Saturday, 11 June 2016

कहीं चैनलों की बहस से दर्शक विमुख न हो जाये !





हम क्या देते हैं दर्शकों को हर शाम चार घंटों की बहस में. क्या हम सही मुद्दे जिनका जन-कल्याण से कोई सरोकार हो, चुनते हैं? अगर चुनते भी हैं तो ऐसे मुद्दे जिसमें होता है : “लात –जूता”, “तेरा नेता , मेरा नेता”, कुतर्क, अल्प ज्ञान से परोसे गए तर्क वाक्य, ऐसे संख्यात्मक तथ्य जो या तो विषय से दूर हैं या विषय के लिए काल-सापेक्ष नहीं हैं या फिर अर्ध-सत्य हैं. नतीजा यह होता है कि पूरी एक घंटे की बहस किसी कस्बे के नीम व्यस्त “चौराहे पर मदारी के करतब” दिखाने जैसा हो जाता है.

इसमें कोई दो राय नहीं कि देश के खबरिया चैनल जो एक समय प्राइम टाइम पर भी मनोरंजन, भूत-भभूत , सांप –बिच्छू दिखाया करते थे आज देश के तात्कालिक विषयों को लेते हैं और उन्हें बहस में उठा कर जनता को पक्ष-विपक्ष के तर्कों से हीं नहीं , परस्पर विरोधी तथ्यों से अवगत कराते हैं. जन संवाद के धरातल पर समाज के सामूहिक चिंतन को बेहतर बनाने का शायद इससे कारगर कदम कोई और नहीं हो सकता. इससे प्रजातंत्र की गुणवत्ता बढ़ती है. परन्तु क्या कभी हमने सोचा है कि विकास के मुद्दे , परियोजनाओं का जमीन पर आने पर हश्र और गरीबी की असली समस्या इन चर्चाओं का कितने प्रतिशत समय या स्थान ले पाते हैं ? क्यों जब सी ए जी की रिपोर्ट में बताया जाता है कि मनरेगा में दस साल पहले मरे आदमी के नाम पर काम दिखा कर अधिकारी पैसा हजम कर रहे हैं तो हम छोटी सी खबर देते हैं? क्या हम पहले हीं इस तथ्य को गाँव में जा कर दरयाफ्त नहीं कर सकते और क्या इस भ्रष्टाचार की वेदी पर दम तोड़ती  इस सार्थक योजना को लेकर जन-मत नहीं बना सकते?  

उदाहरण के तौर पर एक हीं दिन में हमारे पास कई खबरें होती हैं. एक: जिसमें कोई सामान्य समझ या कम सामाजिक प्रतिबद्धता वाला कोई तन्मय नाम का व्यक्ति किसी आइकॉन के बारे में एक फूहड़ टिपण्णी करता है. दूसरी और उतनी हीं बेहूदा टिपण्णी किसी साध्वी मंत्री द्वारा की जाती है जिसमें वह भारत को कांग्रेस –मुक्त के साथ मुसलमान-मुक्त करने का ऐलान करती है. पहला फूहड़पन की पराकाष्ठ है तो दूसरा अज्ञानता और घटिया धर्मान्धता की. लेकिन वहीं एक और खबर होती है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शिक्षा प्रकल्प द्वारा संचालित स्कूल का छात्र सरफराज हुसैन पूरे असम में टॉप करता है. हम इसे स्थान नहीं देते। चौथी खबर होती है : देश में पिछले १५ सालों में एक प्रतिशत अमीरों की संपत्ति में बाकि ९९ प्रतिशत लोगों के मुकाबले १०० गुना इजाफा हुआ है. सन २००० में यह इजाफा ५८ प्रतिशत था, २००५ में ७५ प्रतिशत, सन २०१० में ९४ प्रतिशत था. अगर इस स्थिति पर नियंत्रण नहीं किया गया तो गरीब की चड्ढी भी इन एक प्रतिशत के पास पहुँच जायेगी. क्या किसी देश में सक्षम मीडिया का यह दायित्व नहीं बनता कि व्यापक जन –चेतना बनाई जाये ताकि सत्ता पर बैठे लोग पर इस असंतुलित विकास को बदलने का दबाव पड़े? पांचवीं खबर: देश के हिंदी भाषी क्षेत्र के सात राज्यों आज भी मानव विकास के तमाम पैरामीटर पर वहीं के वहीं है जहाँ १० साल पहले थे. बिहार में आज भी तीन में से दो परिवार बिजली का इस्तेमाल नहीं करता. इन सात राज्यों के ६० प्रतिशत लोग आज भी खुले में शौच जाते हैं. ये वही लोग हैं जिन्हें गाय को लेकर या भारत माता की जय न कहने वाले पर इतना गुस्सा आता है कि इनकी सामूहिक चेतना परवान चढ़ जाती है. क्या जरूरी नहीं कि मीडिया की बहस इन्हें तार्किकता की ओर अभिमुख करने में हो.

एक ताज़ा खबर है कि मुसलमानों में काम न करने वालों की प्रतिशत अन्य समुदायों के मुकाबले सबसे ज्यादा है. दूसरे स्थान पर जैन धर्म के लोगों का हैं. इन दोनों के अलग –अलग कारण हैं. संपन्न लोगों का वर्ग भी इस श्रेणी में आता है. जबकि आर्थिक विपन्नता वाले दलित, आदिवासी या पिछड़ी जाति के लोग “काम न करने वाले “ वर्ग में कम रहते हैं. लेकिन मुसलमान इस वर्ग में सबसे ज्यादा इसलिए है क्योंकि यह अपने घर की महिलाओं को काम के लिए बाहर नहीं भेजता, “पर्दानशीनी” की प्रथा के चलते. अगर हम “तीन तलाक “ की कुप्रथा पर मुस्लिम महिलाओं के लिए टीवी स्टूडियो में जार-जार आंसू गिराते हैं और कोई मुल्ला इस कुप्रथा को उचित बताता है तो यह भी मीडिया का दायित्व है कि वह मुसलमानों में यह चेतना विकसित करे कि वे अपनी औरतों को आर्थिक संबल देने के लिए पढ़ायें और काम पर भेजें. इसके बाद “तीन तलाक” की कुप्रथा स्वतः हीं दम तोड़ देगी.

मोदी सरकार ने नयी फसल बीमा योजना में पुरानी कमियों को ख़त्म कर दिया है और यह कृषि क्षेत्र में एक बड़े बदलाव का सबब बन सकता है. यह गलत है या सही, गलत है तो क्यों और सही है तो क्यों किसान इसे अंगीकार करे , दर्शक ये मुद्दे कभी बहस में नहीं पाए होंगे. एजुकेशन सिस्टम का निजीकरण गरीबों को शिक्षा से दूर ले जाएगा या एकल परिवार (न्यूक्लियर परिवार) और विदेश में नौकरियों के साथ बढ़ती जीवन प्रत्याशा (६५.४ साल) के कारण बूढ़े लोगों की तादात में बेहद वृद्धि हुई है और वह बूढा व्यक्ति इलाज़ और सुश्रुषा के अभाव में तिल-तिल मर रहा है. समय आ गया है कि राज्य अभिकरणों पर जन-मत का दबाव बनाने का ताकि सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को मजबूत बनाया जाये. क्या इस पर कभी बहस हो सकी है? इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने तो यह भी नहीं बताया कि वर्तमान सरकार इस दिशा में कुछ प्रयत्न कर भी रही है. वह कितना सार्थक है और कितना और करने की ज़रुरत है, यह शायद आज की मीडिया का विषय नहीं है. वह यह बता कर कि अमरीकी कांग्रेस में सांसदों नौ बार खड़े हो कर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के भाषण पर तालियाँ बजाई, हीं खुश है. आज से तीन दिन पहले तक कोई पत्रकार यह नहीं जानता था कि “मिसाइल टेक्नोलॉजी कण्ट्रोल रेजीम” (एम् टी सी आर) क्या है लेकिन जब भारत इसका सदस्य बना और वाशिंगटन में विदेश विभाग के अधिकारियों ने इसकी ब्रीफिंग की तो हर चैनल इस पर घंटों हांफ-हांफ कर कसीदे काढ़ने लगा, बहस कराने लगा.      

दरअसल न्यूज़-रूम को इन मुद्दों के प्रति अपनी जानकारी बढानी होगी और साथ हीं संवेदना भी. कुल २५ करोड भारतीय परिवारों में से १९ करोड परिवारों के पास टीवी सेट्स हैं और “टैम”  मीटर्स की संख्या अब ८००० से बढ़ कर ३५,००० हो चुकी है और इनमें अधिकांश कस्बों में भी लग चुके हैं. इन कस्बों के लोगों में एक बड़ा वर्ग अभी गाँव से हीं आया है और खेती से जुड़ा है.

