Friday, 22 September 2017

सौहार्द्र : मुसलमानों की भी जिम्मेदारी है




सन १९४४ की बात है. भारत की आजादी को लेकर अंग्रेजों ने बटवारे का पेंच फंसा दिया. महात्मा गाँधी और मुस्लिम लीग के मुहम्मद अली जिन्ना के बीच ऐतिहासिक १८ दिन लम्बी बातचीत चली. पर जिन्ना को ब्रितानी हुकूमत की शह थी. लिहाज़ा विवेक और तार्किकता जिद पर भारी नहीं पड़ सकती थी. सातवें दिन यानी १५ सितम्बर को गाँधी ने जिन्ना को एक पत्र लिखा: “हम दोनों की बातचीत के दौरान आपने पुरजोर तरीके से कहा कि भारत में दो देश हैं –हिन्दू और मुसलमान...'। जितनी अधिक हमलोगों के बीच बहस आगे बढ़ रही है उतनी हीं अधिक चिंताजनक मुझे आपकी तस्वीर दिखाई दे रही है........ इतिहास में मुझे एक भी घटना की याद नहीं आती जब धर्मान्तरण करने वाले लोग या उनके वंशज अपने मूल धर्म के लोगों से अलग उसी राष्ट्र में एक नए राष्ट्र का दावा करें. अगर भारत इस्लाम के आने के पहले एक राष्ट्र था तो इसे एक रहना होगा भले हीं उस राष्ट्र के तमाम लोगों ने अपना पंथ बदल लिये हो “.
बहरहाल ३५ महीने बाद हीं पाकिस्तान बन गया. लेकिन आगे की घटना देखिये.
बंटवारे के दौरान और बाद के कई  महीनों तक लाखों हिन्दू -मुसलमान एक दूसरे को मारते रहे . हिंसा का तांडव अभी चल हीं रहा था। संविधान सभा को अपना अपना कार्य करते हुए कोई एक साल से ज्यादा हो चुके थे. पूरा देश इस विभाजन से सकते की हालत में था. दिसम्बर , १९४७ को मुस्लिम लीग (जो बँटवारे के बाद बचे-खुचे सदस्यों से बना रह गया था) ने संविधान के प्रारूप में दो संशोधन प्रस्ताव रखे। पहला था --भारत में रहने वाले मुसलमानों के लिए अलग लोक सभा सीटों में आरक्षण। लेकिन दूसरा उस संकट में मुसलमान नेताओं की मनोदशा बताता है। यह संशोधन प्रस्ताव था --मुसलमानों  को पृथक मतदाता श्रेणी में रखना (याने सेपरेट एलेक्टोरेट --- एक ऐसी मांग जो अंततोगत्वा  फिर एक अन्य देश बनाने का मार्ग प्रशस्त करती. इस संशोधन को देख कर पूरा देश स्तब्ध रहा गया . पटेल ने बेहद भावातिरेक में कहा “मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि इतने बढे झंझावात में फंसे देश के अनुभव के बाद भी इनमें कोई बदलाव आया भी या नहीं जो ऐसी मांग कर रहे हैं. "
आज ७० साल बाद सोशल मीडिया पर एक विडिओ वायरल हो गया है जिसे लाखों लोगों ने देखा. बांग्ला टीवी चैनलों ने इसे दिखाया। राज्य की राजधानी कोलकता में इसी सितम्बर १२  को पश्चिम बंगाल अल्पसंख्यक फेडरेशन के तत्वावधान में १८ संगठनों ने रोहिंग्या शरणार्थियों को भारत में रहने की अनुमति देने की मांग को लेकर एक रैली आयोजित की। रैली में बोलते हुए एक युवा नेता मौलाना शब्बीर अली वारसी चीच-चीख कर कह रहा था “आप इस गलतफहमी में न रहें कि मुसलमान कमज़ोर है. तुम हमारी हिस्ट्री नहीं जानते . हम कर्बला वाले हैं , हम हुसैनी मुसलमान है . अगर हम ७२ भी है तो लाखों का जनाजा निकाल सकते हैं. ................. “ . मंच से आवाज आती है – बहुत खूब. भीड़ से अल्लाहो अकबर के नारे) इस नेता का चीखना और तेज होता है, “दिल्ली की सरकार से मैं बताना चाहता हूँ कि  ये रोहिंग्या हमारे भाई है. इनका और हमारा कुरआन एक है , जो इनका खुदा वो हमारा खुदा....... दुनिया में मुसलमान कहीं भी हो हमारा भाई है.........”. भीड़ हाथ उठाकर कहती है ---- नाला-ए -तदबीर , अल्लाहोअक्बर . नेता आगे कहता है, “ये बंगाल है , गुजरात नहीं, आसाम नहीं , यूपी नहीं , मुज़फ्फरनगर नहीं. मीडिया यहाँ बैठी है. मेरा चैलेंज है. अभी बंगाल में किसी मां ने वो औलाद पैदा नहीं किया जो एक भी रोहिंग्या मुसलमान को निकाल सके”.  भीड़ पागल की हालत में नारे लगाने लगती। प्रश्न इस नेता के आपत्तिजनक भाषण का नहीं है. प्रश्न उस भीड़ का है जो इसे न केवल अनुमोदित कर रही थी बल्कि इन वाक्यों से एक तादात्म्य प्रदर्शित कर रही थी, कुछ भी कर गुज़रने के भाव में।
अब जरा इस कुतर्क को समझें. यह नेता दुनिया के मुसलमानों को अपना भाई मान रहा है पर वह जिससे खून का रिश्ता रहा है या जिस मिट्टी में पला है उसी को चुनौती दे रहा है. इस्लाम से पहले इसके पूर्वज भारतवासी थे. लेकिन क्या आपने कभी किसी सभा में भारत के टुकडे करने वाले कश्मीरी नारों के खिलाफ अन्य भाग के मुसलमानों को इतने गुस्से में देखा है.? खालिद और उसके लोग जे एन यू में कौन सी आजादी मांग रहे थे और न मिलने पर “भारत तेरे टुकडे होंगे इंशाल्लाह “ का ऐलान कर रहे थे? याने धार्मिक रिश्ता वैश्विक है और वह जहाँ की मिटटी में सांस ली है उसके रिश्ते पर भारी पड़ती है. तर्क-वाक्य के विस्तार की प्रक्रिया के तहत यह कहा जा सकता है कि पाकिस्तान का मुसलमान हमला करे तो वह जायज है क्योंकि वह भाई है. सेमिटिक धर्मों की यह एक बड़ी समस्या है उनकी प्रतिबद्दता में राष्ट्र नहीं है. परा-राष्ट्रीय  निष्ठा जो मूलरूप से विश्व भर में फैले उन  धर्मनुयाइयों के प्रति होती है वह उन्हें राष्ट्र की अवधारणा से दूर ले जाती है. ऐसे में देश क्या करे? हिन्दुओं का भाव कैसे गीता के “स्थितिप्रज्ञ” सरीखा बना रहे. आज जरूरत  है कि मुसलमान भी इस बात को समझे कि अगर दुनिया के मुसलमान एक हैं और वो कहीं से भी आयें तो यह बक़ौल इस नेता के यह भारत की जिम्मेदारी है कि उन्हें उदार दिल के साथ आत्मसात करे , तो फिर कल ये ४०,००० रोहिंग्या  भी तो इसी तरह चीख-चीख कर चिल्लायेंगे और चुनौती देंगे और कर्बला का इतिहास बताएँगे. यहाँ के मूल होंगे तो पाकिस्तान बनायेंगे या अलग मतदाता श्रेणी की बात करेंगे।
जहाँ एक ओर अपेक्षा के जाती है कि सत्ता किसी दल विशेष द्वारा हासिल होने का मतलब यह नहीं कि उग्र हिन्दु किसी अखलाक के घर गौमांस तलाशें और फिर उसे मार दें और न हीं ट्रक से दूध के व्यापार के  लिए वैधरूप से गाय ले जा रहे पहलू खान को सरे आम पीट-पीट कर मार दें वहीं “उनकी मां ने वह लाल पैदा नहीं किया” कहना भी अमनपसंद औसत मुसलमानों द्वारा ऐतराज़ का सबब होना चाहिये न कि उन्माद का कारण। स्वयं मुसलमानों को ऐसे भाषणों पर रोक लगाना होगा क्योंकि किसी ममता या अन्य राजनीतिक दलों को सिर्फ वोट से मतलब है जानें तो आती जाती रहती हैं।
हम निरपेक्ष विश्लेषक अख़लाक़ के मारे जाने पर उग्र हिन्दुत्व को कोसने लगते है स्वयं को तटस्थ साबित करने का होड़ में, पर क्या कभी कट्टरता के इस पहलू पर ऐतराज़ जताया है। आतंकी घटना होती है तो हमारा तर्क होता है कि आतंकी का कोई धर्म नहीं होता। हम झूठ बोलते है। उसे धर्म ही वैचारिक प्रतिबद्धता देता है और धर्मानुयाई शरण और वे ही उसका महिमामंडन भी करते हैं।

