Friday, 1 April 2016

दल-बदल कानून में जबरदस्त खामी, गैर-कानूनी हरकत का परिणाम अपरिहार्य

मूल्यविहीन राजनीति—एक खतरनाक संकेत



उत्तराखंड के संवैधानिक संकट ने एक बार फिर साबित कर दिया कि सन २००३ में हुए संविधान संशोधन के बावजूद वर्तमान दल-बदल कानून में जबरदस्त खामी है. अगर कांग्रेस के नौ विधान सभा सदस्य पार्टी व्हिप के खिलाफ जाते हुए धन-विधेयक के खिलाफ वोट करते तो उनका कृत्य गैर-कानूनी होता क्योंकि संविधान की १०वी अनुसूची (पैर २) इसकी इज़ाज़त नहीं देता लेकिन इस गैर-कानूनी हरकत पर उनकी सदस्यता तो बाद में जाती पहले सरकार गिर जाती. यह जानते हुए भी कि सदस्य या कुछ सदस्यों का (जब तक कि वे विधायक दल की कुल संख्या के २/३ से कम नहीं है और साथ हीं दूसरी पार्टी में विलय की घोषणा नहीं करते—पैरा ४) यह कृत्य गलत है उन्हें सजा बाद में मिलेगी लेकिन उनके इस गैर-कानूनी हरकत का परिणाम अपरिहार्य होगा, कानून कुछ नहीं कर सकता.

उत्तराखंड में संविधान की धज्जियाँ उडीं. सबने उड़ाईं. जब मुख्यमंत्री और स्पीकर को पता चला कि कुछ बागी (जिनकी संख्या कम होने से कानून इज़ाज़त नहीं देता) ऐसा कुछ करने जा रहे हैं तो उन्होंने भी उसी कानून के उल्लघन का सहारा लिया. याने सदस्य मत-विभाजन की मांग करते रहे, स्पीकर ने बजट ध्वनिमत से पास कर दिया. अगर कानून यह होता कि व्हिप का उल्लंघन होने पर उलंघनकर्ता की सदस्यता तत्काल स्वतः समाप्त और मतदान दोबारा हो तो स्पीकर को सरकार बचाने के लिए इस अनैतिक हरकत का सहारा न लेना पड़ता. पर हम्माम में नहाने की शायद शर्त हीं है अनैतिक बनना। फिर शुरू हुआ खरीद-फरोख्त और सदस्यों को अगवा (?) करके रिसोर्ट में छिपाने का दौर. राज्यपाल ने बहुमत सिद्ध करने के लिए सरकार को ज्यादा समय दे कर जाने अनजाने में इस प्रक्रिया को और हवा दे दी. अगर सदन पर शक्ति परीक्षण होता तो फिर वही ढाक के तीन पात. मात्र नौ सदस्य (जो कांग्रेस विधायक दल का मात्र एक-चौथाई होता है) भारतीय जनता पार्टी से मिल कर सरकार गिरा देते. लिहाज़ा स्पीकर ने उन्हें निकालने का फैसला कर लिया था.

अब बारी थी केंद्र सरकार की याने भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार की. उसको संविधान के अनुच्छेद ३५५ की याद आयी जिसके तहत उसकी जिम्मेदारी है कि यह सुनिश्चित करे कि राज्यों में सरकार संविधान के अनुरूप चले. उसने भी अर्ध-सत्य का सहारा लिया याने जहाँ से विधान-सभा के स्पीकर ने “गैर-कानूनी” फैसला लिया था (अर्थात मतदान न करा कर बजट को ध्वनि मत से पास मान लिया था). केंद्र को यह नहीं दिखा कि उसके कुछ क्षण पहले कांग्रेस के असंतुष्ट विधायकों, जिनकी संख्या कम होने से कानून इज़ाज़त नहीं देता कि वे व्हिप के खिलाफ जाये और पार्टी विरोधी गति-विधि के तहत एक अन्य पार्टी से मिलकर सरकार गिराने के कार्य में लगें, ने संविधान का अनुपालन नहीं किया. यहाँ दल-बदल कानून की स्पष्ट कमजोरी है कि वह एक्शन में तब आता है जब गैर-कानूनी हरकत से क्षति या लाभ हो चुका होता है. 

उत्तराखंड के संकट ने दो बातें साफ़ कर दी हैं. संविधान की इमारत चाहे कितनी हीं पुख्ता बना लीजिये, रंग-रोगन करा लीजिए लेकिन उसकी देखभाल करने वाले अगर मजबूत नैतिक स्नायु वाले नहीं है तो यह भव्य इमारत ईंट दर ईंट गिरती रहेगी. हमने ३५ साल तक दल-बदल विरोधी कानून नहीं बनाया था तो भी “आया-राम, गया-राम” संस्कृति संविधान को मुंह चिढाती रही और रातों-रात दल-बदल कर कोई सांसद या विधायक संप्रभुता का प्रतीक लाल बत्ती लगाये मंत्री पद की “संविधान में अपनी निष्ठा” की झूठी शपथ लेता रहा. जब सन १९८५ में यह कानून बना तो उसके बाद स्पीकर और दबंग नेता इस कानून की व्याख्या के नाम पर खुलकर तांडव करते रहे. जब सन २००३ में इसे और सख्त बनाने के नाम पर ९१वेन संशोधन के तहत बदला गया तो अब चुने हुए जन-प्रतिनिधि तो ब्लैकमेल तो नहीं करती बल्कि वह काम पार्टी के नेता सामूहिक रूप से करने लगे. याने कानून न रहे तो जन-प्रतिनिधि पैसे या पद ले लिए निष्ठा बदलेगा और कानून बनेगा तो पार्टी का नेता सामूहिक रूप से यही काम करेगा. दूसरा निष्कर्ष यह कि कानून नैतिकता का प्रश्नों का समाधान नहीं हो सकता.

देश भर में करीब ४२०० विधायक और ८०० सांसदों के द्वारा संचालित संसदीय व्यवस्था पिछले ६६ साल के प्रजातंत्र में कोई एक घटना नहीं है जिसमें किसी सांसद या विधायक ने सिद्धांत के आधार पर पार्टी छोड़ हो या दूसरी पार्टी अपनाई हो. शायद प्रजातंत्र की इस स्वदेशी कारखाने में नैतिक माल नहीं बनता. अरुणाचल प्रदेश और उत्तरांचल भले हीं इसके ताज़ा उदाहरण हो लेकिन यह सिलसिला भारत के गणराज्य बनाने के साथ हीं शुरू हो जाता है. सन १९५२ में दल बदल कर टी प्रकाशम् के मुख्यमंत्री पद  हासिल किया. चार साल बाद पट्टम थानू पिल्लई ने राज्यपाल पद पाने के लिए अपना दल बदला. उत्तर प्रदेश में एक समय के विपक्ष के नेता गेंदा सिंह और नारायण दत्त तिवारी ने रातों-रात कांग्रेस बन गए. १७ साल बाद देश में पहली बार कांग्रेस का वर्चस्व टूटा और जो अभी तक आना-जाना कांग्रेस की तरफ होता था उल्टा होने लगा. १० राज्यों में संयुक्त विधायक दल के सरकारें बनी. राजनीति में अनैतिकता का पहला घिनौना नाच शुरू हुआ. देश के ४००० विधायकों में २००० से ज्यादा ने कम से एक बार और सैकड़ों ने कई बार दल-बदल किया और इनमें से कुछ ने तो मात्र ४८ घंटों में तीन बार पार्टियाँ बदली-- कुछ ने सत्ता के लिए तो कुछ ने पैसे लेकर. इसे “आया राम , गया राम” की संस्कृति कहा गया. स्वयं चन्द्रशेखर, और चौधरी चरण सिंह ने अपनी मूल पार्टी छोड़ कर और दल बदल कर प्रधानमंत्री पद सुशोभित किया. राव वीरेंद्र सिंह (हरयाणा), गोविन्द नारायण सिंह (मध्य प्रदेश) और सरदार लक्ष्मण सिंह गिल (पंजाब) मुख्यमंत्री बनाने के लिए कांग्रेस से बाहर आये. इन दल-बदल की घटनाओं के पीछे कोई सिद्धांत नहीं था बल्कि पद- या धन लोलुपता थी.
जबरदस्त मांग उठी दल-बदल के खिलाफ कानून लाने की. लोक सभा ने एक समिति बनाई. १९८४ में राजीव गाँधी ने इंदिरागांधी की हत्या के बाद मिली जबरदस्त बहुमत के बाद इस व्याधि पर रोकने का विचार मुकम्मल किया. संविधान के ५२ वें संशोधन के रूप में सर्वसम्मति से यह विधेयक पारित हुआ. दोबारा सन २००३ में ९१ वें संविधान संशोधन के तहत इसे और “सख्त” बनाया गया याने अब कोई पार्टी एक-तिहाई संख्या के दम पर अलग पार्टी नहीं बना सकता. साथ हीं अगर कोई विधायक दल टूटता है तो उसके सदस्यों की वैधता की दो शर्तें होंगी: (१) विधायक दल की संख्या का दो-तिहाई बहुमत और (२) किसी अन्य किसी अन्य दल में विलय. इस कानून के बाद भी कुछ भी नहीं बदला. हाँ दल-बदलुओं के “भाव” और बढ़ गए. उत्तराखंड और अरुणाचल में हाल की घटनाएँ यही सिद्ध करती हैं कि अनैतिकता के प्रश्न कानून से हल नहीं किये जा सकते. दुनिया में कोई तीन करोड़ कानून हैं लेकिन न तो भ्रष्टाचार रुका, नहीं हत्याएं या बलात्कार कम हुए.
  
