Monday, 21 July 2014

वैदिक प्रकरण: पत्रकारों के लिए एक नसीहत



ओटो वान बिस्मार्क ने कहा था “अ जर्नलिस्ट इस वन  हू हैज फॉरगॉटन हिज कालिंग” (पत्रकार वह है जो अपना पेशा भूल गया है).  
डॉक्टर वेद प्रताप “वैदिक” हम सभी पत्रकारों की तरह सामान्य से व्यक्ति हैं. उन्हें ना तो महिमामंडित करके देखने की ज़रुरत है ना हीं उन्हें “रावण” बनाने की. मानवोचित गुण-दोष के पैरामीटर पर देखने से स्थिति ज्यादा स्पष्ट हो सकती है. उनका टीवी चैनलों में यह कहना कि “नरसिंह राव के ज़माने में उन्हें “डेप्यूटी प्राइम मिनिस्टर” कहा जाता था” उनकी मनोदशा बताता है. उनका साथ हीं यह कहना कि देश के हीं नहीं विदेश के भी कई प्रधानमंत्रियों से उनकी दोस्ती है उसी मनोदशा का इजहार है. एक पत्रकार अगर गलती से भी सत्ता के औपचारिक पदों पर अनौपचारिक रूप से अपनी भूमिका देखने लगता है या इसके गलत या सही जन-आभास का प्रतिकार नहीं करता या तत्काल उस छवि से बचना नहीं चाहता तो वह इस मनोदशा का शाश्वत शिकार हो जाता है. सत्ता के बेहद नजदीक जाने पर अधिकतर मामलों में पत्रकारों में यह मनोदशा विकसित होती है.
यह मनोदशा दिल्ली या राजधानियों के तमाम पत्रकारों में अलग-अलग अंश में देखी जा सकती है. एक टीवी चैनल का सत्ता पक्ष कवर करने वाला दिल्ली का सीनियर रिपोर्टर जब यह कहता है कि “आरोपों से घिरे अमुक मुख्य मंत्री मेरे पीछे पड़े है कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से कह कर मुझे बचा लो” तो यह इस मनोदशा के शुरुआती संकेत हैं. जब वह अपनी शादी या अन्य छोटे-मोटे पारिवारिक कार्यक्रमों में सत्ताधारी मंत्रियों या राजनेताओं को बुलाने में ज्यादा दिलचस्पी रखने लगे तो भी यह संकेत मिलने लगते हैं. बड़े सत्तानशीन नेताओं को घर पर खाने पर बुलाना भी इसी श्रेणी में आता है. छोटे नेताओं और अधिकारियों को “विजिट प्रोटोकॉल” के जरिये पता चलता है और उस पत्रकार की छवि बदलने लगती है. वह अपने मूल कर्तव्य से उसे दूर करती जाती है.
चूंकि हमारे देश में हमने द्वंदात्मक प्रजातंत्र का फॉर्मेट अंगीकार किया है लिहाज़ा विपक्ष की तरह मीडिया की भूमिका मुख्यतौर पर सत्ता पक्ष के खिलाफ होती है. ऐसे में सत्ता पक्ष के बेहद नज़दीक होना या लम्बे समय तक नज़दीक होना मूलरूप से गलत है. जीराल्ड प्रेस्टलैंड का एक मशहूर कथन है “पत्रकार अक्सर गटर में पाया जाता है क्योंकि इसी जगह सत्ताधारी वर्ग अपने कुकृत्य फेंकता है”. पत्रकार का सही मकाम नरसिंहराव के शासनकाल में उपप्रधानमंत्री कहलाने में नहीं बल्कि सत्ताधारियों कोप भजन होने में है. बेचारे वैदिक इस बार विपक्ष के हीं नहीं सत्ता पक्ष के भी कोप भजन बन गए हैं.    
इस मनोदशा की पैदाइश का मूल कारण है वह ग़लतफ़हमी कि सत्ता में बैठा व्यक्ति और वह समकक्ष हैं क्योंकि सत्ताधारी उससे घुलमिल कर बात करता है. वह यह भूल जाता है कि इस घुलने-मिलाने की अगर एक लक्ष्मण रेखा स्वयं नहीं बनाई गयी तो उसके यहाँ सिफारिशी लोग का जमवाड़ा तो लग जाएगा पर वह पत्रकारिता के मूल-कर्तव्य से दूर होता जाएगा क्योंकि उसकी निष्पक्षता पर आंच आनी शुरू हो जायेगी.
इसका एक और संकट यह है इस मनोदशा में पत्रकार यह भूल जाता है कि वह कब निष्पक्ष पत्रकार है और कब दोस्त. जनता को भी यह समझ में नहीं आता कि उस पत्रकार की खबर किस भाव में लिखी या दी गयी गयी है.
वैदिक एक डेलीगेशन के साथ पाकिस्तान गए यह उपक्रम घोषित पत्रकारिता के पैरामीटर से बाहर का कृत्य है. समाज-सुधार, दो देशों की बीच अच्छे सम्बन्ध का प्रयास, आतंक हाफिज सईद का ह्रदय-परिवर्तन आदि पत्रकारिता के स्थापित मानदंडों के बाहर के कार्य हैं. ये सारे कार्य प्रत्रकारिता की सीमा में में रहकर भी अपनी लेखनी या टीवी रिपोर्ट से किये जा सकते हैं. विदेशों में पत्रकारिता करने जाने की एक अलग व्यवस्था है. उसमे अपने देश में पहले से यह बताया जाता है कि “मैं  पत्रकारिता के उद्देश्य से या इंटरव्यू (अगर ज़रुरत हो तो बगैर नाम बताये) लेने के लिए जा रहा हूँ”. इंटरव्यू के लिए कुछ उपादान होते हैं. मसलन प्रिंट है तो टेप-रिकॉर्डर, कलम . प्रश्नावली अगर टीवी है तो कैमरा, कैमरामैन आदि-आदि.
अगर इंटरव्यू की जगह अनौपचारिक बातचीत है तो भी पत्रकार को मनाही नहीं है लेकिन फिर वह ना तो वह पत्रकारिता कही जा सकती है ना हीं उस मुलाकात की विषय-वस्तु का जिससे मुलाकात हुई है उसके नाम से औपचारिक रूप से जिक्र किया जा सकता है. रिपोर्टिंग में एक सर्व-मान्य संस्था है “विश्वस्त सूत्र”. यह तब प्रयोग किया जाता है जब कोई हाफिज सईद या कोई प्रधानमंत्री या मंत्री या अधिकारी पत्रकार से अनौपचारिक बात तो करता है और यह भी चाहता है कि उसकी बात बगैर उसे उद्धृत किये हुए जन-धरातल पर डाल दी जाये.
इस पैरामीटर पर वैदिक एक डेलीगेशन के सदस्य के रूप में जाना और फिर अचानक हाफिज सईद से मिलना पत्रकार का इंटरव्यू नहीं था. लेकिन हाफिज का भारत के बारे में भाव, तमाम मुद्दों के बारे में कथन वैदिक अगर भारत में आ कर जन –धरातल पर डालते हैं तो कहीं कोई गलती नहीं है. शर्त महज यह है कि हाफिज उसका खंडन न करे (क्योंकि वैदिक के पास कोई प्रूफ नहीं है).
एक अन्य खतरा भी है हाफिज-वैदिक बातचीत को तरजीह देने में. वैदिक की वरिष्ठता, समझ, आचरण या राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी पर कोई प्रश्न चिन्ह नहीं लगाया जा सकता परन्तु मान लीजिये इसी फॉर्मेट पर मुलाकर करके एक कम समझ वाला पत्रकार जिसे उर्दू का ज्ञान कम है भारत आ कर कहता है कि “हाफिज ने कहा है भारत पर लश्कर एक बड़े हमले की तैयारी कर रहा है और पाकिस्तान के हुक्मरान और सेना भी इस अभियान के लिए हामी भर चुके है”. क्या इससे भारतीय सेना में सनसनी नहीं फैलेगी ? क्या इससे भारत-पाक संबंधों पर असर नहीं पडेगा? कश्मीर पर वैदिक का कथन किसी एक सामान्य व्यक्ति के कथन के रूप में पाकिस्तान को भी लेना होगा क्योंकि जो उन्होंने कहा है वह ना तो भारत का न हीं संविधान का, ना हीं संसद का और ना हीं देश का मंतव्य है.
लिहाज़ा वैदिक की मुलाकात को नज़रंदाज़ करना होगा. बैक-चैनल डिप्लोमेसी की दूकान बंद करनी होगी. क्योंकि कोई नहीं जानता कौन सा स्वयंभू डेलीगेशन भारत को पाकिस्तान के नाम लिख आये या कौन सा आई एस आई या रॉ किस यात्रा को किस तथाकथित स्वयंसेवी संस्था से फण्ड करवा रहा हो. वैदिक के खिलाफ बन रहा वातावरण उतना हीं गलत है जितना वैदिक का औपचारिक और अनौपचारिक भूमिका में झूलना. वैदिक प्रकरण से देश के सभी पत्रकारों को एक नसीहत भी मिलती है कि सत्ता के प्रति नजदीकी की एक सीमा है दीर्घकालीन विश्वसनीय पत्रकारिता के लिए. शिव सेना या अन्य दलों का वैदिक पर राष्र्ट-द्रोह का आरोप लगाना या संसद में हंगामा करना भी राजनीतिक वर्ग के उसी मानसिक दिवालियेपन का मुजाहरा है.

