Thursday, 18 July 2013

तो बिहार फिर “फर्स्ट” !



कहीं यह नीतीश की प्रजातंत्र की नयी परिभाषा तो नहीं ? 

जिस दिन बिहार देश का पहला राज्य बना जहाँ मध्याह्न भोजन से २२ बच्चों की मौत हो गयी उसी दिन दिल्ली में पुलिस ने एक कार जब्त की जिसमें बिहार के मुंगेर जिले में बनाये गए ९९ बेहतरीन गैर-कानूनी पिस्तौल की खेप उत्तर भारत के अपराधियों को देने के लिए आ रही थी. यह जिला पिछले कई सालों से देश में अपराधियों को नकली हथियार सप्लाई का गढ़ माना जाता है. उसी दिन एक और खबर सरकार के सर्वेक्षण के हवाले से आई कि बिहार बाल विवाह के मामले में देश में “फर्स्ट” आया है. ताज़ा  नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की  रिपोर्ट के अनुसार जायजाद संबधित हत्या के मामले में प्रतिदिन तीन हत्याओं का रिकॉर्ड बना कर बिहार देश में अव्वल रहा है. ये हत्याएं हजारों की संख्या में हाल में उभरे भू-माफिया जमीन पर कब्जा करने के लिए कर रहे हैं. ध्यान देने की बात है बिहार आबादी घनत्व में १००३ प्रति किलोमीटर स्क्वायर के आंकड़े के साथ देश में सबसे आगे है क्योंकि परिवार नियोजन में असफल राज्यों में भी यह राज्य अपना झंडा सबसे ऊपर रखे है.

इतनी सारे “फर्स्ट” के बाद अगर बिहार के मुख्यमंत्री अपने को विकास में अग्रणी बताते हैं तो शायद उनकी विकास की परिभाषा अलग होगी.

अलास्टैर फर्रुजिया का एक कथन है : आजादी तब कहते हैं जब जनता अपनी बात कह सके, प्रजातंत्र तब जब सरकार उसे सुने. बिहार में बच्चों को दिए जाने वाले मध्याह्न भोजन की गुणवत्ता, पकाने का घटिया स्तर के बारे में हीं नहीं बल्कि उन अफसरों के जिन के जिम्मे इसे बेहतर करने का काम था, निकम्मेपण के बारे में कई बार अपनी रिपोर्ट केंद्र व बिहार सरकार को सौंपी थी. एक अन्य गैर-सरकारी संस्था ने तो यह भी बताया कि स्थानीय माफिया धमका कर इस स्कीम के लिए आये पैसे अपना हिस्सा वसूलते है. मीडिया लगभग हर तीसरे दिन किसी न किसी जिले में मध्याह्न भोजन से बीमार हुआ बच्चों के बारे में बताती रही है. लेकिन नीतीश की सरकार इन  सभी आवाजों को नज़रंदाज़ करती रही. शायद उसकी प्रजातंत्र की परिभाषा फर्रुजिया की परिभाषा से अलग है.

बच्चों के जीवन से सरकार के खिलवाड़ का यह आलम रहा कि केंद्र सरकार के द्वारा नियुक्त दो प्रमुख संस्थाओं ---- पटना –स्थित ए एन सिन्हा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज और दिल्ली की जामिया मिलिया इस्लामिया – ने बिहार में इस एम् डी एम् योजना के क्रियान्वयन को लेकर एक अध्ययन किया. दोनों ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि क्रियान्वयन में जबरदस्त खामियां है मसलन, तमाम स्चूलों में यह मिलता हीं नहीं है, अगर मिलता है तो घटिया स्तर का खाद्यान उपयोग किया जाता है और जिन स्थतियों में भोजन पकाया जाता है वह स्वच्छता के पैमाने पर बेहद स्तरहीन है. खासकर मुख्यमंत्री नीतीश के अपने गृहजिले में भी इस स्कीम की बुरी स्थिति थी. रिपोर्ट में इसे बेहतर करने के उपाय भी सुझाये गए थे. यह रिपोर्ट राज्य सरकार ने भी पढ़ी. इस योजना की निगरानी वाली सर्वोच्च संस्था प्रोग्राम अप्रूवल बोर्ड (पी ए बी) ने इस रिपोर्ट पर २३ अप्रैल, २०१३ को बिहार सरकार के शीर्ष अधिकारीयों बातचीत भी की और आगाह भी किया. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि राज्य स्तर के अधिकारी तो छोडिये , यहाँ तक कि जिले या ब्लाक स्तर के अधिकारी भी कभी भोजन की गुणवत्ता की जांच के लिए नहीं जाते. जब कि उन्हें हर माह इंस्पेक्शन करना है और इंस्पेक्शन रजिस्टर में अपनी प्रविष्टि भी लिखनी है. यह रहस्य तब खुला जब तमाम स्कूलों के रजिस्टर में प्रविष्टि का खाना महीनों से खाली पाया गया.

 “मिड-डे-मील” (एम् डी एम्) जिस मध्याह्न भोजन के नाम से समूचे भारत में चलाया जाता है शायद विश्व के प्रजातान्त्रिक लेकिन विकासशील देशों में सबसे उपादेय कार्यक्रमों में से एक माना जाता है. इस वर्ष सरकार ने इस मद में १३,२१५ करोड़ रुपये दिए हैं. इससे १२ करोड़ बच्चे स्कूल में पका भोजन १६७ दिन प्रति वर्ष दिया जाना चाहिए. याने हर बच्चे पर लगभग ५.५० रुपये प्रति भोजन का खर्च. इस कार्यक्रम के दो लाभ हैं. एक तो वे अभिभावक जो गरीबी के कारण बच्चों से काम करवाते थे ताकि कुछ आर्थिक मदद हो सके वे उन्हें स्कूल भेजने लगे ताकि कम से कम अपना एक वक़्त का भोजन तो सुनिश्चित हो सके और दूसरा पौष्टिक खाना मिला तो बच्चा एक स्वस्थ नागरिक बनेगा. यह अवधारणा अर्थशास्त्री फ्रीडमैन की उस सिद्धांत पर आधारित है जिसके अनुसार अगर विकासशील देशों में सकल घरेलू उत्पाद (जी डी पी ) के आकार में अपेक्षातीत वृद्धि हो तो चुनी हुई सरकारों को गरीबी  उन्मूलन के लिए डायरेक्ट डिलीवरी मोड़ (सीधे पैसे या वस्तु गरीबों को देना) में आ कर सीधे पैसे या वस्तु गरीबो को मुहैया करना चाहिए. ब्राजील में यह योजना “बोलसा फेमिलियास” के नाम से जबरदस्त रूप से सफल रही. भारत में, जो आज १.८  ट्रिलियन डॉलर की जी डी पी के साथ दुनिया के सात देशों में है में भी यह योजना या मंनरेगा इसी अवधारणा का प्रतिफल हैं. जहाँ देश में साक्षरता के लिए सर्व शिक्षा अभियान और मध्याह्न भोजन की बड़ी भूमिका रही है वहीं मनरेगा ने गरीबी सीमा रेखा से लोगों को ऊपर उठाने में भरी भूमिका निभाई है.

समस्या सिर्फ यह है कि ये योजनायें तो केंद्र सरकार की हैं परन्तु इनका अमलीकरण राज्य सरकारों के हाथ में हैं. जो राज्य सरकारें सक्षम हैं वे अपने प्रयास से ना केवल जनता को लाभान्वित कर रहीं है बल्कि उसका श्रेय भी केंद्र की जगह खुद ले रही हैं. छत्तीसगढ़ ऐसे नए राज्य ने तो अपनी तरफ से भी जन वितरण प्रणाली में पैसे देकर इससे जबरदस्त लोकप्रियता हासिल की है. जबकि बिहार अपने कोटे का ४५ प्रतिशत अनाज हीं उठा पता है जबकि यह सबसे गरीब राज्य होने की वजह से सबसे ज्यादा इसे सस्ते अनाज की दरकार थी. दक्षिण भारत के राज्य अपने कोटे का ९० से ९८ प्रतिशत तक उठाते है और जनता को वितरित करते हैं.  

मध्याह्न भोजन खा कर मरने वाले २२ बच्चों के इस घटना का तात्कालिक असर यह होगा कि पूरी योजना जिसका देश की भावी पीढी पर सकारात्मक असर होता दम तोड़ देगी. कोई गरीब अभिभावक भी अपने बच्चे को इसलिए स्कूल नहीं भेजेगा कि वहां खाना खिलाया जाता है जिससे बच्चे मर जाते हैं.