lokmat

Wednesday, 23 March 2016

विकास बनाम “राष्ट्रवाद”


         भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी में सीधी सोच का अभाव


हम सीधे नहीं सोचते. देश की राजनीतिक पार्टियाँ तो बिलकुल हीं नहीं. नतीजा यह होता है कि एक पार्टी या नेता दलित का विकास करने लगता है तो दूसरा पिछड़ों का याने पिछड़ी जातियों का. तीसरा पीछे क्यों रहे तो वह कोई अन्य पहचान समूह तलाशता है. मिल गया तो ठीक वर्ना स्थापित पहचान समूह में से हीं एक नया पहचान समूह खड़ा करता है मसलन अति-पिछड़ा (अर्थात अति-पिछड़ी जातियां) या महा –दलित. अगर सीधे सोचने की ईमानदारी होती तो हम “गरीबों” का विकास करते. सीधी सोच न होने का मुख्य कारण हमारी चुनाव पध्यति है जो इन राजनीतिक पार्टियों को उकसाती हैं कि वे पहचान समूह की राजनीति करें. नतीजा यह रहा कि ७० साल के प्रजातंत्र में हमने भारतीय समाज को अनेक टुकड़ों में बाँट दिया. 

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का ताज़ा बैठक में भी इस सीधी सोच का अभाव साफ़ दिखा. एक ऐसे समय जब मोदी सरकार तमाम नए व अपेक्षाकृत जनोपदेय कार्यक्रम ले कर आयी है इस दो-दिवसीय कार्यकारिणी के सन्देश से कार्यकर्त्ता कंफ्यूज रहा. देश के प्रधानमंत्री ने इस कार्यकारिणी में इन कार्यकर्ताओं से अपील तो की कि वे सरकार की नयी नीतियों को पहुँचाने के लिए सरकार और जनता के बीच संवाहक का कार्य करें लेकिन अन्य नेताओं ने राष्ट्रवाद का डोज़ पिलाते हुए कहा कि राष्ट्रवाद (भाजपा-ब्रांड) पर कोई समझौता नहीं होगा. सन्देश साफ़ था. अखलाक की हत्या, जे एन यू प्रकरण और रोहित वेमुला चलते रहेंगे. झारखण्ड में भी गौ –कसी के संदेह में लोगों को मारा जाता रहेगा और हर व्यक्ति को “भारत माता की जय” कहना राष्ट्रवाद की पहचान होगी. जाहिर है कि किसी ओवैसी को इससे अच्छा मौका फिर नहीं मिलेगा अपनी दूकान चमकाने के लिए. अगले हीं दिन “जय हिन्द” शुरू होगया.

हम कहाँ ले जा रहे हैं देश के जन-संवाद को? क्या सार्थक बहस यह नहीं होनी चाहिए कि भ्रष्टाचार के खिलाफ एक जबरदस्त जन-अभियान शुरू किया जाये ताकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नयी मनरेगा किसी राज्य सरकार के भ्रष्ट तंत्र की चौखट पर फिर न दम तोड़े? क्या चर्चा यह नहीं होनी चाहिए कि नयी फसल बीमा योजना जिसमें पुरानी खामियों को काफी हद तक सुधार लिया गया है को किसानों तक पहुंचा कर इसे अमल में लाने के लिए ग्रामीण भारत में एक सार्थक सामूहिक चेतना का विकास किया जाये ताकि फिर कोई किसान अति-वृष्टि या आना-वृष्टि के कारण किसी आम के पेड़ से लटकर या कीटनाशक मैलाथियान खा कर दुनिया से कूच न करे? क्यों स्किल इंडिया कार्यक्रम को जमीन पर फलीभूत करने के लिए दो साल के शासन काल में कुछ भी नहीं हो पाया लेकिन गौ-मांस खाने के शक पर किसी अख़लाक़ को मारने में एक वर्ग की सामूहिक चेतना में इतना उबाल आ जाता है? क्यों किसी विश्वविद्यालय में देश विरोधी नारे राष्ट्र के एक बड़े वर्ग की सामूहिक सोच को इतना झकझोर देते है कि अगले कई महीनों तक सब कुछ ठहर जाता है और देश की एक बड़ी पार्टी में राष्ट्रवाद दो-दिवसीय चर्चा का हीं नहीं राजनीतिक प्रस्तावना का प्रमुख अंग बन जाता है?   

पार्टी का मानना है कि विकास और राष्ट्रवाद में कोई पारस्परिक विभेद नहीं है अर्थात राष्ट्रवाद विकास साथ-साथ चल सकते हैं और दोनों के बीच प्रतिलोमानुपाती सम्बन्ध नहीं है. भाजपा का यह भी मानना है राष्ट्रवाद कहीं न कहीं विकास की प्रक्रिया को मजबूत हीं करता है. शायद उन्हें यह इल्म नहीं है कि तर्क-शास्त्र में संदर्भिता और काल-सापेक्षता का बड़ा महत्व रहा है. उदाहरण के लिए पूरे देश में अगर बाजारू ताकतें भारत के युवाओं को “पश्चिमी खान-पान” याने बर्गर पिज़ा, डांस और क्रिकेट के नशे में डाल दे तो भी विकास नहीं रुकता बल्कि इसे भी सांस्कृतिक बदलाव कह कर प्रोमोट किया जा सकता है. लेकिन क्या यह किसी गरीबी और भ्रष्टाचार से जूझ रहे समाज की प्राथमिकता हो सकती है? क्या आज पिछले दो साल में जो माहौल इस राष्ट्रवाद को लेकर बना है या “हम बनाम वो” का वातावरण तैयार हो रहा है उसमें किसानों को बता सकते हैं कि अधिक नाइट्रोजन खाद डालने की जगह पहले अपने खेत की मिटटी की जांच कराये क्योंकि लगातार नाइट्रोजन के अधिक प्रयोग से जमीन की उर्वरा शक्ति खत्म होती जा रही हैं और जमीन अम्लीयता बढ़  गयी है?

स्किल इंडिया मोदी सरकार का ड्रीम प्रोजेक्ट है लेकिन इस मद में आये पैसे का मात्र ३० प्रतिशत हीं सम्बंधित मंत्रालय पिछले दिसम्बर तक खर्च कर पाया है. स्किल इंडिया अपने आप में बेहद सार्थक स्कीम है जिसके तहत कमजोर ग्रामीण अर्थ-व्यवस्था से इन अनुत्पादक और बेरोजगार युवाओं को निकाल कर रोजगारपरक कौशल (दक्षता) की ट्रेनिंग दी जानी है. ठीक बगल में “मेक इन इंडिया “ और “स्टार्ट-अप इंडिया”  जैसी योजनायें इन “दक्ष” युवाओं को रोजगार के अवसर प्रदान करेंगी. आबादी का दबाव ग्रामीण अर्थ-व्यवस्था से कम होगा तो किसान खुशहाल होगा और युवाओं को रोजगार मिलेगा तो व्यय करने की शक्ति बढेगी और आद्योगिक सेक्टर में उछाल आयेगा. देश में विकास होगा. इस प्रक्रिया को समझने के लिए आइंस्टीन का दिमाग नहीं चाहिए. आज भारत में दक्ष ड्राइवरों की कमी ३१ प्रतिशत है. यहाँ तक कि जो इलेक्ट्रीशियन और फिटर भी हमरे घरों में काम करते हैं उन्हें उपयुक्त ट्रेनिंग नहीं होती. फिर क्या वजह है कि राष्ट्रभक्ति के नाम पर इन युवाओं को घर-घर घुस कर कौन क्या खा रहा है देखने को कहा जाता है?