अगर बाजारू ताकतें मात्र कुछ वर्षों में उच्च से लेकर निम्न माध्यम वर्ग तक १० रुपये किलो का आलू “अंकल चिप्स” के नाम पर ४०० रुपये किलो बेंच सकती हैं (जिसे हर माँ अपने बच्चों के लिए होली में बनाया करती थी और जो कई महीने तक चाय के साथ चाव से खाया जाता था) तो क्या भारत की मीडिया गलत खेती के तरीकों, नयी सरकारी योजनाओं के प्रति जनता को सुग्राही नहीं बना सकता और क्या सरकार पर बढ़ती गरीब-अमीर की खाई पाटने का दबाव नहीं डाला जा सकता?    

बहस का मुद्दा बदलेगा तो राजनीतिक दलों का रुझान भी और समझ भी. “तेरे नेता-मेरा नेता की गला-फाड़“ झांव-झांव से हट कर ये दल भी पढ़े लिखे प्रवक्ताओं को भेजना शुरू करेंगे, एंकर-संपादक भी विषय पर अध्ययन करके आयेंगे और निष्पक्ष विश्लेषण की मान्यता बढेगी. वर्ना वह दिन दूर नहीं जब दर्शक बहस से यह कह कर मुंह मोड़ लेगा कि जब “मदारी का खेल हीं देखना है तो कपिल का शो क्या बुरा है”. और तब शायद हम अपनी पत्रकारिता की गरिमा से वंचित हो जायेंगें.            

lokmat

Friday, 3 June 2016

दादरी कांड: पुलिस का झूठ व कुतर्क


@n_k_singh


मथुरा की फॉरेंसिक लैब ने जांच के बाद पाया कि दिल्ली से सटे गौतमबुद्ध नगर के बिसहरा गाँव में अखलाक हत्याकांड के बाद जिस गोश्त का नमूना भेजा गया था वह गाय या गौ-बंश का था. यह खबर राज्य में चुनाव के मात्र कुछ महीने पहले सत्ताधारी दल – समाजवादी पार्टी के--- लिए नुकसानदेह था लिहाज़ा प्रदेश के “बुद्धिमान” अधिकारी नुकसान कम करने के लिए तर्क ढूढने में जुट गए. मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने राज्य के पुलिस प्रमुख का ताज़ा बयान उधृत किया जिसमें कहा गया था कि जिस मांस की जांच की गयी है वह अखलाक के घर से नहीं कुछ दूर पर रखे कूड़ेदान से लिया गया था. हालाँकि वह बयान दरअसल जिले के कप्तान का था. 


बचकानी लगती है पूरी लीपापोती की कोशिश. बयान की हवा तब निकल गयी जब एक अखबार ने वह तस्वीर छाप दी जिसमें एक पुलिस कर्मी मांस को पॉलिथीन के पैकेट में डाल रहा है. बगल में भगौना रखा हुआ है. यह मीडिया की सांप्रदायिक सौहार्द के प्रति संजीदगी है वर्ना उसके पास वह तस्वीर भी उपलब्ध है जिसमें मांस फ्रिज में भगौने में रखा हुआ है. फ्रिज में मांस पाने के बाद हीं हमलवार  भड़क गए. दरअसल एक जानवर का कटा पैर, और उसकी खाल भी घर से कुछ दूर पर गाँव वालों को मिला था. पुलिस ने भी इन्हें हासिल किया था. अखलाक और उनके बेटे से मार पीट के दौरान इस भीड़ में कुछ लोगों ने फ्रिज से उस भगौने को निकाल कर बाकि लोगों को दिखाना शुरू किया और पुलिस आने के दौरान मांस सहित उस भगौने को ट्रांसफार्मर के किनारे फेंक दिया. फर्द बरामदगी में तो पुलिस ने लिखा है कि इस मांस का अखलाक की हत्या से सबंध है लेकिन चार्जशीट में यह बात गायब है.



भारतीय साक्ष्य अधिनियम, १८७२ के सेक्शन ५ और सेक्शन ७ में तीन तरह के तथ्यों को साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत करने की बाध्यता है. पहला वह तथ्य जो सीधा मामले को लेकर हो याने अ ने ब को मारा. दूसरा सान्दर्भिक तथ्य मसलन मारने के पहले बकाया पैसे को लेकर धमकी दी थी. तीसरा साक्ष्य तथ्य वह होता है जो घटना का अवसर, कारण या परिणति हो. बिसहडा मामले में यह मांस और जानवर के अवशेष घटना की सान्दर्भिकता बताते थे और साथ हीं कारण भी थे. दूसरा, घटना के अगले दिन हीं अखलाक के परिवार की महिलाओं ने कहा कि जो गोश्त घर में था वह बकरे का था. याने गोश्त था. घटना के तत्काल बाद नॉएडा की सरकारी पशु-चिकित्सा लैब से आयी रिपोर्ट में कहा गया कि मांस बकरे का था लेकिन पुष्टि के लिए इसे मथुरा ऍफ़ एस एल लैब भेजा जाएगा. नॉएडा का लैब यह जांच करने में सक्षम नहीं है कि मांस किस जानवर का है. नमूना अक्टूबर ३, २०१५ (घटना के पांच दिन बाद) मथुरा लैब पहुंचता है और उसी दिन शाम को संयुक्त निदेशक के हस्ताक्षर से प्रमाणित किया जाता है कि मांस गाय या उसके वंशज का था. हकीकत यह है कोई सामान्य जानकार भी मात्र गोश्त देख कर बता सकता है कि वह किस जानवर का है. मथुरा लैब में तो त्री-स्तरीय जांच होती है और अंत में कैराटीन या यूरोफिन प्रोटीन स्ट्रक्चर के डिफरेंशियल्स के आधार पर यह पुष्टि की जाती है कि मांस किस जानवर का है.



उत्तर प्रदेश गौ-हत्या निरोधक अधिनियम, १९५५ के सेक्शन ३ में गौ या उसके वंशज की हत्या वर्जित है. सेक्शन २ (अ) में गौ मांस की परिभाषा “वह मांस जो गाय (या उसके वंशज) का हो लेकिन जो सील बंद डिब्बे में बहार से प्रदेश मीन आयातित न किया गया हो” है। अगर प्रदेश के डी जी पी की दलील मान ली जाये कि जांच अधिकारी (दरोगा) की समझ “सीमित” थी और उसने कूड़ेदान का मांस नमूने के तौर पर भेज दिया तो जांच की रिपोर्ट पता चलने के बाद से आज तक (आठ महीने बाद) भी अज्ञात लोगों के नाम गौ-कशी करने का ऍफ़ आई आर क्यों नहीं ? गोश्त गाय या बछड़े को बिना मारे पैदा करने की सलाहियत शायद उत्तर प्रदेश पुलिस में हो वैज्ञानिक रूप से तो संभव नहीं. राज्य पुलिस प्रमुख के अनुसार मांस किसका है, नमूना कहाँ से लिया गया है इससे अखलाक की हत्या से सम्बंधित केस का कोई लेने देना  नहीं है. कितना अजीब जवाब है. अपराध-न्यायशास्त्र में मेंस रिया (अपराध करने के समय अपराधी की मनोदशा)  का सिद्धांत हेनरी प्रथम के ज़माने में लाया गया और सन १११८ से आज तक अपराध-दोष सुनिश्चित करने का यह सबसे बड़ा आधार पूरी दुनिया में रहा है. गाय हिन्दुओं के लिए एक गहरा भावनात्मक मुद्दा ३००० साल से रहा है.    



गाँव के एक समुदाय के लोगों ने अखलाक के घर पर गोमांस पकाने के शक पर हमला किया और अखलाक को मार डाला था. देश हीं नहीं पूरे विश्व में इस घटना की निंदा की गयी. अगर कोई इस कानून का उल्लंघन करता है तो किसी अन्य समुदाय को कोई अधिकार नहीं कि कानून हाथ में ले और किसी की हत्या करे. लिहाज़ा अखलाक को मारा जाना कहीं से भी उचित नहीं है.



पर यहाँ एक प्रश्न और उठता है. भावनाओं के प्रश्न मात्र कानून से हल नहीं किये जाते क्योंकि कानून की प्रक्रिया दुरूह और भावना-शून्य होती है. गाँव की सामजिक सरचना को ध्यान में रखते हुए एक उदाहरण लें. गाँव या आस –पास से एक बछड़ा एक रात गायब होता है. अगले कुछ दिनों तक वह नहीं मिलता. क्या इस मामले को लेकर वह ग्रामीण थाने  में रिपोर्ट लिखवाए. और अगर यह रिपोर्ट लिखी भी जाती है तो क्या पुलिस इस बछड़े को उसी शिद्दत से ढूढेगी जिस शिदत से वह अपने एक मंत्री की भैंस ढूढने के लिए पूरी पुलिस लगा देती है? यहाँ कानून अनुपालन के अभिकरण याने पुलिस जन-अपेक्षा से हमेशा कमतर पायी जाती है. इस बीच अगर यह खबर मिलती है कि अमुक घर के आसपास किसी जानवर का  अस्थि-पंजर मिलता है तो जाहिर है आक्रोश बढेगा.



