Thursday, 8 June 2017

सत्ता का निर्लज्ज भाव


बिहार में दो खबरें आयी. पहली बोर्ड  की परीक्षाओं का रिजल्ट मात्र ३० प्रतिशत हुआ है; और दूसरी, जिसने पूरे बिहार बोर्ड में टॉप किया है वह अपने विषय की आधारभूत समझ भी नहीं  रखता और सैकड़ों ऐसे छात्र है जो बेहद कठिन जी ई ई मैन्स (आई आई टी में दाखिले के लिए) पास करके एडवांस तक पहुंचे उन्हें  बिहार बोर्ड की परीक्षा में फ़िज़िक्स या मैथ्स मे मात्र एक या पांच नंबर आये. उग्र छात्र लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं. परीक्षा में उत्तर  पुस्तिकाओं का मूल्यांकन चौतरफा शंका के  घेरे में  है.

अब जरा बिहार के मुख्यमंत्री (सुशासन  बाबू) का जवाब सुनिये. हंगामे के कई दिन बाद मीडिया से मुखातिब होते हुए उन्होंने उलाहना भरे स्वर और आरोप वाली उग्रता का मिश्रित भाव व्यक्त करते हुए प्रेस कांफ्रेंस में कहा “ सरकार की इस बात पर प्रशंसा की जानी चाहिए कि तमाम वर्षों से होते आ  रहे नक़ल को अपनी दृढ प्रतिज्ञा से ख़त्म किया गया नतीजतन (जो रिजल्ट सालों से ८० प्रतिशत के आस  पास होता था) आज मात्र ३० प्रतिशत बच्चे पास हो रहे हैं”.

नीतीश ने खूबसूरती से  (या भौंडे कुतर्क से) इस आरोप का जवाब नहीं दिया कि जो बच्चे  आई आई टी मेन्स का इम्तेहान पास कर लेते हैं  वे राज्य के बोर्ड  की फिजिक्स की साधारण परीक्षा में कैसे फ़ेल  हो जाते है और कैसे ४५- वर्षीय गणेश कुमार कुल १३ लाख परीक्षार्थियों के बीच कला वर्ग में ८२.६ प्रतिशत पा कर टॉप करता है जबकि उसे संगीत का एक घराना नहीं मालूम न हीं उसे किसी वाद्ययंत्र बजाने या  राग –सुर में अंतर की समझ है, टॉप  कर जाता  है. मुख्यमंत्री  का तर्कविहीन (खूंटा वहीं गड़ेगा” वाले  तेवर में ) जवाब सुनिए: अरे! जैसे  हीं पता चला कि उसकी उम्र ज्यादा है तो  हमारे अधिकारी तत्काल छान-बीन किये और पता चला कि  उसने अपनी उम्र का फर्जी प्रमाण पत्र दिया है. उस के  खिलाफ तत्काल कानूनी कारवाई  की गयी”. नीतीश ने यह नहीं बताया इस तरह का व्यक्ति सभी विषयों में अच्छे अंक  पा कर टॉप कैसे कर सका? संवाद की  जमीन छोड़ कर तर्क को अन्य मुद्दे पर ले जाना वितंडावाद का दोष माना जाता है. पूछा  जा रहा है कि फर्जी व्यक्ति ने जो विषय की मौलिक जानकारी नहीं रखता टॉप कैसे  किया तो मुख्यमंत्री जी  अपनी पीठ थपथपाते हुए मीडिया की समझ को कोसते  हुए बताते हैं कि उनके अफसर कितने सक्षम हैं कि फ़ौरन कानूनी करवाई करते है. यह अलग बात है कि यह रहस्य  भी मीडिया ने हीं उजागर किया कि उसने फर्जी जन्म प्रमाण  पत्र  दिया है और यह कि विषयों के बारे में उसे कुछ नहीं आता. अफसर तो मीडिया के कवरेज से उपजे जन-आक्रोश को नहीं झेल पाने की  वजह से करवाई कर रहे हैं. अगर असली कारवाई करनी थी तो पूरे शिक्षा विभाग पर करनी चाहिए थी कि गलत मार्क्स कैसे मिले. हकीकत यह है  कि उन दिनों शिक्षकों की हड़ताल थी और इंटरमीडिएट की कापियां कक्षा  ६ और ७ के अध्यापकों और अध्यापिकाओं से जंचवायी  गयीं.
                                                                        
गौर कीजिये उस मुख्यमंत्री  के भौंडे बचाव पर जो न केवल तर्क-शास्त्र की अज्ञानता का शिकार है बल्कि सत्ता मद में सरकार की ग़लतियों को दिखाने का दोषी भी मीडिया  को मान रहा है. नीतीश के जवाब  पर सवाल खड़े होते हैं. पहला: नक़ल  रोकना सरकार की जिम्मेदारी है. नीतीश पिछले १५ साल में १२ साल से सरकार में हैं. तो अगर १२ साल नालायक बच्चे नक़ल करके नौकरियां पाते रहे और जो बच्चे  नक़ल नहीं करते थे  वे सही मूल्याँकन न होने के शिकार होते रहे तो यह अपराध  किसके सर जाना चाहिए? दूसरा: अगर नक़ल रोकी गयी और रिजल्ट अचानक ८० प्रतिशत से  ३० प्रतिशत गिर गया तो क्या इसका सीधा मतलब  यह  नहीं है  कि पिछले १५  साल में भी  पढाई  नहीं हुई  और आज भी शिक्षा विभाग की अकर्मण्यता  के कारण मात्र  ३० प्रतिशत बच्चे पास हो सके. तो क्या मीडिया को सिर्फ नीतीश के नक़ल रोकने का गुणगान करके चुप हो जाना चाहिए? तीसरा: मीडिया को कोसने के पहले इस  सवाल  का जबाव भी देना था  कि क्यों पिछले १२ साल के उनके शासन के दौरान शिक्षा की यह स्थिति हुई कि नक़ल होता रहा और जब नक़ल रोका गया तो रिजल्ट जमीन पर आ गया. मुख्यमंत्री की किस बात की तारीफ की जाये : नक़ल रोकने ११ साल अक्षम रहने की  या नक़ल रोक कर शिक्षा की गुणवता की कलाई खुल  जाने की?    

चौथा सवाल: क्या नक़ल रोकने की प्रशासनिक दृढ़ता  नीतीश बाबू ने स्वतः किया  है ?  जी नहीं, पिछले साल जब  एक चैनल के रिपोर्टर ने टॉप  करने  वाली रूबी से सवाल किया कि उसने कौन से विषयों ले रखे  हैं तो वह विषय का नाम तक ठीक से  नहीं जानती थी. फिर उसने एक और इंटरव्यू  में कहा कि  “  मैं तो पापा से खाली  पास  करवाने  को कहा था , उन्होंने तो टॉप हीं करवा दिया” तब जाके  बिहार  के शिक्षा माफियाओं के वर्चस्व का राज खुला और यह पता चला कि कैसे  सालों-दर-साल पैसे दे कर परीक्षा  में फर्जी ढंग से पास-फेल का खेल चलता रहा है. और कैसे शिक्षा विभाग  के अफसर और माफिया के साथ-गाँठ से बिहार में शिक्षा की यह हालत हुई है.  मीडिया में जब यह खबर राष्ट्रव्यारी स्तर पर चली तो “सुशासन बाबू”  के लिए मुंह छिपाने  की जगह नहीं थी नतीजतन नक़ल पर इस साल रोक लगी. लेकिन कापी जांचने में धांधली पर नहीं.

सत्ता सत्य को अलग चश्में से देखती है. बिहार के मुख्यमंत्री की माने तो अच्छी बात की तारीफ मीडिया को  करनी चाहिए. याने हांफ-हांफ  के मीडिया को  यह बताना था कि नीतीश बाबू की सरकार का कमाल देखिये कि सख्ती की वजह से बिहार का रिजल्ट गिरा. क्या प्रशासन एक बार  में एक हीं काम  करता है? इसका तो मतलब यह हुआ कि इस साल रिजल्ट गिरा, अगले साल पढ़ाई में गुणात्मक परिवर्तन होगा और उसके अगले साल कापियों  का मूल्यांकन भी ठीक तरीके से होगा. अगर मुख्यमंत्री का यह सोचना है तो अगले तीन साल के  लिए आप बिहार  से परीक्षा न दें क्योंकि नीतीश बाबू  शिक्षा में क्रांति के मुद्दे पर कटिबद्ध हैं !  

