Wednesday, 10 February 2016

मोदी की कृषि योजनाएं - एक सार्थक प्रयास



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योजनाओं को समग्रता में देखने की ज़रुरत
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किसी भी देश में समग्र विकास के लिए अच्छी नीति और योजनाएं तब सफल होती हैं जब वे दिक्- व काल सापेक्ष हों और उन पर अमल करने में राज्य अभिकरण अपनी पूरी प्रतिबद्धता दिखाए. भारत में इस प्रतिबद्दता के आड़े एक तो भ्रष्टाचार आता है और दूसरा लाभार्थियों को लेकर सही पहचान के लिए विश्वसनीय दस्तावेजों का अभाव. संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यू एन डी पी) ने दो सप्ताह पहले अपने आंकलन में बताया कि रोजगार गारंटी की विश्व भर में जारी योजनाओं में मनरेगा , जो सन २००६ में यू पी ए-२ शासन काल में शुरू की गयी थी, सबसे बेहतरीन है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सत्ता में आने के साथ इस योजना को "यूपीए सरकार की यादगार असफलता " बताया था लेकिन अब इसके तारीफ़ में क़सीदे काढ़ रही है। मोदी की इस माह चार राज्यों मे होने वाली किसान रैलियाँ मनरेगा और नयी फ़सल बीमा योजना को ले कर होगी।  इस योजना का अगर कोई कमी थी तो वह यह कि कार्यक्रम में राज्य सरकारों के तंत्र में इच्छा –शक्ति का अभाव था और अमल के स्तर पर यह कुछ हद तक भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ता रहा. सालों पहले मरे हुए व्यक्ति के नाम पर काम दिखा कर राज्य अभिकरणों के भ्रष्ट कर्मचारियों ने पैसा हड़प लिया.

मोदी सरकार की नयी योजनाओं का अगर निरपेक्ष आंकलन किया जाये तो पाएंगे कि कोई आधा दर्ज़न नयी योजनाओं, जिसमें पुरानी योजनाओं का विस्तार भी है, एक दूसरे की पूरक हैं. साथ हीं तकनीकी के सामाजिक स्तर पर फैलाव व प्रयोग के कारण भ्रष्टाचार पर भी काफी हद तक अंकुश लग सकता है. लगभग २० करोड बैंक खाते खुलवाना, यूरिया पर नीम की परत चढाने से इसे नाइट्रोजन-आधारित उद्यमों के गैर –वाजिब इस्तेमाल से रोकना ताकि इस मद की सब्सिडी का लाभ सिर्फ किसानों को हीं मिले, मृदा –स्वास्थ्य कार्ड का अभियान ताकि किसान जरूरत के मुताबिक हीं नाइट्रोजन, फास्फेट और पोटाश का प्रयोग करे, नयी फसल बीमा योजना जिसमें पहले की तीन योजनाओं की अधिकांश कमियों को दूर किया गया है यह सब उसी व्यापक कृषि नीति पर सरकार के वैज्ञानिक, तार्किक और क्रियात्मक सोच का परिणाम है. इनमें से कोई भी कड़ी हटा ली जाये तो हर योजना अमल की दहलीज़ पर दम तोडती दिखाई देगी.

इनमें से कोई भी योजना ऐसी नहीं है जिसको बनाने में राकेट साइंस के ज्ञान की ज़रूरत है. अगर जरूरत है तो समस्या के सही समझ की और उसे दूर करने की इच्छा –शक्ति की. यह इसी इच्छा –शक्ति का प्रतीक था कि बैंकों के तमाम ना-नुकुर करने की बावजूद प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी के दबाव के चलते घुरहू-पतवारू के खाते खुले. इसका लाभ उस समय तो नहीं समझ में आया पर अब जब अन्य योजनाओं का लाभ सीधे इनका खाते में पहुंचेगा राज्य के भ्रष्ट अभिकरणों को धता बताते हुए तब समझा जा सकता है कि “डायरेक्ट कैश  बेनिफिट” (नकद धन लाभ) क्या है.

फौरी तौर पर और अलग-अलग देखने पर “स्किल इंडिया”, “मेक इन इंडिया” और “स्टार्ट उप इंडिया” समझ में नहीं आ सकता. इन्हें समग्रता में और समेकित करके देखना होगा. एक ओर ग्रामीण बेरोजगार युवाओं के लिए यह वरदान हो सकता है वहीं नए उद्यमियों के लिए यह जबरदस्त उत्प्रेरक भी होगा. इसमें कोई दो राय नहीं है कि ३६५ व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर के आबादी घनत्व वाले भारत में कृषि से युवाओं को निकलना सबसे जरूरी कार्य है. अगर वे निकल कर अन्य रोजगार में लगें तो कृषि पर दबाव कम होगा निवेश ज्यादा होगा और कृषि का अपेक्षित किफायती मशीनीकरण सार्थक होगा. किसानों के जेब में ज्यादा पैसा होगा तो खपत बढ़ेगी और उद्योग बढेंगे. लेकिन जब हम पाते हैं कि देश में ३२ प्रतिशत स्किल्ड (प्रशिक्षित ) ड्राइवरों की कमी है जिससे वाहनों में ईंधन अधिक लगता है और दुर्घटनाएँ होती हैं तो समस्या का अहसास होता है. एक तरफ बेरोजगारी और दूसरी तरह ड्राइवरों का टोटा. अजीब विरोधाभास. आपके घर में जो बिजली ठीक करने इलेक्ट्रीशियन आता है उसे सही पेंचकश घुमाना नहीं आता (हर एक पेंच के लिए एक खास साइज़ का स्क्रू ड्राइवर चाहिए और वह भी एक खास कोण पर निश्चित बल की ज़रुरत होती है) लिहाज़ा गलत पेंच घुमाने से खांचे कट जाते हैं और पूरा उपकरण दो-चार बार में खराब हो जाता है. अगर इन ग्रामीण युवाओं को स्किल इंडिया के तहत गाँव से कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्किल (दक्षता) की ट्रेनिंग मिले और फिर ये “स्टार्ट अप इंडिया” कार्यक्रम के तहत नए उद्यमियों के छोटे-छोटे उद्यमों से लेकर “मेक इन इंडिया” के बड़े उद्योगों में नियोजित हों तो क्या यह क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं लायेगा? दुनिया की सभी अर्थ-व्यवस्थाओं में विकास के विभिन्न स्तर पर योजनाएं बनती हैं. भारत की समस्या हीं ग्रामीण युवाओं को कृषि से बाहर निकल कर उन्हें उद्योगों में नियोजित करने की योग्यता/दक्षता मुहैया कराने की हैं.    

बात सिर्फ सत्ता में बैठ कर सही सोचने की है. देश में पिछले ३० सालों से किसान कृषि शिक्षा के अभाव में पागलपन की हद तक यूरिया (नाइट्रोजन) का इस्तेमाल करता रहा है. नतीज़तन जमीन का पी एच (हाइड्रोजन आयन कंसंट्रेशन) बदलता रहा है और उर्वरता घटती रही है. ७० साल पुराने कृषि विस्तार अभिकरण जैसे खंड विकास कार्यालय किसानों को यह नहीं बता पाए. उनकी नज़र किसानों के दिए जाने वाले फण्ड पर हीं रही. नतीजा यह रहा कि सन १९७० तक जहाँ भारत में प्रति हेक्टेयर १२ क्विंटल गेहूं पैदा होता था वहीं चीन में १० क्विंटल जबकि आज भारत में ३२ क्विंटल गेहूं होता है और चीन में ६० क्विंटल. मृदा स्वास्थ्य कार्ड बनाने के साथ हीं केंद्र सरकार सस्ती किटें बनवा रही है ताकि हर फसल के पहले किसान को यह जानकारी मिल सके कि रासायनिक खादों में से कौन सा और कितना इस्तेमाल करना है. सहीं फसल बोने की जानकारी न होने और कमज़ोर फसलों को लेकर सर्व-स्वीकार्य फसल बीमा के अभाव का नतीजा यह रहा कि देश में दलहन का रकबा घटता रहा , उत्पादन कम होता रहा. सन १९७० में जहाँ भारत में प्रति-व्यक्ति दाल की उपलब्धता ६४ ग्राम थी आज ३६ ग्राम है. दाल गरीबों के लिए प्रोटीन का एक मात्र सस्ता साधन था लेकिन वह २०० रुपये प्रति किलो से ऊपर जा ठहरा.

