Friday, 22 March 2013

संजू बाबा की सजा और क्षमा दान की वकालत



लगभग ५३ वर्षीय संजू बाबा (कन्फ्यूज ना होइएगा बाबा उपरी वर्ग में बच्चों को कहा जाता है और चूंकि बड़े आदमियों के बेटों को बूढ़े होने तक भी बचपन के नाम से बुलाया जाता है यह बताने के लिए कि संबोधन करने वाला कितना करीबी है लिहाजा फिल्म स्टार संजय दत्त अभी भी संजू बाबा हैं)  को २० साल बाद सजा हुई. देश का एक वर्ग, जिसमे संभ्रांत-व्रगीय चरित्र वाले लोग हैं, जार-जार रोये. फिल्म निर्माता महेश भट्ट और सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व न्यायाधीश से लेकर संजू बाबा को फिल्म में गांधीगीरी करते हुए प्रभावित होने वाला मध्यम वर्ग, इन सबने कहा कि “संजू बाबा अब बदल गए हैं और कोई तुक नहीं है कि एक बदले हुए व्यक्ति को फिर उसी गर्त में धकेला जाये”. क्षमा-दान की व्यवस्था का हवाला दिया गया.
अल्प-शिक्षा-जनित अतार्किकता वाले समाज में समुन्नत प्रजातंत्र के ढांचे थोपने का यही नतीजा होता है. हमरे अन्दर कब भावनाएं हिलोरे लेने लगे और हम कब “मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के नाम पर” ढांचा गिरा दें और कब राजीव गाँधी को बिन माँ का “बेटा” समझ या सोनिया गाँधी को “अबला” समझ कर दाता भाव से वोट दे दें इसका भरोसा नहीं. राष्ट्र-भक्ति से ओतप्रोत होकर हम “अभी जाओ और पाकिस्तानी सैनिकों का सर काट कर बता दो कि भारत महान है” का भाव ले लेते हैं. देश में हर मिनट पांच साल से कम आयु वाले तीन बच्चे दम तोड़ देते है या हर मिनट देश के उद्योगपतियों को ७० लाख रु की छूट दे देते हैं लेकिन इन बातों से हमें गुस्सा नहीं आता क्योंकि सिस्टम की खराबी समझने या शोषणवादी व्यवस्था को गहराई से जानने की हमारी सामूहिक सोच बनी हीं नहीं है. हमारी राष्ट्रभक्ति उस समय कुंद हो जाती है और हम किसी राजा या राजा भैया को अपने हीं हाथों से वोट दे कर संसद या विधान –सभा पहुंचा देते हैं. और हम खुश हो कर ताली बजाते हैं जब वह मंत्री बनने के पहले “भारतके संविधान के प्रति सच्ची निष्ठा  की शपथ” लेता है. हमने अपने हाथों से वोट देकर वर्तमान लोक सभा में १६२ ऐसे सांसद भेजे हैं जिन पर गंभीर अपराध के मुकदमे विभिन्न स्तर पर चल रहे हैं.
तो संजू बाबा बदल गए. वह अपनी तीन बच्चों को पाल रहे हें, “वह समाज के प्रति सेवा का भाव रखते हैं और वह गांधीगिरी में विश्वास रखते है लिहाज़ा कोर्ट को उन्हें इस नए रूप को शाश्वत भाव में अंगीकार करने में संजू बाबा की मदद करनी चाहिए” आज प्रचलित तर्क (या कुतर्क) है. कुछ लोग इनसे भी ज्यादा लाल बुझक्कड़ है. “बीस साल तक यह कोर्ट कहाँ था. इतने दिनों में कितनी चीजें बदल गयो हैं और जब अपराधी भी बदल गया है तब कोर्ट जगती है” का सिस्टम पर प्रहार वाला भाव भी चल रहा  है. एक सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश ने तो महाराष्ट्र के राज्यपाल से अपील भी कर दी और यही नहीं महामहिम को संविधान का अनुच्छेद १६१ में क्षमा-दान के अधिकार भी बता दिए.
अब जरा तस्वीर के दूसरे पहलू पर गौर करें. “संजू बाबा बदल गए” तो बहुतों को मालूम है, तस्दीक के लिए उन्होंने गांधीगिरी वाली फिल्म भे देखी है, बाबा को ड्रग एडिक्ट से हट कर मुन्ना भाई के रोल में देखा है और यह भी मालूम है कि पारिवारिक जिम्मेदारियां बखूबी निभा रहे हैं. लेकिन उसी दौरान गरीबों की झुग्गी से भी एक युवक इसी दफा में बंद हुआ था और उसने भी अपने जीवन को पूरी तरह बदलने की कोशिश की लेकिन हर बार पुलिस पुराने रिकॉर्ड खंगाल कर किसी ना किसी दफा में अन्दर कर देती थी. अगर मान लीजिये अन्दर नहीं भी किया तो जिंदगी की जद्दो-जहद में वह जूझता हुआ बच्चों को पालता रहा (अमेरिका में त्रिशला के पालन-पोषण की तरह नहीं ---संजू बाबा की तीन पत्नियों में पहली पत्नी से पैदा त्रिशला). लेकिन चूंकि वह सुनील दत्त –नर्गिस का बेटा नहीं था और ना हीं उसे सबसे बड़ी अदालत से जमानत मिली थी (वहां तक जाने की हैसियत सब में नहीं होती) तो किसी ने भी उसकी गांधीगिरी नहीं देखी –ना तो महेश भट्ट साहेब ने ना हीं सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज साहेब ने और ना हीं उस माध्यम वर्ग ने जो रोटी जीत कर संजू बाबा से भावनात्मक नजदीकी दिखा कर यह बताना चाहता है कि सिस्टम ऊपर के वर्ग के लिए नहीं नीचे वालों के लिए है. “संजू तो बदल गए झुग्गी वालों को जेल में डालो वो कमबख्त ख़ाक बदलेंगे, मालूम नहीं बदलने के लिए फिल्म में काम करना पड़ता है , उसमे गांधीगिरी करनी पड़ती है और फिर नर्गिस के कोख से जन्म लेना पड़ता है?” ये भाव स्पष्ट नज़र आते हैं ऐसे भौंडे तर्कों में.
इस कुतर्क को आगे बढाएं. अगर अपराध करने के बाद अपराधी का बदलना या ना बदलना कोई मायने रखता हो तो कसाब को भी छोड़ कर देखा जाता, एक-आध अच्छी फ़िल्मों में लीड रोल दी जाती और अगर वे बॉक्स ऑफिस पर सफल होती तो कसाब आज दुनिया में होता—गांधीगिरी करता हुआ. याकूब मेमन को भी बदलने का मौका नहीं मिला. दाऊद को भी भारत निमंत्रण देकर बुलाया जाये और २० साल देखा जाये संत बना कर. और अगर आशाराम से ज्यादा भीड़ “संत” दाऊद की सभाओं में हो तो उसे दोषमुक्त कर दिया जाये या क्षमादान देने की वकालत की जाये.  
परन्तु ये तो बदल जायेंगे पर उन २५७ परिवारों का क्या होगा जो जिनके सदस्य पहले से बदले हुए थे और अकारण १९९३ के सीरियल ब्लास्ट में मारे गए. उनके पत्नी और बच्चों का क्या होगा जो अनाथ  हो कर न तो पढ़ सके ना हीं अच्छे नागरिक का सर्टिफिकेट देने वाले फ़िल्मी दुनिया में जा सके. अभाव अक्सर अपराध की दुनिया में धकेलता है. क्या इनमे से कुछ उस दुनिया में नहीं चले गए होंगे या गुमनाम जिंदगी की जद्दो-जेहद में लग गए होंगे?  
देश की जेलों में आज लगभग १५ लाख कैदी है जिनमे लगभग तीन लाख सजायाफ्ता हैं और करीब १२ लाख विचाराधीन हैं. इनमें से कितनों के बारे में यह जानने की कोशिश हुई कि अपराध करने के बाद या आरोप लगने के बाद कौन कितना सुधरा. फिर इस सुधार का पैमाना क्या होगा –फिल्म में गाँधीगिरी या कई शादियाँ या बच्चे को अमरीका में पढ़ाना या अमर सिंह के साथ चुनाव सभाओं में भाषण देना. और कितनों को यह मौका मिलेगा?
जरा अंतिम तथ्य पर गौर करें. इस देश की निचली अदालतों में अगर तीन मुकदमें फौजदारी (आपराधिक) के होते हैं तो महज एक दीवानी (धन-संपत्ति का) का. लेकिन जैसे हीं हम उपरी अदालतों की स्थिति देखते है तो यह अनुपात उल्टा हो जाता है. यानी जो अपराध का दोषी है उनमें से तीन में से दो निचली अदालतों से सजा पाने पर सामर्थ्य के अभाव में अपील भी नहीं कर पाते जबकि धनवानों में हर तीन में दो अपनी पूँजी-संपत्ति के लिए बड़े अदालत-दर-अदालत जाता है.
इस का मतलब मुन्ना भाई की तरह वह टाडा कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील में सर्वोच्च न्यायलय नहीं आ पाता और जेल की सलाखों में बाकि जिंदगी काट लेता है बगैर अपने को गांधीगिरी पर हाथ आज़माने का एक भी मौका पाए. उसके लिए ना तो कोई महेश भट्ट टीवी चैनलों में आंसू बहते हैं ना हीं कोई पूर्व जज राज्यपाल को उनके क्षमादान के अधिकार की याद दिलाता है.           