शहरों में लोग खासकर परिवार के बच्चे पालतू कुत्ते से एक भावनात्मक सम्बन्ध बना लेते हैं. उसी तरह गांवों में एक बछड़ा या गाय जब अपने मालिक, मालकिन या परिवार के बच्चे को देखर हुंकार भरते हैं या कुलांचे मारते हैं उस जानवर से एक जबरदस्त भावनात्मक सम्बन्ध बन जाता है. फिर एक सम्प्रदाय के लोगों का गाय और उसके वंश को लेकर धार्मिक सम्बन्ध भी है. वे गौ को माता मानते हैं. शायद यहीं कारण हैं जिससे देश के २९ में से २४ राज्यों में गौ –हत्या प्रतिबंधित है. जब यह शक होता है कि गाँव के हीं किसी व्यक्ति ने जो गौ के प्रति वैसा भाव नहीं रखता या जिसके लिए गौ मांस का सेवन वर्जना के स्तर तक नहीं है बछड़ा ग़ायब किया है तो उसकी प्रतिक्रिया जाहिर है उग्रता और छोभ के मिश्रण के रूप में होगी.



क्या ऐसे में जरूरी नहीं है कि गांवों में इस भावना का सम्मान करते हुए दूसरा वर्ग भी सुनिश्चित करे कि उसके वर्ग का कोई भी व्यक्ति ऐसी हरकत न करे जिससे किसी अन्य समुदाय में वैमनस्यता आसमान पर हो?



उत्तर प्रदेश के डी जी पी की तरह दिल्ली में बैठ कर हम निरपेक्ष विश्लेषक सिर्फ इस बात को संज्ञान में लेते हैं कि चूंकि देश में कानून का शासन है इसलिए किसी को भी कानून हाथ में लेने का हक नहीं है. लेकिन तब हम यह नहीं देखते कि स्वयं कानून की कमजोरियां क्या हैं, जो लोग कानून के अनुपालन की संस्थाओं से जुड़े हैं वे कितने कमजर्फ हैं या भ्रष्ट हैं या सबसे ऊपर कानून की संस्थाओं को किस तरह राजनीतिक स्वार्थों की सिद्धि के लिए इस्तेमाल किया जाता है. पुलिस की प्रतिक्रिया सत्ता में कौन बैठा है और उसका स्वार्थ किस बात में है इससे निर्धारित होती है. इसे समझने के लिए आइंस्टीन का दिमाग नहीं चाहिए. आज के परिप्रेक्ष्य में ऐसी हीं किसी घटना पर उत्तर प्रदेश में पुलिस कैसे एक्शन लेगी, बिहार की पुलिस क्या करेगी और हरियाणा में क्या होगा इसे समझने के लिए हम “लाल-बुझक्कड़” विश्लेषकों को ज्यादा दिमाग लगाने की जरूरत नहीं है.



कानून की सीमायें हैं. लेकिन व्यक्ति या समुदाय की समझ की नहीं. इसे विकसित किया जा सकता है. क्या यह उचित नहीं था कि विभिन्न समुदाय आपस में हीं यह चेतना विकसित करे कि अगर कोई व्यक्ति सौहार्द बिगाड़ने के लिए या स्वार्थवश किसी अन्य समुदाय की भावना से खिलवाड़ कर रहा है तो गाँव में उस समुदाय के सभी व्यक्ति उसके खिलाफ खड़े हों. अगर कोई बछड़ा या गाय गुम हुई है तो उस समुदाय का भी कर्तव्य बंनता है कि वह अपने समुदाय के एक –एक व्यक्ति के घर की जांच करे. शायद तभी इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति नहीं होगी.


jagran

Saturday, 28 May 2016

यू पी चुनाव: फिर वही पुराने हथकंडे, विकास कहीं दूर खड़ा

@n_k_singh

दो साल पहले जब देश की बागडोर जनता ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हाथ में दी तो हमारे जैसे राजनीति-शास्त्र के विद्यार्थियों के मन में एक विश्वास पैदा हुआ कि प्रजातंत्र की गुणवत्ता बदलेगी और सामाजिक चेतना अतार्किक और पारस्परिक वैमनष्यतापूर्ण पहचान-समूहों से हट कर विकास की तार्किक समझ के आधार पर अपने फैसले लेगी. यह भी भरोसा बना कि दुनिया के वे सभी चिन्तक और राजनीतिक धुरंधर जिन्होंने आजाद भारत में ब्रितानी वेस्टमिन्स्टर मॉडल की शासन –पध्यति के अनुकरण करने के खिलाफ १८७० से १९४७ तक लगातार चेतावनी दी थी गलत साबित होंगे. पर वे सही निकले. पहले बिहार और अब उत्तर प्रदेश के चुनाव के पहले साफ़ दिखाई दे रहा है कि जातिवाद, साम्प्रदायिकता और छद्म सेक्यूलरवाद का बोलबाला हीं नहीं रहेगा बल्कि इसका नग्न तांडव भी हो सकता है.  

इस हफ्ते चार दिन के भीतर हीं सोशल मीडिया में दो खबरें आयीं जिन्हें जाहिर है चैनलों और अखबारों ने भी समय और जगह दी. पहली अयोध्या से थी और दूसरी देश की राजधानी दिल्ली से सटे नॉएडा से. ध्यान रहे कि ये विजुअल्स मीडिया के अपने प्रयासों से नहीं मिलते थे बल्कि आयोजकों के जानबूझ कर इन्हें लीक किया था. अयोध्या --जहाँ संघ परिवार राम मंदिर बनवाना चाहता है और जहां आज से २३ साल पहले बाबरी मस्जिद नामक विवादस्पद ढांचा गिराया गया था. बजरंग दल जो कि संघ परिवार का अनुषांगिक संगठन है इस शांत क़स्बे में हिन्दू युवाओं को शस्त्र प्रशिक्षण दे रहा है जिसमें लाठी और तलवार चलना हीं नहीं बन्दूक चलाना भी शामिल है. उद्देश्य है हिन्दुओं को आत्म-रक्षा के लिए और आतंकवाद के खिलाफ शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार करना. एक विजुअल में आतंकवादी हमले को नाकाम करने का माक -ड्रिल (छद्म अभ्यास) है. यहाँ तक तो ठीक है. अगर तलवार का लाइसेंस है (कुछ राज्यों में यह अनिवार्य है), बन्दूक उन्हीं के हाथ में है जो उसको रखने के कानूनी रूप से हकदार हैं और यह अभ्यास सार्वजनिक स्थल पर नहीं बल्कि निजी चाहरदीवारी के अन्दर किया जा रहा है तो यह कहीं से गैर-कानूनी नहीं है. लेकिन इस विजुअल में प्रदर्शित छद्म अभ्यास के आखिर में जिस "आतंकी" को मार गिराया गया है वह सर पर दोपल्ली टोपी और दाढ़ी (एक समुदाय विशेष का पहनावा) रखे दिखाया गया है. इस अभ्यास करने वाले बजरंग दल के नेता ने कैमरे पर कहा “जी हाँ, हम आतंकियों के खिलाफ हिन्दुओं को तैयार कर रहे हैं और जो कुछ मदरसों में हो रहा है वह नहीं चलने देंगे.

भारतीय दंड संहिता में १९७२ में एक संशोधन किया गया जिसके तहत सेक्शन १५३ अ (ग) लाया गया. उसके अनुसार ऐसा कोई भी अभ्यास, ड्रिल , आन्दोलन या ऐसी कोई अन्य गतिविधि जिसका आशय किसी अन्य समुदाय, नस्ल, भाषा या क्षेत्र के लोगों के खिलाफ हिंसा के लिए होने की आशंका हो, गैर-कानूनी है.  

उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार ने तत्परता दिखाई और अयोध्या के बजरंग दल के नेता को गिरफ्तार कर लिया. अगले तीन दिन मे नॉएडा में भी यही “अभ्यास” उसी बजरंग दल द्वारा किया गया. अगले दिन जब भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष से एक प्रेस वार्ता में पूछा गया कि यह क्या हो रहा है तो उनका कहना था “अगर ये अभ्यास गैर-कानूनी हैं तो उत्तर प्रदेश की सरकार कार्रवाई करे. उनका भाव चुनौती वाला था. यही वह पेंच है जो पूरे प्रजातंत्र के लिए मवाद भरे घाव का रूप ले रहा है. ६६ साल के प्रजातंत्र में हम यही तक पहुंचे हैं. किसी नितीश ने आतंकी इशरत जहाँ को बिहार की बेटी बताया तो किसी मुलायम ने गोरखपुर बम ब्लास्ट के आरोपियों के खिलाफ मुकदमा वापस लेने के उपक्रम किये और किसी लालू ने जेल में बंद अपराधी शहाबुद्दीन को अपनी पार्टी की कार्यकारिणी में मनोनित किया. मुलायम और लालू जब अपने समूचे परिवार को राजनीतिक पदों और लोकसभा और राज्यसभा में आसीन करवाते हैं तो वह लोहिया के सपनों को साकार करना बताया जाता है. प्रजातंत्र की विद्रूप चेहरा साफ़ दीखने लगता है. जाहिर है इस राजनीति का जिसमें शहाबुद्दीन की भूमिका हो या छोड़े जाने वाले आतंकी की भूमिका हो या चुनाव के समय मुख्यमंत्री मुसलमानों को आरक्षण दे डाली जो डंके की चोट पर संविधान का उल्लंघन है का प्रतिकार दूसरी विपक्षी पार्टी कैसे करेगी. लिहाज़ा भाजपा को अगर जिन्दा रहना है तो वह भी जहर को जहर से हीं काटेगी. लिहाज़ा बजरंग दल हिन्दुओं को “बचाएगा” , आतंकियों को ख़त्म करेगा और यह भी बताएगा कि आतंकी कौन से सम्प्रदाय से है. और जब यह सब कम लगेगा तो विजुअल्स मीडिया को लीक कर देगा और उसका नेता बताएगा कि मदरसों में क्या हो रहा है. सरकार को चुनौति दी जायेगी कि दम हो तो गिरफ़्तार करो। अखिलेश कर भी लेंगे क्योंकि उनके भी १८.५ प्रतिशत वोट पक्के। भाजपा भी हिन्दू ध्रुवीकरण के कारण ७९ प्रतिशत में चोंच मार सकेगी। घाटे में होंगी बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस जो इस खेल में अभी तक सेक्युलर -सेक्युलर हीं खेल पाये हैं । 

यहाँ प्रश्न यह है कि भारतीय संविधान ने कब से आतंकवादियों से हिन्दुओं को बचाने का ठेका किसी बजरंग दल को दे दिया है. क्या राज्य के अभिकरण, देश की लगभग १६ लाख केंद्र और राज्यों की पुलिस, १३.५ लाख सेना कम पड़ रहीं हैं और अगर ये कम हैं तो क्या मुट्ठी भर लाठी-भांजते लोग इसे रोक पाएंगे. क्या आशय सच में हिन्दुओं को बचाना है और है तो क्यों नहीं राज्य के अभिकरण के खिलाफ प्रजातान्त्रिक लड़ाई लड़ी जाती कि उत्तर प्रदेश की दो लाख पुलिस क्यों आतंकवादी पैदा होना बंद नहीं कर पा रही है.

दरअसल आतंकवादियों से लड़ने के लिए राज्य अभिकरण हीं होते हैं समाज के लोग भी अगर उसी भाव में आ गए तो हम आतंकवादियों के खिलाफ आतंकवादी पैदा करेंगे और तब समस्या का समाधान होने की जगह भारत सीरिया, बोस्निया और चेचेन्या बन जाएगा.

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने एक प्रेस वार्ता में इस मुद्दे पर दो  अच्छी सलाहें दीं. पहला , अगर बजरंग दल की गतिविधि गलत है तो उन पर कार्रवाई करे राज्य सरकार और दूसरा कि आप किसी संस्था ने क्या किया है पर ध्यान देने की जगह यह देखो कि सरकार (याने मोदी सरकार) क्या कह रही है और क्या कर रही है. पर अगर उनकी बात पर ध्यान दिया जाये तो मोदी सरकार के मंत्री हीं हर दूसरे दिन भारत माता की जय न बोलने वालों को “पापी” कहते हैं, हर तीसरे दिन ऐसे लोगों को पाकिस्तान भेजने की धमकी देते है” और हर चौथे दिन “न बोला तो कानून बनायेंगे “ का ऐलान करते हैं. क्या उनकी बात सुनीं जाये?

क्या अच्छा न होता कि मोदी की पार्टी कार्यकारिणी में की गयी अपील पर ध्यान देते हुए हर भाजपा , बजरंग दल , विश्व हिन्दू परिषद् और संघ परिवार का हर सदस्य नयी फसल बीमा योजना के लाभ, किसानों से जरूरत से अधिक यूरिया न इस्तेमाल करने की सलाह, और केंद्र के जन-कल्याण के अनेक कार्यक्रमों को जन-जन तक ले जाते ? इससे विश्व में भी संघ की साख बढ़ती और देश में समरसता भी. 

Monday, 23 May 2016

मीडिया को नहीं तो कम से कम न्यायपालिका को तो बख्श दो सरकार !!



फ़्रांस के समाजशास्त्री अलेक्सिस टाक्विल (१८३५) और ब्रिटेन के राजनीतिक दार्शनिक जॉन स्टीवर्ट मिल (१८६०) ने २५ साल के अंतराल में प्रजातंत्र के दो नये खतरों के प्रति आगाह किया था. पहले का मानना था कि “बहुमत के आतंक” के शिकार व्यक्ति के पास कोई बचने का चारा नहीं होता. दूसरे ने इस भय की ओर इंगित किया था कि “प्रजातंत्र मात्र एक शासन पद्धति न होकर असंगठित भीड़ की पसंद और नापसंद को देशवासियों पर बलात थोपने की प्रक्रिया है”.    

जब मोदी सरकार का एक वरिष्ठ मंत्री ६० दिन में दो बार (एक बार प्रेस नोट जारी करके) जन-मंचों से अपने प्रधानमंत्री को “भारत के लिए ईश्वर का उपहार” बताता है और उसे फटकार नहीं पड़ती या पद से इस सामंती चाटुकारिता के लिए हटाया नहीं जाता तो डर लगता है कहीं पूरे देशवासियों को शासन अपनी दंड –शक्ति से इस नए “दैवीय उपहार” की वंदना करने को मजबूर तो नहीं करेगा. तार्किक समाज में तो “संविधान” को देश की सामूहिक सोच का उपहार माना जाता है। उसी समाज से वोट लेकर मंत्री मंत्री बनता है और प्रधानमंत्री प्रधानमंत्री और उसी संविधान की शपथ के बाद मंत्रिमंडल शासन करता है. अगर इसके अतिरिक्त कोई “उपहार” है तो वह व्यक्तिगत सोच हो सकती है जो जन-धरातल पर व्यक्त नहीं की जानी चाहिए बल्कि कमरे के अन्दर “अर्चना” की जानी चाहिए. इसी भाव में जब एक अन्य मंत्री “भारत माता” की जय न बोलने वालों को “पापी” बताता है और ऐसे लोगों को कानून बना कर मजबूर करने की धमकी देता है तो भी डर लगता है. यह डर तब और बढ़ जाता है जब एक अन्य सबसे प्रभावी मंत्री न्यायपालिका पर जनता के बीच जा कर सतत हमला करता है.

क्या हो गया है भारतीय जनता पार्टी के विवेक को? “पापी” या “दैवीय उपहार” यह सभ्य और तार्किक समाज के शब्द नहीं हैं. और भारत के संविधान में तो हर नागरिक से “वैज्ञानिक सोच” विकसित करने की अपेक्षा (अनुच्छेद ५१ ज) में की गयी है तथा उद्देशिका में भी “उपासना की स्वतन्त्रता” दी है.

देश का प्रजातंत्र एक खतरनाक मोड़ पर है. भारतीय समाज अनगनित पहचान समूहों में बंटा है और सत्ता में जगह पाने की जबरदस्त लड़ाई चल रही है. राजनीति –शास्त्र के सिद्धांत के अनुसार प्रजातंत्र में जन-धरातल पर तो यह लड़ाई अनवरत रूप से चलती रहती है लेकिन सत्ता में आया दल निर्विकार भाव से कुछ पूर्व-स्थापित मूल्यों, संविधान और तज्ज़नित विधियों के अनुरूप शासन करता है. यहाँ एक लक्ष्मण रेखा होती है. जब पहचान समूह या समूहों के बल पर सत्ता में आया दल या दलों का गठबंधन दूसरे पहचान समूह या समूहों को एक सीमा से ज्यादा नज़रअंदाज या प्रताड़ित करने की कोशिश करता है तो मीडिया या न्यायपालिका तन कर खडी हो जाती है. यह प्रजातंत्र की खूबसूरती है कि जब कोई एक संस्था पाक्षिक, अनैतिक या अकर्मक होने लगती हो तो दूसरी संस्था उसे सही रास्ते पर लाने के लिए अपनी भूमिका में थोडा विस्तार करती है याने मीडिया का कवरेज बढ़ जाता है , भाषा तल्ख़ हो जाती है और न्यायपालिका का रुख सख्त.  