वैसे भी सम्मानित स्वयंसेवी संस्था असर की हाल की रिपोर्ट के अनुसार बिहार में कक्षा ५ के ७० प्रतिशत बच्चे कक्षा २ का ज्ञान नहीं रखते. सोचने की बात है कि दस साल बाद जब वह प्रयोगी परीक्षाओं में जायेंगे तो उनकी स्थिति क्या होगी. शायद बिहार के मुख्या मंत्री की प्रजातंत्र में सरकार के सुनने का मतलब मात्र यह होता है कि दिल्ली में जा कर बिहार के लिए स्पेशल दर्जे की मांग कर बिहारियों को बताओ को वह उनके लिए चिंतित हैं.

jagran

Monday, 15 July 2013

न्यूज़ बनाम मनोरंजन---- सरकार को दोनों में फर्क समझना होगा



मीडिया मरे नहीं यह प्रजातंत्र के स्वास्थ्य के लिए ज़रूरी

भारतीय इलेक्ट्रॉनिक न्यूज़ मीडिया एक संक्रमण के दौर से गुजर रहा है. इनमें  कुछ स्थितियां इसकी बहबूदी और जनोपादेयता को मजबूत करेंगी तो कुछ कमजोर. इनमें तीन प्रमुख हैं. पहला : न्यूज़ चैनलों के प्रबंधन ने बाजारू ताकतों द्वारा संचालित और नितांत त्रुटिपूर्ण दस साल से चले आ रहे  “टैम” (दर्शकों की पसंद नापने की प्रक्रिया) नामक जुए को उतार फेंकना. दूसरा, दर्शकों का रुझान घटिया मनोरंजन से हट कर कुछ-कुछ खबरों की तरफ बढना. तीसरा: कानून के अनुपालन के तहत सभी चैनलों को अपने विज्ञापन समय को १२ मिनट प्रति घंटे तक महदूद करना याने राजस्व में भारी गिरावट (या कुछ लोगों के अनुसार लाभ में कमी जबकि कुछ अन्य के अनुसार घाटे में).   

इन तीनों स्थितियों के निरपेक्ष विश्लेषण की ज़रुरत है. पहली और दूसरी स्थितियां भारतीय इलेक्ट्रॉनिक न्यूज़ मीडिया को प्रेरित करती हैं कि अपने कंटेंट (विषय-वस्तु) को और बेहतर और विश्वसनीय करे  ताकि लोग क्रिकेट मैच की तरह न्यूज़ बुलेटिन देखना अपना धर्म मान लें. अगर यह हो सका तो न्यूज़ चैनल सामजिक और तज्जनित राजनीतिक विकृतियों को दूर करने में संवाहक की भूमिका में होंगे और वह दिन शायद विश्व मीडिया के इतिहास का स्वर्णिम दिन होगा. तीसरे को व्यापक दृष्टिकोण से देखना होगा.

अमरीकी संविधान से अलग भारत में मीडिया के लिए संविधान में कोई अलग व्यवस्था नहीं है. यह नागरिक की अभिव्यक्ति स्वतंत्रता से हीं अपने अस्तित्व का औचित्य हासिल करता है. यह अभिव्यक्ति कई तरह की होती है. सड़क पर डमरू बजा कर नट जो नाच करता है (अगर वह पैसे के लिए नहीं है और यातायात बाधित नहीं करता) भी इसी अधिकार की दुहाई देता है. मनोरंजन के टीवी शो जो भौंडे द्वैयार्थिक कॉमेडी के नाम पर कार्यकर्म होते हैं वह भी अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य के अधिकार में आते हैं. जान पर खेल कर सत्ता से टकराते हुए भ्रष्टाचार का सत्य उजागर करने वाली खबर भी. डांस शो भी इसी अधिकार का भाग है और उत्तराखंड में शून्य तापमान पर रहते हुए अपनी खबरों से सरकार को मदद भेजने के लिए मजबूर करना भी उसी अधिकार के तहत होता है. लेकिन क्या दोनों कीं जनोपादेयता में व्यापक अंतर नहीं है? क्या मनोरंजन चैनल भी उसी स्तर पर रखे जाने चाहिए जिन पर न्यूज़ चैनल? क्या यह खबर कि किस दिन कोई मंत्री का निकट का रिश्तेदार किसी व्यवसायी से टेंडर खुलने के एक दिन पहले किस होटल के गुप्त कमरे में मिलता है और कैसे उसके अकाउंट में कुछ करोड़ रुपये ट्रान्सफर हो जाते हैं या कैसे एक सरकार का मंत्री अविश्वास प्रस्ताव के दो दिन पहले कुछ निर्दलियों के साथ बैठक करता है और उनमें से एक निर्दलीय सदस्य के घर अगले दिन एक नयी महंगी कार आ जाती है वही जनोपादेयता रखती है जो सास  - बहू का कार्यक्रम ? कैसे सरकार का मंत्री सी बी आई को बुलाकर प्रधानमंत्री कार्यालय और सम्बंधित मंत्रालय के अधिकारियों की मौजूदगी में कोयला घोटाले की जांच रिपोर्ट का मजमून बदलवाता है यह खबर किसी भी “डांस नाइट” से ज्यादा महत्वपूर्ण है. एक विकासशील समाज में जिसमें मनोरंजन मात्र चंद अभिजात्य वर्गीय लोगों का, जो रोटी जीत चुके हों, शगल हो, क्या खाद्य सुरक्षा, महंगाई, भ्रष्टाचार या या बेरोजगारी जैसे गंभीर मुद्दों पर न्यूज़ चैनलों द्वारा जनमत का दबाव बनाना ज्यादा जरूरी नहीं है?

अभावग्रस्त, विकासशील समाज में नयी तकनीकि पर पहला हक उन गरीबों का होता है जो जीने की  मूल समस्याओं से जूझ रहे हैं. अगर मुफ्त शिक्षा, गरीबों के होनहार बच्चों के लिए आई आई टी की कोचिंग, किसानों के लिए कृषि तकनीकी के ज्ञान को लेकर अगर चैनल आते हैं तो एक बड़े वर्ग का भला होगा और देश रोटी जीत कर भविष्य में उपयोगी और स्वस्थ नागरिक पैदा करेगा. इसी तरह न्यूज़ चैनल प्रजातंत्र की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए ज़रूरी हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से अपने फैसलों में कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का कोई मतलब नहीं रहेगा अगर वह अभिव्यक्ति संचारित ना हो. सरकार के एक अच्छे प्रयास से यह तो हुआ है कि धीरे-धीरे नयी तकनीकी के ज़रिये सभी चैनलों को उस अनाप-शनाप खर्च से बचाया जा रहा है जो डिस्ट्रीब्यूशन (घर तक पहुंचाने के लिए केबल ऑपरेटरों को दिया जाता था). यह खर्च कुल खर्च का लगभग ४० प्रतिशत होता था या यूं कहें कि न्यूज़ लेन के मद में होने वाले खर्च का चार गुना. क्या यह बेहतर नहीं होगा कि कानून बनाते समय इस बात का ध्यान रखा जाये कि जनोपादेयता के हिसाब से चैनलों का वर्गीकरण किया जाये और यह सुनिश्चित किया जाये किसानों के लिए चैनल , शिक्षा के प्रसार के लिए चैनल या न्यूज़ चैनल ऐसे वर्ग में हों जिनका खर्च कंटेंट में ज्यादा लगे.

एक और दिक्कत है. आज भी खबर और मनोरंजन के दर्शकों के बीच १ और ७ का अनुपात है. यही वजह है कि विज्ञापन (जो चैनलों के आय का मुख्य श्रोत है) देने वाला अपना माल बेंचने के लिए मनोरंजन चैनलों का रुख करता है. नतीजा यह कि जहाँ न्यूज़ चैनलों में विज्ञापन का औसत दर ६०० रुपये प्रति दस सेकंड भी नहीं है वहीं मनोरंजन चैनलों में यह दर औसतन ३० गुना ज्यादा है. कुछ मनोरंजन चैनल अपना समय एक लाख रुपये प्रति दस सेकंड  से ज्यादा में बेंच रहे हैं. न्यूज़ के कुछ बड़े चैनलों को छोड़ कर क्षेत्रीय चैनल बुरी तरह घटे में चल रहे हैं. कमो-बेश यही हालत अधिकांश तथाकथित राष्ट्रीय चैनलों की है. बड़े चैनल भी बहुत अच्छी स्थिति में नहीं हैं.                  

   एक सुखद परिवर्तन यह है कि जनता का रुझान पिछले कुछ समय से न्यूज़ की तरफ बढा है. न्यूज़ चैनलों ने भी इस चिर-अपेक्षित परिवर्तन का खैर-मकदम करते हुए अपने कंटेंट (विषय-वस्तु) अधिकाधिक जनोपादेय बनाने की कोशिश की है. लगभग हर न्यूज़ चैनल शाम को या दिन में देश के प्रमुख मुद्दों पर स्टूडियो से डिस्कशन करता है जिसमें मुद्दे के जानकार लोगों के अलावा राजनीतिक दलों के लोग शिरकत करते हैं. समृद्ध प्रजातंत्र की प्रमुख शर्त है जनता को तथ्यों से अवगत कराना, तर्क क्षमता बढ़ना और उन्हें अपनी राय बनाने के लिए हर पक्ष की बात उनतक पहुँचना. न्यूज़ मीडिया यह काम बखूबी कर रहा है हालांकि कई बार यह डिस्कशन तू-तू-मैं-मैं से ऊपर नहीं बढ़ पाता और जनता को सिर्फ यह पता चल पाता है कि किस नेता की गले में कितनी ताकत है और कौन नेता अपने शीर्ष नेता को खुश करने के लिए दूसरे पक्ष की बोलती बंद करने का हौसला रखता है. पर आने वाले दिनों में यह और बेहतर होगा.