दरअसल इन कार्यक्रमों से तो यह साफ़ झलकता है कि देश की वर्तमान सरकार को समस्याओं की सही पकड़ है, उनका हल निकालने की लगन और सलाहियत भी है और उन्हें अमल में लाने की क्षमता भी है. परन्तु तीन दुश्वारियां अभी भी हैं. अर्ध-संघीय संवैधानिक ढांचे की वजह से राज्य की सरकारें केंद्र की योजनाओं को सफल बनाकर वोट लेने के बजाय उन्हें असफल कर केंद्र में बैठी सरकार का वोट कम करने की नीति अपनाती हैं. यू पी ए -२ के साथ भी यही हुआ और आज भी यही हो रहा है. राज्य सरकारों का तंत्र भी शासकीय प्रतिबद्धता न होने से खुले आम भ्रष्टाचार करता है और स्कीमें असफल हो जाती हैं. रेवेन्यु रिकॉर्ड राज्य सरकारें ठीक नहीं कर रहीं हैं लिहाज़ा जिस फसल बीमा का लाभ बटाईदार को मिलना चाहिए वह नॉएडा और दिल्ली में ए सी कमरे में बैठे जमीन के मालिक को मिल जाता है. मोदी सरकार ने इस का समाधान कुछ हद तक ड्रोन और स्मार्ट फ़ोन का इस्तेमाल करने की योजना बना कर किया है.

केंद्र की वर्तमान योजनाएं तभी सफल होंगी जब सामाजिक स्तर पर जनता की सकारात्मक सोच हो. लेकिन हर तीसरे दिन अगर कोई एक या दूसरा भावनात्मक मुद्दा देश के जन-संवाद के धरातल पर छाया रहेगा तो सामूहिक सोच सार्थक और विकासपरक नही हो सकेगी. यही कारण है कि नयी क्रांतिकारी फसल बीमा योजना जन संवाद के धरातल पर आयी हीं नहीं जबकि रोहित वेमुरी की आत्महत्या एक सप्ताह तक देश के चेतना को झकझोरता रहा.


lokmat

Friday, 5 February 2016

और उसने फांसी लगा ली, क़ानून देखता रहा


किसे दोष दे? बलात्कारी डॉक्टर और सिपाहियों को, कानून को , पुलिस को, न्यायपालिका को या फिर सारी व्यवस्था को. और अंत में समाज को. मनोविज्ञान में आत्महत्या एक मानसिक बीमारी है. पर अगर एक ऐसी स्थिति अपरिहार्य है जिसमें लड़ाई लड़ने पर हारना हीं है, जिसमें तिल –तिल कर अपमानित जीवन केवल खुद ताउम्र नहीं जीना है बल्कि पूरे परिवार को भी वह जीवन जीने के लिए मजबूर होना है, तो विकल्प क्या है?

यह सुसाइड नोट पीडित छात्रा ने अदालती कारवाई चलने के एक साल बाद (जब पुलिस फिर उसके घर सम्मन लेकर पहुँची) खुद पंखे से लटक कर जान देने के पहले लिखा. मामला जून , २०१४ का है जब छात्रा अपने चेहरे के इलाज के लिए भिलाई –स्थिति लाल बहादुर शास्त्री अस्पताल गयी थी. आरोप है कि नशे का इंजेक्शन दे कर उसके साथ पहले डॉक्टर ने और फिर वहां तैनात दो सिपाहियों ने बलात्कार किया. और तब से लगातार अगले छः माह तक उससे विवस्त्र फोटो को सार्वजनिक करने के खौफ दिखा कर ये तीनों बलात्कार करते रहे. छात्रा का बाप किसी संस्थान में गार्ड के रूप हाल हीं में में सेवा-निवृत हुआ है. दो कमरे के किराये के मकान में यह परिवार रहता है. जब बालिका को यह सब बर्दाश्त नहीं हुआ तो अपने परिवार को बताया.  छात्रा के भाई के अनुसार थाने में पीडिता को मार गया लेकिन जब मामला दबाना मुश्किल हो गया तो येनकेन प्रकारेण ऍफ़ आई आर लिखी गयी. चूंकि मामला और तूल पकड़ गया लिहाज़ा पुलिस ने डॉक्टर और दोनों सिपाहियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा और अदालत ने भी जमानत नहीं दी. एक साल की पेशी के दौरान हर तारीख पर छात्रा और उसका भाई मौजूद रहे लेकिन जब मरने की बाद अदालत का रिकॉर्ड देखा गया तो ये हमेशा अनुपस्थित दिखाए गए.

यहाँ यह नहीं देखा गया कि अदालत, कानून, पुलिस की औपचारिकता के बीच कुछ अनौपचारिक भी होता है. वह है पैसे और ताकत का खौफ. पुलिस लगातार इस परिवार को धमकाती रही. लेकिन इसकी कोई लिखा –पढी नहीं होती. उसे वैश्या कह कर कह सरे आम अपमानित करती रही अदालत में भी और मोहल्ले में भी. इसकी भी कोई सनद नहीं होती. पीड़ित व्यक्ति अदालत में है लेकिन फ़ाइल में लिखा जा रहा है कि वे अनुपस्थित हैं. एक दिन इसी आधार पर “दूध-पानी “ (नीर-क्षीर) विवेक का इस्तेमाल करते हुए अदालत या तो आरोपियों को छोड़ देती या नाराज़ हो कर पीडिता को गैर-जमानती वारंट जारी करती हुए पुलिस से पकड़वायेगी. कोई ताज्जुब नहीं कि पुलिस रास्ते में फिर वही करती जो पहले उसके साथ हो चुका था. पीडिता इन सब का कोई सबूत नहीं दे पाती. चूंकि अदालत सबूत के बिना कुछ नहीं करती लिहाज़ा पीडिता हीं अंत में “पानी” ले कर आ जाती दूध आरोपियों के हाथ लगता. सिस्टम यथावत चलता रहता और डॉक्टर और सिपाही किसी और मरीज पर यही नुस्खा आज़माते.    
    
और किसी भी संभ्रांत बौद्धिकता वाले व्यक्ति की तरह राज्य के मुख्यमंन्त्री ने इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए मनोवैज्ञानिक व्याख्या का हीं सहारा लिया. उनका भी कहना था “लगता है वह बालिका मानसिक अंतर्द्वंद में थी वर्ना पुलिस ने आरोपियों को बंद कर दिया. वे जेल में हैं. मामला अदालत के विचाराधीन है”. याने पीडिता को सिस्टम पर भरोसा रखना चाहिए वैसे हीं जैसे नक्सालियों के शिकार लोग पीढी दर पीढी रखते हैं. और नक्सली रक्त बीज की तरह बढ़ते जाते हैं.  

तकनीकी रूप से देखें तो सब ने अपना काम किया भले हीं देर से. पुलिस ने ऍफ़ आई आर लिखा. आरोपियों को जिनमें दो सिपाही भी थे, गिरफ्तार भी किया. अदालत ने भी अपना काम किया उनकी जमानत की अर्जी ख़ारिज कर जेल में रखते हुए. कानून और सिस्टम तो इतना हीं कर सकता है. पर अगर साथ के सिपाही उसे रास्ते में “वेश्या” कहते है या मोहल्ले में इस बात को अन्य को बताते हैं ताकि पूरा मोहल्ला सिपाहियों पर विश्वास करते हुए उसे वैश्या मान ले तो इसमें कानून क्या करेगा? अगर जेल से या जेल के बाहर आरोपियों के गुर्गों द्वारा मोबाइल पर धमकी मिल रही है तो इसमें कौन सा गुनाह एक कमजोर परिवार लगा सकता है?  

कितना सहज है संप्रभु सत्ता की गोद में पूर्ण सुरक्षा का कवच पहने कमजोरों के लिए काल बने सिस्टम पर भरोसा रखने की ताकीद करना. यह नहीं देखा गया कि किसी थानेदार का पहले उस पीडिता से मार-पीट करना, फिर बमुश्किल तमाम ऍफ़ आई आर लिखना फिर हर तीसरे दिन आरोपियों से मिलकर पीडिता को पुलिस द्वारा धमकाना, उसके पेशी के दिन अदालत जाने पर उसे “वैश्या” कहना. सबने नज़रंदाज़ किया कि आरोपी भले हीं जेल में हों, उनके गुर्गे जिनमें पुलिस भी थी किस तरह से उसे पिछले एक साल से केस वापस लेने के लिए धमकाते रहे. ये तथ्य जो छात्रा ने सुसाइड नोट में लिखा है सत्ता में बैठे लोगों के लिए गौण हो जाता है अगर वे खूबसूरती से यह स्थापित कर सकें कि “पीडिता मानसिक अंतर्द्वंद की शिकार थी” याने मेंटल केस थी. सत्ता के प्रतिनिधियों का सीधा जवाब है “पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार किया, याने कानून ने अपना काम किया, न्यायपालिका में केस सुना जा रहा है. अंत में “दूध का दूध” वाला जुमला फेंकते हुए सत्ता उस दूध से मलाई निकालने लगता है.            