मोदी सरकार का एक मंत्री मीडिया को “प्रेस्टीच्यूट” (प्रेस और प्रोस्टीच्यूट --पैसे के लिए शरीर बेचने वाली/वाला-- का शाब्दिक वर्ण -संकर) कहता है. एक अन्य मंत्री “जो भारत माता की जय नहीं बोलेगा वह पापी है का “श्राप” देता है",  दूसरे दिन उन्हें पाकिस्तान भेजने का ऐलान करता है और तीसरे दिन उनको इस पाप से बचाने के लिए कानून बना कर मजबूर करने की धमकी देता है. जाहिर है यह धमकी केवल अल्पसंख्यकों के लिए नहीं बल्कि उन सभी देशवासियों के लिए है जो सताधारी दल के इस भाव से सहमति नहीं रखते. क्यों “भारत माता की जय” ? क्यों भारत पिता की जय नहीं ? क्यों मादर-ए-वतन जिंदाबाद नहीं? क्यों भारत के प्रति अमूर्त सम्मान नहीं जो “अद्वैतवाद” का मूल है ? क्यों जय भी बोलें तो एक खास भाव में? याने सत्ताधारी दल शब्द भी अपने चुनेगा, उसका मूर्त रूप कैसा हो यह भी तय करेगा और निष्ठां व्यक्त करने का तरीका भी वही बताएगा ! और अगर यह सब नहीं किया गया तो कानून भी बना देगा क्योंकि वह संसद में बहुमत में है. और जब कभी न्यायपालिका इस कुप्रयास को संविधान के मूल दांचे के विपरीत बताएगा तो न्यायपालिका पर अपनी सीमा लांघने का आरोप लगेगा !    

जब बहुसंख्यक पहचान समूह और सत्ता में काबिज लोग यकसां हो जाते हैं, जब उनके मंत्री घूम –घूम कर अल्प-संख्यक पहचान समूह को पाकिस्तान भेजने का ऐलान करते हैं और जब सत्ता में बैठा सबसे प्रखर मंत्री देश की बची-खुची और सबसे सम्मानित संस्था को पानी पी –पी कर जन मंचों से कोसने लगता है तो लगता है प्रजातन्त्र का टिकना मुश्किल होगा. इस खतरे के अंदेशे को तब और बल मिलता है जब ऐसे मंत्री पर कोई लगाम नहीं लगाया जाता. साफ़ दीखता है कि बहुसंख्यक का यह भाव राज्य की परोक्ष नीति बन गयी है.

जब यू पी ए के काल में २-जी स्पेक्ट्रम घोटाले को लेकर देश की हर संस्था ने सरकार के रवैये को गलत बताना शुरू किया, जब सी ए जी की रिपोर्ट के प्रकाश में मीडिया भ्रष्टाचार पर जबरदस्त कवरेज करते हुए सामूहिक चेतना में गुणात्मक परिवर्तन का सबब बना, जब सुप्रीम कोर्ट ने सत्ता में बैठे लोगों पर भरोसा न करते हुए भ्रष्टाचार के बड़े मामले में जाँच अपनी देखरेख में कराना शुरू किया और जब इस अदालत ने देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी को “पिंजड़े में बंद तोता” कहा तो भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के इन मंत्रियों को मीडिया, न्यायपालिका गलत नहीं लगी थी और उसी को आगे बढ़ाते हुए जनमत के आधार पर आना बुरा नहीं लगा था. नैतिकता तो तब होती जब घोषणा पत्र में मोदी को देशवाशियों के लिए “दैवीय उपहार” बताते और भारत माता की जय न कहने वालों को पापी प्रमुख बिन्दु होता? 

क्यों न्यायपालिका मजबूर होती है इस संस्थाओं को दिशा-निर्देश देने के लिए. देश के माहौल में जब सांप्रदायिक आवेश पैदा करना मंत्री का शगल हो जाएगा तो अखलाक मारा जाता है. मंत्री पूछता है “क्या सरकार ने मारा , क्या भाजपा ने मारा ?”. नहीं लेकिन मंत्री जब माहौल बनाता है तो एक वर्ग में उन्माद बढ़ता है और वह वर्ग मंत्री या पार्टी को खुश करने के लिए अखलाक के यहाँ कौन सा गोश्त पका है ढूढने निकल पड़ता है.

१९ वीं सदी के पूर्वार्ध में अमरीका में जैकसोनियन प्रजातंत्र की पूरे यूरोप में धूम थी. फ़्रांस के राजनीतिक चिन्तक अलेक्सिस टाकविल्ल उत्सुकतावश इसका अध्ययन करने उस सदी के तीसरे दशक में अमरीका पहुंचे. लौट कर सन १८३५ में उन्होंने “अमरीका में प्रजातंत्र” शीर्षक एक पुस्तक लिखी जिसमें उन्होंने “बहुमत के आतंकवाद” से आगाह किया. उनका कहना था “प्रजातंत्र  की कमियों को लेकर अब तक की यूरोपीय अवधारणा से हट कर जो सबसे बड़ा ख़तरा है वह बहुमत के आतंक का है. अगर कोई व्यक्ति इस आतंक से प्रताणित होता है तो वह किसके पास जाये ? जनमत के पास जो कि उसी बहुमत वाले के पास है ; विधायिका के पास जिसमें उसी बहुमत के लोग चुने गए है ; कार्यपालिका के पास जो उसी बहुमत की सरकार द्वारा नियुक्त की गयी है ; न्यायपालिका के पास जो इसी बहुमत के लोगों द्वारा चुने जाती हैं?” . भारत के संविधान में एक गनीमत है कि यूरोप या अमरीका से से हट कर न्यायपालिका स्वतंत्र है और यही एक सहारा है. लेकिन उसे भी लक्ष्मण रेखा दिखाई जा रही है.

lokmat/ hindustan


Sunday, 15 May 2016

“जंगल राज” में भी कुछ मर्यादाएं होती हैं पर बिहार के "नव - प्रजातंत्र " में वे भी नहीं




१५ अगस्त, १९४७ की बात है. देश आजादी का जश्न मना रहा था. हल्की बारिश हो रही थी. वाराणसी के पास एक स्टेशन था –कोढ़ रोड जिसे आज ज्ञानपुर कहते हैं. उस स्टेशन के सहायक स्टेशन मास्टर फुन्नन सिंह भी अति उत्साह में ऑफिस में बैठे थे. ट्रेन आने का टाइम हो गया था. लेकिन एक भी आदमी टिकट लेने नहीं आया. फुन्नन सिंह अचम्भे में कार्यालय के बाहर निकले तो देखा सैकड़ों लोग प्लेटफार्म पर खड़े हैं. उन्होंने चिल्लाकर सबसे कहा “अरे भाई टिकट ले लो , ट्रेन आने वाली है”. भीड़ का जवाब था “अरे अब किस बात का टिकट. अब ये अंग्रेजों की ट्रेन थोड़े ना है, आज से ये हमारी ट्रेन है”.   

बिहार में आज अपराधियों का भी यही भाव है मानो कह रहे हों --- कैसा कानून, अब ये हमारा शासन है. सीवान में एक हिंदी अखबार के पत्रकार की गोली मार कर सरे शाम फल-मंडी में हत्या करना "जंगल राज “ को शर्मशार करता है. जानवरों के भी कुछ कानून होते हैं. प्रजातंत्र के दार्शनिकों को कोई नया शब्द गढ़ना होगा “नए बिहार” के “सुशासन” को लेकर. लेकिन शब्द गढ़ने से क्या होगा? “जंगल राज” कहा गया था तो क्या जनता ने समझ लिया था इसका मतलब? नहीं, उसने कानून-रूपी नयी गाड़ी को अपना माना और फिर शुरू हो गया तांडव. उसने “जाति देखी”. उसने अपना “रोबिनहुड” पैदा किया और फिर उसे सत्ता की शक्ति का अदृश्य कवच पहना दिया. वर्षों से जेल में रहे एक खतरनाक अपराधी को एक राजनीतिक दल ने बाकायदा अपनी पार्टी का पदाधिकारी बनाया. कानून को “फ्री की ट्रेन” समझने वालों ने लोगों को मारना शुरू किया.