तीसरा मुद्दा ज्यादा गंभीर है. कानून का अनुपालन करते हुए न्यूज़ चैनलों को . अपने विज्ञापन की समय सीमा को १२ मिनट करना होगा. अब अगर ये चैनल अपना रेट बढ़ाते है तो विज्ञापनदाता मनोरंजन चैनलों की तरफ रुख करेगा और अगर नहीं बढ़ाते तो आय का अन्य कोई साधन नज़र नहीं आता. यह बात सही है कि यूरोप के देशों में चैनलों के लिए 12 मिनट की विज्ञापन सीमा है लेकिन वहां विज्ञापन से मात्र 30 प्रतिशत राजस्व आता है, बाकी 70 प्रतिशत दर्शकों से। भारत में इसके विपरीत चैनलों को 90 प्रतिशत आय विज्ञापनों से होती है। एक अन्य साधन है दर्शकों से पैसे लेने का लेकिन अगर यह किया गया तो उससे गरीब दर्शक न्यूज़ से वंचित हो सकता है क्योंकि वह ज्यादा पैसे देने की क्षमता नहीं रखता. 

बहरहाल जहाँ सरकार को प्रजातंत्र की गुणवत्ता के लिए न्यूज़ चैनलों को स्वस्थ आर्थिक हालत में रखने के लिए कानून बनाकर उनका वितरण बगैर किसी खर्च के होना सुनिश्चित करना होगा जैसा कि लोक सभा और राज्य सभा चैनलों के लिए किया गया वहीं न्यूज़ चैनलों को भी कमर कस कर कंटेंट को इतना मजबूत बनाना होगा कि मनोरंजन से हट कर दर्शक न्यूज़ बुलेटिन देखना अपना धर्म समझने लगे.    
bhaskar 


Sunday, 14 July 2013

सिस्टम शुद्धिकरण का सही वक्त

भारतीय समाज में आजादी का आन्दोलन छोड़ दें तो बुराइयों को लेकर जानाक्रोश कई शताब्दियों की गुलामी और तज्जनित “कोऊ नृप हो हीं हमें का हानी (नि)” के शाश्वत भाव की भेंट चढ़ता रहा है. देश में शीर्ष से लेकर नीचे तक व्यापत भ्रष्टाचार का सांप पूरे समाज को डसता रहा लेकिन सिस्टम ने कभी किसी ऐसे व्यक्ति को सजा नहीं दी जिससे भ्रष्टाचारी के मन में डर व्यापत हो और जनता के मन में सिस्टम के प्रति सम्मान. चूंकि दासत्व की जबरदस्त भावना सत्ता के प्रति आक्रोश की जगह उदासीनता पैदा करती है इसलिए देश में चुनाव के समय भी भ्रष्टाचार मुख्य मुद्दा नहीं बन पाता. मुद्दा बनता है तो मंदिर-मस्जिद, जाति, रॉबिनहुड इमेज वाला अपराधी-नेता. अपराधी होना जनता की नज़रों में कोई योग्यता नहीं होती. विख्यात न्यायविद सॉलमण्ड ने कहा था- वह समाज जो कि गलत कार्यों को भोगने के बाद भी अपने अंदर क्रोध नहीं पैदा कर पाता उसे कानून की एक प्रभावी पद्धति कभी नहीं मिल सकती। भारत में प्रभावी कानून जो इस क्रांति को जन्म दे बन हीं नहीं सकता क्योंकि एक बड़ा वर्क जो चुनकर आता है वह जनप्रतिनिधि कम बाहुबल , धन-बल या जाति व्यवस्था की कुरीति का उत्पाद होता है.  

लन्दन –स्थित ग्लोबल करप्शन बैरोमीटर-२०१३ पूरी दुनिया के १०७ देशों में करीब १,७०००० लोगों से उनके देश में भ्रष्टाचार के बारे में सर्वेक्षण किया. जहाँ विश्व के अन्य देशों में औसतन २७ प्रतिशत लोगों ने कहा कि पिछले १२ महीनों में उन्हें रिश्वत देनी पड़ी है, भारत के ५४ प्रतिशत लोगों ने इस बात को कबूला. यानि भारत में घूस का बोलबाला दूना. सर्वेक्षण के अनुसार भारत में अगर प्रमुख संस्थाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार की बात की जाये तो लोगों राजनीतिक दलों को सबसे ज्यादा भ्रष्ट माना और इस स्केल पर राजनीतिक वर्ग को पांच में से ४.४ अंक मिले.  

लेकिन प्रजातंत्र की एक खूबसूरती है. देर से हीं सही कोई ना कोई संस्था अचानक जन-विश्वास जीतती हुई कड़ी होती है और वह अन्य भ्रष्ट संस्थाओं पर लगाम कसना शुरू करती है. आज देश में सर्वोच्च न्यायलय यह काम कर रहा है. जन-आक्रोश तो नहीं बन पाया लेकिन जनता की सामूहिक चेतना भ्रष्टाचार के खिलाफ या बलात्कार के खिलाफ या यूं कहें कि सिस्टम के खिलाफ इंडिया गेट पर जुटाने लगी है. सुप्रीम कोर्ट ऐसी संस्थाओं को ऐसे सामूहिक चेतना से बल मिलता है.  

यूरोप में एक कहावत प्रचलित है “फिश रोट्स फ्रॉम थे हेड फर्स्ट”  (मछली पहले सर से सड़ती है). शुद्धिकरण की प्रक्रिया घुरहू को पड़ने से नहीं बल्कि घरहू से जाति के नाम पर वोट लेने वाले को बदलने से होगा. लेकिन राजनीतिक वर्ग का हौसला देखिये. आजतक के १५ आम चुनावों या दर्जनों राज्य के चुनावों में भ्रष्टाचार मुख्य मुद्दा नहीं बन पाया. अगर बना भी (जैसे बोफोर्स के मामले में) तो मात्र एक चुनाव के लिए. 

कुछ उदाहरण लें. अगले चुनाव का मुदा फिर मंदिर बनेगा या मोदी. जबकि भ्रष्टाचार के मामले मसलन २-जी घोटाला, राष्ट्रमंडल खेल घोटाला , कोयला घोटाला आज मोदी के व्यक्तित्व की आंच में गल गए से लगते हैं. हाल हीं में उत्तर प्रदेश के चुनाव में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एन आर एच एम्) में प्रदेश में 8800 करोड़ में से 5000 करोड़ सरकारी अमला और मंत्री से लेकर संतरी तक, हजम कर गए लेकिन यह चुनावी मुद्दा नहीं बन सका। भ्रष्टाचार को लेकर पूरे देश में कुछ महीनों पहले लगा था कि एक जबर्दस्त जनाक्रोश फूट पड़ा है और अब यह आक्रोश ठंडा नहीं पड़ने जा रहा है। लेकिन उत्तरप्रदेश, उत्तराखण्ड या अन्य तीन राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनावों में शायद ही भ्रष्टाचार एक मुद्दा बन पाया है। ऊपर से तुर्रा यह कि राजनीतिक दलों ने फिर वही हिमाकत दिखाते हुए आपराधिक छवि के लोगों को टिकट दिया है। बड़ी पार्टियों द्वारा खड़ा किया गया हर तीसरा उम्मीदवार आपराधिक पृष्ठभूमि का है।

   ऐसा लगता है कि तुलसीदास के कोउ नृप होहिं हमे का हानिकी अनमनस्कता ने हमारी विद्रोही रगों को कहीं गहरे तक खत्म कर दिया है। हमें उसकी चिंता नहीं रहती कि नृप कौन होगा क्योंकि हमने मान लिया है कि चेरी छोड़ न होउब रानीयानि सत्ता सत्ताधारियों की है, लूटना उनका काम है और हमें दासत्व भाव में इस त्रासदी को जीवनपर्यन्त झेलना है। वरना कोई कारण नहीं था कि राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन में इतने बड़े घपले के बाद भी भ्रष्टाचार मुद्दा न बनता।  

नोनन ने अपनी किताब ब्राइबमें लिखा था- हमें जनजीवन में भ्रष्टाचार के बारे में अपना फैसला इस आधार पर नहीं करना चाहिए कि हमने कितने कानून बनाए और कितने लोगों को सजा दी। करप्शन की विभीषिका का अंदाज़ा तब मिल पाता है जबकि हम यह समझ पाएं कि समाज छोटे से छोटे भ्रष्टाचार या अनैतिकता को लेकर किस हद तक संवेदनशील हैं।                                                                                   
सभी राजनीतिक दलों ने अपना घोषणा-पत्र जारी करते हैं लेकिन एक भी यह नहीं बताता  कि भ्रष्टाचार से लड़ने का उनके पास कौन सा नुस्खा है ? किसी ने मुस्लिम आरक्षण की बात की तो किसी ने बेरोज़गारों को बैठे-बैठाए भत्ता देने का वादा किया। दरअसल हमाम में रहने का एक अलिखित कोड है कि कोई किसी को नंगा नहीं कहेगा।