आखिर इसमें नुकसान किसका है? जिस दिन देश के प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना लांच कर रहे थे पूरा देश जे एन यू प्रकरण में उलझा था यहाँ तक कि भाजपा का पूरा तंत्र भी. दिल्ली में भाजपा एक विधायक एक “राष्ट्रविरोधी” को सड़क पर पीट रहा था और मीडिया के कैमरे पर बता रहा था कि अगर उसके पास बन्दूक होती तो वह इन “राष्ट्रविरोध की बात करने वालों को गोली भी मार देता”. भाजपा के इस विधायक और उसके के साथ के कुछ राष्ट्रवादी वकीलों ने उपद्रव करके किसका नुकसान किया--- –मोदी सरकार के इस बेहतरीन कार्यक्रम का अर्थात भारत के किसानों का या यूं कहें कि विकास का. लिहाजा भाजपा ब्रांड राष्ट्रवाद की इस समय प्राथमिकता पर आना देश के विकास को रोक रहा है. 

क्या यह उचित नहीं होता कि कम से कम अगले तीन साल तक केवल विकास और सम्बंधित कार्यक्रमों को जन-जन में ले जाने का कार्य भाजपा कार्यकर्ताओं को दिया जाये? लेकिन शायद सीधे सोचना ज्यादा मुश्किल होता है. मोदी देश के लिए भगवान् का वरदान हों इसके लिए जरूरी है कि पार्टी, उसके कार्यकर्ता उनकी स्कीमों को समझें और उन्हें जन-मानस तक ले जाकर उनके प्रति सुग्राह्य्ता बढाएं. फिर अगर भाजपा –ब्रांड राष्ट्रीयता भी सर्व-स्वीकार्य करवानी है तो इसे जबरदस्ती भारत माता की जय बोलवा कर नहीं भारत माता के प्रति सभी वर्गों का सम्मान बढ़ाने  वाला “आग्रह” किया जाना चाहिए. “माता” के प्रति सम्मान का एक खास भाव बल प्रयोग करके नहीं लाया जा सकता. और आग्रह के लिए गाँधी जैसी आध्यात्मिक शक्ति की जरूरत होती है, अख़लाक़ को मारने वाले हाथों की नहीं.   
 
jagran
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Monday, 14 March 2016

बैंकों ने दोष कानूनी खामियों पर मढ़ा : अदालतें तारीख पर तारीख देती रही



विजय माल्या प्रकरण में भारत के वित्त मंत्री अरुण जेटली ने वर्तमान सरकार को पाक साफ़ बताने के क्रम में कहा “माल्या पर कोई मुकदमा नहीं था ना हीं  किसी अदालत का आदेश था कि उसे विदेश जाने से रोका जाये”. कितना निश्छल जवाब है. एक टीवी डिबेट मे  इतने हीं उग्ररूप से "निश्छल” आरोप था माल्या के वकील का उन लोगों पर जो माल्या को गलत कह रहे हैं. उसने कहा “क्या इस देश में कानून का राज है कि नही? . किस कानून के तहत माल्या को भगोड़ा, देश का पैसा हड़पने वाला कहा जा रहा है, किस अदालत से उन्हें सजा हुई है? क्या इस देश “बनाना रिपब्लिक” (ऐसा देश जहाँ कुछ भी कानून के मुताबिक न होता हो) बनाना चाहते हैं? ऐसा लगा मानो जो मीडिया या जो लोग इस मुद्दे को उठा रहै है वही सजा का हकदार है क्योंकि वे माल्या जैसे "साधू" को गलत बता रहा है. यह अलग बात है कि बैंक ने देर से ही सही माल्या को "विलफुल डिफ़ॉल्टर " घोषित किया।

जितना जेटली सही थे उतना हीं वह वकील भी. बस एक ही प्रश्न उन दोनों से पूछा जाना था : अगर कानून के रखवाले काम न करें और क़ानून तोड़ने वाला भ्रष्ट सिस्टम के सहारे छुट्टा घूमता रहे तो आरोप क्या अपराध के शिकार लोगों पर लगेगा या कानून के रखवालों की गलती मानी जायेगी? आज प्रश्न यह है कि देश का ९०९० करोड रुपया क़र्ज़ के रूप में लेने वाला माल्या अगर आज उन पैसों को नहीं देता और मान लीजिये क़र्ज़ देने वाले बैंक उस क़र्ज़ को गैर-उत्पादक संपत्ति (नॉन-प्रोडक्टिव एसेट) के रूप में माफ़ कर देते हैं तो कोई भी गलत नहीं माना जाएगा. माल्या ने क़र्ज़ दिया नहीं, बैंक क़र्ज़ वसूल नहीं कर पाई. दोनों खुश. मारी गयी जनता जिस के टैक्स से यह सब कुछ होता रहा.

लिहाज़ा यह तय हो गया कि माल्या कम से कम अभी तक कानूनन गलत नहीं है. तो इसका मतलब मीडिया एक निहायत शरीफ , कानून के अक्षरशः पालनकर्ता को बेवजह सूली पर टांग रहा है. ऐसे में मीडिया पर अवमानना का मुकदमा चलना चाहिए?

अब जरा वस्तुस्थिति पर आयें. राज्यसभा की वेबसाइट पर माल्या की संपत्ति का जिक्र है जिसमें माल्या ने बताया है कि उसकी कुल संपत्ति जिसमें कुछ शेयर भी हैं मात्र ९००० रुपये की है. याने इस व्योरे के आधार पर माल्या गरीबी की सीमा रेखा से बहुत नीचे के हैं और उन्हें सरकारी मदद से मुफ्त अनाज और आर्थिकरूप से कमजोर (ई डब्ल्यू एस ) का मकान दिया जाना जाहिए. यह अलग बात है कि आज १७ बैंकों के कंसोर्टियम जिसका नेतृत्व स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया कर रहा है का कहना है कि माल्या और उसकी कंपनियों को कंसोर्टियम ने ९०९० करोड़ का क़र्ज़ दिया है. उससे भी आगे , इस राशि में १५०० करोड़ वह  ऋण है जो माल्या ने व्यक्तिगत गारंटी दे कर लिया है. 

भ्रष्टाचार करने वालों और करवाने वालों का फंसने के बाद एक तकिया कलम होता है--- सिस्टम हीं गलत था या कानूनी व्यवस्था में खामियां थी. चूंकि सिस्टम या व्यवस्था कोई व्यक्ति नहीं होता लिहाज़ा आरोपियों को यह डर नहीं होता कि उन्हें प्रतिकार झेलना पडेगा लिहाज़ा अपने को पाक -साफ़ बताने के लिए यह सबसे सहज रास्ता दिखाई देता है.

स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया जो १७ बैंकों की कंसोर्टियम का मुखिया है ने भी यही तरीका अपनाया. “हम तो क़र्ज़ वापसी के लिए दिन रात एक कर २० मुकदमें दायर किया पर कानून के प्रक्रिया में देरी की वजह से हमारे हाँथ बंधे हुए थे” मुंबई में बैंक के अधिकारियों का नया जवाब है.     

इनकी माने तो विभिन्न न्यायालयों और प्राधिकरणों (ट्रिब्यूनल) में १८० बार मामले में अगली तारिख दी  गयी जबकि ५०० बार मामले की सुनवाई हुई.

बैंक का कहना है कि एक बार मुंबई हाई कोर्ट से माल्या की सम्पत्ति –गोवा स्थित किंगफ़िशर गाँव – को कुर्क करने के आदेश हुए लेकिन स्थानीय कलेक्टर उस आदेश पर अमल के लिए आठ बार सुनवाई की और अंत में छुट्टी पर चला गया.