तभी तो मुख्यमंत्री ने प्रेस कांफ्रेंस मे मीडिया से प्रति-प्रश्न किया, "आइडियल (आदर्श) व्यवस्था पूरे देश में एक जगह भी दिखा दीजिये?" जब शीर्ष सत्ता पर बैठा व्यक्ति अपनी अकर्मण्यता के लिये "आदर्श स्थिति के नैसर्गिक अभाव" का बचाव ले तो राज्य के भविष्य की चिन्ता होती है।     

lokmat

Saturday, 3 June 2017

भारतीय संस्कृति : कैसे ख़िलाफ़ हुई विश्व-अवधारणा



इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र भारतीय संस्कृति को पुनर्प्रतिष्ठित करने और उसमें काल- व स्थिति सापेक्ष सुधार करने के लिए एक नए  प्रयास का सूत्रपात किया है. पिछले दो सौ सालों के अंग्रेज़ी शासन काल के दौरान जिस तरह इस संस्कृति को दुनिया में असभ्य, बर्बर, आदिम और मृतप्राय बताने  का सफल कुचक्र चला और जिससे आज भी वाम चिन्तक प्रभावित है, उसे ठीक करने के  लिए शायद हाल के दौर में यह पहला सार्थक  प्रयास होगा. लेकिन यह जरूरत क्यों पडी कि  हम अपनी हीं संस्कृति को  अपने  हीं  लोगों के बीच “पुनर्प्रतिष्ठापित” कर रहे  हैं , इसे समझने की ज़रूरत है। 

ठीक दो सौ साल पहले इस वर्ष (१८१७) एक साजिश हुई ईस्ट  इंडिया कम्पनी और ब्रितानी शासन द्वारा. इस साजिश का उद्देश्य था ब्रितानी संसद को इस बात के  लिए प्रभावित करना कि कम्पनी भारत में अच्छा शासन दे रही  है और यह बताना कि दरअसल कंपनी को व्यापर से जो लाभ होता है उससे ज्यादा खर्च तो एक असभ्य, आदिम  और बर्बर भारतीय समाज को शासित करने में लग जाता है. इस योजना के तहत कुल छः खण्डों में एक किताब लिखी गयी (या लिखवाई गयी) जिसका नाम था “द हिस्ट्री ऑफ़ ब्रिटिश इंडिया”. इसके लेखक जेम्स मिल कभी भारत नहीं आये, किसी भी भारतीय भाषा को नहीं पढ़ा, किसी भी उन अधिकारियों या तत्कालीन देशी या विदेशी विद्वानों से जो भारतीय समाज के बारे में अच्छी सोच रखते थे और लिखते थे, बात नहीं की. लेकिन इस किताब के जरिये बनाई गयी भारत विरोधी छवि ने अगले दो सौ सालों तक भारत के ख़िलाफ़ पूरी दुनिया में हीं नहीं अपने देश के वाम बुद्धिजीवियों की सोच को भी आज तक प्रभावित रखा. जो कमी थी इस भारत  विरोधी बौद्धिक अभियान में उसे अगले लगभग सौ साल बाद अमरीकी लेखिका कैथेरिन मेयो ने “मदर इंडिया” लिख कर पूरी कर दी. यह किताब अमेरिका और यूरोप में इतनी लोकप्रिय हुई कि सन १९२७ में इसके छपने की एक साल के भीतर २१ संस्करण निकाले गए और कोई दस लाख से ज्यादा लोगों ने इसे पढ़ा.  

जेम्स मिल के बायोग्राफर ब्रूस माज्लिश के अनुसार जेम्स मिल को रोज़ी- रोटी के लिए १८०२ पादरी की नौकरी भी नहीं मिली तो वह इंग्लैंड पहुंचे. वहां पर स्थिति को समझते हुए इस पुस्तक पर काम शुरू किया और इस बीच अपने लेखों से ब्रिटिश संसद को भारत के बारे में नकारात्मक तथ्य देते रहे. इस पुस्तक के लिखने के पुरस्कार स्वरुप कंपनी में ऊँचे ओहदे और ऊँची पगार वाली नौकरी मिली. यह तन्खवाह अगले १७ सालों में ८०० पौंड से बढ़ कर २००० पौंड हो  गयी  और  जेम्स ने अपने बेटे और जाने-माने राजनीतिक दार्शनिक जॉन स्टुअर्ड मिल को भी कम्पनी में नौकरी लगवा ली. बाप-बेटे का काम  ब्रिटिश संसद औए  सत्ता की  सोच को प्रभावित करना था ताकि कंपनी भारत पर शासन करती रहे. जब पुस्तक में भारतीय संस्कृत की कटु आलोचना को लेकर जेम्स मिल से यह सवाल किया गया कि बिना भारत गए या बगैर कोई भारतीय भाषा जाने भारतीय संस्कृति पर इतने आक्षेप कैसे लगाये तो जेम्स ने अपनी पुस्तक की प्रस्तावना में हीं अपनी इस कमी को कैसे नैतिकता का लबादा पहनाया, देखें.

“एक उपयुक्त रूप से शिक्षित व्यक्ति इंग्लैंड के अपने घर की आलमारी  की किताबों से भारत के बारे में मात्र एक साल में उतनी जानकारी हासिल कर सकता है जितनी कोई व्यक्ति भारत में अपनी आँख-कान खोल कर पूरी जिन्दगी लगाने  के बाद भी नहीं हासिल कर सकता. भारत न जाना और भारतीय भाषाएँ न जाना हीं हमारे पूर्वाग्रह न होने और हमारे वस्तुपरक होने की निशानी है”.

इस पुस्तक में ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपना भविष्य देखा और अगले ४० वर्षों तक (सन १८५८ में भारत का शासन सीधे ब्रिटिश सरकार के पास आ गया) इसे "प्रशासनिक गीता" के रूप में मान्यता दी गयी. हर अँगरेज़ अफसर को जो भारत में भेजे जाने के लिए कंपनी नियुक्त करती थी तीन महीने तक इस छः खण्डों की पुस्तकमाला को पूरी तरह आत्मसात करना होता था. लिहाज़ा जो भी अफसर भारत की सरजमीं पर कदम  रखता था उसका भाव यही होता था कि एक जाहिल, बर्बर, जंगली और मृतप्राय समाज पर शासन करना है.

जब जेम्स मिल को पुरस्कार-स्वरुप कंपनी में ऊँचे पड़ वाली नौकरी दी गयी तो उसी साल कम्पनी एक अन्य व्यक्ति – थॉमस मुनरो – को मद्रास का गवर्नर बनाती है. इस अधिकारी को आज भी भारत में रैयतवारी सिस्टम का जनक माना जाता है. कई दशको भारत में रह कर अपने अनुभव के बाद मुनरो का क्या कहना था यह एक अन्य अधिकारी और मशहूर भारतविद मेजर-जनरल स्लीमन की पुस्तक “रम्बल्स एंड रिकलेक्शन्स” में मिलता है:

“सर थॉमस मुनरो  ने सही कहा था – मैं नहीं  जानता कि भारत के लोगों का सभ्यीकरण (सिविलाइज़िंग द पीपल ऑफ़ इंडिया) के क्या मायने  होते हैं. हो सकता है ये (भारतीय) सुशासन के सिद्धांत और व्यवहार में उतने  परिपक्व न हों लेकिन अगर एक अच्छे कृषि सिस्टम की बात हो, अगर बेहतरीन विनिर्माण की बात हो, अगर पढ़ने -लिखने के लिए स्कूलों की बात हो, अगर आम व्यवहार और आतिथ्य  की बात हो और सबसे अधिक अगर महिलाओं के प्रति ईमानदार सम्मान की बात हो और अगर  इन सब गुणों को सभ्य समाज के अपरिहार्य कारक माने जाते हों तो मैं यह कह सकता हूँ कि हिन्दू यूरोप के लोगों के मुक़ाबले सभ्यता के स्तर पर  कहीं भी पीछे नहीं हैं”.

स्लीमन को  भारत के अँगरेज़ अधिकारियों में सबसे सफल और जमीन  पर काम करने  वाला माना गया. पूरे भारत से  ठगी. जरायम और  अन्य अपराधों को ख़त्म करने का श्रेय स्लीमन  को जाता  है. स्लीमन ने अपनी इस किताब के पहले  अध्याय में हीं एक किस्सा  लिखा है. सन १८२४  में बंगाल के बैरकपुर में भारतीय सैनिकों ने अँगरेज़ अधिकारियों द्वारा किये जा रहे उत्पीडन के खिलाफ सिपाही बिंदी तिवारी के नेतृत्व में बगावत की. लेकिन साथ हीं  यह  भी प्रतिज्ञा ली कि किसी भी अँगरेज़ बच्चे या महिला के साथ  कोई  दुर्व्यवहार  नहीं होगा. स्लीमन  लिखते  हैं: बगावत  के माहौल में भी अँगरेज़ अफसर अपनी पत्नियों और  बच्चों को भारतीय  सिपाहियों की देखरेख में छोड़ कर जंगलों  में शिकार के  लिए  निकल जाया करते थे क्योंकि उन्हें भरोसा  था  कि भारतीय  सैनिक महिलाओं और बच्चों की हफाज़त के लिए अपनी जान भी दे देंगे”.

