Thursday, 25 June 2015

जनमत ही मीडिया का एकमात्र हथियार


मानव और पशु में एक मूल अंतर है. ईश्वर ने मानव में भावना-जनित करुणा और बुद्धि-जनित नैतिकता दी है जो पशु में नहीं होती. नतीजा यह होता है कि कोई करुणा के अतिरेक में चैतन्य महाप्रभु बनता है तो कोई गाँधी बन कर सत्य के प्रति आग्रह जीवन का साध्य मानता है. मानव में ये दोनों पक्ष जितना हीं कम होते जाते हैं वह उतना हीं पशुवत होता जाता है. और जब ये दोनों विशेषताएं शून्य हो जाये तो मानव और पशु में कोई अंतर नहीं रह जाता. प्रजातंत्र में समाज की संस्थाएं – वे राज्य अभिकारण के रूप में हों जैसे मंत्रिमंडल या गैर- शासकीय संस्थाएं हों जैसे मीडिया या फिर सामाजिक विछोभ के रूप में सामूहिक गुस्सा हो जैसे जनाक्रोश— किन स्थितियों में कैसे अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करती है इससे यह पता चलता है कि हम पाशविकता से कितने नज़दीक है या दूर. 
भर्तृहरि ने नीति-शतक में कहा है “वारंगनेव नृपनीति: अनेक रूपा” ( एक दुश्चरिता की तरह राजा की नीति के अनेक रूप होते हैं). इंदौर में खनन माफियाओं ने एक पत्रकार के पूरे परिवार सहित मार दिया और सत्ता के अभिकरणों ने अपराधियों का साथ देते हुए उस पत्रकार पर हीं चारित्रिक दोष मढ़ दिए ताकि जन भावनाएं उसकी तरफ ने जाने पाए. उत्तर प्रदेश की सरकार भी कुछ इसी रास्ते पर चल रही है.
लेकिन प्रजातंत्र की एक खूबसूरती है कि जब राज्य की शक्तिमान संस्थाएं अमानवीय होती है तो कोई ना कोई गैर-राज्य संस्था या अदालतें तन के खडी हो जाती हैं. ऐसे में मीडिया की भूमिका भी काफी महत्वपूर्ण हो जाती है. यही वह गैर-राज्य संस्था है जो जनमत का दबाव बनाती है और सत्ता में बैठे लोगों को उनकी पाशविक प्रवृति से खींच कर बाहर आने को मजबूर करती है. क्या आज भारतीय शीर्ष मीडिया यह कर रही है?   
उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में एक पत्रकार जागेन्द्र को पुलिसवालों ने पेट्रोल डाल कर जिन्दा जला दिया. उसका मृत्यु –पूर्व बयान  मात्र किसी मानव -रुपी मजिस्ट्रेट ने नहीं लिया लिहाजा शक की कोई गुंजायश नहीं है. बल्कि कैमरे ने भी रिकॉर्ड किया. पूरे विश्व में अपराध-शास्त्र में सर्व-मान्य सिद्धांत है कि मरने के पहले आदमी झूठ नहीं बोलता क्योंकि वह अपने बनाने वाले से मिलते समय अपनी होठ पर झूठ लिए नहीं जाना चाहता. भारतीय साक्ष्य कानून, १८७२ की धारा ३२ (१) में इसी वज़ह से इसे एक उच्च स्तरीय साक्ष्य महत्ता का मकाम हासिल है.  इस पत्रकार ने यह बयान तब दिया जब ६० प्रतिशत जलने के बाद अस्पताल में था और मौत को कई दिन से नज़दीक आते देख चुका था. चिकित्सा शास्त्र के अनुसार ३० प्रतिशत से ज्यादा जलने पर किसी का बचना लगभग असंभव होता है. और जिले के पत्रकारों को यह बात मालूम है. जागेन्द्र को भी पता था कि मृत्यु आसन्न है.  उसने कहा कि उसे थानाध्यक्ष श्री प्रकाश राय ने उत्तर प्रदेश के एक राज्यमंत्री राममूर्ति वर्मा के इशारे पर पहले मारा फिर पेट्रोल छिड़क कर आग लगा दिया. शायद कोई हिंसक जानवर भी अन्य जानवर का शिकार इस तरह नहीं करता.