बैंक इस आरोप को भी ख़ारिज कर रहा है कि माल्या का पास पोर्ट जब्त करने के लिए अदालती आदेश हासिल करने में दे हुई. बैंक के अनुसार २६ फ़रवरी को पता चला कि माल्या, उसकी कंपनी यूनाइटेड स्पिरिट्स और डियाजियो के बीच समझौता हुआ है और उसी दिन बैंक बंगलुरु –स्थित डेट रिकवरी ट्रिब्यूनल (डी आर टी) में अपील करने पहुंचा. पर इस प्राधिकरण ने मार्च ८ की तारीख दे दी. लेकिन बाद में बैंक की प्रार्थना पर सुनवाई के लिए फरवरी २९ की तारिख मुक़र्रर की.
बहरहाल जिस दिन माल्या लन्दन जाने वाले जहाज में बैठ चुका था, डी आर टी के सामने बैंक ने चार प्रार्थना पत्र दिए लेकिन ट्रिब्यूनल ने उसके पासपोर्ट जब्ती के मुद्दे पर नहीं बल्कि इस बात सुनवाई स्वीकार की कि तीसरे पार्टी को डियाजियो और यूनाइटेड स्पिरिट बे बीच हुई डील में क्या और कैसे रहत दी  जाये. यह अलग बात है कि ट्रिब्यूनल ने इस सुनवाई के लिए भी अगली तारिख दे दी.

  अजीब हास्यास्पद स्थिति इस देश में कानून के रक्षकों की. आज कांग्रेस संसद मे यह पूछ रही है कि माल्या कैसा भागा या भगा दिया गया? सन २०१२ में यही पार्टी सत्ता में थी और यही माल्या कर्ज में आ कंठ डूबा था लेकिन किसी सी बी आई या बैंक ने आवाज नहीं उठाई थी. इधर वर्तमान सरकार पर भी सवाल है कि अगर पूर्व सरकार नालायक थी तो क्या वर्तमान सरकार को भी निष्क्रीय होने का लाइसेंस मिल जाता है. कैसे सी बी आई के नाक के नीचे से माल्या सात सूटकेस के साथ देश से दिन-दहाड़े निकल जाता है. वर्तमान सरकार का यह जवाब कि माल्या के खिलाफ किसी भी अदालत से ने पासपोर्ट जब्त करने का आदेश नहीं दिया था. यही तो मूल प्रश्न है कि क्या सी बी आई और बैंकों को मालूम नहीं था कि वह भाग सकता है. क्या अदालत के संज्ञान में सही तथ्य लाये गए थे. क्यों सी बी आा अक्तूबर२०१५ में केस दर्ज कर लुकआउट नोटिस जारी करती है और मात्र एक महीने में उसे बदल कर भागने से रोकने का पैरा हटा देती है? लिहाज़ा दोनो सरकारें हीं बराबर की गुनाहगार हैं.   

यहाँ एक कानूनी पेंच है. सी बी आई की लुक आउट नोटिस एअरपोर्ट पर तैनात इमीग्रेशन अधिकरियों को
यह अधिकार नहीं देती कि किसी नागरिक को विदेश जाने से रोका जाये. वह सिर्फ यह सूचना देते है कि व्यक्ति विदेश जा रहा है. हालाँकि सी बी आई को मार्च १ , २०१६ को खबर लग गयी थी कि माल्या विदेश जा रहा है. क्या इस दौरान अदालत से आदेश प्राप्त नहीं किया जा सकते थे?.
            माल्या को बैंकों ने व्यक्तिगत गारंटी पर कैसे १५०० करोड़ का लोन दिया ?
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क्या बैंक पाक-साफ़ हैं? विजय माल्या ने १७ बैंकों को कुल ९००० करोड़ से ज्यादा का लोन लिया। सार्वजनिक बैंकों द्वारा लोन देने की एक हीं शर्त पूरी दुनिया में है. लोन वापसी सुनिश्चित करने के मानदंडों पर क़र्ज़ लेने वाला कितना खरा उतरता है. पर ताज्जुब की बात यह है जब यह तीन साल पहले पहले पूरी दुनिया को पता था कि माल्या की हालत कैसी है तो व्यक्तिगत गारंटी पर बैंकों ने कैसे १५०० करोड़ का ऋण दिया? अब मुश्किल यह है कि कानूनन बैंक माल्या की संपत्ति से यह क़र्ज़ अदा नहीं करवा सकता महज़ उसे बेंचने की प्रक्रिया रोकवा सकता है. बैंकों ने यह भी नहीं किया.
              
 
lokmat

Wednesday, 9 March 2016

दंगे: अब कोई आयोग बैठाने की बात मांग नहीं करेगा


 
755 पेज की रिपोर्ट और यह नहीं पता कि किस नेता ने आग लगाई 
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संस्थाओं और प्रक्रियाओं में जन-विश्वास बदलता रहता है. अपराध होता है या भ्रष्टाचार, तो मांग उठाती है –सी बी आई से जांच कराई जाये, मजिस्ट्रेट से जांच हो या न्यायिक जांच हो. जिस तरह संस्थाओं में गिरावट आयी है और प्रक्रियाएं राजनीतिक दबाव में दूषित की जा रही हैं वह दिन दूर नहीं जब “दूध का ढूढ़ और पानी का पानी” मात्र जुमला रह जाये और जनता को किसी भी संस्था पर भरोसा न रह जाये और पानी को दूध समझ लार पीना पड़े. मुज़फ्फरनगर दंगों में जस्टिस विष्णु सहाय आयोग की लगभग ढाई साल बाद आयी रिपोर्ट देखने के बाद उत्तर प्रदेश की जनता का न्यायिक जांच से भरोसा हमेशा के लिए उठ गया है. आयोग ने आधा दर्ज़न बार अपना कार्य-काल बढाने के बाद भी या यूं कहें कि १५ गुना समय लेने के बाद भी जांच के उन आधारभूत सिद्धांतों की अनदेखी की जिसे एक अदना दरोगा भी नहीं करता. दो समुदायों के ६२ लोग मरते हैं, १०० के करीब घायल होते हैं, ५०,००० लोग गाँव छोड़ कर ठिठुरती सर्दी में शिविरों में शरण लेते हैं पर यह नहीं पता लगता कि वे कौन लोग हैं जिन्होंने मंत्री बन कर या भविष्य में बनने की चाह में पूरे प्रदेश को दंगे की चपेट में झोंक दिया. सैकड़ों ऍफ़ आई आर, तमाम बलात्कार और लूट समूचे रबी के फसल की बर्बादी और इस एक-सदस्यीय आयोग की रिपोर्ट मात्र एक जिला पुलिस कप्तान और एक स्थानीय इंटेलिजेंस यूनिट (एल आई यू) के इंस्पेक्टर को दोषी बता कर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेती हैं.
 
और वह भी किस आधार पर ? “..... इस इंस्पेक्टर ने नगला मन्दौर महापंचायत में शरीक भीड़ की अनुमानित संख्या २०,००० बताई थी जबकि वह ४५,००० थी”. याने अगर वह इंस्पेक्टर सही अनुमान ४५,००० बाते देता तो दंगे रूक जाते या फिर अगर भीड़ २०,००० रहती तो भी दंगे न होते. शायद औसत मानसिक शक्ति और बुद्धि का भी व्यक्ति जानता है कि दंगे के लिए १०० की संख्या भी काफी हो सकती है. फिर पूरे विश्व में किसी भी लोक-प्रशासन संस्था या सिद्धांत में यह नहीं बताया गया है कि “सचल भीड़” का अनुमान कैसे लगाया जाये. यह और भी मुश्किल होता है जब भावनात्मक पक्ष भीड़ को घर से निकालने का मुख्य कारण हो और भीड़ क्षेत्र विशेष से न निकल कर बड़े इलाके से एक जगह जत्थों में एकत्रित हो रही हो. भारतीय इंटेलिजेंस ब्यूरो (आई बी) में एक व्यावहारिक नियम है कि भीड़ का अनुमान (अगर वह एक जगह एकत्रित हो) इस आधार पर लगाया जाता है कि एक वर्ग मीटर में तीन आदमी खड़े होते है. पूरे सभा स्थल का क्षेत्रफल निकल कर भीड़ का आंकलन किया जाता है. आयोग के अध्यक्ष को मालूम होगा कि भाषण सुनने वाली भीड़ और भावनात्मक रूप से आवेशित भीड़ में जमीन –आसमान का अंतर होता है.
 