jagran   

गठबंधन धर्म या ब्लैकमेलिंग





राजनीति-शास्त्र के सिद्धांत के अनुसार गठबंधन धर्मं की तीन शर्तें होती हैं : पारस्परिक टकराव के कम से कम कारक; झगड़े निपटाने के लिए एक मैकेनिज्म और जन-मानस में गठबंधन के उद्देश्यों के प्रति  विश्वसनीयता. द्रविड़ मुनेत्र कजगम (डी एम् के) इन तीनों मानदंडों पर असफल रहा. और उसकी जगह यू पी ए -२ की केंद्र सरकार के सामने उसने एक ऐसी मांग रखी जो ना मुमकिन-उल-अम्ल (अव्यावहारिक ) है. अगर उसकी मांग के सामने घुटने टेकते हुए भारत सरकार अमरीकी प्रस्ताव में तरमीम करते हुए या अपना प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र मानव अधिकार परिषद् (यू एन एच आर सी)  के सामने रखे तो ऐसा प्रस्ताव ना केवल गिर जाएगा बल्कि भारत की जग-हसाई होगी. गँवाई भाषा में डी एम् के की इस मांग को “ब्लैकमेलिंग” कहा जा सकता है.
भारत के संविधान में नागरिक के मौलिक अधिकारों की वर्जना में शामिल है कि अगर कोई व्यक्ति इस अभिव्यक्ति से किसी मित्र देश से सम्बन्ध खराब होने का सबब बनाता है तो उसकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बाधित की जा सकती है. यहाँ तो पूरा का पूरा दल हीं भारत-श्रीलंका संबंधों पर कुल्हाड़ी चला रहा है.
यह बात सही है कि श्रीलंका में तमिलों के साथ हो रहे सरकारी अत्याचार को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता. समूचे तमिलनाडु के लिए यह शायद सबसे बड़ा मुद्दा है. तमिल उग्रवादी संगठनों ने भी श्रीलंका  की सरकार से लगातार मोर्चा ले रखा है. लेकिन क्या कोई अन्य देश इस मुद्दे को लेकर यू एन एच आर सी  में यही प्रस्ताव ला सकता है जिसके तहत श्रीलंका की सरकार पर सीधा आरोप हो कि वह तमिलों का नरसंहार (जेनोसाइड) कर रही है. फिर श्रीलंका से भारत से सम्बन्ध हेमेशा से बेहतर रहे हैं. यहाँ तक कि  इन्हीं संबंधों के तहत उस देश में शान्ति सेना (आई पी के ऍफ़) भेजने की परिणति राजीव गाँधी की ह्त्या में हुई.  
यही बात भी सच है यह मुद्दा उठा कर और केंद्र सरकार से समर्थन वापस ले कर डी एम् के नेता करूणानिधि अपने राज्य में हीरो हो गए है. राज्य की मुख्यमंत्री और ए आई ए डी एम् के की मुखिया जयललिथा की चमक फीकी पड़ गयी है. भारत के वित्तमंत्री प चिदंबरम इस दौराम संकटमोचक की रूप में चेन्नई गए ज़रूर पर कोई खास सफलता हासिल नहीं कर पाए. करूणानिधि ने समर्थन वापस ले लिए और चेतावनी दी कि अगर समर्थन चाहिए तो प्रस्ताव में “नरसंहार”  शब्द डालो. साथ हीं विश्व संगठन के सामने एक अन्य प्रस्ताव भी लाओ जिसके तहत किसी विश्वसनीय अंतर्राष्ट्रीय जांच आयोग द्वारा तमिलों के खिलाफ श्रीलंका के सेना व प्रशासन द्वारा की जा रही ज्यादतियों की जांच हो सके. डी एम् के ने करीब ४८ घंटे का अल्टीमेटम केंद्र सरकार को दिया है. इस बात की भी कोई उम्मीद नहीं है कि तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिथा केंद्र सरकार को समर्थन देंगी क्योंकि चिदंबरम और उनके बीच ३६ का आंकड़ा है और वह आजकल मोदी और भाजपा के कहीं ज्यादा करीब नज़र आती है. वैसे भी लोक सभा में उनके पास डी एम् के के मुकाबले आधे सांसद हीं है.
लेकिन एक शक यह भी होता है कि कहीं यह पूरे खेल “नूरा-कुश्ती” का तो नहीं है. “तुन मुद्दा हड़पो, हम से मांग करो कि “नरसंहार” शब्द भारत के प्रस्ताव में हो, हम इसे संसद में लायें, लाजमी है कि वहां बैठे लोग यह शब्द नहीं लाने देंगे और कोई मुलायम शब्द प्रयोग करेंगे. डी एम् के का मुद्दे पर कब्ज़ा हो जायेगा, संसद से पारित भी हो जायेगा (हल्के शब्द के साथ). कहने का मतलब कि सांप भी मर जाएगा और लाठी भी बची रहेगी. दरअसल ज़रूरी नहीं कि राजनीति में जो दिखता है वही सत्य होता हो. बल्कि कई बार आभासित सत्य और असली सत्य में दूर –दूर तक रिश्ता नहीं होता.
बहरहाल अगर मान भी लिया जाये कि डी एम् के अपनी बात पर कायम रहेगा तो क्या सरकार गिरेगी क्योंकि कोई दिमागीरूप से दिवालिया राष्ट्र हीं इन मांगों को मान सकता है? शायद नहीं, क्योंकि लोक सभा में कुल २७२ सांसदों का समर्थन चाहिए. फिलवक्त यू पी ए -२ को २३६ सांसदों की समर्थन प्राप्त है. भारत के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की दोनों बड़ी पार्टियों --समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी – के क्रमशः २२ और २१ सांसद समर्थन देने को तैयार हैं –अपने –अपने कारणों से. लिहाज़ा सरकार के ऊपर कोई खतरा आसन्न नहीं है.  साथ हीं कोई भी संसद व्यक्तिगत रूप से और बहुजन समाज पार्टी दल के रूप में नहीं चाहते कि निश्चित अवधि से साल भर पहले चुनाव हो. छोटी पार्टियाँ व उनके नेता भी सरकार चलते रहने में हीं अपना भला देखते है. कहना ना होगा कि कुल करीब ५९ ऐसे संसद सदस्य है जो आज भी मनमोहन सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे हैं. हालांकि जल्द चुनाव होना समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव के हित में होगा क्योंकि हाल हीं में उनकी पार्टी में उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में जबरदस्त जीत हासिल की है और अभी भी उनके बेटे और प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की प्रशासनिक अक्षमता की कलई पूरी तरह नहीं खुल सकी है. लिहाज़ा जितनी जल्द चुनाव हो जाये उतना हीं अच्छा होगा.
बहरहाल किन्हीं अज्ञात कारणों से मुलायम तब तक केंद्र सरकार के समर्थन में रहेंगे जबतक उनको यह सुनिश्चित न हो जाए कि सरकार गिरना तय है. चूंकि बसपा सुप्रीमो मायावती की दिलचस्पी सरकार के चलते रहने में है लिहाज़ा दोनों पार्टियाँ इस सरकार को समर्थन देती रहेंगी.  
जहाँ तक कांग्रेस की बात है वह किसी भी स्थिति में इस समय, जब कि उसका स्टॉक भ्रष्टाचार के तमाम मुद्दों को लेकर गिरा हो, चुनाव नहीं चाहेगी. कांग्रेस के रणनीतिकारों का मानना है कि उनकी दो भावी योजनाए ----लाभार्थियों के खाते में सीधा धन और बेहद सस्ते में ६७ प्रतिशत लोगों को अनाज (खाद्य सुरक्षा विधेयक) --- खेल बदलने वाला साबित होंगी. कुछ हद तक यह आशावादिता सही भी है क्योंकि सरकार के गोदामों में अनाज भरा पड़ा है , सड़ रहा है , केवल डिलीवरी उपयुक्त करना है. जहाँ तक खर्च का सवाल है मात्र रु २४,००० करोड़ का हीं अतिरिक्त व्यय आयेगा.
लेकिन इन सब सथियों से अलग जो मूल प्रशन है वह यह कि क्या गटबंधन का जीवन ब्लैकमेल के आधार पर चलेगा? अगर ऐसे सन्देश जनता में जाते हैं तो क्या इसका सीधा मतलब यह नहीं होगा कि शासक वर्ग से जनता का मोह भंग होगा जो एक खतरनाक स्थिति को जन्म दे सकता है.
पहले से भी यह माना जा रहा है कि मुलायम सिंह व मायावती के खिलाफ सी बी आई जांच समर्थन का एक बड़ा कारण हो सकते है. जिस तरह मुलायम के मामले में सी बी आई ने सर्वोच्च न्यायालय में बार –बार अपना स्टैंड बदला रहा है वह कहीं यह आभास तो देता हीं है कि आभाषित सत्य और यथार्थ में जबरदस्त विरोधाभास है.
राजनीति के इस खेल में अविश्वास का बाज़ार गर्म है. दुष्यंत ने इन्हीं स्थितियों को देखर कहा था :
“बहुत ऊँची यहाँ नीचाइयां हैं अभी कुछ और अपना सर तराशो”