lokmat

Wednesday, 16 July 2014

चोर के हाथ कटाने की हिमायत : क्या यह अदालत की अवमानना नहीं



झारखण्ड के बोकारो में स्थित एक गाँव गुलगुलिया ढोरा में एक बलात्कार हुआ. मामला पंचायत में गया. मुखिया ने फैसला सुनाया कि बलात्कार की शिकार महिला का पति बलात्कार आरोपी की १४ –वर्षीया बहन से बलात्कार करे. यही हुआ. पूरे गाँव के सामने. लड़की के माँ-बाप बचाने की गुहार लगाते रहे पर कोई नहीं निकला. लड़की को पास के जंगल में ले जा कर पंचायत के फैसले को पर अमल के भाव में बलात्कार किया जाता रहा. सम्बंधित थाने में भी शुरू में रिपोर्ट नहीं लिखी गयी.
उधर मद्रास हाई कोर्ट के एक जज ने अपने फैसले में ईरान में चोरों की उंगलियाँ काटने वाली मशीन का ज़िक्र करते हुए कहा कि कहा है कि अदालत यह मानती है कि जालसाजी के लिए भी उंगलियाँ काटने की सजा दी जानी चाहिए. जज महोदय ने आगे कहा “दुर्भाग्य से हमारे यहाँ ऐसे कठोर कानून नहीं हैं कि फर्जी कागजात बनाने वालों के हाथ काट लिए जाएँ नहीं तो अपराधियों के हौसले इतने नहीं बढे होते.”
पंचायत या मुखिया का फैसला ऐसा क्यों है समझना मुश्किल नहीं है. वह रिट्रीब्यूटिव जस्टिस (प्रतिशोध से न्याय) हीं जानता है, उसे पुरुष-प्रधान समाज में पीड़ित पत्नी नहीं पति नज़र आता है और प्रतिकार के रूप में आरोपी की बहन नज़र आती है असली बलात्कारी पुरुष नहीं. याने खरबूजा चाकू पर गिरे या चाकू खरबूजे पर , कटेगा खरबूजा हीं” के न्याय-दर्शन से ऊपर नहीं सोच पाता. उसे यह भी नहीं मालूम कि अपराध-न्याय शास्त्र में पीड़ित व्यक्ति होता है और जुर्म भी व्यक्ति हीं करता है परिवार नहीं लिहाज़ा सजा अपराधी की निर्दोष बहन को एक और अपराध के रूप में नहीं दी  जा सकती. उसकी समझ नए तार्किक (?) व युक्तियुक्त (?) व्यवस्था को लेकर अभी नहीं बनी है.  
लेकिन जब हाई कोर्ट का एक जज हाथ काटने की बात विधि द्वारा स्थापित औपचारिक संस्था के प्रतिनिधी के रूप में कहता है और यह कहते हुए कि यह “अदालत मानती है जालसाजी के लिए भी उंगलियाँ काटने की सजा दी  जानी चाहिए” और “दुर्भाग्य से हमारे यहाँ ऐसे कठोर कानून नहीं हैं” तब कई गंभीर प्रश्न उठ खड़े होते हैं. यह अवसर भी जज का ड्राइंग रूम नहीं होता, ना हीं किसी सेमिनार में “भारतीय अपराध न्याय-शास्त्र की विवेचना” बल्कि भरी अदालत.
क्या यह कथन अदालत, न्याय-व्यवस्था या संविधान की अवमानना नहीं है? “अदालत की अवमानना कानून, १९७१ में “अदलत की अवमानना” की परिभाषा में कहा गया है कि अगर कोई ऐसा कृत्य जो अदालत की गरिमा को गिरता हो” इस कानून के तहत अपराध है. इसकी व्याख्या करते हुए सर्वोच्च न्यायलय ने डी सी सक्सेना बनाम भारत के मुख्य न्यायाधीश मामले में १९९६ में अपने फैसले में कहा “ऐसा कोई कृत्य जो अदालत की गरिमा गिरता हो या न्याय प्रशासन में जनता का विश्वास (अंडरमाइन) कम करता हो” अदलत की अवमानना है.  
भारतीय संविधान के अनुसूची ३ के खंड ८ में हाई कोर्ट के जजों के लिए पद भार ग्रहण करते वक़्त ली जाने वाली शपथ का प्रारूप दिया है. हर जज को संविधान के प्रति निष्ठा की हीं नहीं बल्कि संविधान और कानून को बनाये रखने (अपहोल्ड) की शपथ लेनी होती है.
भरी अदालत में यह कहना कि दुर्भाग्य से हमारे यहाँ हाथ काटने का कानून नहीं है यह तस्दीक नहीं करता कि हमारे कानून में जबरदस्त कमी है और “यह” अदालत इस कमी को दुर्भाग्य मानती है. क्या यह अपनी हीं शपथ का उल्लंघन नहीं है? क्या यह अदालतों के प्रति और न्याय-प्रक्रिया के प्रति जनता में दुर्भाव (डिसएफेक्शन)नहीं पैदा करता?
उच्च न्यायालय के जज का मक़ाम भारतीय न्याय व्यवस्था में काफी ऊपर रखा गया है. वह फांसी के मामले में अपील सुनता है. अगर शपथ में उसने यह वायदा किया है कि बगैर दुर्भावना के (इल-विल) कानून की हिफाज़त करेगा तो उसी कानून को दुर्भाग्य मानना क्या संकेत देता है.
यहाँ दो बातें और. जज अपने मर्ज़ी से न्यायमूर्ति का पद ग्रहण करता है उसे यह भी सुविधा है कि वह जज ना बने या जब भी लगे कि कानून दुर्भाग्यपूर्ण है तो इस्तीफ़ा दे दे. लेकिन कानून या संविधान शायद उसे यह इज़ाज़त नहीं देता कि वह पद , वेतन, ऊँची और सम्मानित कुर्सी का भोग करे और जिस व्यवस्था से यह सब कुछ हासिल किया है उसी व्यवस्था को औपचारिक तौर पर और औपचारिक अवसर पर (अदालत की कार्यवाही) के दौरान इतना गलत बताये कि जनता को लगे कि काश हमारी भी व्यवस्था मिस्र जैसे होती तो बलात्कार, जालसाजी और हटी जैसे जघन्य अपराध ना होते.
यहाँ प्रश्न यह भी नहीं है कि जज ने यह बात प्रसंगोक्ति (ओबिटर डिक्टम) के रूप में कही है या मूल फैसले (रेशियो) के अंश के रूप में या फिर ऑब्जरवेशन के भाव में. इसका सन्देश पूरे देश में यह गया है कि एक हाई कोर्ट के जज का मानना है कि कानून में कमी की वजह से जालसाज और बलात्कारी पैदा हो रहे हैं.
फिर भारतीय अपराध न्याय-शास्त्र का पूरा ढांचा हीं सुधारवादी (रेफोर्मेटरी) दर्शन पर आधारित है जिसमे अपराध को एक रोग मान कर उस रोगी को ठीक करने का प्रयास होता है. प्रशन है कि अगर जज को प्रतिशोधात्मक (रिट्रीब्यूटिव) न्याय व्यवस्था में विश्वास है तो फिर वह सुधारवादी सिस्टम में काम हीं क्यों कर रहा है? और क्या यह डर हमेशा नहीं बना रहेगा कि ऐसी विचारधारा वाले जजों का फैसला प्रतिष्ठापित अवधारणा से कम या अधिक सख्त होगा?
अगर अन्ना हजारे के पास धरना दे कर लोकपाल लाने के लिए दबाव डालने का विकल्प है तो क्या इस जज के पास इस्तीफा दे कर व्यवस्था के खिलाफ आन्दोलन करने का विकल्प नहीं था ? और क्या जनता को ऐसे जज से ऐसे साहस  की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए?  संभव है कि कानून दुर्भाग्यपूर्ण हो, लेकिन क्या उसे सिस्टम का उपभोग करते हुए और उसी का लानत मलानत करते हुए हम नैतिक स्तर पर उस नक्सली से भी नीचे नहीं चले जाते जो कम से कम सिस्टम का उपभोग तो नहीं कर रहा है. जंगलों में रहता है , गोली चलाकर या खा कर मरता है पर जो है वही कहता है जो सोचता है वहीं करता भी है.

