Wednesday, 28 October 2015

गाय पर विवाद के पीछे कई तर्क-शास्त्रीय दुराग्रह




देश की राजधानी दिल्ली से सटे दादरी में हिन्दुओं ने गाँव के हीं एक मुसलमान परिवार के घर पर हमला किया, परिवार के मुखिया को मार दिया और बेटे को गंभीर रूप से घायल कर दिया. उनका मानना था कि उस परिवार ने गौ मांस पकाया और सेवन किया है. इसके एक हफ्ते के भीतर हिमांचल में ट्रक में गौ लेकर जा रहे एक मुसलमान युवा लोगों ने पीटकर मार डाला. तीसरे हफ्ते  कर्नाटक के मंगलुरु के होसाबट्टू में पुजारी नाम के एक फूल विक्रेता को कुछ मोटरसाइकिल सवारों ने मार दिया. यह युवक बजरंज दल से जुड़ा था और गौ-ह्त्या और ख़ास कर वध-शालाओं को लेकर सक्रिय था. पूरे इलाके में उपद्रव शुरू हो गया. पूरे देश में गौ –हत्या और गौ-वंश के वध को लेकर एक अजीब उन्माद फैला हुआ है जो कहीं न कहीं भारत के विकास याने “स्किल इंडिया” , “मेक-इन इंडिया” या “डिजिटल इंडिया” की अवधारणा की ऐसी तैसी कर रहा है. हम विकास करने की जगह एक आदिम सभ्यता की ओर बढ़ते जा रहे हैं.      

गौ हत्या और गौ -मांस का सेवन किस काल-खंड में होता रहा है या नहीं होता रहा है, और अब इसके प्रति किस धर्मावलम्बियों की क्या भावना है और क्या इसे अन्य धर्मों के लोगों को आदर करना चाहिए, इस पर एक नया विवाद छिड़ गया है. लेकिन हर शोधकर्ता वह वामपंथी विचारधारा का हो या दक्षिणपंथी  विचार का, यह मानता है कि पिछले २५०० साल में हिन्दू धार्मिक ग्रंथों, परम्पराओं या नियमों ने इसे निषिद्ध किया और गाय को सम्मान का दर्ज़ा और गोवंश को आदर का भाव दिया. प्रश्न यह है कि अगर किसी समाज में ढाई हज़ार साल से एक आस्था विकसित हुई है तो क्या वह उस समाज के लिए कानून से बड़ा दर्ज़ा नहीं रखती? अगर किसी १३०० साल के धार्मिक आदेशों के सम्मान के लिए भारत के संविधान में समान नागरिक संहिता प्रभावकारी बनाने के लिए राज्य को शक्तियां नहीं दी गयी (और इसे नीति-निर्देशक तत्वों में रखा गया है)  तो क्या हिन्दुओं की इस आस्था के प्रति राज्य का कर्तव्य अलग हो जाता है ? और क्या अन्य धर्मों के लिए भी उतना हीं उचित नहीं कि इस आस्था का सम्मान करें ताकि कि पारस्परिक सहभाव व शांति बनी रहे?      

उधर तर्कशास्त्र की एक परेशानी है यह कि तर्क-कर्ता अगर निरपेक्ष न हो तो अपने मतलब का तथ्य लेकर उसे वजन दे कर अपनी अवधारणा को सिद्ध कर सकता है. ऐसा करना तब और आसन हो जाता है जब अपवाद स्वरुप कुछ तथ्य मिल जाएँ.  एकेडेमिक दुनिया में अपवाद को लेकर मूल अवधारणा को गलत करार देना और इसे शोध की संज्ञा देना सहज होता है बगैर यह जांचे हुए कि अपवाद का मूल कारण क्या था. “प्राचीन सत्य” को ढूँढने में एक अन्य समस्या यह है कि किस काल खंड का तथ्य तर्क-वाक्य में शामिल किया जाता है इसे भी देखना चाहिए. तीसरी प्रमुख समस्या है सामजिक –सांस्कृतिक व भावनात्मक मुद्दों पर अदालत के फैसले. अगर सन १९५९ में सुप्रीम कोर्ट ने १६ साल के ऊपर की गाय का वध इस आधार पर सही ठहराया कि यह अनुत्पादकता हो जाती है और चारा और अन्य संसाधनों पर भार पड़ता है तो सन २००५ में उसी अदलत ने इस फैसले को उलटते हुए गौ-हत्या पर पाबंदी लगाई. अदालत ने पशु सम्बंधित राष्ट्रीय आयोग की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा “यह तर्क स्वीकार नहीं किया जा सकता कि १६ साल के उम्र के बाद गाय और बैल बेकार (यूजलेस) हो जाते हैं. वे जीवन –पर्यंत गोबर और मूत्र देते हैं जिससे बायो-गैस और खाद बनता है. एक बूढा बैल अपने इस काल में प्रतिवर्ष पांच टन गोबर और ३४३ पौंड मूत्र देता है जिससे २० ठेला कम्पोस्ट खाद बनाया जा सकता है”.        

इतिहासकार डी एन झा ने एक लेख में लिखा है कि वैदिक काल में गौमांस न केवल खाया जाता था बल्कि मेहमाननवाजी का चरम माना जाता था. उन्होंने याज्ञवल्क्य के कथन का हवाला दिया जिसमें (उनके अनुसार) ऋषि ने गौमांस अपनी पसंद बताई थी.

हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि उत्तर –मौर्य काल में इस पर पाबंदी लगने लगी और बाद में इसे पूर्ण  रूप से हिन्दुओं के लिए निषिद्ध किया गया.

           
                हिन्दुओं की चिंता सही पर हिंसा गलत
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हमारे देश में तीन तरह के बुद्धिजीवी हैं. एक जो भारत में हजारों साल पहले “विमान बनाने की क्षमता थी” या “गणेश जी के मुंह की ग्राफ्टिंग कर प्राचीन शल्य चिकित्सकों ने हाथी का सूंढ़ लगा दिया” के अतार्कि और अवैज्ञानिक “ (अंध?) विश्वास” को भारत पर थोपना चाहते हैं और अखंड भारत के रूप में इस देश का क्षेत्रफल फिर से ३२.८० लाख वर्ग किलोमीटर से बढा कर ८० लाख वर्ग किलोमीटर करने के लिए वर्तमान दुनिया के आठ देशों को भारत में समाहित करने के लिए तर्क और उत्साह पैदा कर रहे हैं याने पाकिस्तान, नेपाल , बर्मा, अफगानिस्तान सब अखंड भारत में मिलाने का ज़ज्बा लिए घूम रहे हैं. उन्हें मोदी के नए भारत के विकास से ज्यादा हिन्दू राष्ट्र बनाने की चिंता है. दूसरे बुद्धिजीवी वो हैं जो हिन्दू शब्द सुनकर हीं ऐसा भड़कते हैं जैसे सांड को लाल कपड़ा दिखा दिया गया हो. उनके लिए हिन्दू कुछ भी करे वह गलत है. गौ मांस खाना इस वर्ग का जन्म सिद्ध अधिकार है हिन्दुओं की भावना भड़के तो भड़के, लेकिन वहीं अगर कोई मुसलामनों के आराध्य मुहम्मद साहेब सलाल्लाहु अलहए वसल्लम का अक्स बना दे (जो उसकी सकारात्मक अभिव्यक्ति भी हो सकती है ) तो वह कट्टरवादी. इसी बीच एक तीसरा वर्ग बुद्धिजीवियों का है जो निरपेक्ष भाव से स्थिति का विश्लेषण करता है जैसे बसहरा गाँव में मुसलमान की हत्या को गलत बताता है तो वहीं इस्लाम में पुनर्समीक्षा के अभाव को इस्लामी कट्टरपंथ का मूल कारण बताता है. यह वर्ग ना तो संघ को ना हीं सत्ता पक्ष को सुहाता है ना हीं “सेकुलरवादी बुद्दिजीवियों को”.

 उत्तर-मौर्य काल में और खासकर तत्कालीन ब्राह्मण ग्रंथों में भोजन के लिए गौ हत्या को गलत ठहराना शुरू हुआ और धर्मग्रंथों ने गौ-हन्ता को समाज से बहिष्कार करना का प्रावधान किया. व्यास-स्मृति में इसे पूर्णरूप से निषिद्ध किया गया. मध्ययुगीन भारत में गौ –हत्या हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच तनाव का बड़ा कारण रहा. सैकड़ों सांप्रदायिक दंगे गोकशी को लेकर होते रहे.