सत्ता में बैठे एक मंत्री ने जब पहली बार इस घटना पर प्रतिक्रया दी तो उसके चेहरे पर कोई विषाद या करूणा का भाव दूर-दूर तक नज़र नहीं आया. तिरस्कार का भाव ज़रूर दिखाई दिया.  जुमला वही पुराना था “जाँच की जायेगी”. कौन करेगा जांच? वही खाकी वर्दी वाला और उसी मंत्री के प्रभाव में. और फिर भी हम मानलें कि दूध-पानी अलग होगा. पाशविकता की जाँच शक्ति-सम्पन्नता से नहीं होती. फिर, क्या मृत्यु-पूर्व बयान क्या किसी मुख्यमंत्री या उसके रिश्तेदार मंत्री को उद्द्वेलित करने के लिए काफी नहीं था? क्या अपेक्षित नहीं था कि सबसे पहले इस मंत्री को पद से हटाया जाये और जांच की निष्पक्षता के लिए हर वे प्रयास किये जाये जिससे प्रदेश की जनता की सामूहिक चेतना पर कुछ मरहम लग सके? क्या एक जाति –विशेष के वोट के लिए एक पाशविक घटना को भी उसी “जाँच की जायेगी” के सत्ता-पोषक जुमले में समाहित करने से कर्तव्य की इतिश्री हो जायेगी?
घटना के पहले जागेन्द्र ने क्या लिखा था इस मंत्री व दरोगा राय के खिलाफ बलात्कार के आरोप को लेकर और मृत्यु –पूर्व बयान में उसने कैसे बताया था कि मंत्री की तरफ से धमकियाँ मिल रही थी और कैसे यह मंत्री अवैध खनन का रैकेट चलता था ये सारे तथ्य (जो जागेन्द्र के लेखन का हिस्सा होकर पारिस्थितिक साक्ष्य) के रूप में मौजूद हैं. और जिससे अपराध-शास्त्र के सिद्धांत “मेंस रिया”  (आपराधिक मंतव्य) की स्पष्ट पुष्टि होती है. पर शायद सत्ता में बैठे लोग में करुणा या नैतिकता खोजना बालू से तेल निकालने जैसा है. सत्ता पाशविक है यह प्रदेश सरकार की “जांच की जायेगी” प्रतिक्रिया से जाहिर हो जाती है.
पूरी दुनिया में आपराधिक रूप से भ्रष्ट तंत्र का एक खास चरित्र होता है. वह तीन काम करता है. पहले  वह अपने विरोधियों पर अलग-अलग हमला करता है. उस व्यक्तिगत हमले में अपने शिकार को  ना केवल आहत करता है या समाप्त करता है बल्कि यह कर के अन्य लोगों को डराता है और जन-भावना को विमुख करने के लिए वह कभी इसे ब्लैकमेलर बताता है तो कभी एक प्रेम-पत्र रख कर उसके चरित्र के प्रति शंका पैदा करता है. इस मामले में भी सत्ता के दलाल अभिकरण कुछ ऐसे हीं प्रयास करते दिखाई दे रहे हैं. आरोपी इंस्पेक्टर राय ने अपने बयान में कहा कि जागेन्द्र पर “गंभीर अपराध” के मामले थे और वह और उनका दल उसी की तफ्तीश के लिए गया था. सत्ता का जब यह भाव रहेगा तो हत्या-आरोपी दरोगा पत्रकार जागेन्द्र को आसानी से अपराधी बता सकेगा और मुख्य गवाह आंगनवाडी कार्यकर्ता जो मजिस्ट्रेट के सामने हीं नहीं मीडिया के सामने भी लगातार कह रही थी कि पेट्रोल छिड़क कर पुलिसवालों ने मारा अचानक पलट कर कहने लगी “जागेन्द्र ने स्वयं को जलाया”. यह वही महिला है जिसने मंत्री और इस पुलिस अधिकारी के खिलाफ अपने पर सामूहिक बलात्कार का मुकदमा किया है. जागेन्द्र इस बात को पुर-जोर तरीके से सोशल मीडिया में उठा रहे थे. गवाह का बयान  बदलवाना शक्तिशाली और साम-दाम, दंड-भेद में पारंगत सत्ता के पाशविक अभिकरणों के लिए बेहद आसान होता है. जागेन्द्र के पुत्र ने इस पर प्रतिक्रिया में कहा “मंत्री का इस इलाके में दहशत है और मुख्य गवाह का अपनी पूर्व बात से अचानक बदल जाना इसी दहशत को दर्शाता है”. 
जागेन्द्र एक छोटा पत्रकार था. छोटा याने बड़े अखबार का बड़े शहर में रहने वाला . मोटो तनख्वाह पाने वाला पत्रकार नहीं था. शायद इस बिरदारी का दोष है कि जिले या  कस्बे के पत्रकार जो आपराधिक सत्ता वर्ग के निचले स्तर से ज्यादा खतरे में रहते हैं उसे ऊपर का पत्रकार वर्ग हिकारत से देखता है और उसके खतरों को कम हीं संज्ञान में लेता है,
अगर देश का “नेशनल मीडिया”  भारत के  किस मंत्री ने सात समन्दर पर ब्रिटेन के किस महकमें को कब क्या लिखा है पता कर सकता है तो वह अपने रिपोर्टर भेज कर इस विवाद में घिरे खनन माफिया मंत्री का पिछले इतिहास भी पता कर सकता था. यह भी पता कर सकता था कि कब और करों मंत्री और पुलिस इंस्पेक्टर राय किस किस्म के आपराधिक नाभि-नालबद्धता से काम करते रहे हैं?

