Wednesday, 10 July 2013

मंदिर मुद्दा बना तो मोदी को ख़ारिज कर देगा बहुसंख्यक


 उग्र हिंदुत्व से बचना मोदी की सफलता की पहली शर्त

आक्रामक हिंदुत्व के तेवर दिखा कर नरेंद्र मोदी शायद अपने पैर पर हीं नहीं भारतीय जनता पार्टी (भजपा) के भविष्य पर भी कुल्हाड़ी मारने जा रहे हैं. आंकड़े गवाह है कि राम मंदिर चुनाव की मुद्दा बना रहा और बहुसंख्यक भाजपा से दूर होता चला गया. मोदी ऐसे जोड़-घटाना करने वाले नेता से यह उम्मीद नहीं थी कि इस स्पष्ट सत्य को ना देख पाएंगे. आज गलत या सही माध्यम वर्ग में मोदी की छवि चार प्रकार की है ---- सक्षम प्रशासक, योग्य विकासकर्ता, भ्रष्टाचार के खिलाफ शून्य-सहिष्णुता वाला और पाक-प्रायोजित आतंकवाद का शत्रु.  अगर मोदी इन चारों से हट कर अपनी पुरानी आदत और संघ के दबाव में आक्रामक हिंदुत्व की ओर बढे (जिसके संकेत उनके अपने आदमी और पार्टी महामंत्री अमित शाह की अयोध्या में मंदिर मुद्दे पर वापस लौटने की घोषणा से मिलने लगे हैं) तो उदारवादी हिन्दुओं का एक बड़ा वर्ग जो आज पहले से अधिक तार्किक और तथ्यात्मक है, मोदी और भाजपा को नकार देगा. 

कुछ तर्क-वाक्यों और तत्संबंधित तथ्यों पर गौर करें. भाजपा या उसके मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर एस एस) का मानना है कि हिन्दुओं के आराध्य देव राम उनके दिल में बसते हैं लिहाज़ा हर हिन्दू की दिली इच्छा है कि अयोध्या में राम मंदिर बने. इनका दूसरा तर्क वाक्य है कि सभी यह चाहते हैं बगैर वैमनस्य के संसद में अगर जरूरत हो तो संविधान संशोधन कर अन्यथा कानून बनाकर राम मंदिर बनाया जाये. तीसरा तर्क वाक्य है भाजपा हिन्दुओं की एक मात्र रहनुमा है. इन तीनो तर्क वाक्यों को एक साथ पढ़ें तो मतलब होगा कि देश के कुल हिन्दुओं (जिन की संख्या ८० प्रतिशत से ज्यादा है) को अपने दिल के सबसे करीब के मुद्दे पर बेहद प्रजातान्त्रिक तरीके से अपनी रहनुमा पार्टी को दो-तिहाई बहुमत से जीता कर अयोध्या में भव्य राम मंदिर का मार्ग प्रशस्त करना चाहिए.

लेकिन मदिर आन्दोलन के २९ साल बीतने और ढांचा गिरने के २१ साल बाद भी मताधिकार प्राप्त हर सात हिन्दुओं में से छः ने भाजपा को रिजेक्ट किया है केवल एक ने हीं वोट दिया है. साथ हीं सन १९९८ से आज तक हर तीसरे वोटर ने पार्टी को वोट देना बंद कर दिया है.   

विवादित ढांचा गिरने से आज तक भारतीय जनता पार्टी बहुसंख्यक हिन्दुओं ने भारतीय जनता पार्टी को ख़ारिज हीं किया है. ८० प्रतिशत हिन्दुओं की रहनुमाई का दावा करनेवाली भाजपा को पार्टी के जन्म (१९८०) से आज तक आम चुनावों में कभी भी कांग्रेस से ज्यादा वोट नहीं मिले. जिस चुनाव में सबसे ज्यादा  मत प्रतिशत भाजपा का रहा वह था १९९८ जिसमें इसे २५.५८ प्रतिशत वोट मिले जो  कांग्रेस के मत प्रतिशत से तीन प्रतिशत कम थे. सन २००९ तक आते –आते इसका मत प्रतिशत लगातार घटते हुए १८.६ प्रतिशत पर पहुँच गया जबकि कांग्रेस का २८.६ प्रतिशत था. यानि कांग्रेस और भाजपा के वोट में डेढ़ गुने का अंतर. कांग्रेस को करीब १२ करोड़ मत मिले जब कि हिन्दुओं की “रहनुमा”, मंदिरनिर्माण का वादा और शुचिता की बात करने वाली इस पार्टी को आठ करोड़ से कम.