   इटली की समसामयिक राजनीतिक पृष्ठभूमि का अध्ययन करने से समझ में आता है कि किस तरह माफिया गैंग कानून-व्यवस्था व सरकारों पर भारी ही नहीं पड़ते बल्कि उनको जिस तरह चाहते हैं तोड़-मरोड़ लेते हैं। भारत में भी जिस तरह टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले में सादिक बाचा जो कि ए.राजा का काफी करीबी माना जाता था, की लाश फांसी में लटकी हुयी उसके घर में पायी गयी, इस बात के संकेत हैं। इसी तरह चारा घोटाल के मामले में पशुपालन मंत्री भोलाराम तूफानी ने खुद को चाकू घोपकरआत्महत्या कर ली। वह भी घोटाले में आरोपी थे। इसी तरह 

70 लाख करोड़ की ब्लैकमनी की कोख से उपजा भ्रष्टतंत्र भीमकाय होता रहा और अब वह इतना ताकतवर हो गया है कि समूचे समाज को मुंह चिढ़ाकर राजफाश करने वालों की हत्याएं कर रहा है। 

इसी बीच जो कुछ दासत्व भाव वाले गलती से शीर्ष पर पहुंच गए उन्होंने भी नृप का चोला पहन लिया और मौसेरे भाई बन गए। इनमें से अगर कभी किसी ने अन्नाभाव में आने की कोशिश की तब या तो वह अलग-थलग पड़ गया या तो चांदी के जूते खाकर चुप हो गया। आज खतरा यह है कि इस भ्रष्टतंत्र में लगे माफिया अब न तो उन्हे अलग-थलग करेंगे ना तो चांदी का जूता दिखाएंगे बल्कि सिर्फ यह संदेश देंगे कि मौत कब, कहां आ जाए कोई भरोसा नहीं।   

आज से कुछ साल पहले तक अपराधी को यह डर रहता था कि भरी बाजार से लड़की उठाने पर लोगों का प्रतिरोध झेलना पड़ सकता है। लेकिन नए परिदृश्य में यह डर हो रहा है कि कहीं अपहर्ता गलती यह न समझ ले कि अमुक ने इस घटना को देखा भी है। हम नजरें मोड़ लेने के भाव में आ गए हैं। पुलिस वाला भी उस जगह से खिसक लेता है जहां अपराधी की हलचल दिखायी देती है। अमेरिका में इन्हीं स्थितियों से निपटने के लिए विटनेस प्रोटेक्शन लॉ(गवाह सुरक्षा अधिनियम) लाया गया ताकि हम अपराधी का प्रतिरोध न कर सकें तो कम से कम गवाही तो दे सकें। एफ.बी.आई को यहां तक शक्ति दी गयी है कि वह न सिर्फ अपने गवाहों की पहचान बदल देते हैं बल्कि अपने गवाहों को नए नाम से नए शहर में नए सिरे से जीने के लिए सारी सुविधाएं और धन मुहैया कराते हैं। इसके ठीक विपरीत आज भारत में इस बात का खतरा है कि पुलिस अपराधियों से अपनी जान बचा रही है।  

आज प्रजातंत्र के मंदिर –संसद – के सदन लोक सभा में जनता से चुन के आये कुल ५४३ में से १६२ सांसद पर खुद उन्हीं के हलफनामे के अनुसार आपराधिक मुकदमें चल रहे हैं. इनमें से १०२ पर गंभीर और उनमें ७६ पर जघन्य अपराध के मामले हैं. यानी हर तीसरा जनता का सदस्य अपराधी है. झारखण्ड में ऐसे आपराधिक छवि वाले लोग बहुमत (५४ प्रतिशत ) हैं. यानी वे जो चाहें कानून पारित करवा सकते हैं

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rashtriya sahara

सही अमल हो तो खाद्य कानून कांग्रेस का “गेम चेंजर” हो सकता है!