आज ज़रुरत है कि बगैर यह सोचे हुए कि कौन किस स्तर का पत्रकार है देश की सारी मीडिया एकजुट हो कर उत्तर प्रदेश की आपराधिक रूप से मदांध सत्ता को बताये कि जनमत को सही दिशा देना किसी दरोगा राय या किसी मंत्री वर्मा के बूते का नहीं रहे गया है. ना हीं “जांच कराई जायेगी” का जूमला फेंक कर कोई मुख्यमंत्री जनाक्रोश से बच पायेगा.      

jagran

Saturday, 17 January 2015

बंद करें संवेदना आहत होने का खेल, बदलें संविधान






हर बात में हमारी संवेदना आहत होने लगी है. किसी ने सोशल मीडिया पर कुछ लिख दिया तो हम आहत संवेदना लिए लाठी लेकर खड़े हो जाते हैं, कोई चित्र बना देता है तो हम अपनी फटी-कटी संवेदना के साथ दंगा करने के भाव में आ जाते हैं. वंदेमातरम् गान पर भी संवेदना आहत होती है. हमारी संवेदनाओं के आहत होने का सीमा धार्मिक-सांप्रदायिक मुद्दे तक हीं महदूद हैं. ये संवेदनाएं तब आहत नहीं होती जब गरीबी के कारण हम अपने बच्चे को स्कूल न भेज कर मात्र प्रारंभिक धार्मिक तालीम दे कर उसे साइकिल का पंचर जोडनेवाला बना देते हैं या उसका बचपन छीन कर टोकरी बुनने, अथवा चंद पैसों के लिए किसी सेठ -सेठानी के पाँव दबाने, ढाबे में बर्तन धोने में लगा देते हैं. सरकारी अस्पताल में डॉक्टर के न उपस्थित रहने या दवा न मिलने के कारण जब वही बच्चा मर जाता है तो भी हमारी संवेदनाएं आहत नहीं होती और तब हम गुस्से में लाठी लेकर या दंगे के भाव में भ्रष्ट सिस्टम को चुनौती नहीं देते. गाँव में स्कूल न होने, राशन विभाग में भ्रष्टाचार होने पर भी हमारी संवेदनाएं अक्षुण्ण रहती हैं. हमारी संवेदनाएं तभी २४ कैरट की रहती हैं जब हम सड़कों पर भीख माँगते, नशा करते या अपराधी बनते बच्चे को देखते हैं. जब एक बाबा आसाराम बलात्कार के आरोप में जेल चला जाता है तो हम दूसरे बाबा रामपाल के यहाँ खड़े हो जाते हैं. संवेदनाएं तब भी तर्क के साथ नहीं देती.        
क्यों पूरा समाज हमारी “संवेदना के आहत होने के” भाव का खामियाजा भुगते और युवा पौध के बड़े वर्ग को अज्ञानता के अन्धकार में रखते हुए मात्र साइकिल का पंचर जोड़ने वाला बना रहने दे? कोई अपने बच्चे को चुटिया रखवा कर वेदपाठी बना कर समझता है कि सनातन धर्म का भला कर रहा है तो कोई मात्र कुरआन शरीफ की कुछ आयतें रटा कर इस्लाम को मजबूत करने का दंभ भरता है. क्या आज ज़रूरी नहीं है कि धर्म के नाम पर चल रही  दूकाने बंद कराकर समाज को एक नयी आधुनिक सोच वाला बनाया जाये जहाँ गरीबी न हो, अशिक्षा जनित धर्मान्धता न हो और जहाँ आन्दोलन हो तो धर्म या जाति के आधार पर नहीं बल्कि भ्रष्टाचार और कुशासन के खिलाफ?