punjab kesri

Sunday, 10 September 2017

अज्ञानी व अनैतिक मीडिया देश के सम्यक सोच के लिए घातक


स्वस्थ जन-संवाद को कुंठित करते ये न्यूज़ चैनल 
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कोई दस साल पहले जब प्राइम-टाइम स्लॉट को बाबा, भूत-भभूत और “एलियन” के शिकंजे से छुडा कर स्वस्थ स्टूडियो –डिस्कशन की ओर लाया गया तो उद्देश्य था जन-संवाद के धरातल में लोकोपयोगी मुद्दे लाना. अपेक्षा थी कि एंकर उस मुद्दे पर यथासंभव जानकारी अपनी रिसर्च यूनिट से हासिल कर पूरी तरह सत्य के निकट पहुँचने की कोशिश करे, याने पक्ष-विपक्ष दोनों पहलू से समाज को अवगत कराएगा. राजनीतिक संवाद में पार्टियों के प्रमुख लोग होंगे और सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक या अन्य मामलों में उस विषय के प्रतिनिधि व जानकार और स्वतंत्र विश्लेषक जिनकी जानकारी और निरपेक्ष तर्क-शक्ति विषय को ट्रैक पर रखेगी.

यह प्रयास दो कारणों से किया गया. पहला: घटिया विषय-वस्तु देने से समाज में मीडिया और खासकर एडिटरों को छवि काफी गिरने लगी थी और दूसरा: प्रजातंत्र के बेहतर संचरण के चार मूल तत्व होते हैं ; (१) बहुमत का शासन, (२) अल्प-संख्यकों के अधिकार की रक्षा, (३) संवैधानिक शासन पद्धति और (४) विमर्श से शासन क्योंकि  चुनाव जीत कर सरकार चलाना कोई साइकिल स्टैंड का ठेका लेना नहीं है और सरकार से उसके कार्यों का हिसाब लगातार लेना, जन-विमर्श के जरिये उसे अमुक कार्य करने या न करने के लिए उद्दत करना और अगले चुनाव में उसे ख़ारिज करने या फिर बहाल करने का भय बनाये रखना इसी विमर्श का हिस्सा होता है। और इसी अवधारणा के कारण मीडिया की भूमिका स्वस्थ प्रजातंत्र में अपरिहार्य मानी जाती है.

स्टूडियो डिस्कशन के जरिये हमारा प्रयास था कि सार्थक मुद्दों पर बहस के माध्यम से दर्शकों को दोनों पक्ष के तथ्य दे दिए जाएँ और फिर उन्हें जन-विमर्श के धरातल पर छोड़ दिया जाये ताकि अगले दिन सुबह चाय की दूकानों, कार्यालयों और अन्य विमर्श के “कोनोँ” इसे लोग डिस्कस करें और प्रजातंत्र की जड़ें अतार्किक, अवैज्ञानिक व भावनात्मक मुद्दों के बाढ़ में बह न जाएँ. साथ हीं चूंकि भारत सरीखे परम्परागत देश में वैज्ञानिक सोच लाने के लिए कोई क्रांति हुई हीं नहीं (जो हुई वह गलत या सही संविधान में हीं कैद रह गयी जैसे दलित प्रताड़ना व जातिवाद से छुटकारा, भ्रष्टाचार उन्मूलन, सम्प्रदायवाद के दंश से मुक्ति) लिहाज़ा डिस्कशन का एक बड़ा फायदा यह होता कि समाज की तर्क-शक्ति बेहतर होती और वह भाव-शून्य और तथ्य पर आधारित सोच विकसित करता.

लेकिन कुछ हीं वर्षों में यह सब कुछ पटरी से उतर गया और उद्देश्यों के ठीक उल्टा होने लगा. एडिटर को लगा कि इसमें देश-व्यापी पहचान बनती है, सत्ता सीधे प्रभावित होती है और उसकी फेस-वैल्यू उसे तनख्वाह आसमानी करवाने में मदद करती है. लिहाज़ा चेहरा रंगा-पोतवा कर वह हर शाम घंटे –दो घंटे की कवायद को अपनी पत्रकरिता की “गणेश-पूजा” मानने लगा. भूत-भभूत, बाबाओं और “गाय ले जाने वाले आकाशीय एलिएंस" दिखाने से अभी-अभी छूटे इन संपादकों को पढ़ने की आदत नहीं रही लिहाज़ा शाम के “डिस्को” के लिए विषय का चुनाव भी राधे-माँ, आसाराम और “दो के बदले दस सिर” से ऊपर नहीं बढ़ पाया. दरअसल इसमें संपादक-एंकर महोदयों को पढ़ना नहीं होता. खाली हांफ-हांफ कर राष्ट्रवाद में तनमन न्योछावर करने के भाव में आना होता है. अंग्रेज़ी चैनल के एक संपादक ने तो “राष्ट्रवाद” को अपनी पत्रकारिता का अपरिहार्य गुणक बता कर अपने को बौद्धिक ईमानदारी का अलमबरदार बताना शुरू किया। तमाम हिंदी चैनलों के युवा एंकर –एडिटरों ने इस स्टाइल को यथावत अंगीकार कर लिया. राष्ट्रवाद को लेकर वही गुस्सा, गैर-भाजपाइयों और गैर हिंदुवादी पैनालिस्टों को खासकर कांग्रेस के प्रवक्ताओं को अ-राष्ट्रवादी मानते हुए इन एंकर –एडिटरों  द्वारा बाकि का काम तथाकथित “राष्ट्रवादी पेनलिस्टों पर छोड़ देना जो अगले पांच मिनट में अपने “प्रतिद्वंदियों” पाकिस्तान भेजने की बात कह कर अपने को विजयी घोषित कर लेगा इस नये फ़ॉर्मेट की बुनियाद बन गया।  इसमें न तो एंकर-एडिटर महोदय को पढ़ने की जरूरत है न हीं दलों से जुड़े पैनालिस्टों को. बस आवाज बुलंद (लंग  पॉवर से) और बदतमीज़ी की हद तक दूसरे को न बोलने देने की सलाहियत हीं तो चाहिए. “तेरा नेता बनाम मेरा नेता” का लाभ यह है कि प्रवक्ता दिल्ली बैठे शीर्ष नेतृत्व की नज़रों में चढ़ जाता है और कई बार मंत्री पद से नवाज़ दिया जाता है या राज्य-सभा में जगह मिल जाती है.