सुसाइड नोट में बी एस सी की इस छात्रा ने मौत को गले लगने के पहले लिखा था “ मम्मी, पापा, मुझे माफ़ करना. मुझे न्याय नहीं मिलेगा और आगे जिन्दगी जीना मुश्किल होगा. अगर मैं मर गयी तो आगे कोई भी हमें वैश्या नहीं कहेगा......... मैं जब भी तारीख पर अदालत जाती थी मुझसे कहा जाता था कि मजिस्ट्रेट साहेब नहीं हैं. मुझे न्याय प्रणाली पर भरोसा नहीं है”.  

पूरा केस देखने पर साफ़ दिखाई देता है कि भारतीय अपराध न्याय-शास्त्र में जबरदस्त कमियां हैं जो पीड़ित की अनौपचैरिक (साक्ष्य-विहीन) प्रताड़ना या उसका भय संज्ञान में नहीं लेता क्योंकि न्याय की देवी के आँखों पर पट्टी है. वह यह भी नहीं देख पाती कि कोर्ट क्लर्क हाज़िर को गैर-हाज़िर बना देता है.
    
lokmat

Sunday, 31 January 2016

क्यों नहीं मिटता भारत से भ्रष्टाचार !

हर साल की तरह इस साल भी २७ जनवरी को ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट आयी. भ्रष्टाचार के वैश्विक पैमाने पर भारत अंकों के आधार पर वहीं खड़ा है. पिछले हफ्ते ऑक्सफैम सहित दुनिया की तीन आर्थिक विश्लेषण संस्थाओं ने बताया कि भारत में  विगत २५ सालों में गरीब –अमीर की खाई खतरनाक रूप से बढ़ती जा रही है. गरीब और गरीब होता जा रहा है और अमीर और अमीर. विश्वास नहीं होता कि बापू के देश में यह सब कैसे. हमने तो बापू के सम्मान में अपने नोटों पर उनकी तस्वीर भी छापी फिर आखिर क्या वजह है कि वे नोट भ्रष्टाचार के रास्ते धन-पशुओं की तरफ जाते रहे. हमने कानून बनाये. हमने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सरकारें गिरायीं और सरकारें बनायी. अन्ना ने आन्दोलन किया. पूरा देश उससे प्रभावित होकर कई दिन अनशन –स्थल पर गया या अपने-अपने जिलों में जलूस निकाला. यहाँ तक कि भ्रष्ट लोग भी आन्दोलन में नज़र आये. लगा कि देश की सामूहिक चेतना में गुणात्मक परिवर्तन हो गया और अब भ्रष्टाचार आखिरी सांस लेगा.
 
लेकिन ताज़ा खबर के मुताबिक देश की सेना के दो मेजर –जनरल के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति को लेकर सी बी आई जांच के आदेश दिए गए हैं. यह भी खबर है कि सेना में प्रमोशन के लिए घूस देने की आशंका है. इसके पहले दो लेफ्टिनेंट –जनरल के खिलाफ भी कुछ ऐसा हीं मामला चला था. प्रधानमंत्री ने हाल में अधिकारियों की मीटिंग में कस्टम्स और उत्पाद कर विभाग में भ्रष्टाचार को लेकर सख्त ताकीद की. याने देश के राजस्व को चुना लगाया जा रहा है. कहने की जरूरत नहीं कि अगर सेना के शीर्ष अधिकारियों को भी यह बीमारी है तो हम कितने महफूज़ रह सकते हैं. अगर देश की सर्वोच्च अफसरशाही –आई ए एस – जिसे सिस्टम पलक –पांवड़े बिछा कर ताउम्र “माई-बाप” मानता है--- भी कफनचोर निकले तो समाज की चिंता बचैनी में बदल जाती है. मीडिया के खिलाफ आरोप आम जन की जुबान पर लगातार रहा है. हाई कोर्ट तो छोडिये सुप्रीम कोर्ट के कुछ मुख्य न्यायाधीशों भी इस आंच से नहीं बचे. हाई कोर्ट के एक मुख्य न्यायाधीश ने सुप्रीम कोर्ट के एक जज पर अपनी बहन को जज बनाने का दबाव डालने का आरोप लगाया और भारत के मुख्य न्यायाधीश को भेजा गया अपना शिकायत पत्र मीडिया को दे कर सार्वजनिक किया. कुल मिलकर प्रजातंत्र की तीनों औपचारिक संस्थाएं और चौथी अनौपचारिकसंस्था –मीडिया—सभी हम्माम में दिखे.
 
आखिर जाता क्यों नहीं हमारे देश से यह रोग. ट्रांस्पैरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट के अनुसार हमेशा क्यों पूरा यूरोप इस बीमारी से लगभग अछूता है. अमरीका में भी यह आम जन को प्रभावित नहीं करता. अगर सम्पन्नता इसका कारण है तो हमने पिछले २५ सालों में जबरदस्त छलांग लगाई है सकल घरेलू उत्पाद में. और ५० वें नंबर से नवें नंबर पर आ गए हैं. यह अलग बात है कि मानव विकास सूचकांक पर हम इस दौरान वहीं के वहीं रहे.
 
सोशल मीडिया में एक फोटो वाइरल हुआ जिसमें इजराइल के प्रधानमंत्री और उनकी पत्नी अपने बेटे को सेना में भर्ती होने पर भाव-भीनी बिदाई दे रहे थे. कभी भारत के किसी बड़े नेता के बेटे को आपने सेना में भर्ती होते सुना है. वह भी देश की सेवा करता है पर पार्टी का टिकट लेकर या पिछले दरवाजे से राज्य सभा में आ कर या फिर पिता के नाम पर चुनाव जीतकर और अगर पिता या पति ज्यादा दमदार हुआ तो मुख्यमंत्री या उप-मुख्य मंत्री बन कर. एक अन्य चित्र भी वाइरल हुआ जिसमें स्वीडेन के प्रधानमंत्री बस में टिकट लेकर संसद के गेट पर उतरते हुए. भारत में क्या यह संभव है?
 
लेकिन नेता का आचरण व्याधि का कारण नहीं अभिव्यक्ति है. अगर लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव के माध्यम से हम अपने रहनुमा चुनते हैं तो दोष हमारा है. अगर कानून है पर काम नहीं कर रहा है, अगर अफसर और सेना में भी यह भ्रष्टाचार व्याप्त है तो शायद हमने अच्छे इंसान पैदा करने बंद कर दिए हैं. लोकपाल (याने एक और संस्था)  इस का इलाज़ नहीं है. इस दुनिया में तीन करोड तीस लाख कानून हैं. परन्तु हत्या , बलात्कार और भ्रष्टाचार के आंकड़े बढ़ते गए.
 
दरअसल भ्रष्टाचार नैतिकता और मूल्यों से जुड़ा प्रश्न है और इसका समाधान कानून और औपचारिक संस्थाओं में ढूढना हीं गलत है. समाज के इकाई के रूप में व्यक्ति कानून के डर से नहीं अपने स्वयं के डर से नैतिक बनता है. और व्यक्ति को नैतिक बनाने वाली संस्थाएं कानून या कोर्ट नहीं होतीं. व्यक्ति नैतिक बनाता है माँ की गोद में, स्कूल में अपने अध्यापक के आचरण को देख कर. पडोसी के बच्चे को देख कर. पास के लोगों के नैतिकता के प्रति निष्ठा और प्रतिबद्धता को देख कर. अपने प्रतिमानों को देख कर. दुर्भाग्यवश हमने प्रतिमान बनाने बंद कर दिए और अगर बनाये भी तो बाजारी ताकतों की वजह से गलत प्रतिमान. सब्जी बेचने वाले की बेटी देश की सबसे कठिन आई आई टी की प्रवेश परीक्षा में पास करती है लेकिन वह आइकॉन नहीं बनती परन्तु “डांस इंडिया डांस” में प्रथम आने वाला लड़का देश के शहरों में घुमाया जाता है और जनता उसे देखने के लिए टूट पड़ती है.      
      
अगर हम आत्ममुग्ध होने के लिए “गिलास आधा भरा है” भाव से देखना चाहें तो कह सकते हैं कि भ्रष्टाचार पिछले एक साल में  बढा नहीं. हम यह भी कह सकते हैं कि पाकिस्तान तो छोडिये चीन भी हमसे बदतर है. पर यह “सुतुर्मुर्गी भाव” उस समय टूट जाता है जब रिपोर्ट यह कहता है कि कि पाकिस्तान पिछले एक साल में अंकों के आधार पर बेहतर हुआ है यानी भ्रष्टाचार कम हुआ है. चीन के विकास के अन्य हमें हमेशा शर्मिंदा करते रहे है.
 