अब एक और पहलू देखें. पश्चिमी समाज से आयातित महिला विमुक्तिकरण (वीमेन लिबरेशन) की अवधारणा के तहत हम इस बात के लिए तो यह कहते हुए सडकों पर आ जाते हैं कि नारी कम कपडे पहने तो “परम्परावादी” वर्ग के पेट में दर्द क्यों, लेकिन वही नारी परिवारों में समान अधिकार के तहत स्कूल जाये और जन्म से पहले भ्रूण के रूप में हीं ना मारी जाये इसके लिए आधुनिकतावादी कोई  आन्दोलन नहीं करते.  
एक अन्य स्थिति देखिये. कोई पांच साल पहले बिहार के छपरा जिले के एक गाँव के दलितों ले अपने बच्चों को पोलियो की दवा पिलाने से इनकार करते हुए स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों भगा दिया. उनकी मांग थी कि पहले बाज़ार जाने वाली सड़क बनवाओ. छपरा उन दिनों विश्व पोलियो अभियान की सुर्ख़ियों में था क्योंकि उस जिले में पोलियो देश में सर्वाधिक था –खासकर उस गाँव में. एक पोलियो की शिकार बच्ची का माँ ने इस लेखक के पूछने पर तर्क दिया.  “बच्चे के पैर ठीक भी हों तो वह चलेगा कहाँ. इससे तो अच्छा है कि पैर हो हीं नहीं?” क्या किसी माँ-बाप को यह अधिकार दिया जा सकता है कि वह अपने बच्चे को पोलियो की खुराक ने दे कर उसे जिन्दगी भर के लिए अपंग बनाये रखे अर्थात अपने वर्तमान के लिए बच्चे का भविष्य बिगाड़े? अभी तक राज्य के पास कोई कानून नहीं है जो इन अभिभावकों को इन बच्चों के भविष्य को अपंग न बनाने के लिए मजबूर कर सके.
अब ज़रा भारतीय संविधान पर गौर करें. इसमें अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा के लिए व शिक्षा और संस्कृति बनाये रखने के लिए सामूहिक अधिकार के रूप में और साथ हीं अल्पसंख्यक समूहों के अधिकार के रूप में तीन अनुच्छेद दिए गए हैं. अनुच्छेद २८ (१) के अनुसार पूर्णतः सरकारी फण्ड से संचालित शिक्षण संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा नहीं जायेगी. लेकिन वहीं २८(२) कहता है कि ऊपर का अनुच्छेद २८(१) नहीं लागू होगा अगर वह संस्था किसी ऐसे ट्रस्ट या एंडोवमेंट के तहत जो धार्मिक शिक्षा देने की मंशा से है, स्थापित की गयी है, भले हीं वह संस्था राज्य द्वारा प्रशासित हो. यहीं आगे २८(३) बताता है कि ऐसी  किसी भी शिक्षण संस्था के , जो राज्य द्वारा मान्यता-प्राप्त हो या जो राज्य के फण्ड से चल रही हो, किसी धार्मिक निर्देश (इंस्ट्रक्शन) में शामिल होना या किसी भी धार्मिक पूजा में उपस्थित होने की अनिवार्यता किसी ऐसे व्यक्ति को नहीं है जो उस संस्था में उपस्थित होता है. लेकिन साथ हीं यह भी कहा गया है कि अगर वह व्यक्ति अवयस्क है तो उसके अभिभावक की अनुमति ज़रूरी होगी. याने अभिभावक चाहे तो वह धार्मिक शिक्षा ले. मतलब यह कि बच्चा आधुनिक शिक्षा ले कि