Saturday, 13 January 2018

ये क्या हुआ “मी लॉर्ड्स” ????????


यह भारत की हीं नहीं, दुनिया की न्याय बिरादरी में एक भूकंप की मानिंद था. भारत में न्यायपालिका और खासकर सर्वोच्च न्यायालय एक ऐसी संस्था थी जिस पर समाज का अद्भुत भरोसा होता था खासकर तब जब वह हर संस्था से न्याय की उम्मीद छोड़ चुका होता था. शुक्रवार को इस न्यायालय के चार वरिष्ठ जजों द्वारा प्रेस कांफ्रेंस करके एक संयुक्त पत्र जारी करना जिसमें देश की सबसे बड़ी अदालत के मुख्य न्यायाधीश पर न्याय -सम्मत तरीके से कार्य न करने का आरोप लगाना और यह कहना कि अगर हम स्थिति के खिलाफ आज तन कर न खड़े होते तो आज से २० साल बाद समाज में से कुछ बुद्धिमान यह कहते कि हम चार जजों ने ‘अपनी आत्मा बेंच’ दी थी” ने ७० साल पुराने लोकतंत्र की जड़ें हिला दी. जजों ने आगे कहा “हम इस मामले में चीफ जस्टिस के पास गए थे लेकिन वहां से खाली हाथ लौटना पडा “. इस प्रेस कांफ्रेंस के पांच मिनट भी नहीं हुए थे कि दर्ज़नों वरिष्ठ वकीलों ने पक्ष -विपक्ष में मीडिया में तर्क देना शुरू कर दिया. अगर वकील प्रशांतभूषण ने मीडिया में आ कर बेसाख्ता मुख्यन्यायाधीश के “चहेते “ जजों का नाम और वे मामले जो उन्हें सौंपे गए बताना शुरू किया तो पूर्व न्यायाधीश जस्टिस सोधी ने इन चार वकीलों के कदम को न्यायलय की गरिमा गिराने वाला , हास्यास्पद और बचकाना बताया. बहरहाल कुल मिलकर आज एक और सबसे मकबूल और विश्वसनीय संस्था भी व्यक्तिगत अहंकार या वर्चस्व की भेंट चढ़ गयी. जब प्रेस कांफ्रेंस में जजों से पूछा गया कि क्या वह मुख्य न्यायाशीश के खिलाफ महा-अभियोग लाने के पक्षधर हैं तो उनका बेबाक जवाब था “यह समाज को तय करना है”. याने सुप्रीम कोर्ट के ये चार जज एक तरह से इससे इनकार नहीं कर रहे हैं. ध्यान रहे कि भारत में पांच सदस्य हो तो वह संविधान पीठ के रूप में कार्य करता है और उसके फैसले में कानून की ताकत होती है.
हमने अभी तक कभी -कभी कमजोर आवाज में केन्द्रीय बार कौंसिल और राज्य बार एसोसिएशनों द्वारा कभी कभी जजों के खिलाफ व्यक्तिगत मामलों में आरोप लगते हुए देखा था लेकिन पिछले ७० साल में एक बार भी ऐसा नहीं देखने में आया कि सर्वोच्च न्यायलय के हीं चार वरिष्ठ जज अपने मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ प्रेस कांफ्रेंस करें और वह भी केसों के आबंटन में तथाकथित पक्षपात को लेकर. उनका कहना था कि कौन केस किस बेंच के पास जाएगा यह मुख्य न्यायाधीश के अधिकार क्षेत्र में होता है लेकिन यह प्रक्रिया भी कुछ स्थापित परम्पराओं के अनुरूप चलायी जाती है जैसे सामान प्रकृति के मामले सामान बेंच को जाते हैं और यह निर्धारण मामलों की प्रकृति के आधार पर न कि केस के आधार पर होता है. इसके आगे बढ़ते हुआ प्रशांतभूषण ने उन केसों और जजों के नाम बताने शुरू किये. इन चार जजों का और वकीलों का जन धरातल पर यह सब कुछ करना हर हालत में अवमानना की श्रेणी में आता है.
आधुनिक न्यायशास्त्र का मूल सिद्धांत कहता है “आप चाहे जितने भी बड़े क्यों न हों, कानून आपसे बड़ा होता है”. अदालत की अवमानना कानून, १९७१ के सेक्शन २(सी) () के अनुसार ऐसा कोई बयान जो अदलत की गरिमा को गिराता है” अदालत की अवमानना है”. इस सेक्शन के उप-खंड () और () को एक साथ पढ़ें तो इन चार जजों का बयान अवमानना की श्रेणी में आता है. अगर किसी सामान्य पर्त्रकार ने या रिपोर्टर ने कहा होता कि जजों को केसों का आबंटन भेद-भाव के तहत किया जा रहा है तो इसे सीधा अवमानना मान कर अदालत उस मीडिया प्रतिष्ठान के चेयरमैन से लेकर चपरासी तक को तलब कर लेता. लेकिन आज भारत में पहली मर्तबा बार हीं नहीं बेंच भी बंटा हुआ है और यह विभेद एक दूसरे पर खुले-आम आरोप लगाने में देखा जा सकता है.
क्या कोई और विकल्प नहीं ?
सर्वोच्च न्यायलय हीं नहीं उच्चन्यायालय के पास भी दो तरह के कार्य होते हैं. पहला न्याय का निष्पादन करना और दूसरा न्याय प्रशासन देखना. यह दूसरा काम आम तौर पर मुख्य न्यायाधीश के हाथ में होता है. जजों के पास केवल फैसले का काम होता है. और कॉलेजियम की व्यवस्था के बाद से पांच सबसे सीनियर जज नए जजों की नियुक्ति में भी भाग लेते हैं. यह बात सही है कि सर्वोच्च न्यायालय हीं नहीं, हाई कोर्ट के जज भी भारत के संविधान द्वारा अभिरक्षित हैं और उन्हें मात्र महा -अभियोग लगा कर हीं हटाया जा सकता है.
कुछ जानकारों का मानना है कि अगर इन चार जजों को मुख्य न्यायाधीश की कार्य प्रणाली से ऐतराज था तो वे सभी जजों की बैठक में जो सवेरे होती है इस मुद्दे को लेकर जाते और एक आम सहमति का प्रयास किया जाता. एक अन्य राय के मुताबिक ये जज अपने फैसले में भी मुख्यन्यायाधीश के केस आबंटन प्रर्किया के खिलाफ “स्वयंसंज्ञान” लेते हुए फैसला दे सकते थे जो स्वतः सार्वजानिक होता और जिससे यह ध्वनि न निकलती कि सार्वजानिक तौर पर सामूहिकरूप से कुछ जज मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ सड़क पर आ गए हैं.
बहरहाल इस प्रेस कांफ्रेंस के बाद भारत की सबसे बड़ी पंचायत की जिस गारिम को क्षति पहुँची है उसकी अनुगूंज आने वाले कई दिनों तक हीं नहीं वर्षों तक सुनायी देगी.
शायर मीर इस दिन का भान करते हुए ताकी मीर ने कहा :
कहता है दिल कि आँख ने मुझको किया खराब
कहती है आँख यह कि मुझे दिल ने खो दिया
लगता नहीं पता कि सही कौन सी है बात
दोनों ने मिल के “मीर” हमें तो डुबो दिया “.

