Saturday, 9 February 2013

संघ के आदेश पर भाजपा का कट्टर हिन्दुवाद की और फिर मुड़ना “सेल्फ गोल” होगा !




सिंघल, तोगड़िया का समर्थन मिला तो मोदी की विकास पुरुष की छवि खतरे में होगी
भारतीय जनता पार्टी को नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करने की एक शर्त है. अगर कट्टर हिंदूवादी शक्तियां मसलन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद् या बजरंग दल कहीं मोदी के आसा-पास फटकती नज़र आयीं तो मोदी की दस वर्षों में तराशी विकास के मसीहा की छवि एक रात में ढहसे हट जाएगी और उसकी जगह २००१ के गुजरात की छवि ले लेगी. मुश्किल यह है कि पार्टी इस समय पूरी तरह संघ की गिरफ्त में है और यह बात कहने की हैसियत या हिम्मत हाशिये पर डाल दिए गए लाल कृष्ण आडवानी को छोड़ कर पार्टी के अन्य किसी नेता में नहीं है.
“ये लोग (भा ज पा) आज हमारी मेहनत पर आज सत्ता सुख भोग रहे हैं , इन्हें शर्म आनी चाहिए” . ये ताज़ा उदगार हैं विश्व हिन्दू परिषद् के मुखिया अशोक सिंघल के. “यह धर्म संसद (राजनीतिक दिशा ) बदलने में  निर्णायक सिद्ध होगा” कहना है परिषद् के दूसरे सबसे बड़े नेता और फायरब्रांड हिन्दू नेता प्रवीण तोगड़िया के. साफ़ दिखाई दे रहा है कि भा ज पा चाहे या ना चाहे , हिन्दुत्त्व की गैर –राजनीतिक ताकतों के चंगुल से निकलना मुश्किल होगा.     
प्रश्न है कि क्या गुजरात के मुख्या मंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी पुरानी छवि पर वापस जाने को तैयार होंगे और तब क्या जनता उनके विकास वाले चहेरे से मुतास्सिर हो सकेगी. ९०वेन दशक से आज तक गंगा में काफी पानी बह चुका है. भारतीय समाज काफी बदल गया है रोटी का संगर्ष कर रहा भारत और रोटी जीत चुका “इंडिया” दोनों को हीं मंदिर में कोई दिलचस्पी नहीं रही. भावनात्मक मुद्दों को भुनाने का फेज ख़त्म हो चुका है. संघर्षरत भारत और प्रगतिशील (?) इंडिया अब भ्रष्टाचार और बलात्कार पर उद्वेलित होता है मंदिर पर नहीं. देश में २००९ के आम चुनाव में ५५ करोड़ से ज्यादा हिन्दू वोटर था लेकिन भा ज पा को वोट मिले आठ करोड़ से भी कम वोट यानी हर सात हिन्दुओं में से छह ने इस पार्टी को ख़ारिज किया है. मंदिर –मस्जिद विवाद के चरम काल में सन १९९१ का चुनाव हो या १९९६ का इस पार्टी का  वोट प्रतिशत लगभग एक हीं रहा और सन १९९८ और सन १९९९ के चुनावों में जो चार प्रतिशत बड़ा वह बाद के दोनों चुनावों में बुरी तरह नीचे आ गया.    
देश की दूसरी सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी ---भारतीय जनता पार्टी -- का वापस मंदिर और कट्टर हिन्दूत्व ऐसे मुद्दों पर जाना ना केवल इस पार्टी में शीर्ष पर बैठे लोगों की संकुचित सोच को दर्शाता है बल्कि यह भी बताता है कि क्रियाशील प्रजातंत्र (फंक्शनल डेमोक्रेसी) में भी ज़रूरी नहीं है कि समय के साथ राजनीतिक पार्टियों में परिपक्वता आये जिससे इस शासन –पध्यती की क्वालिटी बेहतर हो. इस फैसले से यह भी स्पष्ट होता है कि मज़बूत  वैचारिक-आधार पर खड़े राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सरीखे अनुशासित संगठनों की भी एक सीमा है जो उनके सोच में बदलाव को रोकती है और तब जो स्पष्ट है वह भी दिखाई नहीं देता.
जिस देश की १२३ करोड़ की कुल आबादी में १०० करोड़ से ज्यादा हिन्दू हो और महज १५ करोड़ मुसलमान उस देश में अगर हिंदुत्व पर आधारित और मंदिर-मस्जिद विवाद से उपजी राजनीतिक पार्टी आठ करोड़ से भी कम वोट पाए और जिसको पिछले १४ सालों में हर तीसरे मतदाता ने छोड़ दिया हो उसे क्या फिर वापस मंदिर-मस्जिद या कट्टर हिंदुत्व पर जाना चाहिए? क्या इन आंकड़ों से स्पष्ट नहीं है कि तासीरन हिन्दू उदारवादी होता है और एक सीमा से अधिक कट्टरतावाद से उसे गुरेज है? उसी तरह जिस तरह कट्टर अल्पसंख्यकवाद से देश के मुसलामानों को भी ऐतराज होने लगा है. लिहाज़ा दोनों राष्ट्रीय पार्टियों को महत्वाकान्क्षी भारत (एस्पिरेसनल इंडिया) की और देखना होगा जहाँ भ्रष्टाचार, रोजगार, अमीरी-गरीबी की बढ़ती खाई , बेहतर जीवन मुद्दा है ना कि जाति और धर्मं.