राम रहीम मुद्दे पर दिन रात वह तहखाना दिखाया जा रहा है जिसमें इन लालबुझक्कडों के अनुसार बाबा सुरंग से लड़कियों को मंगवाता था बलात्कार करने के लिए. इन में से कई संपादकों के चैनलों में हाल हीं में यह बाबा इन्हीं संपादकों को अपनी फ़िल्म प्रोनोशन के लिये इन्टरव्यू दे चुका है। लेकिन तब इन संपादकों को बाबा नैतिकता की प्रतिमूर्ति लगा। किसी एंकर-एडिटर ने इस बात पर चर्चा नहीं की कि कैसे देश में पारम्परिक व औपचारिक धार्मिक आर्डर ख़त्म हुए या जातिवाद , छुआछूत को प्रश्रय देते रहे जिसकी प्रतिक्रिया में कमज़ोर और अज्ञानी वर्ग इन बाबाओं के चंगुल में फंसता गया; इसमें सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों और बाज़ार की ताकतों और सत्ता-बाबा गठजोड़ की क्या भूमिका थी? संविधान में संशोधन करके सन १९७६ से  “वैज्ञानिक सोच विकसित करना” हर नागरिक का कर्तव्य माना गया लेकिन क्या सरकार ने इसके लिए कोई फण्ड या विभाग या कोई अन्य उपक्रम किया. या फिर किसी मीडिया हाउस ने क्या कभी इसके लिए कोई अभियान चलाया. बाबा से हम विज्ञापन लेते रहे और जब “फंस” गया तो उसके “बेड-रूम” की अय्याशी हफ़्तों-दर-हफ़्तों दिखाने लगे. कहाँ है जरूरत पढने की? एक और उदाहरण  लें. कुछ हफ्ते पहले देश के स्वास्थ्य को लेकर सरकार की एक विस्तृत रिपोर्ट आयी. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एन ऍफ़ एस एच) की यह चौथी रिपोर्ट है (तीसरी सन २००७ में आयी थी). इतनी वृहद् रिपोर्ट जिसमें देश के हर जिले में स्वास्थ्य की कितनी बुरी स्थिति है पर प्रमाणिक व्योरा था. पढने पर पता चला कि देश में स्वास्थ्य की स्थिति बेहद खराब है. क्या इन “सर्वज्ञं” एंकर-एडिटरों को इस पर जन-विमर्श तैयार नहीं करना चाहिए था7th ?  लेकिन इसके लिए इनको कई दशकों तक पढ़ना पड़ता तब इस टॉपिक का महत्व समझ पाते. लिहाज़ा शाम को ये फिर “किसी बाबा के बेड –रूम “ में घुस गए. जाहिर है जब संपादक महोदय न्यूज़ रूम में ऐसे टॉपिक का चुनाव करेंगे तो रिपोर्टर खबर लायेगा “बाबा रोज शाम को काम-शक्ति वर्धक दावा खाता था”. दो दिन पहले एक प्रमाणिक रिपोर्ट में बताया गया कि भारत में लगातार गरीब-अमीर खाई बढ़ रही है (जिन्नी गुणक) के पैमाने पर. तमाम अंतर-राष्ट्रीय संस्थाएं लगातार चीख-चीख कर बता रही हैं कि भारत का आर्थिक मॉडल गलत है और इसमें गरीब और गरीब बन रहा है और अमीर और अमीर. लेकिन क्या आपने एक दिन भी कोई चर्चा सुनी है? कारण ? एंकर महोदय को पढ़ना पडेगा. मीडिया में लाखों रुपये महीने की तन्खवाह, रातों-रात सेलेब्रिटी बन कर बे –पनाह “पहचान” , हर शाम महज घंटे-दो घंटे के लिए राष्ट्रवाद या “बाबा की ऐय्यासी”  को लेकर गुस्से के भाव ने भारत के सार्थक  जन संवाद को कहीं दूर फेंक दिया है.
इनमें से एक अपेक्षाकृत बेहतर वसूलों वाले संपादक का बचाव सुनिए: “संपादक कोई प्रोफेसर थोडे न होता है. १३ घंटे काम करता है. अगर वह ऑफिस में संविधान और गूढ़ रिपोर्ट पढेगा तो चैनल चल चुका.” शायद उसे नहीं मालूम था कि संपादक प्रोफेसर से ज्यादा पढता है और तब जब समाज से सम्मान मिलता है वह अलग होता है. पंडित भीमसेन जोशी और मीका में अन्तर समझना होगा।    

Jag

Wednesday, 6 September 2017

मेडिकल रिसर्च: अधकचरे ज्ञान की मार्केटिंग दुनिया के लिए ख़तरा



घी या मक्खन कम खाना दिल के लिए नुकसानदायक : नया अध्ययन 
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“दिल मजबूत रखना हो तो वसा का सेवन बढाएं, कार्ब कम करें”
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कौन देगा हिसाब ४० साल में दुनिया के करोड़ों लोगों की मौत का ?

पिछले महीने की २९ तारीख को प्रस्तुत एक अध्ययन ने चिकित्सा की दुनिया में खलबली मचा दी है. पिछले ४० साल से बनी अवधारणा जिसका पूरे विश्व के डॉक्टरों ने और समाज ने ध्रुव -सत्य समझ कर पालन किया वह गलत साबित हुई है. नये अध्ययन के मुताबिक कम वसा खाने से दिल की बीमारियों (सी वी डी) का ही नहीं कई अन्य बीमारियों का ख़तरा भी ज्यादा होता है साथ हीं ज्यादा कार्बोहाइड्रेट युक्त भोजन भी इस खतरे को बढ़ाता है. अब तक दुनिया के डॉक्टर यह बताते थे कि ज्यादा “फैट” (घी, मक्खन, तेल, सूखे मेवों आदि से मिलने वाले तीन प्रकार के वसा) के सेवन से दिल की बीमारियों का सीधा समानुपातिक रिश्ता है. गदक्षिण एशियाई देशों खासकर भारत के खानपान को लेकर हुए इस अध्ययन के भाग में माना गया है कि गरीब वर्ग जो उर्जा के लिए अधिक मात्र में अनाज का सहारा लेता है  और जो आर्थिक कारणों से घी-तेल का सेवन नहीं कर पाता वह दिल की बीमारियों के साथ-साथ अन्य बीमारियों को भी जन्म देता है.  

यह व्यापक अध्ययन पांच महाद्वीपों के उच्च, माध्यम और निम्न आय वाले १८ देशों के १३५३३५ लोगों पर कनाडा के हैमिलटन -स्थित म्क्मास्टर यूनिवर्सिटी के पापुलेशन हेल्थ रिसर्च इंस्टिट्यूट के शोधकर्ताओं की टीम ने “प्योर” ( प्रोस्पेक्टिव अर्बन-रूरल एपिड़ेमोलोजी) अध्ययन कार्यक्रम के तहत किया गया. इस रिपोर्ट को पिछले माह के अंतिम सप्ताह स्पेन के बार्सिलोना में हुए यूरोपियन सोसाइटी ऑफ़ कार्डियोलॉजी कांग्रेस में जब प्रस्तुत किया गया तो पूरे विश्व के चिकित्सा वर्ग में चर्चा का एक तूफान सा आ गया है. तमाम देशों से अपील की जा रही है कि वे भोजन के लेकर अपने गाइडलाइन्स को बदलें और डॉक्टरों से भी अपनी चार दशक पुरानी मान्यताओं को तिलांजलि देने को कहा जा रहा है.

चिकित्सा विज्ञानं के अनुसार व्यक्ति को ऊर्जा जिन तीन पदार्थों से मिलती है वे हैं --- कार्बोहायड्रेट, फैट और प्रोटीन. दुनिया के तमाम बड़े देशों ने अपने यहाँ कम वसा और ज्यादा “कार्ब” को प्रोत्साहित करने के लिए कानून बनाये थे. ब्रिटेन के नेशनल हेल्थ सर्विस (एन एच एस) के वेबसाइट पर दिएगये देशवाशियों के सन्देश में भी आज भी दिखाई देता है “वसा का सेवन किसी भी कीमत पर ३० प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए और उसकी जगह स्टार्च-युक्त कार्बोहाइड्रेट्स (अनाज) का अनुपात अधिक होना चाहिए”. 

उधर इस अध्ययन दल के अगुवा डॉ महशिद देहघन ने इस नए अध्ययन पर बोलते हुए  कहा “ शरीर के लिए आवश्यक ऊर्जा के लिए ६० प्रतिशत से अधिक कार्बोहायड्रेट का सेवन दिल हीं नहीं कैंसर व डिमेंशिया सरीखे कई घातक बीमारियों को बढ़ाता है. इसे १० प्रतिशत कम करने के साथ वसा के सेवन (जिसमें सैचुरेटेड वसा जैसे घी और मक्खन भी हैं) बढ़ाया जाना बेहतर विकल्प है”.

इसे भारतीय निम्न व मध्यम वर्गीय खान-पान के अनुरूप इस तरह समझा जा सकता है। आप तीन रोटी खाते है फिर चावल और दाल भी लेते है और फिर आपकी पत्नी या माँ एक रोटी और खाने का इसरार करती है। अब उन्हे यह कहना होगा कि रोटी एक हीं खाओ पर घी लगी और साथ में सब्ज़ियाँ, सलाद और सस्ते फल का सेवन बढ़ा दो।

नए अध्ययन के अनुसार दिल की बीमारियों के अलावा डीमेंशिया (भूलने की बीमारी,) कैंसर आदि भी पुरानी अवधारणा –जनित खान –पान से बढ़ने के संकेत मिले हैं.

ब्रिटेन के जाने –माने हृदय चिकित्सक प्रोफ जेरमी पीअरसन ने इस शोध पर प्रतिक्रिया में कहा कि ब्रिटेन के स्वास्थ्य विभाग को जनता के लिए दी गयी अपनी खाद्य सम्बंधित एडवाइजरी में अमूल-चूल परिवर्तन करना होगा. इस अध्ययन के बाद हमें अपने कार्बोहायड्रेट की मात्र पर न कि वसा की मात्र पर अंकुश लगाना  होगा”. लगभग यही विचार ब्रिटेन के हीं एक अन्य प्रसिद्द कार्डियोलॉजिस्ट असीम मल्होत्रा ने व्यक्त करते हुए कहा “यह सही वक्त है कि दुनिया अपनी अब तक की अपनी अवधारणा में यू-टर्न ले और जिस वसा को “अछूत” समझना बंद करे”.