एक गैर सरकारी संस्थान ने कुछ माह पहले अपने अध्ययन में पाया कि एक औसत ग्रामीण
राशन,स्वास्थ्य,शिक्षा और जलापूर्ति जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए औसतन
164
रुपए घूस हर साल देता है। यानि हर एक ग्रामीण परिवार से लगभग एक हजार
रुपए सालाना। अध्ययन में ये भी पता लगा कि सबसे ज्यादा घूस बगैर कागज़ के
फर्ज़ी बी.पी.एल कार्ड बनाने के मद में जा रहा है,लगभग 800 रुपया। लेकिन यह वह भ्रष्टाचार नहीं जो देश को खा रहा है. असल भ्रष्टाचार गरीब या विकास के नाम पर बहने वाले फण्ड को लेकर है जो हमारी बजट का बड़ा हिस्सा है. इसी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक तीखी टिप्पड़ी में सरकारी वकील से पूंछा था क्या नौकरशाहों को मसूरी(जहां आई.ए.एस प्रोवेशनर्स की ट्रेनिंग होती है)में दिए जाने वाले प्रशिक्षण में यह भी शामिल होता है कि भ्रष्टाचार पर कैसे लीपापोती करें और कैसे अपने साथी को बचाएं  
एक ग्रीक कहावत है- फिश राट्स फ्राम द हेड फर्स्टयानि  मछली पहले सिर से सड़ना शुरू होती है। भारत का तंत्र भी शीर्ष से सड़ना शुरू कर रहा है। मुश्किल ये है कि हम इसमें पूंछ के पास सड़ांध महक रहे हैं।
 
lokmat

Friday, 29 January 2016

एकल नेतृत्व की मोदी-नीति पार्टी के भविष्य के लिए चुनौती


भक्तिवाद ठीक लेकिन वंशवाद गलत ?
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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने फिर “अपने मन की बात” की. न कोई चुनाव, न पार्टी में कोई आतंरिक प्रजातंत्र का छलावा। कार्यकर्ता से लेकर भारतीय जनता पार्टी के “मार्गदर्शक मंडल” के लालकृष्ण आडवाणी को अमित शाह को फिर से अगले तीन साल के लिए अपना नेता मानना होगा. शाह के नेतृत्व में हीं सन २०१७ तक पार्टी एक दर्ज़न राज्यों के विधान सभा चुनाव लड़ेगी और २०१९ का आम चुनाव भी. अगर राज्यों के चुनाव में दिल्ली –बिहार के पुनरावृत्ति हुई तो पार्टी में एक बार फिर आक्रोश बढेगा. शायद पार्टी के वरिष्ठतम नेतागण उसे निर्णायक मकाम तक पहुंचाएं. लेकिन अगर पार्टी जीत गयी तो पार्टी अध्यक्ष का अर्थात मोदी का एकल-नेतृत्व का सिद्धांत सर चढ़ कर बोलेगा. नेतृत्व का अहंकार नेता-कार्यकर्त्ता और सरकार-जनता, सत्ता-मीडिया संबंधों को पुनर्परिभाषित करेगा. आडवाणी, जोशी और संघ का एक वर्ग परित्यक्त खोखे की तरह बाज़ार में किनारे लुढ़के दिखाई देंगे. दोनों स्थितियों में नुकसान देश की जनता का होगा. मोदी जैसी नेतृत्व की क्षमता, विकास की समझ और उसे अंजाम देने की योग्यता देशवासियों को कभी-कभी मिलती है लेकिन मोदी के व्यक्तित्व जैसा अधिनायकवाद भी कम हीं देखने को मिलता है।  

एक किस्सा कुछ दशकों पहले तक मशहूर हुआ करता था. रोल्स रॉयस (आर आर ) कार प्रतिष्ठा होती थी. कहा जाता है २० वीं सदी के पूर्वार्ध तक इस कार –निर्माता कंपनी की नीति थी कि कार केवल राष्ट्राध्यक्षों, राजा-महाराजाओं, बड़े औधोगिक घरानों को हीं बेंची जाये। भारत के एक रियासत के राजा कार खरीदने लन्दन के एक शो-रूम पहुंचे. साथ में उनका ए डी सी भी था. शोरूम मैनेजर ने तपाक से हाथ मिलाया और आगंतुक के बारे में ए डी सी से पूछा. मुतमईन होने के बाद उसने कार की विशेषताएं बताना शुरू किया. “योर हाइनेस, इसका इंजन इतने अश्व-शक्ति का है. इसका शाकर इतनी ताकत का है. इसका स्टीयरिंग ऐसा है... बगैरह वगैरह. अंत में उसने कहा “मान लीजिये योर हाइनेस लॉन्ग ड्राइव (कार से लम्बी यात्रा) पर जा रहे हैं और रास्ते में पेट्रोल ख़त्म हो गया, तो कोई चिंता करने की ज़रुरत नहीं. कोइ  ३५-४० किलोमीटर तक यह कार तब भी चली जायेगी” . राजा साहेब चौंके और बोले “भाई सब विशेषताएं तो समझ में आ गयी लेकिन यह नहीं समझ सका कि पेट्रोल ख़त्म होने पर भी गाडी इतनी दूर कैसे चलेगी ?” मैनेजर ने तपाक से कहा “योर हाइनेस, इतनी दूर तो यह गाड़ी अपनी “रेपुटेशन” की वजह से चल जायेगी”।

लेकिन रोल्स रायस के इस किस्से में एक बात और भी है. रेपुटेशन की भी मियाद या सीमा होती है. इस कार के मामले में यह ३५-४० किलोमीटर थी. भाजपा का नेतृत्व आज लगभग पौने दो साल से “रेपुटेशन” पर चल रहा है. यह रेपुटेशन सन २०१४ में लोक सभा में जीत से बना था. अर्ध-शिक्षित समाज में विजेता के साथ कुछ विशेषताएं जनता स्वतः चस्पा कर देती है वैसे हीं जैसे नेहरु के साथ उनकी सम्पन्नता को लेकर लोगों में कहानी थी कि उनके कपडे पेरिस में धुलने जाते थे. चूंकि जनता यू पी ए -२ के भ्रष्टाचार से त्रस्त थी, निजात पाना चाहती थी लिहाज़ा भाजपा के नरेन्द्र मोदी में उसे कुशल प्रशासक, सक्षम विकासकर्ता, भ्रष्टाचार का समूल नाश करने वाला और आतंकवाद की दुश्मन दिखा. पार्टी जीती. लेकिन नेहरु के कपडे पेरिस में धुलने के किस्से की तरह अमित शाह में जनता “चाणक्य” देखने लगी. उसे ऐसा नेता मानने लगी जो अपनी माइक्रो-मैनेजमेंट के स्किल के तहत जीते को हरा सकता है हारे को जीता सकता है. उत्तर प्रदेश में ७२ लोक सभा सीटें जीत सकता है... आदि आदि. पर सवा साल में हीं हकीकत पता चल गयी जब दिल्ली और बिहार में बुरी हार हुई. “चाणक्य” का शायद यह सबसे भौंडा, गैर-बुद्दिमात्तापूर्ण और बचकाना प्रदर्शन था. तो फिर अमित शाह को दूसरा कार्य-काल क्यों? क्यों भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का नेतृत्व एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के निकटतम सहयोगी गुजरात के अमित शाह के हाथों रह गया और वह भी  अगले तीन साल के लिए? न कोई आतंरिक चुनाव, न कोई आम सहमति ना हीं कोई विचार-विमर्श. दरअसल प्रधान मंत्री ने अपनी रेपुटेशन का इस्तेमाल किया. अब भाजपा की गाड़ी अगले तीन साल के लिए बिना पेट्रोल मात्र मोदी के पार्टी में दबदबे (रेपुटेशन) के कारण चलेगी. अमित शाह चूंकि मोदी के आदमी हैं लिहाज़ा विरोध के स्वर गले में हीं घुट के रह गए. तो फिर राहुल या गाँधी परिवार का कोई कांग्रेस अध्यक्ष बनाता है तो क्यों उसे वंशवाद कहा जाता है. भक्तिवाद ठीक लेकिन वंशवाद गलत।

अमित शाह की गलतियाँ क्या हैं जिनकी वजह से “रेपुटेशन” एक साल में हीं ढहने लगी. पहले के पार्टी अध्यक्षों और अमित शाह के नेतृत्व में अंतर क्या है? इस पार्टी का नेतृत्व डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी , पंडित दीन दयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी के पास रहा हो उसके वर्तमान नेतृत्व से जनता की अपेक्षाएं कम से कम नैतिक और गरिमा के स्तर पर बढ़ जाती हैं. अपेक्षाकृत कम लोकप्रिय जना कृष्णमूर्ति और कुशाभाऊ ठाकरे के व्यक्तित्व से भी सौम्यता और नैतिकता झलकती रहती थी. वेंकैया नायडू और राजनाथ सिंह इन पैमानों पर उतने सर्वस्वीकार्य तो नहीं रहे परन्तु चूंकि वाजपेयी और आडवाणी के नियंत्रण बना रहा लिहाज़ा ये दोनों नेता भी नज़रों में खटकते नहीं थे और पार्टी कार्यकर्ता इन्हें नेता मानते थे. दलित चेहरे के रूप में बंगारू लक्ष्मण को बैठाने का फैसला शायद सबसे गलत था. बंगारू में न तो वह सौम्य छवि थी न हीं नैतिकता को लेकर तनने की जिद।