bhaskar

विशेष राज्य की मांग के पीछे की राजनीति



“प्राकृतिक आपदा” पैरामीटर में जोड़ने की मांग ज्यादा कारगर होती

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने छः करोड़ गुजरातियों के सम्मान की बात की तो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने साढ़े दस करोड़ बिहारियों के सम्मान की. दोनों सम्मान –सम्मान खेल रहे है. नीतीश को दर्द है कि जिन आधारों पर मोदी को भावी प्रधामंत्री के रूप में पेश किया जा रहा है उन्हीं आधारों पर हमें क्यों नहीं. लिहाज़ा “अधिकार रैली” में भीड़ जुटा कर बिहार को विशेष राज्य का दर्ज़ा दिलाने के नाम पर दिल्ली men  नीतीश ने अपने भाषण में कोशिश की कि उन्हें भी कम से कम से कुछ पिछड़े राज्यों की रहनुमाई का तमगा मिल जाये तो भविष्य में रायसीना हिल्स पर उनका भी दावा बने. पूरे भाषण में चार बार दिल्ली का नाम लेकर और यह बता कर कि वह यह लड़ाई सभी गरीब राज्यों के लिए लड़ रहे हैं, नीतीश ने दिल की बात जुबान पर लाई.

लेकिन बिहार को विशेष राज्य दिलानेकी मांग पर ना तो नीतीश गंभीर थे ना हीं वह तथ्यों को सही पेश कर पाए.
अर्थशास्त्र का प्रारंभिक कक्षा का छात्र भी बता सकता है कि यह मांग जिस स्वरुप में मांगी जा रही है केंद्र को कभी भी स्वीकार्य नहीं होगी. नीतीश ने अपने भाषण में अपनी तारीफ के कसीदे काढ़ने के बजाय बेसाख्ता बिहार के पिछड़ेपन के आंकडे और कमियां गिनाईं. सबसे कम प्रति-व्यक्ति आय जो राष्ट्रीय आय का महज एक-तिहाई से कुछ ज्यादा है, प्रति एक लाख आबादी पर कम सड़कें, कम रेल लाइनें, राष्ट्रीय औसत के मुकाबले छठवां हिस्सा प्रति व्यक्ति बिजली खपत, राष्ट्रीय औसत के आधा प्रति व्यक्ति विकास खर्च, पर्वतीय क्षेत्र ना होने का बावजूद हिमालय से निकली नदियों का बिहार में तबाही मचाना और आबादी का घनत्व. उनके कहने का मतलब था कि केंद्र अगर पैसे देता तो बिहार की यह हालत ना होती.

अपने भाषण में नीतीश ने बड़ी खूबसूरती से उन कार्यों का आंकड़ा नहीं दिया जिसमें राज्य सरकार की पूर्ण जिम्मेंदारी थी और उनमें राज्य लगातार पिछड़ता रहा. मुख्यमंत्री ने यह नहीं बताया कि शिक्षा की स्थिति क्यों गिरी है, स्वास्थ्य के पैरामीटर्स क्यों ज़मीन पर हैं, क्यों केन्द्र द्वारा भेजे गए सस्ते अनाज का महज ४५ प्रतिशत हीं राज्य सरकार उठा पाई जबकि आंध्र जैसा संपन्न राज्य अपने कोटे का ९३ प्रतिशत उठता है. यह भी चर्चा नहीं की कि क्यों राज्य के पॉवर प्लांट ३० प्रतिशत प्लांट लोड फैक्टर से कम पर चलते है. क्यों मनरेगा का पैसा बिचौलिए ले जाते हैं और क्यों अपराध के आंकडे बताते हैं कि अपहरण, लूट और चोरी की घटनाओं में आठ साल में बेहद इजाफा हुआ है. क्या चोरी और अपहरण रोकने का काम भी केंद्र के पैसे से होना है? जिस राज्य में केंद्र का भेजा पैसा (गरीबों के स्वास्थ्य बीमा के रूप) पुरुषों की बच्चेदानी (?) निकाल कर हड़प लिया जाता हो उस राज्य में नीतीश की सरकार कितनी सक्षम है यह साफ़ दिखाई देता है.

परिवार नियोजन के कार्य-क्रमों में बिहार सरकार पिछले आठ सालों में बुरी तरह असफल रही है और आबादी पर कोई नियंत्रण नहीं हो पाया है. राष्ट्रीय औसत के मुकाबले डेढ़ गुना आबादी दर क्या केंद्र की अक्षमता है? केरल में प्रति-व्यक्ति आय बहुत ज्यादा ना होते हुए भी मानव विकास में राज्य सरकार द्वारा व्यय करने से जीवन स्तर देश में सबसे अच्छा है.  

नीतीश ने अपने कुछ चुनिन्दा कार्यों की बड़ाई करते हुआ बताया कि लड़कियों को साइकिल देना की वज़ह से लड़कियाँ स्कूल जानी लगीं लेकिन यह नहीं बताया कि केंद्र की “मिड-डे –मील” (बच्चों को स्कूल में दोपहर का भोजन) योजना कैसे भष्टाचार की भेंट चढ़ गयी और कैसे (प्रतिष्ठित स्वयंसेवी संस्था असर की तजा रिपोर्ट के अनुसार) कक्षा पांच के ७२ प्रतिशत छात्र कक्षा दो का ज्ञान नहीं रखते. क्या इसके लिए भी पैसे की ज़रुरत है?       

 विशेष राज्य देने का पैमाना पांच कारकों पर आधारित है. वे हैं (अ) पहाड़ी और दुर्गम भू क्षेत्र (बी) निम्न जन-संख्या घनत्व (स) पडोसी देशों से सीमाओं पर सामरिक स्थिति (द) आर्थिक एवं अधि-संरचनात्मक पिछड़ापन और (य) राजकीय वित्त-व्यवस्था की अक्षम प्रकृति. बिहार इनमें से मात्र अंतिम दो में आता है. जबकि हकीकत यह है कि बिहार का भारत के राज्यों में सर्वाधिक धनत्व वाला होना इसको विशेष राज्य का दर्ज़ा ना दिए जाने का बड़ा कारण हो सकता है क्यों ज्यादा आबादी घनत्व हो तो डिलीवरी आसान होती है. उसी वस्तु या सेवा को कम आबादी वाले क्षेत्र में पहुँचाने में राज्य के अभिकरणों को ज्यादा श्रम व पैसे लगने होता है. अगर बिहार विशेष दर्जे में शामिल होने की बात करता है तो ओड़िसा, यू पी या मध्य प्रदेश क्यों नहीं.  

दरअसल मांग यह होनी चाहिए थी कि चूंकि बिहार एक ऐसा प्रदेश है जहाँ नेपाल के हिमालय से निकालने वाली नदियों की विभीषिका एक श्राप के रूप में हर साल आती है और बाकी का बिहार सूखे में कराहता है लिहाज़ा प्लानिंग कमीशन अपने पैरामीटर में “लगातार आने वाली प्राकृतिक आपदा “ भी जोड़ दे.
     
केंद्र अपनी आय का ३२ प्रतिशत राज्यों को अभी दे रहा है. मांग यह होनी चाहिए कि केंद्र अपनी आय का बड़ा भाग पिछड़े राज्यों को दे और यह धन  परफोर्मेंस पर आधारित होना चाहिए. 

एक और कुतर्क देखें. भाषण में नीतीश ने कहा “भाडा –समानीकरण की नीति के कारण बिहार को नुकसान हुआ.” उनका कहने का मतलब था कि देश के अन्य भागों में बिहार के लौहे को लेजा कर उद्योग लगाये गए और केंद्र ने उन्हें भाड़े में झूट दी. यह भौंडा तर्क है. इस आधार गुजरात का कपास या यू पी एवं मध्य प्रदेश के सिंगरौली की बिजली बिहार भी नहीं जाएगी. अगर नीतीश की सरकार में क्षमता होती तो इस ब्लैकमेल के बजाय समान शर्तों पर इस्पात उद्योग लगने के लिए बाहर के उद्योगपतियों को बुला सकते थे लेकिन उद्योग तो लगे “अपहरण के” .   