jagran  

Thursday, 11 January 2018

आगामी बजट और भारतीय किसान की समस्या


आसन्न २०१८-१९ बजट, डेढ़ साल बाद आम-चुनाव और पिछले चार साल में शुरू के दो साल सूखा, तीसरे साल इंद्र भगवान मेहरबान लिहाज़ा रिकॉर्ड फसल उत्पादन लेकिन कृषि उत्पाद मूल्यों में व्यापक गिरावट की मार और अब वैज्ञानिकों की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक आधे भारत में फसल पर कीटों के हमले से २० प्रतिशत तक फसल को नुकसान का ख़तरा. मोदी सरकार के लिए यह सब एक नयी चुनौती बन गए हैं. लखनऊ में मुख्यमंत्री आवास के सामने टनों आलू फेंकना, महाराष्ट्र में खडी फसलों को जलाना, ग्रामीण गुजरात के चुनाव परिणाम, मध्य प्रदेश में आन्दोलनकारी किसानों पर पुलिस फायरिंग में छह किसानों का मरना यह सब व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखना किसी भी ऐसी सरकार या उसके मुखिया के लिए, जो जन-स्वीकार्यता और जन-विश्वास के पैमाने पर शिखर पर हो, अपरिहार्य है. भारत का ताज़ा बजट इस बार शायद परम्परागत फॉर्मेट से अलग होगा.
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की विकास की समझ अप्रतिम है. उसके अनुरूप नीतियां भी बन रहीं हैं लेकिन जब देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश का कृषि मंत्री , मुख्यमंत्री आवास पर नाराज़ किसानों द्वारा आलू फेंकने पर अपनी प्रतिक्रया में यह कहता है कि “सड़े आलू फेंके हैं और पुलिस एफ आई आर लिख कर फेंकने वालों की तलाश कर रही है” तब लगता है कि राज्य की सरकारों को नयी जनहित योजनाओं को अमल में लाने की न तो संवेदनशीलता है न हीं अपेक्षित विवेक. यही वजह है कि देश भर में अबकी साल दलहन, गेंहूं और तमाम रबी की फसलों का रकबा भी घटा है और आशंका है कि जी डी पी विकास दर में आने वाली कमी, जिसके बारे में केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन ने दो दिन पहले अपनी रिपोर्ट दी है, में मुख्य भूमिका प्राथमिक क्षेत्र याने कृषि और सम्बंधित गतिविधियों की होगी. कीटों के हमले के अंदेशे की पुष्टि भारतीय अनुसन्धान परिषद् के एक प्रमुख इन्वेस्टिगेटर डॉक्टर पांडुरंग मोहिते ने और महाराष्ट्र के परभणी -स्थित वसंतराव नाइक मराठवाडा कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉक्टर बी वेंकटेश्वरलू ने की.
हालाँकि देश के १९ राज्यों में आज भारतीय जनता पार्टी या उसकी सहयोगी दलों की सरकारें हों फिर भी कृषि क्षेत्र को विकास के मानचित्र पर सूर्खरू करने में राज्य सरकारों अभी कोई गति नहीं दिखा पाई हैं. उदाहरण के लिए मोदी सरकार ने फसल बीमा योजना में व्यापक परिवर्तन करके एक क्रांतिकारी प्रयास किया लेकिन गैर-भाजपा राज्य सरकारें तो छोडिये, भारतीय जनता पार्टी की सरकारें इसे वह गति नहीं दे पायीं जो अपेक्षित था. यह बीमा योजना देश के किसानों का नगण्य बीमा राशि के अंशदान पर हर प्राकृतिक या अन्य खतरे से हुए फसल नुकसान से किसान को मुक्ति दिलाता है लेकिन असल में दो साल बाद भी देश भर में मात्र दो से पांच प्रतिशत सामान्य किसान हीं इसका लाभ ले सके. उत्तर प्रदेश और बिहार में भी यही स्थिति रही. इस आपराधिक विफलता का एक मात्र कारण राज्य सरकारों को विवेक-शून्यता और अकर्मण्यता रही.
जहाँ एक ओर फसल बीमा योजना को युद्ध स्तर पर अमल में लाने की ज़रुरत है वहीं कृषि विपणन के क्षेत्र में भी व्यापक परिवर्तन करना होगा. पिछले वर्ष किसानों की मेहरबानी से दलहन का रिकॉर्ड २३ मिलियन टन उत्पादन हुआ जो कि देश की जरूरत से एक मिलियन टन ज्यादा रहा लेकिन अफसरों की अदूरदर्शिता के कारण पांच मिलियन टन दाल क आयत किया गया. पिछले कई दशकों से दाल की समस्या-जनित ऊँची कीमतों से जूझ रहे लोगों को पहली बार राहत मिली लेकिन किसानों के हाथ खाली रहे क्योंकि खुले बाज़ार में कीमतें औसतन मात्र ४००० रुपये प्रति कुंतल के आसपास रही. सरकारी क्रय केन्द्रों पर भी उन्हें समर्थन मूल्य पर बेंचना सरकारी संवेदनहीनता के कारण संभव नहीं हो पाया. हालाँकि उत्तर प्रदेश में योगी सरकार ने जरूर गेंहू की खरीददारी पिछली सरकारों के मुकाबले काफी अधिक की. आलू और गन्ने के प्रति यही तत्परता नहीं दिखी. अन्य राज्यों जैसे महाराष्ट्र में दलहन, गुजरात में कपास और मध्य प्रदेश में प्याज को लेकर अपेक्षित तत्परता नहीं दिखाई.
किसानों पर फायरिंग के बाद शिवराज सरकार ने सक्रियता दिखाई और कीमतों को तय करने की “भावान्तर भुगतान योजना” के नाम से एक नयी व्यवस्था लागू की. इस योजना में समर्थन मूल्य और बाज़ार की कीमत के बीच अंतर राशि का बुगतान किसानों को क्या जाएगा. इसकी शर्त यह है कि किसान को पहले से हीं फसल का प्रकार और रकबा सरकार को बताना और प्रमाणित करना होगा. इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा सरकार खरीद, भण्डारण और वितरण के जद्दोजहद से बाख जायेगी. भारत सरकार इसी मॉडल से जिंसों की कीमत निर्धारित करने पर विचार कर रही है.
गो-वंश और किसान
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इस बीच पूरे उत्तर भारत के किसान एक नयी समस्या से जूझ रहे हैं. हाल हीं में इस अखबार ने एक रिपोर्ट छपी जिसके अनुसार कानपुर के इमिलिया गाँव के एक किसान ५८ वर्षीय झल्लन सिंह ने आत्महत्या की क्योंकि कमर तोड़ मेहनत से अपनी लहलहाती पांच बीघे की गेंहू की फसल देखने जब एक दिन कड़ाके की सर्दी में खेत पहुंचे तो पाया कि छुट्टा गाय-बैल-सांडों के झुण्ड ने पूरी फसल चर ली है और फसल के नाम पर ठूंठ इस गरीब किसान को मुंह चिढ़ा रहे हैं. तथाकथित गो-रक्षकों के उत्तर भारत में आक्रामक होने से गो-वंश की खरीद -बिक्री बंद हो गयी है और जो गायें दूध नहीं दे रहीं हैं उन्हें चारे के अभाव में रखना किसानों के लिए मुश्किल हो रहा है लिहाज़ा ये गाय और बछड़े छुट्टा घूम रहे हैं और भूख के कारण खडी फसलों पर रातों में हमला कर रहे हैं. प्रदेश के उन्नाव जिले की हिन्दूखेडा गाँव की ८४ वर्षीय चन्द्रावती का कहना है कि उनके जीवन में ऐसे हालात पहले कभी नहीं दिखाई दिए. “इक्का-दुक्का पशु कभी दिन में खेत में आते थे जो भगा दिये जाते थे”. उत्तर बिहार में इसी तरह गो-वंश हीं नहीं नीलगाय और जंगली सूअर का फसलों पर हमला एक नयी आपदा के रूप में खडा है लेकिन धार्मिक भावना के कारण गौवंश तो छोडिये नीलगायों को भी नहीं मारा जा रहा है. गोवंश को छुट्टा छोड़ने की संख्या में अचानक वृद्धि इसलिए भी है क्योंकि विशुद्ध आर्थिक कारणों से बछड़ों का (बैल के रूप में) कृषि में कर्षण (जोतने) में इस्तेमाल बंद हो गया है. फिर विदेश नस्लों के नर-गोवंश (कंधे पर पुट्ठा) न होने के कारण जोतने के लिए इस्तेमाल भी नहीं हो सकते. इसके अलावा देशी नस्ल की गायें चारे की किल्लत और मोटे अनाज की अनुपलब्धता के कारण जल्द हीं बाँझपन की शिकार हो रही हैं. देश के बड़े भाग में किसानों को इन्हें रखना दुष्कर हो गया है. बिहार और उत्तर प्रदेश के कई जिलों मे गावों के किसानों में आपस में फौजदारी की नौबत आ रही है. लाख टेक का सवाल यह है कि गोरक्षक की भावनात्मक दादागीरी में अखलाक (उत्तर प्रदेश) और पहलू खान (राजस्थान) तो मार दिए जा रहे हैं और नतीजतन पूरे उत्तर भारत में गाय तो छोडिये , विदेशी नस्ल के नर गोवंश का एक जगह से दूसरे जगह ले जाना बंद हो गया है लेकिन सरकार न तो आक्रामक हिंदुत्व को रोकने में सक्षम है न हीं इसका कोई रास्ता निकाल पा रही है. किसानों का आक्रोश एक घुटन के रूप में कभी भी लावा बन कर निकल सकता है.
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश के अर्थशास्त्रियों के साथ किसानों की समस्याओं पर एक बजट पूर्व बैठक करने जा रहे हैं लेकिन शायद उन्हें एक और बैठक राज्य के मुख्य मंत्रियों के साथ और एक अन्य आक्रामक हिंदुत्व के पुरोधाओं के साथ भी करनी होगी.

navodya times       

Friday, 29 December 2017

बर्बर, आदिम पड़ोसी से छुटकारा कैसे !