अमित शाह को लेकर मन में न तो जन-नेता की छवि उभरती हैं न हीं सौम्य व्यक्तित्व की. नैतिकता पर जिद की  हद तक खड़े रहने का तो प्रश्न हीं नही पैदा होता. प्रेस कांफ्रेंस में अमित शाह को मीडिया के सवालों पर “चढ़ कर” “दबंगई से” और “हिकारत के भाव से” जवाब देना शाह को मोदी की नज़रों में तो भले हीं उठा ले लेकिन जनता की नज़रों में एक अलग तस्वीर पेश करता है. एक टीवी के खुले कार्यक्रम में एडिटर को एंकरिंग से इसलिए हटना पड़ा क्योंकि वह शाह को पसंद नहीं था. सन्देश गया “उसे बदल दो”. उस प्रेस कांफ्रेंस के दौरान शाह के जवाब में भी आक्रामकता थी, नीचा दिखने की कोशिश भी साफ़ झलक रही थी. बिहार चुनाव में चुनाव विज्ञान का अदना विद्यार्थी भी जो गलतियाँ न करता वह शाह ने की. जिस तरह राज्य के वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार कर कर्नाटक के अनंत कुमार और अन्य बाहरी नेताओं को लाया गया, वह अहंकार की पराकाष्ठ थी. शाह का यही अहंकार पिछले कुछ महीनों में पार्टी के प्रवक्ताओं में भी दिखाई देने लगा. टीवी चैनलों पर विनम्रता छोड़ कर हिकारत से बात करना, बदतमीजी करना इन प्रवक्ताओं का शौक होने  लगा. उन्हें लगा पार्टी अध्यक्ष इसी अहंकारपूर्ण जवाब से खुश होंगे, शायद मोदी जी भी।    

अमित शाह पार्टी के अध्यक्ष भले हीं मोदी के दबाव के कारण अगले तीन साल के लिए चुने गए लेकिन क्या वह इस अहंकार को बदल पाएंगे. अहंकार व्यक्तित्व का भाव होता है और वह आसानी से जाता नहीं है. आज भाजपा में नेतृत्व और मध्य स्तर के नेताओं के बीच जबरदस्त दूरी है. दिल्ली हार के बाद भाजपा मुख्यालय में बैठने वाले एक नेता ने दबी जबान में कहा “बहुत अच्छा हुआ. घमंड बढ़ गया था. मुख्यालय में कार्यकर्ताओं का तो छोडिये, राज्य के नेताओं का आना-जाना बंद कर दिया गया था”. बिहार की हार के बाद पार्टी के एक बड़े वर्ग ने हीं नहीं तमाम वरिष्ठ नेताओं ने ख़ुशी महसूस किया और उनकी जुबान पर एक हीं बात थी “अच्छा हुआ. अहंकार की यही परिणति होती है”।

अगर अमित शाह को पार्टी के कार्यकर्त्ता व नेता अहंकारी मान रहे हैं और अगर वे यह भी जानते हैं कि शाह मोदी को जिद की हद तक  पसंद हैं तो उससे मोदी की अपनी छवि पर भी असर पड़ता है. एकल नेतृत्व व्यवस्था तब तक कारगर रहती है जब तक सफलता उसका पैर चूमे. लेकिन अगर असफलता आने लगे तो यह अपने हीं लोग दूनी तेजी से हमला करते है. अभी तक जो जनता मोदी के अधिनायक प्रवृति को “कुशल प्रशासक” का आभूषण मानती थी और उसे कुशल प्रशासन के लिए अपरिहार्य समझती थी, दिल्ली और बिहार की हार बाद मोदी में भी शाह के अहंकार का विस्तार मानने लगी. “रेपुटेशन” ढहने की शुरूआत हो गयी. मियाद ख़त्म।

नए कार्यकाल में भाजपा अध्यक्ष शाह की चुनौती क्या होगी? पार्टी कैडर को हीं नहीं, पार्टी के मध्यम स्तर के नेताओं को भी फैसलों में शामिल करना, मोदी सरकार की अच्छी योजनाओं को जनमानस तक पहुँचाना, गिरिराज सिंह, महंत आदित्य नाथ, साध्वी निरंजन ज्योति –टाइप नेताओं के मुह पर लगाम लगाना. देश में विकास और सामाजिक तनाव साथ-साथ नहीं चल सकते. भारत की अर्थ-व्यवस्था वैश्विक अर्थ-व्यवस्था में समेकित है और अख़लाक़ मरता है तो उसकी अनुगूंज कैलिफ़ोर्निया के उद्यमी के कानों को प्रभावित करती है. क्रिसिल या ऐसी तमाम रेटिंग एजेंसियां छत पर खड़े हो कर चिल्लाने लगती हैं “भारत में निवेश का माहौल नहीं”. यही कारण है कि भारत में पूंजी-निवेश अपेक्षित दर से नहीं हो सका. यही कारण है कि मोदी के एक पैर विदेश में रहने और वहां के एन आर आई लोगों के पागलपन के हद तक मोदी आगमन में डांस करने के बावजूद देश के इतिहास में पहली बार निर्यात लगातार पिछले ११ महीनों से गिरता जा रहा है।

पार्टी के अति-सम्मानित नेता आडवाणी का रेलवे की “परित्यक्त लाइन” की तरह पार्टी में हाशिये पर रखा जाना न तो कार्यकर्ता ने अच्छा माना न जनता ने. आडवानी-जोशी-यशवंत का पत्र लिखना, सांसद आर के सिंह, कीर्ति आज़ाद और शत्रुघ्न सिन्हा का नेतृत्व के खिलाफ बेबाकी से बोलना अमित शाह नज़रंदाज़ तो कर सकते हैं पर तब उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है।       

मोदी की क्षमता को कम आंकना अपराध होगा. फसल बीमा योजना, स्किल इंडिया, मृदा (खेत) स्वास्थ्य योजना, यूरिया पर नीम की परत प्रधानमंत्री की बेहतरीन समझ का परिचायक है. लेकिन वहीं भूमि अधिग्रहण विधेयक उस अहंकार का परिचायक है जिससे एक अच्छी योजना जो किसानों के बीच मोदी-सरकार को हमेशा के लिए स्वीकार कराती, आज सरकार को किसानों के बीच अप्रिय कर चुकी है. मिनिस्टर रोज सबेरे डरते रहते हैं कि परफॉरमेंस को लेकर पी एम् ओ से सन्देश न आ जाए।

अगर एक तरफ मोदी इतने सबल और अधिनायक व्यक्तित्व के हैं कि अपने मन का अध्यक्ष “निर्विरोध” नियुक्त करवा सकते हैं तो देश का माहौल खराब करने वाले बाबाओं, महंतों, स्वामियों, साध्वियों पर अंकुश क्यों नहीं? अगर देश का विकास फंसा है तो उसका बड़ा कारण इनके माहौल खराब करने वाले वकतव्य हैं।

अगले तीन सालों में मोदी-शाह जोड़ी को इसका जवाब देने होगा अन्यथा “रेपुटेशन” ख़त्म हो जायेगी और भाजपा की गाड़ी बंद हो जायेगी।
 
 
शुक्लपक्ष

Saturday, 23 January 2016

बढ़ती पूंजी, बढ़ती असमानता और बढ़ता सामाजिक तनाव



दुनिया के मात्र ६२ लोगों के पास दुनिया के आधे लोगों की कुल संपत्ति से ज्यादा है. प्रकारांतर से जितना ६२ लोगों के पास है उतना ३५० करोड लोगों की कुल संपत्ति भी नहीं है. कहा तो गया था कि यह आर्थिक सुधार है पर इन २० सालों में फायदा मिला अमीरों को. तीन जानी –मानी आर्थिक आंकलन संस्थाओं ने एक हीं निष्कर्ष निकाला. दुनिया की संपत्ति खिंच कर चंद हाथों में सिमटती जा रही है. और अगर सन २००० से आज तक के आंकड़े प्रतिबिम्ब हैं तो भारत में भी ऊपरी एक प्रतिशत की ओर लगातार यह “लक्ष्मी” भागती जा रही है और ९९ प्रतिशत गरीब होते जा रहे है. कोई ताज्जुब नहीं कि देश के इन ९९ प्रतिशत लोगों का अधो-वस्त्र (चड्ढी) भी इन एक प्रतिशत धन-पशुओं के पास पहुँच जाये और हम नंगे खड़े हों यह मानते हुए कि देश और दुनिया विकास कर रही है. ऑक्सफेम नामक संस्था की “एक अर्थव्यवस्था जो मात्र एक प्रतिशत के लिए है” शीर्षक रिपोर्ट के अनुसार “इस अर्थव्यवस्था में आय और संपत्ति का रिसाव गरीबों की ओर होना था लेकिन इन २० सालों में यह खतरनाक रूप से उपर की ओर तूफ़ान की गति से खींचती जा है”. यही वजह है कि भारत में पूजी बढ़ती जा रही और साथ हीं असमानता भी. एक और ख़तरा. यह एक प्रतिशत अभिजात्य वर्ग इस बात से खुश न हो कि उसकी संपत्ति बढ़ती जा रही है. पांच साल पहले दुनिया की आधी से ज्यादा संपत्ति ३८८ लोगों के पास थी. आज मात्र ६२ लोगों के पास है.