हालांकि नव –उदारवादी अर्थ -व्यवस्था में कल्याणकारी राज्य की भूमिका से सरकार लगभग विमुख हो चुकी थी जिसका उदाहरण स्वास्थ्य और शिक्षा का जबरदस्त निजीकरण है--- आज गरीब आदमी के लिए क्वालिटी शिक्षा एक सपना है और बीमार पड़ना एक ऐयाशी ----लेकिन खाद्य सुरक्षा कानून बना कर वर्तमान सत्ता पक्ष ने यह दिखाने की कोशिश ज़रूर की है कि गरीब उनके राडार पर है भले हीं वोट के लिए.  बहरहाल देर आयद, दुरुस्त आयद. विश्व के किसी भी प्रजातंत्र में गरीबों को भूख जीतने के लिए राज्य की तरफ से शायद यह पहला कानून है. जिसमें भोजन का अधिकार भारत के ६७ प्रतिशत लोगों को या यू कहें कि विश्व के १३ प्रतिशत आबादी को मिलने जा रहा है. जैसे अनुसूचित जाति के लिए रिजर्वेशन की संवैधानिक व्यवस्था को चाह कर भी उच्चवर्गीय दल छेड़ नहीं सकते उसी तरह एक बार कानून बनने की बाद अब कोई भी दल इसे बेहतर हीं करने का उपक्रम करेगा.   
   जो सबसे बड़ी मूर्खता , जिसे पालिसी पैरालिसिस (नीतिगत पक्षाघात) के नाम से जाना जाता है इन चार सालों में सरकार के खाते में रही है वह यह कि वह यह कि अनाज सड़कों पर बारिश में सड़ रहा था , चूहे (या आदमीनुमा चूहे) खा रहे थे (हमारे पास मात्र ५० मिलियन टन की भण्डारण क्षमता है जबकि सरकार के पास अनाज करीब ८८ मिलियन टन है) लेकिन सर्वोच्च न्यायलय की सलाह के बाद भी सरकार ने इसे “चूहे” के पेट में जाने दिया , आदमी के पेट में नहीं. याद आता है नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन का अपनी मशहूर पुस्तक  “गरीबी एवं  दुर्भिक्ष “ में यह कहना कि क्रियाशील प्रजातंत्र में दुर्भिक्ष नहीं हो सकता क्योंकि सरकार पर मीडिया या जनमत का इतना बड़ा दबाव रहता है कि उसे चाहे जैसे भी हो रसद पहुँचाना हीं पड़ता है. दरअसल १९४२ के बंगाल दुर्भिक्ष में सेन ने पाया कि अनाज प्रचुर मात्र में अंग्रेज़ सरकार के पास था परन्तु दबाव नहीं था लिहाज़ा २० लाख लोग भूख से मर गए. भारत में तो मीडिया हीं नहीं सर्वोच्च न्यायलय भी सरकार को अपने गोदाम खोलने के लिए कहता रहा. लेकिन कोई चिदंबरम या कोई प्लानिंग कमीशन इस बात को लेकर खूंटा गाड़ कर बैठ गया कि इस कानून से वित्तीय घटा बढ़ेगा. चुनाव घोषणा पत्र में वायदे के बावजूद कांग्रेस की नेतृत्व वाली सरकार को चार साल लग गए इस कानून को बनाने में. क्या अनाज की जगह प्रजातंत्र में चूहे का पेट है या आदमी का पेट वह भी जब करोड़ों आदमी भूखे हो?
    कांग्रेस की अगुवाई वाली यू पी ए -२—के शासन काल की दो विशेषताएं रहीं हैं. पहला, भ्रष्टाचार को लेकर जनता की सामूहिक चेतना में व्यापक बदलाव जो कि आने वाले दिनों में काफी सकारात्मक भूमिका निभाएगा. इस सामूहिक चेतना के विकास का “श्रेय” भी सरकार अदूरदर्शिता को जाता है. इस काल में  भ्रष्टाचार की तीन घटनाओं ---२-जी, कामनवेल्थ घोटाला और कोलगेट—ने देश की चेतना को झकझोर दिया. ऐसा नहीं कि शासन-प्रायोजित भ्रष्टाचार  पहले नहीं होता था, लेकिन बढ़ती शिक्षा-जनित तार्किक समझ, राज्य के प्रति जनता का “माई-बाप” भाव का ह्रास और राज्य से बढ़ती अपेक्षाओं ने जनता के मनस को औपनिवेशिक जड़ता से बाहर निकाला. ट्रेन में रिजर्वेशन देने के लिए घूस लेने वाले टी टी को, पैसे मांगने वाले पुलिस दरोगा को सामूहिक रूप से पकड़ कर पीटा और कानून के हवाले किया. अन्ना आन्दोलन में या बलात्कार की घटनाओं पर क्षण भर में हज़ारों युवा इंडिया गेट पर पहुँच गए. जनता के इस नए तेवर से सत्ता पक्ष के पसीने छूट गए. भ्रष्टाचार के मामले में अगर कामनवेल्थ घोटाले को छोड़ दिया जाये तो बाकि दोनों में जनता की नज़रों में शीर्ष नेतृत्व किसी ना किसी स्तर पर दोषी नज़र आया या तो सीधे तौर पर या स्थितियों को जान –बूझ कर नज़रंदाज़ करने के कारण.  
दूसरी विशेषता यह रही कि देश सकल घरलू उत्पाद के नज़रिए से दुनिया के आठ देशों में आ गया. भारत के पास अनाज की रिकॉर्ड पैदावार ---2५८ मिलियन टन तक पहुँच गयी. जिस सरकार के पास ८८ मिलियन टन का खाद्यान्न रिज़र्व हो(जो कि समान्य से कई गुना ज्यादा है) और जिस सरकार को अभावग्रस्त किसानों के आत्महत्या की खबरें लगातार आती रही हो, उस सरकार के कार्यकाल में महंगाई आसमान छू जाए, इसका सीधा मतलब था कि रायसीना शक्तिपीठ पर काबिज़ मनमोहन-चिदंबरम-कपिल सिब्बल की तिकड़ी को बदलते जनमत को समझने की क्षमता नहीं थी।
देश की अर्थ-व्यवस्था में कुछ मौलिक खामियां नज़र आने लगीं. सन १९८० से इंदिरा गांधी ने उदारवाद की प्रक्रिया शुरू की जो अगले दशक में राव-मनमोहन जोड़ी ने अर्थ-व्यवस्था को शासकीय शिकंजों से उबरते हुए वैश्विक अर्थव्यवस्था में समेकित किया. और उसके अगले दशक में यानि २००१ से नव-उदारवादी अर्थ-व्यवस्था का आगाज़ हुआ. इन ३२ सालों में भारत की औसत जी डी पी ६.५ प्रतिशत रही जो विश्व- स्तर सराहनीय थी. लेकिन जो सबसे बड़ी चिंता की बात थी वह यह कि सन १९८० में मानव विकास सूचकांक में भारत १३४वें स्थान पर था. और २०११ में भी वह ठीक १३४ वें स्थान पर रहा.    
खाद्य सुरक्षा बिल 64 वर्ष के शासनकाल का (बल्कि विश्व का ) शायद सबसे बड़ा जनोपयोगी कानून बना । बल्कि यूं कहें कि समूचे विश्व में सीधी डिलीवरी का इतना बड़ा कोई प्रयास नहीं हुआ है। लेकिन यू.पी.ए सरकार और इसके समझदार मैनेजरों ”  में सरकार के अच्छे कार्यों का भी श्रेय लेने की समझ नहीं है। पिछली बार यह बिल भी संसद में ठीक उसी दिन लाया गया जिस दिन विवादास्पद लोकपाल बिल सदन के पटल पर रखा गया लिहाज़ा मीडिया में और संपूर्ण देश में लोकपाल बिल पर जम कर चर्चा हुयी। खाद्य सुरक्षा बिल जिसमें कि एक रुपए से तीन रुपए तक या रियायती दरों पर लगभग 70 करोड़ लोगों को अनाज देने की सरकारी प्रतिबद्धता थी, चर्चा में नहीं रही। यू.पी.ए-2 के अब तक के शासनकाल में शीर्ष पर बैठे लोगों में राजनीतिक सूझ-बूझ की बेहद कमी नज़र आती है। विश्वास नहीं होता कि यह वही कांग्रेस का नेतृत्व है जिसे कई दशकों तक शासन चलाने का अनुभव रहा है. इस बार भी जब यह उपक्रम शुरू किया गया तो अध्यादेश के जरिये जबकि बेहतर होता कि इसे जबरदस्त प्रचार दे कर सीधे संसद में विधेयक के रूप में लाते. किसी राजनीतिक दल की हिम्मत नहीं होती कि इसके खिलाफ जाये. लेजिन शायद यह कांग्रेस के डी एन ए की समस्या है. 
   अगर गहराई से विश्लेषण करें तब पाएंगे कि मनरेगा अभी तक सीधी डिलीवरी का पहला कार्यक्रम था , जिसमें कि सरकार सीधे रोज़गार का सृजन करके पैसा ग्रामीण बेरोज़गारों को देती है. यह एक बेहद जनोपयोगी योजना रही है। और कांग्रेस को इसका फायदा २००९ के चुनावों में फिर से सरकार बनाने के रूप में मिला.  लेकिन भ्रष्ट राज्य सरकारों के हाथ इसका क्रियान्वयन न होने की वजह से अपयश भी केंद्र सरकार के खाते में चला गया। 
   इस कानून के तहत पहली बार केंद्र सिविल सोसाइटी को क्रियान्वयन के स्तर पर जोड़ रही है—राज्य और जिला स्तर पर. अगर  खाद्य सुरक्षा कानून पर सही अमल हो जाये तो  देश में बढ़ती अमीरी-गरीबी की खांई को कुछ कम करने का एक बड़ा ज़रिया हो सकता है। भारत जैसे देश में जहां कि जितनी अमेरिका की पूरी आबादी है उतने लोग रोज़ शाम को भूखे सोते हैं, सस्ते दाम पर अनाज उपलब्ध कराना किसी भी सरकार की नेक-नियति को उसकी स्थायी राजनीतिक सुग्राह्यता के रूप में जनता में पेश किया जा सकता था लेकिन आज संदेश यह जा रहा है कि सोनिया न होतीं तब मनमोहन एण्ड कंपनी इस बिल को कभी पास ही न होने देती। क्या संभव है कि सोनिया के मैनेजर कम से कम पार्टी के इस गिरते ग्राफ को रोक सकें ?

sahara hastakshep

Wednesday, 10 July 2013

इशरत एनकाउंटर: राज्य अभिकरणों का गैर-कानूनी रास्ते का औचित्य



इशरत जहाँ एनकाउंटर से दो सवाल उभरते हैं. क्या वह पाकिस्तान के आतंकवादी गुट की सदस्य के रूप में काम कर रही थी? और अगर कर भी रही थी तो क्या पुलिस को आई बी के अधिकारियों से मिल कर उसे फर्जी एनकाउंटर में मारना उचित  था? बौद्धिक स्तर पर सोचने पर स्पष्ट लगता है कि राज्य के अभिकरणों को इस तरह का अधिकार देने का मतलब संविधान , न्यायालय और कानून की व्यवस्था को नष्ट कर एक अधिनायकवादी व्यवस्था को जन्म देना है. अच्छा लगता है दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में बैठ कर प्रजातंत्र  या संविधान के मौलिक स्वरुप को अक्षुण्ण बनाये रखने का भाव और वह भी तब जब बुद्धिजीवी स्वयं कभी भी अपने जीवन में आतंकवाद की विभीषिका न झेला हो.

पर जरा गौर करें. अपराध न्याय व्यवस्था गवाह व तथ्यों पर चलती है. गवाह या साक्ष्य जुटाने वाला किसी का बाप, किसी का बेटा है, जिसे नौकरी के बाद घर आना है. आतंकवादी के लिए कोई “रूल ऑफ़ गेम” नहीं है. झारखण्ड के पाकुर जिले का एस पी व पांच पुलिस जवान १०० माओवादियों की गोली का निशाना बनते हैं. हकीकत यह है कि जनता का एक भी गवाह यह नहीं कहने जा रहा है कि उसने अमुक माओवादी को गोली चलाते देखा है. न्यायपालिका का यह हाल है कि बिहार के बथानी टोला में २३ दलितों को सवर्णों ने हत्या कर दी  लेकिन सेशंस कोर्ट के फैसले को उलटते हुए हाई कोर्ट ने “साक्ष्य के अभाव” में सभी आरोपियों को छोड़ दिया.    

आतंकवादी बदला लेगा , यह डर सभी को होता है , जनता से लेकर सत्ता में बैठे लोगों तक जिनके परिवार हैं , भविष्य में रिटायरमेंट है और वर्तमान में उन्हीं क्षेत्रों में रहना है. राज्य अभिकरण बदला ले नहीं सकता. न्यायपालिका संविधान के अनुच्छेद २१ के तहत “विधि सम्मत प्रक्रिया” से और अनुच्छेद १४ के बराबरी के अधिकार से बंधी हुई है. कहीं ऐसा तो नहीं कि प्रजातान्त्रिक व्यवस्था में इस तरह के आतंकवाद सम्बंधित गतिविधियों पर लगाम लगने की अंतर्निष्ठ व्यवस्था संभव हीं नहीं है?

रॉ और आई बी में एक व्यवस्था है जिसके तहत वे अपने इन्फोर्मेर्स को अपने एस एस फण्ड से पैसे देकर गुप्त सूचना हासिल करते है. कई बार इन इन्फोर्मेरों के लिए गैरकानूनी मदद भी की जाती है. नैतिकतावादियों के लिए यह भी गलत होगा. लेकिन राज्य का कार्य एक दिन भी नहीं चलेगा अगर इस व्यवस्था को ख़त्म कर दिया जाये.