बिहार के तथाकथित विकास की इमारत अब दरकने लगी है। अध्ययन का विषय यह हो गया है कि कैसे संचार तंत्र पर आंशिक नियंत्रण करके और दूसरी ओर सीधी डिलीवरी के माध्यम कुछ साइकिलें बांटकर और कुछ मुख्य सड़कें बनवाकर जनसोच को पूरी तरह बदला जा सकता है और वोट हासिल किए जा सकते हैं।

हम हाल में हुए  तीन रहस्योद्घाटन लेते हैं जो कि काफी विश्वसनीय संस्थाओं ने उजागर किया है जो कि बिहार के तथाकथित विकास की एक घृणित तस्वीर पेश करते हैं। नियंत्रक-महालेखापरीक्षक का कहना है कि  वर्ष 2009-10 में 2399.68 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है। यानि बिहार के हर व्यक्ति से साल भर में परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से 240 रुपए छीने गए हैं। ये उस बिहार की हालत है जहां पर 77 प्रतिशत आदमी महज 17 रुपए रोज पर गुज़ारा करता है। ये उस बिहार की हालत है जहां हर दूसरा बच्चा कुपोषण का शिकार है और ये उस बिहार की हालत है जहां विकास के नाम पर होने वाला खर्च राष्ट्रीय औसत का लगभग आधा है।
 राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य और विश्वविख्यात अर्थशास्त्री एवं समाज सुधारक जीन ड्रेज़ के नेतृत्व में अभी हाल में कुछ जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ताओं की टीम ने, जिसमें भारत की बड़ी संस्थाओं के प्रोफेसर्स आदि शामिल थे, ने एक सर्वेक्षण कराया। सर्वे ने चौकाने वाले नतीजे दिए। इस नतीजे के अनुसार बिहार में जन वितरण प्रणाली पूरी तरह ठप है। जहां कुछ गरीब राज्यों में प्रति सुपात्र (बी.पी.एल) परिवार 37 किलो तक अनाज हर महीने उठाता है वहीं बिहार जैसे सबसे गरीब राज्य में महज 11 किलो प्रतिमाह। इसको हम यूं भी कह सकते हैं कि जहां आन्ध्रप्रदेश जैसा सम्पन्न राज्य अपने कोटे का 99 प्रतिशत खपत कर लेता है, उड़ीसा 97 प्रतिशत, छत्तीसगढ़ 95 प्रतिशत, हिमांचल 93 प्रतिशत, उत्तर प्रदेश 77 प्रतिशत, झारखण्ड 71 प्रतिशत वहीं बिहार अपने कोटे का केवल 45 प्रतिशत खपत कर पाता है।
   सरकार का यह कृत्य अपराध की श्रेंणी में आता है जिसमें मिलने वाला खाद्य का कोटा जिसमें कुछ खाद्यान्न केंद्र मुफ्त में देता है, भी नीतीश सरकार उठाकर गरीबों का पेट नहीं भर रही है। इस सर्वे ने इस बात का भी आंकलन करने की कोशिश की कि कितने गरीब लोग सस्ते दरों पर खाद्यान्न चाहते हैं और कितने कैश। चूंकि बिहार में जन वितरण प्रणाली का अस्तित्व ही नहीं है इसलिए यह अकेला राज्य है जहां के 80 प्रतिशत गरीब सस्ते खाद्यान्न के बजाय पैसा चाहते हैं। अन्य सभी राज्यों के 80 प्रतिशत गरीबों ने कहा कि हमें पैसा नहीं अनाज चाहिए। ध्यान रहे कि प्रधानमंत्री व प्रणब मुखर्जी की कोशिश है कि सीधी डिलीवरी के सिद्धान्त को आगे बढ़ाते हुए सस्ते खाद्यान्न की जगह उस खाद्यान्न पर मिलने वाली सब्सिडी का पैसा ही सीधे गरीबों के खाते में जाला जाए।
   विकास के खोखलेपन की यह हालत है कि आज भी राज्य में 94.5 प्रतिशत लोग रोशनी के लिए मिट्टी के तेल पर आश्रित हैं और एक से पांचवी तक की कक्षा के छात्र-छात्राओं में आधे से ज्यादा स्कूल छोंड़ देते हैं। 86.09 प्रतिशत घरों में आज भी शौचालय नहीं है। देश में औसत प्रतिव्यक्ति बिजली की खपत 716 यूनिट है जबकि बिहार में मात्र 100 यूनिट है।


lokmat

Friday, 15 March 2013

कुछ बात है कि गरीब हटती नहीं हमारी !