भारत आये दुनिया के जाने-माने अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी ने इस स्थिति पर चिंता जताते हुए इसी हफ्ते एक व्याख्यान में कहा “प्रजातान्त्रिक व्यवस्था ने अगर इस असमानता पर रोक नहीं लगाया तो इसे हल करने के लिए समाज के गैर-प्रजातान्त्रिक रास्ते अपनाने का ख़तरा है”.



अगर गहराई से देखें तो भारत में यह स्थिति नज़र आ रही है. हर रोज़ देश किसी न किसी भावनात्मक मुद्दों से घिरता जा रहा है. ऐसा कोई दिन नहीं होता जब एन नया सामाजिक-भावनात्मक मुद्दा देश की प्रशांत सामूहिक चेतना को इस या उस दिशा में झकझोरता न हो. क्या कुछ दशकों पहले तक भारत में किसी ने इतना सामाजिक तनाव देखा था?



ये तथ्य किसी भी समाज को क्रांति के लिए प्रेरित करने के लिए पर्याप्त कारण देते हैं. यहाँ क्रांति का मतलब खूनी क्रांति से नहीं है बल्कि बल्कि व्यवस्था –परिवर्तन के लिए जन दबाव बनाने से है. लेकिन पूरे विश्व में कहीं धर्म के नाम पर खून बह रहा है तो कहीं अन्य भावनात्मक मुद्दे पर. हैदराबाद का मुद्दा दलित समाज के लिए अति-संवेदनशील हो जाता है. पश्चिम बंगाल में मालदा स्थित कालियाचक में डेढ़ लाख मुसलमान जुटते हैं पर इसलिए नहीं कि उन्हें बेहतर रोजगार , बेहतर शिक्षा मिले बल्कि इस लिए कि एक माह पहले किसी बद-दिमाग हिन्दू स्वयंभू नेता ने उनके धर्म के बारे में १४०० किलीमीटर दूर लखनऊ में कुछ कह दिया है. कभी किसी मुसलमान नेता या दलित नेता को उनकी शाश्वत गरीबी में रहने के खिलाफ लाखों की भीड़ जुटते किसी ने नहीं देखा ना हीं किसी गिरिराज सिंह ने बिहार के गरीबों को लेकर कहा कि भाव रहा तो हम शोषकों को “पाकिस्तान” भेज देंगे. कोई महंत मंदिर न बन पाने के लिए अल्पसंख्यक समुदाय को दोषी मान कर “हिन्दुस्थान में रहना है तो राम –नाम कहना होगा” का नारा देता है. न कोई महंत, न कोई साध्वी, न कोई आज़म न हीं कोई ओवैसी यह बीड़ा उठाता कि कैसे देश की सारी संपत्ति एक आर्थिक चक्रवात में फंस कर एक प्रतिशत के पास क्यों पहुँचती जा रही है. कोई आज़म खान देश का मामला यू एन ओ में उठाने की धमकी देता है तो कोई ओवैसी आतंकी की फांसी पर देश की सर्वोच्च न्यायलय पर सवाल उठा देता है.



यह भारत में क्यों हो रहा है? हमने इस बढ़ती असमानता को प्रजातान्त्रिक तरीके से ख़त्म करने के सार्थक प्रयास नहीं किये. नतीजतन, अपने गुस्से को छोटे-छोटे अतार्किक लेकिन भावनात्मक मुद्दे के जरिये समाज निकल रहा है. आमतौर पर मान्यता रही है कि समाज समय के साथ बेहतर होता है, समता-मूलक समाज बनता है, शोषण ख़त्म होता है, मानव-मानव के बीच विभेद का अंत होता है और प्रताड़ना के स्थूल तरीके बंद होते हैं याने गोदान की झुनिया-सिलिया -गोबर-होरी और मालती—मेहता-मातादीन के बीच खाई कम होती जाता है और कोई मातादीन पैसे के बल पर सिलिया के यौवन पर कामुक नज़र नहीं डालता.        



हमने विश्व में नयी आर्थिक नीति शुरू की. आर्थिक उदारवाद, नव –आर्थिकवाद, अर्थ-व्यवस्था का वैश्वीकरण और न जाने क्या-क्या नाम दे कर. भारत में ने भी इसे सन १९९१ में अंगीकार किया. हमें बताया जाता रहा कि भारत जी डी पी (सकल घरेलू उत्पाद) में स्तर पर इस दौरान तीसवें पायदान से कूद कर नवें स्थान पर आ गया है. कुल जी डी पी २.०८ ट्रिलियन डालर हो गई है. जी डी पी विकास दर को देश की नियति का पैमाना बताया जा रहा है. किसी ने यह नहीं बताया कि सन २००० में जहाँ देश एक प्रतिशत संपन्न लोगों के पास देश की ३७ प्रतिशत संपत्ति थी, सन २००५ में वह बढ़ कर ४२ प्रतिशत, सन २०१० में ४८ प्रतिशत, सन २०१२ में ४८ प्रतिशत और अब सन २०१४-१५ में ५२ प्रतिशत हो गयी है. एक अन्य आंकडे के मुताबिक देश के एक प्रतिशत के पास आज ७० प्रतिशत संपत्ति है.



कृषि-आधारित समाज, सामंतवादी समाज में राजशाही में शोषण के स्थूल तरीके रहे. गरीब किसानों से सामंती लोग चाबुक मार कर शोषण करते रहे और उनकी बहू-बेटियों पर कामुक नज़र डालते रहे. पर अगर ७० साल के “लोकतंत्र” और स्व-शासन में भी एक प्रतिशत बनाम ९९ प्रतिशत के बीच चाकू-खरबूजे का रिश्ता बना रहा तो बदला क्या ? हाँ, एक खास बात यह हुई है इस दौरान कि अब हमें अपना शोषण भी पता नहीं चलता. बाजारों ताकतों ने हमारे मन-मस्तिष्क पर एक घाना कोहरा डाल दिया है और हम सोच भी नहीं पा रहे हैं कि पिछले २० वर्षों से हर ३६ मिनट पर एक किसान क्यों मर रहा है , और इन २० सालों में हीं हर रोज़ २०५२ किसान क्यों खेती छोड़ कर मजदूरी करने लगा है. हैरानी की बात यह है कि इतना अभाव होने की बाद भी समाज में दृष्टिगोचर और असली मुद्दे को लेकर कोई गुस्सा नहीं है , ना हीं व्यवस्था बदलने की तड़प. वह इस बात से खुश है कि वह भी अपने इन्टरनेट-समर्थ मोबाइल में फ़िल्में, कई बार ब्लू फ़िल्में देख सकता है. देश में जितने लोग शौच के लिए खेत में या सड़क के किनारे जाते हैं उन सभी के हाथों लोटे के साथ नेट-समर्थ मोबाइल है.



पुराना सिद्धांत है किसी समाज की सोचने की ताकत छीननी हो तो उसे नशे में डाल दो. आज मुसलमान समाज इस बात से नाराज़ नहीं है कि उसके समान हीं दलित समाज के लोगों को रोज़गार मिला कि नहीं. उसकी चिंता है किसने उसके घर्म के खिलाफ कुछ कहा. दलित समाज का अभिजात्य वर्ग आरक्षण नहीं छोड़ना चाहता ताकि वह भी “उच्च जाति के लोगों की तरह” लम्बी गाड़ी और पांच सितारा होटलों में शाम गुजरे.              



व्यवस्था से जुड़े लोगों को सोचना होगा कि किस तरह “आर्थिक नीति” को जनोन्मुख किया जाये अन्यथा भावनात्मक मुद्दे समाज के क्रोध का सबब बनेंगे जिन्हें हल करना राज्य अभिकरणों की सामर्थ्य से बाहर है.

lokmat

Saturday, 16 January 2016

सेक्युलर (धर्मनिरपेक्ष) होने का स्वांग और भारतीय मीडिया




अपने को धर्म-निरपेक्ष होने अर्थात बौद्धिक ईमानदारी का ठप्पा लगवाने के लिए ज्यादा मेहनत करने की ज़रुरत नहीं होती. अगर आपके नाम के अंत में सिंह, शुक्ला, जाटव, यादव लगा है या पहले विकास, रामचंद्र या सुच्चा लगा है और संघ, हिन्दुत्त्व, भारतीय जनता पार्टी , बहुसंख्यक अवधारणाओं या फिर हिन्दू देवी देवताओं के खिलाफ बोल सकते है तो आप सेक्युलर हैं. यह मान लिया जाएगा कि आप बौद्धिक रूप से ईमानदार है और चूंकि बौद्धिक रूप से ईमानदार हैं तो आर्थिक, सामाजिक, चारित्रिक रूप से गलत हो हीं नहीं सकते. और कहीं अगर आप इससे भी सहज रास्ते से सेक्युलर होना चाहते हैं तो किसी आज़म, किसी ओवैसी या किसी फायरब्रांड मौलाना की बात को सही ठहराइये. आप की सेकुलरिज्म चमक जायेगी. और अगर सेकुलरिज्म चमक गयी तो बाकि सारी योग्यताएं आपके खाते में बोनस के रूप में होंगी.

