Sunday, 9 July 2017

राजनीतिक वर्ग की गिरती साख पर इलाज़ क्या ?

लालू के लिये क्या कोइ नैतिक संकट है भी ?
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तुम उनके वादे का ज़िक्र उनसे क्यूं करो ग़ालिब,
ये क्या, कि तुम कहा किये और वो कहें कि याद नहीं !
                              ---  मिर्ज़ा ग़ालिब

भारत के संविधान की अनुसूची ३ में मंत्रियों और जन प्रतिनिधियों (जिसमें प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री भी  शामिल हैं) को पद ग्रहण करने के पहले इस बात की शपथ लेनी होती है कि वे संविधान में “सच्ची श्रद्धा और निष्ठा” रखते हैं। संविधान निर्माताओं ने सोचा होगा कि सार्वजानिक रूप से शपथ लेने से मानव बांध जाता है क्योंकि उसे ईश्वर से डर लगे या न लगे, प्रजातंत्र में जनता की नज़रों से गिरने का भय रहेगा। लेकिन भारत में ठीक उलटा हुआ और नेता की समझ विकसित हुई कि शपथ लेने के बाद सरकारी सुविधा में ईश्वर को मंदिर के दर पर “वी आई पी” दर्शन कर खुश किया जा सकता है लेकिन जनता की नाराजगी की काट एक ही है और वह है उसे जाति या सम्प्रदाय में बाँट देना और खुद को उसका “प्रोटेक्टर” बताना। अभिजात्य वर्ग के लिए या दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल में सेमिनार के लिए इसका नाम “सोशल जस्टिस फोर्सेज” (सामाजिक न्याय की ताकतें) दिया गया।

नतीजा यह हुआ कि जब वर्षों पहले लालू यादव पर चारा घोटाला का आरोप लगा तब एक संपादक ने बिहार के एक यादव -बहुल क्षेत्र राघोपुर में, जहाँ से लालू और उनके परिवार के लोग समय समय पर चुनाव लड़े, अपने रिपोर्टर भेजे। रिपोर्टर का सवाल था “लालू यादव चारा घोटाला में फंसे हैं, आपकी क्या प्रतिक्रिया है?” लगभग सभी यादवों का जवाब था “बाबू साहेब आपका नाम क्या है?” जब उस रिपोर्टर ने नाम बताने की ज़रुरत नहीं होने की बात कही और प्रश्न दोहराया तो उनका जवाब था “जगन्नाथ मिश्रा भ्रष्टाचार करें तो आप लोगों नहीं दिखाई देता लेकिन हमारा नेता छाती ठोक कर भ्रष्टाचार कर रहा है तो बड़ा बुरा लग रहा है”।

किसी समाज में किसी जाति विशेष के नेता द्वारा अगर भ्रष्टाचार करना भी उस जाति की सामूहिक गरिमा का परिचायक होने लगे तो वहां प्रजातंत्र, प्रजातांत्रिक मूल्य, नियम और कानून –व्यवस्था सामुद्रिक आंधी में छोटी नौका की तरह डोलने लगता है और अंत में डूब जाता है. घोटाले में फंसने के कारण लालू के बाद राबरी का शासन में आना और फिर बाद में उनके बच्चों का भी संविधान में उसी “सच्ची निष्ठा“ की शपथ लेना मानों प्रजातंन्त्र का उस आँधी में नाव की मानिंद रहा. इस आंधी में कोई अपराधी शहाबुद्दीन भी पांच बार चुनाव जीतता है क्योंकि उसे मुसलमान अपना रोबिनहुड मानता है और हिन्दू वोटर डर के मारे वोट देना लगता है. शहाबुद्दीन जेल से भी वही करता है जो छुट्टा घूमते हुए करता था. संविधान में सच्ची निष्ठा थी तभी तो अपने खिलाफ किसी भी गवाह को जिन्दा नहीं रहने देता है. फिर वोटर का अपने रॉबिनहुड से मोह भंग हो जाएगा अगर गवाह इतनी हिमाकत कर जाये कि अदालत तक पहुँच कर “साहेब” के खिलाफ बोल दे.  

तो लालू यादब अदालत में भ्रष्टाचार के तमाम मामले के बावजूद चुनाव-दर-चुनाव मंत्री के रूप में केंद्र में संविधान में सच्ची निष्ठा की शपथ लेते रहे, बिहार में राबरी देवी और अब उनके ‘होनहार बेटा –बेटी भी”. कुछ साल हुए इस लालू यादव की वर्षों की सच्ची निष्ठा और अदालत के फैसले में टकराव होता है. इस बार कानून की व्यवस्था जीत जाती है लालू चुनाव राजनीति से बाहर कर दिए जाते हैं. यहीं पर प्रजातन्त्र की जनता की समझ और संविधान की प्रजातांत्रिक व्यवस्था में विरोधाभास दिखता है जो समस्या की जड़ में है. अगर लालू भ्रष्टाचार के दोषी है और अदालत सजा दे चुकी है तो फिर लालू की पार्टी , लालू का परिवार कैसे वोट पाता है. क्या वोटरों को किसी ब-मुश्किलतमाम हाई स्कूल पास और नीम –शिक्षित जन-सेवा से कोसों दूर पत्नी और बेटा-बेटियों में भी वही “गरीबनवाज” दिखाई देने लगा?

बिहार विधानसभा में नीतीश कुमार लालू यादव की संवैधानिक प्रतिबद्धता और गरीबो (यादव-मुस्लिम वोटरों) के उत्थान के लिए उनकी कर्मठता देखते हुए दस साल लालू को बुरा भला कहने के बाद गलती का अहसास करते हैं और लालू का हाथ थाम लेते हैं. बिहार की “प्रबुद्ध” लेर्किन जाति और सम्प्रदाय में बंटी जनता एक बार फिर प्रजातन्त्र को “मजबूत” करने के लिए इस गठबंधन को अपना तारणहार बनाती है.

इसी बीच देश में शासन बदला और भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में एन डी ए की सरकार आती है. लालू पर नाजायज धन और जायदाद कमाने के तमाम मामलों की जांच शुरू होती है केन्द्रीय जांच एजेंसी सी बी आई द्वारा.

अब यहाँ भी लालू –ब्रांड प्रजातंत्र का नमूना देखिये. जब लालू यादव ने रेल मंत्री के रूप में संविधान में सच्ची निष्ठा की शपथ ली और उसके अनुरूप काम शुरू किया तो बिहार के एक परिचित व्यक्ति के होटल को सरकारी होटल चलने का ठेका दिया जाता है. ठेका काफी कम में उठाया जाता है. लालू की पार्टी के एक अन्य मंत्री (उन्होंने ने भी सच्ची निष्ठा की शपथ ली थी) प्रेम गुप्ता की पत्नी सरला गुप्ता की व्यावसायिक क्षमता देखिये कि उनकी कंपनी को यह होटल चलाने वाला कम दर पर एक जमीन का कीमती टुकड़ा देता है. फिर यह जमीन का टुकड़ा सरला गुप्ता की कंपनी लालू यादव के परिवार की कंपनी “लारा” (लालू-राबरी) को औने-पौने बेचती है इसकी कीमत वैसे तो ३२ करोड रुपाई है लेकिन कागजों में मात्र कुछ लाख दर्ज की गयी है. क्या कहीं भी संविधान के प्रति सच्ची निष्ठा में कोई कमी किसी लालू या किसी प्रेम गुप्ता में नज़र आयी?

लालू की गर्जना स्वाभाविक है. हालांकि उनको जवाब इन प्रश्नों का  देना था कि क्या होटल को सस्ते में टेंडर दिया गया , क्या होटल मालिक ने प्रेम गुप्ता की पत्नी की कंपनी को जमीन दी , क्या यह जमीन लारा कंपनी को  ट्रान्सफर हुई और क्या इसकी कीमत उस समय बाज़ार की प्रचलित दर से (जिस पर अन्य क्रेताओं ने जमीने बेंची या खरीदी थी) कम पर दिया गया? लेकिन लालू के प्रजातंत्र की मान्यताएं अलग हैं. उन्होंने पहले तो कहा कि मेरी होने वाली रैली से मोदी डर गए हैं और जब सी बी आई का छापा और पूछ-ताछ लम्बा चला  तब लालू ने मीडिया को बताया “ये मोदी –अमित शाह मुझे जेल में बंद करके भी मुझे समर्पण करने को मजबूर नहीं कर सकते. मैं इनकी सरकार को उखाड़ फेंकूंगा”. लालू को यह बोलने की शक्ति शायद इस बात मिल रही है कि जनता को जाति और सम्प्रदाय में बाँट कर फिर एक बार “सच्ची निष्ठां” की धज्जियाँ उडाई जा सकती है. पर शायद अबकी बार जनता की तर्क-शक्ति और सामूहिक सोच बदलेगी और प्रजातंत्र संकीर्ण सोच के भंवर से निकल सकेगा।    

lokmat

Sunday, 2 July 2017

कभी हम सरकार के ही नहीं अपने गरेबां में झांकें !