nai duniya

Tuesday, 15 July 2014

क्या गुल खिलाएगी "आतंक" से भेंट

वैदिक विभिन्न देशों में ऎसी यात्रा पर जाते रहे हैं। ये सेमिनार और आपसी संवाद की यात्राएं होती हैं। इनका सरकार या आधिकारिक डेलिगेशन से कोई लेना-देना नहीं होता। न ही ये कोई डिप्लोमेसी का जरिया होती हैं। 

स्थिति इसलिए ज्यादा खराब हुई है, क्योंकि वेद प्रताप वैदिक ने काफी बढ़-चढ़कर बातें की हैं। उन्होंने पाकिस्तानी टेलीविजन को एक साक्षात्कार में कह दिया कि वे मोदी से मिलते रहते हैं। 

कश्मीर की आजादी के पक्षधर हैं। क्या सरकार ऎसे व्यक्ति से खुद को ही नुकसान करना चाहेगी। वैदिक सत्ता के करीब रहे हैं। उनकी भाजपा और बाबा रामदेव से नजदीकियां जगजाहिर हैं। ऎसे में उनकी सईद से मुलाकात के बाद सरकार को नुकसान होना लाजिमी है। 

बुनियादी तौर पर पत्रकारिता में एक सर्वमान्य सत्य यह है कि बडे-बड़े अपराधियों, जिनकी पुलिस को तलाश रहती है या जिन पर इनाम घोेषित होता है और वे पकड़ में नहीं आ रहे हैं, उनसे साक्षात्कार करना पूरे विश्व में सामान्य प्रक्रिया है। ओसामा बिन लादेन का हामिद मीर ने साक्षात्कार किया था। लिट्टे प्रमुख प्रभाकरन, जिसने राजीव गांधी की हत्या कराई, उसका साक्षात्कार हुआ था। 

कुख्यात चंदन तस्कर वीरप्पन, जिसे कभी पुलिस पकड़ नहीं पाई, उसका साक्षात्कार किया गया। डकैत ददुआ का साक्षात्कार किया गया था, जिसका किसी के पास फोटोग्राफ तक नहीं था। इन सबके अलावा हमारे देश में उन नक्सलियों का जंगलों में साक्षात्कार करने के लिए पत्रकार अक्सर जाते हैं, जिनकी तलाश पुलिस कर रही होती है। 

इस तरह के साक्षात्कार के दो मकसद होते हैं। पहला यह होता है कि जिन्हें पुलिस या अन्य एजेंसियां नहीं पकड़ पा रही हैं, वे पत्रकारों को उपलब्ध हैं। यानी उन्हें पकड़ने के प्रयासों में कहीं न कहीं कमी है। दूसरा मकसद यह होता है कि उन अपराधियों का वर्जन भी सुना जाए। 

इस लिहाज से वेद प्रताप वैदिक ने हाफिज सईद से मुलाकात कर कुछ गलत नहीं किया है। इनमें से कई साक्षात्कारों में अपराधी कैमरे के सामने नहीं आते। नक्सली इसी तरह साक्षात्कार देते हैं। वे अनौपचारिक बात करने को तैयार होते हैं। वे टेपरिकॉर्डर की भी इजाजत नहीं देते। पूरे विश्वभर में ऎसी अनौपचारिक बातचीत की परम्परा है। 

वैदिक-सईद प्रकरण में बेहतर होता कि हमारा इंटेलीजेंस ब्यूरो वैदिक से उनकी मुलाकात के बारे में तफ्सील से जानकारी मांगता। वह उनकी बातचीत का विश्लेषण कर पाता और सईद के जवाबों से उसके इरादों का अंदाज लगा पाता। वैदिक को देशद्रोही या गुनहगार की तरह पेश करना गलत है। भारत के दंड विधान में, सीआरपीसी या आईपीसी में किसी अपराधी या सरगना से मिलने की पाबंदी नहीं है।