कैसे शुरू होता है यह सिलसिला, इसे समझने की ज़रुरत है. सिस्टम पर विश्वास नहीं लिहाजा जनता अपने पहचान समूह में फिर से वापस चली जाती है और उसमें तलाशती है एक रोबिनहुड  -- याने वह डकैत जो उसके विचार में अमीरों को तो लूटता है पर गरीबों की शादी में उस लूट का कुछ अंश दान के रूप में दे देता है. कार्ल मार्क्स ने भी तो यही कहा था --- राज्य का उद्भव शोषण-जनित वर्ग संघर्ष को ख़त्म करने के अभिकरण के रूप में होता है लेकिन कालांतर में राज्य के अभिकरण स्वयं शोषक हो जाए हैं. तो किसी ठाकुर जाति के लोगों को किसी अपनी जाति  के गुंडे में या किसी मुसलमान समाज के लोगों को एक मुसलमान गुंडे में अपना रहनुमा देखने में क्या दिक्कत है? कुछ दिन में हीं इस रािबनहुड को मतदान के ज़रिये  राज्य की शक्तियों से भी नवाज़ दिया जायेगा। राकी और शहाबुद्दीन को भी यह मालूम है कि जनता के बीच भी अपने को रािबनहुड के रूप मे स्थापित करने के लिये किसी बेगुनाह निहत्थे आदित्य या राजदेव रंजन को तो मारना ही पड़ेगा। चूँकि फिर कोई चश्मदीद गवाह आदित्य या रंजन नहीं बनना चाहेगा लिहाज़ा गवाह बदल जायेंगे और मीडिया ख़ामोश। अदालत को गवाह और सबूत चाहिये जो सरकार और पुलिस जुटाती है। जब सत्ता मे भी राकी और शहाबुद्दीन की ज़रूरत होने लगे तो पुलिस क्या करेगी।
       
आदित्य सचदेव को मारने वाला रॉकी लाईसेंसी पिस्तौल रखता है और उसका का पिता एक क्षेत्रीय बाहुबली है. इसे समझने के लिए आइंस्टीन का दिमाग नहीं चाहिए कि बाहुबली क्यों और कैसे पैदा होते हैं और उनका बेटा कैसे उन्हीं नक़्शे कदम पर चलता रोबिनहुड की महिमामंडित संस्था पर बैठता है. किसी राजद या किसी जदयू को यह समझने में देर नहीं लगती कि बाहुबली का बल सत्ता का संरक्षण पा कर रामचरित मानस के उस बालि की तरह हो जाता है जिसके सामने अगर शत्रु खड़ा भी हो जाये तो उसकी आधी शक्ति बालि के पास पहुँच जाती है. लिहाज़ा ऐसे भावी “राबिनहुडों” को तैयार करने के लिए पहले चरण में किसी नितीश कुमार को या किसी लालू यादव को उसकी माँ में देश का रहनुमा नज़र आने लगता है. और उसे चुनाव की जलालत न झेलनी पड़े लिहाज़ा विधान परिषद् में ला कर इस “नव-प्रजातांत्रिक प्रक्रिया” के तहत महिमामंडित किया जाता है. लालू यादव का जेल में बंद खतरनाक अपराधी शहाबुद्दीन को पार्टी में पद से नवाजना भी उससी "नव-प्रजातंत्र” का हिस्सा है.

प्रश्न यह नहीं है कि इस “नव-प्रजातंत्र “ में रोबिनहुड पैदा किये जा रहे हैं. प्रश्न यह है कि औपचारिक प्रजातंत्र, जिसमें एक संविधान होता है और कानून के राज की अपरिहार्य शर्त होती है, के प्रसाद में बैठ कर कुछ नेता इसे ईंट-दर-ईंट तामीर कर रहे हैं और वह भी औपचारिक प्रजातंत्र की इमारत को गिरा कर और उसी की ईंटों द्वारा.

यही वजह है कि आदित्य सचदेवा की बीच सड़क पर की गोली मार कर के गयी हत्या के बाद भी प्रदेश का मुख्यमंत्री कहता है “इसमें रॉकी की माँ का क्या दोष है ?”. कितनी निश्छल है यह स्वीकारोक्ति. लेकिन अगले २४ घंटे में हीं शायद नितीश कुमार को पता चला कि “निर्दोष माँ” के घर में प्रतिबंधित शराब भी मिलती है. हालांकि अदालत में यह भी कहा जा सकता है कि किसी अदने नौकर ने यह शराब रखी है और वह नौकर उसे स्वीकार भी कर लेगा जैसे रॉकी का कहना है कि वह घटना के समय दिल्ली में था और सभी गवाहों ने अचानक “किसी को भी आदित्य को गोली मारते नहीं देखा” कहना शुरू किया है. फिल्म अभिनेता सलमान की ड्राइवर ने भी “बाद” में अपना जुर्म कबूल लिया था.

नितीश कुमार को राजनीतिक दार्शनिक जर्मी बेन्थैम की मशहूर उक्ति “कानून और नैतिकता की केंद्र बिंदु एक होता है परन्तु परिधि अलग-अलग” मालूम होनी चाहिए. मैकआइवर ने कहा था “कानून का अनुपालन सामाजिक व्यवस्था के प्रति लोगों की प्रतिक्रिया के रूप में होती है” और बिहार में इसके उलट अपराधियों के हौसले सत्ता की गुणवत्ता के प्रतिक्रिया के रूप में सडकों पर दिखाई दे रहे हैं. 

सीवान में पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या बिहार में प्रजातंत्र के घाव का बदबूदार मवाद है और अगर इसे छोड़ दिया गया तो यह मेटा-स्टासिस के स्टेज का कैंसर बन कर न केवल मीडिया को बल्कि पूरे बिहार को अपनी आगोश में ले लेगा. तब शायद सत्ताधारी भी न बच पायें.


lokmat

Friday, 6 May 2016

वो, हम और “डील” --- कुछ अनछुए पहलू


भारत में घोटाले की बाद पहले चरण में “चिट्टी-चिट्ठी और जांच-जांच” खेलते हैं और अगर मामले  की आंच राजनीतिकों तक जाये तो “दूध का दूध और पानी का पानी” के जुमले फेंकते  हैं क्योंकि सभी राजनेता जानते हैं कि “तोता खाली टांय –टांय करता है”

भ्रष्टाचार को लेकर हमारी संस्थाएं संवेदन-शून्य हो चुकी हैं.  तुलसीदास के मूढ़ की तरह हैं जिनपर “जगत-गति” व्याप्त हीं नहीं होती ये संस्थाएं और इनके “बलवान लोग” “पागुर” (जुगाली)  करते रहते हैं. जरा दो राष्ट्रों ---- इटली और भारत-- की संस्थाओं की भ्रष्टाचार को लेकर प्रतिक्रिया देखें समझ में आ जाएगा भारत की सरकारों व  उनकी संस्थाओं का "भैंस-भाव”. चार साल। दो सरकारें। और संसद में इस बात पर पाँच घंन्टे बहस कि पैरामीटर किसने बदले अर्थात दोनो एक दूसरे की क़मीज़ के धब्बे दिखाते रहे।

अगुस्ता हेलीकाप्टर कंपनी की होल्डिंग कंपनी फिनमेकनिका के एक पूर्व वरिष्ठ कर्मचारी लोरेंजो ने एक पत्र भेजा जिसमें भारत द्वारा की गयी १२ हेलीकॉप्टरों की खरीद में “घूस” देने की बात कही. पत्र पाने के एक हफ्ते के अन्दर देश की सैन्य पुलिस – अरमा दी करबेनिएरि – ने जाल बिछा दिया. कंपनी के सी ई ओ ओरसी के इर्द गिर्द. उसके मोबाइल को और ईमेल को सर्विलांस और इंटरसेप्टर पर डाल दिया गया. गुप्त कैमरे लगाये गए और वायर टेप का जाल बिछा दिया गया. एक टीम छाया की तरह ओरसी और कंपनी के एक अन्य अधिकारी के पीछे लग गयी. कई रातों गुप्त छापे  मार कर इसके कार्यालय और घर में मौजूद दस्तावेजों की नक़ल तैयार कर लीं गयी. शिकार पांच महीने में हीं जाल में फंस गया. फ़रवरी १२, २०१३ को अल सुबह उत्तरी मिलान राज्य से ६० किलो मीटर दूर ऐल्प्स की पहाड़ियों की तलहटी में बसे सस्तो कालंडे शहर के मकान से ओरसी को गिरफ्तार कर लिए गया. अगले एक साल में देश की निचली अदालत ने ओरसी और उसके दूसरे अधिकारी को दो साल की सजा सुना दी लेकिन ज्यादा दर पर हेलिकॉप्टर बेचने के आरोप में). अगले दो साल में हीं मिलान के अपील कोर्ट (हाई कोर्ट) ने सजा पलटते हुए स्पष्ट रूप से भ्रष्टाचार के मामले में याने दलालों को और भारतीय लोगों को घूस देने के आरोप में चार और साढ़े चार साल के सजा सुना दी. याने एक चिट्ठी से खबर मिलने और हाई कोर्ट से सजा होने में मात्र चार साल. जब ओरसी को गिरफ्तार किया गया तो उस देश के तीन बार प्रधानमंत्री रहे बर्लुस्कोनी ने नाराजगी जताते हुए एक इंटरव्यू में कहा “ दुनिया में व्यापार करने के लिए घूस देना एक अनिवार्य शर्त है और ओरसी की गिरफ्तारी से इटली की  सरकार “आर्थिक आत्महत्या “ कर रही है. भारत जैसे देशों में बगैर घूस के कुछ होता हीं नहीं है”. ध्यान देना होगा कि इटली में किसी को घूस नहीं मिला, १२ हेलीकॉप्टरों को तीन गुने दाम पर बेंच कर ओरसी और कंपनी ने देश का कोई अहित नहीं किया और कंपनी में सरकार के बड़े शेयर हैं. 