हमारे पडोसी पाकिस्तान में विकास अंतिम सांसे ले रहा है, मोबाइल के लिए क़त्ल हो जाता है बेटियां पढ़ती नहीं हैं. लाहौर तहरीक--तालिबान--पाकिस्तान के प्रभाव से दूर है तो क्या हुआ? दो साल पहले इस खूंखार संगठन ने ऐलान किया कि उत्तर-पश्चिम पाकिस्तान की तरह यहाँ भी लड़कियां अगर स्कूल गयी तो स्कूल बम से उड़ा दिया जाएगा. न मानने पर एक स्कूल बम से उड़ा दिया गया. सरकार मूकदर्शक बनी रही. लिहाज़ा लोगों ने अपनी बेटियों को स्कूल भेजना बंद कर दिया था. पूरे देश में मानव विकास के हर पैरामीटर उठ हीं नहीं पा रहे हैं और बस एक हीं भाव है कट्टर इस्लाम के वर्चस्व का. चूंकि आधुनिक शिक्षा के अभाव में सामूहिक चेतना बेहद अतार्किक है लिहाज़ा युवा जिहाद को अपने वजूद की अंतिम परिणति मानता है. पाकिस्तान के इस जडवत समाज में हम आधुनिक मानवीय मूल्यों की अपेक्षा करें तो झटका लगेगा हीं.
लिहाज़ा पाकिस्तानी हुक्मरान ने जिस तथाकथित “मानवता के मानदंडों को मानते हुए” अपने यहाँ जेल में बंद भारतीय नागरिक कुलभूषण जाधव की उसके परिवार से मुलाक़ात करवाई उसमें कुलभूषण कांच की दीवार के इस पार था और परिवार (मां और पत्नी) उस पार. उनसे कहा गया कि वे अपनी भाषा (मराठी) में नहीं बल्कि अंग्रेजी या हिंदी में बात करें. जाहिर है अगर कुरआन शरीफ के किसी पाकिस्तानी विद्वान को भी कहा जाये कि अल्लाह के बारे में जर्मन भाषा में बताओ तो वह नहीं बता सकता. लिहाज़ा कोई संवाद हो हीं नहीं पाया. उतने भावनात्मक क्षण में जिसमें पत्थर भी पसीज जाये, पाकिस्तानी अधिकारियों का रवैया पशुवत था. उस मानसिकता को देखें कि शीशे की दीवार के उस पार से टेलीफोन के ज़रिये अंग्रेज़ी की बाध्यता के साथ आतंक के माहौल में न तो मां -बेटे में कोई बात हुई न पति -पत्नी में. मुलाक़ात के पहले दोनों की चूड़ियाँ, माथे की बिंदी व मंगलसूत्र निकाल लिए गये, कपडे बदल दिए गए और जूते वापस हीं नहीं किये गए. जाहिर है पूरा भारत इस रवैये से स्तब्ध है. देश के विदेश मंत्रालय ने न केवल तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है बल्कि उसे यह भी शक है कि पाकिस्तानी सरकार जूते में कुछ रख कर यह आरोप लगा सकती है कि भारत के खुफिया एजेंसी ने ट्रांसमीटर या कैमरा फिट किया था इसलिए जूते वापस नहीं किये गए. बहरहाल अगले दिन भारत के आक्रोश का जवाब देते हुए पाकिस्तान विदेश मंत्रालय ने कहा “हमने यह सब इसलिए किया क्योंकि हमें शक था भारतीय एजेंसियां कुछ मशीने शरीर के वस्त्र या जूते में रखवा सकती हैं”. स्पष्ट है यह तर्क कितना लचर था विश्व समुदाय के लिए. मशीन केवल आवाज रिकॉर्ड कर सकती थी और कुलभूषण की असली शक्ल का फोटो खींचा जा सकता था. पाकिस्तान को क्या इसका डर था ? क्या कुलभूषण के शक्ल को बिगाड़ा गया है? क्या उसे इतना मारा-पीटा गया है जिससे पाकिस्तानी सरकार उजागर नहीं होने देना चाहती ? भारतीय विदेश मंत्रालय का मानना है कि कुलभूषण का निचला हिस्सा इसलिए मुलाकात के दौरान नहीं दिखाया गया क्योंकि नीचे का अंग मार के कारण लकवाग्रस्त हो गया होगा.

पाकिस्तान हमारे उस पड़ोसी की तरह है जो रोज़ शराब पी कर अपने बच्चों को और पत्नी को पीटता है , गाली -गलौच करता है, उन्हें खाना नहीं देता, बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य के प्रति आपराधिक उदासीनता दीखता है लेकिन न तो उसकी पत्नी कुछ बोलती है ना हीं बच्चे क्योंकि वे कहाँ जाएँ ? कोई कानून इस समस्या को हल नहीं कर सकता जब तक परिवार के सदस्य इसके खिलाफ खुद न खड़े हों. सिद्धांत हैं किसी के व्यक्तिगत मामले में बाहरी दखल न देने की.
कुल मिलकर पाकिस्तान को इससे मिला क्या? क्या विश्व यह मान लेगा कि पाकिस्तान का व्यवहार मानवीय है तब जब कि मां-बेटे को शीशे की दीवार के उस पार से मिलवाया गया. किस बात का डर था अगर मां-बाप गले मिलते तो? क्या यह कि वह रो-रो कर बताता कि पाकिस्तानियों ने उसके हर अंग को तोड़ दिया है और मानसिक प्रताड़ना की सभी हदें पार करते हुए उसे अवचेतना की स्थिति में पहुंचा दिया है. जाहिर है कुलभूषण का मूंह सूजा था, वह सामान्य मानसिक अवस्था में नहीं लग रहा था. परिवार से मिलने का हर्ष व उत्साह कहीं भी उसके चेहरे पर नहीं झलक रहा था. वह जडवत दीख रहा था. उसने यंत्रवत वही बोला जो उसे पाकिस्तानी अधिकारियों द्वारा सिखाया गया था, शायद इस डर के साथ की जाने के बाद फिर उसे वही यंत्रणा झेलनी पड़ेगी.
क्या पूरी दुनिया यह सब कुछ समझ नहीं सकेगी? फिर पाकिस्तान को हासिल क्या हुआ? अगर दुनिया को रंगा-पुता कर अपना मानवीय चेहरा (जो भयावह है) दिखाना चाहता था तो वह खूंखार रूप से प्रगट हुआ. अगर भारत से अच्छे सम्बन्ध बनाने के लिए यह किया था तो वह उल्टा पडा और अगर अंतरराष्ट्रीय नियमों व तज्जनित दबावों के चलते किया था तो कुलभूषण के साथ की उसकी अमानवीय यातना का खाका दुनिया से छिपा नहीं रह गया. अगर भारत को चिढाने के लिए यह सब कुछ किया तो इसका प्रतिकार हमें वहां के अधिक से अधिकबीमारों का इलाज़ करके देना होगा. पिछले ३ जुलाई को पाकिस्तान मेडिकल एसोसिएशन ने भारत के इस रवैये की तारीफ की भारत का इस्लामाबाद स्थित उच्चायोग अपने वीसा नियमों को लचीला बनाते हुए बीमारों को वीसा दे रहा है. एसोसिएशन ने प्रेस नोट जारी करके बताया कि भारत में इलाज़ बेहतर और अन्य देशों के मुकाबले सस्ता है और पिछली साल पाकिस्तान के ५०० बच्चों सहित कुल दो हज़ार लोगों का भारत में इलाज हुआ.
उधर चेतना के स्तर पर आज भी सदियों पीछे रहे इस देश की स्थिति यह है कि इस देश के लोगों में इस जड़ता से निकलने की चाह भी ख़त्म हो गयी है बल्कि आधुनिक सभ्यता के मानदंडों से इसे भय लगता है. कुछ बानगी देखें. इस देश के उत्तर -पश्चिम क्षेत्र को फाटा के नाम से जाना जाता है जो कहने को तो पाकिस्तान में है परन्तु सारा प्रशासन अप्रत्यक्षरूप से इस्लामिक आतंकवादियों के संगठन तहरीक--तालिबान द्वारा चलाया जाता है. इसने एक फरमान जारे किया कि क्षेत्र की लड़कियां केवल घर में हीं रह कर पढ़ेंगी और वह भी मात्र कुरआन. दूसरा फरमान था कोई मर्द डॉक्टर किसी भी बीमार औरतों को हाथ नहीं लगाएगा और दूर से हीं इलाज करेगा. जाहिर है पढ़ेंगी नहीं तो औरतें डॉक्टर नहीं बनेगीं और पुरुष उन्हें छू भी नहीं पायेगा . हजारों औरतें सर्जरी के अभाव में या बच्चा पैदा होने के दौरान मर रहीं है. इन सबके बावजूद पाकिस्तान सरकार ने इस जून माह में वहां प्रचालन में रहे “रिवायती कानून” याने आतंकी मुल्लाओं के फैसले की प्रक्रिया को मान्यता दे दी और देश का सुप्रीम कोर्ट भी कट्टरपंथी मुल्लाओं की संस्था “जिरगा” के फैसले को नहीं बदल सकता.


lokmat

Friday, 22 December 2017

२ जी स्पेक्ट्रम फैसला : तो फिर गलत कौन था !