मीडिया में इस पर बेबुनियाद बहस हो रही है। उनकी यात्रा पर विवाद प्रदर्शित करता है कि देश में तर्क शक्ति का विलोप हो रहा है, जो कि समाज के लिए खतरनाक स्थिति है। ऎसा प्रतीत हो रहा है कि विपक्ष और मीडिया के एक वर्ग के पास मुद्दे ही नहीं हैं। कांग्रेस संसद में महंगाई के मुद्दे पर सरकार को घेरती तो ज्यादा मुनासिब होता। 

सवाल यह जरूर उठता है कि एक भारतीय पत्रकार होने के नाते वैदिक को 26/11 के मास्टरमाइंड से जो तीखे सवाल करने चाहिए थे, वो उन्होंने किए कि नहीं? लेकिन इसमें यह भी ध्यान रखना होगा कि उन्होंने सईद से एक अनौपचारिक मुलाकात की थी।

वे किसी योजनाबद्ध साक्षात्कार के लिए नहीं गए थे। वे इससे पहले भी तीन दर्जन बार पाकिस्तान जा चुके हैं। इस बार उनकी यात्रा पर यह सवाल उठाना कि वे विशेष तौर पर मोदी सरकार के भेजे गए दूत थे, यह सरासर गलत है। कोई सरकार सईद जैसे आतंकी से बातचीत करने के लिए वैदिक को ही क्यों चुनेगी


rajsthan patrika

Monday, 23 June 2014

अटल-आडवाणी की जन स्वीकार्यता और मोदी के प्रति जन-विश्वास में अंतर है !



जिन्ना प्रकरण के बाद लाल कृष्ण आडवाणी के नेपथ्य में चले जाने के कुछ दिनों बाद की बात है. एक भारतीय जनता पार्टी के नेता जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नज़दीक थे, संघ के एक वरिष्ठ पदाधिकारी से मिलने पहुंचे. बातचीत में उन्होंने उस पदाधिकारी से कहा “कुछ भी कहिये, पार्टी को इस उंचाई तक पहुँचाने में आडवाणी जी का बड़ा योगदान है”. पदाधिकारी ने त्वरित प्रश्नरूपी जवाब दागा “और आडवाणी को आडवानी बनाने में किसका योगदान है?
श्रेय देने की प्रक्रिया कई बार जटिल होती है सफलता के पीछे की बहुत सारे तथ्य आम जनता तो छोडिये जानकार लोग भी नहीं समझ पाते हैं. लिहाज़ा संगठन में पीछे से कार्य करने वाले उपादान, सोच और व्यक्ति गौण हो जाते हैं. ताजमहल तामीर करने वाले कारीगर को कोई नहीं जानता लेकिन शाहजहाँ को सभी जानते हैं. कई बार सफलता पर आधारित श्रेय पाने वाला यह समझ लेता है कि वह ना होता तो यह सफलता ना होती और यहीं से शुरू होता है संगठन और व्यक्ति में विभेद.
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भाजपा के पदाधिकारियों को संबोधित किया. कुछ विश्लेषकों ने माना कि यह पार्टी पर प्रभुत्व की बेजा कोशिश है. यहाँ विश्लेषण इस बात का करना है कि अटल-आडवाणी की जन स्वीकार्यता और मोदी को मिले जन-समर्थन में कई गुणात्मक अंतर हैं. भाजपा, अटल बिहारी वाजपेयी या लाल कृष्ण आडवाणी की जन –स्वीकार्यता १९८४ में शुरू किये गए राम मंदिर आन्दोलन की उपज है. यह मुद्दा विशुद्ध रूप से भावनात्मक है. दिक्- काल-सापेक्ष है याने समय बदला , जगह बदला तो भावना तिरोहित हुई और भावना नहीं रही तो स्वीकार्यता ख़त्म. शिक्षा, तर्क-शक्ति का विकास , सामाजिक सोच में बदलाव , प्रति-व्यक्ति आय में वृद्धि से पैदा हुई उपभोक्तावादी संस्कृति के कारण यह भावना दुबारा परवान नहीं चढ़ पाई. वही वाजपेयी-आडवाणी की जोड़ी जब १९९८ में पार्टी को सर्वोच्च जन स्वीकार्यता की स्थिति (लेकिन तब भी कांग्रेस से कम मत प्रतिशत) में ले गयी लेकिन उसके बाद जैसे –जैसे भावना का ज्वार कम होने लगा पार्टी के वोट कम होने लगे. बाद के चुनाव जैसे १९९९ , २००४ और २००९ तक मत प्रतिशत लगातार गिरता गया जब कि २००९ के चुनाव में आडवाणी को पार्टी ने प्रधानमंत्री का प्रत्याशी भी घोषित किया था.
तात्पर्य यह कि मंदिर-जनित हिंदुत्व की लहर की मियाद थी और इसका श्रेय अगर दिया जाना था तो संघ के अन्य घटकों जैसे विश्व हिन्दू परिषद् , बजरंग दल या उन सभी को जो इसमें शामिल थे. दरअसल आडवाणी की रथ-यात्रा को मिला जन –समर्थन भी उसी प्रयास का बाई - प्रोडक्ट था. अर्थात संघ ना होता , तो परिषद् ना होता , परिषद् ना होता तो मुद्दा हिन्दुओं की भावना में ना बदलता और भावना ना होती तो आडवाणी की राम रथ -यात्रा पर कन्याकुमारी से कश्मीर तक उनका मनस उद्वेलित ना होता. या यहाँ एक बात नहीं भूलनी चाहिए कि जो भीड़ आडवाणी की रथ यात्रा में उमड़ी वह मुरली मनोहर जोशी की यात्रा में नहीं. यहाँ व्यक्ति के राष्ट्र –व्यापी स्वीकार्यता को नज़रंदाज़ करना आडवाणी के साथ अन्याय होगा.
लेकिन नरेन्द्र मोदी की जन स्वीकार्यता एक ऐसे समय में हुई जब मीडिया की तथ्यों को जनता तक पहुँचाने की शक्ति का फैलाव निर्बाध था. अतः जनता की तर्क-शक्ति बढ़ी , अपेक्षाएं भावनात्मक ना होकर वास्तविक हुईं. मोदी किसी भावना की उपज नहीं थे. कोई उन्माद नहीं था जनता में बल्कि एक तार्किक सोच से पैदा हुई सामूहिक चेतना थी.
यहाँ कोई यह तर्क दे सकता है कि मोदी को क्या संघ ने नहीं एक मकाम दिया? ज़रूर दिया और उन्हें गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया. यहाँ यह भी कहा जा सकता है कि जिस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने गुजरात दंगों के बाद राजधर्म निभाने की सलाह दी थी उस समय अगर आडवाणी उनके समर्थन में ना आये होते तो आज मोदी शायद यहाँ ना पहुंचते. लेकिन उसके बाद मोदी की यात्रा उनकी अपनी थी, किसी व्यक्ति या भावना कि मोहताज़ नहीं.
इन दस वर्षों में मोदी ने अपने व्यक्तित्व में जिन चार विशेषताओं का समाहन किया वे थे – कुशल प्रशासक, सक्षम विकासकर्ता, भ्रष्टाचार के प्रति शून्य-सहिष्णुता और आतंकवाद का विनाशक. मोदी में ये गुण वास्तविक हैं या परसेप्शन , इस पर विवाद हो सकता है लेकिन आम जनता ने ऐसा माना और उनमें मोदी के प्रति ऐसा विश्वास जगा जो दो दशकों की जाति –आधारित राजनीति को तोड़ता गया. इसमें फैलाव भी था (बंगाल से केरल तक) और गहराई भी (उच्च वर्ग से दलित तक) . अगर उच्च वर्ग ने कमल को वोट दिया तो किसी मंदिर पर नहीं विकास की अपेक्षा के साथ. उत्तर प्रदेश और बिहार के दलितों ने अगर वोट दिया तो इसलिए मोदी रोजी-रोटी की स्थिति बेहतर करेंगे. लालू, मुलायम और माया के लोग अगर पाला बदले तो यह मान कर कि जाति से बड़ा है विकास और वह विकास केवल और केवल मोदी कर सकेंगे. इसमें भाजपा या संघ को उतना हीं श्रेय जाता है जितना एक सामान्य बाप को अपने प्रखर बेटे की सफलता के लिए. यह तर्क नहीं दिया जा सकता कि अगर बाप ने पढ़ाई में एडमिशन के लिए पैसे नहीं दिए होते तो बेटा यह सफलता नहीं हासिल कर पाता.
लिहाज़ा आज जब मोदी पार्टी के पदाधिकारियों की बैठक में कुछ आदेशरूपी सलाह देते हैं तो वह औचित्यपूर्ण इसलिए है क्योंकि जनता ने मोदी पर अपना दांव लगाया है. वहीं भाजपा है, वही संघ है वही आडवाणी २००४ और २००९ में भी थे. आज मोदी अगर उन जन अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए पार्टी को माध्यम बनाना चाहते हैं तो इसे पार्टी पर प्रभुत्व की संज्ञा देना अतार्किक हीं नहीं हैं अनैतिक भी है.
बहरहाल संघ शायद यह बात समझता है और यही कारण है कि आज संघ भी यह मानने लगा है कि सफल राजनीति खासकर गवर्नेंस की पहली शर्त है प्राथमिकताओं को पहचानना. अगर मोदी सफल रहे तो संघ को भी अपने विस्तार हीं नहीं व्यापक स्वीकार्यता का अच्छा वातावरण मिलेगा और वह अपने व्यापक और अद्भुत संगठन की बूते पर अपनी सार्थक पैठ बना पायेगा और सामाजिक समरसता बहाल हो सकेगी. ना केवल हिन्दू जातियों की बीच बल्कि अन्य धर्मों के लोगों में भी.