अगर कोई लेखक यह स्वीकार करता है कि पिछले कम से कम ढाई हज़ार साल से गाय को पवित्र मानते हुए इसकी पूजा की जाने लगी और हत्या निषिद्ध की गयी तो फिर क्या यह उचित नहीं कि आज हिन्दुओं की इस भावना का सम्मान किया जाये? यहाँ पर किसी जस्टिस काटजू को या किसी शोभा डे को व्यक्तिगत आजादी की याद आ जाती है. देवी दुर्गा की नंगी पेंटिंग बनाना फ़िदा हुसैन की अभिव्यक्ति की आज़ादी का नमूना है लेकिन मुहम्मद साहेब का कार्टून बनाने पर फ़्रांस में हमला करना उचित हो जाता है.

आइन्स्टीन के अनुसार किसी समस्या को सोच के उसी स्तर पर सुलझाना जिस सोच के स्तर पर हमने इसे खड़ा किया था संभव नहीं. लिहाज़ा “उस वर्सेज देम (हम बनाम वो) के भाव से यह समस्या दूर नहीं हो सकेगी. लेकिन अगर दूसरा पक्ष पहले पक्ष की भावना की कद्र रंचमात्र भी नहीं करता तो पहला पक्ष उसे कब तक बर्दाश्त कर सकता है?  

मैंने ऋग्वेद पढ़ा और पाया पूरी ग्रन्थ में गौ को लेकर आदर का भाव है और इसकी हत्या या भोज्यता को वर्जना के भाव से देखा गया है. बल्कि कई जगह इसे स्पष्ट रूप से निषिद्ध भी किया गया. लेकिन चूंकि यह वेद कोई एक दिन या दस वर्ष में नहीं लिखा गया है बल्कि हजारों साल का सामाजिक , अभ्यास, सोच और दर्शन का संकलन है लिहाज़ा विश्लेषक को यत्र-तत्र वह सब भी मिल जाएगा जो वह अपनी बात खडी करने के लिए चाहता है. डा. अम्बेदकर हों या अन्य साम्यवादी विश्लेषक सभी ने इसी तर्क-दोष का सहारा लिया.

उदाहरण के लिए : ऋग्वेद, अथर्ववेड और यजुर्वेद तीनों में अश्वमेध हीं नहीं पुरुषमेध का ज़िक्र है. अब इसको लेकर कोई विश्लेषक कह सकता है कि वैदिल काल में न केवल अश्व की बलि बल्कि पुरुष की बलि भी दी  जाती थी. लेकिन पूरे काल में और बाद में एक भी ऐसी घटना नहीं है और दरअसल पुरुषमेध कर्मकांड में प्रतीक के रूप में था. महाभारत काल में स्थिति यहाँ तक आयी कि अहिंसा को सबसे बड़ा कर्तव्य और शाकाहार को सबसे बड़ी शिक्षा बताया गया”.

ऋग्वेद मंडल १० सूक्त (८६-१४) :
उक्षणो ही मे पञ्चदश साकं पचन्ति विन्शतिम,
(इंद्र कहते हैं ---इन्द्राणी द्वारा प्रेरित याज्ञिक मेरे लिए १५ या २० बैल पकाते हैं, उन्हें खाकर मैं मोटा होता हूँ ) केवल इतना हीं पढ़ कर कोई यह कह सकता है कि बैलों के मांस से इंद्रा को भजन का आह्वान किया जाता था. लेकिन अगर किओ भी इसकी संदर्भिता देखे तो वह पायेगा कि इस दशम मंडल के ८६वें सूक्त में सभी श्लोकों --ऋचा १ से लेकर २३ तक—में इंद्रा –इंद्राणी संवाद में इंद्राणी वृषाकपि के खिलाफ इंद्र से शिकायत कर रही हैं. यह उसी सन्दर्भ में है. इसी सूक्त में और इसी संवाद में इस बात पर चर्चा है कि मैथुन की क्षमता के लिए लिंग का स्वरुप कैसा होना चाहिए. ज़ाहिर है यह सब उस काल-खंड का और उस क्षेत्र का है जहाँ तथाकथित अ-वेदी समाज (जिसे राक्षस कहा गया है) रहता था और यह ऋगवेद में प्रक्षिप्त किया गया है या मूल आत्मा से भिन्न है.    

लेकिन उसी मंडल के आगे वाले याने ८७ वें सूक्त में अग्नि से प्रार्थना की गयी है कि मांस-भक्षी राक्षसों को काट कर अपने मुंह में रख लें”.

उसी मंडल के उसी सूक्त के श्लोक १७ वें में अग्नि देवता से प्रार्थना है कि राक्षसों को गाय के अमृत -तुल्य दूध को पीने पर उनके मर्मस्थल को जला दें.

ऋग्वेद के हीं मंडल ६, सूक्त २८ (१) को देखें :

आ गावो अग्मन्नुत भद्रमक्रन्त्सीदन्तु गोष्ठे रणयंत्वसमे.......
(गाय हमारे घर आवें और हमारा कल्याण करें , वे हमारी गौशाला में बैठें एवं हमारे ऊपर प्रसन्न हों”).

ऐसे में यह मान लेना को गौ मांस खाना वैदिक काल में प्रचलित था गलत होगा. हाँ चूंकि हजारों साल की परम्पराएँ और अभ्यास का समावेश ऋग्वेद में या अन्य वेदों में है लिहाज़ा किसी काल- या खंड विशेष में बैल- वध को मान्यता मिली देखी जा सकती है. लेकिन ऊपर का वर्ग इसे हमेशा वर्जित करता रहा है. और गौ को माता का दर्ज़ा अपने अपने रूप में देता रहा है. दरअसल जैसे जैसे वन्य क्षेत्र से समतल में बसना शुरू हुआ जीव हत्या से समाज दूर होने लगा और कृषि तक आते आते गौ वध पूर्णरूप से निषिद्ध हो गया. लेकिन चूंकि यह परिवर्तन हजारों साल में हुआ लिहाज़ा कहीं कहीं वेदों में गौ वध और गौमांस के प्रचालन का ज़िक्र मिल जाता है. लेकिन यह वैदिक काल की मूल आत्मा के अनुरूप नहीं बल्कि अपवाद स्वरुप है.   

अथर्ववेद की यह ऋचा (९-१५-४ ) देखें.

“उप ह्वये सुदुघाम धेनुमेता सुहस्तो गोधुगुत दोहदेनाम
श्रेष्ठं सवं सविता साविषन्नो अभीद्धो घर्मस्तदु षु प्र वोचत
(शोभन हाथों से गाय को दुहने वाला मैं सरलता से दुही जाने वाली गाय का दूध दुहता हुआ उसे अपने समीप बुलाता हूँ. सविता मुझे श्रेष्ठ गौ प्रदान करें. उसी में तेजस्वी धर्म का कथन भी है.)

अगले श्लोक में भी गाय को यजमान ने अपना सौभाग्य माना है. लिहाज़ा यह कहना कि गौ मांस वैदिक समाज में “प्रचलित” था, सत्य को नकारना होगा.        


स्वयं डॉ अम्बेडकर ने जिन्होंने एक लेख लिख कर यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि वैदिक काल में भी एक वर्ग गौ मांस खाता था का कहना ने कहा और इस लेखक ने भी उनकी तस्दीक की कि ऋग्वेद में गाय को रूद्र की माँ, वासु की पुत्री और आदित्य की बहन और अमृत का केंद्र कहा गया है. जब कि एक अन्य जगह गे को देवी की संज्ञा दी  गयी है और अघन्य माना गया है.    