वो वाकया भूकंप से किसी बड़ी ईमारत में आई दरार की मानिंद था. एक आरोप (बल्कि सही शब्द होगा चार्ज ) लगा वह भी एक बेहद मकबूल संस्था --- कॉम्पट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल (सी ए जी) --- द्वारा. बताया गया कि कुछ लोगों को लाभ पहुँचाने के लिए प्रक्रिया बदली गयी, छः साल पुराने दर पर स्पेक्ट्रम आबंटित किये गए और इस तरह देश को १.७६ लाख करोड़ (यह उस समय के भारत के रक्षा बजट से भी अधिक की राशि है) का चूना लगाया गया. (बोफोर्स घोटाला जिसमें राजीव गाँधी की सरकार चली गयी मात्र ६५ करोड़ का था और वह भी कभी सिद्ध नहीं हो पाया). देश के १२० करोड़ लोगों की प्रजातंत्र, न्याय और सत्ता के प्रति भावना बदलने लगी. वह इतिहास का सबसे बड़ा भ्रष्टाचार माना गया. जाहिर है मैंने भी सभी उस वक्त के रिपोर्टरों की तरह दिन रात इसे एक लम्हे पर कवर किया.लगा कि “कोल्युसिव” किस्म के भ्रष्टाचार की यह गंगोत्री है जिसे आने वाली पीढी समाजशास्त्र , राजनीति शास्त्र और लोक शासन के एक विषय के रूप में हीं नहीं कानून और अपराधशास्त्र के पाठ के रूप में पढेगी. आज सी बी आई कोर्ट ने कहा वह पूरा आरोप देश की सर्वोत्तम जांच एजेंसी –केन्द्रीय जांच ब्यूरो (सी बी आई – सिद्ध नहीं कर पाई. लिहाज़ा सभी दोषी मुक्त कर दिए गये.

प्रजातान्त्रिक व्यवहार के सभी मूल्य टूट गए थे. जब तत्कालीन मंत्री ए राजा को पुलिस अदालत ले जा रही थी तो अखबरों और चैनलों के रिपोर्टरों के शब्द थे ---- यही है वो पौने दो लाख करोड़ रुपये का चुना लगाने वाला राजा. जब जनमत गुस्से में हो तो मीडिया बेलगाम हो जाता है. या यूं कहिये कि मीडिया जब सभ्यता की हदें पार कर जाता है तो जनमत का गुस्से में आना स्वाभाविक है.

लेकिन आज का सी बी आई कोर्ट का फैसला हम सब को आइना दीखता है. इसका मतलब क्या है?मतलब वह जलजला गलत था, सी ए जी गलत थी , मीडिया का वह महीनों का कवरेज गलत था ,  संसद में कई हफ्ते चला हंगामा गलत था और तब इन सबसे बनने वाला जनमत गलत था और अंत में इस जनमत से उद्भूत २०१४ के चुनाव में यूं पी ए की हार भी गलत थी.

तो सही क्या था. यह इस पर निर्भर करेगा कि सरकार (सी बी आई) फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट में या सुप्रीम कोर्ट में अपील करती है कि नहीं. जरूरी नहीं कि सत्य वहां भी मिले क्योंकि अगर हाई कोर्ट ने जो भी फैसला दिया , उससे प्रभावित पार्टी सुप्रीम कोर्ट जायेगी. चूंकि यह अपील दर अपील की अंतिम मंजिल सुप्रीम कोर्ट है लिहाज़ा सत्य वहां जा कर ठिठक जाता है या वहीं पर अंतिम सत्य का फैसला होता है. यह अलग बात है कि अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट के एक महान जज रोबर्ट जैक्सन ने कहा था “हम अंतिम सत्य इसलिए नहीं है कि हम अमोघ (कभी गलत न करने वाले ) हैं बल्कि इसलिए कि हम अंतिम हैं”.

तो मीडिया सहित क्या जरूरी नहीं कि जब तक अंतिम सत्य न आ जाये वह किसी को दोषी करार न दे , क्या यह ज़रूरी नहीं कि किसी ए राजा सूली पर महज किसी संस्था द्वारा आरोप लगाने पर न टांगा जाये.
लेकिन इसमें भी एक ख़तरा है . भारत में अगर मीडिया इसी बाबा के खिलाफ कम ऊँची आवाज में  बोले तो उसके गुर्गे भावना आहात होने का आरोप  कर देते हैं . आसाराम दशकों तक मीडिया को धमकाता रहा और राम रहीम के दरबार में नेता वोट के लिए मत्था टेकते रहे . लेकिन जब मीडिया को कुछ विश्वसनीय साक्ष्य मिल गए तो उसकी आवाज बुलंद हुई और ये बाबा आज जेल में हैं. प्रश्न यह है तो फिर मीडिया कब अपनी आवाज ऊँची करे ? 

सी बी आई अदलत के डेढ़ हजार से ज्यादा पृष्ठों वाले २ जी स्पेक्ट्रम घोटाले में आये फैसले में अदलत ने सीधे इस जाँच एजेंसी को हीं कटघरे में खड़ा किया है और साथ हीं टेलीफोन विभाग के अधिकारियों को अज्ञानता का दोषी ठह्रह है. “न तो इन्हें अपने हीं कानून में शब्दों के प्रयोग या उनके मायने मालूम हैं न हीं ये उन्हें सही जगह पर इस्तेमाल करते रहे हैं”. अदलत ने कहा सम्बंधित कानून की धारा ८ में “असोसिएट” , “प्रमोटर” या “स्टेक” शब्दों का प्रयोग है लेकिन इन अधिकारियों को इनके मायने नहीं मालूम. साथ हीं तमाम अधिकारियों द्वारा फाइल पर जो टिप्पणियां की गयी हैं उनमें से अधिकांस समझ से परे हैं क्योंकि उनकी लिखावट समझ से परे हैं. फिर कुछ ऐसी हैं जो मंत्री के समझ में आ हीं नहीं सकती क्योंकि बेहद टेक्निकल भाषा में हैं. ये जानबूझ कर ऐसे लिखी गयी हैं ताकि जब भी चाहे जैसे भी चाहें उनके अर्थ निकले जा सकें. यह सब देखने के बाद यह स्थापित नहीं हो सकता कि मंत्री ए राजा दोषी हैं. कट ऑफ तिथि तय करने में भी कहीं से ए राजा के दोषी होने के सबूत नहीं मिल सके. साथ हीं सी बी आई यह स्थापित करने में असफल रही कि जो दो सौ करोड़ रुपये कलैगनर टी वी में आये हैं उनका कोई सम्बन्ध २ जी स्पेक्ट्रम के घोटाले से हासिल तथाकथित लाभ से है.

अदलत ने दरअसल सी बी आई को पूरी तरह कटघरे में खड़ा किया है और साथ हीं यह नहीं कहा है कि सबूतों के आभाव में अभियुक्तों को छोड़ा जा रहा है बल्कि उनके बरी करने को बगैर किसी शर्त आदेशित किया है.