अब जरा तस्वीर का दूसरा पहलू देखिये. ठीक उसी वक्त जब इतालियन मिलिट्री पुलिस को पूर्व कर्मचारी लोरेंजो की चिट्ठी मिली, भारत में भी प्रतिरक्षा मंत्रालय, एन्फोर्समेंट डायरेक्टरेट और गृहमंत्रालय को भी एक चिट्ठी और कुछ “सीक्रेट” दस्तावेज़ भेजे गए. अमरीका के एक पूर्व हथियार दलाल और वकील एल्मोंड एलन द्वारा भेजे गए गुप्त दस्तावेजों में भारत की मिलिट्री के सात “सीक्रेट” दस्तावेज भी थे. एक दस्तावेज वायु सेना का अगले पांच साल में हथियार खरीद की योजना से सम्बंधित था दूसरा मानव-रहित विमान खरीदने की योजना के बारे में, तीसरा हेलीकाप्टर खरीदने के बारे मे, चौथा “रॉ” द्वारा उपयोग में लाये जाने वाले सुर्विलांस विमान की खरीद के बारे में और पांचवां नेवी के लिए अगली पीढी की सबमरीन खरीदने के बारे में. पत्र में कहा गया था अंतरराष्ट्रीय दलालों को भारत की रक्षा सम्बंधित सीक्रेट दस्तावेज  थोक के भाव उपलब्ध रहते हैं.

भारत के सरकारी संस्थाएं अब “चिट्टी चिठ्ठी” और “जाँच-जाँच” खेलने लगीं. जैसे गिद्ध को किसी घोंसले में मांस का टुकडा दिखाई देता है.  सी बी आई से कहा गया पता लगाये, एन्फोर्समेंट डायरेक्टरेट से भी हकीकत बताने का इसरार हुआ. एन्फोर्समेंट डायरेक्टरेट का कहना था सी बी आई ऍफ़ आई आर नहीं दे रही है जबकि सी बी आई रक्षा मंत्रालय द्वारा सभी तथ्य न देना देरी का कारण बताने लगी. अधिकारियों की एक टीम अमरीका पहुँच गयी शिकायतकर्ता एलन से पूछ-ताझ के नाम पर १५ दिन अमरीका में मौज करने। शायद “भारतीय सीक्रेट दस्तावेज का स्रोत” तलाश करने का यही सबसे बेहतरीन तरीक़ा भी है। हालांकि तथ्य यह ही कि भारत सरकार के आधिकारिक “एग्जामिनर” ने अपनी रिपोर्ट में यह घोषित कर दिया था कि दस्तावेज बेहद सीक्रेट हैं. 

बहरहाल सी बी आई ने उस साल येन केन प्रकारेण में मुकदमा दर्ज किया. लेकिन कोई निष्कर्ष नहीं निकला. इस बीच इनकम टैक्स के अधिकारियों से भी जानकारी चाही गयी लेकिन उस विभाग ने कहा “पहले तथ्य तो बताइये”. पहले से गिरफ्तार अभिषेक वर्मा तक जांच को ले जा कर मामला ठन्डे बस्ते में डालने के कोशिश सबने मिल कर की. याने अगुस्ता डील पर कोई रोक नहीं लगाई गयी नहीं किसी अधिकारी के खिलाफ सर्विलांस या छापा मारा गया कम से कम इस बात की चिंता करते हुए कि देश की सेना के गुप्त कागजात और योजनायें विदेशी दलालों तक कैसे पहुँची. टीम घर में जांच करने के बजाये अमेरिका में बैठे “व्हिसलब्लोअर” के घर पहुँचती है जब कि चोर घर में बैठे थे. सी बी आई शायद ऍफ़ आई आर भी न लिखती अगर उसे यह आभास न होता कि ऑगस्टा डील पर भी स्वयं इटली की सरकार ने ग्रहण लगा गया दिया है.

जब १२ फ़रवरी, २०१३ को फिनमेकनिका का सी ई ओ ओरसी इटली की मिलिट्री पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया जाता है तो भारत में खलबली मचती है क्योंकि असली भ्रष्टाचार का दावानल तो इधर हीं आता. तब भारत के रक्षा मंत्री कहते हैं “घोटाला हुआ है” मानो उन्होंने आइंस्टीन की तरह कोई “सापेक्षता का सिद्धांत प्रतिपादित किया हो”. सी बी आई मार्च में केस तो रजिस्टर करती है और उसमें पूर्व वायु सेना प्रमुख त्यागी की नाम भी रहता है पर त्यागी किन किन दलालों से मिले यह बात जब चार साल बाद मिलान अपील कोर्ट का फैसला आ जाता है और देश में आक्रोश की ज्वाला फूट पड़ती है तब सी बी आई पूछती  है. पहले दिन त्यागी इनकार करते हैं दूसरे दिन जब उनकी इटली में दलालों और अधिकारियों मुलाकात संबंधी रजिस्टर में दर्ज नाम दिखाए जाती हैं तो कबूल करते हैं. इस बीच मीडिया के सवालों पर वह उन्हें “इनह्यूमन” (पशुवत) भी कहना नहीं भूलते. बताया जाता है त्यागी कई बार इन दलालों से मिल चुके हैं और वह भी पद पर आने के एक महीने में और डील के दौरान. उनके रिश्तेदार इसी धंधे में बताये जाते हैं. क्या त्यागी पर हाथ डालने के लिए भी इतालियन कोर्ट के फैसले का इन्तेजार करना ज़रूरी था? क्या हमारे वायु सेना चीफ विदेश में किससे मिले इसकी जानकारी दूतावास का काम नहीं है? क्या देश में उन के भतीजे किस धंधे में लगे हैं यह इंटेलिजेंस को नहीं जाननी चाहिए?   

भारत में घोटाले की बाद पहले चरण में “चिट्टी-चिट्ठी और जांच-जांच” खेलते हैं और अगर मामले  की आंच राजनीतिकों तक जाये तो “दूध का दूध और पानी का पानी” के जुमले फेंकते  हैं क्योंकि सभी राजनेता जानते हैं कि “तोता खाली टांय –टांय करता है”. जब मामला किसी “नालायक” इटली सरकार द्वारा इससे आगे बढ़ाया जाता है और हमारे राजनेताओं के पास चुल्लू भर पानी नहीं होता तो हम उस देश की अदालत को अपने देश की अदालत से “लेटर रोगेटरी” भेजवा देते हैं. 

सी ए जी की रिपोर्ट अगस्त, २०१३ में याने इटली में ओरसी की गिरफ्तारी के सात महीने बाद संसद पटल पर रखी गयी जिसमें कहा गया “कॉन्ट्रैक्ट निगोशिएटिंग समिति” ने हेलीकाप्टर का जो निम्नतम (आधार कीमत) रखा है वह जो कीमत निर्माताओं द्वारा ऑफर की गयी है उससे गैर-वाजिब रूप से ज्यादा है. लेकिन भारत में सरकारों और उनकी संस्थाओं को इस तरह की रिपोर्टों से कोई खास फर्क नहीं पड़ता. “ऐसी रिपोर्टें तो ७० साल से आ रही हैं, लेकिन कभी देश में क़यामत हुई क्या” का शाश्वत भाव सत्ताधारी वर्ग में रहता है.

लिहाज़ा तीन महीने बाद बेहद ईमानदार छवि वाले रक्षा मंत्री अन्थोनी ने दिसम्बर, २०१३ को आकाशवाणी की तरह ईश्वरीय वचन कहे जो भ्रष्टाचार से युगों से दबे –कराहते लोगों को अच्छा लगा--- “हेलीकाप्टर समझौते में घपला हुआ है”. प्रश्न था कि हुआ है तो आगे क्या? इस पर रक्षामंत्री ने कहा “ब्रिटिश और इतालावी सरकारों ने ज्यादा जानकारी देने से इस आधार पर मना कर दिया कि मामला अभी अदालत में है”.

अब जरा गौर कीजिये जब इसी इतालवी सरकार ने भारत से जानकारी माँगी तो भारत की सरकार ने मात्र सी ए जी की रिपोर्ट पकड़ा दी. इस बात पर इटली की सरकार जो नाराज मिलान की अपील अदालत ने भी इस बात का जिक्र किया कि भारत से कोई सहयोग नहीं मिला. 