मदरसा में धार्मिक शिक्षा ले अपने व्यक्तित्व की इतिश्री मान ले यह अभिभावक पर निर्भर है. अगर वह अभिभावक बच्चे पैदा करने की बाद उसे बचपने में हीं साइकिल का पंचर लगने के लिए छोड़ दे , उसे सडकों पर भीख माँगने के लिए छोड़ दे और उसे भविष्य का अपराधी बनाने के लिए स्थितियां पैदा करे तो समाज या संविधान कुछ भी नहीं कर सकता. अगर कोई कानून बनाया जाता है तो उसे धार्मिक भावनाओं से छेड़ –छाड़ मान कर बवेला मचाया जा सकता है.
तहरीक-ए-तालिबान-ए-पाकिस्तान ने ऐलान किया कि लड़कियां घर से बहार निकल कर स्कूल नहीं जायेंगी. दूसरा फरमान था पुरुष डॉक्टर महिलाओं के शरीर को नहीं छू सकता. अब चूंकि लड़कियां पढ़ेंगी नहीं, पुरुष डॉक्टर महिला शरीर को हाथ नहीं लगाएगा लिहाज़ा पूरे फाटा क्षेत्र व उत्तरी और पश्चिमी वजीरिस्तान में महिलाएं आधुनिक इलाज और सर्जरी के अभाव में मर रहीं है. यह सब तालिबान धर्म के अलमबरदार के रूप में कर रहा है.
उधर पश्चिमी उदारवाद से प्रभावित हो कर पिछले साल भारत में एक कानून पास किया गया जिसके तहत कोई बच्चा अपने माँ-बाप के खिलाफ मुकदमा कर सकता है कि वह प्रताड़ित किया जा रहा है. याने अगर माँ –बाप बच्चे को पढ़ने के लिए एक चांटा मर देते है तो उन्हें जेल हो सकती है. विरोधाभास देखिये. एक अभिभावक पोलियो ड्राप न पिला कर बच्चे की जिन्दगी पंगु कर सकता है और एक अन्य उसको मात्र तथाकथित धार्मिक शिक्षा दे कर आधुनिक , रोजगार परक एवं तार्किक वैज्ञानिक शिक्षा से वंचित कर सकता है वहीं दूसरा अपने बच्चे को डांट भी नहीं सकता.
राष्ट्र के चरित्र में एक अजीब दोगलापन दिखाई देता है. एक तरफ धार्मिक भावनाओं को संरक्षित करने के नाम पर एक समाज को सोच के स्तर पर कुंठित करने के लिए संविधान निर्माताओं ने अलग शिक्षा का प्रावधान किया है और अगर लडकी को बच्चे पैदा करने की मशीन मात्र बनाये रखने को उस समुदाय की धार्मिक मर्यादाओं को सरक्षित करने का तथाकथित संवैधानिक अधिकार दिया है और दूसरी तरफ योग साधना और वन्दे मातरम को किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाला बता कर बाधित करता है. 
ताजिया  किधर से निकले या राम -लीला कहाँ हो इस बात पर दंगा, धर्म कैसे बदला इस बात पर दंगा, टोपी वाले ने तिलक वाले को क्या कहा इस बात पर दंगा लेकिन एक भी आन्दोलन इस बात पर नहीं कि गरीब बस्तियों में पानी क्यों नहीं, उनके बच्चों को भी वही शिक्षा क्यों नहीं, टीकाकरण से लेकर इलाज़ के लिए अस्पताल अल्पसंख्यक इलाकों में कम क्यों. क्यों अल्पसंख्यक और दलित हीं आज भी गरीब हैं और क्यूं कानून लाकर उनके बच्चों को स्कूल भेजना अनिवार्य नहीं किया जा रहा है?     