shuklapaksha

Saturday, 24 October 2015

विकास के बढ़ते पैमाने फिर भी समाज बीमार


पिछले  दिनों में दिल्ली में लगातार 48 घंटों में ढाई साल और पांच साल के बच्चियों से बलात्कार और एक अन्य  केस में बलात्कार के बाद पाशविक रूप से हत्या के मामले आये.  इसके ठीक बगल के हरियाणा राज्य के समृद्ध फरीदाबाद में दलितों के घर हमला कर दो मासूम बच्चों को जिन्दा जलाया गया सवर्णों द्वारा. दिल्ली या हरियाणा  में प्रति-व्यक्ति आय, शिक्षा का स्तर और मानव विकास विकास के लगभग सभी तीनों पैमाने तमाम अन्य राज्यों से काफी बेहतर हैं. दिल्ली में पुलिस-आबादी अनुपात भी राष्ट्रीय औसत से ढाई गुना ज्यादा है. दिल्ली १२७ करोड़ आबादी और ३२ लाख वर्ग किलोमीटर के विस्तार वाले देश की राजधानी भी है जहाँ सत्ता के केंद्र बिंदु पर राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री भी होते है , संसद और सर्वोच्च न्यायलय भी. फिर मानवीय संवेदनाओं को झकझोरती ये घटनाएँ क्यों? अगर विकास का पाशविकता से प्रलोमानुपाती रिश्ता नहीं तो हम विकास करते हीं क्यों हैं, क्यों बच्चे भारी बस्ता लादे रोज सुबह स्कूल जाते हैं और उन्हीं में से एक कंडक्टर, ड्राइवर या किसी बहशी शिक्षक की हवस या सनक का शिकार हो जाता है या जाती है? क्यों मध्य प्रदेश के आई ए एस दंपत्ति भष्टाचार में जेल बंद होते हैं. उन दोनों ने तो समाजशास्त्र में अपराध की मानसिकता का मूल कारण, गीता का निष्काम कर्म,  आइन्स्टीन का जटिल सापेक्षतावाद का सिद्धांत और बौध धर्म का क्षणभंगुरवाद भी पढ़ रखा था.           
१९ वीं सदी में वर्तमान मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के अधिकारी रहे कर्नल स्लीमन अपनी डायरी, जिसे प्रख्यात जर्मन भारतविद मैक्स म्युलर ने भी शतप्रति शत सही माना, में कई घटनाओं पर आधारित जनजाति जीवन का बयान करते हुए कहते हैं “ ये आदिवासी अपनी पंचायतों में सत्य के प्रति इतनी अटूट श्रद्धा रखते है कि अगर किसी मामले में इन्हें मालूम हो कि झूठ बोल कर ये बच सकते हैं और सच कहने पर इनकी सम्पत्ति छिनी जा सकती है, इन्हें गाँव से निकाला जा सकता है और यहाँ तक कई बार जान जा सकती है तो भी ये सच बोलते हैं” . तो फिर आई ए एस जोशी दम्पति, यादव सिंह, ए राजा या सत्ता में बैठे तमाम नामी लोग क्यों सत्य का साथ छोड़ देते हैं ? क्या उन आदिवासियों से सीखने की ज़रुरत नहीं है और क्या सुप्रीम कोर्ट को आदिवासियों की पंचायत ऐसी संस्था की न्यायप्रणाली से सीखना नहीं करना चाहिए ?.      
एक अन्य पहलू लें. झारखण्ड में हर तीसरे दिन मनोविकार से पीड़ित महिला को डायन यह कह कर मार दिया जाता है कि डायन है और पूरे गाँव को खाने आयी है तो यह समझ में आता है कि उस गाँव के लोग बीमार है, अज्ञानी है और अभी वैज्ञानिक सोच विकसित नहीं हुई है. पर जब कोई बाबा अपने सॉफ्टवेयर इंजिनियर भक्त के कष्ट दूर करने के लिए या प्रमोशन के लिए उसे पीले कपडे में काला चना सफ़ेद कुत्ते को गुरुवार को खिलाने को कहता है और वह ईश्वर आदेश के रूप में इसे ग्रहण कर यह सब कुछ करने लगता है तब लगता है कि यह बाबा उससे किसी मुद्दे पर किसी के खिलाफ कुछ भी करवा सकता है. और तबी समझ में आता है कि क्यों इस दुनिया में तीन करोड़ तीस लाख कानून के रहते हुए भी हत्याएं और बलात्कार बढ़ते जा रहे हैं.
एक और पहलू देखें. कहते हैं सभ्यता और अराजकता के बीच महज पांच वक़्त के भोजन का फासला है. याने हजारों साल की तथाकथित सभ्यता और संस्कृति चिन्दियों में बिखर जायेगी और लोग एक दूसरे को मारने लग जाएँगे अगर उन्हे दो दिन खाना न मिले. लेकिन यह समझ में आता है क्योंकि भूख का जीव के जीवन से सीधा रिश्ता है. पर धर्म के नाम पर आज २५०० साल के सभ्यता और संस्कृति के बाद भी हत्याएं होती हैं तो यह समझ में नहीं आता कि समस्या कहाँ है. हमें बताया गया है कि हर धर्म और हर ईश्वर अच्छी बात सिखाता है, हिंसा वर्जित करता है आदमी को मारना तो दूर जीव पर भी हिंसा मना  करता है और कई तो मानस हिंसा भी प्रतिषिद्ध करते हैं. फिर अगर किसी की भावना गाय को लेकर है तो कोई गौ- हत्या क्यों करता है ? और जब वह करता है या उसके द्वारा ऐसा किये जाने का संदेह होता है तो उसे मार क्यों दिया जाता है ? क्या २५०० साल कम होते हैं इस हिंसा से बचने के लिए ? अगर इन ढाई हज़ार साल में जंगल से “मंगल” (ग्रह) तक पहुँचा जा सकता हैं, खानाबदोशी व “झूम” की खेती से वैश्विक अर्थव्यवस्था की जटिलता तक की समझ विकसित की जा सकती है, महामारी, बाढ़ और बड़ी-बड़ी प्राक्रितिक आपदाओं पर अंकुश लगाया जा सकता है तो तो फिर “मलाला” को गोली क्यों मारी जाती है, मुंबई में ताज़ होटल पर हमला क्यों होता है, आई एस आई एस क्यों पनपता है और कैसे जन-समर्थन के नाम पर एक पायलट को जला देता है? अख़लाक़ क्यों मरता है?        
शायद समाज बीमार है. और यह बीमारी खत्म नहीं होती बस इसके प्रकार बदल जाते हैं. अगर छह माह  की उस दलित बच्ची में जो फरीदाबाद में जला कर मार दी गयी, समझने या बोलने की शक्ति होती या जलाये गए पायलट से जिन्दा करके पूछा जाये तो वे यही कहेंगे कि प्रजातंत्र, शिक्षा, सामाजिक मान्यता ये सब चोंचले हैं. जब केंट्रीय सिविल सर्विसेज की परीक्षा का टॉपर आई ए एस बनने की बाद घूस लेते पकड़ा जाता है तो वह भी कहीं बीमार हीं होता है. शिक्षा या इंटेलिजेंस उसे इस बीमारी से नहीं बचा पाई है. अमरीका ऐसे “सभ्य” देश में कोई वहशी स्कूली बच्चों को फायरिंग करके मार देता है तो पाकिस्तान में आतंकवादी धर्म के नाम पर आर्मी स्कूल में.
क्या आज यह ज़रूरी नहीं हो गया है कि हमारा सारा ध्यान ऐसे प्रयास में लगे कि ना तो व्यक्ति तांत्रिक के रूप में पागल बने ना हीं समूह आतंकी के रूप में बीमार हो. क्या ऐसी संस्थाएं और सोच विकसित नहीं की जा सकती हैं जो बचपने से हीं व्यक्ति को बेहतर और शालीन नागरिक बनाये. प्रश्न यह नहीं है कि विचार वैभिन्य न हो, प्रश्न यह है कि विचार की विभिन्नता बन्दूक की गोलियों में या सर काटने के बहशीपन में क्यों तब्दील हो ? क्यों इस बात की जिद्द हो कि जो हम या हमारा भगवान कहता है (ऐसा वह मानता है) वही अंतिम सत्य है और बाकी सब कुछ खिलाफ है और उसे ख़त्म करना उस ईश्वर का इबादत है.   
विश्व के एक प्रमुख समाजशास्त्री रोबर्ट पुटनम की अपनी रिसर्च और तत्संबंधित बहुचर्चित पुस्तक “बोलिंग अलोन” के अनुसार समाज में आर्थिक समृद्धि चाहे कितनी हीं बढ़ जाये अगर उस समाज में  “सामाजिक पूँजी” घटने लगे तो समाज स्वस्थ नहीं रहता और उसका कुल “आत्मतोष” कम होने लगता है. अर्थात नॉएडा का एक चीफ इंजिनियर  सारे भष्टाचार करते हुए भी हजारों करोड कमा सकता है और कोई समाजवादी पार्टी की उत्तर प्रदेश सरकार उसे बचाने के लिए (सुप्रीम कोर्ट में हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ अपील) कर सकती है पर जहाँ तक मूल आत्मतोष का सवाल है वह न तो यादव सिंह की बढ़ेगी ना हीं अख़लाक़ को मारने वालों की. हाँ कुछ काल के लिए कोई संगीत सोम या कोई ओवैसी अपनी दुकान चमका सकता है.   