डॉ देहघन के अनुसार हम यह मानते आये हैं कि कुल वसा और खासकर सैचुरेटेड फैटी एसिड (जो घी मक्खन से मिलता है) को कार्बोहायड्रेट और अनसैचुरेटेड फैट से विस्थापित करने से एलडीएल कोलेस्ट्रोल कम किया जा सकता है और जिससे दिल की बीमारियाँ कम होंगी. यह अवधारणा केवल यूरोपीय लोगों के खान पान को देख कर हीं बनाई गयी. लेकिन दक्षिण एशिया के लोग गरीबी के कारण एक अलग किस्म का भोजन करते हैं जिसमें वसा की मात्र कम होती है और यह कमी जानलेवा होती है. साथ हीं पुराने अध्ययन में यह बात शामिल नहीं कि अगर वसा एलडीएल कोलेस्ट्रोल बढ़ता है तो साथ हीं एच डी एल (अच्छा कोलेस्ट्रोल) भी बढ़ाता है नतीजतन दोनों का अनुपात समान रहता है.

डा देहघन की टीम के अनुसार एल डी एल कोलेस्ट्रोल (जो कि खान –पान नियमन का मूल आधार है) वसा का दिल की बीमारियों पर क्या प्रभाव होता है , जानने के लिए विश्वसनीय कारक नहीं है. इसकी जगह एपीओबी (अपोलिपोप्रोटीन बी) और एपीओए-१ (अपोलिपोप्रोटीन ए-१) के अनुपात को आधार माना  जाना चाहिए था.  

प्रश्न है रिसर्च की विश्वसनीयता क्यों नहीं ?
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यहाँ प्रश्न यह उठाता है कि अगर पुरानी अवधारणा गलत थी तो क्यों सैकड़ों गलत या अधकचरे निष्कर्षों की बुनियाद पर पूरी दुनिया के लोगों को चार दशकों से मौत के मुंह में झोंका जा रहा है. क्यों यूरोप के लोगों और उनके खान-पान पर किये गए अध्ययनों को मानने के लिए भारत सरीखे गरीब मुल्कों के लोगों को मजबूर किया जाता रहा है?  कौन देगा हिसाब उन करोड़ों मौतों का जो गलत अवधारणा के कारण विश्व समुदाय ने झेली हैं?      

क्या आज सही समय नहीं है कि या तो विश्व स्वास्थ्य संगठन के स्तर पर नियम बनाये जाएँ कि चिकित्सा शोध तभीं जन-प्रयोग में लाये जाएँ जब व्यापक नमूनों को जो विश्व के हर भाग, संस्कृति , आर्थिक वर्ग के आधार पर लिए गए हों और जिन पर दीर्घ काल तक प्रयोग करके के किसी वैश्विक मानक संगठन द्वारा सत्यापित किये गए हों.        

lokmat

Sunday, 27 August 2017

आस्था और राजनीति का आपराधिक गठजोड़


क्या आज भी एक वर्ग की सोच आदिम सभ्यता वाली ही है ? 

डेरा सच्चा सौदा के मुखिया बाबा राम रहीम के खिलाफ बलात्कार के मामले में फैसला आने के मात्र २४ घंटे पहले हरियाणा के शिक्षा मंत्री राम बिलास शर्मा ने मीडिया को बताया "जाब्ता फौजदारी (सी आर पी सी) की धारा १४४ डेरा के अनुयाइयों पर लागू नहीं होती. वे तो हमारी सरकार के अतिथि हैं जिनके लिए भोजन-पानी की व्यवस्था हमारा दायित्य है. ये तो इतने शांतिप्रिय लोग हैं कि ये एक पत्ता भी नहीं तोड़ सकते ”. मंत्री ने सन २०१४ में हुए विधान-सभा चुनाव में जीत के बाद मंत्री पद की शपथ में कहा था “मैं भारत के संविधान में सच्ची श्रद्धा व निष्ठा रखूंगा”. १५६ साल पुरानी इस धारा में “किसी भी व्यक्ति” (अर्थात किसी को छूट नहीं) लिखा है. राज्य सरकार इस केंद्र के कानून में कोई संशोधन नहीं कर सकती. इस मंत्री सहित राज्य के तीन मंत्रियों ने डेरा को कुल एक करोड रुपये का अनुदान दिया है जिसमें इस मंत्री द्वारा पिछले माह दिया गया ५० लाख का अनुदान भी शामिल है. प्रजातंत्र का दुर्भाग्य यह है कि अदालत द्वारा बाबा को बलात्कारी करार देने के कोर्ट के फैसले से गुस्साये लाखों “शांतिप्रिय अनुयाइयों” द्वारा की गयी हिंसा रोकने में असफलता के आरोप में पंचकुला के पुलिस उपाधीक्षक को निलंबित किया गया.  

बताया जाता है कि जब विधान सभा का चुनाव हो रहा था तो उस दौरान भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेताओं ने बाहों पर टैटू बनवाये इस आधुनिक बाबा से मदद मांगी और बाबा ने सार्वजनिकरूप से आशीर्वाद के रूप में समर्थन की घोषणा की. इसके पहले कांग्रेस और इनेलो रात के अँधेरे में यह सब करती थी और बाबा भी गुपचुप रूप से अनुयाइयों को आदेश देते थे. यह २०१४ के चुनाव में पहली बार हुआ कि किसी राजनीतिक दल ने सार्वजानिक रूप से इस डेरा से मदद माँगी और बलात्कार और हत्या के आरोपी इस मॉडर्न बाबा ने उतने हीं सार्वजनिकरूप से मदद का ऐलान भी किया. इसके बाद पार्टी के एक केन्द्रीय नेता के साथ ४४ पार्टी प्रत्याशी बाबा के यहाँ मदद के मदद की औपचारिक याचना के लिये गए. जीतने वाले ४४ प्रत्याशियों में १९ बाबा के मदद के बगैर शायद न जीत पाते लिहाज़ा ये सभी सार्वजानिक रूप से बाबा के यहाँ सजदा करने जाने लगे. इनमें पार्टी के राज्य इकाई के अध्यक्ष भी हैं. मंत्रियों में होड़ लगी कि कौन कितना अनुदान दे सकता है. इसकी परिणति मंत्री के इस बयान से हुई कि बाबा के अनुयाई पर दफा १४४ लागू हीं नहीं होती. जाहिर है यह दफा निष्प्रभ रही और लाखों लोग (अनुयाइ) पंचकुला में हिंसा का तांडव कर सके. उन्हें मालूम था बाबा के हाथ कितने लम्बे हैं. देश के ३६ वी आई पी लोगों में राम रहीम भी है जिसे “जेड” केटेगरी की सुरक्षा हमारे –आपके पैसों से दी गयी है और हमारे आप के पैसों से हीं बाबा अपनी प्राइवेट आर्मी भी रखता है.  

बाबा जब अपनी गुफा में किसी साध्वी” से बलात्कार करता था और वह विरोध करती थी तो बाबा इसी “लम्बे हाथ” से डराता था. यह बात उस साध्वी ने अदालत को बताई. जाहिर है अगर मंत्री से लेकर मुख्यमंत्री बाबा के यहाँ जा कर सजदा करेंगे तो उस बाबा को यह बात बताने की ज़रुरत भी नहीं है. राज्य और जिले का प्रशासन घास खाए नहीं बैठा रहता है उसे मालूम है नए माहौल में कानून के नहीं बाबा के हाथ लम्बे हैं और उन हाथों की पहुँच ऊपर याने दिल्ली तक है. आरोप लगाने की हिम्मत ( या हिमाक़त ) करने वाली यह साध्वी क्यों नहीं समझ पाई इस बात को जो बड़े बड़े आई ए एस और आई पी एस हीं नहीं मंत्री और मुख्यमंत्री सरकार बदलने के २४ घंटों में हीं समझ गए?
  