जहाँ विश्व विख्यात चिन्तक हीगेल ने अपने जीवन के अंतिम  काल में गीता की महानता को समझा और मुहर लगायी वहीं जेम्स इसे पाश्चात्य मूल्यों की नक़ल बताकर हाल की हिन्दुवादी धूर्तता की उपज बताता है।                                                                                                                                                              
ज्ञानमीमांसा में एक तर्क-दोष का जिक्र है जिसे कहते हैं --- संवाद की पृष्ठभूमि से हट कर कुछ चुनिन्दा तथ्यों से अपने पूर्व-निर्धारित निष्कर्ष पर पहुँचाना (सेलेक्टिव अप्प्रोप्रिएशन ऑफ़ फैक्ट्स). इन दोनों लेखकों ने अपनी पुस्तकों में  इसका पूरा इस्तेमाल किया और भारत को एक ऐसा समाज बताया जहाँ सामान्य सभ्यता से काफी पीछे हैं और जिन्हें शासित करना अंग्रेजों के लिए बेहद मुश्किल है. यह कहते  हुए दोनों लेखकों का प्रयास यह बताने का रहा कि अहसान है अंग्रेज़ी हुकूमत का इस भारतीय  जाहिलों  को जीना सिखा रही है. इस पुस्तक माला के द्वितीय खंड में हिन्दू संस्कृति की चर्चा है और  इसे  कई जगहों पर इसे घटिया बताया गया. जेम्स का मानना है महाभारत ऐसे कई ग्रन्थ अंग्रेजों के ज्ञान, जीवन मूल्य, आदर्शों को लेकर मात्र ३०० सौ साल पहले लिखे गए.

गौर करने की बात है कि आर्यभट्ट ने खगोल शास्त्र और सौर मंडल की ग्रहों के चालन की पूरी अकाट्य गणना पांचवीं सदी में की थी  जिसे ईरानी  विद्वान् अलबेरुनी ने ५०० वर्ष बाद भूरि –भूरि प्रशंसा  करते हुए अपने  देश के विद्वानों को बताया लेकिन जेम्स इसको  भी नकारता है. यह अलग बात है कि लगभग १००० साल बाद भी आर्यभट्ट को सही ठहराते हुए जब गैलिलीयो और कापरनिकस सूर्य को स्थिर और प्रृथ्वी के घूमने की बात कहते है तो यूरोप के शासक उन्हें सज़ा देते है क्योंकि यह बात ईसाइयों के धार्मिक अवधारणा का चूलें हिला देता है। फिर जंगली और बर्बर कौन हुआ? 

आज  समय आ गया है जब भारत के विद्वान् फिर से भारतीय (तथाकथित हिन्दू ) संस्कृति और ज्ञान को पुनर्प्रतिष्ठापित करें और पश्चिमी वितंडावाद से प्रभावित भारत के वामपंथी बुद्धिजीवियों को हक़ीक़त से रूबरू करायें।इन्दिरागाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र का यह प्रयास एक बेहद सार्थक और चिर-प्रतीक्षित प्रयास कहा जा  सकता है.  

lokmat

Tuesday, 16 May 2017

अविश्वसनीय राजनीतिक वर्ग फिर वोट देना मजबूरी क्यों ?



उनकी खता नहीं है ये मेरा क़ुसूर था !  
---  मिर्ज़ा ग़ालिब 
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एक नसीमुद्दीन अचानक एक  दिन खडा होता है और प्रेस कांफ्रेंस करके कई सी डी  जारी करता है जिसमें बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की मुखिया और उत्तर प्रदेश की कई बार मुख्यमंत्री  रही मायावती को पैसे के लिए गैर-कानूनी रूप से दबाव डालने की  बात कहते सुना गया. नसीमुद्दीन बसपा सरकार में न  केवल सबसे दमदार मंत्री रहा बल्कि दशकों तक मायावती के “हर काम में” दाहिना हाथ रहा. मीडिया के सामने अब उसका कहना है  कि मायावती टिकट के लिए पैसे लेती है और अन्य तरीकों से भी पैसे लेती है जो पार्टी के खाते में नहीं दिखाया जाता. अगले ३०  मिनट में बसपा सुप्रीमो  मायावती एक  प्रेस  कांफ्रेंस करती हैं जनता को यह बताने  के  लिए कि नसीमुद्दीन “लोगों की बातचीत की चुपचाप रिकॉर्डिंग करता है  और फिर  ब्लैकमेल  करता है"।उन्होंने आगे बताया  कि यह  आरोप पहले भी कार्यकर्ता लगा रहे थे लेकिन  तब उन्होंने विश्वास नहीं होता था. २४ घंटे में नसीमुद्दीन का अगला आरोप आता है "महारानी (मायावती) से बड़ा ब्लैकमेलर दुनिया में नहीं और यह धंधा मैंने उन्हीं से सीखा है"। लब्बो लुआब यह कि एक पूर्व –मत्री और एक पूर्व मुख्यमंत्री का एक  दूसरे पर भ्रष्टाचार और अपराध  का आरोप-प्रत्यारोप. इस पार्टी को कुछ हफ्ते पहले देश के सबसे बड़े  प्रदेश में  हुए चुनाव में लगभग २ करोड लोगों  ने वोट दिया था. कहना न होगा कि सन  २०१४ के  आम चुनाव  में इससे दस लाख कम वोट हासिल कर  अन्ना द्रमुक ने  लोक सभा की ३७  सीटें जीती थी  लेकिन बसपा ने एक  भी  नहीं. एक और  तथ्य: सन  २०१२ के प्रदेश चुनाव में अगर बसपा मात्र ३.१३ प्रतिशत (२४ लाख) और वोट पा जाती तो ३.४६ लाख करोड़ बजट  वाले इस राज्य पर यही मायावती और यही नसीमुद्दीन पांच साल शासन करते. कौन किसको ब्लैकमेल करता रहा है या क्या  दोनों मिलकर जनता को “ब्लैकमेल”  करते रहे हैं ? अगर दोनों के आरोप सच हैं तो ख़तरा,  अगर दोनों के आरोप गलत हैं तो भी ख़तरा और एक सही है और दूसरा गलत  तो  यह  दोनों पिछले ३० साल से जन जीवन में एक दूसरे के साथ कैसे  टिके थे.  

यह सवाल किसी  एक  मायावती या  नसीमुद्दीन का  नहीं है. आप पार्टी के  नेता , अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार के आन्दोलन की उपज और देश की राजधानी दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल  पर अचानक उनका सबसे वफादार मंत्री कपिल  मिश्र दो करोड रुपये घूस लेने का आरोप लगता है यह कहते हुए  कि उसने अपनी आँख से देखा  है. अरविन्द के लोग इस आरोप  के जवाब में एक प्रति-आरोप लगते हैं  कि यह भारतीय जनता पार्टी का एजेंट है. क्या अरविन्द का  इंटेलिजेंस इतना खराब है एक प्रतिद्वंदी पार्टी  की  एजेंट  उनके साथ  वर्षों  तक रहता  है और उसे वह मंत्री  बनाते हैं लेकिन कभी यह पता नहीं चल पाता. क्या कपिल मिश्रा मानसिक रूप से इतना पंगु है कि उसे अपने नेता के बारे में वर्षों तक  पता  नहीं चल पाता?

इन दोनों आरोपों में एक कॉमन फैक्टर है. दोनों ने ये  आरोप अपने नेता पर तब लगाये जब  उन्हें  नेता ने हाशिये पर ला दिया  या पद छीन लिया. उत्तर प्रदेश चुनाव में हार के बाद मायावती को इस मुसलमान नेता से वितृष्णा हुई और उसे मध्य प्रदेश का प्रभारी बना दिया जहाँ अल्पसंख्यक राजनीति है हीं नहीं और जहाँ पार्टी की अस्तित्व भी  नाम  मात्र का है. कपिल ने अरविन्द केजरीवाल में, जिनकी वह दशकों से “सदाचार की प्रतिमूर्ति” मान कर  पूजा  करते थे, भ्रष्टाचार का  दानव उन्हें मंत्री पद से हटाये  जाने  के अगले २४  घंटे बाद दिखाई दिया.