आज ज़रूरी यह है कि नैतिक मूल्य, वैज्ञानिक सोच और सही तर्क शक्ति की शिक्षा और ट्रेनिंग न केवल स्कूलों में शिक्षा का मूल आधार हो बल्कि माँ की गोद में लोरी वापस आये और उससे हीं यह शिक्षा और ट्रेनिंग शुरू हो अन्यथा दुनिया में जी डी पी (सकल घरेलू उत्पाद) बढ़ता रहेगा और साथ हीं बलात्कार और हत्याएं भी. अख़लाक़ मरता रहेगा और आई ए एस जोशी दंपत्ति या ए राजा पैदा होते रहेंगे और व्यक्ति का सकल संतोष (हम इसे एस एस कह सकते हैं) जी डी पी के प्रतिलोमानुपति बना रहेगा.

lokmat 

Thursday, 8 October 2015

बिहार चुनाव : तर्क व नैतिकता से आज भी कोसों दूर



चुनाव आयोग के एक सर्वे के अनुसार बिहार के ८० प्रतिशत मतदाताओं का मानना है कि पैसे या गिफ्ट लेकर मतदान करने में कोई बुराई नहीं है. कोई ४५०० से अधिक लोगों के सैंपल साइज़ के आधार पर किये गए इस सर्वे का निष्कर्ष राज्य के चुनाव तंत्र के लिए एक चुनौती बन गया है. कोई ताज्जुब नहीं कि बिहार ऐसे गरीब राज्य में चुनाव घोषणा के बाद से अभी तक १६ करोड़ रुपये, ८३०० लीटर शराब और ८.५० किलो सोना बरामद हो चुका है.


किसी समाज में भ्रष्टाचार को लेकर अगर सहिष्णुता का यह भाव हो तो समझा जा सकता है कि चुनावी संवाद किस स्तर तक जा सकता है. और नेताओं को तार्किक या नैतिक मानदंडों को ठेंगा दिखाना कितना सहज हो सकता है. उदाहरण के तौर पर क्या किसी समाज में ६८ साल के प्रजातान्त्रिक व्यवस्था के बाद भी कोई राजनीतिक नेता यह कह कर बच सकता है कि उसका बड़ा बेटा २५ साल का है और छोटा २६ साल का क्योंकि मतदाता सूची में ऐसा हीं लिखा है ? क्या किसी सभ्य समाज की तार्किक और नैतिक सोच पर यह तमाचा नहीं है? भ्रष्टाचार के आरोप में सजा पाए राष्ट्रीय जनता दल के नेता लालू प्रसाद यादव ने कहा कि उनके दोनों पुत्रों ने जो उम्र लिखवाई है उसका आधार मतदाता सूची में दर्ज उम्र है. हकीकत यह है कि अगर मतदाता सूची या किसी सरकारी दस्तावेज में कोई टंकण सम्बंधित या मानवीय गलती तथ्यों को लेकर दिखाई देती है तो उसे ठीक कराना सम्बंधित नागरिक की जिम्मेदारी होती है. अगर लालू के तर्क को आधार बनाया जाये तो पुलिस के दस्तावेजों के हिसाब से या अदालत के फैसले के मुताबिक वह भ्रष्टाचार के दोषी हैं लेकिन उन्होने उसे गलत ठहराते हुए उपर की अदालत में अपील की है.

यह सत्य है कि अशिक्षित अथवा अर्ध-शिक्षित समाज में तर्क पर भावनाएं भारी पड़ती हैं लिहाज़ा मायावती इस आधार पर उत्तर प्रदेश में चुनाव जीतती हैं कि उनका जन्म -दिन किसी राजतंत्र के काल वाली साम्राज्ञी की तरह मनाया जाता है या उनकी उम्र से १५ साल बड़ा कोई ब्राह्मण या ठाकुर अफसर सार्वजनिक स्थलों पर भी उनके पैर छूता है. उनके मतदाताओं को खासकर दलितों को जो हजारों साल से ब्राह्मणवादी व्यवस्था द्वारा दबाये जाते रहे हैं यह देख कर एक सशक्तिकरणकी झूठी चेतना का अहसास होता है. अगर इस वर्ग के नेतोँ पर वहीं भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं जो किसी उच्च जाति के नेता जैसे जगन्नाथ मिश्र पर लगे तो उसे फिर सशक्तिकरण का अहसास होता है. यही कारण है कि जब लालू यादव पर लगे चारा घोटाले के आरोप के बाद के एक चुनाव में राघोपुर के एक यादव मतदाता से एक संवाददाता द्वारा पूछा गया कितुम्हारे नेता पर भ्रष्टाचार का आरोप है फिर भी तुम लालू यादव को वोट दोगे तो वह गुस्से से भड़क कर बोला, अच्छा, जब मिसिर बाबा करे तब आप लोगों को कोई दिक्कत नहीं लेकिन हमारा नेता करे तो गलत है”. भावना तर्क पर भारी पड़ गयी थी.

चूंकि भावनात्मक आधार पर जनमत मोड़ना अर्ध-शिक्षित, नीम-तार्किक समाज में तो चलता है लेकिन जैसे-जैसे समाज में शिक्षा बढ़ती है, आर्थिक आय में इजाफा होता है और इन दोनों के कारण तर्क शक्ति भावना से हट कर बौद्धिक स्तर का सहारा लेने लगती है तो वह व्यक्ति यह सोचने लगता है कि हमारा नेता भी उसी स्तर का भ्रष्ट हो गया जिस स्तर का उच्च वर्गीय नेता इतने दशकों तक था. उसे इससे भी शक्ति मिलती है कि अधिकतर एस पी और डी एमअपनीजाति से हैं  और जहाँ तक सड़क का सवाल है वह तो न तब बनी न आज बनी, ना हीं नौकरी तब लगी न आज लगी.

सोच और तर्क के इस भाव में आने की एक शर्त है. किसी समाज या पहचान समूह में नीचे जितनी चेतना शून्यता होगी उतनी हीं इस तरह की राजनीति के जिन्दा रहने की मियाद होगी. लिहाज़ा कोई मायावती इस सशक्तिकरण की झूठी चेतनावाली राजनीति को २५-३० साल चला सकती हैं तो कोई मुलायम या लालू १० से १५ साल. लेकिन कोई मायावतीलालू या मुलायम इसे मियाद से ज्यादा खींचेगे तो उनका आधार कम होने लगेगा. भैंस की पीठ पर बैठना, चुनाव के दौरान उड़नखटोले (हेलीकाप्टर), पर किसी सुदूर गाँव में उतरना और गांववासियों को बताना कि सड़क और पुल बना देंगे तो अफीम की अवैध खेती  नहीं कर पाओगे क्योंकि अफसर तब धडाक-धडाकछापा मारेगा”  का तर्क दे कर मत हासिल करना पांच-दस साल तो चलता है पर इससे अधिक नहीं. कुछ साल पहले राघोपुर के एक गाँव में लालू उड़नखटोलासे उतरे और तीन वाक्यों का चुनावी भाषण दिया. अब जब तुम नदी में जाल डालते हो मछली पकड़ने के लिए तो कोई सरकारी अमला (कर्मचारी) तो मना नहीं करता ?” . भीड़ ने जवाब दिया ना साहेब” . नेता का दूसरा सवाल था जब ताड़ी के पेड़ पर चढ़ कर ताड़ी उतारते हो तो कोई टैक्स तो नहीं लेने आता ?” भीड़ ने उसी उत्साह से जवाब दिया ना साहेब” . नेता का तीसरा और अंतिम चुनावी वाक्य था बस मौज करो, मछली मारो और ताड़ी पीयो”. उस समय वहाँ से चुनाव में जबरदस्त सफलता मिली थी.

लेकिन उसी नेता की पत्नी और पूर्व मुख्यमंत्री उसी विधानसभा क्षेत्र से २०१० में चुनाव हार जाती हैं क्योंकि अब उसे केवल अवैध मछली और ताड़ी नहीं, उसके बच्चे को नौकरी चाहिए, अस्पताल चाहिए , सड़क चाहिए. चेतना , तर्क शक्ति और अपेक्षाएं झूठे सशक्तिकरण के अहसास से काफी ऊपर चली गयी हैं.

एक और आयाम देखें. भारतीय जनता पार्टी के सुशील मोदी ने आरोप लगाया कि लालू के प्रत्याशी पुत्र-द्वय में से एक की सम्पति के रूप में एक १७ लाख की मोटर-साइकिल है और एक बी एम डब्लू कार. प्रश्न यह नहीं है कि १७ लाख रुपये की मोटरसाइकिल कैसे? प्रश्न यह है कि ऐसी मोटरसाइकिल अपने लिए रख कर उन लाखों यादव युवाओं को अब यह नहीं कह सकते कि तुम भैंस की पीठ पर बैठ कर शक्ति का अहसास करो और हम बी एम् डब्लू कार पर. कम से कम एक यमहा या होंडा बाइक उसे भी चाहिए. यही कारण है कि यादव् मतदाता विकल्प की तलाश पिछले दस साल से कर रहा है. लेकिन लालू अभी भी पहचान नहीं पा रहे है. उन्हें यह नहीं समझ में आ रहा है कि पहचान समूह की चेतना परिवर्तित होती रहती है लिहाज़ा राजनीतिक सन्देश की विषय वस्तु (कन्टेन्ट)  और सम्प्रेषण का तरीका भी बदलना पड़ता है. साम्यवादियों ने यही नहीं समझा वर्ना भारत से ज्यादा बेहतर देश साम्यवाद के पनपने के लिए दुनिया में दूसरा नहीं था.

