Thursday, 13 March 2014

संतुलन बिठाना मोदी की चुनौती


महत्वपूर्ण यह नहीं है जो भारतीय जनता पार्टी को 2014 के आम चुनाव की वैतरणी पार करने के लिए उभरे (या उभारे गए) गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने पार्टी की राष्ट्रीय परिषद में पिछले दिनों बोला। महत्वपूर्ण वह है जो उन्होंने नहीं बोला। और वह था उनका पार्टी के मातृ-संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भावी गठबंधन की प्रकृति के बारे में कोई र्चचा न करना। मोदी एस्पिरेस्नल इंडियायानी महत्वाकांक्षी भारत के आइकॉन हैं। एक ऐसे उभरते भारत के, जिसमें विकास के प्रति जबरदस्त ललक है, जिसमें भ्रष्टाचार के प्रति क्रियात्मक (ड्राइंग-रूम आउटरेज से हट कर) गुस्सा है और जिसमें वर्तमान राजनीतिक वर्ग की निष्क्रियता को लेकर एक कुंठा है। मोदी एक संबल के रूप में दिखाई दे रहे हैं। परंपरागत राजनीतिक जुमले से हट कर जब मोदी गुजरात का दूध दिल्ली में ही नहीं, सिंगापुर में भी पिया जाता हैकहते हैं तो देश के युवाओं को उसमें अपना भविष्य नजर आता है। मोदी के व्यक्तित्व में न झुकने, न रिरियाने’ वाली तस्वीर देख कर उस युवा वर्ग को अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति का जरिया नजर आता है। कांग्रेस के राहुल गांधी ने जहां कुछ ही दिन पहले एक मां की अश्रुपूरित नेत्रों से अनिच्छित समर्थनवाली तस्वीर पेश की थी, वहीं मोदी ने देश चल पड़ा है बदलाव के लिए, आप शामिल हों तो ठीक, न शामिल हों तो भी यह बदलाव होगावाले भाव की हुंकार भरी। एक गुणात्मक अंतर था दोनों की विषय-वस्तु में, दोनों के संदेश में। परंतु गौर करने की बात दूसरी है। वह यह कि इस एस्पिरेस्नल इंडिया में हैं कितने लोग? और बाकी भारत सौ करोड़ से ऊपर की आबादी वाला है, जो दो जून की रोटी जुटाने में ही मर-खप रहा है, जो अशिक्षा-जनित अज्ञानता की वजह से जाति, समुदाय, धर्म और ऐसी अनेक संकीर्ण अवधारणाओं में बंटा हुआ है। जो तमाम क्षेत्रीय नेताओं की जातिवादी, उपजातिवादी या फिर कांग्रेस ब्रांड सेक्युलर छवि (जिसका मतलब वर्तमान संदर्भ में अल्पसंख्यकों की बेवजह और अयाचित तरफदारी करना होता है) वाले राजनीतिक खांचों में बंटा हुआ है। विकास दरअसल उसके संज्ञान में ही नहीं आ पाया है। अगर आया है तो राजनीतिक वर्ग के प्रति सब एक से हैंरूपी अविश्वास के रूप में। जहां जनसंख्या का मात्र 10 प्रतिशत एस्पिरेशनल इंडिया वाचाल है, टीवी वालों की मुख्य खुराक है, जो इंडिया गेट पर दिए जलाता है, जो अंग्रेजी में राज्य और व्यवस्था के प्रति गुस्सा दिखाता है और टीवी चैनलों के लिए विजुअल देता है; वहीं बाकी का 90 प्रतिशत दरोगा को ही राज्य का संप्रभु समझ कर और ग्राम-प्रधान को प्रधानमंत्री मान कर अपनी सीमा तय कर लेता है और जाही विधि राखे राम ताहि विधि रहिएकह कर सीता-राम, सीता-रामकरने लगता है। उसकी जगह हम जैसे बुद्धिजीवी पहले वाले वर्ग को भारत समझ लेते हैं। मोदी भी यही गलती करते हैं जब वह कहते हैं कि देश चल पड़ा है। दरअसल, देश कहीं नहीं चला है। अभी कल ही तो पोलियो से निकला (अगर ताजा सरकारी रिपोर्ट सच है