एक  तीसरा मामला देखिये. उत्तर प्रदेश  चुनाव  में जब बेटे  अखिलेश ने  बाप मुलायम सिंह  से बगावत की और कांग्रेस से हाथ मिलाया तो  मुलायम सिंह  ने एक सभा में कहा “ कांग्रेस मेरा मुंह न खुलवाए वरना कई  चेहरे बेनकाब हो जायेंगे”. यह बात कांग्रेस के साथ गठबंधन में रह  कर मंत्री  बने रहते हुए नहीं  पता चला इस समाजवादी नेता को. ना हीं तब जब सी  बी आई  उनके आय से  अधिक संपत्ति की जांच कर रही थी और उसने देश  की सर्वोच्च  अदालत में छः बार मुलायम के खिलाफ  अपना रुख बदला. तब भी  नहीं , जब यू  पी  ए  -१  की सरकार परमाणु  समझौते के खिलाफ कम्युनिस्ट पार्टियों  द्वारा लाये गए अविश्वास प्रस्ताव पर  लगभग  गिरने जा  रही थी और तब उनकी  पार्टी ने  समर्थन दिया क्योंकि सी  बी आई  संपत्ति जांच के मामले में लगभग चार्जशीट तैयार कर चुकी  थी. तब भी नहीं जब  उनकी पार्टी के  नेता अमर सिंह भाजपा के लोगों को पैसे दे कर तोड़ रहे थे.  

अगर इन मायावतियों,  नसीमुद्दीनों, मुलायमों, अर्विन्दों, अमरों और कपिलों की समझ इतनी खराब है कि यह अपने नेता या अनुयायियों को दशकों तक नहीं पहचान पाते और उन्हें लूटने  की  शक्ति देते रहते हैं तो क्या इन्हें जन  जीवन में रहना  चाहिए?  मायावती को किसने अधिकार दिया  कि एक तथाकथित “ब्लैकमेलर”  को मंत्री बनाये या नसीमुद्दीन अगर  यह जानता था कि मायावती  सत्ता में आने के बाद पैसे की उगाही करती हैं तो क्या उसपर आपराधिक  मुकदमा नहीं चलना चाहिए.  इन सभी  ने पद पर आने के पहले संविधान में निष्ठा की शपथ ली थी. फिर अब कोई मुलायम यह क्यों  कह रहा है  कि मुंह खोला  तो सत्ता के कई  तत्कालीन चहरे बेनकाब होंगे. क्या इन सभी पर संवैधानिक शपथ को भंग करने  का मुकदमा नहीं चलना चाहिए? क्या इन सब घटनाओं  से जनता का विश्वास पूरे प्रजातंत्र  और संवैधानिक  व्यवस्था में नहीं टूटेगा ?  

समस्या इस राजनीतिक वर्ग में अनैतिकता और आपराधिकता  का नहीं  है. ना हीं  हम  यह कह कर बच सकते हैं कि चूंकि राजनीति में यही वर्ग आ रहा है लिहाज़ा जनता के पास विकल्प नहीं है. दरअसल जाति, सम्प्रदाय, रोबिनहुड इमेज ( जिसके तहत हम खूंखार  अपराधी  शहाबुद्दीन को चार बार इस प्रजातंत्र  के मंदिर लोक  सभा में अपने  प्रतिनिधि के  रूप  में भेजते है इसलिए  कि बड़ा अपराधी  है और हमें  छोटे अपराधियों से  बचाएगा) ने हमारी  सामूहिक विवेचना शक्ति छीन ली है .  हम अगर इन कुत्सित भावनाओं से बच  भी गए तो यह नहीं  तलाशते कि राज्य या देश  की विकास किसने  किया  या नहीं किया. वास्तव में विकास जन-विमर्श का कभी भी मुद्दा बन हीं न सका। राजनीति शास्त्र का सिद्धांत  है : अल्प-शिक्षित  या अर्ध-शिक्षित समाज में भावनात्मक मुद्दे  तार्किक  और सर्व- समाज के लिए उपादेय मुद्दों  पर भारी पड़ जाते हैं. हमें इससे  जल्द निकलना  होगा . दरअसल कौन सा वर्ग राजनीति में आकर हमारा भाग्य विधाता बने यह तो हमें तय करना था। ग़ालिब ने यूँ ही नहीं कहा था : उसकी खता नहीं है ये मेरा क़ुसूर था ।                                                                                                                      

lokmat

Tuesday, 9 May 2017

आतंक के लिए कुतर्क का सहारा




“अगर कोई सैनिक अपने देश के लिए जान देता है तो उसे शहीद कहते हैं लेकिन अगर कोई धर्म के लिए कुर्बान होता हो तो  उसे आतंकवादी कहते हैं ? मान लीजिये, कोई भारत के सरकार  के खिलाफ हो जाता है तो सरकार उसे दण्डित करती है , कि नहीं?”. ये सवाल केरल के इस्लाम कबूल करने वाले याहिया ( जो पहले ईसाई था) का है जो अपने २१ साथियों के साथ देश छोड़ कर आई एस आई एस के अफगानिस्तान में सक्रिय संगठन से जुड़ गया. अपने तमाम पत्रों को एक एनक्रिप्टेड वेवसाइट “टेलीग्राम” के जरिये पिछले काफी समय से एक अंग्रेज़ी अखबार को भेजता रहा है. हाल हीं में उसके एक साथी  ने खबर दी कि याहिया एक अमरीका सैनिकों  के ऑपरेशन  में मारा गया.

तर्क याहिया का हो या आई एस आई एस का, यह प्रदर्शित करता है किस तरह विश्व के इस्लामिक आतंकी संगठन अपने कुतर्कों से आज पूरी दुनिया के लिए ख़तरा बन गये हैं, किस तरह ये संगठन ग़रीब , अशिक्षित या नीम शिक्षित मुसलमान युवाओं को कुतर्क के सहारे गुमराह कर रहे है और उनमें एक उन्माद पैदा कर रहे हैं.  आज ज़रुरत है कि या तो  इस्लाम के वास्तविक अलमबरदार इस धर्म के उन्माद से दुनिया को बचाने के लिए आगे आये और इसे पुनर्परिभाषित करें या  दुनिया संगठित हो कर इसका  प्रतिकार करे. याहिया को यह नहीं बताया गया कि “धर्म के लिए मरना और धर्म के  लिए मारना” में कितना अंतर है ना हीं यह कि दुनिया में ख़ून बहा कर खलीफा का शासन स्थापित करना अगर धर्म है तो वह पूरी  मानवता, समाज की स्थापना के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है. जो सैनिक देश के  लिए जान देता है वह अपने वतन की सुरक्षा के लिए ऐसा करता है ताकि पूरा समाज (जिसमें याहिया ऐसे लोग भी होते  हैं) महफूज रहे. उसे  यह भी नहीं बताया गया कि दुनिया में खलीफा का शासन (एक अवधारणा जिसे स्वयं दर्ज़नों इस्लामिक देश नकार चुके है) लाने के लिये बेगुनाह लोगों को मारना धर्म नहीं हो सकता। उसे यह  भी नहीं बताया गया कि खून बहा कर धर्म का  प्रसार एक बर्बरतापूर्ण  आदिम सभ्यता का द्योतक  है और इसे विश्व समाज काफ़ी अर्से पहले ख़ारिज कर चुका है.  देश की सुरक्षा में करने वाले सैनिक या हमला करने वाले सैनिक भी मानवता के दुश्मन माने जाते है जब वे निहत्थे और निर्दोष पर हमला करते है। जब एक  आतंकी धर्म के नाम पर यह सब कुछ करता है तो वह उस देश के हीं नहीं पूरे विश्व समाज के और  मानवता के लिए ख़तरा माना जाता है.

याहिया ने आगे  लिखा  है “जेहाद बाज़ार  का एक सौदा है अल्लाह के साथ. एक ऐसा सौदा जिसमें हम अपना जीवन और पूँजी अल्लाह को देकर बदले में जन्नत  हासिल करते  हैं.  कितना फायदे का सौदा है! " . याहिया कुरआन के उस आयत (अल तौबा सूरा  ९ आयत १११) को उधृत कर रहा था जिसमें  कहा गया है “ अल्लाह ने इस्लाम में  विश्वास  करने वालों से उनका जीवन और उनकी संपत्ति खरीद  ली है और बदले में उन्हें जन्नत देने  का वादा किया है.........ये  अनुयायी अल्लाह के मार्ग में  लड़ते  हैं और  या तो मारते  हैं या मर जाते  हैं”.

पाकिस्तान जाने-माने पत्रकार अारिफ जमाल ने अपनी किताब  “द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ़ जेहाद इन कश्मीर” में करीब ६०० जेहादियों के अंतिम पत्र (मरने  के  पहले के)  का अध्ययन करके लिखा  कि “शायद हीं कोई  पत्र हो जिसमें जिहाद में  मरने के बाद  इनाम –स्वरुप जन्नत  में मिलने वाली  ७२ हूरों का जिक्र न हो. मरते वक्त इसका उल्लेख यह बताता  है कि जन्नत की हूरें उनका मुख्य आकर्षण होती हैं.” हालांकि कुरआन की कई आयातों में (अल तुर ५२-२६) और (अल वकियाह ५६-२२, ३५, ३६) हूरों (पुरुष और स्त्री) का जिक्र तो है, उनकी खूबसूरती और उनके शरीर सौष्ठव की चर्चा भी लेकिन ७२ की संख्या हदीस  सुनन अत-तिरमिदिह वॉल्यूम ४, अध्याय २१ हदीस २६८७ में मिलता है. दुनिया के जाने-माने इस्लाम के स्कॉलर शेख जब्रिल हद्दाद  ने जिन्हें परंपरागत इस्लाम का सबसे बड़ा जानकार माना जाता है , सन २००५ में एक फतवा जारी करके के अल्लाह के नाम पर शहीद हुए लोगों के लिए जन्नत में मिलने वाली छः नियामतों का जिक्र किया है उनमें से पांचवां ७२ हूरों के उपलब्ध होने की तस्दीक करता है.