गौ-मांस पर उनका बोलना उसी विकृत तर्क का नमूना है जिसके तहत कानून को ठेंगे पर रखना ऐसे नेता शाश्वत भाव समझते हैं. शैतानने उन्हें भुलवादिया कि वह यादवों (गौ-पालकों) के नेता हैं ना कि मात्र १७ प्रतिशत मुसलामानों के.  दोनों मिलते हैं तब ३०-३१ प्रतिशत बनता है वह भी अगर पूरा मिला तब. २०१४ के चुनाव में नहीं मिला तो लालू की पार्टी मात्र २० प्रतिशत पर रह गयी।
        
अगर लालू का छोटा बेटा २६ साल का है और बड़ा २५ साल का और वे राज्य की विधान सभा के चुनाव में जीतते हैं और 10.5 करोड़ बिहारियों लिए कानून बनाते हैं तो शायद दुनिया के प्रजातंत्र के लिए इससे बड़ा मज़ाक कोई और नहीं हो सकता. वैसे भी यह जिम्मेदारी प्रत्याशी की होती है कि उसे ठीक करवाए अन्यथा अगर किसी तरह से असली जन्म प्रमाण तय करने वाले दस्तावेज चुनाव आयोग के हाथ लग गए तो नामांकन या चुनाव  रद भी हो सकता है.

lokmat

Monday, 28 September 2015

संविधान : नेपाल में अशांति का स्रोत हीं नहीं भारत के साथ गहरा धोखा



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भगवान् राम द्वारा लोक-चर्चा के बाद निकाले जाने पर अगर गर्भवती माता सीता को वाल्मीकि आश्रम में शरण न मिली होती और वह अपने मायके जनकपुर (नेपाल) गयी होती तो नेपाल के नए संविधान के अनुसार पैदा हुए जुड़वाँ पुत्रों --लव व कुश—को नेपाली नागरिकता नहीं मिली होती. लेकिन वहीं अगर राम नेपाल के होते और सीता भारत की तो लव-कुश को यह दिक्कत ना तो भारत में आती ना हीं नेपाल में.  

नेपाल के नए संविधान के प्रावधान यह सुनिश्चित करते हैं कि इस देश में अशांति बनी रहे. उच्च जाति के मूल निवासी पहाड़ी लोग सत्ता के शीर्ष पर बने रहें और ५२ प्रतिशत मधेसी और आदिवासी (जो तराई क्षेत्र में रहते हैं) सदियों से चले आ रहे अभाव, अपमान और शोषण का शिकार बने रहें. इसमें कोई दो राय नहीं कि नए संविधान में भारत की चिंताओं को जानबूझकर नज़रंदाज़ किया गया है. इसका मतलब यह भी निकाला जा सकता है कि चीन की इच्छा को तरजीह दी गयी है बगैर यह सोचते हुए कि संविधान पड़ोसी देशों को साधने या नाराज़ करने का खेल नहीं बल्कि राष्ट्र के इतिहास की सर्वश्रेष्ठ और पवित्र प्रक्रिया है जिसकी विश्वसनीयता पर आंच आने का मतलब सालों साल चलने वाली अस्थिरता और अशांति. नेपाल में यह अशांति सितम्बर २०, २०१५ को इस नए संविधान के प्रभावी होने के साथ हीं शुरू हो गयी है. आज कई क्षेत्र कर्फ्यू की चपेट में हैं.

पांच ऐसे बिंदु हैं जिनको पुराने अंतरिम संविधान के प्रावधानों से हटा दिया गया है. उदहारण के तौर पर अंतरिम संविधान में चुनाव क्षेत्र बनाने का आधार जनसँख्या, भूगोल और अन्य विशेषता थी और मधेसी लोगों के मामले में मात्र जनसँख्या को आधार माना गया था. नतीज़तन मधेसी व आधिवासियों को जनसँख्या के आधार आनुपातिक प्रतिनिधित्व के अनुसार संसद में ५८ प्रतिशत सीटें हासिल हो सकती थीं. नए संविधान के अनुच्छेद ८४ में इसे इस तरह संशोधित किया गया है कि अब केवल ४५ प्रतिशत सीटें हीं अधिक जनसँख्या वाले वर्ग के पास होंगी. इसी तरह अंतरिम संविधान के अनुच्छेद २१ (जो अब अनुच्छेद ४२ के रूप में हैं) में संशोधन कर के संवैधानिक पद पर बैठने वाले लोगों में वे लोग नहीं होंगे जो मूल नागरिक नहीं है और शादी या अन्य वजहों से गैर-मूल नागरिक हैं. चालाकी यहाँ तक की गयी है कि अब कोई नेपाली महिला नागरिक अगर भारतीय से शादी करती है तो इस विवाह से पैदा होने वाले बच्चे वह नागरिकता नहीं हासिल कर सकेंगे जो नेपाली पुरुष और भारतीय स्त्री के विवाह से पैदा होने वाले बच्चे कर सकेंगे. प्रयास यह है कि भारत नेपाल के सदियों पुराने सांस्कृतिक, भौगोलिक और धार्मिक रिश्ते ख़त्म नहीं तो कम हो सकें और चीन से यह रिश्ते ज्यादा बढ़ सकें. यही कारण है कि अनुच्छेद ११(२) (ब) में “माता और पिता” से “और” हटा कर “या” शब्द लाया गया है.
      
नेपाल की संविधान सभा का दस साल के भीतर दो बार चुनाव हुआ. पहली संविधान सभा में माओवादियों को ३८.२ प्रतिशत सीटें मिली थी. नेपाली कांग्रेस और सी पी एम् (यू एम् एल) को क्रमशः १९.१ और १८.१ प्रतिशत. मधेशी जन संघर्ष मोर्चा को ८.८ प्रतिशत सीटें हासिल हुई. लेकिन अगले चार साल में माओवादियों के खिलाफ जनाक्रोश बढ़ता गया और संविधान नहीं बन सका यहाँ तक इसका कार्यकाल एक साल के लिए बढ़ाया भा गया. नतीज़तन २०१३ में फिर से नए संविधान सभा के लिए चुनाव हुआ और इस बार नेपाली कांग्रेस को बहुमत हासिल हुआ. कहना न होगा कि अगर संविधान सभा चुनने में हीं जनता चार साल में इतना बदल जायेगी तो उस संविधान की मजबूती कितनी होगी. संविधान कोई कानून बनाना नहीं है कि “अबकी नहीं बना तो अगले चुनाव में किसी और को सत्ता पर बैठा कर देखा जाएगा. यह पवित्र प्रक्रिया है जो उस राष्ट्र का भविष्य और शासन पध्यती से  

कानून की दुनिया में एक कहावत है “अगर आपको कानून और सौसेजेस (एक प्रकार का अंग्रेज़ी पकवान) पसंद है तो उन्हें कभी भी बनते हुए न देखें”. यहाँ तो पूरा संविधान हीं बनाया जा रहा है. लिहाज़ा विरोध स्वाभाविक है. जब भी संविधान बनता है तो तमाम पहचान समूह--- क्षेत्रीय, भाषाई, नस्लीय, जातिवादी, उप-जातिवादी, धार्मिक . सांस्कृतिक और भू-सांस्कृतिक आधारों पर दबाव बनना शुरू हो जाता है. इसमें संविधान निर्माताओं को तरह –तरह के समझौते करने पड़ते हैं और तरह –तरह की चालाकियों का सहारा लेना पड़ता है ताकि सर्वसम्मति न सही तो बहुमत बना रहे. संविधान बनने के बाद होने वाला उपद्रव कई बार इस बात पर निर्भर करता है कि निर्माताओं की नीयत में खोट कितना है, जन-चेतना कितनी तार्किक है, क्या ये तर्क वैज्ञानिक आधार पर हैं , क्या संविधान बनाने की ज़रुरत अन्य सभी भावनाओं पर भारी पड़ रही है?

भारत का संविधान इसका एक उदाहरण है. विश्व में सबसे ज्यादा वैभिन्य इस देश में आज भी है. कोई ३७४२ जातियां, ७२० बोलियाँ, २२ मान्यता प्राप्त भाषाएँ, १३ लिपियाँ, ५०० से ज्यादा रियासतें, चार वर्ण, आधा दर्ज़न से ज्यादा धर्म और दर्ज़नों सम्प्रदाय और सैकड़ों उप-सम्प्रदाय और पूजा-पद्ध्यती. लिहाजा हमारे संविधान निर्माताओं को कुछ ऐसे समझौते करने पड़े जिनके दुष्प्रभाव हम आज तक झेल रहे हैं. कश्मीर और समान नागरिक संहिता का न होना उनमें से कुछ हैं.          