lokmat

Friday, 20 June 2014

राज्यपाल को संविधान ने हीं फुटबॉल बना दिया था !



महामहिम राज्यपाल” को लेकर जरा विरोधाभास देखिये. देश में केवल दो हीं संस्थाएं हैं जो संविधान के संरक्षण, परिरक्षण और प्रतिरक्षण (प्रेसर्व, प्रोटेक्ट और डिफेंड) की शपथ लेती है ---राष्ट्रपति और राज्यपाल. यहाँ तक कि उप-राष्ट्रपति या सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश भी संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ लेते हैं. लेकिन “संविधान की रक्षा” करने वाले इस राज्यपाल को केंद्र सरकार मात्र एक चिट्ठी भेजकर जब चाहे निकाल सकती है. जबकि इसी संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ लेने वाले तमाम पदों पर आसीन लोगों को जैसे न्यायाधीश, मुख्य चुनाव आयुक्त या लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष को निकालने के लिए जटिल प्रक्रियाएं हैं. यहाँ तक कि सरकारी अफसरों को भी सेवा से हटाने से बचाने के लिए संविधान में अनुच्छेद ३११ में अलग व्यवस्था है.
राज्यपाल की संस्था को लेकर बहस एक बार फिर गर्मा गयी है. केंद्र की नयी सरकार पुरानी यू पी ए-२ की सरकार द्वारा नियुक्त राज्यपालों को बाहर कर अपने लोग लाना चाहती है. एक वर्ग इस कदम को गलत बता रहा है और कुछ फैसलों या संस्तुतियों का हवाला दे रहा है. दूसरा वर्ग पिछली सरकारों ने क्या किया यह बता कर अपने को उचित ठहरा रहा है.
आखिर आज संविधान के बनने और अमल में आने के ६५ साल बाद भी यह भ्रमद्वन्द क्यों? दरअसल इसे समझने के लिए संविधान निर्माताओं की तत्कालीन परिस्थितियों के मद्दे नज़र बनी सोच का अध्ययन करना होगा. राज्यपाल की संस्था को लेकर संविधान सभा के सलाहकार बी एन राव ने सलाह डी थी कि राज्य की विधायिका द्वारा एकल संक्रमनीय पध्यती से राज्यपाल का चुनाव हो. दूसरी सलाह थी कि राज्य विधायिका चार नाम भेजे जिनमें से एक पर राष्ट्रपति का अनुमोदन हो सके. तीसरा और सबसे प्रभावशाली विकल्प था राज्यपाल को राज्य की जनता द्वारा सीधे चार साल के लिए चुनाव करना. संविधान सभा की दो प्रस्तावना समितियां थी –एक राज्य के संविधान के लिए और दूसरी केंद्र के लिए. सरदार पटेल ने सभा को बताया कि दोनों समितियां इस बात पर सहमत हैं कि राज्यपाल राज्य की जनता द्वारा सीधे चुना जाना चाहिए. सभा में इस मुद्दे पर जबरदस्त बहस हुई और तीसरा विकल्प लगभग पारित होने की स्थिति में था. लेकिन उसी समय कुछ घटनाएँ हुई. गाँधी की हत्या, सांप्रदायिक दंगे, तेलंगाना का आन्दोलन और हैदराबाद के निजाम का भारत के खिलाफ हथियार खरीदने का प्रयास और कश्मीर में तनाव. निर्माताओं को लगा कि मज़बूत केंद्र होने का सन्देश देना जरूरी है.
इन सब के मद्दे नज़र नेहरु व कुछ अन्य सदस्यों का मानना था कि अगर राज्यपाल को जनता सीधे चुनती है तो वह बेहद शक्तिशाली होगा और मुख्यमंत्री जो परोक्ष चुनाव से बनेगा (विधायकों के द्वारा चुने जाने के कारण) गौण हो जाएगा और दूसरा अगर दोनों एक साथ मिल जाते हैं तो इससे पृथकतावादी भावों को बल मिल सकता है. लिहाज़ा एक मज़बूत केंद्र का सन्देश जाना ज़रूरी है. इस तरह राज्यपाल केंद्र का एजेंट मात्र हो कर रह गया.
लेकिन निर्माताओं का भ्रम्द्वंद बना रहा. नतीजा यह हुआ कि संविधान के अनुच्छेद १५६ में एक अजीब विरोधाभास देखने को मिलता है. अनुच्छेद के खंड () में कहा गया है कि राज्यपाल राष्ट्रपति के प्रसाद पर्यंत काम करेगा. लेकिन वहीं खंड () में बताया गया है कि उसका कार्यकाल पांच साल का होगा. राष्टपति के प्रसाद पर्यंत काम करने का तात्पर्य है जब भी चाहे केंद्र की सरकार उसे हटा सकती है. यही वजह है कि जब भी केंद्र में कोई नयी पार्टी या नया गठबंधन आता है वह राज्यपालों बाहर कर अपने लोग इस पद पर लाता है. निर्माताओं का भ्रम्द्वंद इस संस्था को लेकर इतना ज्यादा था कि इस पद को महिमा मंडित -करने के लिए अनुच्छेद १५९ में एक अलग प्रावधान किया गया जिसके तहत इस संस्था को राष्ट्रपति की हीं तरह संविधान का संरक्षक के रूप में शपथ का प्रावधान किया गया. क्या संविधान का संरक्षक इतना निरीह होना चाहिए कि जिसे जब चाहे कोई केंद्र सरकार बाहर कर दे?