गोमांस तलाशने की जगह फर्जी टीचर तलाशें
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उत्तर प्रदेश में इस नए सत्र से प्राइमरी और बेसिक स्कूलों में बच्चों को अपने अध्यापकों का फोटो नोटिस बोर्ड पर चस्पा मिलेगा ताकि हमारे नौनिहाल जान सके कि उन्हें असली टीचर पढ़ा रहा है कि नकली. याने बच्चे प्रार्थना करने के पहले कह सकेंगे “ यही है वो शख्श” ! सार्वजनिक स्थलों, थानों या रेलवे स्टेशनों में शातिर अपराधियों का चित्र लगा रहता है. दरअसल प्रदेश सरकार को यह कदम इस जानकारी के बाद उठाना पड़ा कि बड़े पैमाने पर शिक्षक स्कूल नहीं आते और अपनी जगह सस्ते में किराये पर शिक्षित बेरोजगारों को मात्र ५००० से ६००० रुपये माहवारी पर रख लेते हैं. अटेंडेंस रजिस्टर पर फर्जी दस्तखत होते हैं और मूल तन्खवाह जो आम तौर पर ३०,००० से ४०,००० रुपये प्रति माह होती है असली टीचर के खाते में चली जाती है. यह असली टीचर अन्यत्र रह कर अन्य धंधों में लिप्त रहता है और हेडमास्टर के पास एक पहले से हीं दस्तखत किया गया छुट्टी प्रार्थना पत्र रखा रहता है जिसे किसी अधिकारी के आने पर दिखा दिया जाता है.

ज़रा सोचिये!  क्या यह रात के अँधेरे में चोरी है? क्या यह रात में सड़क पर की गयी राहजनी है? क्या यह किसी अफसर द्वारा किया गया विकास के पैसे का “फर्जी काम दिखाकर” गोलमाल है? यह तो आपके सामने, आपके बच्चे के साथ खुले-आम बौद्धिक और मानसिक लूट है जिसे हम रोज घटित होते देखते हैं. यह बहाना भी गलत है कि “सब मिले हुए हैं”. फर्जी शिक्षक को उसी समय पकड़ा जा सकता है क्योंकि यह प्रारंम्भिक तौर पर आपराधिक कृत्य (इम्पर्सोनेशन) का मामला है.

ऐसा नहीं कि हम व्यक्तिगत रूप से चिर-उनीदेपन से रुग्ण हैं या हमारी सामूहिक चेतना विलुप्त हो गयी है या हमारी सामाजिक सक्रियता नपुंसक हो गयी है. अगर हम वर्तमान राजनीतिक बदलाव के मद्देनज़र  सशक्तिकरण की झूठी चेतना से उत्प्रेरित भावातिरेक में बगैर किसी कानूनी अधिकार के किसी अखलाक के घर में गाय का मांस तलाशने झुण्ड में निकल पढ़ते हैं और खुद के बनाये तस्दीक के तरीके से मुतमईन हो कर अखलाक को पीट-पीट कर मार देते हैं तो हम “चिर-उनीदेपन” के शिकार तो नहीं हैं.हम इसी भाव में राजस्थान के अलवर में किसी व्यापारी पहलू खान के वैध कागजों को नकारते हुए उसे सरे राह पीट-पीट कर मार देते हैं तो हम “निष्क्रिय" तो नहीं हीं हैं और अगर कभी थे भी तो अब तो हम गर्व से कह सकते हैं कि “हम जाग गये हैं" फिर भारत की आबादी की यह बड़ा वर्ग उस समय कहाँ सो जाता है जब उसी के लिए , उसी की चुनी सरकार द्वारा और उसके विकास के लिए बनाई जा रही सड़क पर खराब बजरी और घटिया सीमेंट डाली जाती है. अध्यापक तो उसके बच्चों का भविष्य बनाता –बिगड़ता है. किसी भी अखलाक, पहलू खान या जुनैद के किसी भी तथाकथित अपराध से बड़ा अपराध तो वह शिक्षक कर रहा है है जो ४०,००० रुपये की पगार के बाद भी आपके बच्चों को पढ़ने की जगह ५००० रुपये का शिक्षित बेरोजगार रख कर स्वयं दूसरे धंधे में लग जाता है. हो सकता है इन भ्रष्ट शिक्षकों में कुछ का हाथ पहलू खान के गले तक जाता हो और हम इस बात पर खुश हों कि गौ माता की रक्षा करने वाले हमारे अपने हैं.              
  
गौर से सोचिये, भ्रष्टाचार के इन बेख़ौफ़ प्रतिमानों को ख़त्म करना, जो हमारी पीढ़ियाँ बर्बाद कर रहे हैं, क्या केवल सरकार का हीं काम है? क्या उस स्कूल के अन्य शिक्षकों को यह बात नहीं मालूम कि मूल शिक्षक सालों से गायाब है? क्या हेडमास्टर इससे गाफिल है? क्या गाँव या मोहल्ले के लोगों को जिनके बच्चे इस पाठशाला में भविष्य बनाने गए हैं यह पता नहीं करना चाहिए कि असली टीचर कौन है? अगर चोर-सिपाही का खेल इतना खुला हो जाये कि सरकार को अपराधियों की तरह टीचर का भी फोटो लगाना पड़े तो हमें सोचना पडेगा कि हम कहाँ तक गिर गए हैं. भ्रष्टाचार को हमने आत्मसात कर लिया है. हम या तो इसके भागीदार हैं या इसके प्रति संवेदन –शून्य. यह हमें झकझोरता नहीं. “कमसे कम, नकली हीं सही, टीचर आता तो हैं, बगल वाले गाँव में तो वह भी नहीं आता” के “कोऊ नृप होहीं , हमें का हानी” के भाव में हम “शाश्वत उन्नीदेपन” की आगोश में चले जाते हैं.      
  
उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, झारखण्ड और छत्तीसगढ़ के तमाम प्राइमरी और मिडिल स्कूलों में यह आम बात है. अगर अध्यापक किसी मंत्री का, स्थानीय नेता का या बड़े अपराधी का रिश्तेदार है तो वह वर्षों अंतर्ध्यान रह कर मोटी तन्खवाह लेता रह सकता है और साथ हीं हर साल उसपर मिलने वाली वेतन वृद्धि के लिए आन्दोलन भी कर सकता है. हेडमास्टर इस लिए नहीं बोलता क्योंकि उसे भी शिक्षा के मद में आये तमाम फंडों को उदरस्थ करना होता है. कमजोर शिक्षक इतनी हीं बात पर संतोष कर लेता है कि गाह-ए-बगाहे उसे भी “गायब होने” का अवसर दे दिया जाता है. यही वजह है कि गरीबों का एक बड़ा वर्ग भी खेत बेंच कर अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में महंगे खर्च पर भर्ती करा रहा है. लेकिन सामूहिक रूप से इस सर्वविदित और सर्वव्याप्त भ्रष्टाचार पर कभी भी कोई सामूहिक आवाज नहीं उठी.

शायद किसी सभ्य समाज के लिए यह क्रांति का सबब बन सकता है कि असली टीचर की पहचान के लिए सरकार को अपराधियों की तरह उसकी फोटो लगानी पड़ रही है. हम उस मकाम पर खड़े हैं जहाँ अपराधी तो छोडिये एक सरकारी टीचर भी सरे-आम, एक दिन नहीं, दो दिन नहीं महीनों और सालों तक
पूरे समाज को मुंह चिढाता धोखा देता रहता है और वह भी पैसे का धोखा नहीं हमारी नस्ल बिगाडने का लेकिन हम हैं कि इससे उद्वेलित होने की जगह वन्दे मातरम न कहने वालों को पाकिस्तान भेजने के लिए कमर कसे हुए हैं बगैर यह समझे हुए कि एवजी टीचर पूरा राष्ट्रगीत “वन्दे मातरम” भी हमारे बच्चे को सही नहीं सिखा सकता.

lokmat

Monday, 26 June 2017

राष्ट्रपति की संस्था: कुछ खट्टे –मीठे अनुभव


भारत ६७ साल के गणतंत्र में आगामी १७ जुलाई को राष्ट्रपति के रूप में १४वें व्यक्ति को चुनेगा. सत्ताधारी गठबंधन (एन डी ए ) ने जहाँ रामनाथ कोविंद को प्रत्याशी बनाया है वहीं विपक्षी गठबंधन (यू पी ए) ने मीरा कुमार को. दोनों दलित नेता हैं. कोविंद एक सप्ताह पहले तक बिहार के राज्यपाल थे तो मीरा कुमार बिहार की रहने वाली हैं. दोनों अति-मृदुभाषी लिहाज़ा अजातशत्रु हैं. मीरा कुमार लोक सभा की स्पीकर के रूप में सुचारूरूप से सदन चलाने के लिए जानी गयी तो कोविंद उस राज्य में जिसमें नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सत्ताधरी गठबंधन और प्रमुख विपक्षी दल –भारतीय जनता पार्टी—के बीच हर रोज़ तलवारें खिची रहती है विवाद से परे रहे. और शायद उनकी यही क्षमता उन्हें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष अमित शाह का प्रिय बनाती हैं. देश को अप्केशा रहती है कि राष्ट्रपति राग-द्वेष , लोभ –मोह से परे हो कर अपना कार्य करे.