अमेरिका का संविधान जो विश्व का सबसे पुराना संविधान है इससे ज्यादा प्रसव –पीड़ा से गुजर चुका है और दशकों तक उस दर्द की टीस देखी गयी. यहाँ तक कि जब १८६४ में गुलाम परम्परा का अंततः खत्म करने के लिए कानून बनाया गया तब भी एक ऐसा वक्त आया कि राज्यों ने और उनके सांसदों ने बगावत किया और अंत में राष्ट्रपति अब्राहिम लिंकन को खुले आम (लेकिन बंद हाल में) धमकी देनी पडी यह कहते हुए कि आप लोगों को अमरीकी राष्ट्रपति की ताकत का अंदाज़ा नहीं है”. यह अलग बात है कि अगर लिंकन की अगले चुनाव के पहले ह्त्या न हुई होती तो उनपर नयी सरकार इस धमकी के आरोप में मुकदमा चलाती.  

नेपाल में नया संविधान जो सातवीं प्रयास और जो एक नहीं दो-दो संविधान सभाओं द्वारा छः दशक की मशक्कत के बाद लोकतंत्रात्मक स्वरुप में बनाया गया है सामाजिक अंतर्विरोधों का पिटारा बन गया है. और कोई ताज्जुब नहीं कि यह कुछ समय बाद यह फिर बदला जाये. भारत की नाराज़गी को दरकिनार कर के इसे पिछले २० सितम्बर को राष्ट्र को समर्पित किया गया लेकिन हिमालय की गोद में बैठे और दो तरफ से दो बड़ी ताकतों –दक्षिण में भारत और उत्तर में चीन-- से घिरे (या अभिरक्षित?) भर में खुशी से ज्यादा गम का और गुस्से का इज़हार हुआ. क्या यह जन-इच्छा का प्रतिफल नहीं था ? क्या जनता कुछ और किस्म का संविधान चाहती है? क्या मात्र कुछ मुद्दों पर हीं विवाद है और अगर ऐसा है तो क्या इन्हें संशोधन कर कालांतर में सुलझाया नहीं जा सकता? ख़ुशी के मौके पर क्यों इतनी हिंसा का इज़हार?  

भारत को इस संविधान से ऐतराज है. एक तो वह यह चाहता था  कि नेपाल में इस संविधान के लागू होने की घोषणा बिहार चुनाव के बाद किया जाये और दूसरे राज्यों के गठन को लेकर भारतीय मूल के मधेसिया और स्थनीय थारू समुदाय के साथ भारत खड़ा है. संविधान निर्माताओं ने जिस तरह इस समस्या का हल निकाला है वह देखने में पक्षपात पूर्ण लगता है. राज्यों का गठन उत्तर से दक्षिण किया गया है जबकि यह दोनों वर्ग लम्बाई में पूर्व से पश्चिम में फैले हुए हैं. इसका नतीजा यह होगा कि इन राज्यों में भी पहाडी मूल का वर्चस्व रहेगा. लेकिन संविधान निर्मातों की तरफ हो कर अगर सोचा जाये तो अगर मधेशिया समुदाय को उनके बाहुल्य के आधार पर राज्य दे दिया जाये तो आने वाले दिनों में इस तरह के कई राज्य अपनी स्वतन्त्रता का मांग उठा सकते हैं और नेपाल टुकड़ों में बंट सकता है.  

दरअसल संविधान अगर किसी क्रांति की उपज हो तो इसे बनाने और मान्यता दिलाने में ज्यादा दिक्कत नहीं होती. अमेरिका और भारत इसके उदाहरण हैं. दोनों के बीच जो एक सामान्य कारक है वह है ब्रिटिश साम्राज्य से आजादी. लेकिन नेपाल में राजतन्त्र से आज़ादी के सुखद भाव पर कम्युनिस्ट पार्टियों का साया पडा और पूरा समाज छिटक कर परस्पर विरोधी पहचान समूहों में बंट गया. देखना है आने वाले दिनों में हमारा यह पडोसी कैसे एक आसन्न झंझावात से निपट पाता है.
lokmat

Friday, 18 September 2015

इन्द्राणी, मर्डर और मीडिया ट्रायल

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यह आरोप अक्सर लगता है कि किसी अपराध को सनसनीखेज बना कर मीडिया खुद हीं जांचकर्ता, वकील और जज बन जाता है जब कि पुलिस अभी दूर-दूर तक मामले की सच्चाई के आस –पास भी नहीं पहुँचती. इस मीडिया ट्रायल का नतीजा यह होता है कि पुलिस याने जांचकर्ता हीं नहीं जज भी दबाव में आ जाते हैं और हकीकत और फैसला सब कुछ उलटा-पुल्टा हो जाता है. सवाल यह है कि अगर मीडिया का दबाव जजों को भी प्रभावित करता है तो फिर क्यों यह दावा कि “जजों का फैसला “ट्रेंड माइंड” से होता है? फिर आम आदमी और जज में अंतर क्या? क्या पूरी जांच इस बात से नहीं प्रभावित होती कि महाराष्ट्र सरकार अपनी सनक में जाँच जब परिणति पर पहुँचने को होता है तो शीर्ष अधिकारी राकेश मारिया को बदल देती है? क्या इससे जाँच की गुणवत्ता प्रभावित नहीं होगी और क्या यह भी मीडिया के दबाव में किया गया है?

अगर सरकार ने मारिया को इसलिए हटाया कि केस से जुड़े किसी एक ताकतवर पीटर मुखर्जी से सम्बन्ध है और जाँच की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती थी तो प्रश्न यह उठता है कि अगर मीडिया के इतने जबरदस्त कवरेज के बाद भी अगर कोई अधिकारी जाँच प्रभावित कर सकता है तो समझा जा सकता है कि सत्ता में बैठे लोग के खिलाफ मीडिया की कितनी जरूरत इस देश में है. अगर मारिया सही जांच कर रहे थे और सरकार ने जांच को किसी अन्य दिशा में ले जाने के लिए हटाया तो भी देश में मीडिया जरूरी है यह समझा जा सकता है.    

हम यहाँ कुछ अन्य उदाहरण लेते हैं. आसाराम बलात्कार केस, यादव सिंह भ्रष्टाचार केस और हाल में उभरा शीना हत्या केस. इन तीनों मामलों में दो में एक तथ्य कॉमन है और वह यह कि इनमें स्थापित सामाजिक या नैतिक मूल्य टूटे हैं जबकि एक शुद्ध भ्रष्टाचार का केस है. और तीनों अभिजात्य वर्ग या ताकतवर व्यक्ति या परिवार से जुड़े हैं. पूरे विश्व में न्यूज की परिभाषा है –वह घटना या तथ्य या घटनाओं या तथ्यों के आधार पर इंगित होता सच जो समाज को प्रत्यक्ष या परोक्षरूप से प्रभावित करता हो या संवेदनाओं को झकझोरता हो. यही कारण है कि सिख आतंकवाद की घटनाएँ दस साल के अन्दर पेज १ से खिसकते हुए अंतिम पेज तक पहुँच गयीं. लेकिन आज अगर फिर कोई ऐसे घटना हो वह चैनलों के लिए कई दिन की व्यस्तता होगी और अखबारों में फिर पेज १ पर आ जायेगी. इसे “स्टनिग वैल्यू” (चौंकाने वाला महत्व) कहते हैं. इस देश में नैतिक मूल्यों के पश्चिमीकरण को लेकर एक जंग चल रही है और ये तीनों घटनाएँ हर दृष्टिकोण से इन मूल्यों को लेकर हमारी संवेदनाएं झकझोरती हैं. आसाराम को एक वर्ग भगवान् के रूप में देखता था उसे अगर ये तथ्य बुलंद आवाज में न बताये जाते तो न जाने कितने नए आसाराम पैदा होते रहते और कितने भगवत-प्रेम भाव से आँखे और दिमाग बंद किये श्रद्धालु अपने बच्चों का भविष्य खराब करते रहते. मीडिया का यह कवरेज उसी अनुपात में होता है जिस अनुपात में घटना का या उसके अपरिहार्य प्रभाव का महत्व होता है. यह अनुपात इस बात पर भी निर्भर करता है कि आरोपी व्यवस्था को दबाने की कितनी क्षमता रखता है याने जितनी क्षमता उतनी हीं तेज़  मीडिया की आवाज. 