इशरत के केस पर गौर करें. पाकिस्तान के इनफॉर्मर से इंटेलिजेंस रिपोर्ट आती है कि मोदी को मारने के लिए लश्कर या कोई और संगठन कुछ फिदायीन तैयार कर रहा है. बमुश्किल तमाम दो ऐसे लोग शक के घेरे में आते हैं जिनका पाकिस्तान-लिंक स्थापित होता है. अगर इन्हें न्याय की प्रक्रिया से गुजरा जाये तो ज़रूरी नहीं कि लश्कर अगला दस्ता तैयार ना कर ले. और यह भी ज़रूरी नहीं कि अगले दस्ते के बारे में भी इतनी हीं सटीक खुफिया जानकारी मिल सके. लिहाज़ा दूसरे देश से संचालित आतंकवाद के प्रति इन एजेंसियों का रवैया मिलिट्री भाव से प्रभावित होता है और आमतौर पर समाज भी इसे स्वीकार करता है.

एक ताज़ा उदाहरण लें. पंजाब पुलिस के एक सब-इंस्पेक्टर सुरजीत सिंह ने एक टीवी चैनल को दिए गए इंटरव्यू में कबूल किया ही कि अधिकारियों के कहने पर उसने ८८ फर्जी एनकाउंटर किये. यह बात उसने पश्चाताप के भाव में कही और साथ हीं यह भी बताया कि कई बार उसे अपने कुकृत्य के प्रायश्चित के लिए आत्महत्या तक की बात सोची. अभी दो दन पहले सुरजीत न पंजाब हाई कोर्ट से गुहार के है कि उसे सुरक्षा प्रदान की जाये क्योंकि उसके इस बयान के बाद से कई अधिकारी उसके जान के दुश्मन हो गए हैं. इस पुलिस दरोगा ने यह भी बताया कि १९८९ (सिख आतंकवाद के चरम काल में जिसकी वजह से के पी एस गिल को पंजाब पुलिस का मुखिया बनाया गया था) में नौकरी में आने के बाद से कैसे –कैसे फर्जी एनकाउंटर के पहले हथियार जुटाए जाते थे जिन्हें मृतकों के शव के पास रख दया जाता था. फर्जी एनकाउंटरों में मारे गए इन लोगों में कुछ तो आतंकवादी थे लेकिन कुछ अज्ञात. हाई कोर्ट में अपनी याचिका में सुरजीत ने १६ ऐसे फर्जी एनकाउंटर का व्योरा दिया है जिनमें करीब तीन दर्ज़न लोगों को उसने गोली का निशाना बनाया. इनमें से कुछ के बारे में वह कुछ भी नहीं जानता था. 

उस दौरान गिल का कहना था कि आतंकवादी सरगनाओं को अगर सिर्फ इतना भय रहे कि उनका नाम पुलिस की “अ” सूची में आ गया है और अब उनकी जिंदगी ज्यादा से ज्यादा छह महीने बची है, सिख आतंकवाद ख़त्म हो जाएगा. गिल ने किया भी ऐसे हीं आतंकवाद को ख़त्म अपने मशहूर “कैट” एक्शन (काउंटर-एंटी-टेररिस्ट एक्शन) से. जब खूंखार आतंकी गुरुचरण सिंह मनोचहल ने एक पुलिस अधीक्षक के पीता का अपहरण कर लिया तो गिल ने सिर्फ एक ऑपरेशन किया. वह था मनोचहल के बेटे का अपहरण. पंजाब पुलिस का आतंकियों को सन्देश स्पष्ट था “कप्तान के पिता को तुम मार दो, अगले दिन हीं पुलिस तुम्हारे बेटे को मार देगी”. मनोचहल या अन्य सिख आतंकवादियों को पंजाब पुलिस का यह आपराधिक रूप समझ में हीं नहीं आया. सिख आतंकवाद अपनी मौत मरने लगा. कहना ना होगा कि इस तरह  के कैट ऑपरेशन के दौरान पुलिस अपनी वर्दी , बिल्ले सब उतार कर काम करती थी. दरअसल एस आई बी (आई बी की राज्य इकाई) के लोग पूरी निष्ठां एवं समर्पण के भाव से इस कार्य में पंजाब पुलिस की मदद करते थे.

गिल की सफलता की वजह से उन्हें दो बार पंजाब पुलिस का मुखिया बनाया गया और भारत सरकार ने इस पद पर आने के साल भर बाद हीं उन्हें चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मश्री से नवाज़ा. आज भी देश का एक बड़ा वर्ग गिल को सम्मान की नज़रों से देखता है. हालांकि कुछ मानवाधिकार संस्थाओं से जुड़े लोग उनपर आरोप लगते रहे हैं.

अब मान लीजिये पाठकों के पास दो तथ्य अलग –अलग आये. सब-इंस्पेक्टर सुरजीत का कहना कि कप्तान के कहने पर उसने फर्जी एनकाउंटर किया , लेकिन साथ में यह भी बताया जाये कि एनकाउंटर में मारे गए आतंकवादी ने कुछ हीं दिन पहले हेमकुंड गुरुद्वारा का दर्शन कर लौट रहे ४० से अधिक तीर्थयात्रियों, जिनमें बच्चे भी थे, को पीलीभीत में बस रोक कर मौत के घाट उतार दिया था. ऐसे में पाठकों की प्रतिक्रया मानवाधिकार के अगुवाओं से बिलकुल अलग होगी. अगर उन लोगों से पूछा जाये जिनके बेटे, बाप, बहन आतंकवादियों के हाथ मारे गए थे, कि गिल का “कैट” एक्शन कैसा था तो शायद  वे गिल को भगवान् का दूत बताएं.

अमेरिका में भी सी आई ए को राष्ट्रपति की ओर से खुली छूट मिलती है इस तरह के ऑपरेशन करने की. ऍफ़ बी आई को यहाँ तक अधिकार हैं कि वह अपने गवाह की जीवन को सुरक्षित करने के लिए उसकी पूरी पहचान बदल कर नया नाम व धन देकर नए शहर में बसा सकता है.

 इशरत के मामले में आई बी के अधिकारी पर आरोप लगने का शुद्ध मतलब यह होगा कि कल से आई बी ऐसा कोई भी काम नहीं करेगी जिस में रंच मात्र भी अनैतिकता का आभास हो. वह दिन देश के लिए संकटों का अम्बार लायेगा.

बेहतर तो यह होता कि इन सस्थाओं को पूरी छूट देते हुए इनकी मोनिटरिंग के लिए शीर्ष स्तर पर व्यवस्था हो ताकि इशरत जहाँ के मामले में इनकी भूमिका पर नज़र रखी जाये और दूसरी ओर इस तरह के अपराधों पर न्याय-व्यवस्था को और सख्त तथा चुस्त-दुरुस्त रखा जाये ताकि जज केवल क्रिकेट के अम्पायर की भूमिका में ना रह कर सत्य की तह तक जाये. बौद्धिक सोच से यह कहीं से न्यायोचित नहीं लगता परन्तु इस बात को देखते हुए कि विदेश से चलाये जा रहे आतंकवाद के मद्दे नज़र मानवाधिकार को पुनर्परिभाषित करने की ज़रुरत होगी और तब राज्य अभिकरणों को संवेदनशील परन्तु निष्ठुर बनाना पडेगा.   

 jagran 

इशरत एनकाउंटर: राज्य अभिकरणों का गैर-कानूनी रास्ते का औचित्य



इशरत जहाँ एनकाउंटर से दो सवाल उभरते हैं. क्या वह पाकिस्तान के आतंकवादी गुट की सदस्य के रूप में काम कर रही थी? और अगर कर भी रही थी तो क्या पुलिस को आई बी के अधिकारियों से मिल कर उसे फर्जी एनकाउंटर में मारना उचित  था? बौद्धिक स्तर पर सोचने पर स्पष्ट लगता है कि राज्य के अभिकरणों को इस तरह का अधिकार देने का मतलब संविधान , न्यायालय और कानून की व्यवस्था को नष्ट कर एक अधिनायकवादी व्यवस्था को जन्म देना है. अच्छा लगता है दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में बैठ कर प्रजातंत्र  या संविधान के मौलिक स्वरुप को अक्षुण्ण बनाये रखने का भाव और वह भी तब जब बुद्धिजीवी स्वयं कभी भी अपने जीवन में आतंकवाद की विभीषिका न झेला हो.

पर जरा गौर करें. अपराध न्याय व्यवस्था गवाह व तथ्यों पर चलती है. गवाह या साक्ष्य जुटाने वाला किसी का बाप, किसी का बेटा है, जिसे नौकरी के बाद घर आना है. आतंकवादी के लिए कोई “रूल ऑफ़ गेम” नहीं है. झारखण्ड के पाकुर जिले का एस पी व पांच पुलिस जवान १०० माओवादियों की गोली का निशाना बनते हैं. हकीकत यह है कि जनता का एक भी गवाह यह नहीं कहने जा रहा है कि उसने अमुक माओवादी को गोली चलाते देखा है. न्यायपालिका का यह हाल है कि बिहार के बथानी टोला में २३ दलितों को सवर्णों ने हत्या कर दी  लेकिन सेशंस कोर्ट के फैसले को उलटते हुए हाई कोर्ट ने “साक्ष्य के अभाव” में सभी आरोपियों को छोड़ दिया.    