एक बार किसी अंग्रेजी स्कूल की एक कक्षा में बच्चों से गरीब पर एक पैराग्राफ लिखने को कहा गया. कक्षा में एक अमीर बाप के बेटे ने लिखा “एक गरीब आदमी था. वह इतना गरीब था कि उसका बंगला भी गरीब था , उसकी गाड़ी भी गरीब थी , उसका माली भी गरीब था , उसका सब कुछ गरीब था”. भारत में गरीब एक मानसिक अय्यासी का शब्द बन गया है. हमें वोट पाना होता है तो गरीब की  याद आती है , हमें अपने को दूसरे से नैतिक दिखाना होता है तो गरीब की याद आती है और हमें जब गरीब के शोषण की रफ़्तार बढ़ानी होती है तो उसकी याद आती है. यहाँ तक कि हमें सत्ता पर काबिज़ रहने के लिए इमरजेंसी लगना होता है तो भी गरीब की याद आती है (राष्ट्रपति के आपातकाल की घोषणा के बाद का इन्दिरा गाँधी का भाषण). लिहाज़ा ६५ साल में गरीबी तो नहीं हटी, उसके नाम पर सत्ताधारी वर्ग अमीर ज़रूर होता रहा.
गरीबी के प्रति यह भाव आज का नहीं है. समूचे विस्तृत संविधान में एक जगह भी गरीब या गरीबी शब्द का प्रयोग नहीं हुआ है. अगर हुआ भी तो वह सन १९९३ में आये ७३वें  संविधान संशोधन के तहत ११ वीं अनुसूचि की १६ वीं प्रविष्टि में.
चालू बजट सत्र में वर्ष २०१२-१३ का ४२१ पृष्ठ का आर्थिक सर्वेक्षण पेश किया गया. इसके प्रस्तावना में यह आशंका ज़ाहिर की गयी है कि “जब तक भारत इन सुधारों को नहीं अपनाता, क्षमता से बहुत कम वृद्धि होने से राजकोषीय दबाव का जोखिम, सामाजिक अशांति और अधिक से अधिक पीछे रह जायेंगे”. यानी ३२ साल से चलायी जा रही आर्थिक उदारीकरण के परिणति सामाजिक अशांति में हो सकती है.
ज़रा गौर करें. सन १९८० में जब उदारीकरण का पहला चरण शुरू हुआ उस समय से आज तक देश का तथाकथित विकास दर औसतन ६.५ फी सदी रहा जो काफी विश्व के अन्य देशों के मुकाबले काफी अच्छा मन गया. लेकिन जहाँ भारत सन १९८० में मानव विकास सूचकांक में १३२ नंबर पर था सन २०१२ में भी वह ठीक इस नंबर पर है. याने आर्थिक विकास और मानव विकास में कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है. नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने हाल हीं में फ़्रांस के तत्कालीन राष्ट्रपति सरकोजी के आग्रह पर सकल घरेलू उत्पाद (जी डी पी ) पर आधारित विकास की अवधारणा की धज्जी उड़ाते हुए अपनी विस्तृत रिपोर्ट में लिखा कि इसका विकास से दूर –दूर तक सम्बन्ध नहीं है. एक उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि अगर भारत की राजधानी दिल्ली के कनाट प्लेस में बद-इन्तजामी से ट्रैफिक जाम हो जाये तो देश का जी डी पी बढ़ जाएगा.
एक नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री मिल्टन फ़्राईडमेन का एक उद्धरण भारत की अर्थ-व्यवस्था की समस्या बताने के लिए समीचीन होगा. उनके अनुसार सन १७७६ में जब संयुक्त राज्य अमरीका बना तो वहां अगर १९ आदमी खेतों में काम करते थे तो २० लोगों के लिए अनाज पैदा होता था. आज उस देश में मात्र १.५ व्यक्ति उतना अनाज पैदा कर रहे हैं टेक्नोलॉजी के संवर्धन के कारण. अब राज्य से अपेक्षित है कि जो १७.५ लोग बेरोजगार हुए उनको अन्य उत्पादन कार्यों में लगा कर ना केवल उनके बल्कि पूरे समाज का जीवन स्तर बेहतर किया जाये. भारत में इन ६५ सालों में हरित क्रांति ने अनाज उत्पान में जबरदस्त वृद्धि तो कर दी लेकिन रोगगार के अवसर ना होने से ६२ प्रतिशत लोग गाँव में हीं रह गए. यानि जो वृद्धि हुई उसे घर बैठ कर खा गए, न उनका जीवन-स्तर बेहतर हुआ न हीं समाज  को लाभ नहीं मिला. यहीं पर सरकार की योजना बनाने वाली भूमिका की जरूरत है. यहाँ सरकार से मतलब दोनों, केंद्र व राज्य सरकारों से है.
आज बताया जा रहा है कि नरेन्द्र मोदी ने गुजरात को, नीतीश कुमार ने बिहार को, शिवराज सिंह चौहान ने मध्य प्रदेश को और रमन सिंह ने छत्तीसगढ़ को जबरदस्त जी डी पी विकास दर के मार्ग पर झोंक दिया है. उत्तराखंड भी ऐसे दावे कर रहा है. लेकिन जो चिंता का विषय है वह यह कि मानव विकास में जहाँ बिहार अभी भी ३२ वें स्थान पर है वहीँ गुजरात पहले से नीचे पहुँच गया है. इन दोनों राज्यों में तथाकथित विकास (जी डी पी के चश्में से) के पीछे कृषि की बड़ी भूमिका है , जिसके लिए सरकार को कम, किसानों को और इंद्रा देवता को ज्यादा धन्यवाद देने की जरूरत है. 
जहाँ तक नीतीश या मोदी की सरकारों का सवाल है हकीकत यह है कि मानव विकास के तमाम पैरामीटरों पर ये राज्य फिसड्डी रहे हैं. गुजरात में सामाजिक क्षेत्र में व्यय जी एस डी पी (राज्य का सकल घरेलू उत्पाद) के अनुपात में राष्ट्रीय स्तर से भी कम हुआ है. रोजगार, शिक्षा, वतन, उपभोग , गरीबी , असमानता और स्वास्थ्य के मानकों पर यह राज्य पहले से नीचे खिसक गया है. शहर-गाँव खाई बढ़ी है. पिछले पांच वर्षों में जहाँ एक और कृषि में आसमानी वृद्धि हुई वहीं इस क्षेत्र में रोजगार के अवसर कम हुए. दरअसल हुआ यह कि संपन्न किसानों ने ज्यादा लागत और ज्यादा मूल्य वाली फसलें लगानी शुरू की जिस प्रक्रिया से छोटे व सीमान्त किसान अछूते रहे. जमीन का मूल्य बढ़ जाने से इन छोटे व सीमान्त  किसानों को  जमीन की उपलब्द्धता जाती रही (जो अक्सर बताई पर ले लिया करते थे). नतीजा यह हुआ कि ग्रामीण बेरोज़गारी बढ़ी, अमीर –गरीब खाई बढ़ी और साथ बड़ी अभाव-जनित ग्रामीणों के प्रति मानव विकास सरकार द्वारा अनदेखी क्योंकि सरकार इस बात से खुश थी कि राज्य की विकास जी डी पी पैमाने पर तो हो हीं रहा है.
बिहार के विकास को भी कुछ नए चश्में से देखने की ज़रुरत है. अगर कोई राज्य बेहद निचले स्तर पर है तो थोडा विकास भी प्रतिशत के रूप में ज्यादा हो जाता है. बिहार की खेती बुरी हालत में थी. बेहतर मानसून , नयी प्रजाति के बीज, खाद की उपलब्धता और बाहर काम करने वाले बिहारियों का गाँव में पैसा भेजना कृषि उत्पादन को उछाल देने लगा. कमोबेश पूरे देश में कृषि उत्पादन में जबरदस्त वृद्धि हुई. लिहाज़ा जी डी पी ग्रोथ रेट में बिहार सर्व-प्रथम हो गया. इस विकास का ना तो सरकार से कोई मतलब था नहीं यह स्थायी-भाव रहेगा. दूसरा कारण जिसका श्रेय नीतीश की सरकार को जाता है (और मोदी को भी) है इन्फ्रा-स्ट्रक्चर में सड़क आदि पर हुए खर्च (जिसमें केन्द्रीय अनुदान और योजनाओं का बड़ा योगदान है भले हीं हो, राज्य –सरकार द्वारा ईमानदारी से इसे इमली जामा पहनाना एक बड़ा काम था) का जी डी पी में शामिल होना. नतीजा यह हुआ कि मोदी की तरह नीतीश ने भी विकास का सेहरा पहन लिया जबकि मानव विकास में बिहार उसी ३२ नंबर पर लटका रहा. इसके ठीक उलट जहाँ गुजरात में उद्योग लगे बिहार में ना तो उद्योग लगे ना हीं सेवा क्षेत्र का कोई सार्थक विस्तार हो सका. उद्योगपति शरू के दौर में तो आये और एम् ओ यू पर दस्तखत कर के चले गए लेकिन कानून –व्यवस्था लगातार गिराने की कारण वापस लौट के नहीं आये. बिहार में १६.५ प्रतिशत का विकास दर दर्ज करता रहा.
लेकिन यहाँ एक बात ध्यान देने की है कि जहाँ एक ओर दोनों हीं मुख्य –मंत्री व्यक्तिगत रूप से ईमानदार हैं वहीं दोनों राज्यों में विकास के कारकों को लेकर भारी अंतर है. गुजरात का समाज आदतन उद्यमी है, वणिक-वृत्ति वाला है, तासीरन शांत है, पहले से हीं विकसित रहा है और जमीन पर आबादी का भार अधिक नहीं है. इसके ठीक विपरीत बिहार में जनसँख्या घनत्व गुजरात के मुकाबले साढ़े तीन गुना (३२०:११००) है. लालू यादव के काल में विकास की कल्पना “ सशक्तिकरण की झूठी चेतना” (फाल्स सेन्स ऑफ़ एम्पावरमेंट) से ऊपर नहीं बढ़ पायी थी. वातावरण आपराधिक हो गया था. सामंतशाही अवशेषों के कारण उद्यमिता की कमी रही.
लेकिन इन दोनों विकास के मॉडल का कॉमन फैक्टर था “राज्य का डायरेक्ट डिलीवरी मोड में जाना) . शायद दोनों ने फ़्राईडमेन की सलाह कि “यदि जी डी पी बढ़ रहा हो तो पहला काम सीधे फण्ड गरीबों को ट्रान्सफर करो”  ब्राज़ील के लूला की तरह हीं गांठ बांध ली. नतीजा यह हुआ कि जब बिहार के गाँवों से लड़कियां सरकरी साइकिलों पर स्कूल के लिए निकलती थी तो फिजा बदलती थी. सरकार कल्याणकारी लगने लगा. नीतीश और मोदी दोनों ने फिर जनता का आशीर्वाद पाया.
इसके ठीक विपरीत केंद्र द्वारा जारी ग्रामीण स्वास्थ्य योजना उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती रही. राजनीति और अपराध में दूध-पानी सदृश्यता हो गयी. विकास केवल अपराधी और भ्रष्ट का हुआ. अगर देश के अन्य राज्य विकास के इस मॉडल को जल्द अंगीकार नहीं करते तो आर्थिक सर्वेक्षण में बताया गया “सामाजिक अशांति” का खतरे का अंदेशा जी डी पी रहते कभी सही हो सकता है.

rashrtiya sahara 

संपादक-एंकर के उग्र विचार परोसने के खतरे !