आज़ाद भारत में सी बी आई के खिलाफ शायद यह पहला इतना बड़ा आक्षेप है जिससे इस संस्था को उबरने में काफी वक्त लग सकता है. 

jagran/ lokmat

Saturday, 9 December 2017

नेहरु से राहुल तक: आयातित सेकुलरिज्म से उदारवादी हिंदुत्व तक


नेहरु परिवार और कांग्रेस के नाभि-नाल बद्धता को समझने के लिए तुलसी के रामचरित मानस की चौपाई --- एक धरम परिमिति पहिचाने , नृपहिं दोष नहीं दीन्ही सयाने “ का जनता का भाव समझना होगा. जब दशरथ जी ने राम को बनवास जाने की आज्ञा दी तो प्रजा में कुछ लोग फैसले से आहात थे लेकिन सुधि जनों ने उन्हें समझाया कि धर्म की सीमा समझ कर राजा में दोष नहीं देखना चाहिए”. भारत में प्रजातंत्र तो आया पर “राजा के प्रति भाव “ आज भी वैसा हीं है. भारत का प्रजातंत्र एकल नेतृत्व में विश्वास करता है . नेहरु और उनका परिवार कांग्रेस से अलग हो तो जनता नहीं कांग्रेस बिखर जाती है. वोट कांग्रेस को नहीं नेहरु, इंदिरा , राजीव या सोनिया को मिलते हैं.  जनता के इस भाव का एक दूसरा पहलू देखिये. भारतीय जनता पार्टी तो वैचारिक तौर पर मजबूत मानी जाती है लेकिन एक नरेन्द्र मोदी के परिदृश्य में आने पर इस पार्टी का वोट २००९ के चुनाव में हासिल १८.६ प्रतिशत से बढ़ कर सन २०१४ में ३२.७ प्रतिशत पर चला जाता है. लिहाज़ा  नेहरु और नेहरु परिवार को वंशवाद का दोषी मानने वालों को यह समझना होगा कि भारतीय जनता का मिजाज हीं एकल नेतृत्व का है , कम्युनिस्ट नहीं चल पाए क्योंकि उनके यहाँ विचार प्रधान था, व्यक्ति गौण. 
एक समाज जो शहाबुद्दीन सरीखे खतरनाक अपराधी को अपना “रोबिनहुड मान कर पांच बार लोक सभा में चुनता हो , एक समाज जहाँ भ्रष्टाचार के आरोप के बावजूद कोई लालू यादव देश की छाती पर सत्ता की चक्की से वर्षों तक मूंग दलता हो उसमें वंशवाद को पार्टियों के चरित्र से हटाना और प्रजातान्त्रिक तरीके से नेता चुनने की अपेक्षा रखना मूल सत्य से मुंह मोड़ना होगा. क्या भारतीय जनता पार्टी में अमित शाह किसी आतंरिक चुनाव से आये थे? क्या वेंकैया , ज ना कृष्णमूर्ति या कुशाभाऊ ठाकरे कार्यकर्ताओं के बैलट से पार्टी के अध्यक्ष के रूप में चुने गए थे. अगर नेहरु परिवार वंशवाद का दोषी है तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी मात् संगठन के रूप में वही करता है. 
मूल प्रश्न जनता की समझ को लेकर है कि वह कांग्रेस को नेहरु परिवार का पर्याय समझती है . विश्लेषण इस बात का होना चाहिए कि क्या जनता के इस “राजा के प्रति समर्पण” के प्राचीन भाव को नेहरु परिवार ने ७० साल में सत्ता पाने का साधन मात्र माना या अपने को जन सेवा में समर्पित किया और अगर किया तो कितना और कितनी सही दिशा में.    
भारत के पहले प्रधानमंत्री और देश के मकबूल रहनुमा पंडित जवाहरलाल नेहरु ने भारत के गणतंत्र बनने के एक साल में हीं सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार और राष्ट्रपति के वहां प्राणप्रतिष्ठ समारोह में जाने का पुरजोर विरोध करते हुए इसे धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ बताया. यह वह काल था जब उनके सेकुलरिज्म के यूरोपीय स्वरुप के प्रति आस्था पर अंकुश लगाने के लिए न तो महत्मा गाँधी जिंदा थे न हीं सरदार पटेल. उसके २६ साल बाद उनकी पुत्री और भारत की प्रधानमंत्री इंदिरागांधी ने आपातकाल के शासन के दौरान इस सेकुलरिज्म को संविधान की प्रस्तावना में ४२ वें संशोधन के जरिये जोड़ कर कंफ्यूजन को और बढ़ा दिया या सत्य को स्वीकार न करने का स्वांग करने लगी. सत्य अगर ज्यादा दिन नज़रंदाज़ हो तो इतिहास करवट लेने लगता है. अगले आठ वर्षों में हीं याने १९८४ में राम मंदिर को लेकर हिंदू समाज उद्वेलित करने के लिए विश्व हिन्दू परिषद् खडा हो गया. इतिहास ने करवट ली. आन्दोलन जोर पकड़ता गया. अगले पांच साल बाद उनके नाती (इंदिरागांधी के पुत्र) राजीव गाँधी को प्रधानमंत्री के रूप में अहसास होने लगा इतिहास की गलतियों को नज़रंदाज़ करने का. १९८९ में अयोध्या में युवा राजीव ने आम चुनाव के पहले राम मंदिर के शिलान्यास का फैसला किया और अपने भाषण में पांच बार राम का नाम लिया. पर चूंकि पुरखों का भाव ठीक उल्टा था इसलिए इस टोकेनिस्म ने हिन्दुओं को तो प्रभावित किया हीं नहीं, मुसलमान भी बिदक गए. यूं पी , बिहार सहित देश के अन्य भागों में मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू कराने तत्कालीन प्रधानमंत्री वी पी सिंह के फैसले ने समाज में एक नए जाति आधारित दबाव समूह को जन्म दिया. अयोध्या में राजीव के मंदिर के शिलान्यास के रवैये से नाराज़ मुसलमान इन तथाकथित “सामाजिक न्याय की ताकतों” के साथ हो चले. कांग्रेस की हालत  “न खुदा हीं मिला , न विशाल-ए-सनम, न इधर के रहे न उधर के रहे” वाली हो गयी. कांग्रेस सत्ता से बेदखल हो गयी और रही भी तो गठजोड़ करके. वोट प्रतिशत गिरता गया. लेकिन फिर भी चूंकि तासीरन भारतीय समाज अहसान फरामोश नहीं था इसलिए फिर से कांग्रेस को शासन में आई और यह दौर विदेशी मूल की लेकिन राजीव की पत्नी सोनिया का था भले हीं शासन मनमोहन सिंह का. 
इस बीच इतिहास एक बार फिर करवट लेता है. हिंदू एकता धीरे -धीरे परवान चढ़ती है क्योंकि किसी लालू , किसी मुलायम या किसी मायावती से भी वही टोकेनिस्म मिला. अशिक्षित या दबे समाज में सामूहिक चेतना का स्तर अतार्किकता की भेंट चढ़ जाता है. मायावती , मुलायम या लालू भ्रष्टाचार के पर्याय बनाने लगे लेकिन लालू के वोटर (यादव) इस बात पर हीं क्रुद्ध थे “कि जगन्नाथ बाबू (तत्कालीन मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र) भ्रष्टाचार करें तो ठीक लेकिन मेरा नेता करे तो गलत ?”  शुरू में दलित इस बात से हीं खुश था कि उनकी नेता मयावती भी उच्च जाति के नेताओं की तरह साम्राज्ञी की तरह लाखों रुपये का हार पहनती हैं.  मायावती का भ्रष्टाचार दलितों के लिए सशक्तिकरण का पर्याय बन गया.  कांग्रेस हाशिये पर आने लगी .  
इस उहापोह में कांग्रेस में फूट पडी . नेहरु परिवार का वर्चस्व एक बार फिर दरकने लगा. कोई अर्जुन सिंह , कोई कमलापति या कोई नारायण दत्त तिवारी राजीव गाँधी के नेतृत्व का विरोध करने लगे और कुछ तो अलग पार्टी बनाने का उपक्रम भी करने लगे. कोई प्रधानमंत्री नरसिंह राव सोनिया को चुनौती देने लगा . लेकिन सदियों तक गुलाम रही जनता एकल नेतृत्व की हिमायती है लिहाज़ा सोनिया फिर कांग्रेस का नेतृत्व संभालने लगीं, मनमोहन सिंह मात्र प्रधानमंत्री थे शासन सोनिया के इर्दगिर्द हीं रहा . इस बीच कांग्रेस सत्ता में तो आयी पर कैडर संरचना के अभाव में और नेता -कार्यकर्ताओं के बीच संवादहीनता से मनमोहन सरकार के अच्छे कार्यक्रम भी जनता के बीच नहीं जा सके . साझा सरकार में समझौते होते हैं लिहाज़ा मनमोहन सिंह की ईमानदारी बाँझ साबित हुई और भ्रष्टाचार का बोलबाला जनता को निराश करने लगा. 
इस बीच हिंदू साम्प्रदायिकता परवान चढने लगी. नरेन्द्र मोदी विकास और हिंदू अस्मिता के पर्याय के रूप में राष्ट्रीय राजनीतिक क्षितिज पर छाने लगे. 
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी बीमार रहने लगीं. राहुल ने जयपुर कांग्रेस अधिवेशान के दौरान एक भावनात्मक भाषण दिया जिसे देशवासियों ने भी टेलीविज़न के जरिये सुना. उसका सार यह था कि राहुल राजनीति को अन्यमनस्क भाव से लेते हैं. अगले कुछ सालों में देश में जब भी कोई बड़ी घटना हुई और देश ने एक मजबूत विपक्ष या नेता की जरूरत महसूस की राहुल गायब पाए गए. लेकिन गुजरात चुनाव में अचानक जिस शिद्दत  से राहुल ने चुनाव प्रचार किया एक बार फिर लगाने लगा कि देश को एक युवा और मकबूल नेतृत्व मिल सकता है. इस दौरान  राहुल गाँधी उसी मंदिर में गुजरात चुनाव प्रचार किया जिस मंदिर के शिलान्यास का उनके परनाना ने विरोश किया था. एक बार फिर लगने लगा कि नेहरू परिवार की पांचवीं पीढी भी राजनीतिक नेतृत्व के लिए तैयार है. राहुल को पार्टी का औपचारिक अध्यक्ष चुना जाना मात्र औपचारिकता है. 
लेकिन राहुल ने अपने पिता राजीव गाँधी से सीख लेते हुए कुछ नए ढंग से कांग्रेस की नीति में अमूल चूल परिवर्तन का फैसला किया है. नेहरु की धर्मनिरपेक्षता से ठीक उलट राहुल मंदिर-मंदिर जा रहे हैं (और मस्जिद नहीं). शायद कांग्रेस के रणनीतिकार समझ गए हैं कि मोदी के सत्ता में आने के बाद से देश में जो उग्र हिंदुत्व देखने को मिला है वह भारत के आम हिंदू पसंद नहीं करते और कालांतर में वे इसे ख़ारिज करेंगे क्योंकि तासीरन हिन्दू उदारवादी संस्कृति का है और धर्म में भी वह उग्रता को ख़ारिज करता है. चूंकि उदार हिंदुत्व का स्लॉट खाली है लिहाज़ा कांग्रेस अगर उसे भर पाई तो पिछड़ा वर्ग और दलित एक बार फिर उसके साथ हो सकता है. राहुल की रणनीति सही है लेकिन जनता को अभी भी पूरी तरह यह भरोसा नहीं है कि राहुल गाँधी में राजनीति को लेकर एक निरंतरता रहेगी. अगर वह रही और जनता को विश्वास हो सका तो भारत को एक मजबूत विपक्ष और उदारवादी नेता मिल सकता है. यह प्रजातंत्र के लिए अच्छा होगा.     