तो) है, इतनी जल्दी चल कैसे लेगा। यही नासमझी है जिसकी वजह से दोनों राष्ट्रीय पार्टयिां पिछले 23 सालों में अपना जन-धरातल खोती गई हैं, क्योंकि वे दस फीसद को 90 फीसद समझती रहीं और अपनी उपादेयता खोती रहीं। कांग्रेस पार्टी औसत 37 प्रतिशत वोट की जगह 26 और 28.7 प्रतिशत या 12 करोड़ से कम पर आ गई, जबकि हिंदुओं के प्रतिनिधित्व का दावा करने वाली भारतीय जनता पार्टी 1998 में 25.59 प्रतिशत तक वोट पाने के बाद 2009 में मात्र 18.8 प्रतिशत या आठ करोड़ से कम वोट पर आ गई। मोदी मंच के जादूगर हैं, उनके भाषण पर जबरदस्त तालियां बजती हैं, वे ईमानदार हैं, प्रशासनिक रूप से दक्ष हैं, उन्हें न केवल विकास की समझ है, बल्कि उनके अंदर योजनाओं को अमल में लाने के लिए भ्रष्ट और निष्क्रिय अफसरशाही को रास्ते पर लाने की अपेक्षित दबंगई भी है (जिसे कई बार गलती से मोदी का अधिनायकवादी चरित्र मान लिया जाता है)। परंतु उनकी पार्टी और कांग्रेस के बीच डेढ़ गुने वोट (लगभग चार करोड़) का अंतर है। क्या मोदी अपने प्रति बढ़ते शहरी, अभिजात्यवर्गीय रुझान को जाति में बंटते वोटरों के बीच एक ज्वार-भाटे की लहर दे पाएंगे? क्या वह एस्पिरेस्नल इंडिया और कराहते भारत के बीच अपने को लेकर एक अपेक्षित सादृश्यता बना पाएंगे? यह मिलियन-डॉलर क्वेश्चन इसलिए है कि अगर यह लहर आ गई तो किसी नीतीश, ममता, जयललिता या चंद्रबाबू की जरूरत नहीं होगी, और होगी भी तो अपनी शतरे पर; यानी बिहार में नीतीश, ओड़िसा में नवीन और आंध्रप्रदेश में चंद्रबाबू को राजनीतिक रूप से जिंदा रहने के लिए मजबूरन भाजपा के पास आना ही होगा। लेकिन अगर यह लहर चुनाव के पहले छह महीनों में नहीं दिखी तो इनमें से अधिसंख्य भाजपा को घुटनों पर लाना चाहेंगे। यहां एक और समस्या है। मान लीजिए कि पार्टी के लिए या नेताओं के कहने- सुनने पर अपने स्वभाव के विपरीत मोदी भी घुटनों पर आने को तैयार हो जाएं तो ऐसे में उनकी फाइटर वाली इमेज’, जो एस्पिरेस्नल इंडिया को अच्छी लगती है, पर बट्टा लग जाएगा। सवाल है कि क्या मोदी इसके लिए तैयार होंगे? इसी से हट कर एक और गंभीर समस्या है। पिछले दस सालों में मोदी ने बड़ी मेहनत व ईमानदारी से अपनी पुरानी छवि (2001 के दंगों वाली) को साफ कर एक विकासकर्ता की इमेज बनाई है। संघ का वर्चस्व आज पार्टी पर पूरी तरह नजर आता है। मोदी उसकी बगैर मर्जी के यहां तक भी न आ पाते। लेकिन अगर मोदी किसी तोगड़िया के साथ दिखाई दिए या किसी मंदिर वहीं बनाएंगेके भाव के आसपास दिखाई दिए तो इन दस सालों की उनकी मेहनत पर पानी फिर जाएगा और कांग्रेस को कुछ ही मिनट लगेंगे मोदी की पुरानी छवि वोटरों के मन में चस्पा करने में। और तब चुनाव से पहले ही एनडीए बिखर जाएगा। लिहाजा संघ के लिए जरूरी होगा कि वह मोदी के आसपास न फटके, विश्व हिंदू परिषद मोदी को आशीर्वाद तक देने से बचें और पार्टी को सिर्फ मोदी के हाल पर अगले छह महीनों तक छोड़ दे। अगर वह लहर मोदी की वजह से आ जाती है तो चलने दें और अगर नहीं आती है तभी अपने पुराने एजेंडा (मंदिर वहीं बनाएंगे) के भाव में आएं।
sahara

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