Friday, 22 March 2013

विशेष राज्य की मांग के पीछे की राजनीति



“प्राकृतिक आपदा” पैरामीटर में जोड़ने की मांग ज्यादा कारगर होती

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने छः करोड़ गुजरातियों के सम्मान की बात की तो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने साढ़े दस करोड़ बिहारियों के सम्मान की. दोनों सम्मान –सम्मान खेल रहे है. नीतीश को दर्द है कि जिन आधारों पर मोदी को भावी प्रधामंत्री के रूप में पेश किया जा रहा है उन्हीं आधारों पर हमें क्यों नहीं. लिहाज़ा “अधिकार रैली” में भीड़ जुटा कर बिहार को विशेष राज्य का दर्ज़ा दिलाने के नाम पर दिल्ली men  नीतीश ने अपने भाषण में कोशिश की कि उन्हें भी कम से कम से कुछ पिछड़े राज्यों की रहनुमाई का तमगा मिल जाये तो भविष्य में रायसीना हिल्स पर उनका भी दावा बने. पूरे भाषण में चार बार दिल्ली का नाम लेकर और यह बता कर कि वह यह लड़ाई सभी गरीब राज्यों के लिए लड़ रहे हैं, नीतीश ने दिल की बात जुबान पर लाई.

लेकिन बिहार को विशेष राज्य दिलानेकी मांग पर ना तो नीतीश गंभीर थे ना हीं वह तथ्यों को सही पेश कर पाए.
अर्थशास्त्र का प्रारंभिक कक्षा का छात्र भी बता सकता है कि यह मांग जिस स्वरुप में मांगी जा रही है केंद्र को कभी भी स्वीकार्य नहीं होगी. नीतीश ने अपने भाषण में अपनी तारीफ के कसीदे काढ़ने के बजाय बेसाख्ता बिहार के पिछड़ेपन के आंकडे और कमियां गिनाईं. सबसे कम प्रति-व्यक्ति आय जो राष्ट्रीय आय का महज एक-तिहाई से कुछ ज्यादा है, प्रति एक लाख आबादी पर कम सड़कें, कम रेल लाइनें, राष्ट्रीय औसत के मुकाबले छठवां हिस्सा प्रति व्यक्ति बिजली खपत, राष्ट्रीय औसत के आधा प्रति व्यक्ति विकास खर्च, पर्वतीय क्षेत्र ना होने का बावजूद हिमालय से निकली नदियों का बिहार में तबाही मचाना और आबादी का घनत्व. उनके कहने का मतलब था कि केंद्र अगर पैसे देता तो बिहार की यह हालत ना होती.

अपने भाषण में नीतीश ने बड़ी खूबसूरती से उन कार्यों का आंकड़ा नहीं दिया जिसमें राज्य सरकार की पूर्ण जिम्मेंदारी थी और उनमें राज्य लगातार पिछड़ता रहा. मुख्यमंत्री ने यह नहीं बताया कि शिक्षा की स्थिति क्यों गिरी है, स्वास्थ्य के पैरामीटर्स क्यों ज़मीन पर हैं, क्यों केन्द्र द्वारा भेजे गए सस्ते अनाज का महज ४५ प्रतिशत हीं राज्य सरकार उठा पाई जबकि आंध्र जैसा संपन्न राज्य अपने कोटे का ९३ प्रतिशत उठता है. यह भी चर्चा नहीं की कि क्यों राज्य के पॉवर प्लांट ३० प्रतिशत प्लांट लोड फैक्टर से कम पर चलते है. क्यों मनरेगा का पैसा बिचौलिए ले जाते हैं और क्यों अपराध के आंकडे बताते हैं कि अपहरण, लूट और चोरी की घटनाओं में आठ साल में बेहद इजाफा हुआ है. क्या चोरी और अपहरण रोकने का काम भी केंद्र के पैसे से होना है? जिस राज्य में केंद्र का भेजा पैसा (गरीबों के स्वास्थ्य बीमा के रूप) पुरुषों की बच्चेदानी (?) निकाल कर हड़प लिया जाता हो उस राज्य में नीतीश की सरकार कितनी सक्षम है यह साफ़ दिखाई देता है.