लेकिन इस साध्वी को वह “ब्रह्मज्ञान” नहीं था जो अन्य को था. लिहाज़ा उसने सन २००२ में प्रधानमंत्री और हाई कोर्ट को एक गुमनाम चिट्ठी लिख कर बाबा द्वारा बलात्कार की बात लिखी. हाई कोर्ट ने संज्ञान लिया और पहले जिला जज से जांच कराई जिसमें बाबा की इन हरकतों की तरफ काफी संकेत थे. हाई कोर्ट ने इस रिपोर्ट के बाद सी बी आई जांच के आदेश दिए. हाई कोर्ट को मालूम था कि राज्य सरकार के लोगों का “ब्रह्मज्ञानं” कैसा है जो वोट के लालच में दफा १४४ को भी पुनर्परिभाषित कर देता है.    
लेकिन इन ब्रह्मज्ञानियों के प्रभाव के कारण (जिसमें कांग्रेस और इनेलो के सरकारें थीं) अगले पांच साल याने सन २००७ तक सी बी आई को केस में जांच करने से रोक रखा था. लेकिन अदालत का फिर दबाव आया और तब सी बी आई के जिस अधिकारी को यह केस दिया गया वह भी साध्वी की तरह “ब्रह्मज्ञान” में कमज़ोर था. इस अधिकारी एम् नारायणन का (जो अब रिटायर्ड हो चुके हैं) कहना था कि जैसे हीं यह केस मुझे सौंपा गया मेरे एक अधिकारी मेरे पास आ कर बोले “यह केस तुम्हें इसलिए दिया जा रहा कि तुम क्लोज़र रिपोर्ट लगा दो (अर्थात बाबा को क्लीनचिट). यही दबाव कई ऊपर के अफसरों और राजनेताओं की तरफ से भी आया। अधिकारी ईमानदार था लिहाजा ब्रह्मज्ञान की कमी थी. उसने अगले दो सालों में जबरदस्त छानबीन करके इस केस को अंजाम तक पहुँचाया. इस बीच बाबा पर इस बात का भी मुकदमा चलने लगा कि इसके गुर्गों ने अपने मैनेजर को जो गवाह था मरवा दिया है.

बाबा के बलात्कार की शिकार दो आरोपी महिला भक्तों ने अदालत में अपने बयान में कहा कि “बाबा के गुफे की खुफिया दुनिया में औरतें (भक्तिन) हीं सुरक्षा गार्ड होती हैं और बाबा के बलात्कार को उस दुनिया में “पिता जी की माफी” कही जाती है. याने जिस औरत से अमुक दिन बलात्कार करना होता था उस दिन उस औरत से कहा जाता था कि आज तुम्हे “पिता जी की माफी मिलेगी”. इस आरोपी साध्वी के साथ तीन दिन “पिता जी की माफी” चलती रही और चलते-चलते बाबा ने अपने प्रभावी लम्बे हाथ की धमकी भी दी और साथ हीं अपने को भगवान् बताया. याने आरोपी को लालच और डर दिया गया कि पिता जी की माफी लेती रहो और पिताजी रुपी भगवान् तुम्हे इस माफी के साथ कहाँ से कहाँ पहुंचा देंगे नहीं. कुछ भक्तों और भक्तिनों को शायद यह ब्रह्ज्ञान भा गया. यह अलग बात है कि इस ५० वर्षीय मॉडर्न जीवन और फिल्म बनाने  के शौक़ीन बाबा ने अदालत में आरोप को निराधार बताते हुए कहा कि वह नपुंसक है हालांकि वह शादी –शुदा है और उसकी दो बेटियां हैं.  

डेरा सच्चा सौदा के वेबसाइट पर इस संगठन को “आध्यात्मिक” बताया गया है. 

समझ में नहीं आता कि अध्यात्म गलत है कि “पिता जी की माफी” देने की उदारता; या फिर राजनेताओं और अधिकारियों का “ब्रह्मज्ञान” या फिर उन दो साध्वियों सहित सी बी आई जांच अधिकारी की बगावत जिसने "माफी" के घिनौना क्रृत्य के खिलाफ आवाज़ उठाई और फिर जांच में हकीकत बताई या या फिर हाई कोर्ट जज जिसने जाँच के आदेश दिये और सी बी आई कोर्ट जिसने बाबा को बलात्कारी करार दिया या अंत में वे लाखों भक्त जो आज भी सत्य को न समझ कर हिंसा के जरिया जाने –अनजाने में “पिता जी की माफी” प्रक्रिया को बहाल रख कर अपनी हीं परिवार के बेटियों और पत्नियों को उस कामुक गुफे की आग में झोंकना चाहते हैं.  

lokmat

Saturday, 26 August 2017

क्यों न समाज अपने हीं भीतर से सुधार का भाव पैदा करे ?


९० साल पहले भी महिलाएं बाल विवाह के खिलाफ खडी हुई थी
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“अगर आज तुम इस विधेयक (सारदा बिल) का विरोध करते हो तो पूरा विश्व तुम पर हंसेगा”. कोई ८८ साल पहले तख्ती हाथ में लिए और नारे लगाते सैकड़ों औरतें भारत में बाल विवाह की कुप्रथा के खिलाफ धर्मं के पोंगापंथी और कट्टर ठेकेदारों को जगा रही थी. जगह थी सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली (आज का संसद) भवन का गेट. ये महिलाएं जिनमें मुसलमान औरतें भी थी,अखिल भारतीय महिला संगठनों ---आल इंडिया वीमेंस कांफ्रेंस, वीमेन’स इंडियन एसोसिएशन और नेशनल कौंसिल ऑफ़ वीमेन इन इंडिया) ---- के बैनर के तले सदियों पुरानी बाल विवाह की कुप्रथा के खिलाफ आन्दोलन कर रही थी. इन्हीं महिलाओं ने उसी साल जून माह में भी जोशी समिति के सामने उपस्थित होकर अपनी बात रखी थी. उधर पिछले पांच साल से असेंबली के कट्टरपंथी सदस्य बाल विवाह की उम्र (और शारीरिक सम्बन्ध के सहमती की उम्र) को मात्र १४ साल करने के लिए ब्रिटिश हुकूमत और प्रगतिशील सोच वाले हिन्दू नेताओं के प्रयासों को यह कह कर ख़ारिज कर रहे थे कि इससे धर्म की मूल भावनाएं आहत होंगी.  

अगर मुसलमान नारी शक्ति आज इस्लाम में १४०० साल में पहली बार सुधार (रिफॉर्म्स) की प्रक्रिया के लिए तन कर खडी हुई है और सफलता हासिल की है तो आज से ९० साल पहले भी इसी नारी शक्ति ने बाल विवाह की कुप्रथा के खिलाफ कुछ ऐसा हीं कर दिखाया था नतीजतन ब्रिटिश सरकार को पोंगापंथी हिंदुवादियों और कट्टर मुल्लाओं के भारी विरोध के बावजूद बाल विवाह निरोधक अधिनियम जिसे सारदा एक्ट के नाम से जाना जाता है, २८ सितम्बर, १९२९ को पारित किया. लेकिन प्रश्न यह है कि क्या बाकि समाज को इसमें पहल नहीं करनी चाहिए थी? बड़ा अजीब लगता है जब देश की सर्वोच्च अदालत धर्म, उससे जुड़े परम्पराओं और पद्धतियों के सत्य और औचित्य को दो के मुकाबले तीन से निर्णित करती है. क्या धर्म के अनुयायियों में वह कूवत नहीं है कि वे और धार्मिक अधिष्ठान खुद ये फैसले लें? अगर देश की न्यायपालिका और विधायिका को यह काम करना पड़े तो कमी किसकी मानी जायेगी ? क्या इससे यह सिद्ध नहीं होता कि धर्म के ठेकेदार आदतन यथास्थितिवादी होते हैं (चाहे वे परंमपराएंं ईश्वरीय मूल सिद्धांतों के खिलाफ हो और कई मामलों में अमानवीय हो) क्योंकि बदलाव से उनकी दूकाने खतरे में आ जाती हैं?