अफगानिस्तान में यू एन मिशन की आधिकारिक रिसर्चर क्रिस्टिनी जेहादी मानव बमों का अध्ययन करने पर पाया कि लगभग सभी आत्मघाती जेहादी इस विश्वास से प्रेरित होते हैं कि “काफ़िर (जो इस्लाम की जगह किसी और धर्म को मानता है) को मारना हमारा धार्मिक कर्तव्य है”.

जम्मू क्षेत्र के नगरोटा आर्मी कैंप पिछले २९ नवम्बर को हुए आतंकी हमले में मरे फिदाइन के पास से मिले सामान में एक असाल्ट राइफल और कुछ कारतूस के अलावा जो चीज़ मिली वह थी सस्ते इत्र की एक बोतल. तमाम पिछले सबूतों के आधार पर पाया गया कि फिदायीन जान देने के पहले नहाता है फिर दूल्हे की तरह श्रृंगार करता है, आँखों में काजल लगता है और शरीर पर इत्र. इसका आशय यह निकला गया कि ऐसे फिदायीन की यह मान्यता होती  है कि जब वह मरने के बाद जन्नत के दरवाजे पर पहुंचे तो वहां हूरों को उसके शरीर से खुशबू आये और वह खूबसूरत दिखे.    

९/११ के हमले (वर्ल्ड ट्रेड टावर) के मास्टरमाईंड मुहम्मद अट्टा ने भी अपने अंतिम  पत्र में धर्म के नाम पर कुर्बान होने का हवाला  दिया था. १९९५ में ओसामा बिन  लादेन ने सऊदी शाह फहद को गुस्से में लिखे गए पत्र में बताया था कि सारा झगडा कुरआन के मुताबिक चलने और  न चलने वालों के बीच  है. उसने उस लम्बे पत्र में २० बार कुरआन की आयातों को उधृत करते हुए कहा कि हम अल्लाह के मजहब पर विश्वास न करने वालों से बदला लेंगे”.



शायद इस्लाम का एक कट्टर वर्ग है जो सही परिभाषा और उदार व्याख्या की जगह अपनी दूकाने चलने के लिए पूरी दुनिया में आतंक फैलाना  चाह रहा है और उधर इसका और विद्रूप चेहरा आई एस आई  एस के रूप में उभरा है. दुनिया में अमन के लिए दो हीं रास्ते हैं या तो इस्लाम स्वयं इन तत्वों को ख़त्म करे या पूरी दुनिया  एकजुट हो कर इस खतरे से लड़े.

दरअसल इस्लाम के प्रसार के लिए और काफिरों (जो इस्लाम में विश्वास न कर किसी और धर्म में करते हैं) से लड़ने के लिए
आत्मघाती दस्ते तैयार करने का इतिहास ११वीं सदी के उत्तरार्ध से शुरू होता है और इसका जनक हसन इब्न अत-सब्बह को माना जाता है. ये फिदायीन सेल्जुक तुर्की साम्राज्य से लड़ने के लिए तैयार किये गए थे. आज भी फिदायीन को (जिसमें कम उम्र के बच्चों को शुरू से हीं मानसिक रूप से तैयार किया जाता है) यही बताया जाता है कि उसका जन्म हीं अल्लाह के काम के लिए हुआ है और फिदायीन का उद्देश्य अल्लाह के लिए अपनी कुर्बानी (इस दुनिया में ) देते हुए जन्नत में वह सब कुछ हासिल करना होता है जो यहाँ उसे नहीं मिलता. इसे उन्माद की हद तक ले जाने में धर्म  की खाल ओढ़े आतंकवादी संगठन इतने सफल हो जाते हैं कि आतंकी इमरान माजिद भट्ट के जम्मू में सन २०१३ में आत्मघाती हमले के  बाद उसकी माँ के एक कविता लिखी जिसमें उसने कहा “ऐ अल्लाह , तू कब ये आवाज़ देगा कि इस खून में लतपथ पड़े गुलाब की  माँ कहाँ है”. पेशवर में २०१४ के सैनिक स्कूल में आत्मघाती हमले मैं तहरीक-ए-तालिबान ने विदेशी आत्मघाती दस्तों जिनमें  अफ़ग़ान, अरब और चेचन्या के आतंकी थे, बच्चों के मारे जाने को भी “अल्लाह का काम” बता कर अपने को न्यायोचित ठहराया. यह अलग बात है कि पूरे पीकिस्तान के धार्मिक स्चोलारों ने इसकी आलोचना की और  इस संगठन के कृत्य को गैर-इस्लामिक करार दिया.    
ऐसा नहीं है कि इस्लाम में एक बड़ा वर्ग कठमुल्लाओं के इस गैर मानवीय प्रयास के खिलाफ आवाज नहीं उठता परन्तु
इस्लाम के इस कठमुल्ले वर्ग के  रहनुमाओं की परिभाषा का नतीजा यह रहा कि एबीसी न्यूज़ के पत्रकार बिल रेडेकर  जब पेशावर के एक मदरसे में दरी पर पढ़ रहे ६० बच्चों की कक्षा में सवाल किया कि जो बच्चे इंजीनियर  या डॉक्टर बनाना चाहते हैं वे हाथ उठायें. केवल दो हाथ उठे. लेकिन जब  उन्होंने पूछा कि कितने  बच्चे जेहाद लड़ना चाहते हैं तो सारे  हाथ उठे.

आज दुनिया को और साथ हीं इस्लाम की सही शिक्षा को मानने वालों को इस नए खतरे से लड़ना होगा क्योंकि  गरीबी और अज्ञानता में पल रहे करोड़ों बच्चों को “जन्नत की ७२ हूरों” के लालच में गुमराह कर निर्दोषों की हत्या करने वालों को इस देश या उस देश का सामान्य अपराधी समझना अपने को और आने वाली पढ़ी को शुतुर्मुर्गी छलावे में  डालना होगा.

१९  वीं सदी के  उत्तरार्ध  में ब्रिटेन के चार बार प्रधानमत्री रहे दुनिया के मशहूर स्टेट्समैन ग्लेडस्टोन ने अनायास हीं नहीं कहा था कि जब तक धार्मिक ग्रंथें में कट्टरता रहेगी दुनिया में शांति नहीं रह पायेगी.      

lokmat

Tuesday, 2 May 2017

हम मोदी आलोचकों की समस्या


किसी भी देश या समाज के इतिहास में ऐसा कम हीं होता है कि किसी एक व्यक्ति पर समाज का एक बड़ा वर्ग न केवल विश्वास करने लगे बल्कि उसमें हर कष्ट का निवारक देखने लगे और उसके व्यक्ति के खिलाफ बोलने वाले स्वरों को व्यक्तिगत अपना, समाज का या देश का दुश्मन मानने लगे। प्रधानमंन्त्री नरेन्द्र दामोदर मोदी धीरे-धीरे नेतृत्व का वह मकाम हासिल कर रहे हैं जहाँ हम निरपेक्ष विश्लेषकों के लिए भी एक समस्या खडी हो रही है कि आलोचना के लिए कौन से बिंदु तलाशें या कौन से तर्क-वाक्य लायें. प्रजातंत्र के समुचित सञ्चालन में आलोचना एक बड़ा पहलू है और इसका जन-विमर्श से विलुप्त होना खतरनाक संकेत हैं. तो फिर क्या  हम तथ्य-विहीन , हठधर्मी और अतार्किक आलोचना शुरू करें और वह भी  इसलिए कि हम निरपेक्ष दिखें और प्रोफेशनल रूप से जिंदा रहें? क्या  यह स्वयं प्रजातंत्र के लिए उचित होगा? आज मोदी की जन-स्वीकार्यता उस स्तर पर है जहाँ स्वयं मोदी को शायद एक समान्तर विरोधी स्वर पैदा करने पड़ें.