इस बात को दूसरे तथ्यों से भी सिद्द किया जा सकता है. विवादास्पद ढांचा गिराने के  बाद से आज तक छः आम चुनाव हुए. कहना ना होगा कि इस घटना के तत्काल पहले याने सन १९९१ के चुनाव या घटना के चार साल बाद याने सन १९९६ में हिंदुत्व की भावना अपनी चरम पर होगी. लेकिन तब से ले कर आज तक हुए सात चुनावों में एक भी ऐसा नहीं था जिसमे भारतीय जनता पार्टी कहीं भी कांग्रेस के आस पास रही हो. सन २००९ के आम चुनाव में जहाँ कांग्रेस को कुल २८ प्रतिशत या लगभग १२ करोड़ वोट मिले वहीँ चुनाव की वैतरणी को हिंदुत्व की बछिया की पूंछ पकड़ कर पार करने की कोशिश करने वाली इस पार्टी को महज १८ प्रतिशत आठ करोड़ से भी कम वोट.
क्या यह सिद्ध नहीं करता कि अगर कोई पार्टी एक सीमा से आगे हिन्दूवादी कट्टरता अपनाती है तो बहुसंख्यक समाज उसे ना केवल ख़ारिज कर देगा बल्कि उस गुस्से में वह इससे भी अधिक दकियानूसी सोच से उपजी क्षेत्रीय पार्टियों का दामन थाम लेगा? भा ज पा का जनाधार लगातार गिरना और ठीक उसके बरअक्स इन जाति-आधारित क्षेत्रीय पार्टियों का जनाधार बढ़ना यही संकेत देता है.
यह बात अब जग-जाहिर हो चुकी है कि संघ अपने इस अनुषांगिक (?) राजनीतिक संगठन को पूरी तरह नियंत्रण में ले चुका है. और अबकी बार यह नियंत्रण खरादी की बांक में फंसे लकड़ी जैसा है. अब ना तो बड़े कद के अटल बिहारी वाजपेयी परिदृश्य में हैं ना हीं हाशिये पर डाल दिए गए आडवाणी. उधर सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, वेंकैया नायडू या राजनाथ सिंह वाजपेयी-आडवाणी सरीखे मॉस लीडर नहीं थे लिहाज़ा संघ के सामने तन कर खड़े होने की कूवत नहीं थी. बन पाए. नतीजा यह रहा कि  इन्हीं में से एक जो ज्याद लचीला था , को पार्टी के शीर्ष पर रख कर संघ ने अपना नियंत्रण मजबूत करना शुरू कर दिया. 
इसी से जुड़ा एक अन्य प्रश्न भी है. क्या वजह है कि अपने ८७ साल के अस्तित्व के बावजूद समाज के बड़े मुद्दे पर इसकी शक्ति नहीं लग पाती है और कोई अन्ना हजारे आकर उन मुद्दों पर बगैर किसी संसाधन के , बिना किसी कैडर के पूरे समाज को उद्वेलित कर देता है और तंत्र को झनझना देता है. बेहद संगठित, राष्ट्रवाद की विचारधारा से ओतप्रोत और प्रामाणिक रूप से अनुशासित ८७ साल पुराने इस संघ से क्या यह अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए कि जब वैश्वीकरण के दौर में राष्ट्रवाद की अवधारण हीं कटघरे में हो तो क्या व्यापक जन हित का भाव अंगीकार कर लेना श्रेयस्कर नहीं रहेगा और क्या इस भाव में मंदिर-मस्जिद की जगह भ्रष्टाचार, मानव विकास, विश्व बंधुत्व नहीं आता  जो हिन्दू धर्मं का मूल रहा है? 

jagran

2 comments:

  1. एक बेहतर लेख है भाजपा को अपने आप(मुद्दों)को पहचानने का एवं उसमें सुधार करने का ।

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  2. A guideline for BJP to come out of the grip of RSS and make a headway in the relevant Indian politics.Party is fast losing its penetration among the youth voters due to hardcore thinking based on communal politics. The most serious problem with party is absence of any mass leader in front row.Rajnath Singh in order to justify his selection for the second term has taken a wrong step by going to Dharma Sansad in Kumbh.These are old styl and don't attract the new generation at all.

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