यहाँ तक की इस संस्था को इतना कमज़ोर करने का बाद भी निर्माताओं को डर बना रहा. नतीज़तन अनुच्छेद ३५६ में जहाँ राष्ट्रपति शासन लगने की शक्ति केंद्र ने अपने पास रखी है वहीं यह भी व्यवस्था है कि ऐसा करने के लिए भी वह राज्यपाल के रिपोर्ट की हीं मोहताज़ ना रहे. इस अनुच्छेद में कहा गया है कि राष्ट्रपति राज्यपाल या अन्य रूप से हासिल रिपोर्ट से संतुष्ट है कि ऐसी स्थिति आ गयी है कि राज्य सरकार संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप शासन नहीं चल सकती है ..... “. याने संविधान के संरक्षण की शपथ लेने वाले राज्यपाल पर हीं पूर्ण भरोषा नहीं किया गया है.
इन सब का नतीजा यह हुआ कि राज्यपाल एक कमज़ोर संस्था बनी रही और केंद्र के इशारों पर काम करती रही. बूटा सिंह और सिब्ते रजी इसके ताज़ा उदाहरण रहे. राज्यपाल को लेकर विवाद तब शुरू हुआ जब पहली बार १९६७ में दस राज्यों में गैर-कांग्रेस सरकारें आयीं. फिर नरसिंहराव ने प्रधानमंत्री बनते हीं अपने पूर्ववर्ती चन्द्रशेखर व विश्वनाथ प्रताप सिंह द्वारा नियुक्त १४ राज्यपालों को निकाल दिया.
इन तमाम स्थितियों के बीच सरकारिया आयोग, संविधान पर बने वेंकटचेलैया आयोग, प्रशानिक सुधार आयोग और सर्वोच्च न्यायलय सभी ने कहा कि राज्यपाल संस्था का कार्यकाल सुनिश्चित होना चाहिए. आयोगों ने राज्यपाल को हटाने के लिए एक प्रक्रिया का अनुमोदन किया. लेकिन किसी भी केंद्र सरकार को यह गवारा नहीं था.
संविधान निर्माताओं का और सरकारिया आयोग, वेंकटचेलैया आयोग का मानना था कि इस पद पर निर्विवाद और सम्मानित लोग आसीन किये जाने चाहिए. खासकर ऐसे लोग जो राजनीति से अपने को काफी पहले अलग कर चुके हैं. लेकिन केंद्र सरकारों ने इस पद को राजनीति में घिसे-पिटे लोगों, एक पार्टी में निष्ठां रखने वाले अफसरों, जनरलों, न्यायाधीशों और साथ हीं पार्टी के भीतर हीं विरोध करने वालों को ठिकाने लगने के लिए एक चारागाह बना दिया. दिल्ली की पूर्वमुख्यमंत्री शीला दीक्षित को चुनाव हारने के बाद राज्यपाल बनाना इसका ताज़ा उदाहरण है.

नरेन्द्र मोदी सरकार का पुराने राज्यपालों को बाहर का रास्ता दिखाना और अपने लोगों को लाना उसी की अगली कड़ी है जिसमें कुछ भी नया नहीं.     

jagran

Sunday, 15 June 2014

पाठ्यक्रमों में भ्रष्टाचार का पाठ: मोदी सरकार की एक अद्भुत पहल


 “जानामि धरमं न च मे प्रवृति, जानाम्यधर्मम न च में निवृति,

                                             (प्रपन्न गीता -५७)  

(हे इन्द्रियों के अधिष्ठाता (भगवान् कृष्ण), मुझे धर्मं ज्ञान है पर मेरी प्रवृति उस ओर नहीं है और मुझे अधर्म भी मालूम है पर मुझे उससे छुटकारा नहीं है ) .

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के जवाब में बोलते हुए महाभारत के इस श्लोक के प्रथम पंक्ति का पूर्व अंश यू पी ए -२ की सरकार पर तंज कसते हुए उद्धृत किया था. सन्दर्भ था कृष्ण ने जब दुर्योधन से पूछा कि जब तुम यह जानते हो क्या धर्म है और क्या अधर्म तो धर्म का आचरण क्यों नहीं करते? इस पर उक्त श्लोक में दुर्योधन ने अपनी स्थिति बतायी.

मोदी के जन समर्थन की पीछे जो सबसे बड़ा कारण था वह था जनता का विश्वास कि यह व्यक्ति भ्रष्टाचार से निजात दिलाएगा. मोदी की सरकार का इस दिशा में पहला कदम है मानव संसाधन मंत्रालय के ताज़ा आदेश पर यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (यू जी सी) का देश के सभी कुलपतियों को एक पत्र जिसमे भष्टाचार को उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रमों में शामिल करने की सलाह. यह भी कहा गया है कि इस विषय को कानून, लोक-प्रशासन और मानवाधिकार के पाठ्यक्रमों में शामिल हीं नहीं किया जाये बल्कि इस पर शोध भी कराया जाये.

भ्रष्टाचार को शुद्ध रूप से कानूनी समस्या समझना शायद अभी तक की सबसे बड़ी भूल रही है, यह जितना कानूनी समस्या है उससे ज्यादा सामाजिक और नैतिक. इस समस्या का हल मात्र कानून और कानूनी संस्थाओं में ढूढना बालू में से तेल निकालने की तरह है. और मोदी सरकार शायद इस गूढ़ तथ्य को आते हीं समझ गयी है.