जांच का पहला सिद्धांत है प्रशासन में लगे सभी शीर्ष अधिकारियों से लिखित रिपोर्ट तलब की जाये. पाठकों को ताज्जुब होगा कि आयोग आज तक कभी भी राज्य अभिसूचना (इंटेलिजेंस) के एडिशनल डायरेक्टर जनरल से नहीं मिला ना हीं कोई रिपोर्ट तलब की जबकि हकीकत यह है कि विभाग पूरी फाइल लिए तैयार बैठा था हकीकत बताने के लिए. 
 
फिर जज साहेब के टर्म्स ऑफ़ रिफरेन्स में दंगे का कारण और भविष्य में इसकी पुनरावृत्ति न होने के उपाय भी बताने को कहा गया था. अगर थोडा भी सार्थक मेहनत आयोग करता तो वह देख पाता कि कम से कम २० इंटेलिजेंस रिपोर्ट्स जिले से राज्य मुख्यालय होती हुई मुख्य सचिव तक याने मुख्यमंत्री तक गयी जिनमें स्पष्टरूप से दंगे की आशंका का ज़िक्र  था. अगस्त २७,२०१३ की कवाल की घटना जिसमें एक मुसलमान और दो हिन्दू युवा मारे गए, के पहले २१ अगस्त को भी शहर में हीं नहीं शामली में भी सांप्रदायिक झड़पें हुईं जिनमें १५० लोगों के खिलाफ ऍफ़ आई आर दर्ज हुए. सरकार को अभिसूचना विभाग ने तब भी आगाह किया.
 
                     राज्य में इंटेलिजेंस नेटवर्क का स्वरुप
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आयोग के अध्यक्ष को यह भी समझना होगा कि अभिसूचना का ढांचा कैसा है , उनकी प्रोफेशनल क्षमता क्या है और किस अधिकारी से किस किस्म की अभिसूचना अपेक्षित है. भारत में अभिसूचना के तीन स्तर है. केंद्र का विभाग – आई बी जो राज्यों में एस आई बी शाखाओं के रूप में रहता है और इसमें दो ग्रेड के ए सी आई ओ (सब-इंस्पेक्टर), डी सी आई ओ (डिप्टी एस पी) , असिस्टेंट डायरेक्टर (एस पी स्तर)  से जी डी (संयुक्त निदेशक तक होते हैं). राज्य सरकार के पास अपनी दो इकाइयाँ होती है जो मूल रूप से पुलिस महकमें से हीं उत्सर्ग होती हैं. एक स्थनीय अभिसूचना इकाई जो जिला मजिस्ट्रेट और एस पी के अधीन होती है और दूसरी राज्य अभिसूचना की स्पेशल इकाई जिसमें कुल मात्र २००० फील्ड स्टाफ होते हैं जिन्हें २० करोड़ आबादी वाले राज्य में अपराध से लेकर तस्करी, नेताओं की गतिविधि (राजनीतिक अभिसूचना), जातीय और सांप्रदायिक स्थितियों पर नज़र रखनी होती है. अपने सोर्स को देने के लिए इनका पास कुल फण्ड मात्र एक करोड़ सालाना होता है जिसमें से आधे से ज्यादा पुलिस महकमा और डी जी कार्यालय अनौपचारिक रूप से कप्तानों को आकस्मिक खर्च के लिए ले लेता है. याने एल लाख की आबादी पर एक व्यक्ति जो पीर, बाबर्ची, भिस्ती और खर सब का काम मात्र ६५ पैसे प्रतिदिन खर्च कर अपने “सूत्रों” द्वारा सैकड़ों गाँव की नब्ज़ टटोले.
 
क्या मानव तो छोडिये मशीन से भी संभव है? इसके अलावा इंस्पेक्टर के ऊपर क्षेत्रीय अभिसूचना अधिकारी (जेड ओ) होता है जिससे व्यापक दृष्टि रखने की अपेक्षा होती है और उसके उपर मेरठ में एस पी (आर) बैठता है जिसके पास दोनों प्रशासनिक मंडल सहारनपुर और मेरठ मंडल के सभी जिलों का प्रभार है. क्या उस दिन भीड़ का आंकलन उन्हें नहीं करना था?
 
इस पर अगर किसी आदर्शवादी इंस्पेक्टर ने दंगे की सही स्थिति मुख्यालय को भेज दी तो डी एम् और एस पी उसकी खाट खडी कर देता है क्योंकि इन दोनों अफसरों को  डी जी पी या गृह मंत्रालय से डांट पड़ती है या कभी कभी मुख्यमंत्री पूछ बैठता है. अब चूंकि इस आदर्शवादी इंस्पेक्टर को भी मालूम है कि कल यही कप्तान उसका अफसर बनेगा लिहाज़ा मगर से बैर कौन मोल ले.
 
तीसरा, कौन सत्ता का नेता या मंत्री कैसे सिफारिश करके एक समुदाय के लोगों को छुडवा देता है जिससे दूसरा समुदाय आक्रोश में आ जाता है इसका हिसाब –किताब भी आयोग की रिपोर्ट का भाग होना चाहिए लेकिन वह नदारत है. क्या आयोग को आइंस्टीन के दिमाग की जरूरत थी यह जानने के लिए कि अगर एक समुदाय के दो युवा मारे गए हैं और दूसरे का एक तो दोनों के सम्बन्धियों को तत्काल गिरफ्तार किया जाये और प्रशासन अपनी विश्वशनीयता जनता के दोनों समुदायों में बरकरार रखे न कि सत्ता में बैठे ताकतवर मंत्रियों के प्रति? क्यों जब एक समुदाय के लोगों को गिरफ्तार किया गया तो कप्तान का रातों-रात तबादला किया गया ? कौन था इसके पीछे? क्यों एक हीं समुदाय के मामा-चाचा, नाना-नानी को पुलिस ने नामजद किया जबकि दूसरे समुदाय के हत्यारे “अनाम” करार दिए गए? किसने यह अविश्वास प्रशासन और सरकार में पैदा किया.
 
जाहिर है कि अगर आयोग जांच की आधारभूत प्रक्रिया को हीं नज़रंदाज़ करेगा तो निष्कर्ष गलत होगा. ७५५ पेज की रिपोर्ट और यह नहीं पता कि किस नेता ने आग लगाई समुदायों को बांटने के लिए. अगर आई बी की उस काल की रिपोर्ट देख लें और राज्य अभिसूचना की उन रिपोर्टों पर जो सरकार को भेजे गए हैं पर नज़र डालें तो आयोग को सब कुछ पता लग जाएगा. लेकिन तब कुछ मंत्री, कुछ राजनीतिक दलों के नेता कटघरे में होंगे. शायद आयोग के टर्म्स ऑफ़ रिफरेन्स में उस तरफ जाना वर्जित था. 

 
jagran

Friday, 4 March 2016

भूलभुलैय्या में फंसी देश की सामूहिक सोच




आजादी का बाद से शायद पहली बार देश में जबरदस्त कंफ्यूजन है. तीन स्पष्ट खेमे में समाज बँटा है। कुछ व्यक्ति या तो इस खेमे में है या उस। सामूहिक सोच या तो राष्ट्रवाद की नयी परिभाषा के साथ खडी है या देश को “बहुमत के आतंक” से निजात दिलाने वालों के साथ. एक लकीर खींच दी गयी है यह कहते हुए कि रेखा के उस पार तुम्हरा और इस पार हमारा. तलवारें खींची हुई हैं.  इसके बीच एक बड़ा वर्ग जो न तो “इस” के साथ है ना “उसके”. वह दाल के बढे दाम और बढ़ती महंगाई, आसमान छूती शिक्षा और स्वास्थ्य व्यय से जूझ रहा है. वह ठगा सा यह पूछ रहा है कि ७० साल की आज़ादी की यह परिणति? क्या विकास इसी को कहते हैं? कभी उसे “यह” ठीक लगता है तो कभी “वह”. लेकिन इस “यह” और “वह” के बीच में उसकी मूल समस्या का निदान कहीं नज़र नहीं आ रहा. “लव जेहाद”, “भारत विरोधी नारे” , “अवार्ड वापसी” , “राष्ट्रवाद” या “देश द्रोह” की बीच किसान आज भी पेड़ से लटक कर आत्म हत्या कर रहा है और विधायक आज भी बहला-फुसला कर लाई गरीब किशोरी का बलात्कार कर रहा है. दूसरी ओर उसी राज्य बिहार में सत्ताधारी दल का एक विधायक जन सभा में धमकी देता है कि मेरे लोगों को “कुछ” किया तो गर्दन काट दिया जाएगा. “मैं तो अपराध करके के जेल गया तो नेता बन गया और चुनाव जीत गया. मेरा तो एक पैर जेल में हीं रहता है” इस विधायक की यह घोषणा थी. इसी विधायक के मत से विधान सभा में कानून बनते हैं.    