भारतीय संविधान में राष्ट्रपति की स्थिति संविधान के दो अनुच्छेदों के बीच की रस्साकशी में डालती है. एक तरफ संविधान के अनुच्छेद ६० के तहत केवल दो हीं पद हैं जो संविधान के अभिरक्षण, परिरक्षण और संरक्षण की शपथ लेते हैं जबकि अन्य सभी पदाधिकारी यहाँ तक कि प्रधानमंत्री और भारत के मुख्य न्यायाधीश भी संविधान में निष्ठा की शपथ लेते हैं. वे पद है-- राष्ट्रपति और राज्यपाल के।  वहीं दूसरी ओर राष्ट्रपति के लिए अनुच्छेद ७४ के तहत मंत्रिमंडल की राय के अनुरूप कार्य करना बाध्यकारी बनाया गया है. लिहाज़ा संकट यह रहता है कि राष्ट्रपति अपनी शपथ के अनुसार संविधान की रक्षा करे या बाध्यकारी प्रावधानों के तहत “रबर स्टेम्प” बना रहे. ऐसे अवसर आये जब पूर्व राष्ट्रपतियों ने अपने विवेक को तरजीह दी और यह प्रजातन्त्र की खूबसूरती रही कि कार्यपालिका ने उसका सम्मान किया.      

भारत के गणतंत्र बनने के बाद राष्ट्रपति पद के प्रथम पांच साल में दो ऐसे तनाव की घटनाएँ हुई जिन्होंने राष्ट्रपति-कार्यपालिका के संबंधों को प्रभावित किया. पहली थी राजेंद्र प्रसाद का नेहरु के स्पष्टरूप से मना करने के बावजूद सोमनाथ मंदिर जाना और दूसरा हिन्दू कोड बिल पर अपनी मुहर न लगाना. पहले मामले में नेहरु कैबिनेट के मंत्री के एम् मुन्सी जो कि सोमनाथ मंदिर जीर्णोद्धार समिति के अध्यक्ष भी थे, मंदिर के कायाकल्प के बाद राष्ट्रपति से उद्घाटन करने का आग्रह करने गए जिसे राजेंद्र प्रसाद ने तत्काल स्वीकार कर लिया. नेहरु आग बबूला हो गए क्योंकि उन्हें यह राज्य के “धर्मनिरपेक्ष” स्वरुप से बिलकुल अलग लगा. नेहरु ने पहले तो मुन्सी के पत्र लिख कर लताड़ा जिसका उतना हीं सख्त जवाब मुन्सी ने भी दिया. फिर राजेंद्र प्रसाद से न जाने की बात कही. बहरहाल राष्ट्रपति गये।

हिन्दू कोड बिल पर तो संवैधानिक प्रश्न उठ खडा हुआ. राष्ट्रपति का कहना था कि एक तो उस समय का संसद प्रतिनिधि स्वरुप नहीं रखता क्योंकि संविधान सभा हीं संसद के रूप में काम कर रही थी. दूसरा प्रसाद का मानना था राष्ट्रपति कार्यपालिका की हर सलाह मानने को बाध्य नहीं है. उन्होंने नेहरु को पत्र लिखा : इस मामले में मंत्रिमंडल की राय मानने को बाध्य नहीं हूँ. फिर वर्तमान संसद अस्थायी है और चुन कर नहीं आयी है लिहाज़ा मैं इस संसद की राय मानने को बाध्य नहीं हूँ”.  इस पर नेहरु ने प्रसाद को लिखा “हमारी राय में राष्ट्रपति के पास इस विधेयक के मामले में संसद की इच्छा के विरुद्ध जाने की कोई शक्ति नहीं है. संवैधानिक सरकार की अवधारणा के मूल में हीं यह बात विहित है कि राष्ट्रपति उसकी राय के खिलाफ नहीं जा सकता. जहाँ तक इस संसद (अस्थायी) की शक्तियों का सवाल है इस मुद्दे पर स्पीकर ने अपनी व्यवस्था पहले हीं दे दी है और यह संसद पूरी तरह विधायक बनाने के लिए सक्षम है”.        
            
इसके बाद के राष्ट्रपतियों का कार्यकाल बगैर विवाद के चलता रहा. और राजनीतिक नैतिकता में गिरावट आती रही. ४२ वें संविधान संशोधन के तहत राष्ट्रपति को बाध्य किया गया कि वह संसद में पारित किसी भी विधेयक पर आँख मुड़कर हस्ताक्षर करने को बाध्य है. दो साल बाद जब मोरारजी के नेतृत्व में जनता सरकार आयी तो उसने इस संशोधन में इतना हीं बदलाव किया कि अब राष्ट्रपति किसी भी विधेयक पर हस्ताक्षर करने को मजबूर होगा लेकिन एक बार वह उस विधेयक को पुनर्विचार के लिए संसद के पास भेज सकता है. भारत के अब तक के इतिहास में सबसे ज्यादा विवाद राष्ट्रपति जैल सिंह और प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के बीच रहा जो गली-कूचों तक सुना गया. लेकिन इसके पहले की इंदिरागांधी की नीति पर कुछ प्रकाश डालना जरूरी है. १९६९ में इंदिरागांधी ने निजलिंगप्पा से झगडे के बाद पहली बार पार्टी में दो फाड़ के मार्ग प्रशस्त किया. नीलम संजीव रेड्डी औपचारिकरूप से  कांग्रेस प्रत्याशी घोषित किये गए लेकिन इंदिरागांधी उन्हें हरा कर विरोधी पक्ष को सन्देश देना चाहती थी. वी वी गिरी को स्वतंत्र रूप से खड़ा किया गया और इंदिरा गाँधी ने देश भर के सभी कांग्रेस सांसदों और विधायकों को “अंतरात्मा की आवाज पर वोट देने को कहा”. गिरी जीत गए. इंदिरागांधी का वर्चस्व कायम रहा. ज्ञानी जैल सिंह तब आलोचना के पात्र बन गए जब श्रीमती गाँधी द्वारा उन्हें राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बनाये जाने पर इस सिख नेता ने कहा “अगर श्रीमती गाँधी कहें तो मैं झाडू-पोंछा भी करूंगा”. बहरहाल इंदिरागांधी की हत्या के समय राष्ट्रपति जैल सिंह विदेशी में थे और तत्काल वापस लौटे. रास्ते में अफसरों से उन्होंने कहा कि वह राजीव गाँधी को प्रधानमंत्री पद की शपथ के लिए आमत्रित करेंगे. इस पर कुछ अफसरों ने सलाह दी कि कांग्रेस संसदीय पार्टी की राय ले ली जाये तो बेहतर रहेगा. सिंह इतने आतुर थे कि उन्होंने ने अफसरों से कहा “संसदीय पार्टी कुछ भी कहे मैं तो राजीव् को हीं शपथ दिलवाऊंगा क्योंकि मेरे राष्ट्रपति पद पर चुने जाने में उनका बहुत बड़ा योगदान है”. और हुआ भी वही. राजीव गाँधी प्रधानमंत्री बने.

लेकिन डेढ़ साल के भीतर हीं दोनों के बीच सम्बन्ध इतने खराब हो गए कि राजीव के नज़दीक़ी के पी तिवारी सरीखे लोग संसद में आरोप लगने लगे कि राष्ट्रपति भवन में खालिस्तानी आतंकवादी शरण ले रहे हैं. सरकार ने जैल सिंह की विदेश यात्रा की अनुमति देना बंद कर दिया. परम्परा है कि प्रधानमंत्री विदेश यात्रा से लौटने के बाद राष्ट्रपति को ब्रीफ करता है पर राजीव् गाँधी दो साल तक राष्ट्रपति भवन नहीं गए. कैबिनेट के मंत्री भी राष्ट्रपति के बुलाने पर नही जाते थे. प्रतिक्रिया में राष्ट्रपति भवन विपक्ष के नेताओं का अड्डा बना. इसी बीच सरकार डाक विधेयक ले कर आयी. इसके प्रावधान का आशय सरकार को किसी की भी चिट्ठी खोल कर पढने के अधिकार देने का था. जैल सिंह ने इस विधेयक को न तो लौटाया ना हीं  दस्तखत किया. दरअसल संविधान में राष्ट्रपति दोबारा हस्ताक्षर करने को बाध्य तो है पर संविधान यह नहीं बताता कि राष्ट्रपति किसी विधेयक पर कितने दिन के भीतर हस्ताक्षर करे.