बात २३ मार्च, सन १९२५ की है. सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली में बाल विवाह को कट्टरपंथियों के डर से न छेड़ते हुए शादी -शुदा दंपत्ति की शारीरिक संबंधों की उम्र न्यूनतम १४ साल करने संबंधी विधेयक पर विचार हो रहा था. दक्षिण राज्य के एक ब्राह्मण सदस्य ने धमकी भरे स्वर में कहा : हमारे धर्म और सामाजिक परम्पराओं के तहत जो स्थान महिलाओं का है वह दुनिया के किसी धर्म , सभ्यता और संस्कृति में नहीं है. हमारी महिलाओं को जब वे दूधमुंही बच्ची होती हैं बताया जाता है कि उनके लिए उनका पति धरती पर उनका भगवान् होता है. अगर दुनिया के सभी समाज-सुधारकों को एक गठरी में बांध कर उनके महिला कल्याणकारी योजनाओं को तौला जाये तो पति का अकेला कार्य उस भारतीय पत्नी के लिए बड़ा होता है. आपको (याने अंग्रेजों शासकों को) क्या अधिकार है कि शादी के पवित्र बंधन रुपी हमारी इस उत्तम और प्राचीन परम्परा में हस्तक्षेप करें? इस कानून का उद्देश्य क्या है? क्या अाप हमारी महिलाओं को मजबूत और बच्चों को बेहतर व्यक्तित्व देना चाहते हैं? ध्यान रखिये कि ऐसा प्रयोग करने में आप और बुराइयों को जन्म देंगें. मैं प्रार्थना करता हूँ कि आप कृपया हिन्दुओं के घरों को बर्बाद न करें. लगभग ऐसा हीं भाव अन्य दर्जनों सदस्यों ने व्यक्त किया और तब विधेयक पारित नहीं हो सका था। 

उस समय के आंकड़ें बताते हैं कि हर साल देश में ३२ लाख औरतें प्रसव पीड़ा में मर जाती थी क्यों कि दस या १२ साल में उनका शरीर बच्चे पैदा करने के लिए तैयार नहीं होता था. यह संख्या प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटेन, फ़्रांस , बेल्जियम , इटली और अमेरिका में मारे गए लोगों से ज्यादा थी. दूसरा नतीजा यह था अधिकांश बच्चे जन्म के दौरान या कुछ दिनों में या तो मर जाते थे या पूरी जिन्दगी कमजोर रहते थे और देश की नस्ल की नस्ल खराब हो जाती थी. पति भी कम उम्र में सेक्स के अाधिक्य  के कारण जल्दी हीं काल के ग्रास बनते थे. औसत आयु मात्र २८ साल होती थी. स्वयं गाँधी ने अपने पत्र यंग इंडिया में
और अपनी आत्म-कथा में बड़े हीं दुःख से जिक्र किया है. स्वयं गाँधी की शादी १४ साल की अवस्था में हुई थी और बक़ौल उनके वह दाम्पत्य क्रियायों में शामिल हो गए थे.

                  धर्म में सुधार के तत्व
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इसके ठीक विपरीत ईसाई धर्म में सुधार को लेकर कठमुल्लाओं के खिलाफ आवाज उठी. सन १५१७ में मार्टिन लूथर ने अपने ९५ प्रश्नों के जरिये  धार्मिक आर्डर --पादरी से लेकर पोप तक--को चुनौती दी. उनका कहना था ईसाई खुद बाइबिल पढ़े न कि पादरी के जरिये धर्म को समझें. नतीजा यह हुआ कि धार्मिक पदों पर बैठे लोगों और परिवर्तन के हिमायतियों के बीच भयंकर मार-काट करीब १५० साल चली. ईसाई धर्म अनेक और परस्पर विरोधी शाखाओं में बंटा. और आज धर्म ने एक उदारवादी सोच अख्तियार किया क्योंकि अनुयायियों ने स्वय धर्म ग्रन्थ पढ़ कर जो अंश समय के अनुरूप नहीं था उसे नज़रअंदाज किया और जो समयानुकूल था उसे ग्रहण किया.  

भारत में भी हिन्दुओं ने अपने को बदला. सती- प्रथा जैसी कुरीति के खिलाफ लार्ड विलियम बेंटिंक ने १८२९ में राजा राम मोहन राय की मदद से कानून पारित किया हालाकिं कट्टर पंथी हिन्दू राजस्थान में अगले डेढ़ सौ वर्षों तक इस कुप्रथा पर टिके रहे और हिन्दू औरतें पति के मरने पर चिता पर जलती रही या जलाई जाती रहीं.

सर्वोच्च न्यायलय के ताज़ा फैसले से देश में पहली बार इस्लाम के नाम पर जारी एक बेहद अमानवीय कुप्रथा –एक बार में मुसलमान पति द्वारा तीन तलाक कह कर औरत को घर से बाहर का रास्ता दिखाना --ख़त्म हुआ है. और इसका भी श्रेय मुस्लिम महिलाओं को जाता है जो इस कुप्रथा के दंश को झेल रहीं थीं. लेकिन अभी इस लड़ाई में और लोगों को खासकर आधुनिक और मानवीय सोच वाले पुरुषों को भी शामिल होना होगा. जाहिर हैं धर्म के ठेकेदारों को यह नागवार गुजरेगा जैसे बाल विवाह और सती –प्रथा को लेकर हिन्दू कठमुल्लाओं ने प्रारंभिक दौर में किया था.

lokmat

Thursday, 17 August 2017

हमने प्रजातंत्र माने "अपना" समझा, सबका नहीं !


१५ अगस्त, १९४७ के सुबह की बात है. देश आजादी का जश्न मना रहा था. हल्की बारिश हो रही थी. वाराणसी के पास एक छोटा रेलवे स्टेशन था ---कोढ़ रोड, जिसे आज ज्ञानपुर कहते हैं. उस स्टेशन के सहायक स्टेशन मास्टर फुन्नन सिंह भी अति-उत्साह में टेबल पर बैठे थे. ट्रेन आने का टाइम हो गया था. लेकिन एक भी आदमी टिकट लेने नहीं आया. फुन्नन सिंह अचम्भे में कार्यालय से बाहर निकले तो देखा कि सैकड़ों लोग प्लेटफार्म पर खड़े हैं. उन्होने चिल्लाकर कहा,”अरे भाई टिकट ले लो ट्रेन आने वाली है”. भीड़ का जवाब था, “अरे, अब किस बात का टिकट. अब ये अंग्रेजों की ट्रेन थोड़े ना है. आज से ये हमारी ट्रेन है”.  

दरअसल ७० साल की आज़ादी और तज्जनित प्रजातंत्र में हमने “अपना ट्रेन तो समझा हीं, ट्रेन में लगे गद्दे की रेक्सीन भी काट कर अपने लिए झोले बनाना शुरू किया. सार्वजानिक सड़क के किनारे लगी ईंटों को घर में ला कर दीवार खडी की इस भाव से “सर्व” तो “स्व” का हीं विस्तार मात्र है. फिर “अपनी जाति” और “अपने”  समुदाय के लोगों को अपने पर शासन करने भेजा. चूंकि सबकुछ “अपना” था तो किसी लालू यादव ने उसी “जनभावना” को आगे बढाते हुए “अपने” लोगों को ठेका दिया. फिर उन “अपनों” ने उन्हें जमीन लिख डाली. और फिर शुरू हुआ अब्राहिम लिंकन के मशहूर सिद्धांत का अमल -- “अपनों” का, “अपनों” के लिए , “अपनों” द्वारा नाभि-नाल भ्रष्ट रिश्ता जिसने प्रजातंत्र की स्थापित अवधारणाओं की चूल हिला दी. प्रजातंत्र के भारतीयकरण के मूल में लिंकन के पीपुल (जनता) और भारत के “अपनों” का मूल अंतर यह रहा कि हम “अपनों” का क्रमशः विस्तार किया. हमारा “अपना” सबसे पहले स्वयं, फिर बेटा-बेटी-पत्नी फिर रिश्तेदार से शुरू होता हुआ जाति और फिर समुदाय तक पहुंचा. नेता के लिए “अपना” माने उसकी जाति (कई बार उप-जाति भी) के लोग जो वोट देते हों, था. फिर चूंकि “फर्स्ट-पास्ट-द –पोस्ट” (ऍफ़ पी टी पी) चुनाव पद्धति में जीत के लिए मात्र जाति के लोगों से कई बार चुनाव वैतरणी पार नहीं होती तो किसी और जाति, उप-जाति को साधा जैसे नीतीश कुमार ने बिहार में महादलित नाम से एक नया पहचान समूह पैदा किया जो भारत के संविधान में तसव्वुर नहीं किया गया था, फिर अगर उससे भी मामला नहीं बना तो रमजान के दौरान दो-पल्ली टोपी पहन कर इफ्तार पार्टी देना शुरू किया. “अपनों” का विस्तार एक बार फिर हुआ जब साम्प्रदायिकता को हमने धर्मनिरपेक्षता का चोला पहनाया. लेकिन यह दुधारी तलवार थी, ७० साल में आधा समय बीतने के बाद जाति के विस्तार की परिणति रिवर्स साम्प्रदायिकता में हुई. बड़ा सम्प्रदाय जाति को लगभग समाहित करने लगा और तब उदय हुआ एक नए राजनीति का. पांसा पलटा. आज वही बड़ी साम्प्रदायिकता का भाव राष्ट्रवाद के साथ समेकित हो गया है. हालांकि उसे हमने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की संज्ञा दी. इन सब के बीच हमने कभी यह नहीं देखा कि पिछले ७० साल में हमारा विकास रेंगता रहा जबकि छोटे-छोटे देश मानव विकास सूचकांक पर हमसे काफी आगे निकल गए. देश का बाल मृत्यु दर, कुपोषण, गरीब-अमीर खाई, बेरोजगारी, अशिक्षा हमें शाश्वत भाव से घेरे रहा जबकि सत्ता पर बैठे लोग घोटाले पर घोटाला याने लाख रुपये के १९५० के जीप स्कैंडल से हमारे  “अपने” का विस्तार आज दो लाख करोड़ रुपये तक पहुँच गया.                  
प्रजातंत्र मानव संगठन को लेकर हुए सार्थक चिंतन का सबसे बेहतरीन उत्पाद है. लेकिन इसके सफल होने की कुछ शर्तें हैं. पहली और अपरिहार्य शर्त है : समाज के लिए कुछ व्यक्तिगत हितों की तिलांजलि और वह भी इसलिए कि समाज के हित में हीं व्यक्तिगत हित निहित है. एक व्यक्ति रात के अँधेरे में अपने घर का कूड़ा सड़क पर फेंक कर आगे बढ़ जाएगा यह सोचता हुआ कि उसका घर साफ़ हो गया. उसे यह नहीं मालूम कि उसी सोच का दूसरा व्यक्ति उसके घर के आगे उसी अँधेरे में अपने घर का कूड़ा फेंक चुका है. धीरे –धीरे हम भ्रष्टाचार के प्रति सहिष्णु होते गए. और यह मानने लगे कि हम जाति के नेता को वोट दें तो सही पर दूसरा सम्प्रदाय के नाम पर दे तो गलत.