किस बात  पर  मोदी का विरोध  करे? इस बात पर कि कोई अख़लाक़ मार दिया  जाता  है? या कुछ लम्पट हिन्दुवादी हिन्दू धर्म का नीम  ज्ञान लिये गौ रक्षा के नाम पर किसी पहलू खान को मार देते हैं? पिछले तीन  साल के शासन में ऐसा कब देखने में आया कि कभी मोदी ने इस तरह के भाव को प्रश्रय दिया है? हम विश्लेषक भूल जाते हैं कि  मोदी  तो पहले दिन से हीं “स्वच्छ भारत”, नशे के खिलाफ अभियान, किसानों को मृदा  परिक्षण, यूरिया पर नीम की  परत,  अद्भुत फसल बीमा योजना, टेक्नोलॉजी का गवर्नेंस  में तेज और भ्रष्टाचार मुक्त डिलीवरी के लिए प्रयोग में लगे हुए हैं. लेकिन शायद विश्लेषण के निरपेक्ष चश्में के राडार पर यह नज़र नहीं आता. अगर फसल बीमा योजना को                                                                    पूर्णरूप से अमली जामा पहनने  के लिए  बटाईदार और जमींदार के  बीच शंका की खाई ख़त्म करने के लिए ताकि बटाईदार खेती में निवेश कर सके और जमींदार उससे जमीन एक समय सीमा के भीतर न ले  सके आदि के  लिए मोदी सरकार कानून बना रही है तो क्या यह विश्लेषण का विषय नहीं है? मध्य प्रदेश में पिछले दस साल से नौ प्रतिशत कृषि विकास दर रही है पर यह निरपेक्ष विश्लेषण का बिंदु नहीं  बन पाता. इसी दौरान कृषि क्षेत्र में राष्ट्रीय विकास दर ३.७ प्रतिशत रहा जबकि उत्तर प्रदेश में मात्र ३.२ प्रतिशत. लेकिन अगर हम निरपेक्ष विश्लेषक उसकी  आलोचना करें तो हमें अपना हीं वर्ग “भाजपाई” मानने लगेगा. उज्जवला योजना ने भारतीय ग्रामीण गरीब महिलाओं का जीवन बदल दिया  (वाम और अंग्रेज़ीदां विश्लेषक  शायद उस अभाव-जनित यातना-ग्रस्त जीवन से बावस्ता नहीं रहे हैं) लेकिन क्या वह किसी निरपेक्ष विश्लेषक की बौधिक जुगाली का सबब  बन सका? अगर हम यह समझ लेंगे तो यह भी जान जायेंगे कि क्यों मोदी की जन-स्वीकार्यता  लगातार बढ़ती जा  रही है.                        

यह अजीब कुतर्क है कि कब्रिस्तान के लिए जमीन दिया जाये तो वह अखिलेश सरकार की धर्म-निरपेक्ष राजनीति होती है लेकिन वहीं अगर चुनाव सभा में मोदी उसका जिक्र  भर भी कर दें तो उससे साम्प्रदायिकता की बू आने लगती है. मोदी को शायद यह चर्चा नहीं करनी पड़ती अगर हम निरपेक्ष विश्लेषक इस बात को  लेकर पिछले ७० साल में किसी दिग्विजय, किसी ओवैसी , किसी अाजम खान या किसी मायावती, मुलायम या  लालू की आलोचना कर रहे  होते. चुनाव के ठीक पहले कोई कांग्रेस मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी जब मुसलमानों को आरक्षण दे देता है (यह पूरी तरह से जानते हुए कि अदालत में यह आदेश  नहीं ठहरेगा) तो क्या हमें उसे धर्म-निरपेक्षता का चोला पहनते हुए निरपेक्षता के नाम  पर  चुप रहना  चाहिए था? तीन तलाक की इस्लामी व्यवस्था सभ्य समाज पर एक बदनुमा दाग है लेकिन क्या किसी वाम चिन्तक को इसके खिलाफ तलवार ताने देखा गया? अगर वर्तमान सरकार इसके खिलाफ  कानून लाये तो उसे साम्प्रदायिकता की राजनीति कह कर हम विश्लेषकों को मोदी की आलोचना करनी चाहिए? तत्कालीन राजीव गाँधी की कांग्रेस सरकार सन १९८६ में मुसलमान पुरुषों को ख़ुश करने के लिये मुस्लिम महिला विरोधी क़ानून बनाती है ताकि सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला निषप्रभ हो सके। सर्वोच्च अदालत ने तलाक शुदा शाहबानो के गुजरा भत्ता के  लिए अपराध प्रक्रिया  संहिता की धारा  १२५  के तहत आदेश किया था जो मौलवियों को नागवार लगा। मुसलमानों के वोट के लिए इस आदेश को निष्प्रभ करते हुए मुस्लिम  पर्सनल लॉ को बहाल रखते हुए तत्कालीन राजीव सरकार एक नया कानून बनाती है जिसका नाम “मुस्लिम महिला (तलाक अधिकार अभिरक्षण ) कानून लाती  है –जो महिलाओं  के खिलाफ है लेकिन जिसका नाम मुस्लिम  महिला अभिरक्षण रखा गया) तो वह धर्मनिरपेक्षता का प्रतीक हो जाता है. याने  राजीव गाँधी या अखिलेश यादव कानून बदलें ताकि मुस्लिम पुरुष समाज खुश हो कर वोट दे  तो वह धर्मनिरपेक्षता लेकिन मोदी तीन तलाक के खिलाफ कानून लायें तो वह घोर साम्प्रदायिकता.    
    
मोदी या गाँधी की जन-स्वीकार्यता और धर्म गुरुओं या बाबाओं की स्वीकार्यता में अंतर को भी समझना होगा. निरपेक्ष विश्लेषण की एक मूल शर्त होती है कि विश्लेषणकर्ता जिस व्यक्ति के वर्तमान मकाम से याने उसकी सम्प्रति उपलब्धियों से रंचमात्र भी प्रभावित न  हो. वह यह नहीं कह सकता  कि जब समाज का एक  बड़ा वर्ग उस व्यक्ति को मान्यता दे रहा  है तो वह सही हीं होगा. इस लिहाज़ से न तो गाँधी की आलोचना हो सकती थी न हीं कार्ल मार्क्स की और न हीं धर्म गुरुओं या  “बाबाओं” की क्योंकि समाज तात्कालिक कारकों से, भावनात्मक अतिरेक के कारण और कई बार अर्ध-सत्य के आधार पर हीं अपने विचार  बन लेता है. गाँधी  अपनी व्यापक जन-स्वीकार्यता के दौरान इस खतरे को समझ गये थे. असहयोग आन्दोलन  के दौरान चौरी-चौरा में जब अहिंसक भीड़ अचानक थाने पर हमला करने लगी तो उस उग्रता के  पीछे कहीं लोगों में अपने नेता (गाँधी) में ईश्वरीय तत्व दिखाई देने लगा. गाँधी ने इस  खतरे को  समझते हुए आन्दोलन स्थगित किया. धर्म की दुनिया में यह अक्सर  पाया जाता है. धार्मिक नेताओं में ईश्वरीय रूप देखना भारतीय समाज का एक शगल रहा है. यहाँ तक कि एक समय था कि शीबू सोरेन (गुरु जी) में झारखण्ड के एक आदिवासी समाज का इतना विश्वास रहा कि उनके बारे में किस्से हुआ करते थे कि “गुरु जी तो एक हीं समय में कई जगह  पर मौजूद रहते हैं”. सोरेन आदिवासियों में यह स्पष्ट मत  था कि गुरु जी के दर्शन मात्र से लोग धन्य हो  जाते थे. आसाराम बापू जब किसी परिवार की युवा लडकी को आश्राम में छोड़ जाने की बात कहते थे तो अनुयायी माँ-बाप उसे बाबा का उपकार मानकर उस बालिका को आश्रम में “पढने”  के लिए छोड़ जाते थे. आसाराम आज बलात्कार के आरोप में वर्षों से जेल में है. शिबू सोरेन मुख्यमंत्री और केंद्र में मंत्री बनने के बाद भ्रष्टाचार के आरोप झेलते हुए आज राजनीतिक गुमनामी की भेंट चढ़ चुके हैं.