मीडिया का स्वर ऊँचा होने के कुछ मूल और सार्थक कारण होते हैं. शीना हत्या कांड देखें. इस घटना को परिप्रेक्ष्य में देखें तो आने वाला भारत किस नैतिक मूल्य का होने जा रहा है इस खतरे का संकेत हैं. इस मामले में कन्फ्यूजन यह है कि किसी लिव-इन रिलेशन को भी धोखा देते हुए किस भावी लिव –इन पार्टनर के साथ “ट्रायल के दौरान” कोई संतान दुनिया में आयी यह माँ को भी नहीं पता है. लिहाज़ा आज भारत वहां पहुँच रहा है जहाँ संतान किसकी  है इसका निर्धारण डी एन ए  से होगा. मॉडर्न मांएं नहीं चाहेंगी कि अगले १८ साल के लिए वे ढोए यह जिम्मेदारी और अपना “करियर” खराब करे. उधर पहला और दूसरा लिव-इन पार्टनर अपने को मुक्त कर सकते हैं यह कहते हुए कि पहले पता करो कि “किसका है”. लिहाज़ा अब डी एन ए से पता चलेगा बच्चा किस की जिम्मेदारी है. आज जेल में बंद इन्द्रानी पहले कई शादियाँ”  “बना” चुकी है. रोटी जीत चुका एक वर्ग  किस संस्कृति का है और किस तरह उसके लिए शाश्वत मूल्य भी कोई मायने नहीं रखते. साथ हीं चूंकि  समाज का निचला वर्ग उसी ऊपरी वर्ग की नक़ल करता है लिहाज़ा ऊपर क्या हो रहा है और इसका ख़तरा कहाँ तक बढ़ गया है यह बताना जरूरी हो जाता है.   

हिन्दू रीति के मुताबिक “जन्म-जन्म” का रिश्ता अव्वल तो टूट हीं नहीं सकता फिर भी आज़ाद भारत में इसे कोई तोड़ना चाहे तो उसे तोड़ने के लिए अदालत में “तलाक” (हिंदी में इसके लिए कोई एक शब्द नहीं है समासन के जरिये हम “विवाह विच्छेद” गढ़ते हैं) की दुरूह प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है. नए समाज ने इसकी काट निकाली. आज “लिव-इन-रिलेशन” विवाह के मामले में सभी धार्मिक रीतियों से ज्यादा “पोपुलर” हो रहा है. इसके तहत “मॉडर्न” महिला बच्चे पैदा कर सकती है और फिर अगर “मूड” बदला तो फिर किसी संपन्न खन्ना की तलाश में बच्चों को कुत्ते का जीवन व्यतीत करने के लिए सड़क पर (या हर महीने कुछ  पैसे दे कर आर्थिक रूप से कमज़ोर रिश्तेदार के घर) छोड़ सकती है. बच्चे का “बैगेज” साथ नहीं होगा तो उम्र मेक-अप से छिपा सकते है किसी खन्ना को फंसाने के लिए. खन्ना भी जानता है कि मेक-उप उतरने की बाद का चेहरा कैसा है. लेकिन वह भी जितनी नई –नई महिलाओं से “शादी बनाता” है उतनी हीं उसकी मार्किट वैल्यू होती है.

यहाँ यह बताना जरूरी है कि पश्चिम और भारत के बीच  अपराध न्यायशास्त्र और मीडिया व्यवहार की तुलना असंगत इसलिए है कि पश्चिम में यह सोचा भी नहीं जा सकता कि कोई पैसे वाला शराब पी कर गाड़ी चलाये और पांच लोगों को कुचल दे और सालों चलने वाली न्यायप्रक्रिया के दौरान एक दिन पता चले कि सारे गवाह पलट गए और अदालत में कहने लगे कि उन्होंने घटना के दौरान इस प्रभावशाली व्यक्ति को गाड़ी चलाते  हुए नहीं देखा. शराब पी कर चलना तो दूर की बात है. न्यायप्रक्रिया में बैठा जज अपने की पंगु मानने लगता है. ब्रिटेन में तीन साल पहले एक मंत्री डेविड ब्लंकेट को इस बात पर इस्तीफ़ा देना पड़ा क्योंकि उसके पी ए ने मंत्री के पूर्व -पत्नी की आया को वीसा देने के लिए आस्ट्रेलिया के उच्चायोग पर दबाव डाला था हालाँकि उच्चायोग ने भी इसका खंडन किया. भारत में मीडिया की आवाज इसलिए बढ़ जाती है कि कोई मंत्री या कोई धनपशु थाने को दबाव में लेकर या पैसे दे कर अपनी जगह किसी निर्दोष को मुजरिम न बनवा दे.

मीडिया का दबाव न होने का एक अंतर देखें. नॉएडा के चीफ इंजीनियर यादव सिंह के घर के सामने खडी अपनी कार में करोड़ों रुपये कैश के रूप में आयकर अधिकारी छापे के दौरान बरामद करते हैं और आगे की जाँच में करोड़ों रुपये की संपत्ति का पता चलता है लेकिन राज्य की सरकार जांच को किसी निष्पक्ष एजेंसी को देना तो दूर इस अधिकारी को ससपेंड भी नहीं करती. मीडिया इसे हाई पिच पर नहीं ले जाती क्योंकि तथ्य के लिए ज़रूरी जाँच राज्य की सरकार की सोची समझी ढिलाई के कारण नहीं हो पाती. अंत में हाई कोर्ट को निर्देश देना पड़ता है कि इस मामले की सी बी आई जाँच करवाई जाये. लेकिन अखिलेश सरकार  नैतिकता की उस झीनी चादर को उस दिन तार-तार कर देती है जब हाई कोर्ट के इस आदेश के खिलाफ वह सुप्रीम कोर्ट जाती है यह कहते हुए कि सी बी आई के मार्फ़त केंद्र सरकार उसे ब्लैकमेल करेगी. विश्व में शासन की प्रत्यक्ष अनैतिकता का शायद इससे बड़ा कोई अन्य उदाहरण न हो. अगर सी बी आई के जरिये राज्य की सरकार केंद्र द्वारा ब्लैकमेल होती है तो क्या केंद्र सरकारों को समर्थन देना (यू पी ए १ में परमाणु मामले को लेकर लोक सभा में मतदान के दौरान) इसी ब्लैकमेल का नतीजा था और फिर अगर आय से अधिक धन मामले में किसी नेता को राहत मिली है तो क्या सी बी आई ने मामला कमज़ोर किया था? एक भ्रष्टाचार के आरोपी इंजीनियर को बचाने की इतनी शिद्दत से कोशिश !
 jagran

Sunday, 6 September 2015

शीना हत्या केसः उन्मुक्तता के नाम पर ऐय्याशी-जनित 'लिव-इन' संबंधों को खत्म करें

 
 
 




तो अब डी एन ए टेस्ट से पता लगाया जाएगा कि किस बेटे-बेटी का बाप कौन है क्योंकि कन्फ्यूजन यह है कि किसी लिव-इन रिलेशन को भी धोखा देते हुए किस भावी लिव –इन पार्टनर के साथ "ट्रायल के दौरान" कोई संतान दुनिया में आयी यह माँ को भी नहीं पता है. लिहाज़ा वह क्यों अगले १८ साल के लिए ढोए यह जिम्मेदारी और अपना "करियर" खराब करे. उधर पहला और दूसरा लिव-इन पार्टनर अपने को मुक्त कर सकते हैं यह कहते हुए कि पहले पता करो कि "किसका है". लिहाज़ा अब डी एन ए से पता चलेगा बच्चा किस की जिम्मेदारी है. आज जेल में बंद इन्द्रानी पहले कई "शादियाँ" "बना" चुकी है. उसके पैत्रिक बंगले को देख कर हीं लगता है कि समाज के काफी ऊपर के वर्ग की रही है. उसके अनुसार उसके पिता ने उसकी माँ और उसे छोड़ दिया और उसके चाचा ने उसकी माँ को रखा और इन्द्रानी से भी शारीरिक सम्बन्ध बनाये. पुलिस को दिए बयान में जो मीडिया ने बताया, की पुष्टि देश के एक बड़े पत्रकार वीर संघवी ने भी की. "इन्द्रानी ने मुझसे भी यह बात बताई थी", संघवी ने एक न्यूज चैनल को पिछले हफ्ते बताया. संघवी इन्द्रानी के पति के टीवी चैनल में सम्पादक रह चुके हैं. खैर, यहाँ मकसद किसी इन्द्रनी के खानदान का वंश-वृक्ष दिखाने का नहीं ही बल्कि यह बताने का है कि रोटी जीत चुका एक वर्ग किस संस्कृति का है और किस तरह उसके लिए शाश्वत मूल्य भी कोई मायने नहीं रखते. साथ हीं चूंकि समाज का निचला वर्ग उसी ऊपरी वर्ग की नक़ल करता है लिहाज़ा ऊपर क्या हो रहा है और इसका ख़तरा कहाँ तक बढ़ गया है.