स्वर्गीय डॉ अब्दुल कलाम ने अपनी राष्ट्रपति काल में पहली बार एक गलती की जब उनसे उनकी मास्को यात्रा के दौरान आधी रात को बिहार में राष्ट्रपति शासन लागू करने के आदेश पर हस्ताक्षर करवाए गए. लेकिन तत्काल बाद उन्हें यह अहसास हुआ कि राष्ट्रपति को अपने विवेक से सही –गलत देखने और तदनुसार निर्णय लेने की क्षमता है. लिहाज़ा जब कांग्रेस सरकार ने ऑफिस ऑफ़ प्रॉफिट विधेयक सदन से पास करवा कर राष्ट्रपति के पास भेजा तो कलाम ने संविधान के तमाम जानकार जैसे वी एन खरे (भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश) से सलाह ली और बिल कुछ सलाह के साथ वापस कर दिया. वास्तव में अगर कलाम उस बिल पर संस्तुति कर देता तो वह एक गलत कदम होता क्योंकि उसमें कुछ लोगों को जो पड़ पर रहते हुए अन्य पदों पर काबिज़ थे संविधान के प्रावधानों से बचाया जा रहा था जबकि अन्य लोगों की सदस्यता पर आंच आ रही थी.

फिर भी कुल मिला कर राष्ट्रपति की संस्था भारत में पिछले ६७ सालों से एक वाचडॉग का कम कर रही है और प्रजातन्त्र को मजबूती की और ले जाने में मददगार है.

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Saturday, 17 June 2017

किसान आन्दोलन: चश्मा बदलना होगा



जरा विरोधाभास देखें.  इस साल देश में रिकॉर्ड २७४ मिलियन टन अनाज पैदा हुआ. गेंहू और चावल हीं नहीं दाल का उत्पादन भी देश की जरूरत से काफी ज्यादा रहा। फिर किसान आन्दोलन की राह पर क्यों? एक राज्य में  नहीं, दो राज्य में नहीं बल्कि कई राज्यों में यह फैलता जा रहा है. जो किसान आत्महत्या नहीं कर रहा  है  वह उग्र है और पुलिस की गोलियां खा कर मर रहा है. महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश ,  पंजाब  और  गुजरात इसकी चपेट में हैं और कर्णाटक, आंध्र प्रदेश में भी इसके दस्तक सुने जा सकते हैं. उत्तर प्रदेश और  बिहार में भी यह फ़ैल सकता है. सरकार के २४ घंटे पहले के आंकडे के अनुसार भारत में एक किसान की आय मात्र १६०० रुपये प्रति  माह है। 

इस किसान आन्दोलन  के मूल कारण दो हैं . एक तात्कालिक और दूसरा दीर्घ-कालिक. तात्कालिक कारण है किसानों की क़र्ज़ माफी का मुद्दा चुनावी मुद्दा बनाना जो भारतीय जनता पार्टी की अदूरदर्शिता का नतीजा है. सन २०१४ के आम चुनाव में पार्टी ने वादा किया कि अगर वह सत्ता  में आयी तो वह स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करते हुए अनाज  का समर्थन मूल्य लागत का ५० प्रतिशत बढ़ा  कर देगी. याने किसानों को जबरदस्त लाभ. लेकिन जब मामला सुप्रीम कोर्ट  में गया तो पार्टी की नेतृत्व वाली मोदी सरकार ने हलफनामे में साफ़ तौर पर कहा कि यह संभव नहीं है. किसान तीन साल चुपचाप देखता रहा. इस बीच  उसे एक अन्य लोक-लुभावन वादा किया गया कि किसान की आमदनी पांच सालो में दोगुनी कर दी जायेगी. भूलना न होगा स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का छत्तीसगढ़ की एक जनसभा में यह  ऐलान कि उनकी सरकार आयी तो हर गरीब की जेब में १५ लाख रुपये होंगे. कहने की ज़रुरत नहीं कि भारत में गरीब और  किसान समानार्थी  होते हैं. कोई सामान्य गणित जानने वाला बच्चा भी यह समझ सकता है कि अगर यह वादा अमल में लाया जाये तो उस पर पूरा खर्च भारत अगले १०० साल के बजट से भी ज्यादा होता है. दरअसल  यह वादा नामुमकिन-उल-अमल था. बाद में इसे  जुमला करार देना पड़ा. तीन साल के भीतर हीं उत्तर प्रदेश के चुनाव हुए और एक बार (तीसरा वादा ). फिर अपनी पिछली  गलतियों को नज़रंदाज़ करते हुए स्वयं प्रधानमंत्री ने ऐलान  किया कि उनकी पार्टी  की सरकार आयी तो किसानों का क़र्ज़ माफ़ किया जाएगा. पार्टी की सरकार आयी  भी. और इस तीसरे वादे को पूरा करने की  अर्थात उत्तर प्रदेश के किसानों का ३६००० करोड  कर्ज  माफ़ करने की घोषणा भी  की गयी. (हालाँकि आज तक कोई भी अधिसूचना इस सम्बन्ध में नहीं लाई जा सकी है). लिहाज़ा आज अन्य राज्यों के किसानों को लगा कि वह क़र्ज़ माफी से इसलिए वंचित  है कि उसके यहाँ चुनाव नहीं है. जाहिर  है उसे आन्दोलन से हीं अपनी मांग मनवाना सबसे सहज रास्ता लग रहा है.                                                    

यहाँ  प्रशन यह है कि क्या क़र्ज़ माफी चुनाव का मुद्दा होना चाहिए? यह तो शुद्ध रूप से नीतिगत मामला है और इसे नीति बनाने वाली सस्थाओं पर छोड़ देना चाहिए. किस आधार पर उत्तर प्रदेश के किसानों का क़र्ज़ माफ़ करने का ऐलान प्रधानमंत्री करते है?  क्या महाराष्ट्र का किसान अपने खेत में सोना उगाता है या मध्य प्रदेश या  ऐसे हीं अन्य राज्यों के किसान की उत्पादकता उत्तर प्रदेश के किसानों से ज्यादा है? वोट पाने की ललक में पार्टियाँ गैर-जिम्मेदाराना वादे करती हैं और फिर या तो मुकर जाती हैं या आंशिक रूप उन्हें पूरा करके समूचे देश में गैर-बराबरी –जनित आक्रोश  पैदा करती हैं.                        
आज अगर पूरे देश के किसानों का क़र्ज़ माफ़ कर दिया जाये तो सरकार को लगभग ढाई लाख करोड़ रुपये खर्च करने पड़ेंगे. क्या वादा करने वाली केंद्र या राज्य का सरकारें यह राशि खर्च करने  की स्थिति में हैं और अगर करती हैं तो तज्जनित वित्तीय घाटा अर्थ-व्यवस्था में कमजोरी नहीं लायेगा? दरअसल क़र्ज़  माफ़ करना कैंसर के मरीज को दर्द की गोली देने से अधिक कुछ भी नहीं. मूल कारण पर  जाना होगा और वह है – क्यों भारत में खेती अलाभकर है, क्यों देश में पिछले २५ सालों से हर ३७ मिनट पर एक किसान आत्महत्या कर  रहा है और क्यों पिछले २५ सालों में हर रोज़ २०५२ किसान खेती छोड़ कर शहरों  में रिक्शा पकड़ लेते हैं या मजदूर बन कर रहते हैं?

इस  बीच एक नयी स्थिति उत्पन्न हुई. सरकार ने इन तीनों अदूरदर्शी वादों से किसानों की अपेक्षाएं तो बढ़ा दीं लेकिन उनके  हाथ में कुछ भी नहीं आया. इसके ठीक उलट उन्होंने मोदी  की बात  मानते हुए जम  कर अनाज पैदा किया और दलहन (जिसका  उत्पादन लगातार घट रहा था)  का  उत्पादन ३० प्रतिशत बढ़ा दिया याने १७.१५ मिलियन टन से २२.१४ मिलियन  टन. लेकिन जब वह अपने उत्पाद को लेकर बाज़ार गया तो जो अरहर की दाल एक साल पहले २५००० रुपये  कुन्तल तक  बिकी  थी उसे  आढ़तियों  ने ३८०० रुपये खरीदने की पेशकश की.  ध्यान देने की बात यह है  कि सरकारी समर्थन ५०५० रुपये प्रति कुन्तल था लेकिन सरकारी  क्रय केन्द्रों पर या तो उसे तंग करके मजबूर  किया जाता था कि वह आढ़तियों      के हाथ  सस्ते में बेचे या फिर अगर इन  केन्द्रों पर खरीद हुई  भी तो पैसे महीनों तक नहीं मिलते थे।                                                                                                                      
खुले  बाज़ार में अरहर की दाल के सस्ते  होने  का कारण था म्यांमार, तंज़ानिया,                      मोज़ाम्बीक  और मलावी ऐसे  देशों से दाल की आयत. सरकार ने एडवांस इन्टेलिजेंस से यह जानकारी नहीं ली कि भारत में इस साल  दलहन उत्पादन की क्या स्थिति रहेगी. अगर यह पता होता कि अरहर की दाल  का  उत्पादन डेढ गुना होने जा रहा है तो सरकार यह भी जान जाती कि भारत में  जितनी दाल की खपत हर साल  होती  है वह घरेलू उत्पादन से हीं पूरी की जा सकती है. महाराष्ट्र और    मध्यप्रदेश दलहन उत्पादन  के लिए जाना  जाता  है. वहां का किसान आज अपने को ठगा महसूस  कर रहा है.                        
                                                                                                                                                                                                                      