एक ओर दिल्ली से सटे नॉएडा में घर से खींच कर सैकड़ों गाँव के हीं लोगों द्वारा “गौ मांस पकाने के शक पर अख़लाक़ मार दिया जाता है तो दूसरी ओर आगरा में विश्व हिन्दू परिषद् के कार्यकर्त्ता को मांस का व्यापार करने वाले लोगों के गुर्गों द्वारा गोली मार कर हत्या कर दी जाती है. अख़लाक़ मरता है तो बुद्धिजीवियों का एक वर्ग वैचारिक क्रांति का आह्वान करता है और अवार्ड वापस करने लगता है. जबकि स्थानीय सांसद और देश का सांस्कृतिक कार्य मंत्री घटना स्थल से ऐलान करता है कि यह सामान्य आपराधिक घटना है. आगरा की घटना पर देश का एक अन्य मंत्री जो स्थानीय सांसद भी है आग उगलता है और उस मंच से “बदला” लेने की बात कही जाती है. पूरे देश में अचानक “गौ माता” के प्रति श्रद्धा उमड़ती है. संगठन बनते है  इस “माँ” को बचने के लिए. “गौ रक्षक दल” के स्थानीय लम्पट दिया लेकर रातों में ट्रक रोकते हैं माता की रक्षा के लिए. शक के आधार पर हिमाचल प्रदेश में एक ड्राईवर का नाम पूछा जाता है और फिर यह मान कर कि यह गौ-हन्ता है, उसे दुनिया से विदा कर दिया जाता है.

      
पिछले एक साल से हर मुद्दा “वह” और “यह” के आधार पर तय हो रहा है. जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के छात्र संघ का अध्यक्ष कन्हैया कुमार “वह” है क्योंकि भारत विरोधी नारे लगने वालों के साथ मंच पर रहा. जो विधायक “वह” वर्ग के कार्यकर्ता को जमीन में गिरा कर मारता है सैकड़ों कैमरे के सामने वह यह भी कहता है “मेरे पास बन्दूक नहीं था वरना इन देशद्रोहियों को गोली मार देता”. एक वकील दिन-दहाड़े कोर्ट-रूम में घुस कर कन्हैया, मीडिया और “वह” के लोगों को मारता हीं नहीं है बल्कि जेल में घुस कर कन्हैया को जान से मारने का टीवी चैनलों के सामने ऐलान करता है वह “यह” वर्ग का है और उसे उम्मीद है कि “राष्ट्रभक्तों” का “यह” समुदाय उसे बचा लेगा और अगले दिन हीं उसे “यह” वर्ग सच में महिमा मंडित करता है. विधायक को भी उम्मीद होगी कि उसकी “राष्ट्रभक्ति” देखा कर उसे “यह वर्ग” लोक सभा का टिकट दिला देगा.  

इन सब के बीच एक मूल प्रश्न उभरता है कि क्या “वह” वर्ग का “देश द्रोह” मात्र पिछले दो साल में उभरा है और क्या “राष्ट्रप्रेम” की भावना आज क्यों अपनी अस्मिता की लड़ाई लड़ने के भाव में “दो-दो हाथ “ करने पर उतारू है? यह सब पिछले ७० साल में कहाँ था? शायद जबाव साफ़ है. तब “यह” सत्ता में नहीं था. याने “यह” वर्ग की राष्ट्रभक्ति भी तब परवान चढ़ती है जब बगल में पुलिस खडी हो या विधायक या सांसद भी “यह वर्ग” का हो. “लव जेहाद” भी इन्हें ख़तरा तब लगता है जब स्थानीय पुलिस पार्कों से लड़के –लड़कियों को भगाती है. गाय देश में ७० साल से कचरे से प्लास्टिक खा कर मर रही हैं पर “गौ माता” तब याद आती है जब एक पार्टी राज्य या केंद्र में शासन करने लगती है.

ऐसे में डर यह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का “स्वच्छ भारत” कहीं “हम के मोहल्ले में तो हो लेकिन “वह” के मोहल्ले उसे गन्दा करने पर आमादा हों. स्वच्छ भारत पाक्षिक नहीं हो सकता. यह समाज के चिंतन को बदलने का काम है. ३० प्रतिशत हम सफाई करे (हालाँकि वह भी अन्य कार्यों में व्यस्त है), ५० प्रतिशत उदासीन रहे और २० प्रतिशत इसलिए गन्दगी फैलता रहे कि यह तो “यह” का अभियान है तो मोदी समझ सकते हैं कि देश कैसे साफ़ होगा. स्किल इंडिया , स्टार्ट अप इंडिया , स्किल इंडिया अपने आप मे  बेहद अच्छे प्रयास हैं लेकिन क्या ३० प्रतिशत के भरोसे ये सफल हो पाएंगे?

उधर “वह” वर्ग अख़लाक़ के मरने पर देश में वैचारिक क्रांति का बिगुल फूंकने के लिए अवार्ड वापस करने लगता है लेकिन इनमें से एक भी भारत विरोधी नारे को गलत नहीं बताता न हीं आगरा की घटना पर वहां जा कर वी एच पी के मारे  गए कार्यकर्ता के परिवार से सहानुभूति प्रदर्शित करने के लिए दिल्ली में कैंडल मार्च करता है.  
  
इसी दौरान समाज के मानसिक भ्रमद्वन्द के बीच एक नया मामला आता है. इशरत जहाँ आतंकवादी थी या नहीं, उसका एनकाउंटर फर्जी था या नहीं अब यह प्रश्न इतना महत्वपूर्ण नहीं रहा जितना कि यह कि क्या सत्ता का खेल इतना घिनौना होता है? और अगर ऐसा है तो किस पर विश्वास किया जाये? क्या भारत में संविधान के अनुरूप काम हो रहा है ? क्या देश में कानून का शासन है? क्या ७० साल के प्रजातंत्र के बाद भी हम उसी राजशाही में हैं जिसमें “राजमहलों के षड्यंत्र” से एक राजा को मार कर दूसरा बैठा करता था फिर उसको मार कर तीसरा और प्रजा केवल एक मूकदर्शक हुआ करती थी.  


lokmat/patrika

Monday, 22 February 2016

अभिव्यक्ति: एक बोले तो देशद्रोह, दूसरा बोले तो देशप्रेम


प्रख्यात न्यायविद फाली नारीमन ने अपने एक लेख में एक घटना का बयान किया. “कुछ साल पहले कुआलालम्पुर में अंतर्राष्ट्रीय बार एसोसिएशन के तत्वावधान में आयोजित एक कांफ्रेंस में मलेशिया के हीं एक जाने-माने रिटायर्ड जज ने देश-विदेश से आये लगभग ५०० से ज्यादा कानून के जानकारों से भरे हाल में अपनी तक़रीर की शुरुआत में कहा --- हमारे लिखित संविधान ने हमें बोलने “की” आज़ादी (फ्रीडम ऑफ़ स्पीच) दी है (तालियाँ बजीं). थोडा रुकने के बाद उन्होंने आगे कहा “लेकिन बोलने “के बाद” की आज़ादी (फ्रीडम आफ्टर स्पीच) नहीं दी है”. पूरे हाल में सन्नाटा छा गया. भारत में इस समय कुछ को बेलगाम बोलने की आज़ादी दी गयी है लेकिन कुछ का बोलना राजद्रोह बन जा रहा है.

नतीजतन सरकार का इक़बाल घट रहा है। देश में तनाव का माहौल है। जाति आरक्षण को लेकर हिंसा, गौमांस को ले कर बवाल और छात्रों में रोष इस बात की तस्दीक़ हैं।
पिछले दो हफ्ते में भारत में कुछ घटनाएँ हुई.  कई वीडियो जो साफ़ नहीं है और जिनमें अँधेरे में खींचे गए दृश्य भी हैं, सोशल मीडिया में हीं नहीं औपचारिक मीडिया –न्यूज़ चैनलों और अखबारों—रिपोर्ट किये जाते हैं. इनमें जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में भारत विरोधी नारे लगते दिखाए गए हैं. और वामपंथ से जुड़े छात्र संगठनों के युवा दिखाई दे रहे हैं. विश्वविध्यालय यूनियन का अध्यक्ष कन्हैया भी कथित रूप से इसमें शामिल है. एक हफ्ते तक पूरे भारत में “राष्ट्र भक्तों” का गुस्सा फूट पड़ता है, मीडिया दिन-रात बताता है कि देश की अखंडता पर बड़ा ख़तरा है. सरकार अभूतपूर्व तत्परता दिखाते हुए कन्हैया को गिरफ्तार कर लेती है.