परिवार नियोजन के कार्य-क्रमों में बिहार सरकार पिछले आठ सालों में बुरी तरह असफल रही है और आबादी पर कोई नियंत्रण नहीं हो पाया है. राष्ट्रीय औसत के मुकाबले डेढ़ गुना आबादी दर क्या केंद्र की अक्षमता है? केरल में प्रति-व्यक्ति आय बहुत ज्यादा ना होते हुए भी मानव विकास में राज्य सरकार द्वारा व्यय करने से जीवन स्तर देश में सबसे अच्छा है.  

नीतीश ने अपने कुछ चुनिन्दा कार्यों की बड़ाई करते हुआ बताया कि लड़कियों को साइकिल देना की वज़ह से लड़कियाँ स्कूल जानी लगीं लेकिन यह नहीं बताया कि केंद्र की “मिड-डे –मील” (बच्चों को स्कूल में दोपहर का भोजन) योजना कैसे भष्टाचार की भेंट चढ़ गयी और कैसे (प्रतिष्ठित स्वयंसेवी संस्था असर की तजा रिपोर्ट के अनुसार) कक्षा पांच के ७२ प्रतिशत छात्र कक्षा दो का ज्ञान नहीं रखते. क्या इसके लिए भी पैसे की ज़रुरत है?       

 विशेष राज्य देने का पैमाना पांच कारकों पर आधारित है. वे हैं (अ) पहाड़ी और दुर्गम भू क्षेत्र (बी) निम्न जन-संख्या घनत्व (स) पडोसी देशों से सीमाओं पर सामरिक स्थिति (द) आर्थिक एवं अधि-संरचनात्मक पिछड़ापन और (य) राजकीय वित्त-व्यवस्था की अक्षम प्रकृति. बिहार इनमें से मात्र अंतिम दो में आता है. जबकि हकीकत यह है कि बिहार का भारत के राज्यों में सर्वाधिक धनत्व वाला होना इसको विशेष राज्य का दर्ज़ा ना दिए जाने का बड़ा कारण हो सकता है क्यों ज्यादा आबादी घनत्व हो तो डिलीवरी आसान होती है. उसी वस्तु या सेवा को कम आबादी वाले क्षेत्र में पहुँचाने में राज्य के अभिकरणों को ज्यादा श्रम व पैसे लगने होता है. अगर बिहार विशेष दर्जे में शामिल होने की बात करता है तो ओड़िसा, यू पी या मध्य प्रदेश क्यों नहीं.  

दरअसल मांग यह होनी चाहिए थी कि चूंकि बिहार एक ऐसा प्रदेश है जहाँ नेपाल के हिमालय से निकालने वाली नदियों की विभीषिका एक श्राप के रूप में हर साल आती है और बाकी का बिहार सूखे में कराहता है लिहाज़ा प्लानिंग कमीशन अपने पैरामीटर में “लगातार आने वाली प्राकृतिक आपदा “ भी जोड़ दे.
     
केंद्र अपनी आय का ३२ प्रतिशत राज्यों को अभी दे रहा है. मांग यह होनी चाहिए कि केंद्र अपनी आय का बड़ा भाग पिछड़े राज्यों को दे और यह धन  परफोर्मेंस पर आधारित होना चाहिए. 

एक और कुतर्क देखें. भाषण में नीतीश ने कहा “भाडा –समानीकरण की नीति के कारण बिहार को नुकसान हुआ.” उनका कहने का मतलब था कि देश के अन्य भागों में बिहार के लौहे को लेजा कर उद्योग लगाये गए और केंद्र ने उन्हें भाड़े में झूट दी. यह भौंडा तर्क है. इस आधार गुजरात का कपास या यू पी एवं मध्य प्रदेश के सिंगरौली की बिजली बिहार भी नहीं जाएगी. अगर नीतीश की सरकार में क्षमता होती तो इस ब्लैकमेल के बजाय समान शर्तों पर इस्पात उद्योग लगने के लिए बाहर के उद्योगपतियों को बुला सकते थे लेकिन उद्योग तो लगे “अपहरण के” .   