ऐसा नहीं है कि पिछली सरकार इस तथ्य को नहीं जानती थी. सन २००७ में जारी  द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग की चौथी रिपोर्ट में भ्रष्टाचार पर बृहद और सार्थक विश्लेषण किया गया. भ्रष्टाचार को दो वर्गों में बाँट कर उसके निदाल की बात भी की गयी है. ये दो वर्ग है – कोएर्सिव (सत्ता व कानून का भय दिखाकर लोगों से लाभ लेना) और कोल्यूसिव (सता और जनता में से भ्रष्ट लोगों के बीच एक समझौते के तहत किया गया भ्रष्टाचार). रिपोर्ट के पृष्ठ ६३ में दोनों किस्म के भ्रष्टाचार से निपटने के लिए अलग-अलग कानून बनाने की संस्तुति की गयी है और दूसरे किस्म के भ्रष्टाचार (जो यू पी ए -२ के कार्यकाल में व्यापक रूप से नजर आयी ) के लिए कठोरतम कानून की बात कही गयी है. इस किस्म के भ्रष्टाचार के आरोपी पर हीं ओनस प्रोबेन्डी (अपने को निर्दोष सिद्ध करने की जिम्मेदारी) डालने की सलाह है.

दरअसल श्लोक की प्रथम पंक्ति के पूर्वार्ध का भाग (धर्म पर चलने की प्रवृति का न होना) सीधे समाज से जुड़ा है जबकि उत्तरार्ध का भाग (अधर्म जानते हुए भी मेरी उससे निवृति नहीं है) सत्ता में बैठे लोगों से. रेड लाइट जम्प करने से लेकर टी टी को घूस दे कर ट्रेन में बर्थ पाना उसी श्रेणी में आते हैं. मोदी सरकार ने पाठ्यकर्म इसे शामिल करने के आदेश से भ्रष्टाचार के खिलाफ इससे सामाजिक व व्यक्तिगत चेतना को जगाने का सूत्रपात किया है. बेहतर हो कि प्राथमिक शिक्षा से हीं इसका आगाज हो क्योंकि उच्च शिक्षा तक पहुंचते-पहुंचते युवा अपनी संस्कृति और नैतिकता परिभाषित कर चुका होता है और उसे आत्मसात भी कर चुका होता है. अगर प्रवृति हो जायेगी नैतिक आचरण की तो अधर्म से निवृति की ज़रुरत हीं नहीं पड़ेगी. दरअसल कोल्यूसिव किस्म के भ्रष्टाचार में मंत्री और उद्योगपति दोनों हीं शामिल होते हैं या इंजिनियर और ठेकेदार संझौता कर लेते हैं. नुकसान किसी एक व्यक्ति का नहीं पूरे समाज का होता है जब देश के राजस्व को १.७६ लाख करोड़ का चुना लग जाता है या जब १५ साल बाद पुल गिरता है. लेकिन तब तक यह इंजिनियर इंजिनियर-इन-चीफ बन चुका होता है और ठेकेदार मंत्री, सांसद या विधायक या फिर उनको खरीदने वाली. इन दोनों में सिस्टम को दबाने की जबरदस्त ताकत आ चुकी होती है.

दरोगा का ट्रक वालों से सड़क पर वसूली करना कोएर्सिव किस्म का भ्रष्टाचार है जिसे बेहतर कानून और मज़बूत कानूनी संस्था बना कर रोका जा सकता है पर जिन जैसे –जैसे राज्य विकास का काम अपने हाथ में लेती है या संसाधनों का नियंत्रण करती है मक्कार शासक वर्ग को उतने हीं मक्कार ठेकेदार का वर्ग संझौता कर लेता है. चूंकि यह समझौता सत्ता के गिलियारे में या पांच तारा होटलों में होते है जहाँ परिंदा भी पर नहीं मार सकता लिहाज़ा ना तो गवाही मिलता है न कोई साक्ष्य (क्योंकि जनकल्याण के नाम पर कानून में लचीलापन जानबूझ कर लाया जाता है – २-जी स्पेक्ट्रम के “पहले आओ, पहले पाओ” के नियम की तरह). जिस समाज में कोल्यूसिवे किस्म का भ्रष्टाचार घर कर जाता है उसे ख़त्म करना बेहद मुश्किल होता है हालांकि नामुमकिन नहीं--- सिंगापुर और हांगकांग इसके उदाहरण हैं.

नूनन ने अपने किताब “ब्राइब” में कहा है “भ्रष्टाचार की सीमा वहां तक जाती हैं जहाँ तक समाज इसे लेकर सहिष्णु रहता है”. याने अगर समाज इसे नज़रअंदाज करता रहे तो भ्रष्टाचारी सांस लेने का भी पैसा लेने लगेगा. लिहाजा समाज को भ्रष्टाचार के प्रति असहिष्णु (इनटोलेरेंट) बनाना होगा और यह होगा बाल मस्तिष्क को बदल कर जो शुरूआती दौर में अगर घरों में नहीं तो कक्षा में तो हो हीं. बस एक डर है. ५५ साल पहले बेसिक शिक्षा की किताबों में एक पाठ था जिसमें तोते को सिखाया गया था “शिकारी आयेगा, दाना डालेगा , पर लोभी से उसमें फंसना नहीं”. पर जब एक बार शिकारी ने दाना डाला तो तोता यह रटता तो रहा लेकिन दाना खाने के चक्कर में शिकारी के जाल में फंस गया क्योंकि उसे उसका मतलब नहीं मालूम था.     

यूनानी कहावत है “मछली पहले सिर से सड़ना शुरू होती है”. भ्रष्टाचार के बारे में कहा जा सकता है यह भ्रूण से हीं शुरू हो जाता है. लिहाज़ा मोदी सरकार के प्रयासों के अलावा एक व्यापक जन चेतना की ज़रुरत भी होगी ताकि एक माँ उसे पालने में हीं (आजकल क्रेश में) नैतिकता का पाठ पढ़ाये ना कि यह बताये कि उस बच्चे का बाप भ्रष्टाचार करके कितनी बड़ी गाड़ी पर चलता है. जिस दिन बेटा या पडोसी भ्रष्टाचारी की लम्बी गाड़ी को हिकारत से देखने लगेंगे उसी दिन दिन से भ्रष्टाचार अंतिम सांसे गिनने लगेगा. दुर्योधन की प्रवृति धर्म पर चलने की हो जायेगी. 
jagran/lokm

Tuesday, 27 May 2014

परिणाम को मोदी की सुनामी कहना मोदी व जन-विवेक का अपमान ?


 


सन २०१४ के आम चुनाव परिणाम देश की जनता की सोच में प्रतीकात्मक बदलाव (पैराडाइम शिफ्ट) का संकेत दे रहे हैं. बढ़ती प्रति-व्यक्ति आय, ७४.४ प्रतिशत साक्षरता , मीडिया के जरिये तथ्यों का निर्बाध प्रवाह, स्टूडियो डिस्कशन से हासिल तर्क-शक्ति और सोशल मीडिया के माध्यम से अपने को अभिव्यक्त करने की सुविधा ने देश की जनता की सामूहिक चेतना को बेहतर किया है. वह “कोऊ नृप होहिं हमें का हानि“ की उदासीन –अवसाद की मानसिकता से निकल कर अब राज्य से सही अपेक्षा करने लगी हैं.