लेकिन वहीं दो दिन बाद भारतीय जनता पार्टी का एक विधायक अपने आधा दर्ज़न गुर्गों के साथ एक वामपंथी कार्यकर्त्ता को पटक कर मारता है. स्थान –पटियाला कोर्ट, समय दोपहर, भीड़ की संख्या एक हज़ार, कैमरे –उत्तम क्वालिटी के प्रोफेशनल और मीडिया के. बगल में कोर्ट रूम के भीतर मीडिया कर्मी जिसमें पुरुष और महिला रिपोर्टर हैं की जमकर पिटाई होती है. पीटने वाले काले कोट में होते हैं और उनका चेहरा साफ़ नज़र आता है. उनमें से सभी वकीलों के चेहरे कैमरे में आते हैं मारते हुए. लेकिन पुलिस अगले ९६ घंटे तक कोई मुकदमा नहीं करती और जब मीडिया सस्थाएं आन्दोलनात्मक रूप लेती है तो पुलिस ऍफ़ आई आर लिखती है लेकिन वह भी अनाम लोगों के खिलाफ. इस बीच घटना के अगले दो दिन यह विधायक चैनलों के कैमरे पर घूम-घूम कर कहता है “मेरे पास बन्दूक होता तो मैं गोली मार देता. भारत के खिलाफ जो भी बोलेगा उसका ऐसा हीं हश्र होगा”. पांचवें दिन वह थाने में बुलाया जाता है कुछ घंटें पूछताछ के नाम पर बैठाया जाता है और फिर थाने से हीं जमानत मिल जाती है. एक वकील अपने फेसबुक पर फरवरी ११ से १६ तक ट्वीट करके वकीलों आह्वान करता है कि “समय आ गया है इनको सबक सिखाना का”. फिर पुलिस अभिरक्षण में लाये गए कन्हैया पर भरी भीड़ में दिनदहाड़े हमला करता है. और फिर मीडिया पर बताता है कि अगर यह सब गुंडई है तो वह गुंडा है”. पुलिस खडी नपुंसकता की पराकाष्ठा तक देखती रहती है. यह वकील इसी दौरान अपने उन फोटो का मुज़ाहरा करता है जिनमें वह भारतीय जनता पार्टी के नेता और मंत्री राजनाथ सिंह, जे पी नड्डा और विजयवर्गीय के साथ नज़र आता है. विधायक भी कुछ साल पहले तक केंद्र के एक बेहद ताकतवर मंत्री का पी ए रहा है.  बताया जाता है कि आज भी इस मंत्री के वरदहस्त के कारण पुलिस ने हाथ डालने की हिम्मत नहीं दिखाई.



याने कन्हैया पर आरोप शक के दायरे में है और एक वर्ग का कहना है वीडिओ से छेड़ छाड की गयी है। कन्हैया मन्च पर थे लिहाज़ा ज़िम्मेदारी अपराध न्याय शास्त्र के अनुसार बनती है, लेकिन चूंकि वह छात्र नेता वाम विचारधारा से जुड़ा है इसलिए देश के लिए ख़तरा लेकिन जो अपील कर के सरेआम देश को सन्देश दे रहा है कि ऐसे “भारत-विरोधियों” (यह उसकी अपनी परिभाषा है) को मारो, वह देश भक्त.



प्रश्न यह नहीं है कि कन्हैया पर राजद्रोह का मुकदमा होना चाहिए या नहीं. राज्य को जन-व्यवस्था को बिगाड़ने वाले किसी भी कुप्रयास पर अपने दंड का इस्तेमाल करना राजधर्म है लेकिन यही दंड तब कहाँ चला जाता है जब पार्टी के विधायक या नेताओं के करीबी लम्पट सरे आम उसी व्यवस्था को भंग करते हुए सुप्रीम कोर्ट द्वारा भेजे गए प्रमुख वकीलों के जांच दल के साथ गाली गलौच करते हैं? जब गौमांस खाने के शक पर गाँव के बहुसंख्यक अख़लाक़ की हत्या करने के लिए पार्टी के स्थानीय नेताओं के संरक्षण में हमला करते हैं तो देश का एक मंत्री इसे सामान्य आपराधिक घटना बताता है और एक पार्टी विधायक कहता है कि अगर एक वर्ग विशेष अपनी आदतों से बाज नहीं आयेगा तो मुजफ्फरनगर दंगे की पुनरावृत्ति की जायेगी. इस दंगे में हुए हमले में सकदों अल्पसंख्यकों को अपने घर और गाँव छोड़ कर शिविर की शरण लेनी पडी थी. आज भी वहां मुस्लिम बाहुल्य वाले गाँव उजाड़ पड़े हैं. गौमांस मुद्दे से उत्साहित लम्पट युवाओं ने देश में कम से कम एक दर्ज़न स्थानों पर ट्रकों को रोक कर ड्राइवरों का धर्म पोछ कर मार-पीट की और कुछ में हत्या तक. शायद “सब का साथ. सबका विकास” पिछले १६ महीनों के शासन में “कुछ का हाथ , कुछ के गर्दन पर” में बदल गया है.    



चीनी दार्शनिक कन्फ़्यूशियस ने कहा था: “एक अच्छे राजा को तीन चीज़ों की ज़रुरत होती है--रसद, हथियार और प्रजा का विश्वास. अगर एक ऐसी परिस्थिति उत्पन्न हो जाये कि उसे ये तीनों उपलब्ध न हो सकें और चुनाव करना हो तो उसे पहले रसद छोड़ना चाहिए, उसके बाद हथियार और आखिर में प्रजा का विश्वास.” आज इस विश्वास का संकट साफ़ दिखाई दे रहा है.



केंद्र की वर्तमान मोदी सरकार शायद यह भूल गयी है कि जनता का विश्वास इस पर से उठाता जा रहा है. उसे यह भी विश्वास हो चला है कि भारतीयता और राष्ट्रवाद के नाम पर लम्पटवाद का बोलबाला बढ़ रहा है. उधर गुंडई करने वाले विधायक या वकील को यह विश्वास ज़रूर है कि आज वह अगर दूसरे विचारधारा के लोगों को मारते है तो अगले चुनाव में उसका टिकट पक्का। इस “कु-विश्वास” का हीं प्रभाव है कि भाजपा का एक विधायक कांग्रेस के उपाध्यक्ष को चौराहे पर सजा देने की बात कहता है तो दूसरा किसानों की आत्महत्या को फैशन बताता है.



और यही वजह है कि जिस दिन देश के प्रधानमंत्री बेहद अच्छी फसल बीमा योजना का आगाज़ कर रहे दे देश की मीडिया में भाजपा के इन लम्पटों द्वारा मार-पीट की खबर छाई रही. नुकसान किसका हुआ यह मोदी, भाजपा और संघ को सोचना है.  


lokmat

Tuesday, 16 February 2016

अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य तो ठीक पर कुतर्क से देश की हानि न करें


देश की अजीब स्थिति है. अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के मौलिक अधिकार का सटोरिये से सांसद तक, गाँव के घुरहू से घंटाघर के घनश्याम सेठ तक और चौपाल से चर्चगेट तक खुल कर इस्तेमाल हो रहा है. हर मुद्दे पर हर एक की अपनी राय है. सही राय बनाने की पहली शर्त होती है कि सम्पूर्ण तथ्यों की जानकारी न भी हो तो इतनी हो जिससे तर्क-वाक्य से निष्कर्ष तक पहुंचा जा सके, तर्क –वाक्यों को निरपेक्ष भाव से गढ़ने की बौद्धिक सलाहियत हो और सोच में दुराग्रह न हो. अगर इन सबके बगैर अपना मत बनाने लगें तो निष्कर्ष हमेशा गलत होगा. आज अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को पंख लग गए जब से सोशल मीडिया मोबाइल के जरिये सबके पास पहुँच गया और हर व्यक्ति अद्वैतवाद से अवमूल्यन तक हर टॉपिक पर अधकचरा और दुराग्रहपूर्ण राय रखने लगा. नतीजा यह कि पूरे देश में कंफ्यूजन का माहौल है. देश में शाम को टी वी चैनल स्टूडियो में चार राजनीतिक पार्टियों के तथाकथित घोषित या स्वयंभू प्रवक्ता बैठा कर “मुंहचोथौव्वल” करने लगे. ये प्रवक्ता न तो तथ्य समझते हैं न हीं सत्य के प्रति कोई प्रतिबद्धता है. उसे सिर्फ एक बात मालूम है कि अगर किसी दूसरे प्रवक्ता ने उसके नेता और पार्टी को कुछ कहा तो फेफड़े की पूरी ताकत से दूसरे पक्ष के नेता और पार्टी की लानत-मलानत करनी है. नहीं तो उसके नंबर कट जायेंगे. एडिटर-एंकर भी कभी राष्ट्रभक्ति के नए भाव में सबको चुप करते हुए अपनी बात खड़ी करता है तो कभी देश के खिलाफ मानवाधिकार का अलमबरदार बन जाता है.