तथ्यों को एक अन्य कोण से देखिये. सन २००९ में देश में कुल ७१.४० करोड़ लोग थे जिन्हें मतदान का अधिकार था. इन मताधिकार-प्राप्त लोगों में लगभग ५८ करोड़ हिन्दू थे. देश में इन मताधिकार प्राप्त लोगों में मात्र ३९.५० करोड़ (५४.६ प्रतिशत) ने मतदान किया. इनमें से ३२ करोड़ हिन्दू थे. लेकिन हिन्दुओं की तथाकथित रहनुमा भजपा को वोट पड़े आठ करोड़ से भी कम. अगर हिन्दुओं के दिल के करीब राम हैं और हसरत है मंदिर बने तो ५८ करोड़ मताधिकार प्राप्त हिन्दुओं में क्यों मात्र आठ करोड़ हीं भाजपा को वोट देता है. इसका सीधा मतलब है कि हर सात मताधिकार प्राप्त या चार मतदान करने वाले हिन्दुओं में केवल एक ने हीं भाजपा को वोट दिया. इसका सीधा मतलब यह भी था हिन्दुओं का एक बड़ा वर्ग उदारवादी है. और जैसे हीं भाजपा या संघ आक्रामक हिंदुत्व का भाव लेन की कोशिश करते हैं वह उनसे विमुख हो जाता है.

प्रकारांतर से इसका मतलब यह भी हुआ कि ना तो भाजपा हिन्दुओं की राजनीतिक रहनुमा है, ना हीं मंदिर उसका प्रमुख मुद्दा है और ना हीं वह संसद का इस्तेमाल रोजी-रोटी छोड़ कर मंदिर –मस्जिद ऐसे भावनात्मक मुद्दों पर करना चाहता है. राजनीति-शास्त्र का सिद्धांत है अर्ध- या अल्प-शिक्षित समाज में भावनात्मक मुद्दे संवैधानिक और तर्क-सम्मत असली मुद्दों को आच्छादित कर लेते है और पूरी संवैधानिक व्यवस्था को तोड़-मरोड़ कर कुछ काल तक अपनी ओर कर लेते हैं. भाजपा दो से १८२ सीटों तक इसी की वजह आई  थी. लेकिन भारत की जनता ने हकीकत को समझ लिया  कि रोटी, भ्रष्टाचार –मुक्त व्यवस्था, रोजगार के आभाव में मंदिर का कोई औचित्य नहीं हैं. “मंदिर वहीं बनायेंगे” के अल्पकालिक उत्साह से हट कर जनता पूछने लगी “रोटी कब खिलाएंगे” और “कलमाड़ी, राजा व येद्दियुरप्पा से कब बचायेंगे”.  पिछले २९ सालों में समाज में प्रति-व्यक्ति आय बढ़ी, तर्क शक्ति बढ़ी और शिक्षा बढ़ी. लिहाज़ा अमित शाह, भाजपा या संघ को अपनी पुरानी सोच से हट कर स्थितियों को आंकना पडेगा.

दरअसल समस्या मोदी के लिए और भी है, आडवाणी इस हकीकत को समझ गए थे और भाजपा का चेहरा उदारवादी करने के प्रयास में लगे लेकिन संघ को अपने मूल से हटना रास नहीं आया. आडवाणी को किनारे होना पड़ा. भाजपा को सत्ता दिलाने के लिए संघ अपने मूल उद्देश्यों और तज्ज़नित प्रतिबद्धताओं से विमुख हो नहीं सकता क्योंकि ऐसा करने पर उसके सामने अपने अस्तित्व का प्रश्न आ जायेगा. भाजपा का समस्या यह है कि बगैर उदारवादी चेहरा जो वाजपेयी के बाद विलुप्त हो गया, दिखाए चुनाव वैतरणी पार नहीं कर सकता. यानि भजपा को यह वैतरणी पार करनी है तो या तो संघ से अलग रास्ता अपनाना होगा या संघ को अपने मूल से हटना होगा और वह भी अपने अस्तित्व की कीमत पर.

सन २०१४ के आम चुनाव में लगभग आठ करोड़ नए युवा जिनकी उम्र १८ से २३ साल होगी जुड़ने जा रहे हैं. ध्यान रहे कि यह संख्या उतनी हीं है जितनी भाजपा का पिछला कुल वोट. सन २००४ के मुकाबले सन २००९ के चुनाव में मतदाताओं की संख्या में ६.४ प्रतिशत या चार करोड़ की वृद्धि हुई थी लेकिन चुस्त एवं तकनीकी रूप से सक्षम चुनाव तंत्र ज्यादा लोगों को वोटर कार्ड बांटने की स्थिति में है. साथ हीं युवकों में मताधिकार को लेकर उत्साह है.
ये युवक अपने नेता से रोजगार चाहते हैं, अनाज चाहते हैं , विकास की भाषा चाहते हैं, भ्रष्टाचार के खिलाफ ऐलाने –जंग चाहते हैं ना कि मंदिर. और मोदी इस फॉर्मेट में फिट बैठते हैं लेकिन उनकी सफलता की शर्त हीं यही हैं कि संघ और उग्र हिंदुत्व उनके आस-पास न फटकें वरना उनकी २००२ की गुजरात दंगों वाली तस्वीर सामने आ जाएगी और उदारवादी हिन्दू पहले की तरह दूर हट जाएगा

nai duniya

No comments:

Post a Comment