अब किसान आक्रोश के दीर्धकालीन कारणों पर आते हैं. देश में ७७ प्रतिशत किसानों के  पास दो हेक्टेयर से कम जमीन है और ७० साल के प्रजातन्त्र में किसानों को अन्नदाता कह कर बेवक़ूफ़ बनाने वाले सत्ताभोगी अभिजात्य वर्ग ने आज तक मात्र ४५ प्रतिशत जमीन पर हीं सिंचाई की  व्यवस्था की है बाकि ५५ प्रतिशत खेती  इंद्रा भगवान् के भरोसे होती हैं. यह समझने के लिए कि किसान को  एक हेक्टेयर में कितनी सालाना आय होती है आइन्स्टीन की दिमाग नहीं  चाहिए. किसान को सिर्फ परिवार के पेट पालने के लिए भी अन्य लोगों  की खेती किराये पर लेनी होती है. यह अन्य लोग कुलीन वर्ग के हैं जो बड़ी नौकरी या बड़ा बिज़नस  करने बड़े शहरों में डेरा जमाये हैं  और अपनी खेती  गरीब काश्तकारों को २५,००० से ३०,००० रुपये प्रति हेक्टेयर की दर से  दे कर शहरों में  एयर कंडिशन्ड बंगलों में रौनकआफरोज़ होते हैं. और अपने  काले धन  को  खेती से  हुई आय दिखा कर सफ़ेद कर लेते हैं. अगर इस  किराये को  किसान के खर्ज में जोड़ दिया जाये तो दरअसल उसे खेती से  बहुत कम आय हो पाती है. आज ज़रुरत इस बात की है कि लघु व सीमान्त किसानों को जो किराये पर जमीन ले कर खेती  करते  हैं उन्हें अलग से उत्पाद का  मूल्य दिया जाये.                                                                                                                            
                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                            
आखिर किसान की स्थिति की वजह क्या है? किसानों की समस्या को पिछले ३०० सालों से कभी भी गहराई से नहीं समझा गया. सत्ता चाहे मुग़लों की रही या अंग्रेजों या वर्तमान में प्रजातंत्र के  नाम पर अभिजात्य वर्ग की, सबने इसे शोषण का साधन बनाया. कोड़े मार कर “तीन कठिया” (१५ प्रतिशत खेत में  जबरन नील की खेती की  मजबूरी) स्कीम में बिहार में  नील की खेती कराई गयी तो थॉमस  मुनरो की रैयतवारी व्यवस्था में इस पर जबरदस्त टैक्स लाद  कर ईस्ट इंडिया कंपनी ऐश करती रही और वारेन हेस्टिंग्स ने जमींदारी की व्यवस्था ला कर किसानों की रही सही कमर तोड़ दी.

जहाँ सन २००० में भारत के एक फीसदी अभिजात्य वर्ग के पास देश की ३७  प्रतिशत पूंजी  होती थी,  सन  २००५ में वह बढ़ कर ४२ प्रतिशत, सन २०१० में ४८ प्रतिशत, सन २०१२ में ५२ प्रतिशत  और आज वह बढ़ कर ५८.४  प्रतिशत  हो गयी है. बढ़ती गरीब-अमीर की खाई भी इन आंदोलनों का  एक बड़ा कारण  हैं.          

लेकिन मोदी सरकार की कृषि क्षेत्र में कुछ  क्रांतिकारी कदमों को भी समझने की ज़रुरत है. फसल बीमा योजना,  यूरिया पर नीम  की परत, किसानों को मृदा-स्वास्थ्य  कार्ड और बैंक खाते  में मदद का पैसा सीधा जमा करना भ्रष्टाचार की  जड़ पर हमला है. और अगर राज्य सरकारें  इस क्रांतिकारी  योजनाओं  पर  राजनीति छोड़ कर अमल करें तो  देश में किसानों की  हालत काफी हद तक बदली जा सकती है.                                                                                                 
Lokmat

Wednesday, 14 June 2017

किसान आन्दोलन: चश्मा बदलना होगा



जरा विरोधाभास देखें.  इस साल देश में रिकॉर्ड २७४ मिलियन टन अनाज पैदा हुआ. गेंहू और चावल हीं नहीं दाल का उत्पादन भी देश की जरूरत से काफी ज्यादा रहा। फिर किसान आन्दोलन की राह पर क्यों? एक राज्य में  नहीं, दो राज्य में नहीं बल्कि कई राज्यों में यह फैलता जा रहा है. जो किसान आत्महत्या नहीं कर रहा  है  वह उग्र है और पुलिस की गोलियां खा कर मर रहा है. महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश ,  पंजाब  और  गुजरात इसकी चपेट में हैं और कर्णाटक, आंध्र प्रदेश में भी इसके दस्तक सुने जा सकते हैं. उत्तर प्रदेश और  बिहार में भी यह फ़ैल सकता है. सरकार के २४ घंटे पहले के आंकडे के अनुसार भारत में एक किसान की आय मात्र १६०० रुपये प्रति  माह है। 

इस किसान आन्दोलन  के मूल कारण दो हैं . एक तात्कालिक और दूसरा दीर्घ-कालिक. तात्कालिक कारण है किसानों की क़र्ज़ माफी का मुद्दा चुनावी मुद्दा बनाना जो भारतीय जनता पार्टी की अदूरदर्शिता का नतीजा है. सन २०१४ के आम चुनाव में पार्टी ने वादा किया कि अगर वह सत्ता  में आयी तो वह स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करते हुए अनाज  का समर्थन मूल्य लागत का ५० प्रतिशत बढ़ा  कर देगी. याने किसानों को जबरदस्त लाभ. लेकिन जब मामला सुप्रीम कोर्ट  में गया तो पार्टी की नेतृत्व वाली मोदी सरकार ने हलफनामे में साफ़ तौर पर कहा कि यह संभव नहीं है. किसान तीन साल चुपचाप देखता रहा. इस बीच  उसे एक अन्य लोक-लुभावन वादा किया गया कि किसान की आमदनी पांच सालो में दोगुनी कर दी जायेगी. भूलना न होगा स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का छत्तीसगढ़ की एक जनसभा में यह  ऐलान कि उनकी सरकार आयी तो हर गरीब की जेब में १५ लाख रुपये होंगे. कहने की ज़रुरत नहीं कि भारत में गरीब और  किसान समानार्थी  होते हैं. कोई सामान्य गणित जानने वाला बच्चा भी यह समझ सकता है कि अगर यह वादा अमल में लाया जाये तो उस पर पूरा खर्च भारत अगले १०० साल के बजट से भी ज्यादा होता है. दरअसल  यह वादा नामुमकिन-उल-अमल था. बाद में इसे  जुमला करार देना पड़ा. तीन साल के भीतर हीं उत्तर प्रदेश के चुनाव हुए और एक बार (तीसरा वादा ). फिर अपनी पिछली  गलतियों को नज़रंदाज़ करते हुए स्वयं प्रधानमंत्री ने ऐलान  किया कि उनकी पार्टी  की सरकार आयी तो किसानों का क़र्ज़ माफ़ किया जाएगा. पार्टी की सरकार आयी  भी. और इस तीसरे वादे को पूरा करने की  अर्थात उत्तर प्रदेश के किसानों का ३६००० करोड  कर्ज  माफ़ करने की घोषणा भी  की गयी. (हालाँकि आज तक कोई भी अधिसूचना इस सम्बन्ध में नहीं लाई जा सकी है). लिहाज़ा आज अन्य राज्यों के किसानों को लगा कि वह क़र्ज़ माफी से इसलिए वंचित  है कि उसके यहाँ चुनाव नहीं है. जाहिर  है उसे आन्दोलन से हीं अपनी मांग मनवाना सबसे सहज रास्ता लग रहा है.                                                    

यहाँ  प्रशन यह है कि क्या क़र्ज़ माफी चुनाव का मुद्दा होना चाहिए? यह तो शुद्ध रूप से नीतिगत मामला है और इसे नीति बनाने वाली सस्थाओं पर छोड़ देना चाहिए. किस आधार पर उत्तर प्रदेश के किसानों का क़र्ज़ माफ़ करने का ऐलान प्रधानमंत्री करते है?  क्या महाराष्ट्र का किसान अपने खेत में सोना उगाता है या मध्य प्रदेश या  ऐसे हीं अन्य राज्यों के किसान की उत्पादकता उत्तर प्रदेश के किसानों से ज्यादा है? वोट पाने की ललक में पार्टियाँ गैर-जिम्मेदाराना वादे करती हैं और फिर या तो मुकर जाती हैं या आंशिक रूप उन्हें पूरा करके समूचे देश में गैर-बराबरी –जनित आक्रोश  पैदा करती हैं.                        
आज अगर पूरे देश के किसानों का क़र्ज़ माफ़ कर दिया जाये तो सरकार को लगभग ढाई लाख करोड़ रुपये खर्च करने पड़ेंगे. क्या वादा करने वाली केंद्र या राज्य का सरकारें यह राशि खर्च करने  की स्थिति में हैं और अगर करती हैं तो तज्जनित वित्तीय घाटा अर्थ-व्यवस्था में कमजोरी नहीं लायेगा? दरअसल क़र्ज़  माफ़ करना कैंसर के मरीज को दर्द की गोली देने से अधिक कुछ भी नहीं. मूल कारण पर  जाना होगा और वह है – क्यों भारत में खेती अलाभकर है, क्यों देश में पिछले २५ सालों से हर ३७ मिनट पर एक किसान आत्महत्या कर  रहा है और क्यों पिछले २५ सालों में हर रोज़ २०५२ किसान खेती छोड़ कर शहरों  में रिक्शा पकड़ लेते हैं या मजदूर बन कर रहते हैं?