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Monday, 4 December 2017

आखिर हम बीमार क्यों रहते हैं ?


देश के जाने माने हॉस्पिटल चेन मैक्स के दिल्ली स्थिति एक नामी अस्पताल इकाई में एक महिल के जुड़वाँ बच्चे पैदा हुए ---एक बेटा और दूसरी बेटी. डॉक्टरों ने बताया कि एक बच्चा मारा पैदा हुआ और दूसरा कुछ हीं क्षण बाद मर गया. जब दुखी माँ-बाप अपने सगे सम्बन्धियों के साथ इन “शवों” को अंतिम क्रिया के लिए ले जा रहे थे तो आधे रास्ते में पिता ने देखा कि एक “शव” में कुछ हरकत हो रही है. फ़ौरन उसे कफ़न से निकाल कर पास के अस्पताल में ले जाया गया. घंटों पॉलिथीन में ऑक्सीजन के अभाव में बंद बच्चे की स्थिति गंभीर हो गयी थी. बहरहाल उसका इलाज़ चल रहा है. मीडिया में खबर के बाद देश के स्वास्थ्य मंत्री ने मामले का संज्ञान लिया. एक अन्य नामी गिरामी हॉस्पिटल चेन--- फोर्टिस--- के गुडगाँव इकाई ने सात साल की एक बच्ची के १५ दिन चले असफल इलाज़ (बच्ची मर गयी) में पिता को १६ लाख रुपाए का बिल पकड़ा दिया गया. सोशल मीडिया और बाद में औपचारिक मीडिया में उछले इस खबर के बाद फिर मंत्री ने संज्ञान लिया. तीसरे मामले में नॉएडा के हीं एक इसे मशहूर अस्पताल में एक व्यक्ति ने आरोप लगाया कि उसकी पत्नी तीन दिन पहले मर चुकी थी लेकिन अस्पताल प्रबंधन ने वेंटीलेटर पर रख कर तीन दिनों में हजारों रुपये का बिल बनाया. लेकिन चूंकि मीडिया ने इस मामले को उस पुरजोर तरीके से नहीं उठाया लिहाज़ा मंत्री जी ने संज्ञान भी नहीं लिया.
ये तीनों घटनाएँ पिछले १५ दिन के भीतर घटीं हैं. इनसे तीन निष्कर्ष निकलते हैं. आप या आपका बच्चा बीमार पड़े तो प्राइवेट बड़े अस्पताल में जाने के बाद तीन बातों का ध्यान रखें. अस्पताल में जरूरी नहीं कि इलाज हो और अगर हो तो मरीज़ बच हीं जाये. फिर कब मरे और कब मरना बताया जाये यह भी अस्पताल और डॉक्टर के “प्रोफेशनल बुद्धिमत्ता” पर निर्भर करेगा . अगर मरना बता भी दिया गया तो ज़रूरी नहीं कि यह सच हो इसलिए गम करते हुए उसे शमशान ले जाने के पहले एक बार किसी और डॉक्टर से दिखा लें. और आखिर में अगर मरीज़ मर भी गया हो तो आप उस बिल के सदमें से न मरें. इससे दो सीख और भी हैं. अगर आप अस्पताल और उसके बिल से मरने से बच भी गए तो कम से कम सोशल मीडिया में ट्विट जरूर करें. औपचारिक मीडिया तभी मामले का न्यूज महत्त्व समझता है जब वह सोशल मीडिया में वाइरल हो जाता है वरना उसे बाबा राम रहीम और हनी प्रीत और उनके बेडरूम से फुर्सत नहीं होती. जब सोशल मीडिया में वायरल होगा तो शाम को एक कम पढ़ा लिखा लेकिन बुलंद आवाज वाला एंकर -एडिटर चीख-चीख कर बताएगा और उतनी हीं चीख के साथ सत्ताधारी दल का उतने हीं अज्ञानी प्रवक्ता अपने विपक्षी प्रतिद्वन्दी के साथ “तेरा-नेता , मेरा नेता “ करते हुए टी आर पी बढ़ने में चैनल का सहयोग करेगा. आख़िरी बात : मंत्री जी को जगाने के लिए आवाज बुलंद हीं नहीं हो , मीडिया में हो.
क्या हो गया हैं इस देश की नैतिकता , समझ और कर्तव्यबोध को. क्या हत्या का अपराध सिर्फ चौराहे पर गोली मारने को कहा जाना चाहिए. कम से कम दस साल पढ़ाई और हाउसजॉब के बाद किसी डॉक्टर से यह अपेक्षा की जा सकती है वह हमारी - आपकी की टैक्स के रूप में वसूली गयी रकम के लाखों रुपये खर्च करने के बाद इतना ज्ञानी (या जिम्मेदार) तो हो हीं कि जिन्दा और मरे में अंतर कर सके? मोदी सरकार के तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने ओड़िसा एम्स में डॉक्टरों को संबोधित करते हुए सन २०१४ की २० जुलाई को बताया था कि एक डॉक्टर बनाने में सरकार जनता के टैक्स का आठ से दस करोड़ रुपया खर्च करती है. तो फिर इनमें से कुछ डॉक्टर (सभी नहीं क्योंकि नैतिक प्रैक्टिस के भी तमाम उदाहरण हैं) इतना अनैतिक (आपराधिक) क्यों होते हैं कि अस्पताल का और अपना बिल बढाने के लिए मरे व्यक्ति को कई दिन तक वेंटीलेटर पर रख कर “धंधा” करे? क्या यह संगठित अपराध की परिभाषा में नहीं अना चाहिए ? जेब काटने वाले गरीब को तो हर कोई पकडे जाने पर दो हाथ लगा देता है और कानून भी मुश्तैद हो जाता है पर जब हम इन “तथाकथित रूप से पढ़े लिखे लोगों वाले और संस्थागत अस्पताल के नाम पर चल रहे “ क्राइम सिंडिकेट” से खुद शोषण के लिए जाते हैं तो उनका दोष तभी होता है जब मंत्री जी को मीडिया के जरिये बताया जाये. एम आर पी पर दवा भी अस्पताल हीं देगा क्योंकि निर्माता कंपनी से समझौता है कि दूकान से न बेंचों. पेटेंट की जगह जेनेरिक दावा लिखवाने के सारे सरकारी प्रयास विफल रहे और डॉक्टर महंगी दावा लिख कर कंपनियों से मोटी रकम कमीशन के रूप में वसूलते रहे या विदेश परिवार के साथ घूमने या अकेले रंगरेलियां मानते जाते रहे . कभी भी इनकम टैक्स विभाग ने इनके खर्च के स्रोत का पता नहीं किया. मेडिकल सेमिनार के नाम पर पांच तारा होटलों में दारू पार्टियाँ (जिसका बिल ये दवा कंपनियां भरती हैं) कैसे नए चिकित्सा-ज्ञान बढाने का सबब बनती हैं कभी किसी सरकार ने नहीं पूछा .
तस्वीर का दूसरा पहलू
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अगर आप बिहार में पैदा हुए हैं तो वहां की सरकार आपके स्वास्थ्य पर मात्र ३३८ रुपये खर्च करेगी जबकि हिमाचल, उत्तराखंड या केरल में पैदा हुए हैं तो क्रमशः इसके छः गुना, पांच गुना और चार गुना खर्च करेगी. इसका दूसरा मतलब यह कि उपयुक्त सरकारी सुविधा के अभाव में आप बिहार , उत्तर प्रदेश या झारखण्ड में गरीब होते हुए भी आप अपनी जेब से इस खर्च का पांच गुना खर्च करेंगे भले हीं इसके लिए आपको घर या जमीन बेंचना पड़े. गुजरात और महाराष्ट्र में प्रति-व्यक्ति स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च क्रमशः १०४० और ७६३ रुपये है. उधर विश्व स्वास्थ्य संगठन की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार भारत मलेरिया पर काबू पाने में बुरी तरह असफल रहा और आज ७० साल बाद भी केवल आठ प्रतिशत मलेरिया के मामले हीं सर्विलांस के जरिये संज्ञान में आते हैं . इस मामले में भारत नाइजीरिया के समकक्ष खड़ा है. बाल मृत्यु दर और मात्र मृत्यु दर, जन्म के समय बच्चे के वजन या कुपोषण ऐसे पैरामीटर्स पर भारत आज भी बेहद पीछे है. इसका कारण यह है कि जहाँ हम देश के सकल घरेलू उत्पाद (जी डी पी ) का मात्र एक प्रतिशत से भी कम स्वास्थ्य मद में खर्च करते हैं वहीं चीन और तमाम छोटे -छोटे देश चार प्रतिशत तक खर्च करते हैं. हालांकि मोदी सरकार के वर्तमान स्वास्थ्य मंत्री जी पी नड्डा ने संसद के सदन में नयी स्वास्थ्य नीति रखते हुए इसे जी डी पी का २.५ प्रतिशत तक लाने का संकल्प बताया था लेकिन जब बजट आया तो वह कहीं भी परिलक्षित नहीं हुआ.