भारतीय चिंतन परम्परा में सीधे सोचने, बेबाकी से तथ्यों को देखने या निरपेक्ष रूप से विश्लेषण करने की पद्धति शायद विलुप्त सी हो गयी है. एक बुद्दिजीवी या तो ताउम्र इस धारा का होता है या उस धारा का. जो दादरी घटना में अखलाक की मौत पर क्रुद्ध हो कर देश के धर्मनिरपेक्ष तानेबाने के टूटने की आशंका पर जार-जार आंसू बहता है और बहुसंख्यक हिन्दुओं के खिलाफ आग उगलता है क्या मजाल कि वही व्यक्ति पश्चिम बंगाल के मालदा स्थित कलियाचक कस्बे में अल्पसंख्यकों (उस क्षेत्र में बहुसंख्यक) द्वारा थाने पर हमला करने और रिकॉर्ड जलाने, तन्मय तिवारी के पैर में गोली मारने और एक १३ वर्षीय हिन्दू बालिका को पीटने का निंदा उसी क्रोध-मिश्रित तर्क के साथ करे.  मैं यहाँ प्रत्रकारीय सीमा का अतिक्रमण कर रहा हूँ. आज की पत्रकारिता में हिन्दू आक्रान्ता का नाम तो लिया जा सकता है लेकिन गलती से भी “मुसलमान” शब्द कहना या मुस्लिम हमलावरों के नाम लेना गलत माना जाता है. अख़लाक़ को मारने वाले हिन्दू ठाकुर थे यह कह सकते हैं लेकिन तन्मय को गोली मार कर किसने घायल किया यह नहीं. हिंदू लड़की से अगर किसी मुसलमान लड़के ने बदतमीजी कि तो लडकी का नाम तो ले सकते हैं पर गलती से मुसलमान आरोपी का नहीं. इससे हमारी “सेक्युलर” फैब्रिक्स खराब होती है. इसीलिये हम उसे “एक अन्य समुदाय का” लिखते हैं.  

अख़लाक़ को जिन लोगों ने मारा वे भी लम्पट अपराधी थे. राम भक्त तो कहीं से नहीं हो सकते. समाज के दुश्मन थे लेकिन क्या इस “सेक्युलर ब्रिगेड” को यह समझ में नहीं आता कि कालियाचक में जिन डेढ़ लाख मुसलमानों की भीड़ में से हीं कुछ निकल कर थाने पर हमला कर रहे थे या तन्मय के पैर पर गोली मार रहे थे वे भी अल्लाह की इबादत नहीं कर रहे थे. देश भर के आम मुसलमानों से पूछिए तो वह कालियाचक के हिंसा की भी निंदा करता है और दादरी की भी. आम हिन्दू भी यही करता है. उसे ना तो कालियाचक का उपद्रव सुहाता है न हीं अख़लाक़ का मारा जाना. फिर यह बात “सेक्युलर ब्रिगेड” को क्यों नहीं समझ में आती? जिस कुरआन-ए-पाक में “अह्दिनास सिरातुल मुस्तकीम ”ऐ खुदा, मुझे सीधा रास्ता दिखा” कह कर ईश्वर का आह्वान किया गया हो वह मालदा की घटना की इज़ाज़त तो कतई नहीं देता.  

इसमें कोई दो राय नहीं है कि मीडिया में भी ऐसे तत्व हैं जो “सत्य” अपने हिसाब से गढ़ते हैं. यही वजह है कि आज कालियाचक को मीडिया में वह प्राथमिकता नहीं मिलती जो अख़लाक़ की हत्या को दी  गयी. उत्तर प्रदेश में हिन्दू महा सभा का कमलेश तिवारी अगर देश की व्यवस्था के लिए ख़तरा है तो क्या इदारा-ए-शरिया जिसके आह्वान पर मुसलमान कालियाचक में इकट्ठा हुए थे को इंसानियत का अलमबरदार कहा जा सकता है? कमलेश ने सलालिल्लाहे अलेहे वसल्लम मुहम्मद साहेब के बारे में बेहूदी बाते कही तो क्या इस इदारे के लोगों को थाना जलाने का या तन्मय को गोली मारने का लाइसेंस मिल गया?

क्यों नहीं भारत की मीडिया जो दिन-रात हांफ –हांफ कर अख़लाक़ के मरने पर भारत सरकार का मर्सिया पढती रही (जब कि मोदी सरकार का उससे कुछ लेना देना नहीं था) और “सब कुछ लुट रहा है” के भाव में देश के बहुसंख्यक वर्ग की लानत-मलानत करती रही, कालियाचक में भी उसी शिद्दत से रिपोर्टिंग कर रही है? भारत सरकार के एक मंत्री ने कहा “अख़लाक़ की हत्या आपराधिक घटना है”. मंत्री का यह बयान गलत था. मारने वाले अख़लाक़ के यहाँ चोरी करने या डाका डालने नहीं गए थे. लिहाज़ा देश भर के  “सेक्युलर” मीडिया ने और सेक्युलर बुद्दिजीवियों ने उस मंत्री को जी भर के कोसा. अच्छा लगा. पर जब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी कलियाचक की घटना भी ठीक यही बयान दिया तो अचानक “सेक्युलर ब्रिगेड” को क्यों सांप सूंघ गया?

जिन्होनें अख़लाक़ की हत्या में देश का “संवैधानिक सेक्युलर” ताना-बाना टूटता देखा और प्रतिक्रया में अपने अवार्ड वापस किया क्या उनमें से एक भी ऐसा नहीं है जो जन-धरातल पर आ कर फिर कोई अवार्ड वापस करे?  पश्चिम बंगाल तो बुद्दिजीवियों का गढ़ रहा है. कहाँ गए वे सारे दर्ज़नों बुद्दिजीवी, वो आमिर खान जिसकी पत्नी को इतना डर पैदा हो गया कि वह आमिर को देश छोड़ने की सलाह देने लगी? कैसे हो जाती है एक घटना “इनटोलरेंस” की पराकाष्ठा और दूसरी मात्र आपराधिक घटना. क्या इस घटना के बाद कालियाचक के अल्पसंख्यक हिन्दुओं में भी वही दहशत नहीं होगी जो आमिर को दादरी की घटना के बाद हुई? क्या उन हिन्दुओं की सुरक्षा को लेकर के लिए बुद्दिजीवियों का भाव अलग होना चाहिए? आखिर तन्मय को गोली शरीर के उपरी भाग में भी लग सकती थी और वह भी अख़लाक़ की गति को प्राप्त हो सकता था?  

जब कांग्रेस सरकार में आये और इस “सेक्युलर ब्रिगेड” के बुद्दिजीवियों को तमाम संस्थाओं का चेयरमैन बनाये तो वह धर्म-निरपेक्षता को मज़बूत करता है लेकिन अगर भारतीय जनता पार्टी उन्हीं पदों पर प्रतिष्ठित लेकिन एक खास विचारधारा के हिमायती लोगों को ले आये तो वह भारतीय “गंगा-जमुनी” संस्कृत पर हमला.  

देश में स्वतंत्र, पूर्वाग्रह-शून्य विचारकों की बेहद टोटा है. सब खेमे में बटें हुए हैं. नतीजतन आज देश में संवाद को सही दिशा नहीं मिल पा रही है.


jagran

Wednesday, 30 December 2015

मोदी की लाहौर यात्रा: समाधान की अनूठी पहल


  
आइन्स्टीन ने कहा था “उन महत्वपूर्ण समस्याओं का जिन्हें हम झेल रहे हों, समाधान कभी नहीं निकल सकता हम अगर अपनी सोच का स्तर वही रखते हैं जिस स्तर पर हमने उन समस्याओं को पैदा किया था”.  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लाहौर यात्रा को इस परिप्रेक्ष्य में देखेंगे तो एक रास्ता दिखाई देता है –--न केवल एक ऐसी भारत-पाकिस्तान तनाव समस्या का जिसका समाधान ७० साल में अब असम्भव सा लगता है, बल्कि दुनिया में दौत्य सबंधों को औपचारिकता के बाँझ चंगुल से निकालने का.    