लेकिन मोदी की जन स्वीकार्यता उस भरोसे की वजह से है जो जनता को काफी अरसे बाद हुआ है. और वह भरोसा  इस बात का नहीं है कि वह राम  मंदिर बनवायेंगे बल्कि  इसका कि इस व्यक्ति में भारत को बदलने की क्षमता है ,  इसका व्यक्तित्व भ्रष्टाचार या सत्ता-जनित दोषों से परे है. यही वजह है कि अरविन्द केजरीवाल को विकास छोड़ कर को मोदी के  खिलाफ अभियान छेड़ना महंगा  पड़ा.      

lokmat

Saturday, 22 April 2017

अपराध न्यायशास्त्र के लिए नयी चुनौती

सर्वोच्च न्यायलय के फैसले से उपजे छ: बिंदु
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बाबरी मस्जिद-राम मंदिर विवादस्पद दांचे के गिराए जाने के २५ साल बाद सर्वोच्च अदालत के ताज़ा  फैसले ने छः नए प्रश्नों को जन्म दिया है. अदालत ने कहा  कि इस मामले में दायर दो ऍफ़ आई आर ( एक कार सेवकों के खिलाफ और दूसरा २१ बड़े नेताओं के  खिलाफ) को  संयुक्त रूप से समयबद्ध तरीके से दो साल के अन्दर सुन कर फैसला दिया जाये और तब  तक मामले को सुनने वाले जज का तबादला न हो. फैसले का तात्पर्य यह कि भारतीय जनता  पार्टी के पितामह लालकृष्ण आडवाणी (८९ वर्ष) , पूर्व अध्यक्ष मुरलीमनोहर जोशी (८३ वर्ष) के खिलाफ ढांचा गिराने  की साजिश का मुकदमा लखनऊ की अदालत में फिर से शुरू होगा. और साथ हीं अभियुक्त चाहें  तो सभी ६५६ गवाहों से फिर से जिरह की जा सकती  है.  अदालत के पास मात्र ५६४ कार्य दिवस हैं। 

इस फैसले से उपजे प्रश्न हैं: (१) क्या आडवाणी अब राष्ट्रपति पद के  प्रत्याशी बनने के लिए योग्य रहेंगे?; (२) धार्मिक-राजनितिक-सामाजिक आंदोलनों को लेकर किसी राजनेता के बयानों से उपजे जनांदोलन की परिणति के आधार पर क्या साजिश के अंश देखना या अपराध-शास्त्र के “मेंस रिया”  के सिद्धांत के  तहत दोष के अंश (कल्पेबिलिटी) निर्धारित करना आसान होगा? (३) क्या घटना के २५ साल बाद गवाहों को याद होगा कि उन्होंने क्या देखा था और पिछली (१५ साल पहले) जिरह  में क्या कहा था?; (४) क्या सुप्रीम कोर्ट  को सन २००२ और सन २००७ में  इसी अदालत द्वारा लिए  गए  फैसले को देखने की ज़रुरत नहीं थी जिसमे इसी अदालत ने दोनों मामलों को संयुक्तरूप से लखनऊ में सुने जाने की याचिका  को ख़ारिज करने वाले हाई कोर्ट के फ़ैसले को बहाल रखा था और वह भी तीन सदस्यीय  बेंच द्वारा?; (५) (यह प्रश्न न्यायिक प्रक्रिया में नैतिकता का ज्यादा  है कानून का कम) पिछले २५ सालों में अदालतें और अभियोजन संस्थाएं ढिलाई करती रहीं लिहाज़ा इन २१ नेताओं में (जिनके खिलाफ रायबरेली की अदालत  में मुकदमा चल रहा था, आठ मर चुके हैं और एक के खिलाफ इसलिए मुकदमा नहीं चल सकता कि वह वर्तमान में राज्यपाल है)  से १३ आज जीवित हैं. क्या अच्छा स्वास्थ्य और दीर्घकालीन जीवन होना अभिशाप है और साथ  हीं अगर राष्ट्रपति पद का चुनाव इस फैसले  के दो माह पूर्व होता और अगर अडवाणी राष्ट्रपति बन जाते तो क्या यह मुकदमा चल सकता था ? (६) सर्वोच्च  न्यायलय ने अपने इस फैसले में पैरा १९ में न्याय का एक  सिद्धांत उधृत किया है  जिसके तहत कहा गया  है कि चाहे आसमान गिर जाये न्याय किया  जाना चाहिए. ऐसे  में इसी अदालत की बड़ी बेंच द्वारा इस फैसले से इतर  फैसला दिया जाना (सन २००२ और सन २००७) इस सिद्धांत से परे था?      

                      राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी
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देश में केवल दो पद हैं जिन पर बैठने के पहले व्यक्ति संविधान  के अभिरक्षण, परिरक्षण व संरक्षण की शपथ लेता है. ये पद हैं राष्ट्रपति और राज्यपाल. अन्य  सभी यहाँ तक कि प्रधानमंत्री , उप  राष्ट्रपति , भारत के मुख्य-न्यायाधीश संविधान में निष्ठा की शपथ लेते हैं. कोई व्यक्ति सविधान के अनुच्छेदों के तहत बनाये गए कानूनों का अगर उल्लंघन  करने का आरोपी  है तो इसका  मतलब होता है  कि उस संविधान  की रक्षा की शपथ नहीं  ले सकता. यही कारण है  कि भारत जनता पार्टी के ८९ – वर्षीय पितामह लालकृष्ण आडवाणी या पार्टी के पूर्व अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी अब राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी नहीं हो सकते.

इसमें कोई दो राय नहीं  कि सर्वोच्च  अदालत के फैसले से न केवल न्याय के  इस  मंदिर के  प्रति जनता का विश्वास बढा है बल्कि इस फैसले ने कानून की दुनिया में चर्चित यह ब्रह्म वाक्य भी सत्य साबित किया “चाहे आप कितने भी ऊपर हों , कानून आप से ऊपर रहेगा”. इस फैसले के बाद अब लखनऊ में सी बी आई की अदालत ऍफ़ आई आर संख्या १९७  और १९८ (पहला सभी कार सेवकों के खिलाफ और दूसरा २१ विशिष्ठ व्यक्तियों –जिनमें आठ मर चुके हैं) एक साथ सुना जाएगा. साथ हीं दुनिया  में अपराध न्यायशास्त्र के लिए सी बी आई कोर्ट का भावी फैसला एक नया आयाम  होगा. इसमें कोई दो राय नहीं है कि ६ दिसम्बर, १९९२ के प्रस्तावित कार –सेवा के पूर्व देश के हिन्दुओं में राम मंदिर को लेकर एक जबरदस्त उन्माद पैदा किया गया था. यह भी सच है कि आडवाणी, जोशी ने देश भर में यात्रायें निकाली थी. उमा भारती और साध्वी ऋतंभरा के तत्कालीन भाषणों ने  इस उन्माद को हवा देने का काम किया था. अदालत के सामने ये सारे प्रश्न होंगे. पर मूल प्रश्न होगा --क्या विवादास्पद ढाँचा गिराये जाने में इन आरोपियों की साज़िश के स्तर पर भी कोई संलिप्तता थी? इन नेताओं पर मुकदमा आई पी सी की धारा १२० (बी) के तहत है अर्थात आपराधिक साजिश करने का.

यह बात स्पष्ट है (और जिसका जिक्र वर्तमान फैसले में किया भी  गया है) कि हाई कोर्ट ने टेक्निकल आधार पर दोनों मामलों को एक साथ चलाने का राज्य सरकार की दूसरी अधिसूचना ख़ारिज  की थी क्योंकि सरकार ने इस अधिसूचना के लिए उच्च न्यायलय की सहमति नहीं ली  थी. लेकिन फिर अगर अगले चार से छः सालों में सर्वोच्च न्यायलय ने पुनरीक्षण याचिका, रिविजन याचिका हीं नहीं क्यूरेटिव याचिका के दौरान भी हाई कोर्ट के आदेश को बहाल रखा तो क्या आरोपी इसका खामियाजा भुगतें यह न्यायोचित है?
इस फैसले के तत्काल बाद केंद्र में सत्तानशीन भारतीय जनता पार्टी का शीर्ष नेतृत्व प्रधानमंत्री के आवास  पर बैठा और यह फैसला लिया गया कि इन वयोवृद्ध नेताओं को मुक़दमा लड़ना चाहिए और बेदाग़ निकलने की कोशिश की जानी चाहिए. जाहिर है पार्टी को जब दो साल में फैसला आयेगा तो जो भी फैसला हो २०१९ के चुनाव में इसका राजनीतिक  लाभ मिलेगा. यह अलग बात है  कि अगर स्पेशल कोर्ट से सजा होती भी है तो इसकी अपील फिर  हाई कोर्ट में हो सकती है लेकिन भारतीय समाज के एक सम्प्रदाय विशेष में इन नेताओं के प्रति और साथ हीं पार्टी के प्रति सहानुभूति रहेगी.

एक प्रश्न और भी अनुत्तरित रहेगा और वह यह कि दो साल बाद जब कल्याण सिंह राज्यपाल के पद से हटेंगे और उन पर मुकदमा चलेगा तो क्या वह भी  यह अपेक्षा नहीं  करेंगे कि सभी गवाहों से फिर से जिरह हो जो कि उनका मौलिक अधिकार है? और तब क्या एक हीं मामले में तीन बार गवाहों का जिरह और वह भी लगभग ३० साल बाद न्याय  की प्रक्रिया के लिए उपयुक्त होगा?            

lokmat                                                                                                                                                                                                            

Saturday, 15 April 2017

मीडिया की जड़ता: क्या ऐसे बनेगा “नया” भारत?