आतंकवादी बदला लेगा , यह डर सभी को होता है , जनता से लेकर सत्ता में बैठे लोगों तक जिनके परिवार हैं , भविष्य में रिटायरमेंट है और वर्तमान में उन्हीं क्षेत्रों में रहना है. राज्य अभिकरण बदला ले नहीं सकता. न्यायपालिका संविधान के अनुच्छेद २१ के तहत “विधि सम्मत प्रक्रिया” से और अनुच्छेद १४ के बराबरी के अधिकार से बंधी हुई है. कहीं ऐसा तो नहीं कि प्रजातान्त्रिक व्यवस्था में इस तरह के आतंकवाद सम्बंधित गतिविधियों पर लगाम लगने की अंतर्निष्ठ व्यवस्था संभव हीं नहीं है?

रॉ और आई बी में एक व्यवस्था है जिसके तहत वे अपने इन्फोर्मेर्स को अपने एस एस फण्ड से पैसे देकर गुप्त सूचना हासिल करते है. कई बार इन इन्फोर्मेरों के लिए गैरकानूनी मदद भी की जाती है. नैतिकतावादियों के लिए यह भी गलत होगा. लेकिन राज्य का कार्य एक दिन भी नहीं चलेगा अगर इस व्यवस्था को ख़त्म कर दिया जाये.

इशरत के केस पर गौर करें. पाकिस्तान के इनफॉर्मर से इंटेलिजेंस रिपोर्ट आती है कि मोदी को मारने के लिए लश्कर या कोई और संगठन कुछ फिदायीन तैयार कर रहा है. बमुश्किल तमाम दो ऐसे लोग शक के घेरे में आते हैं जिनका पाकिस्तान-लिंक स्थापित होता है. अगर इन्हें न्याय की प्रक्रिया से गुजरा जाये तो ज़रूरी नहीं कि लश्कर अगला दस्ता तैयार ना कर ले. और यह भी ज़रूरी नहीं कि अगले दस्ते के बारे में भी इतनी हीं सटीक खुफिया जानकारी मिल सके. लिहाज़ा दूसरे देश से संचालित आतंकवाद के प्रति इन एजेंसियों का रवैया मिलिट्री भाव से प्रभावित होता है और आमतौर पर समाज भी इसे स्वीकार करता है.

एक ताज़ा उदाहरण लें. पंजाब पुलिस के एक सब-इंस्पेक्टर सुरजीत सिंह ने एक टीवी चैनल को दिए गए इंटरव्यू में कबूल किया ही कि अधिकारियों के कहने पर उसने ८८ फर्जी एनकाउंटर किये. यह बात उसने पश्चाताप के भाव में कही और साथ हीं यह भी बताया कि कई बार उसे अपने कुकृत्य के प्रायश्चित के लिए आत्महत्या तक की बात सोची. अभी दो दन पहले सुरजीत न पंजाब हाई कोर्ट से गुहार के है कि उसे सुरक्षा प्रदान की जाये क्योंकि उसके इस बयान के बाद से कई अधिकारी उसके जान के दुश्मन हो गए हैं. इस पुलिस दरोगा ने यह भी बताया कि १९८९ (सिख आतंकवाद के चरम काल में जिसकी वजह से के पी एस गिल को पंजाब पुलिस का मुखिया बनाया गया था) में नौकरी में आने के बाद से कैसे –कैसे फर्जी एनकाउंटर के पहले हथियार जुटाए जाते थे जिन्हें मृतकों के शव के पास रख दया जाता था. फर्जी एनकाउंटरों में मारे गए इन लोगों में कुछ तो आतंकवादी थे लेकिन कुछ अज्ञात. हाई कोर्ट में अपनी याचिका में सुरजीत ने १६ ऐसे फर्जी एनकाउंटर का व्योरा दिया है जिनमें करीब तीन दर्ज़न लोगों को उसने गोली का निशाना बनाया. इनमें से कुछ के बारे में वह कुछ भी नहीं जानता था. 

उस दौरान गिल का कहना था कि आतंकवादी सरगनाओं को अगर सिर्फ इतना भय रहे कि उनका नाम पुलिस की “अ” सूची में आ गया है और अब उनकी जिंदगी ज्यादा से ज्यादा छह महीने बची है, सिख आतंकवाद ख़त्म हो जाएगा. गिल ने किया भी ऐसे हीं आतंकवाद को ख़त्म अपने मशहूर “कैट” एक्शन (काउंटर-एंटी-टेररिस्ट एक्शन) से. जब खूंखार आतंकी गुरुचरण सिंह मनोचहल ने एक पुलिस अधीक्षक के पीता का अपहरण कर लिया तो गिल ने सिर्फ एक ऑपरेशन किया. वह था मनोचहल के बेटे का अपहरण. पंजाब पुलिस का आतंकियों को सन्देश स्पष्ट था “कप्तान के पिता को तुम मार दो, अगले दिन हीं पुलिस तुम्हारे बेटे को मार देगी”. मनोचहल या अन्य सिख आतंकवादियों को पंजाब पुलिस का यह आपराधिक रूप समझ में हीं नहीं आया. सिख आतंकवाद अपनी मौत मरने लगा. कहना ना होगा कि इस तरह  के कैट ऑपरेशन के दौरान पुलिस अपनी वर्दी , बिल्ले सब उतार कर काम करती थी. दरअसल एस आई बी (आई बी की राज्य इकाई) के लोग पूरी निष्ठां एवं समर्पण के भाव से इस कार्य में पंजाब पुलिस की मदद करते थे.

गिल की सफलता की वजह से उन्हें दो बार पंजाब पुलिस का मुखिया बनाया गया और भारत सरकार ने इस पद पर आने के साल भर बाद हीं उन्हें चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मश्री से नवाज़ा. आज भी देश का एक बड़ा वर्ग गिल को सम्मान की नज़रों से देखता है. हालांकि कुछ मानवाधिकार संस्थाओं से जुड़े लोग उनपर आरोप लगते रहे हैं.

अब मान लीजिये पाठकों के पास दो तथ्य अलग –अलग आये. सब-इंस्पेक्टर सुरजीत का कहना कि कप्तान के कहने पर उसने फर्जी एनकाउंटर किया , लेकिन साथ में यह भी बताया जाये कि एनकाउंटर में मारे गए आतंकवादी ने कुछ हीं दिन पहले हेमकुंड गुरुद्वारा का दर्शन कर लौट रहे ४० से अधिक तीर्थयात्रियों, जिनमें बच्चे भी थे, को पीलीभीत में बस रोक कर मौत के घाट उतार दिया था. ऐसे में पाठकों की प्रतिक्रया मानवाधिकार के अगुवाओं से बिलकुल अलग होगी. अगर उन लोगों से पूछा जाये जिनके बेटे, बाप, बहन आतंकवादियों के हाथ मारे गए थे, कि गिल का “कैट” एक्शन कैसा था तो शायद  वे गिल को भगवान् का दूत बताएं.

अमेरिका में भी सी आई ए को राष्ट्रपति की ओर से खुली छूट मिलती है इस तरह के ऑपरेशन करने की. ऍफ़ बी आई को यहाँ तक अधिकार हैं कि वह अपने गवाह की जीवन को सुरक्षित करने के लिए उसकी पूरी पहचान बदल कर नया नाम व धन देकर नए शहर में बसा सकता है.

 इशरत के मामले में आई बी के अधिकारी पर आरोप लगने का शुद्ध मतलब यह होगा कि कल से आई बी ऐसा कोई भी काम नहीं करेगी जिस में रंच मात्र भी अनैतिकता का आभास हो. वह दिन देश के लिए संकटों का अम्बार लायेगा.

बेहतर तो यह होता कि इन सस्थाओं को पूरी छूट देते हुए इनकी मोनिटरिंग के लिए शीर्ष स्तर पर व्यवस्था हो ताकि इशरत जहाँ के मामले में इनकी भूमिका पर नज़र रखी जाये और दूसरी ओर इस तरह के अपराधों पर न्याय-व्यवस्था को और सख्त तथा चुस्त-दुरुस्त रखा जाये ताकि जज केवल क्रिकेट के अम्पायर की भूमिका में ना रह कर सत्य की तह तक जाये. बौद्धिक सोच से यह कहीं से न्यायोचित नहीं लगता परन्तु इस बात को देखते हुए कि विदेश से चलाये जा रहे आतंकवाद के मद्दे नज़र मानवाधिकार को पुनर्परिभाषित करने की ज़रुरत होगी और तब राज्य अभिकरणों को संवेदनशील परन्तु निष्ठुर बनाना पडेगा.   

 jagran 

मंदिर मुद्दा बना तो मोदी को ख़ारिज कर देगा बहुसंख्यक


 उग्र हिंदुत्व से बचना मोदी की सफलता की पहली शर्त

आक्रामक हिंदुत्व के तेवर दिखा कर नरेंद्र मोदी शायद अपने पैर पर हीं नहीं भारतीय जनता पार्टी (भजपा) के भविष्य पर भी कुल्हाड़ी मारने जा रहे हैं. आंकड़े गवाह है कि राम मंदिर चुनाव की मुद्दा बना रहा और बहुसंख्यक भाजपा से दूर होता चला गया. मोदी ऐसे जोड़-घटाना करने वाले नेता से यह उम्मीद नहीं थी कि इस स्पष्ट सत्य को ना देख पाएंगे. आज गलत या सही माध्यम वर्ग में मोदी की छवि चार प्रकार की है ---- सक्षम प्रशासक, योग्य विकासकर्ता, भ्रष्टाचार के खिलाफ शून्य-सहिष्णुता वाला और पाक-प्रायोजित आतंकवाद का शत्रु.  अगर मोदी इन चारों से हट कर अपनी पुरानी आदत और संघ के दबाव में आक्रामक हिंदुत्व की ओर बढे (जिसके संकेत उनके अपने आदमी और पार्टी महामंत्री अमित शाह की अयोध्या में मंदिर मुद्दे पर वापस लौटने की घोषणा से मिलने लगे हैं) तो उदारवादी हिन्दुओं का एक बड़ा वर्ग जो आज पहले से अधिक तार्किक और तथ्यात्मक है, मोदी और भाजपा को नकार देगा. 