“जनता को वैसा हीं शासन (सरकार) मिलता है जिसकी वह पात्र होती है”. यह कथन दुनिया के जाने-माने  फ्रांसीसी राजनीति –शास्त्र के विद्वान टोक्विल के नाम पर उदृत किया जाता है.

क्या आज यह सोचने की जरूरत नहीं है कि अगर इतने बड़े परमाणु हादसे के बाद जापान उभर सकता है, अगर एक ज़माने में अफीम के नशे में धुत रहने वाला चीन अपने ६९ साल के कम्युनिस्ट शासन के बाद आज दुनिया की दूसरे नंबर की अर्थ-व्यवस्था बन सकता है, अगर मात्र ४५ साल पहले पैदा हुआ बांग्लादेश मानव-विकास के तमाम परा-मीटर्स पर आगे हो सकता है तो हमें एक बार अपने सिस्टम, संविधान, समाज और संस्थाओं पर गौर करना होगा.
  
अब आते हैं भारत में प्रजातन्त्र के उदय (और अवसान) पर. ब्रिटिश प्रजातंत्र की अवधारणा तभी फलीभूत हो सकती है जब प्रजा की समझ बेहद संवर्धित हो. यही कारण था कि तमाम तत्कालीन ब्रिटिश शासकों और राजनीतिशास्त्र के पंडितों ने हीं नहीं गाँधी ने भी इस वेस्टमिनस्टर सिस्टम शासन पद्धति का विरोध किया पर अंग्रेज़ीदां नेहरु को ग्राम पंचायतों की बुनियाद पर सर्वोच्च संसदीय बुर्ज तैयार करना दकियानूशी सोच लगी. उनका यह गलत फैसला आज पूरे भारत के लिए नासूर बन गया़।

लोहिया के नाम पर दुकान चलने वाले लालू, मुलायम का समाजवाद अंत में भ्रष्टाचार का पर्याय बनते हुए अंत में हार के बाद फिर “अपनों” पर आ जाता है. याने मुलायम सिंह के उत्तर प्रदेश चुनाव में पराजित और सत्ताच्युत बेटे अखिलेश यादव को समाजवाद की नयी परिभाषा गढ़ने के लिए नारा देना पड़ता है “ जिसकी जितनी हिस्सेदारी उसकी उतनी भागीदारी” याने आबादी के अनुरूप आरक्षण लालू के बेटे ने भी सत्ता से हटाने के बाद कहा कि वह “अपनों “ के बीच जायेंगे.
आज ७० साल बाद जरूरत है कि हमारी सामूहिक चेतना में “अपनों” की परिभाषा बदले और वही समाज के हित में समाहित हो लेकिन यह सब तब तक नहीं होगा जब तक हम जाति, धर्म और अन्य संकुचित सोच से नहीं उबरते.

हाल की कुछ घटनाओं के विश्लेषण से समझा जा सकता है कि ७० साल की आज़ादी और ६७ साल के गणतंत्र में हम कहाँ तक पहुंचे हैं, या फिसले हैं. गुजरात कांग्रेस के ४४ विधायकों को एक स्पेशल जहाज से पार्टी-शासित कर्णाटक में ले जा कर एक रिसोर्ट में छिपाया गया जैसे हिंसक जानवर से मेमनों को बचाने के लिए बाड़े की चौकीदारी की जाती है. डर था कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) उन विधायकों को  करोड़ों रुपये का लालच दे कर या डरा-धमका कर अपने पक्ष में वोट करवायेगी. कांग्रेस ने सार्वजनिकरूप से यह आरोप लगाया भी. याने औसत लगभग तीन लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाले विधायक की नैतिकता इतनी कमजोर है कि कुछ करोड या किसी इनकम टैक्स अफसर की या थानेदार की धमकी से टूट सकती है. तो फिर प्रश्न यह खडा होता है कि ये विधायक जनता को किसी अतिवादी शासन से या असामाजिक तत्वों के खिलाफ कैसे खड़े रहेंगे? फिर कोई अम्बानी या अडानी इनसे कोई भी कानून बनवा सकता है और उनके द्वारा दिया गया पैसा तो किसी को पता भी नहीं चलेगा. कांग्रेस गाँधी-नेहरु-पटेल-मौलाना-राजेंद्र की पार्टी रही है और देश को आजादी दिला चुकी है. दूसरी ओर अगर यह आरोप सही है तो अगला सवाल उठता है कि मोदी के “नोटबंदी” के कसीदे काढ़ने वाली पार्टी के पास नंबर दो के पैसे आये कहाँ से? अगर यह कांग्रेस का मात्र आरोप है तो क्या राजनीति में आरोपों का स्तर इतना गिर गया है? क्या ज़रूरी नहीं था कि बजाय आरोप लगाने के या डर के मारे अपने “ढोर” बचाने के लिए ६०० किलोमीटर दूर छिपाने की जगह कांग्रेस “स्टिंग ऑपरेशन” करती या विधायक पैसे ऑफर करने वाले के खिलाफ जन-आन्दोलन करते और तब भाजपा को कहीं मुंह छिपाने की जगह न मिलती? क्या विधायकों की नैतिकता “गरीब की लुगाई, पूरे गाँव की भौजाई” टाइप की थी जो कभी भी पतित हो सकती थी.            

दूसरी घटना थी हरियाणा की, जिसमें राज्य भाजपा के अध्यक्ष का बेटा तथाकथित नशे की हालत में किसी अधिकारी की लडकी का पीछा कर रहा था और अगवा करना चाहता था. राज्य के एक मंत्री ने अपनी तर्क शक्ति का परिचय देते हुए काउंटर-क्वेश्चन (प्रति-प्रश्न) किया , “ वह लडकी रात में सड़क पर कर क्या रही थी?” लालुओं और मुलायमों की तरह भाजपा प्रवक्ता ने कहा, “इससे नेता का कुछ लेना-देना नहीं है और कानून अपना काम करेगा”. अब यह जुमला इतना पुराना हो चुका है कि जनता फोरम समझ जाती है कि “अब तो कम से कम कानून काम नहीं हीं करेगा. वैसे प्रवक्ता और मंत्री ने शीर्ष नेतृत्व में अपने नंबर जरूर बढा लिए होंगे अगर नेतृत्व “शुतुर्मुर्गी भाव” रखता होगा.