पिछले सप्ताह एक अजीब घटना हुई. उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में जंगलों से सटे हाईवे पर एक १०-वर्षीय लडकी लगभग नीम-बेहोशी की हालत में पाई गयी. पुलिस गश्ती दल को इस बात की सूचना किसी राहगीर ने दी. और पुलिस ने उसे उठा कर पास के अस्पताल में भर्ती कराया. गैर-ज़िम्मेदार मीडिया ने फ़ौरन “एक्सक्लूसिव” खबर चलायी कि यह लडकी जंगलों में बंदरों द्वारा पाली गयी, इसके शरीर पर कपडे नहीं थी और यह बंदरों की तरह चार अंगों (दो हाथ और दो पैर ) पर चलती है और खाना (तरल) भी दिया जा रहा है तो बंदरों की तरह सीधे मुंह बर्तन में लगा कर पी रही है. मीडिया की इस खबर की बाद अगले २४ घंटों में कल्पना के पर लग जाती हैं और दूसरी खबर आती है कि वह वन देवी है. बस फिर क्या था चढ़ावा और पूजा का  समान ले कर सैकड़ों  श्रद्धालु इस देवी के दर्शन को इकठ्ठे हो जाते हैं. देश में गरीब सबसे से ज्यादा भक्त होता है लिहाज़ा आस-पास के गाँव  के लोग अपने खलिहान में गेंहू की व्यवस्था “बड़े ईश्वर” पर छोड़ कर वन देवी की अर्चना में  व्यस्त हो जाते हैं.
तीन दिन बाद जिस पुलिस गश्ती दल के सिपाही ने इस लडकी को जंगले से सटे हाईवे से उठाकर पास के अस्पताल में भर्ती कराया था उसने इस ख़बर को पढ़ा और पब्लिक में आकर बताया कि इस लडकी को जब उसने देखा तो उसके  शरीर पर कपडे भी थे और वह हाँ और ना में कुछ बोल भी रही थी. वह बेहद कमज़ोर हो गयी थी. इस खुलासे की बाद राज खुला कि वह मानसिक रूप से पूर्ण विकसित नहीं थी और शायद घर वालों ने उसे पालने की जहमत न उठाते हुए सड़क पर भगवान भरोसे छोड़ दिया था.

जरा गैर कीजिये मीडिया का गैर-प्रोफेशनल व्यवहार. किसी एडिटर ने अपने रिपोर्टर से पहली खबर देने से पहले यह नहीं पूछा कि जिसने सबसे पहले उस लडकी को देखा था याने पुलिस कर्मी उससे हकीकत पता करे. एडिटर को मात्र इस बात में दिलचस्पी थी कि हैडिंग में लिखा जाये “मोगली गर्ल जिसे बंदरों ने पाला”.
डेस्क की बुलन्द्परवाजी (कल्पनाशीलता) का यह आलम था कि सभी लोकल अख़बारों और चैनलों ने यह बताना शुरू किया कि बंदरों में कितनी दया होती है और वे कितने “मानवीय” होते हैं कि जंगल में भी उस बच्ची के भरण-पोषण का इन्तेजाम इतने सालों  से करते रहे हैं.  यह है भारतीय मीडिया. 
  
किसी भी समाज में बदलाव की  दो मूल शर्तें होती हैं. एक: वह बेहतरी के लिए हो और दो: वह बुद्धि-सम्मत हो. भारत में हाल के आंकड़े जो संयुक्त राष्ट्र संघ ने या अन्य विश्वसनीय संस्थाओं ने  जारी किये हैं चीख-चीख कर बताते हैं कि भ्रष्टाचार, भूख सूचाकांक, खुशहाली सूचकांक या मानव विकास सूचकांक में भारत पिछले २७ सालों में या तो वहीं का वहीं है या नीचे गिरा है. यहाँ तक कि गरीब-अमीर के बीच खाई लगातार बढ़ती जा रही और आज देश के मात्र एक प्रतिशत अभिजात्य वर्ग के पास देश की  कुल संपत्ति का ५८.६ प्रतिशत सिमट गया है जो कि सन २००० में ३७ प्रतिशत हुआ करता था.  लेकिन क्या कभी आपने इन मुद्दों पर लोगों को  सड़क पर आते देखा है? क्या कभी सत्ता में बैठे लोगों को इन मुद्दों पर किसी भी प्रकार के जन-आन्दोलन का सामना करना पड़ा है? इस देश में पिछले २७ सालों से हर ३७ मिनट पर एक किसान आत्महत्या करता रहा है और प्रतिदिन २०५२ किसान खेती छोड़ कर श्रमिक बन कर बड़े शहरों में रिक्शा चलने को मजबूर हो रहा है. लेकिन क्या कभी टी वी स्टूडियो में ये मुद्दे चर्चा का सबब बन पाए हैं? अशिक्षित, गैर-प्रोफेशनल और गैर-जिम्मेदाराना मीडिया भी भावनात्मक मुद्दों को हवा देने में ज्यादा दिलचस्पी रखता है बजाय जनता को असली मुद्दों पर शिक्षित करने या मुद्दों पर जनमत बनाने के़़। 

जी हाँ? हम उत्सव धर्मी हैं और मुद्दे तलाशना हमारा शगल है. यही वजह है कि हम गौ-मांस, वन्दे मातरम का अपमान और राष्ट्रभक्ति की नयी परिभाषा और प्रतिमान गढ़ने लगे हैं. दिल्ली से सटे नॉएडा में घर में घुस कर जो हाथ अखलाक को मार देते हैं वे कभी भी इस बात के खिलाफ नारे नहीं लगाते कि कैसे एक अधिकारी इंजिनियर की संपती दो  हज़ार करोड रुपये की हो जाती है. वे हाथ अलवर में गाय का व्यापर करने वाले ५५ वर्षीय पहलू खान को सरे राह पीट-पीट कर मार देते हैं लेकिन कभी यह नहीं देखते कि बगल के किसान का अनाज सरकारी खरीद केन्द्रों पर नहीं लिया जाता जबकि आढ़ती उन्हीं से सस्ते  दाम पर वही अनाज लेकर उसी क्रय केन्द्रों  के भ्रष्ट लोगों  को बेंच देते है और मुनाफे का हिस्सा बाँट लिया जाता है.

मोदी सरकार ने नयी फसल बीमा योजना शुरू की. यह एक बेहद उपादेय योजना है जिसमें पिछली तीन योजनाओं की खामियों को लगभग पूरी तरह दूर  कर दिया गया है. लेकिन आजतक किसी भी न्यूज़ चैनल ने इसे डिस्कशन  का मुद्दा बना  कर जन-विमर्श के धरातल पर नहीं रखा लेकिन अगर ओवैसी ने  राम मंदिर को लेकर  कुछ भी कह दिया तो वह गेरुआ पहने बाबाओं और दाढ़ी रखे मुल्लाओं को हाफ-हांफ कर "तेरा धर्म-मेरा धर्म " की बांग देने का सबब बन जाता है.

भारतीय मीडिया में इतनी गिरावट पहले कभी नहीं देखी गयी थी. विकास के पैरामीटर्स को लेकर रिपोर्टरों की बीट होती थी और कोई भी रिपोर्टर "गौ-हत्या" या "तीन –तलाक" को फुल टाइम  बीट के रूप में नहीं देखता था. इस साल गेंहू की बम्पर फसल हुई है और देश में करीब ८५ मिलियन टन अनाज के भण्डारण की बड़ी समस्या बनी हुई है. आज देश में मात्र ३२ मिलियन टन अनाज के भण्डारण की क्षमता है. सरकार ने अगर तत्काल कुछ व्यवस्था नहीं की  तो किसानों की कड़ी मेहनत से उपजा गेंहू सड़कों पर फैला रहेगा और चूहे या चूहेनुमा अफसर इसे हज़म कर जायेंगे पर क्या आपने कोई चर्चा इस पर देखी है?

अमर्त्य सेन ने  भारत में १९४३ में होने वाले दुर्भिक्ष जिसमें २० लाख लोग मारे गए थे का विश्लेषण करते हुए कहा था कि अगर उस समय प्रजातंत्र होता तो लाखों लोगों की जानें न जाती क्योंकि उस समय भी सरकार के पास वहीं पास के सैनिक बैरकों में काफी अनाज था. उनका मानना था कि मीडिया की ताकत सरकार को मजबूर कर देती है कि वह रसद तत्काल दुर्भिक्ष वाले इलाके में पहुंचाए चाहे उसकी  जो भी  कीमत हो. लेकिन आज भारत में अनाज भी इफरात है , मीडिया भी है लेकिन विश्व भूखमरी सूचकांक पर भारत बेहद पीछे है और करींब २० करोड लोग रोजाना रात को भूखे पेट सोते हैं. क्या भारतीय मीडिया की अब भी अपने को संविधान के अनुच्छेद १९(१) (अ) से परिरक्षित रखने की जिद सही है?  

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