इस  बीच एक नयी स्थिति उत्पन्न हुई. सरकार ने इन तीनों अदूरदर्शी वादों से किसानों की अपेक्षाएं तो बढ़ा दीं लेकिन उनके  हाथ में कुछ भी नहीं आया. इसके ठीक उलट उन्होंने मोदी  की बात  मानते हुए जम  कर अनाज पैदा किया और दलहन (जिसका  उत्पादन लगातार घट रहा था)  का  उत्पादन ३० प्रतिशत बढ़ा दिया याने १७.१५ मिलियन टन से २२.१४ मिलियन  टन. लेकिन जब वह अपने उत्पाद को लेकर बाज़ार गया तो जो अरहर की दाल एक साल पहले २५००० रुपये  कुन्तल तक  बिकी  थी उसे  आढ़तियों  ने ३८०० रुपये खरीदने की पेशकश की.  ध्यान देने की बात यह है  कि सरकारी समर्थन ५०५० रुपये प्रति कुन्तल था लेकिन सरकारी  क्रय केन्द्रों पर या तो उसे तंग करके मजबूर  किया जाता था कि वह आढ़तियों      के हाथ  सस्ते में बेचे या फिर अगर इन  केन्द्रों पर खरीद हुई  भी तो पैसे महीनों तक नहीं मिलते थे।                                                                                                                      
खुले  बाज़ार में अरहर की दाल के सस्ते  होने  का कारण था म्यांमार, तंज़ानिया,                      मोज़ाम्बीक  और मलावी ऐसे  देशों से दाल की आयत. सरकार ने एडवांस इन्टेलिजेंस से यह जानकारी नहीं ली कि भारत में इस साल  दलहन उत्पादन की क्या स्थिति रहेगी. अगर यह पता होता कि अरहर की दाल  का  उत्पादन डेढ गुना होने जा रहा है तो सरकार यह भी जान जाती कि भारत में  जितनी दाल की खपत हर साल  होती  है वह घरेलू उत्पादन से हीं पूरी की जा सकती है. महाराष्ट्र और    मध्यप्रदेश दलहन उत्पादन  के लिए जाना  जाता  है. वहां का किसान आज अपने को ठगा महसूस  कर रहा है.                        
                                                                                                                                                                                                                      
अब किसान आक्रोश के दीर्धकालीन कारणों पर आते हैं. देश में ७७ प्रतिशत किसानों के  पास दो हेक्टेयर से कम जमीन है और ७० साल के प्रजातन्त्र में किसानों को अन्नदाता कह कर बेवक़ूफ़ बनाने वाले सत्ताभोगी अभिजात्य वर्ग ने आज तक मात्र ४५ प्रतिशत जमीन पर हीं सिंचाई की  व्यवस्था की है बाकि ५५ प्रतिशत खेती  इंद्रा भगवान् के भरोसे होती हैं. यह समझने के लिए कि किसान को  एक हेक्टेयर में कितनी सालाना आय होती है आइन्स्टीन की दिमाग नहीं  चाहिए. किसान को सिर्फ परिवार के पेट पालने के लिए भी अन्य लोगों  की खेती किराये पर लेनी होती है. यह अन्य लोग कुलीन वर्ग के हैं जो बड़ी नौकरी या बड़ा बिज़नस  करने बड़े शहरों में डेरा जमाये हैं  और अपनी खेती  गरीब काश्तकारों को २५,००० से ३०,००० रुपये प्रति हेक्टेयर की दर से  दे कर शहरों में  एयर कंडिशन्ड बंगलों में रौनकआफरोज़ होते हैं. और अपने  काले धन  को  खेती से  हुई आय दिखा कर सफ़ेद कर लेते हैं. अगर इस  किराये को  किसान के खर्ज में जोड़ दिया जाये तो दरअसल उसे खेती से  बहुत कम आय हो पाती है. आज ज़रुरत इस बात की है कि लघु व सीमान्त किसानों को जो किराये पर जमीन ले कर खेती  करते  हैं उन्हें अलग से उत्पाद का  मूल्य दिया जाये.                                                         
आखिर किसान की स्थिति की वजह क्या है? किसानों की समस्या को पिछले ३०० सालों से कभी भी गहराई से नहीं समझा गया. सत्ता चाहे मुग़लों की रही या अंग्रेजों या वर्तमान में प्रजातंत्र के  नाम पर अभिजात्य वर्ग की, सबने इसे शोषण का साधन बनाया. कोड़े मार कर “तीन कठिया” (१५ प्रतिशत खेत में  जबरन नील की खेती की  मजबूरी) स्कीम में बिहार में  नील की खेती कराई गयी तो थॉमस  मुनरो की रैयतवारी व्यवस्था में इस पर जबरदस्त टैक्स लाद  कर ईस्ट इंडिया कंपनी ऐश करती रही और वारेन हेस्टिंग्स ने जमींदारी की व्यवस्था ला कर किसानों की रही सही कमर तोड़ दी.

जहाँ सन २००० में भारत के एक फीसदी अभिजात्य वर्ग के पास देश की ३७  प्रतिशत पूंजी  होती थी,  सन  २००५ में वह बढ़ कर ४२ प्रतिशत, सन २०१० में ४८ प्रतिशत, सन २०१२ में ५२ प्रतिशत  और आज वह बढ़ कर ५८.४  प्रतिशत  हो गयी है. बढ़ती गरीब-अमीर की खाई भी इन आंदोलनों का  एक बड़ा कारण  हैं.          

लेकिन मोदी सरकार की कृषि क्षेत्र में कुछ  क्रांतिकारी कदमों को भी समझने की ज़रुरत है. फसल बीमा योजना,  यूरिया पर नीम  की परत, किसानों को मृदा-स्वास्थ्य  कार्ड और बैंक खाते  में मदद का पैसा सीधा जमा करना भ्रष्टाचार की  जड़ पर हमला है. और अगर राज्य सरकारें  इस क्रांतिकारी  योजनाओं  पर  राजनीति छोड़ कर अमल करें तो  देश में किसानों की  हालत काफी हद तक बदली जा सकती है.  

lokmat

Thursday, 8 June 2017

सत्ता का निर्लज्ज भाव


बिहार में दो खबरें आयी. पहली बोर्ड  की परीक्षाओं का रिजल्ट मात्र ३० प्रतिशत हुआ है; और दूसरी, जिसने पूरे बिहार बोर्ड में टॉप किया है वह अपने विषय की आधारभूत समझ भी नहीं  रखता और सैकड़ों ऐसे छात्र है जो बेहद कठिन जी ई ई मैन्स (आई आई टी में दाखिले के लिए) पास करके एडवांस तक पहुंचे उन्हें  बिहार बोर्ड की परीक्षा में फ़िज़िक्स या मैथ्स मे मात्र एक या पांच नंबर आये. उग्र छात्र लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं. परीक्षा में उत्तर  पुस्तिकाओं का मूल्यांकन चौतरफा शंका के  घेरे में  है.

अब जरा बिहार के मुख्यमंत्री (सुशासन  बाबू) का जवाब सुनिये. हंगामे के कई दिन बाद मीडिया से मुखातिब होते हुए उन्होंने उलाहना भरे स्वर और आरोप वाली उग्रता का मिश्रित भाव व्यक्त करते हुए प्रेस कांफ्रेंस में कहा “ सरकार की इस बात पर प्रशंसा की जानी चाहिए कि तमाम वर्षों से होते आ  रहे नक़ल को अपनी दृढ प्रतिज्ञा से ख़त्म किया गया नतीजतन (जो रिजल्ट सालों से ८० प्रतिशत के आस  पास होता था) आज मात्र ३० प्रतिशत बच्चे पास हो रहे हैं”.