कुछ तर्क-वाक्यों और तत्संबंधित तथ्यों पर गौर करें. भाजपा या उसके मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर एस एस) का मानना है कि हिन्दुओं के आराध्य देव राम उनके दिल में बसते हैं लिहाज़ा हर हिन्दू की दिली इच्छा है कि अयोध्या में राम मंदिर बने. इनका दूसरा तर्क वाक्य है कि सभी यह चाहते हैं बगैर वैमनस्य के संसद में अगर जरूरत हो तो संविधान संशोधन कर अन्यथा कानून बनाकर राम मंदिर बनाया जाये. तीसरा तर्क वाक्य है भाजपा हिन्दुओं की एक मात्र रहनुमा है. इन तीनो तर्क वाक्यों को एक साथ पढ़ें तो मतलब होगा कि देश के कुल हिन्दुओं (जिन की संख्या ८० प्रतिशत से ज्यादा है) को अपने दिल के सबसे करीब के मुद्दे पर बेहद प्रजातान्त्रिक तरीके से अपनी रहनुमा पार्टी को दो-तिहाई बहुमत से जीता कर अयोध्या में भव्य राम मंदिर का मार्ग प्रशस्त करना चाहिए.

लेकिन मदिर आन्दोलन के २९ साल बीतने और ढांचा गिरने के २१ साल बाद भी मताधिकार प्राप्त हर सात हिन्दुओं में से छः ने भाजपा को रिजेक्ट किया है केवल एक ने हीं वोट दिया है. साथ हीं सन १९९८ से आज तक हर तीसरे वोटर ने पार्टी को वोट देना बंद कर दिया है.   

विवादित ढांचा गिरने से आज तक भारतीय जनता पार्टी बहुसंख्यक हिन्दुओं ने भारतीय जनता पार्टी को ख़ारिज हीं किया है. ८० प्रतिशत हिन्दुओं की रहनुमाई का दावा करनेवाली भाजपा को पार्टी के जन्म (१९८०) से आज तक आम चुनावों में कभी भी कांग्रेस से ज्यादा वोट नहीं मिले. जिस चुनाव में सबसे ज्यादा  मत प्रतिशत भाजपा का रहा वह था १९९८ जिसमें इसे २५.५८ प्रतिशत वोट मिले जो  कांग्रेस के मत प्रतिशत से तीन प्रतिशत कम थे. सन २००९ तक आते –आते इसका मत प्रतिशत लगातार घटते हुए १८.६ प्रतिशत पर पहुँच गया जबकि कांग्रेस का २८.६ प्रतिशत था. यानि कांग्रेस और भाजपा के वोट में डेढ़ गुने का अंतर. कांग्रेस को करीब १२ करोड़ मत मिले जब कि हिन्दुओं की “रहनुमा”, मंदिरनिर्माण का वादा और शुचिता की बात करने वाली इस पार्टी को आठ करोड़ से कम.

तथ्यों को एक अन्य कोण से देखिये. सन २००९ में देश में कुल ७१.४० करोड़ लोग थे जिन्हें मतदान का अधिकार था. इन मताधिकार-प्राप्त लोगों में लगभग ५८ करोड़ हिन्दू थे. देश में इन मताधिकार प्राप्त लोगों में मात्र ३९.५० करोड़ (५४.६ प्रतिशत) ने मतदान किया. इनमें से ३२ करोड़ हिन्दू थे. लेकिन हिन्दुओं की तथाकथित रहनुमा भजपा को वोट पड़े आठ करोड़ से भी कम. अगर हिन्दुओं के दिल के करीब राम हैं और हसरत है मंदिर बने तो ५८ करोड़ मताधिकार प्राप्त हिन्दुओं में क्यों मात्र आठ करोड़ हीं भाजपा को वोट देता है. इसका सीधा मतलब है कि हर सात मताधिकार प्राप्त या चार मतदान करने वाले हिन्दुओं में केवल एक ने हीं भाजपा को वोट दिया. इसका सीधा मतलब यह भी था हिन्दुओं का एक बड़ा वर्ग उदारवादी है. और जैसे हीं भाजपा या संघ आक्रामक हिंदुत्व का भाव लेन की कोशिश करते हैं वह उनसे विमुख हो जाता है.

प्रकारांतर से इसका मतलब यह भी हुआ कि ना तो भाजपा हिन्दुओं की राजनीतिक रहनुमा है, ना हीं मंदिर उसका प्रमुख मुद्दा है और ना हीं वह संसद का इस्तेमाल रोजी-रोटी छोड़ कर मंदिर –मस्जिद ऐसे भावनात्मक मुद्दों पर करना चाहता है. राजनीति-शास्त्र का सिद्धांत है अर्ध- या अल्प-शिक्षित समाज में भावनात्मक मुद्दे संवैधानिक और तर्क-सम्मत असली मुद्दों को आच्छादित कर लेते है और पूरी संवैधानिक व्यवस्था को तोड़-मरोड़ कर कुछ काल तक अपनी ओर कर लेते हैं. भाजपा दो से १८२ सीटों तक इसी की वजह आई  थी. लेकिन भारत की जनता ने हकीकत को समझ लिया  कि रोटी, भ्रष्टाचार –मुक्त व्यवस्था, रोजगार के आभाव में मंदिर का कोई औचित्य नहीं हैं. “मंदिर वहीं बनायेंगे” के अल्पकालिक उत्साह से हट कर जनता पूछने लगी “रोटी कब खिलाएंगे” और “कलमाड़ी, राजा व येद्दियुरप्पा से कब बचायेंगे”.  पिछले २९ सालों में समाज में प्रति-व्यक्ति आय बढ़ी, तर्क शक्ति बढ़ी और शिक्षा बढ़ी. लिहाज़ा अमित शाह, भाजपा या संघ को अपनी पुरानी सोच से हट कर स्थितियों को आंकना पडेगा.

दरअसल समस्या मोदी के लिए और भी है, आडवाणी इस हकीकत को समझ गए थे और भाजपा का चेहरा उदारवादी करने के प्रयास में लगे लेकिन संघ को अपने मूल से हटना रास नहीं आया. आडवाणी को किनारे होना पड़ा. भाजपा को सत्ता दिलाने के लिए संघ अपने मूल उद्देश्यों और तज्ज़नित प्रतिबद्धताओं से विमुख हो नहीं सकता क्योंकि ऐसा करने पर उसके सामने अपने अस्तित्व का प्रश्न आ जायेगा. भाजपा का समस्या यह है कि बगैर उदारवादी चेहरा जो वाजपेयी के बाद विलुप्त हो गया, दिखाए चुनाव वैतरणी पार नहीं कर सकता. यानि भजपा को यह वैतरणी पार करनी है तो या तो संघ से अलग रास्ता अपनाना होगा या संघ को अपने मूल से हटना होगा और वह भी अपने अस्तित्व की कीमत पर.

सन २०१४ के आम चुनाव में लगभग आठ करोड़ नए युवा जिनकी उम्र १८ से २३ साल होगी जुड़ने जा रहे हैं. ध्यान रहे कि यह संख्या उतनी हीं है जितनी भाजपा का पिछला कुल वोट. सन २००४ के मुकाबले सन २००९ के चुनाव में मतदाताओं की संख्या में ६.४ प्रतिशत या चार करोड़ की वृद्धि हुई थी लेकिन चुस्त एवं तकनीकी रूप से सक्षम चुनाव तंत्र ज्यादा लोगों को वोटर कार्ड बांटने की स्थिति में है. साथ हीं युवकों में मताधिकार को लेकर उत्साह है.
ये युवक अपने नेता से रोजगार चाहते हैं, अनाज चाहते हैं , विकास की भाषा चाहते हैं, भ्रष्टाचार के खिलाफ ऐलाने –जंग चाहते हैं ना कि मंदिर. और मोदी इस फॉर्मेट में फिट बैठते हैं लेकिन उनकी सफलता की शर्त हीं यही हैं कि संघ और उग्र हिंदुत्व उनके आस-पास न फटकें वरना उनकी २००२ की गुजरात दंगों वाली तस्वीर सामने आ जाएगी और उदारवादी हिन्दू पहले की तरह दूर हट जाएगा

nai duniya