यह जनता पिछले तीन वर्षों में सभी राजनीतिक दलों को इस परिवर्तन का सिगनल भेज रहीं थीं. कभी भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना आन्दोलन में शरीक हो कर तो कभी बलात्कार के खिलाफ इंडिया गेट में खड़े हो कर. यह सन्देश सत्ताधारी कांग्रेस व उसके अगुवा राहुल गाँधी के लिए भी उतना हीं था जितना भारतीय जनता पार्टी और उसके संकटमोचन नरेन्द्र मोदी के लिए. राहुल और कांग्रेस ये संकेत नहीं समझ पाए या समझना नहीं चाहते थे जबकि मोदी ने ना केवल समझा बल्कि जनता से यह विश्वास भी हासिल कर लिया कि मोदी इन अपेक्षाओं को पूरा करेंगे. मोदी का कमल मात्र इतना था कि वह संकेतों के अनुरूप अपने व्यक्तित्व को उभर पाए.

जनता ने मोदी में पाया एक ऐसा नेता जो सक्षम विकासकर्ता है, कुशल प्रशासक है, भ्रष्टाचार के खिलाफ उन्हीं की तरह “शून्य सहिष्णुता” (जीरो टॉलरेंस) रखता है और जो अपने “छप्पन इंच छाती का इस्तेमाल आतंकवाद से लेकर पाकिस्तान के कुचक्रों से निपटने के लिए करेगा. यहीं चार अपेक्षाएं तो देश की जनता में थी. और इनमें से एक भी ना तो दकियानूसी सोच से विकसित है ना हीं अतार्किक रूप से भावनात्मक है जैसा मंदिर या मंडल काल में हुआ था. राजनीति-शास्त्र के सिद्धांत के अनुसार अर्ध- या अशिक्षित समाज में भावनात्मक मुद्दे वास्तविक मुद्दों पर भरी पड़ते हैं. १९९० तक समाज कम शिक्षित था, अतार्किक था लिहाज़ा मंडल-कमंडल उसकी जेहन को बदलते थे लेकिन आज स्थिति पूरी तरह  बदली है.

नये प्रधानमंत्री कैसे इन सपनों को पूरा करेंगे इसका पूरे देश को बेसब्री से इन्तेजार है. मोदी सरीखे सक्षम नेता को जनता ने निर्द्वंद ताकत (पूर्ण बहुमत) दे कर भेजा है ताकि कोई अवरोध ना रहे. हम ने देखा कि २-जी स्पेक्ट्रम घोटाले ने सरकार को १.७६ लाख  करोड़ रुपये का चुना लगाया. इस पूरे देश को अगर मुफ्त भर पेट अनाज सरकार दे तो मात्र १.५० लाख करोड़ रुपये का खर्च आएगा. यानि अगर प्रधानमंत्री मोदी मात्र एक ऐसा भ्रष्टाचार रोक सकें तो पूरे देश को बगैर किसी अतिरिक्त खर्च के १४ महीने तक मुफ्त भोजन दिया जा सकता है. और ऐसा करने में ना तो किसी फिस्कल डेफिसिट (वित्तीय घाटा ) नाधने का दर रहेगा ना कोई निवेश का माहौल बिगड़ेगा जिसकी दुहाई पिछली सरकार कॉर्पोरेट घराने और विदेशी निवेशक के कहने पर देती थी.

लेकिन इस चुनाव की विवेचना कुछ गलत ढंग से की जा रही है. हम भारत के लोग शब्दों को खर्ज करने में खुला दिल रखते हैं. होना यह चाहिए जहाँ दो शब्दों की ज़रुरत हो वहां एक से काम चलायें पर हम चार शब्दों का इस्तेमाल करने में नहीं हिचकते. भावना का भी अतिरेक हमारे डी एन ए में है. लिहाज़ा कई बार तार्किक सोच की बलि चढ़ जाती है. इसका आदत का समाजशास्त्रीय विश्लेषण यह है कि हम सम्बन्ध-आधारित समाज हैं न कि यूरोप या अमरीका की तरह संविदा-आधारित. भाई के रूप में भारत, पुत्र के रूप में श्रवण कुमार , मित्र के रूप में कृष्ण को आदर्श मानते हैं. लिहाज़ा वर्तमान चुनाव परिणाम आने के पहले और बाद में हमने “मोदी की लहर” या “मोदी की सुनामी” के विशेषण से जनमत को नवाजा.

अब जरा तथ्य देखें. इस चुनाव में हर दस लोग जो मतदान देने गए उनमें से तीन ने हीं भारतीय जनता पार्टी को वोट दिया जबकि २००९ के चुनाव में पार्टी को दो लोगों ने मत दिया था. क्या इसे किसी व्यक्ति-विशेष के पक्ष की लहर माना जा सकता है? कोई ८२ करोड़ मतदाताओं में ५४ करोड़ ने मतदान किया और भारतीय जनता पार्टी को मत मिले १७.२० करोड़. याने हर पांच लोगों में जिन्हें मतदान का अधिकार था मात्र एक ने इस पार्टी को वोट दिया. क्या इसे सुनामी की संज्ञा दी जा सकती है?

भारत के संविधान की प्रस्तावना में कहा गया है “हम भारत के लोग ---------धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी , प्रजातान्त्रिक गणतंत्र अंगीकार करते हैं”. अब एक अन्य उदाहरण लें. भारत के हीं उत्तर प्रदेश में रहने वाले २.३० करोड़ मतदाताओं ने मायावती की बहुजन समाज पार्टी को वोट दिया लेकिन इस पार्टी को एक भी सीट लोक सभा में नहीं मिली लेकिन इसी देश के तमिलनाडु में जयललिता की ए डी एम् के को कुल १.७० लाख वोट मिले और सीटें आयीं ३७. क्या इन २.३० करोड़ लोगों के वोटों की कीमत वह नहीं जो तमिलनाडु के वोटरों की है? दरअसल हमारी चुनाव पद्धति फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट (ऍफ़ पी टी पी) है यानी जो एक वोट से भी आगे वह विजयी. यह दोष उसका है.

एक अन्य उदाहरण देखें. इस चुनाव में कांग्रेस को करीब ११ करोड़ वोट मिले. लेकिन सीटें आयी ४४. लेकिन २००९ के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को आठ करोड़ से भी कम वोट मिले थे और सीटें मिली थीं १४४. इस तरह की चुनाव पद्धति का सबसे बड़ा दोष है मत और जीती सीटों में विसंगति. नतीजा यह होता है कि संसद प्रतिनिधि चरित्र का नहीं होता.

अब बात “मोदी की सुनामी की”. दरअसल इसे मोदी की सुनामी कह कर प्रधानमंत्री –नियुक्त नरेन्द्र मोदी का जितना अपमान किया जा रहा है उतना हीं जनता के विवेक का भी. अति-उत्साह में भारतीय जनता पार्टी या उसके समर्थक मोदी को महिमा-मंडित करने में यह भूल जा रहे हैं कि इस प्रचार से यह सन्देश जा रहा है कि मोदी कोई जादूगर हैं और चूंकि जादू छलावा होता है लिहाज़ा यह आभास होता है कि मोदी ने जनता को छल लिया है अपने वायदों से और अपनी वाक्-पटुता हे. किसी इतने बड़े देश के नेता के लिए यह अनुचित और दीर्घकाल में हानिकारक प्रशंसा है.
 
nai duniya