तो गरीब क्या करे? सरकारी अस्पताल में दवा नहीं, डॉक्टर नहीं , इलाज के उपकरण नहीं और मंशा भी नहीं. प्राइवेट में अस्पतालों में संगठित गैंग के रूप में डॉक्टर और नर्सिंग होम के मालिक का गिरोह किसको मरा बता दे , किसकों मरने के बाद भी वेंटीलेटर पर रख कर बिल बढ़ा दे और किसे गलत मर्ज बता कर ज्यादा दिन अस्पताल में रखे यह उसके विवेक (धंधे की जरूरत ) पर है. क्या कानून बनाकर जीवन से अनैतिक व्यापर करने वालों पर अंकुश लगना सरकार की जिम्मेदारी नहीं? ऐसे में गरीब जाये तो जाये कहाँ लिहाज़ा बीमार होने पर घर या जमीन बेंच कर जिन्दा रहने की कोशिश (अगर रह पाया) हीं उसकी नियति हो चली है

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Friday, 1 December 2017

मैकाले का दानवीकरण अज्ञानता व फरेब की उपज !



भारत में जब कोई किसी अंग्रेज़ी बोलने वाले से (खासकर अफसर से) या ऐसी “मानसिकता” वाले व्यक्ति से गुस्सा होता है तो उसे “भूरा साहेब” हीं नहीं “मैकाले का वंशज” भी कहता है. पाकिस्तान में जब मलाला यूसुफ़जाई को अक्टूबर, २०१२ में तहरीक--तालिबान ने गोली मारी तो औचित्य बताने के लिए एक लम्बे पत्र में कहा “मलाला भी मैकाले की अनुयायी बन गयी थी”. इस अंग्रेज़ समाजशास्त्री, कानूनविद और युगदृष्टा को १९० साल से हिन्दू हो या मुसलमान, भारत हो या पाकिस्तान या बंगलादेश सामान रूप से घृणा करते रहे हैं. जबकि उसके द्वारा बनाई गयी दंड संहिता, साक्ष्य कानून और सिविल सर्विस आज तक तीनों देशों में यथावत या थोड़े -बहुत तब्दीलियों के साथ लागू है. क्या कभी हमने सोचा है कि जिस व्यक्ति का हमने दानवीकरण कर दिया है उसकी हकीकत क्या है? कहीं ऐसा तो नहीं कि झूठ और तथ्यों को गलत सन्दर्भ में रखा गया है? वेबसाइट पर हीं नहीं, देश के पाठ्यक्रमों में भी बच्चों को गलत शिक्षा से भ्रमित किया जाता रहा है. देश के पूर्व प्रधानमंत्री और आमतौर पर सत्य के प्रति आग्रही के रूप में सम्मानित लालकृष्ण आडवाणी सहित तमाम मकबूल लोग भी इस दुश्चक्र के शिकार होते रहे हैं. आइये देखें हकीकत क्या है. आडवाणी की आत्म-कथा “माय कंट्री माय लाइफ” के पृष्ठ १३२-१३३ के अंश देखें ----- आडवाणी कहते है:
भारत के लिए सही भाषा नीति के सन्दर्भ में हम इस बात को, कि अंग्रेजों ने भारतीयों को अपनी हीं भाषा और संस्कृति के प्रति हीन भावना से ग्रस्त होने की सचेतन रणनीति अपनाई, नज़रंदाज़ नहीं कर सकते. मुझे स्मरण आता है लार्ड मैकॉले का वह चौंकाने वाला उद्बोधन जो उसने फ़रवरी २, १८३५ को ब्रिटिश संसद में दिया था : (अब आडवाणी मैकाले को तथाकथित रूप से ऊद्धृत करते है):