उधर ब्रिटेन में पैदा हुआ लिहाज़ा वहीं की नागरिकता रखने वाला पीटर मुखर्जी व रातों-रात धनी हुआ संजीव खन्ना भी कई शादियाँ "बना" चुके हैं. ये शादियाँ करते नहीं बल्कि "बनाते हैं". इनकी शादियाँ "जन्म-जन्म" के रिश्ते वाले फॉर्मेट में नहीं थी बल्कि "जब तक पटा ठीक, नहीं तो अपने-अपने रास्ते" वाले पाश्चात्य फॉर्मेट में थीं. इस फॉर्मेट की अनौपचारिक (जो अब कुछ पश्चिमी वैल्यू सिस्टम से प्रभावित भारतीय बुद्धिजीवी निर्बाध उन्मुक्तता के नाम पर औपचारिक बनाने में लगे हैं) परिणति है -- "लिव-इन-रिलेशन". अपनी जिस बेटी शीना को माँ इन्द्रानी ने अपने नंबर २ "पति" के साथ मिलकर मारा वह इसी आधुनिक "लिव-इन" रिलेशनशिप की पैदाइश है. शीना का पिता अचानक एक दिन अवतरित होता है और चैनलों को बताता है कि इन्द्रानी किस तरह बच्चे को छोड़ किसी धनी "पति" की तलाश में निकल गयी. "लिव-इन" नाम की गैर-परम्परागत अनैतिक, अस्थाई और समाज को पतन के दिशा में ले जाने वाली पश्चिमी प्रैक्टिस को भारत में भी धीरे-धीरे सामाजिक अभिमति मिलने लगी है और यहाँ तक की सर्वोच्च न्यायालय ने भी हाल के तमाम फैसलों में इसे मान्यता दे दी है. मूल रूप से भारत का कानून पहले वाले याने पारंपरिक विवाह के फॉर्मेट के प्रति बहुत सख्त है. हिन्दू रीति के मुताबिक "जन्म-जन्म" का रिश्ता अव्वल तो टूट हीं नहीं सकता फिर भी आज़ाद भारत में इसे कोई तोड़ना चाहे तो उसे तोड़ने के लिए अदालत में "तलाक" (हिंदी में इसके लिए कोई एक शब्द नहीं है समासन के जरिये हम "विवाह विच्छेद" गढ़ते हैं) की दुरूह प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है. इस्लामिक रीति में भी इसकी ज़रुरत नहीं पड़ती. तीन बार कहा और हो गया. समस्या हिन्दू और ईसाई विवाह पद्यति की ज्यादा है. यही वज़ह है कि "लिव-इन-रिलेशन" विवाह के मामले में सभी धार्मिक रीतियों से ज्यादा "पोपुलर" हो रहा है. इसके तहत "मॉडर्न" महिला बच्चे पैदा कर सकती है और फिर अगर "मूड" बदला तो फिर किसी संपन्न खन्ना की तलाश में बच्चों को कुत्ते का जीवन व्यतीत करने के लिए सड़क पर (या हर महीने कुछ पैसे दे कर आर्थिक रूप से कमज़ोर रिश्तेदार के घर) छोड़ सकती है. बच्चे का "बैगेज" साथ नहीं होगा तो उम्र मेक-अप से छिपा सकते है किसी खन्ना को फंसाने के लिए. खन्ना भी जानता है कि मेक-उप उतरने की बाद का चेहरा कैसा है. लेकिन वह भी जितनी नई –नई महिलाओं से "शादी बनाता" है उतनी हीं उसकी मार्किट वैल्यू होती है.



खन्ना इन्द्रानी को शादी न करते हुए भी रखता है, फिर छोड़ता है , फिर दोनों "आवश्यकतानुसार" के एक -दूसरे के साथ आ जाते हैं. इन्द्रानी भी यही करती है. इन्द्रानी और खन्ना उस नयी संस्कृति की अभिव्यक्ति है जो पश्चिमी उदारवाद, व्यक्ति स्वातंत्र्य, नारी उन्मुक्ति के नाम पर भारत के समाज को न केवल घायल कर रहा है बल्कि उसके जख्मों में मवाद पैदा कर रहा है. वैश्विक समाजशास्त्रीय सिद्धांत है कि माँ का अपनी कोख से पैदा बच्चे के प्रति ममत्व सबसे प्राकृतिक, प्रगाढ़ और अटूट होता है और उसके लिए माँ अपनी जान हंसते –हंसते दे देती है (अभी –कभी बेटा या बेटी भी) . इन्द्रानी भी अपनी बेटी शीना और बेटे मिखाइल की माँ है पर वह यह रिश्ता छिपाती है. छिपाने के लिए पैसे देती है और फिर जब उसे डर लगता है कि छिप नहीं पायेगा और ये औलादें संपत्ति में हिस्सा मांग सकती हैं या ब्लैकमेल कर सकती हैं तो वह अपनी हीं संतान को अपने तीन में से एक पति के साथ मिल कर मार देती है. मिखाइल कहता है कि अगर उस दिन वह भी वहां होता तो उसकी माँ उसे भी मार देती याने बच्चे का बैगेज हमेशा के लिए "डंप" कर देती है.



शरीर संरचना की ईश्वरीय या भौतिक व्यवस्था है कि शारीरिक सम्बन्ध होगा तो बच्चे पैदा होंगे दाम्पत्य सम्बन्ध का फॉर्मेट चाहे कोई भी हो. लेकिन इसकी काट भी है. बच्चे न होने के उपादान हैं. लिहाज़ा अगर किसी को जिन्दागी भर खन्ना तलाशना है और दाम्पत्य-जीवन को फैशन डिज़ाइनर के साप्ताहिक रूप से बदले जाने वाले ड्रेस की तरह जीना है तो इन उपादानों का इस्तेमाल कर सकता है ताकि न शीना पैदा होगी न मातृत्व की मजबूरियों के कारण शरीर शौष्ठव (फिगर) पर असर पडेगा.



आज प्रश्न यह है कि क्या किसी इन्द्रनी को या किसी खन्ना को यह अधिकार दिया जा सकता है कि शादी –दर शादी करता हुआ बच्चे पैदा करे और फिर उन्हें सडकों पर छोड़ दे और खुद दूसरी पार्टी में किसी इन्द्रानी पर डोरे डालता रहे या इन्द्रानी किसी और खन्ना या संपन्न पीटर की तलाश करती रहे.



पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित हो कर हमने कानून नहीं बनाये. आज दम्पत्ति में से कोई भी एक चाहे तो किसी अन्य व्यक्ति से शारीरिक सम्बन्ध बना सकता है अगर दूसरे को ऐतराज नहीं है. याने इन्द्रानी भी स्वतंत्र और खन्ना भी. लेकिन जहाँ पाश्चात्य देशों में राज्य के अभिकरण इन संबंधों से पैदा बच्चे की हिफाज़त का ज़िम्मा लेता है लिहाज़ा कोई इन्द्रानी किसी खन्ना से मिलकर अपने हीं कोख से पैदा बच्चे को नहीं मारती.



शीना हत्या के मामले ने भारतीय समाज को झकझोर दिया है. क्या उन्मुक्तता का अर्थ यहाँ तक बदल जाएगा कि हम लिव-इन रिलेशन के तहत हम नाजायज बच्चे पैदा करते रहेंगे और बगैर कोई जिम्मेदारी लिए उन्हें कुत्ते-बिल्ली का जीवन जीने को मजबूर करते रहेंगे. भारत के जींस में यह नहीं है नहीं राज्य के पास इन्टने संसाधन हैं कि दलित घुरहू या बैकवर्ड पतावारू के जीवन को बेहतर बनाने का प्राण छोड़ कर किसी धनी ऐय्यास इन्द्रानी और खन्ना की नाजायज पैदाइस को झेले. लिहाज़ा कानून बनाने की ज़रुरत है कि बचे पैदा किया तो दूसरी शादी तब तक नहीं जब तक बच्चे को पढ़ाने का खर्च और १४ साल तक पूर्ण मातृत्व नहीं देते. अन्यथा भारतीय समाज कुछ वर्षों में नाजायज औलादों का बसेरा बन जाएगा जिसमें न शिक्षा होगी न नैतिकता और तब हम उस फिसलन की राह पर होंगे जहाँ से गर्त हीं दीखता है ठहराव नहीं.
 
lokmat