नीतीश ने खूबसूरती से  (या भौंडे कुतर्क से) इस आरोप का जवाब नहीं दिया कि जो बच्चे  आई आई टी मेन्स का इम्तेहान पास कर लेते हैं  वे राज्य के बोर्ड  की फिजिक्स की साधारण परीक्षा में कैसे फ़ेल  हो जाते है और कैसे ४५- वर्षीय गणेश कुमार कुल १३ लाख परीक्षार्थियों के बीच कला वर्ग में ८२.६ प्रतिशत पा कर टॉप करता है जबकि उसे संगीत का एक घराना नहीं मालूम न हीं उसे किसी वाद्ययंत्र बजाने या  राग –सुर में अंतर की समझ है, टॉप  कर जाता  है. मुख्यमंत्री  का तर्कविहीन (खूंटा वहीं गड़ेगा” वाले  तेवर में ) जवाब सुनिए: अरे! जैसे  हीं पता चला कि उसकी उम्र ज्यादा है तो  हमारे अधिकारी तत्काल छान-बीन किये और पता चला कि  उसने अपनी उम्र का फर्जी प्रमाण पत्र दिया है. उस के  खिलाफ तत्काल कानूनी कारवाई  की गयी”. नीतीश ने यह नहीं बताया इस तरह का व्यक्ति सभी विषयों में अच्छे अंक  पा कर टॉप कैसे कर सका? संवाद की  जमीन छोड़ कर तर्क को अन्य मुद्दे पर ले जाना वितंडावाद का दोष माना जाता है. पूछा  जा रहा है कि फर्जी व्यक्ति ने जो विषय की मौलिक जानकारी नहीं रखता टॉप कैसे  किया तो मुख्यमंत्री जी  अपनी पीठ थपथपाते हुए मीडिया की समझ को कोसते  हुए बताते हैं कि उनके अफसर कितने सक्षम हैं कि फ़ौरन कानूनी करवाई करते है. यह अलग बात है कि यह रहस्य  भी मीडिया ने हीं उजागर किया कि उसने फर्जी जन्म प्रमाण  पत्र  दिया है और यह कि विषयों के बारे में उसे कुछ नहीं आता. अफसर तो मीडिया के कवरेज से उपजे जन-आक्रोश को नहीं झेल पाने की  वजह से करवाई कर रहे हैं. अगर असली कारवाई करनी थी तो पूरे शिक्षा विभाग पर करनी चाहिए थी कि गलत मार्क्स कैसे मिले. हकीकत यह है  कि उन दिनों शिक्षकों की हड़ताल थी और इंटरमीडिएट की कापियां कक्षा  ६ और ७ के अध्यापकों और अध्यापिकाओं से जंचवायी  गयीं.
                                                                        
गौर कीजिये उस मुख्यमंत्री  के भौंडे बचाव पर जो न केवल तर्क-शास्त्र की अज्ञानता का शिकार है बल्कि सत्ता मद में सरकार की ग़लतियों को दिखाने का दोषी भी मीडिया  को मान रहा है. नीतीश के जवाब  पर सवाल खड़े होते हैं. पहला: नक़ल  रोकना सरकार की जिम्मेदारी है. नीतीश पिछले १५ साल में १२ साल से सरकार में हैं. तो अगर १२ साल नालायक बच्चे नक़ल करके नौकरियां पाते रहे और जो बच्चे  नक़ल नहीं करते थे  वे सही मूल्याँकन न होने के शिकार होते रहे तो यह अपराध  किसके सर जाना चाहिए? दूसरा: अगर नक़ल रोकी गयी और रिजल्ट अचानक ८० प्रतिशत से  ३० प्रतिशत गिर गया तो क्या इसका सीधा मतलब  यह  नहीं है  कि पिछले १५  साल में भी  पढाई  नहीं हुई  और आज भी शिक्षा विभाग की अकर्मण्यता  के कारण मात्र  ३० प्रतिशत बच्चे पास हो सके. तो क्या मीडिया को सिर्फ नीतीश के नक़ल रोकने का गुणगान करके चुप हो जाना चाहिए? तीसरा: मीडिया को कोसने के पहले इस  सवाल  का जबाव भी देना था  कि क्यों पिछले १२ साल के उनके शासन के दौरान शिक्षा की यह स्थिति हुई कि नक़ल होता रहा और जब नक़ल रोका गया तो रिजल्ट जमीन पर आ गया. मुख्यमंत्री की किस बात की तारीफ की जाये : नक़ल रोकने ११ साल अक्षम रहने की  या नक़ल रोक कर शिक्षा की गुणवता की कलाई खुल  जाने की?    

चौथा सवाल: क्या नक़ल रोकने की प्रशासनिक दृढ़ता  नीतीश बाबू ने स्वतः किया  है ?  जी नहीं, पिछले साल जब  एक चैनल के रिपोर्टर ने टॉप  करने  वाली रूबी से सवाल किया कि उसने कौन से विषयों ले रखे  हैं तो वह विषय का नाम तक ठीक से  नहीं जानती थी. फिर उसने एक और इंटरव्यू  में कहा कि  “  मैं तो पापा से खाली  पास  करवाने  को कहा था , उन्होंने तो टॉप हीं करवा दिया” तब जाके  बिहार  के शिक्षा माफियाओं के वर्चस्व का राज खुला और यह पता चला कि कैसे  सालों-दर-साल पैसे दे कर परीक्षा  में फर्जी ढंग से पास-फेल का खेल चलता रहा है. और कैसे शिक्षा विभाग  के अफसर और माफिया के साथ-गाँठ से बिहार में शिक्षा की यह हालत हुई है.  मीडिया में जब यह खबर राष्ट्रव्यारी स्तर पर चली तो “सुशासन बाबू”  के लिए मुंह छिपाने  की जगह नहीं थी नतीजतन नक़ल पर इस साल रोक लगी. लेकिन कापी जांचने में धांधली पर नहीं.

सत्ता सत्य को अलग चश्में से देखती है. बिहार के मुख्यमंत्री की माने तो अच्छी बात की तारीफ मीडिया को  करनी चाहिए. याने हांफ-हांफ  के मीडिया को  यह बताना था कि नीतीश बाबू की सरकार का कमाल देखिये कि सख्ती की वजह से बिहार का रिजल्ट गिरा. क्या प्रशासन एक बार  में एक हीं काम  करता है? इसका तो मतलब यह हुआ कि इस साल रिजल्ट गिरा, अगले साल पढ़ाई में गुणात्मक परिवर्तन होगा और उसके अगले साल कापियों  का मूल्यांकन भी ठीक तरीके से होगा. अगर मुख्यमंत्री का यह सोचना है तो अगले तीन साल के  लिए आप बिहार  से परीक्षा न दें क्योंकि नीतीश बाबू  शिक्षा में क्रांति के मुद्दे पर कटिबद्ध हैं !  

तभी तो मुख्यमंत्री ने प्रेस कांफ्रेंस मे मीडिया से प्रति-प्रश्न किया, "आइडियल (आदर्श) व्यवस्था पूरे देश में एक जगह भी दिखा दीजिये?" जब शीर्ष सत्ता पर बैठा व्यक्ति अपनी अकर्मण्यता के लिये "आदर्श स्थिति के नैसर्गिक अभाव" का बचाव ले तो राज्य के भविष्य की चिन्ता होती है।     

lokmat

Saturday, 3 June 2017

भारतीय संस्कृति : कैसे ख़िलाफ़ हुई विश्व-अवधारणा



इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र भारतीय संस्कृति को पुनर्प्रतिष्ठित करने और उसमें काल- व स्थिति सापेक्ष सुधार करने के लिए एक नए  प्रयास का सूत्रपात किया है. पिछले दो सौ सालों के अंग्रेज़ी शासन काल के दौरान जिस तरह इस संस्कृति को दुनिया में असभ्य, बर्बर, आदिम और मृतप्राय बताने  का सफल कुचक्र चला और जिससे आज भी वाम चिन्तक प्रभावित है, उसे ठीक करने के  लिए शायद हाल के दौर में यह पहला सार्थक  प्रयास होगा. लेकिन यह जरूरत क्यों पडी कि  हम अपनी हीं संस्कृति को  अपने  हीं  लोगों के बीच “पुनर्प्रतिष्ठापित” कर रहे  हैं , इसे समझने की ज़रूरत है। 

ठीक दो सौ साल पहले इस वर्ष (१८१७) एक साजिश हुई ईस्ट  इंडिया कम्पनी और ब्रितानी शासन द्वारा. इस साजिश का उद्देश्य था ब्रितानी संसद को इस बात के  लिए प्रभावित करना कि कम्पनी भारत में अच्छा शासन दे रही  है और यह बताना कि दरअसल कंपनी को व्यापर से जो लाभ होता है उससे ज्यादा खर्च तो एक असभ्य, आदिम  और बर्बर भारतीय समाज को शासित करने में लग जाता है. इस योजना के तहत कुल छः खण्डों में एक किताब लिखी गयी (या लिखवाई गयी) जिसका नाम था “द हिस्ट्री ऑफ़ ब्रिटिश इंडिया”. इसके लेखक जेम्स मिल कभी भारत नहीं आये, किसी भी भारतीय भाषा को नहीं पढ़ा, किसी भी उन अधिकारियों या तत्कालीन देशी या विदेशी विद्वानों से जो भारतीय समाज के बारे में अच्छी सोच रखते थे और लिखते थे, बात नहीं की. लेकिन इस किताब के जरिये बनाई गयी भारत विरोधी छवि ने अगले दो सौ सालों तक भारत के ख़िलाफ़ पूरी दुनिया में हीं नहीं अपने देश के वाम बुद्धिजीवियों की सोच को भी आज तक प्रभावित रखा. जो कमी थी इस भारत  विरोधी बौद्धिक अभियान में उसे अगले लगभग सौ साल बाद अमरीकी लेखिका कैथेरिन मेयो ने “मदर इंडिया” लिख कर पूरी कर दी. यह किताब अमेरिका और यूरोप में इतनी लोकप्रिय हुई कि सन १९२७ में इसके छपने की एक साल के भीतर २१ संस्करण निकाले गए और कोई दस लाख से ज्यादा लोगों ने इसे पढ़ा.  