"मैंने भारत का विस्तृत भ्रमण किया और मैंने ऐसा एक भी आदमी नहीं देखा जो भीखमंगा हो या जो चोर हो. ऐसी पूंजी हमने इस देश में देखी, ऐसा उच्च नैतिक मूल्य देखा, ऐसे प्रखर लोग देखे कि मुझे लगता नहीं है कि हम कभी भी इस देश को जीत सकते हैं जबतक इस राष्ट्र की कमर – जो इसकी संस्कृति और आध्यात्मिक विरासत में निहित है -- नहीं तोड़ देते, लिहाजा मैं प्रस्तावित करता हूँ कि हम इसके प्राचीन शिक्षा पद्धति और संस्कृति को बदलें क्योंकि अगर ये भारतीय यह सोचने लगें कि हर वह चीज जो विदेशी है और अंग्रेज़ी है वह उनकी अपनी चीजों से अच्छी और महान है तो उनका आत्म -सम्मान और उनकी संस्कृति ख़त्म होगी और (तब) वे वही होंगे तो हम उन्हें होने देना चाहते हैं--- एक सचमुच का गुलाम राष्ट्र”.
(यहाँ जिस दिन ब्रिटिश संसद में भाषण देने की बात कही जा रही है , मैकाले उसके नौ माह पहले हीं भारत आ गए थे और अगले छः साल भारत मेे) रहे. 2फरवरी,1835 को वह कलकत्ता में थे. )
अब जरा हकीकत देखें! भारत आने के पहले ब्रिटिश संसद में दिनांक १० जुलाई, १९३३ को दिए अपने लम्बे भाषण में मैकाले ने अपना ध्येय व अपनी अवधारणा प्रस्तुत की और अपेक्षा की कि सरकार की नीतियां उन्हीं के अनुरूप हों. मैकाले के भाषण का अंश:
हमारे लिए यह बेहतर होगा कि एक कुशासित प्रजा के बजाय एक सुशासित समाज से जो हमसे स्वतंत्र शासन में अपने राजाओं द्वारा शासित हो, व्यापार करें, यह प्रजा गरीब रहे तो हमारा उद्योग भी नहीं पनपेगा. एक सभ्य समाज से व्यापर करना अज्ञानी और गरीब प्रजा पर शासन करने से बेहतर होगा....... क्या हम यह चाहते हैं कि भारत की जनता अज्ञान के गर्त में डूबी रहे ताकि हम उन पर शासन करते रहें? क्या हम उनकी अपेक्षाओं को उभारे बगैर उन्हें शिक्षित कर सकेंगें? ज्ञान होगा तो वे भी यूरोपीय संस्थाओं (प्रजातांत्रिक संस्थाओं ) की चाह करने लगेंगे. ऐसा दिन कब आयेगा मैं नहीं कह सकता लेकिन मैं कभी भी इस तरह की भारतीय जनता की कोशिश (याने स्व-शासन की) को न तो रोकूंगा न धीमा करना चाहूँगा. (मैं इतना कह सकता हूँ कि) जिस दिन ऐसा होगा .... कि भारत की जनता नागरिक अधिकारों के लिए सोचने लगेगी वह ब्रिटेन के इतिहास का स्वर्णिम दिन होगा.”
क्या ऐसा सोचने वाला व्यक्ति यह कह सकता है कि भारत को गुलाम रखना है तो उसकी सांस्कृतिक व नैतिक रीढ़ तोड़ना होगा? बल्कि इसके उलट मैकाले का मिशन हीं भारतीय समाज को मॉडर्न शिक्षा से आधुनिक सोच की ओर ले जाना और उससे उनके अन्दर नए प्रजातान्त्रिक संस्थाओं के प्रति झुकाव बढ़ाना और अंत में स्वतन्त्रता की मांग करना था.
असत्य १. जिस तारीख और जगह (ब्रिटिश पार्लियामेंट) का यह भाषण बताया जा रहा है उस तारीख से नौ माह पहले से हीं मैकाले भारत आ चुके थे. और अगले छः साल तक भारत में हीं रहे. साथ हीं अपने पूरे जीवन के भाषणों में कहीं भी मैकाले ने उपरोक्त बात नहीं कही है.
असत्य २: मैकाले ने पूरा भारत भ्रमण किया हीं नहीं था. फिर जिस देश में भीख मांगना एक संस्थागत स्वरुप में हो जिसमें दान को पुण्य का दर्जा हासिल हो और भीख मांगना आदिकाल से चला आ रहा हो उस देश में किसी काल खंड में एक भी भिखारी पूरे देश में न दिखे यह संभव है? और वह भी तब जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने ८६ साल के वर्चस्व में भारत के उद्योग, शिल्प और तज्जनित “समृद्धि” ख़त्म कर दी हो?
असत्य ३: मैकाले को पूरे भारत में चोर या चोरी की एक भी घटना नहीं मिली जबकि उस काल में मेजर जनरल स्लीमन (तब कर्नल) ने पिंडारियों (लुटेरों) के खिलाफ देशव्यापी अभियान चला रखा था. पिंडारियों की लूट और हत्या उस समय की सबसे बड़ी त्रासदी मानी जाती थी.

असत्य ३: मैकाले एक घोर नस्लवादी था और गैर यूरोपी लोगों, खासकर भारत की संस्कृति और ग्यान के प्रति उसमें जबरदस्त हिकारत का भाव था. जो मैकाले यह कह सकता है समूचा भारतीय ज्ञान किसी ब्रिटेन के किसी छोटी सी लाइब्रेरी की छोटी सी अलमारी में बंद किताबों से भी कम है वह कैसे कह सकता है कि इस देश के लोगों में अद्भुत मेधा है , परिष्कृत संस्कृति है और अप्रतिम नैतिकता है? (यह झूट इसलिए उसके नाम से कहा जा रहा है कि यह बता सकें कि भारतीय समाज की गुणवत्ता से ऐसा व्यक्ति भी घबराया था , याने गुणवत्ता थी).
असत्य ४: उस समय तक अधिकांश भारत अंग्रेजों के कब्जे में आ चुका था और इसकी कमर तोड़ने के लिए इसकी संस्कृति और उस संस्कृति के प्रति समाज की प्रतिबद्धता की कमर तोड़ने की ज़रुरत हीं नहीं थी.
असत्य ५. जिन अंग्रेज़ी शब्दों का प्रयोग भाषण में बताया गया है वे शब्द मैकाले के ज़माने में प्रचलित नहीं थे. फिर वर्तनी और व्याकरण की भी अशुद्धियाँ स्पष्ट है. मैकाले साहित्यकार भी थे और उनकी कवितायेँ स्तरीय होती थीं.
पूरे भारत में आडवाणी हीं नहीं एक भी चिन्तक ने तथ्य जानने की कोशिश नहीं की , ना हीं इस झूठ के पर्दाफाश की कोशिश की जो मैकाले के नाम पर चलाया गया. हकीकत यह है कि जिस दिन, जहाँ और जिस भाषण का जिक्र किया गया है वह मैकॉले ने कभी दिया हीं नहीं. दिनाक २ फ़रवरी, १८३५ को मैकॉले ब्रिटेन में थे हीं नहीं बल्कि वह उसके आठ महीने पहले १० जून , १८३४ को वह तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बेंटिंक के बुलावे पर भारत आ चुके थे. लिहाज़ा ब्रिटिश संसद में उनके भाषण देने का प्रश्न हीं नहीं उठता. जी हाँ, , फ़रवरी को उनका भाषण एक लिखित रिपोर्ट के रूप में हुआ था जो उन्होंने तत्कालीन वाइसराय के परिषद् के शिक्षा सदस्य के रूप में अपने मिनट्स में दिया. उस रिपोर्ट में भी मैकाले की कोशिश थी कि देश को वैज्ञानिक सोच की ओर उन्मुख कराया जाये और उन्हें आधुनिक विकास का लाभ मिले. यह बात सही है कि भाषण के अंश में उन्होंने भारतीय संस्कृति और ज्ञान को हिकारत से देखा और अंग्रेज़ी और विज्ञानं पढाये जाने की वकालत की. पर उन्होंने ऐसा कहने के लिए आंकड़े दिए. उन्होंने ने बताया कि उनके पास सैकड़ों युवाओं के शिकायती पत्र आये हैं कि शासन से मिले वजीफे से वे केवल संस्कृत या अरबी की पढाई कर अपने जीवन के १२ साल बर्बाद कर चुके हैं और उन्हें न तो इनके गाँव में इज्ज़त मिल सकी है न हीं गांव के बाहर नौकरी. उन युवाओं ने हुकूमत पर आरोप लगाया कि इस वजीफे से हासिल ज्ञान उनके किसी भी काम का नहीं है.
मैकाले ने परिषद् के सदस्यों को बताया कि किस तरह पिछले २१ साल से अंग्रेज़ सरकार हर साल एक लाख रुपये शिक्षा के विकास के लिए देती हैं और कैसे उन पैसों से छापी गयी संस्कृत और अरबी की किताबें गोदामों में दीमक के हवाले हैं क्योंकि कोई इसे मुफ्त में भी लेने को तैयार नहीं है. मैकाले ने यह भी खुलासा किया कि भारतीय युवाओं का बड़ा वर्ग अंग्रेज़ी शिक्षा के लिए महंगी ट्यूशन फी देने में नहीं हिचकता. यही कारण है कि मैकाले गरीब युवाओं को विज्ञान और अंग्रेज़ी की शिक्षा दे कर उन्हें रोजगार परक बनाना चाहते थे. इसका एक मकसद और भी था और वह यह कि इस तरह से शिक्षित युवा भारत की जनता और अंग्रेज़ शासन के बीच एक संवाद का काम करेंगे और विकास की रफ़्तार के प्रति गाँव तक में चेतना जागृत करेंगे.

लेकिन आज उनकी आत्मा शायद अपनी प्रति हो रहे अन्याय को देख कर कब्र में कुढ़मुढ़ाती होगी.

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