जिस समाज में तर्क-शक्ति अच्छी न हो और सत्य की खोज के प्रति आदतन प्रतिबद्धता क्षीण हो उसमें जन-संवाद तूफ़ान से घिरी नाव की तरह इधर-उधर डोलता रहता है कई बार डूब भी जाता है. इसकी एक बानगी देखिये. एक चैनल पर हेडली की इशरत जहाँ को फिदायीन बताने पर चर्चा हो रही थी. जनता दल (यू) का एक प्रवक्ता का तर्क था : हेडली खुद एक आतंकवादी और अपराधी है और केंद्र सरकार उस अपराधी की बात पर इतना विश्वास कर रही है लेकिन वहीं उत्तर प्रदेश कैबिनेट के दूसरे नंबर के मंत्री आज़म खान के इस आरोप पर कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के घर पर गुप्त रूप से दाउद इब्राहिम से मिले थे, पर विश्वास नहीं कर रही है. अब इस कुतर्क का क्या कोई जवाब हो सकता है?

तर्क शास्त्र का मूल सिद्धांत है कि तर्क-वाक्य यूनिवर्स ऑफ़ डिस्कोर्स (संवाद की दुनिया) की सीमा में होना चाहिए. तर्क-सदृश्यता (लॉजिकल पैरिटी) रखने की भी कुछ शर्तें हैं. अगर क़त्ल के आरोपी से पूछा जाये कि हत्या के दिन वह मृतक के मोहल्ले में क्यों गया था तो उसका जवाब यह नहीं हो सकता क्योंकि जज साहेब उस दिन लाल कमीज़ पहने थे.  अगर मुद्दा पाकिस्तान से भारत में किये जा रहे आतंकवाद को लेकर है तो उसमें जो लोग लिप्त रहे हैं उन्हीं की गवाही ली जा सकती है उन्हीं गवाहियों पर सत्य के खोज की बुनियाद खडी की जा सकती है. इशरत जहाँ की हकीकत लखनऊ में बैठे किसी फिजिक्स के प्रोफेसर की गवाही कर के नहीं हासिल की जा सकती. फिर पिछले २५ सालों से पाकिस्तान के आई एस आई द्वारा भारत में कराई जा रही आतंकी घटनाओं पर उस संस्था के पैसे पर आतंकवाद में भूमिका अदा करने वाले ने अगर यह बात कही है (जो पहले भी कह चुका है पर तब इस पर कोई विवाद नहीं हुआ था क्योंकि यूपी ए -२ की सरकार थी ) तो अपराध न्याय शास्त्र में इसका साक्ष्य –मूल्य तो बढ़ हीं जाती है कॉमन सेंस से भी लगता है कि २५ साल से कही बात एक बार फिर पुख्ता हुई. लेकिन भारत में एक बड़ा वर्ग है तथाकथित वाम बुद्धिजीवियो का और एक वर्ग –विशेष के वोट पाने को लालायित राजनीतिक दलों का कुनबा डिनायल मोड़ में आ जाता है बगैर यह सोचे हुए कि वह जाने-अनजाने में पाकिस्तान के घिनौने कृत्य को समर्थन दे रहा है.

इस प्रवक्ता का यह कहना कि आज़म खान का प्रधानमंत्री पर दाऊद से मिलने का आरोप भी ज्यादा बड़ा सत्य है एक बीमार मानसिकता दिखता है. आज़म खान तब भी प्रदेश शासन में दूसरे नंबर के मंत्री थे जब उन्होंने कहा था कि समाजवादी पार्टी नेता मुलायम सिंह का जन्म दिन मनाने के लिए उन्हें दाऊद इब्राहिम से पैसे मिले थे. इस प्रवक्ता ने तब यह मांग नहीं की कि इसको आपराधिक कॉन्फेशन माना जाये और मुकदमा चलाया जाये. आज़म खान के दो स्टेटमेंट हैं. एक में कैमरे पर स्पष्ट कथन है और दूसरे में मात्र आरोप (जो प्रशानिक अज्ञानता का या राजनीति में हल्केपन का ध्योतक है) लगाया गया है.
लेकिन जनता दल (यू) के इस प्रवक्ता को भौंडी तार्किक सदृश्यता दे कर अपने नेता को खुश करना था.

कुतर्क की एक अन्य बानगी देखिये. एक अन्य स्टूडियो डिस्कशन में एन सी पी के एक प्रवक्ता ने कहा “मुंबई के खालसा कॉलेज के रिकॉर्ड में, जहाँ इशरत जहाँ बी एस सी की छात्रा थे, कभी भी क्लास में अनुपस्थित नहीं थी, लिहाज़ा वह आतंवादी तो हो हीं नहीं सकती फिदायीन होना तो दूर की बात है”. हम सब जानते हैं कि अपराधी यह सुनिश्चित करता है कि घटना के समय वह अपनी उपस्थिति कहीं और दिखाए. यह सामान्य एलबाई –अपराध करके बचने का एक खास किस्म का बहाना) है. फिर हेडली उर्फ़ दाऊद गिलानी से सरकारी वकील उज्जवल निकम ने पूछा “महिलाओं आतंकवादियों में किसी का नाम याद है” तो हेडली ने कहा नहीं लेकिन जब यह पूछा गया “कोई नाम जैसे नुसरत, इशरत या मुमताज़” तो उसने कहा शायद दूसरा नाम. यह बयान इतना नेचुरल था कि कोई भी इसकी विश्वसनीयता पर प्रश्न-चिन्ह नहीं लगाएगा.

एक तीसरा उदहारण देखें. एक टीवी चैनल पर जे एन यू का छात्र यूनियन का नेता बैठा था. इस विश्वविद्यालय में भारत –विरोधी और कश्मीर की आज़ादी के समर्थन में नारे लगे और वह भी यूनियन के तत्वावधान में. उस छात्र नेता से पूछा गया कि क्या वह कश्मीर की आजादी के समर्थन में भारत के टुकडे करने के पक्ष में है और क्या यह राष्ट्र-द्रोह नहीं है? उसका जवाब के रूप में प्रति-प्रशन था “कश्मीर में जनमत (प्लेबिसाईट) की बात क्या बाबा साहेब अम्बेडकर और जवाहर लाल नेहरु ने नहीं कही थी. उन पर भी राष्ट्र –द्रोह का मुकदमा चलाइये? उसने अधकचरे ज्ञान के आधार पर यह नहीं जानने की कोशिश की कि नेहरु ने हीं अपने शासन काल में चीन युद्ध के दौरान जब ऐसे हीं कुछ धुर मार्क्सवादी कम्युनिस्टों ने भारत छोड़ चीन की हिमायत करनी शुरू की तो संविधान में १६ वाँ संशोधन करते हुए अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता रोकने के लिए “भारत की संप्रभुता और अखंडता “ जोड़ा.

आज भारत की सरकार को उसी संविधान के इस प्रावधान को सख्ती से अमल में लाने की ज़रुरत है. इन गुमराह छात्रों को यह भी नहीं मालूम को भारत के टुकडे होंगे तो जे एन यू नाम की केन्द्रीय यूनिवर्सिटी भी नहीं रहेगी और नहीं इन देश के दुश्मनों की पौध खडी हो पायेगी. 
jagran