहेगा, न हीं अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य. और तब हम फिसल कर एक आदिम युग में जा चुके होंगे. पाकिस्तान, सीरिया और विश्व के तमाम अन्य मुल्क इसके गवाह हैं. 
 
nai duniya
Posted by postcard at 20:49
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3 comments:

  1. Vijaypratap Singh14 February 2016 at 23:25

    स्टेट सीमाओं से नहीं भावना से परिभाषित होता है. आधी शताब्दी तक संविधान और तिरंगे से गुरेज करने वाले और आज़ादी को अधूरा बताने वाले आज एका एक संविधान और राष्ट्र की दुहाई देने लगे.पत्रकारों को विश्लेषण में निष्पक्षता रखनी चाहिए न की सत्ता की भाडगिरी .मत भूलें की कल तक लाहौर भी हमारी मातृभूमि का हिस्सा था.अली ब्रदर्स ने स्वाधीनता आंदोलन वर्तमान पाकिस्तान की सीमा तलक महदूद नहीं रखा था. खान अब्दुल गफ्फार खान महज़ पाकिस्तान के नेता नहीं थे. मोदी जब नवाज़ शरीफ की माँ के पैर छुएं तो कूटनीति लेकिन जे इन यू के कुछ विद्यार्थियों ने अगर पाकिस्तान को शुभकामनायें दे दी तो देश द्रोही?क्यों नहीं मोदीजी ने नवाज़ के जन्मदिन पर यह बद्दुआ दी की देश के दुश्मन हो तुम्हारा सत्यानाश हो.युवा शक्ति को कुचलने का प्रयास इतिहास का सब से बड़ा अपराध है.ये हमारे बच्चे हैं हम इन्ही के साथ मरे और जिएंगे

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    1. Unknown15 February 2016 at 02:22

      विजय प्रताप सिंह जी ,आप किस युवा शक्ति की बात कर रहे है , जो पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगा रहे थे , जो देश को टुकड़े टुकड़े करने की बात कर रहे थे , जो अफजल गुरु के समर्थन में नारे लगा रहे थे। आप जरा वीडियो फुटेज पुनः देख ले और उसके बाद टिप्पणी करे। खून खौल जा रहा है , इन गद्दारो की भाषा सुनकर। शायद आप घटना के बाद भी कन्हैया कुमार का टीवी चैनल पर भाषण नहीं सुना जिसमे वे सबकुछ को उचित बता रहे थे। यहाँ तक की वे अपने नाम से छपे परचा को भी सही ठहराया। इस स्वीकरोक्ति के बाद पैनल में बैठे उनके समर्थक जे एन यू के शिक्षक ने अपने को उनके विचार से अलग कर लिया।
      विरोध ठीक है , असहमति भी ठीक है , अलग विचारधारा होना भी ठीक है किन्तु कन्हैया कुमार तथा आपके तथाकथित युवा शक्ति को देश के वीर जवानो की याद नहीं आई , सारा देश लांस नायक हनुतप्पा के जीवन के लिए दुआ कर रहा था , याद नहीं आई। देश ने वीडियो फुटेज देखा। उसके बाद समर्थन में बेहूदा तर्क सुना।

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    2. Rakesh15 February 2016 at 22:03

      kisi dusre ko shukhkamnayen dena or apni ma ke tukne karna agal bat hai mitra

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