बिहार के तथाकथित विकास की इमारत अब दरकने लगी है। अध्ययन का विषय यह हो गया है कि कैसे संचार तंत्र पर आंशिक नियंत्रण करके और दूसरी ओर सीधी डिलीवरी के माध्यम कुछ साइकिलें बांटकर और कुछ मुख्य सड़कें बनवाकर जनसोच को पूरी तरह बदला जा सकता है और वोट हासिल किए जा सकते हैं।

हम हाल में हुए  तीन रहस्योद्घाटन लेते हैं जो कि काफी विश्वसनीय संस्थाओं ने उजागर किया है जो कि बिहार के तथाकथित विकास की एक घृणित तस्वीर पेश करते हैं। नियंत्रक-महालेखापरीक्षक का कहना है कि  वर्ष 2009-10 में 2399.68 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है। यानि बिहार के हर व्यक्ति से साल भर में परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से 240 रुपए छीने गए हैं। ये उस बिहार की हालत है जहां पर 77 प्रतिशत आदमी महज 17 रुपए रोज पर गुज़ारा करता है। ये उस बिहार की हालत है जहां हर दूसरा बच्चा कुपोषण का शिकार है और ये उस बिहार की हालत है जहां विकास के नाम पर होने वाला खर्च राष्ट्रीय औसत का लगभग आधा है।
 राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य और विश्वविख्यात अर्थशास्त्री एवं समाज सुधारक जीन ड्रेज़ के नेतृत्व में अभी हाल में कुछ जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ताओं की टीम ने, जिसमें भारत की बड़ी संस्थाओं के प्रोफेसर्स आदि शामिल थे, ने एक सर्वेक्षण कराया। सर्वे ने चौकाने वाले नतीजे दिए। इस नतीजे के अनुसार बिहार में जन वितरण प्रणाली पूरी तरह ठप है। जहां कुछ गरीब राज्यों में प्रति सुपात्र (बी.पी.एल) परिवार 37 किलो तक अनाज हर महीने उठाता है वहीं बिहार जैसे सबसे गरीब राज्य में महज 11 किलो प्रतिमाह। इसको हम यूं भी कह सकते हैं कि जहां आन्ध्रप्रदेश जैसा सम्पन्न राज्य अपने कोटे का 99 प्रतिशत खपत कर लेता है, उड़ीसा 97 प्रतिशत, छत्तीसगढ़ 95 प्रतिशत, हिमांचल 93 प्रतिशत, उत्तर प्रदेश 77 प्रतिशत, झारखण्ड 71 प्रतिशत वहीं बिहार अपने कोटे का केवल 45 प्रतिशत खपत कर पाता है।
   सरकार का यह कृत्य अपराध की श्रेंणी में आता है जिसमें मिलने वाला खाद्य का कोटा जिसमें कुछ खाद्यान्न केंद्र मुफ्त में देता है, भी नीतीश सरकार उठाकर गरीबों का पेट नहीं भर रही है। इस सर्वे ने इस बात का भी आंकलन करने की कोशिश की कि कितने गरीब लोग सस्ते दरों पर खाद्यान्न चाहते हैं और कितने कैश। चूंकि बिहार में जन वितरण प्रणाली का अस्तित्व ही नहीं है इसलिए यह अकेला राज्य है जहां के 80 प्रतिशत गरीब सस्ते खाद्यान्न के बजाय पैसा चाहते हैं। अन्य सभी राज्यों के 80 प्रतिशत गरीबों ने कहा कि हमें पैसा नहीं अनाज चाहिए। ध्यान रहे कि प्रधानमंत्री व प्रणब मुखर्जी की कोशिश है कि सीधी डिलीवरी के सिद्धान्त को आगे बढ़ाते हुए सस्ते खाद्यान्न की जगह उस खाद्यान्न पर मिलने वाली सब्सिडी का पैसा ही सीधे गरीबों के खाते में जाला जाए।
   विकास के खोखलेपन की यह हालत है कि आज भी राज्य में 94.5 प्रतिशत लोग रोशनी के लिए मिट्टी के तेल पर आश्रित हैं और एक से पांचवी तक की कक्षा के छात्र-छात्राओं में आधे से ज्यादा स्कूल छोंड़ देते हैं। 86.09 प्रतिशत घरों में आज भी शौचालय नहीं है। देश में औसत प्रतिव्यक्ति बिजली की खपत 716 यूनिट है जबकि बिहार में मात्र 100 यूनिट है।


lokmat

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