क्यों बनाते है हम इतने कमजर्फ और अनैतिक लोगों को अपना रहनुमा। क्या महज़ इसलिये कि वह हमारा ग़लत या सही काम कराता है, इसलिये कि वह हमारी जाति का है या फिर इसलिये कि वह इतना बड़ा अपराधी है कि हमें कोई छोटा गुंडा या मुहल्ले की पुलिस हमें परेशान नहीं करेगी? तब फिर हम अपने लिये अच्छी सड़क या बेटे के लिये अच्छे स्कूल की अपेक्षा क्यों करते हैं क्योंकि टेकेदार और भ्रष्ट स्कूल प्रबंधनन भी तो उसी अपराधी-नेता की ढ्योढी पर मत्था टेकता है और वह भी मोटी थैली के साथ। 

jagran/ lokmat

Friday, 4 August 2017

विलुप्त होता विपक्ष शुभ संकेत नहीं

राजनीतिक परिदृश्य से उठते खतरनाक संकेत  
  


सुदर्शन की अमर कहानियों में एक था “हार की जीत”. उसमें बाबा भारती एक पुजारी संत थे जिनके पास एक बलशाली घोड़ा था. एक दिन बाबा घोड़े पर हवा से बाद करते हुए जा रहे थे कि कान में आवाज़ आयी ,” बाबा , इस दुखियारे को भी लेता चल, बीमार हूँ डॉक्टर को दिखने जाना है”. बाबा ने दया करते हुए उसे बैठा लिया. लेकिन चंद मिनटों में हीं बाबा को धक्का दे कर वह दुखायारा तन कर लगाम ताने घोड़े पर बैठा था और कह रहा था “बाबा , तुम संतों को ऐसे बलवान घोड़े से क्या लेना देना, यह तो हम डाकुओं के इस्तेमाल के लिए है”. तब बाबा को अहसास हुआ कि दुखियारा कोई और नहीं, डाकू खड्ग सिंह है. डाकू घोड़े को लेकर अभी चंद कदम बढ़ा हीं था कि बाबा कि आवाज आयी. जिस पर डाकू ने कहा “बाबा कुछ भी मांग लो , दे दूंगा पर, अब यह घोड़ा नहीं दूंगा”. बाबा ने घोड़े  की ओर से मुंह मोड़ते हुए कहा, “घोडा अब तुंहारा हुआ मैं कभी इस ओर देखूँगा भी नहीं, पर एक प्रार्थना है और वह यह कि इस घटना का ज़िक्र किसी से न करना”. खडक सिंह चंका, “बाबा मैं तो स्वयं हीं आप से कहना चाहता था क्योंकि इस इलाके में आप का सम्मान है और लोगों को मेरा यह घोडा आप से छीनना अच्छा नहीं लगेगा पर आप स्वयं यह बात क्यों कह रहे हैं ?”. बाबा ने कहा , “अगर लोगों को यह पता लगा तो वे आज से किसी दुखियारे की मदद नहीं करेंगे “.

बिहार की ताज़ा राजनीतिक घटनाओं के बाद आब देश में राजनीतिक वर्ग से जनता का विश्वास हमेशा –हमेशा के लिए उठ गया. यह विश्वास पहले हीं से काफी कम हो गया था और राजनीति में सिद्धांत और विचारधारा  एक मजाक हो चुका था लेकिन फिर भी एक झीना पर्दा था और कई बार लगता था कि कभी यह पर्दा पूरी तरह पारदर्शी नहीं होगा. जिस देश में आजादी के लिए गाँधी ने लाखों लोगों के साथ एक अहिंसक आन्दोलन किया (जिसमें जबरदस्त नैतिक साहस की दरकार होती थी) उस देश में आज कोई लालू यादव २० साल तक चारा घोटाले में कानूनी प्रक्रिया को धता बताते हुए सत्ता में रह सकता है और यही नहीं लगातार अद्भुत हिमाकत दिखाते हुए भ्रष्टाचार पर भ्रष्टाचार कर सकता है. कोई तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व्यक्तिगत सुचिता की नयी परिभाषा गढ़ते हुआ इसे सिर्फ अपने तक महदूद करता हुआ दूसरों के भ्रष्टाचार को मौन स्वीकृति दे सकता है. कोई वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी “पत्ता भी नहीं हिलेगा मेरी मर्जी के बगैर” के भाव में अपने मंत्रिमंडल पर ऐसा लगाम कस सकता है कि वह मंत्री महज सांस भर ले सकता है, लेकिन जब पूरे देश में एक नए राष्ट्रवाद के अलमबरदार के रूप में लम्पट तत्व किसी अखलाक को घर में घुस कर गौमांस तलाशते हुए उसे जान से मारते हैं या जब कुछ ऐसे हीं तत्व किसी कारोबारी पहलू खान को सरे –राह दिनदहाड़े पीट-पीट कर मार देते हैं और उसका विडिओ भी उपलब्ध होता है तो वही मोदी कुछ नहीं करते.

किसी भी प्रजातंत्र में, खासकर के भारत के सन्दर्भ में जहाँ द्वंदात्मक प्रजातंत्र है, विपक्ष की बड़ी भूमिका होती है. लेकिन जिस तरह सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस मृतप्राय सड़क के कोने में पडी है और कभी कभी पूंछ हिलाकर अपने जीने का संकेत दे रही है उससे साफ़ है कि युवाओं को अपना भविष्य भारतीय जनता पार्टी में या राष्ट्रवादी बनकर गौ के नाम पर एक समुदाय विशेष के लोगों को मार कर भारतीय जनता पार्टी में अपनी उपादेयता सिद्ध करने पर लगी है, यही वजह है कि आज भारतीय जनता पार्टी देश के ६८ प्रतिशत जनसंख्या पर अपनी राज्य सरकारों के जरिये शासन कर रही है और कांग्रेस मात्र पांच प्रतिशत पर सिमट गयी है. कोई ताज्जुब नहीं कि राष्ट्रवाद की एक झूठी किन्तु अति बलशाली चेतना में बहते हुए पूरे देश याने ७९.५ प्रतिशत बहुसंख्यक इसी दल को अपना मुखिया बना ले.
और शायद यही वजह है कि अन्य पार्टियों के तमाम नेता और मकबूल कार्यकर्ता अपनी पार्टियों को अलविदा कह कर भजपा की शरण में आ रहे हैं. इसमें दोष भाजपा का नहीं बल्कि दोष कांग्रेस जैसी पूर्व की बड़ी पार्टी के नेतृत्व का है जो लड़ने की क्षमता खो चुकी है और अपनी राजनीतिक मौत के प्रति आश्वस्त है.

हम विश्लेषक क्यों दोष देते हैं किसी अमित शाह या प्रकारांतर से किसी मोदी को. कांग्रेस के नेता राहुल गाँधी अगर हर आम-ओ-ख़ास मौके पर सीन से नदारत रहेंगे और कभी –कभी उल्का पिंड की तरह नज़र आयेंगे और वह भी क्षण मात्र में रात के आकाश के समुन्दर में विलीन होने के लिए तो कौन कार्यकर्ता या विधायक या संसद ज्यादा दिन “मोदी-अमित” ब्रांड “फाइट –टु- फिनिश” युद्ध में टिका रह सकता है. इस ब्रांड की राजनीति में “साम-दाम-दंड-भेद” सभी कुछ तो अपनाये जा रहे हैं. चूंकि राजनीति में आज के दौर में ज्यादातर लोग या तो अपराध की दुनिया से आये हैं या अपराधी को संरक्षण दे कर वहां तक पहुंचे हैं या भ्रष्टाचार में लिप्त रहते हैं और अगर यह सब भी नहीं तो टैक्स की चोरी तो आम बात है. मुलायम के पास जो खेती है उसमें औसतन एक हेक्टेयर में कुछ करोड की पैदावार होती है. फिर मुलायम –मायावती आदि पर तो आय से अधिक संपत्ति के मामले फिर से चलाये जा सकते हैं. लिहाज़ा  विपक्ष के किसी भी नेता  की आज हिम्मत नहीं है कि तन कर खडा हो फिर अगर  समाजवादी पार्टी का भुक्कल नवाब सरीखा व्यक्ति पाला बदलता है और मोदी-अमित शाह के गुणगान करता हुआ भाजपा में जाता है तो इसमें थानेदार की क्षमता या आयकर अधिकारी की पारखी नज़रों का हीं तो कमाल है.

आरोप मीडिया पर लग रहे हैं. मीडिया की भूमिका हमेशा द्वितीयक रही है प्राथमिक नहीं. जब ८० प्रतिशत एक समुदाय विशेष की सोच एक खास दिशा में जा रही हो, जब विपक्ष का मुद्दों को लेकर दूर-दूर तक नमो-निशाँ न मिले तो मीडिया उस भावनात्मक आंधी के खिलाफ ज्यादा दूर नहीं जा सकती. सन १९७५ में जब इंदिरा गाँधी ने आपातकाल लगाया तो जनमत, विपक्ष और नैतिकता का पूर्ण संबल इसकी ओर था. फिर भी आपने देखा कि मीडिया का कुछ वर्ग हीं नहीं सर्वोच्च न्यायलय का एक धडा भी इंदिरा गाँधी के साथ हो चला.

आज जरूरत है कि एक सबल विपक्ष और जन-स्वीकार्यता वाला नेता सामने आये. वरना मोदी-अमित ब्रांड “फाइट- तु-फिनिश” वार में कोई भी नहीं बचेगा. मीडिया भी नहीं, विपक्ष भी नहीं और ना हीं तर्क-आधारित जनमत.


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