जेम्स मिल के बायोग्राफर ब्रूस माज्लिश के अनुसार जेम्स मिल को रोज़ी- रोटी के लिए १८०२ पादरी की नौकरी भी नहीं मिली तो वह इंग्लैंड पहुंचे. वहां पर स्थिति को समझते हुए इस पुस्तक पर काम शुरू किया और इस बीच अपने लेखों से ब्रिटिश संसद को भारत के बारे में नकारात्मक तथ्य देते रहे. इस पुस्तक के लिखने के पुरस्कार स्वरुप कंपनी में ऊँचे ओहदे और ऊँची पगार वाली नौकरी मिली. यह तन्खवाह अगले १७ सालों में ८०० पौंड से बढ़ कर २००० पौंड हो  गयी  और  जेम्स ने अपने बेटे और जाने-माने राजनीतिक दार्शनिक जॉन स्टुअर्ड मिल को भी कम्पनी में नौकरी लगवा ली. बाप-बेटे का काम  ब्रिटिश संसद औए  सत्ता की  सोच को प्रभावित करना था ताकि कंपनी भारत पर शासन करती रहे. जब पुस्तक में भारतीय संस्कृत की कटु आलोचना को लेकर जेम्स मिल से यह सवाल किया गया कि बिना भारत गए या बगैर कोई भारतीय भाषा जाने भारतीय संस्कृति पर इतने आक्षेप कैसे लगाये तो जेम्स ने अपनी पुस्तक की प्रस्तावना में हीं अपनी इस कमी को कैसे नैतिकता का लबादा पहनाया, देखें.

“एक उपयुक्त रूप से शिक्षित व्यक्ति इंग्लैंड के अपने घर की आलमारी  की किताबों से भारत के बारे में मात्र एक साल में उतनी जानकारी हासिल कर सकता है जितनी कोई व्यक्ति भारत में अपनी आँख-कान खोल कर पूरी जिन्दगी लगाने  के बाद भी नहीं हासिल कर सकता. भारत न जाना और भारतीय भाषाएँ न जाना हीं हमारे पूर्वाग्रह न होने और हमारे वस्तुपरक होने की निशानी है”.

इस पुस्तक में ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपना भविष्य देखा और अगले ४० वर्षों तक (सन १८५८ में भारत का शासन सीधे ब्रिटिश सरकार के पास आ गया) इसे "प्रशासनिक गीता" के रूप में मान्यता दी गयी. हर अँगरेज़ अफसर को जो भारत में भेजे जाने के लिए कंपनी नियुक्त करती थी तीन महीने तक इस छः खण्डों की पुस्तकमाला को पूरी तरह आत्मसात करना होता था. लिहाज़ा जो भी अफसर भारत की सरजमीं पर कदम  रखता था उसका भाव यही होता था कि एक जाहिल, बर्बर, जंगली और मृतप्राय समाज पर शासन करना है.

जब जेम्स मिल को पुरस्कार-स्वरुप कंपनी में ऊँचे पड़ वाली नौकरी दी गयी तो उसी साल कम्पनी एक अन्य व्यक्ति – थॉमस मुनरो – को मद्रास का गवर्नर बनाती है. इस अधिकारी को आज भी भारत में रैयतवारी सिस्टम का जनक माना जाता है. कई दशको भारत में रह कर अपने अनुभव के बाद मुनरो का क्या कहना था यह एक अन्य अधिकारी और मशहूर भारतविद मेजर-जनरल स्लीमन की पुस्तक “रम्बल्स एंड रिकलेक्शन्स” में मिलता है:

“सर थॉमस मुनरो  ने सही कहा था – मैं नहीं  जानता कि भारत के लोगों का सभ्यीकरण (सिविलाइज़िंग द पीपल ऑफ़ इंडिया) के क्या मायने  होते हैं. हो सकता है ये (भारतीय) सुशासन के सिद्धांत और व्यवहार में उतने  परिपक्व न हों लेकिन अगर एक अच्छे कृषि सिस्टम की बात हो, अगर बेहतरीन विनिर्माण की बात हो, अगर पढ़ने -लिखने के लिए स्कूलों की बात हो, अगर आम व्यवहार और आतिथ्य  की बात हो और सबसे अधिक अगर महिलाओं के प्रति ईमानदार सम्मान की बात हो और अगर  इन सब गुणों को सभ्य समाज के अपरिहार्य कारक माने जाते हों तो मैं यह कह सकता हूँ कि हिन्दू यूरोप के लोगों के मुक़ाबले सभ्यता के स्तर पर  कहीं भी पीछे नहीं हैं”.

स्लीमन को  भारत के अँगरेज़ अधिकारियों में सबसे सफल और जमीन  पर काम करने  वाला माना गया. पूरे भारत से  ठगी. जरायम और  अन्य अपराधों को ख़त्म करने का श्रेय स्लीमन  को जाता  है. स्लीमन ने अपनी इस किताब के पहले  अध्याय में हीं एक किस्सा  लिखा है. सन १८२४  में बंगाल के बैरकपुर में भारतीय सैनिकों ने अँगरेज़ अधिकारियों द्वारा किये जा रहे उत्पीडन के खिलाफ सिपाही बिंदी तिवारी के नेतृत्व में बगावत की. लेकिन साथ हीं  यह  भी प्रतिज्ञा ली कि किसी भी अँगरेज़ बच्चे या महिला के साथ  कोई  दुर्व्यवहार  नहीं होगा. स्लीमन  लिखते  हैं: बगावत  के माहौल में भी अँगरेज़ अफसर अपनी पत्नियों और  बच्चों को भारतीय  सिपाहियों की देखरेख में छोड़ कर जंगलों  में शिकार के  लिए  निकल जाया करते थे क्योंकि उन्हें भरोसा  था  कि भारतीय  सैनिक महिलाओं और बच्चों की हफाज़त के लिए अपनी जान भी दे देंगे”.

जहाँ विश्व विख्यात चिन्तक हीगेल ने अपने जीवन के अंतिम  काल में गीता की महानता को समझा और मुहर लगायी वहीं जेम्स इसे पाश्चात्य मूल्यों की नक़ल बताकर हाल की हिन्दुवादी धूर्तता की उपज बताता है।                                                                                                                                                              
ज्ञानमीमांसा में एक तर्क-दोष का जिक्र है जिसे कहते हैं --- संवाद की पृष्ठभूमि से हट कर कुछ चुनिन्दा तथ्यों से अपने पूर्व-निर्धारित निष्कर्ष पर पहुँचाना (सेलेक्टिव अप्प्रोप्रिएशन ऑफ़ फैक्ट्स). इन दोनों लेखकों ने अपनी पुस्तकों में  इसका पूरा इस्तेमाल किया और भारत को एक ऐसा समाज बताया जहाँ सामान्य सभ्यता से काफी पीछे हैं और जिन्हें शासित करना अंग्रेजों के लिए बेहद मुश्किल है. यह कहते  हुए दोनों लेखकों का प्रयास यह बताने का रहा कि अहसान है अंग्रेज़ी हुकूमत का इस भारतीय  जाहिलों  को जीना सिखा रही है. इस पुस्तक माला के द्वितीय खंड में हिन्दू संस्कृति की चर्चा है और  इसे  कई जगहों पर इसे घटिया बताया गया. जेम्स का मानना है महाभारत ऐसे कई ग्रन्थ अंग्रेजों के ज्ञान, जीवन मूल्य, आदर्शों को लेकर मात्र ३०० सौ साल पहले लिखे गए.

गौर करने की बात है कि आर्यभट्ट ने खगोल शास्त्र और सौर मंडल की ग्रहों के चालन की पूरी अकाट्य गणना पांचवीं सदी में की थी  जिसे ईरानी  विद्वान् अलबेरुनी ने ५०० वर्ष बाद भूरि –भूरि प्रशंसा  करते हुए अपने  देश के विद्वानों को बताया लेकिन जेम्स इसको  भी नकारता है. यह अलग बात है कि लगभग १००० साल बाद भी आर्यभट्ट को सही ठहराते हुए जब गैलिलीयो और कापरनिकस सूर्य को स्थिर और प्रृथ्वी के घूमने की बात कहते है तो यूरोप के शासक उन्हें सज़ा देते है क्योंकि यह बात ईसाइयों के धार्मिक अवधारणा का चूलें हिला देता है। फिर जंगली और बर्बर कौन हुआ? 

आज  समय आ गया है जब भारत के विद्वान् फिर से भारतीय (तथाकथित हिन्दू ) संस्कृति और ज्ञान को पुनर्प्रतिष्ठापित करें और पश्चिमी वितंडावाद से प्रभावित भारत के वामपंथी बुद्धिजीवियों को हक़ीक़त से रूबरू करायें।इन्दिरागाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र का यह प्रयास एक बेहद सार्थक और चिर-प्रतीक्षित प्रयास कहा जा  सकता है.  

lokmat