विगत सप्ताह एक चैनल द्वारा आयोजित “मीडिया फेस्ट” में देश के दो जाने-माने फायरब्रांड एंकरों ने, जो अपने चैनलों के संपादक भी है ---एक अंग्रेजी चैनल का और दूसरा हिंदी चैनल का— युवा पत्रकारों के सवालों का जवाब दे रहे थे. युवाओं का प्रश्न  था इनके मशहूर कार्यक्रमों (स्टूडियो डिस्कशन्स) में इनके  आक्रामक तेवर और मुद्दों पर अपने बेलाग और “यही अंतिम सत्य है” वाले थोपू विचार को लेकर.
कहना न होगा कि दोनों ने अपने धंधे के अनुरूप वाक्-कुशलता के जरिये पूरी शिद्दत से अपने को सही ठहराया. उनके तीन तर्क थे. पहला यह कि वास्तविक पत्रकारिता और गजट-वाचन में अंतर होता है याने पत्रकारिता उस दिन शून्य-उपादेय हो जाएगी जिस दिन महज तथ्य (एक –मरे-दो-घायल टाइप) परोसने का काम करने लगेगी, सरकारी प्रेस-नोट या डी-डी न्यूज़ की मानिंद. दूसरा तर्क था एक सम्पादक-एंकर को भी अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता उतनी हीं है जितनी किसी अन्य को. तीसरा तर्क था एक पत्रकार को मुद्दों के तह में जाने के बाद उसको लेकर एक पैशन (आसक्ति) होना चाहिए क्योंकि पत्रकार मशीन नहीं संवेदनशील आदमी है.
इन दोनों संपादक-एंकरों ने चश्में पहन रखे थे. अगर वे चश्में उतार देते तो उस हॉल का,जिसमें यह संवाद हो रहा था, स्वरुप उनके लिए बदल चुका होता. लोगों ने कैसे कपडे पहने हैं, दूर तक भीड़ कितनी है, लड़के-लड़कियों का अनुपात क्या है यह सब कुछ वही ना होता जो चश्मे से देखने पर था. यानि महज एक सेकंड के दशांश में हीं तथ्य (जिसे इन्होने सत्य मान लिया था) बदल गए होते. चश्मा लगाने के पहले का सत्य और चश्मा उतारने के बाद का सत्य अलग –अलग होते. अब मान लीजिये रोशनी कम हो जाये तो संपादकों का सत्य एक बार फिर बदल जाएगा और अगर दूर कहीं एक झालर गिर कर हवा में लटक रहा हो और कुछ हीं देर पहले इनको आयोजकों से यह भी पता चला हो कि दो दिन पहले यहाँ एक बड़ा सांप देखा गया था, दो क्या संपादकों का सत्य “झालर नहीं सांप” के रूप में बदल नहीं जाएगा? अद्वैत –वेदान्त का सिद्धांत ब्रह्म सत्यम , जगत मिथ्या और खासकर शंकर के मायावाद का “सर्प-रज्जू भ्रम” इसी को उजागर करता है.
ज्ञान-मीमांसा (एपिस्टेमोलोजी) के सिद्धांतों के तहत मानव जिसे सत्य समझता है वह दरअसल उसके पिछले ज्ञान और ज्ञानेन्द्रियों द्वारा हासिल ताज़ा तथ्य का दिमाग में संश्लेषण होता है. एक बच्चे को सांप से डर नहीं लगता लेकिन बड़े को लगता है. चूँकि ज्ञानेन्द्रियों के सीमा है इसलिए कोई भी सत्य अंतिम नहीं होता.     
इन दोनो संपादक-एंकरों की बातों में गंभीर तर्क-शास्त्रीय दोष है. पहला पत्रकारिता और एक्टिविज्म में अंतर है. पत्रकार किसी मुद्दे पर प्रतिस्पर्धी तथ्यों व विचारों का बाज़ार (मार्किट-प्लेस) तैयार करता है और फैसला जनता पर छोड़ देता है. यही वज़ह है कि सामना, पीपुल्स डेली या पांचजन्य के संपादकों के तर्क-वाक्यों की विश्वसनीयता उतनी नहीं होती जितनी किसी स्वतंत्र (या ऐसा माने जाने वाले) चैनल या अखबार के सम्पादक की. दोनों को अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता है पर उनकी विश्वसनीयता जन-धरातल में लोगों द्वारा तय की जाती है. लिहाज़ा सम्पादक विचार तो रख सकता है पर एंकर के रूप में वह उन विचारों की लाइन में अगर संवाद को धकेलना चाहता है तो ना केवल उसकी और संपादक के संस्था की  बल्कि उसके चैनल की विश्वसनीयता भी संदिग्ध हो सकती है. क्योंकि चैनल के प्रतिनिधि के रूप में वह संपादक सामान्य नागरिक से कुछ ज्यादा होता है.
एक उदाहरण लें. भारत –पाकिस्तान बॉर्डर पर दो भारतीय सैनिकों की सर कटी लाश बरामद होती है. कुछ हीं घंटों में एक एडिटर-एंकर जो पूरे तथ्य एकत्रित करने का याने तथ्य तक पहुँचाने का दावा करता है अपने स्टूडियो प्रोग्राम में पाकिस्तान सेना को दोषी ठहराते हुए इतनी उर्जा पैदा करता है कि पूरे देश में ड्राइंग-रूम आउटरेज (कमरे में बैठे गुस्सा ) का भूचाल आ जाता है. सरकार से अपेक्षा होने लगाती है कि “हमेशा-हमेशा के लिए ये समस्या ख़त्म करो” या “अबकी पाकिस्तान को एक ऐसा सबक सिखाओ कि दोबारा हिम्मत ना करे”. उस दर्शक को यह नहीं बताया जाता कि वैश्विक राजनीतिक, सामाजिक व सामरिक स्थितियां कैसी हैं. क्या दो देशों के संबंधों को वर्तमान विश्वजनीन परिप्रेक्ष्य को देखते हुए एक भावनात्मक आक्रोश के तहत सामरिक आग में झोंका जा सकता है? क्या देश को इस चैनल ने यह बताया कि पाकिस्तान एक ऐसा देश है जहाँ आतंकवादी, आई एस आई , सेना और राजनीतिक शासक अलग –अलग बगैर एक दूसरे की परवाह किये काम करते हैं और ऐसे में पाकिस्तान को सबक सिखाने का मतलब सीधे युद्ध में जाना हीं हो सकता है वह भी एक ऐसे देश के साथ जिसके पास भारत से ज्यादा परमाणु हथियार है और जिसका ना तो स्वरुप तय है ना हीं गंतव्य? क्या आज भारत विकास छोड़ कर अपने को परमाणु युद्ध में एक ऐसे देश के साथ भीड़ सकता है जो असफल राष्ट्र है. क्या ऐसे असफल पडोसी को, जो स्वयं हीं ख़त्म हो रहा है, कमजोर करने के और उपादान नहीं है? 
एक और खतरा देखें. मान लीजिये एक महीने बाद पता चलता है कि दरअसल भारतीय सैनिकों के सर पाक सैनिकों ने नहीं बल्कि कश्मीरी आतंकवादियों ने या अफ़ग़ानिस्तान से आने वाले तस्करों ने काटे थे तब उस संपादक की विश्वसनीयता की क्या हश्र होगा?
एक और उदहारण लें. डी एस पी की हत्या में राजा भैया पर आरोप है और एडिटर-एंकर उसी दिन शाम  को अपने प्रोग्राम में सरकार से पुरज़ोर मांग करता है कि आरोपी को गिरफ्तार किया जाये. अब मान लीजिये कि सी बी आई की जाँच के बाद पता चलता है कि राजा भैय्या नहीं बल्कि कोई और गुंडा इस कांड के पीछे है, क्या उसके बाद सम्पादक की सस्था पर आने वाले आक्षेप से बचा जा सकता है?
क्या यह आरोप संपादक पर नहीं लगेगा कि उसने “सभी तथ्यों” के बजाय “कुछ चुनिन्दा तथ्यों के आधार पर अपना “तोड़ दो, फोड़ दो, हमेशा के लिए ख़त्म कर दो” का भाव अपनाया है. जब सी बी आई को महीनों पापड़ बेलने की बाद पूर्ण तथ्यों का टोटा रहता है तो सम्पादक महोदय को कुछ हीं घंटों में किस अलादीन का चिराग से “सभी तथ्य” मालूम हो जाते है?
एक और गलती. तर्क शास्त्र में माना जाता है कि जब तर्क कमजोर होते हैं तो आप्त-वचन का सहारा लिया जाता है यानि यह कहा जाता है कि अमुक बात मैं हीं नहीं गाँधी ने या गीता ने या भारत के सी ए जी द्वारा भी कही गयी है. इसी क्रम में “नेशन वांट्स तो नो टु नाइट” (देश आज इसी वक्त जानना चाहता है) कहा जाता है. क्या कोई राय -शुमारी संपादक-एंकर ने की है? और अगर मान लीजिये देश की भावना है भी तो क्या पाकिस्तान से युद्ध शुरू किया जा सकता है? इस तरह तो विवादास्पद भूमि पर कब का मंदिर बन जाना चाहिए क्योंकि प्रजातंत्र में राय-शुमारी के तहत बहुसंख्यक मत हीं देश का मत होगा?
संपादक-एंकर का उग्र विचार दो खतरे पैदा कर सकता है. एक उसकी, संपादक के संस्था की और उसके चैनल की विश्वसनीयता ख़त्म हो सकती है और दो, दर्शकों को सुविचारित एवं सम्यक विचार (अन्य एक्सपर्ट्स के) से वंचित होना पड़ सकता है और वह अपना स्वतंत्र मत नहीं बना सकता , जो कि पत्रकारिता का मूल उद्देश्य है.