निष्पक्ष विश्लेषकों के लिए एक बड़ी समस्या तब खडी होती है जब कोई रानीतिक दल या कोई नेता सत्ता सञ्चालन में परंपरागत फॉर्मेट से हट कर अपना आचरण करने लगता है. यह विवेचना और मुश्किल होती है जब विवेचना काल अल्प हो और नेता का परफॉरमेंस इसी अल्पावधि में तय करना हो.  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राजनीति के कई पैरामीटर्स बदल डाले. इनमें से कुछ विरोधाभासी हैं. ट्विटर पर अति-सक्रिय लेकिन कई तात्कालिक मुद्दों पर चुप्पी, आक्रामक हिंदुत्व के अलंबरदारों पर लगाम नहीं लेकिन मंत्रियों पर काम करने का दबाव. काबुल में पाकिस्तान के रवैये पर अफ़सोस पर कुछ हीं मिनटों में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के जन्म-दिन पर लाहौर आ कर बधाई देना. 

बिरले नेता होते हैं जो लीक से हट कर समस्याओं का निदान सोचते हैं. स्वतंत्र भारत में शायद नरेन्द्र मोदी पहले नेता हैं जो फॉर्मेट से हट कर सोच रहे हैं. गौर कीजिए. टेलीफोन पर बातचीत में मोदी द्वारा जन्म दिन की बधाई देने पर नवाज़ साहेब का उन्हें घर आने का न्योता देना वह भी कुछ इस तरह “जी मैं तो लाहौर आ गया हूँ “. मोदी: “अरे, वहां क्या कर रहे हैं?” “जी मेरे बेटी की बेटी की कल शादी है, तैयारी में लगा हूँ. आप तो दिल्ली लाहौर के उपर से हीं जायेंगे, क्यों न कुछ देर के लिए यहाँ हो कर जाएँ.”. मोदी, “अरे आप को दिक्कत होगी”. नवाज़ “नहीं जनाब, मुझे तो बहुत खुशी होगी”. मोदी : ठीक है में आता हूँ”.         

जरा सोचिये. कोई दूसरा नेता होता तो दस बार सोचता कि अगर हम जायेंगे तो भारत में इसकी क्या प्रतिक्रिया होगी. वह अफसरों को बुलाता. वे अफसर प्रोटोकॉल की दुनिया भर की समस्याएं बताते, राजनीति में यह कदम कैसा होगा इस पर “लाल बुझक्कड़ बैकरूम बॉयज घंटों सोचते और फिर न जाने की सलाह देते. सुरक्षा से जुड़े लोग तो साफ़ हीं मना करते यह कह कर फलां फलां आतंकी गुट वहां सक्रिय है और उनके पास राकेट लांचर हैं. आगे कहते “दोनों हीं परमाणु बम समर्थ देश हैं लिहाज़ा इस तरह के “एड्वेंचरिस्म” से बचना चाहिए. और यही पिछले ७० साल से होता रहा है. कुछ लोग प्रथम  विश्व युद्ध होने के मूल कारण तक याद दिलाते. कुल मिलाकर भारत के प्रधानमंत्री यह नहीं कर पाते जो उन्होंने किया.

बहरहाल अब इस यात्रा का विश्लेषण. पिछले ७० साल में हम तथाकथित “प्रोटोकॉल-निष्ठ” डिप्लोमेसी करते रहे और हमें चार युद्ध झेलने पड़े. दोनों देशों की बीच तनाव बढ़ता हीं रहा. कभी हमने सी बी एम --“कान्फिडेंस बिल्डिंग मेजर” (विश्वास संवर्धन उपक्रम)—के नाम पर राजनयिक चारागाह में हरी घास चरी तो कभी बेक-चैनल डिप्लोमेसी (पिछवाड़े से दौत्य सम्बन्ध का प्रयास) के नाम पर कुछ नॉन-स्टेट एक्टर्स (गैर-राजकीय लोग) को धंधे से लगाये रखा. लेकिन रिजल्ट वही “ढाक  के तीन पात”.

भारत-पाकिस्तान संबंधों को लेकर आज हम दो बातें साफ़-साफ़ कह सकते हैं. पहला : फॉर्मल (औपचारिक) और फार्मेटेड ( तयशुदालीक पर चलने वाली) राजनयिक प्रक्रिया असफल रही और दूसरा : पाकिस्तान चूंकि एक प्राकृतिक राज्य का चरित्र नहीं रखता और इस देश में कई सस्थाएं --- सैन्य प्रतिष्ठान, आई एस आई, कट्टरवादी तत्व और राजनीतिक प्रशासन-- एक दूसरे के खिलाफ काम करती हैं, लिहाज़ा हमें दोनों तरफ जन -दबाव बना पडेगा ताकि गैर –राजनितिक संस्थाओं की सदर्भिता हीं ख़त्म हो सके. जो भारतीय पाकिस्तान जाते रहे हैं उन्हें मालूम होगा कि जहाँ तक पाकिस्तान की जनता का सवाल है वे भारत के लोगों से बेपनाह मुहब्बत करती है. मैं कई बार यह आजमा चुका हूँ (कराची और लाहौर में रेस्त्रां मालिक खाने का पैसा लेने से मना कर देता है और टेक्सी वाला भाडा, इस्लामाबाद में किसी के घर जाइये तो पड़ोसी तक आकर कुछ भेट नज़र करते हैं अगर पता चल जाये कि हम हिंदुस्तान से है. अगर कुछ नाराजगी है तो वह उन अफवाहों के आधार पर जो आई एस आई ने अपने देश की जनता के बीच भारत के खिलाफ गलत-वीडियो बाँट कर दिखाई है.  

मोदी ने लाहौर जा कर जो किया उसे न केवल पाकिस्तान के विपक्षी दलों ने सराहा बल्कि वहाँ की आम जनता में “भारतीयों के प्रति मुहब्बत” की एक लहर दौड़ गयी. नवाज शरीफ अपने देश में मजबूत हुए. भारत की आम जनता ने भी इसे अच्छा, उदार और स्टेट्समैन की तरह का व्यवहार माना. कांग्रेस से भी अपेक्षा थी कि गरिमा दिखाते हुए इस यात्रा की  आलोचना सकारात्मक ढंग से करे.

इस यात्रा के खिलाफ बोलने वालों को कुछ तथ्य समझने होंगे. पाकिस्तान भौगोलिक पडोसी है और भूगोल बदला नहीं जा सकता. युद्ध रास्ता नहीं है और युद्ध विकास के मद्देनज़र भारत को ज्यादा नुक्सान करेगा पाकिस्तान तो अभी विकास के रास्ते पर भी नहीं है. पाकिस्तानी सेना, कट्टरपंथियों और आई एस आई को सन्दर्भ-विहीन करने के लिए पाकिस्तानी जनमत का दबाव बनाना ज़रूरी है.

दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि भारत में मीडिया का एक प्रमुख वर्ग भी “हाकिश” (बाजनुमा) तेवर अपना लेता है यह बगैर जाने हुए कि भारतीय सैनिकों का सर काटने में नवाज़ शरीफ की कितनी भूमिका है. पाकिस्तान के राज्य के चरित्र को न जानने के कारण भारत की मीडिया का एक वर्ग “हम पाकिस्तानियों को रौंद देंगे” के भाव मे स्टूडियो में हीं ऐठने लगता है.


बहरहाल भारत के प्रधानमंत्री ने “भावनात्मक परराष्ट्र नीति” (इमोशनल डिप्लोमेसी) की नयी शुरूआत की है क्योंकि अन्य सभी औपचारिक परराष्ट्र नीति पाकिस्तान के सन्दर्भ में असफल रही है. एक अच्छा प्रयास है. लेकिन एक सतर्कता बरतनी जरूरी है. इसे असफल बनाने के लिए पाकिस्तान के कट्टरपंथी और आतंकवादी समूह जल्द हीं कोई हमला करके हमारे कुछ सैनिकों को मार सकते हैं. इससे भारत में  मोदी के इस डिप्लोमेसी की एक ओर निंदा शुरू हो जायेगी. लेकिन इससे भी बड़ा दूसरा ख़तरा यह है कि चूंकि इस नए किस्म के डिप्लोमेसी में भावना का अतिरेक है लिहाज़ा अगर कभी भारतीय लोगों को किसी हमले से जन हानि हो भी तो प्रतिक्रिया भावनात्मक याने “दो के बदले दस” की नहीं होनी चाहिए बल्कि बेहद “मेजर्ड” (नाप-जोख कर) सरकार की या सेना की प्रतिक्रिया होनी चाहिए. अगर हमने भी दो के बदले दस “ का भाव अख्तियार किया तो आतंकवादी पाकिस्तान में सफल हो जायेंगे और “बाजनुमा” लोग भारत में. और तब नवाज़ शरीफ भी हार जायेंगे और मोदी का “नया प्रयोग भी”.
patrika