इन सब के बावजूद आज देश की पार्लियामेंट में बहस इस बात पर है कि “मैंने तो नहीं तह तक जाँच नहीं किया दम हो तो तुम करके दिखादो”. और शायद यह सरकार भी सफल न हो क्योंकि

गैर मुमकिन है कि हालात की गुत्थी सुलझे, 
अहले दानिश ने बहुत सोच के उलझाया है .
jagran/naiduniya

Monday, 2 May 2016

कराहती न्यायपालिका - समाधान क्या है?


न्यायपालिका कराह रही है. देश के मुख्य न्यायाधीश सार्वजनिकरूप से रो पड़ते हैं. जजों की कमी है लिहाज़ा जनता को दशकों तक न्याय नहीं मिल पा रहा है. देर से हीं सही अगर न्याय मिलता भी है तो जरूरी नहीं की सही हो क्योंकि अमरीका में एक जज चार दिन में एक केस निपटाता है जबकि भारत में रोजाना आठ केस. या यूं कहें कि हर ४५ मिनट एक जज केस पढ़ भी लेता है पक्ष-विपक्ष की दलीलों को को सुन भी लेता है और फैसला लिख भी देता है. अगर न्यायपालिका में छुट्टियों का आंकलन शामिल कर दिया जाये तो शायद हर केस को निपटने का समय घट कर मात्र २५ मिनट हीं रहेगा. इनमें वे केस भी शामिल हैं जिनमें अभियुक्त को फांसी भी हो सकती है या जेल की सजा भी. वे केस भी शामिल हैं जिनमें गरीब बुढिया की एक मात्र दुकान  कोई मक्कार भतीजा हड़प जाना चाहता है और बुढ़िया सड़क पर भीख माँगने को मजबूर हो जाती है या जहर पी कर मौत को गले लगा लेती है. इस रफ़्तार से केस निपटाने में शायद आइंस्टीन का दिमाग भी फेल हो जाये.

लेकिन ठहरिये ! हमें अपने को कोसने की आदत हो गयी है. हर बात पर हम अमरीका और चीन से तुलना करते हैं और फिर “भारत कभी सोने की चिड़िया थी, अँगरेज़ सोना लूट ले गए और पिछले ७० सालों में बचा पीतल भ्रष्ट राजनीतिक वर्ग और सड़े सिस्टम की भेंट चढ़ गया” के भाव में बताते हैं कि कैसे चीन शिक्षा में बजट की इतना प्रतिशत , स्वास्थ्य में उतना और हथियार खरीदने में उससे भी ज्यादा खर्च करता है. हम भूल जाते हैं कि भारत का आबादी घनत्व ३६८ प्रति किलोमीटर स्क्वायर है जबकि चीन का १४२, इंग्लैंड का २१६, ब्राज़ील का २४, रूस का ८.३ अमरीका का ३२ है. मूल रूप से कृषि –आधारित अर्थ व्यवस्था में जब संसाधनों पर इतना दबाव पडेगा तो विकास की रफ़्तार धीमी तो रहेगी हीं और उस पर से कोढ़ में खाज के रूप में भ्रष्टाचार.

फिर हम कहाँ से शुरू करें? हमारी प्राथमिकता क्या है? घुरहू , पतवारू या छेदी को पहले पेट में अनाज चाहिए, अनाज के लिए खेत को पानी चाहिए, दलित के बीमार पत्नी और बच्चे के लिए अस्पताल चाहिए  शिक्षा चाहिए. घर में शौचालय चाहिए. बीमार रहेंगे तो बचेंगे नहीं (बाल मृत्यु दर ३.७ प्रतिशत है) , बच गए तो पढ़ –लिख नहीं पाएंगे (गरीबों और दलितों महिलाओं में साक्षरता आज भी कई राज्यों में ३५ प्रतिशत से कम है). और इस तरह के तमाम अभाव में जीने वाले लोगों की संख्या ७५ प्रतिशत है. ऐसे में तात्कालिकता के पैमाने पर उन्हें न्याय की ज़रुरत शायद उतनी नहीं जितनी जीवन की अनिवार्य शर्तों की.

अब न्याय न मिलने का या देर से मिलने का या न्याय की गुणवत्ता खराब होने का एक खतरनाक पहलू देखें. बिहार का आबादी घनत्व देश के मुकाबले तीन गुना ज्यादा है याने १०५६ व्यक्ति प्रति किलोमीटर स्क्वायर या अमेरिका के आबादी घनत्व से ३० गुना ज्यादा. इस राज्य में जमीन पर इतना दबाव है कि ७० प्रतिशत हत्याएं परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से जमीन को लेकर हो रही हैं. अंग्रेज़ी की कहावत “डॉग इट्स डॉग वर्ल्ड” (ऐसी दुनिया  जिसमें कुत्ता कुत्ते को खाता हो) बिहार में चरितार्थ हो रही ही. लिहाज़ा सिर्फ न्याय व्यवस्था दुरुस्त करने से शायद हीं स्थिति बेहतर हो सके. समाज में अभाव, अशिक्षा, रोजगार के अल्प अवसर की वजह से व्याप्त लम्पटता और राज्य अभिकरणों के भ्रष्ट लोगों और गुंडों-राजनीतिक वर्ग के बीच पनपा समझौता अभियोजन को प्रभावित करता है और न्याय प्रक्रिया को भी निष्पक्ष नहीं रहने देता. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक सजा की दर में बिहार देश के सभी राज्यों से पीछे है. सन २०१४ में अगर १०० लोगों पर आपराधिक मुकदमें थे तो केवल १० को सजा हो पाई जब कि सन २०१३ में १५.६ को हुई थी. राष्ट्रीय औसत ४५ प्रतिशत है।

इन सब का नतीजा यह है कि इन राज्यों में न केवल न्याय-व्यवस्था से बल्कि पूरे तंत्र से जनता का विश्वास उठ जाता है और हार कर वह थाने या ब्लाक में जा कर अपनी समस्या बताने की जगह मोहल्ले के उस गुंडे को तलाशने लगता है जो हाल हीं में खद्दर पहनने लगा है. ऐसे राजनीतिक रॉबिनहुड किसी न किसी जाति के होते हैं और वे अपनी जाति के लोगों के लिए “संकटमोचन का रूप” धारण कर लेते हैं. बिहार के हाल के चुनावों में जाति का संयोजन और जद (यू) –राजद की विजय का सहीं विश्लेषण इस बात को दर्शाता है. यह रॉबिनहुड शीर्ष पर बैठे नेताओं के लिए भीड़ जुटा सकता है और अवसर हो तो बाँहों की ताकत भी दिखा सकता है. अपराध के लिए जाने जाने वाले और वर्षों से जेल में बंद शहाबुद्दीन को राजद का पदाधिकारी बनाना यह सिद्ध करता है कि प्रजातंत्र की मूल अवधारणा कहीं दम तोड़ चुकी है.

देश में पुलिस –आबादी अनुपात वैश्विक औसत से आधी है, उत्तर प्रदेश में चौथाई और बिहार में उससे भी कम. तो क्या ज़रूरी नहीं कि पुलिस की  संख्या बढ़ाई जाये? क्या जिन राज्यों में पुलिस की संख्या औसत से ज्यादा है वहां अपराध कम हुए हैं? क्या सजा की दर बढ़ी है ? नहीं? ऐसे तमाम उदहारण हैं जिनमें अपराधी को सेशंस कोर्ट से सजा हुई। अपराधी ने हाई कोर्ट में अपील की। हाई कोर्ट ने सेशंस कोर्ट को डांट लगते हुए सज़ा को “ससम्मान रिहाई” में बदल दिया लेकिन फिर जब राज्य सर्वोच्च न्यायलय पहुंचा तो देश की सबसे बड़ी अदालत ने हाई कोर्ट को गलत ठहराते हुए और सेशंस के फैसले की प्रशंसा करते हुए अपराधी की सजा फिर बहाल कर दी. अगर राज्य सरकार ऊपर की अदालत में न जाती तो अभियुक्त सीना तान कर घूमता. या अभियुक्त खेत बेंच कर या कोई और अपराध करके पैसे खर्च करके अच्छा वकील खड़ा न करता तो कई साल पहले हीं जेल की सलाखों के पीछे होता. क्या न्याय प्रणाली दोषपूर्ण नहीं है?

दरअसल भारत के मुख्य न्यायाधीश का सार्वजनिक मंच से भावातिरेक में आना गंभीर है लेकिन समस्या का निदान मात्र जजों की संख्या बढ़ाने  से नहीं होगा. व्याधि कहीं और है और वह एक नहीं कई हैं और हर व्याधि दूसरी व्याधि को जन्म दे रही है. 
 
lokmat/jagran