bhaskar 13-3-13    

Thursday, 28 February 2013

शाइनिंग इंडिया” की कुछ चमक “बिलखते भारत” पर भी डालें



एडम स्मिथ ने “वेल्थ ऑफ़ नेशन” में कहा है “ हमारा  रात का खाना किसी  गोश्त बेंचने वाले या रोटी बनाने वाले बेकरी के मालिक की उदारता पर नहीं बल्कि उसकी अपने लाभ प्रति ललक की वजह से मिलता है”. कहने का मतलब पूंजीपति या उद्योग चलने वाला जब लाभ कमाता है तो कोई अहसान नहीं करता और उससे वसूल कर उन लोंगों को बांटना जो अपने नहीं बल्कि स्थिति-जन्य कारणों से गरीब है राज्य का नैतिक दायित्व है. सन १९८० में शुरू हुआ उदारीकरण दस साल बाद सन १९९१ में भारतीय अर्थ-व्यवस्था को वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ समेकित करने का सबब बना जो आज नव-उदारवादी अर्थव्यवस्था में परिणित हुआ. इन ३१ वर्षों में देश का सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर (जी डी पी ग्रोथ रेट) औसतन ६.५०  प्रतिशत रहा. हमने नयी व्यवस्था को लेकर कसीदे काढ़े. “इंडिया शाइन” करने लगा. लेकिन मानव विकास सूचकांक (एच डी आई) में भारत तब भी १३४वेन नंबर पर था और सन २०११ में भी ठीक १३४ वें नंबर पर (भूटान और बांग्लादेश से भी नीचे ) है. क्या देश के वित्त मंत्री पी चिदंबरम इस बात को कल पेश होने वाले बजट में संज्ञान लेंगे? 
संसद में बुधवार को पेश हुए वर्ष २०१२-१३ के आर्थिक सर्वेक्षण कल पेश होने वाले बजट की आहट बताता है. दो बाते स्पष्ट है. पहला : खाद्य सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाएगी और दूसरा: पेट्रोलियम पदार्थों खासकर डीजल पर सब्सिडी में कटौती की जाएगी. पहला चुनाव की वैतरणी पार कराएगा और दूसरा भारतीय अर्थ-व्यवस्था को वित्तीय घटा कम करके अंतर्राष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों की हीं नहीं विदेशी निवेशकों की नज़र में भी उंचा करेगा.
पर इस सर्वेक्षण का एक तीसरा पहलू भी गौर करने लायक है. यह सिद्ध करता है कि कम टैक्स दर से ज़रूरी नहीं कि कर की चोरी ना हो. भारत में प्रत्यक्ष कर और जी डी पी का अनुपात महज सात फी सदी है जबकि अति गरीब मुल्कों में भी यह दूना या उससे ज्यादा है. अमीर देशों में तो यह ३० फीसदी से अधिक है. आखिर हम क्यों शर्माते है अमीरों से टैक्स लेकर ग़रीबों के विकास में लगाने में.
स्थिति यह है कि अगर किसी व्यक्ति की आमदनी दस लाख रुपये सालाना है तो वह ३० प्रतिशत टैक्स देता है लेकिन अगर एक अन्य व्यक्ति की आमदनी १०,००० करोड़ है तो वह भी ३० प्रतिशत हीं देगा. यह कहा जा रहा है कि कम टैक्स दरें होंगी तो लोग कर चोरी नहीं करेंगे लेकिन यह बात आज पेश हुए सर्वेक्षण ने गलत साबित कर दी. और फिर राज्य अभिकरण चोरी के डर से टैक्स कम करे यह बात हजम नहीं होती.   
अर्थशास्त्र का एक मूल सिद्धांत है कि अगर महंगाई ज्यादा है तो सकल घरेलू उत्पाद (जी डी पी ) और वित्तीय घाटे के अनुपात का कोई मतलब नहीं रहा जाता. लेकिन जो सबसे चौंकाने वाले तथ्य इस सर्वेक्षण से पता चलता है वह ये कि  कर वसूली लक्ष्य से कम हुई है. अगर महंगाई बढ़ी है तो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर दोनों का लक्ष्य क्यों नहीं हासिल हो सका.
आज देश में लगभग २.८४ करोड़ आय कर दाता है. इनमें से केवल चार लाख करदाता ऐसे हैं जिनकी आमदनी २० लाख से ऊपर है और जिनका कुल टैक्स कोई चार लाख करोड़ रु. है और जो कि इस मद में आने वाले टैक्स का ८९ प्रतिशत है. बाकि २.८० करोड़ आयकर दाताओं से महज ११ प्रतिशत टैक्स आता है. अगर इस रु बीस लाख की आमदनी वाले चार लाख लोगों से ४० प्रतिशत टैक्स लिया जाये और तीस लाख से ऊपर वालों से ५० प्रतिशत या इससे ऊपर वालों से ६० प्रतिशत तो ना केवल आय बढेगा बल्कि वित्तीय घाटे का हौवा भी ख़त्म होगा और गरीबों को और सब्सिडी दी जा सकेगी. माध्यम वर्ग को भी , जिसे आजकल महत्वाकांक्षी भारत (एस्पिरेस्नल इंडिया) कहा जाता है , एक बड़ी रहत मिलेगी .  
याद आता है दो साल पहले का आर्थिक सर्वेक्षण (२०१०-११) जिसमे बताया गया था कि उत्पाद कर और जी डी पी का अनुपात २००५-०६ के मुकाबले तीन प्रतिशत से घट कर १.७ प्रतिशत और कस्टम्स का १.८ से घट कर १.५ प्रतिशत हो गया था. कुल मिलाकर इस अवधि में इस नीति से देश को अप्रत्यक्ष कर में लम्बा चूना लगा.
 एक अन्य उदहारण लें. फ़ोर्ब्स मैगज़ीन में भारत के उन १०० लोगों को शामिल किया गया है जिनका नेट वर्थ (पूंजीगत हैसियत) रु १२ लाख  करोड़ है. लेकिन इन्हें कोई वेल्थ टैक्स नहीं देना पड़ता. इसी तरह डिविडेंड को आयकर से इस आधार पर बाहर रखा गया है कि कंपनी जिसका शेयर धारक ने लिया है पहले हीं टैक्स दे चुका है. लेकिन गौर करने की बात है कि एक नौकरी पेशा व्यक्ति १०० शेयर खरीद कर रु. दस हज़ार कमाता है और दूसरा व्यवसायी १० हज़ार शेयर लेकर दस लाख कमाता है दोनो को आय कर में पूरी छूट मिलाती है.
अगर लगभग साढ़े पांच लाख करोड़ की छूट के बावजूद औद्योगिक विकास दर जमीन नहीं छोड़ रही है तो एक बार सोचना होगा कि समस्या कहीं और है. प्रत्यक्ष कर (आय कर और कॉर्पोरेशन कर) एवं अप्रत्यक्ष कर (कस्टम्स और उत्पाद) के रूप में मिलाने वाली छोट इसलिये दी जाति है कि कीमतें नियंत्रण में रहें और औद्योगिक कंपनियां इस छूट का लाभ कीमतें कम रख कर जनता तक पहुंचाएं. पर जिस तरह कीमतें आसमान पर रहीं उसे देखा कर सरकार को सोचना पडेगा कि मर्ज कहीं और तो नहीं है.
आज ज़र्रोरत इस बात की है कि अप्रत्यक्ष कर में छूट दे कर प्रत्यक्ष कर को कई श्रेणियों में बनता जाये याने १० से लेकर ६० प्रतिशत के छः स्लैब रखे जाएँ. अगर संपन्न देशों में जहाँ गरीब –अमीर का अंतर इतना नहीं है या आभावग्रस्त लोगों का प्रतिशत पूरी आबादी का ७७ प्रतिशत नहीं है वहां भी सर्वोच्च टैक्स स्लैब ८० प्रतिशत से ऊपर है. क्या भारत ऐसा करके बढ़ाते जी डी पी का लाभ कृषि में पूंजी –निर्माण के लिए नहीं लगा सकता? आज देश का ४० प्रतिशत किसान अवसर मिलते हीं खेती छोड़ कर मजदूरी को तैयार है. क्या रु २७ प्रतिदिन (सरकारी आंकड़ा) पाने वाले ४२ प्रतिशत अभावग्रस्त जीवन जीने से बचाए नहीं जा सकते?

bhaskar 

Tuesday, 26 February 2013

क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ जनांदोलन ख़त्म हो गया?




हेलीकाप्टर सौदा. फिर एक घोटाला फिर एक इन्क्वारी की मांग , फिर एक सरकारी आश्वासन और फिर एक बार जनता के गठरी में लगा चोर. दरअसल गठरी से चोर कभी अलग हुआ हीं नहीं. हमें बस अहसास होता  है कि सिपाही रात में सीटी बजा कर चोर भगा देता है. वास्तव में वह चोर को अपनी लोकेशन बताता है. हम ठगे जाते रहे हैं.
लेकिन अब कोई अन्ना जन्तर –मंतर पर उस तरह का धरना नहीं देता और अगर देता भी है तो भीड़ नहीं उमड़ती. अब कोई किरण बेदी मंच से झंडा नहीं लहराती और न हीं कोई विश्वास अपनी कविताओं से जन-मानस को उद्वेलित करता है. अब कोई केजरीवाल भी अपने प्रति वही विश्वास दिला पाता  है जो एक साल पहले तक था. सब कुछ मानो ख़त्म हो गया है. क्या भ्रष्टाचार ख़त्म हो गया या हमने इसे २०-२० के क्रिकेट मैच की तरह लिया और यह मान कर की सब कुछ फिक्स है टिकट फाड़ते हुए घर लौट गए वही सब कुछ झेलने के लिए जो ६५ साल तक हमारी अस्थि-मज्जा को खाता रहा?
क्या भारतीय समाज की बुराइयों से लड़ने की कूवत ख़त्म हो गयी है? क्या कोई गाँधी नहीं होगा तो हम घर बैठ जायेंगे और कमी  खोजेंगे किसी अन्ना, किरण या केजरीवाल में? “मैं तो पहले से हीं कह रहा था कि अन्ना संघ के आदमी हैं” या “केजरीवाल में राजनीतिक महत्वाकांक्षा तो मुझे पहले से हीं दिखाई दे रही थी “ कह कर हम फिर ड्राइंग रूम में टीवी पर कोई भोंडी हंसी का प्रोग्राम देखने लगे हैं. जैसे भ्रष्टाचार कोई हमारी नहीं बल्कि केवल अन्ना-किरण-केजरीवाल की समस्या हो.
आन्दोलनों में लीडर होना ज़रूरी होता है लेकिन लीडर होने से आन्दोलन हो यह ज़रूरी नहीं. देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ जनान्दोलन के सारे अवयव मौजूद हैं , सामूहिक चेतना भी विकसित हो चुकी है. आन्दोलन को स्थायित्व देने के सभी कारक—मसलन शोषक-शोषित अंतर्संबंध की समझ, गरीबी व अभाव से जूझता एक बड़ा समाज और साथ हीं चाँद-सितारे पाने की मरीचिका में सारे मूल्यों को तिलांजलि देने वाला  एक मध्यम वर्ग और कुछ हाथों में लगातार केन्द्रित होती पूँजी और बगैर किसी खूनी –क्रांति के वोट के ज़रिये सत्ता-वर्ग पर लगाम लगने की संवैधानिक प्रक्रिया. फिर भी क्यों नहीं बदलाता भारतीय भ्रष्ट तंत्र.
इसका एक हीं कारण हो सकता है –सत्ता वर्ग का यह विश्वास कि ये जन्तर –मंतर पर जाने वाले मतदान केंद्र पर नहीं जाते या अगर जाते भी हैं तो किसी जादुई शक्ति से जाति, धर्म, क्षेत्र और अन्य संकीर्ण पहचान समूह में बंट जाते हैं.   
हम शायद भूल गए हैं कि अपनी समस्याओं को प्रजातान्त्रिक ढंग से सुलझाने का पहला उपक्रम हीं भारत और एथेंस में लगभग साथ साथ शुरू हुआ था. वैशाली में बौद्ध परिषदों में जनता अपनी समस्याओं पर विचार करके उनका सामूहिक निदान कर लेती थी. गौतम बुद्ध की मृत्यु के तत्काल बाद राजगीर में हुई धर्म संसद का इतिहास सर्व-विदित है. दूसरी बड़ी संसद वैशाली में हुई. तीसरी सबसे बड़ी संसद सम्राट अशोक की सदारत में पटना में हुई. इस विशाल परिषद् में ना केवल राज काज पर चर्चा हुई बल्कि जन-धरातल पर होने वाले संवादों को संहिता-बढ किया गया यानि इन संवादों का स्वरुप, विषय-वस्तु, तर्क-वाक्यों की सीमायें आदि सुनिश्चित की गयी.  अंतिम जन -संसद कश्मीर में दूसरी सदी में हुई.    
यूरोपीय दुनिया के दावों के विपरीत ना केवल भारत बल्कि जापान भी प्रजातान्त्रिक शासन प्रणाली का प्रयोग ६०४ ई से कर रहा है. जहाँ ब्रिटेन में मैगना कार्टा सन १२१५ में आया. जापान के बौद्द राजकुमार शोतोको ने १७ अनुच्छेदों का संविधान अपने देश में लागू किया.
दरअसल समझाने में एक गलती हुई है. कोई १२४ करोड़ के देश दशमलव एक प्रतिशत भी अगर किसी जगह इकट्ठा हो जाये तो वह क्रांति लगाती है, जन-भावना बन जाती है और मंच के लोगों को लगता है कि उनके नेत्रित्व में क्रांति आ गयी. उन्हें आभासित सत्य से गलतफहमी हो जाती है. अन्ना को भी हुई और केजरीवाल को भी. इस गलतफहमी का नतीजा यह हुआ कि उन्होंने बगैर इसे गाँव-गाँव में पहुंचाए , बगैर इसे संकीर्ण पहचान समूह की सीमाओं से पार करते हुए और बगैर इसे गाँव की बुधिया से सहर के साहेब तक की बीच जीने की अकेली शर्त बनाये हुए फॉर्मेट बदलने लगे. अन्ना ने गाँधी की विनम्रता और मानसिक हिंसा का त्याग अंगीकार न करते हुए हिंसक भाव का परिचय दिया और केजरीवाल के साथ दुश्मन जैसा व्यवहार करना लगे जो कि गाँधी ने इतने झटके खाने के बाद भी नेहरु के साथ नहीं किया.
दूसरी ओर केजरीवाल को यह गलतफहमी हो गयी कि जन्तर-मन्तर में भीड़ और मीडिया में खबर के मायने देश में क्रांति. और शायद तब सोच जगी कि जब क्रांति हो हीं गयी हो तो क्यों ना इसे सत्ता परिवर्तन का साधन भी लगे हाथ बना लिया जाये. इसके पीछे मनसा भले हीं सत्ता पाने की लालसा ना रही हो पर सम्पूर्ण क्रांति को शॉर्टकट मार्ग पर ले जाना तो था हीं. केजरीवाल शायद यह भी भूल गए कि मीडिया तभी तक उनके साथ है जब तक लोगों का हुजूम जन्तर मन्तर पर अच्छे विसुअल दे रहा है. मीडिया की दिलचस्पी अन्ना-केजरीवाल में नहीं बल्कि विसुअल देने वाली भीड़ में थी, अन्ना के हेल्थ रिपोर्ट पर थी, रामदेव की पिटाई पर थी और भ्रष्टाचार के खिलाफ ६५ साल में पहली बार मिले “जबरदस्त विसुअल” में थी. जैसे हीं केजरीवाल ने राजनीति में कदम रखा , भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन का फॉर्मेट बदल गया. “राजनीति में रह कर भ्रष्टाचार से बैर हो हीं नहीं सकता” के भाव में लोगों ने केजरीवाल को भी नज़रों से उतार दिया. हालांकि न तो अन्ना की नियत गलत थी ना हीं केजरीवाल का इरादा या मंशा. दोनों निहायत ईमानदार और उद्देश्य के प्रति समर्पित लोग थे परन्तु उनकी समझ जरूर गलत दिशा में उन्हें ले गयी.    
समाजशास्त्री सिडनी वर्बा के एक अध्ययन के अनुसार यह ज़रूरी नहीं कि जिस समाज की आर्थिक स्थिति बेहतर हो उसमे लोगों की प्रजातान्त्रिक प्रक्रिया में भागीदारी भी ज्यादा हो. वर्बा ने पाया कि जहाँ अमरीका की प्रति-व्यक्ति आर्थिक आय यूरोप के तमाम देशों से बेहतर है जन भागीदारी के मामले में यूरोप के वे देश ज्यादा तत्पर हैं. भारत में भी जन भागीदारी का इतिहास रहा है भले हीं वह एक हज़ार साल के समय खंड में सुस्त रहा और हम विदेशी शासकों का दंश झेलते रहे.
आज प्रश्न यह है कि क्या कोई अन्ना या कोई केजरीवाल नही तो भ्रष्टाचार का दंश हम झलते रहेंगे ? क्या नेता –विहीन जनादोलन की कल्पना नहीं की जा सकती ? क्या १२४ करोड़ की भीड़ में से एक या एक दर्जन अगुवा नहीं निकाले जा सकते? अगर नहीं तो हम अगली पीढी को एक भ्रष्ट, बीमार और कुंठित भारत दे जायेंगे जो हमें हमरे पिछली पीढ़ी ने सौपी थी.    

sahara