jagran
  

Wednesday, 31 December 2014

मीडिया विरोधी है कानून

अभिव्यक्ति की आजादी की स्वतंत्रता पर जिसमें मीडिया की स्वतंत्रता भी शामिल है जब भी राज्य की तरफ से हमला हुआ है तो यही कहा गया है कि इससे राष्ट्र की संप्रभुता, सुरक्षा और लोक व्यवस्था को क्षति पहुंचती है। ऎसा लगता है कि मीडिया की स्वतंत्रता को बाधित करने के लिए एक चौतरफा कोशिश चल रही है। कार्यपालिका ऑफिशियल सीक्रेट एक्ट के माध्यम से मीडया के हाथ बंाधने का प्रयास करती है। विधायिका विशेषाधिकार कानून से मीडिया को रोकती है। न्यायपालिक के पास अदालत की अवमानना का चाबुक है, तो सामान्य आदमी की जुबान पर लगाम लगाने के लिए मानहानि कानून है। मीडिया को बांधने के प्रयास सभी ओर से हो रहे हैं। तमाम सरकारी संस्थाओं ने अपने प्रतिवेदन और साथ ही सुप्रीम कोर्ट के फैसले में बार-बार यह कहा गया है कि गोपनीयता कानून की उपादेयता खत्म हो गई है। 12 जून 2006 को दो घटनाएं हुई। मोइली की अध्यक्षता वाले द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग ने अपनी रिपोर्ट जारी की जिसमें गोपनीयता कानून, 1923 को खत्म करने की अनुशंसा की गई। अनुशंसा का आधार था सूचना का अधिकार, 2005 का प्रभाव में आना। हालांकि उसी दिन किसी के जन्मदिन की पार्टी में मीका ने राखी सावंत का चुंबन किया और न्यूज चैनल दिन भर इस खबर को दिखाते रहे, पर यह खबर दबा दी गई। शायद राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को यह जानकारी नहीं है कि गोपनीयता कानून तकनीकी रूप से अब वजूद मे नहीं है। यह कानून अब अस्त्तिवहीन हो चुका है। मीडिया विरोधी अतीतयह कानून सबसे पहले ब्रिटेन में 1889 में मीडिया को दबाने के लिए वजूद में आया था। उसी समय यह भारत में भी लागू कर दिया गया था। हुआ यह था कि 11 साल पहले 1878 में ब्रिटिश फॉरेन सर्विस के एक कर्मी ने मारविन ने रूस और ब्रिटेन के बीच हुए एक करार को लीक कर दिया था, जो कि उस समय ग्लोग मैग्जीन में छपा। पूरी संसद में हंगामा हो गया। पूरे देश में सरकार के खिलाफ चर्चा होने लगी। चूंकि इस समय ऎसा कोई कानून नहीं था इसलिए मारविन को जेल नहीं भेजा जा सका। नया कानून भारत में भी लागू हो गया था, पर इस कानून में कड़े प्रावधान नहीं थे, लिहाजा आजादी के आंदोलन में सक्रिय देशभक्त पत्रकारों पर कार्रवाई नहीं हो पा रही थी। 1911 में ब्रिटिश संसद ने इसे नया प्रारूप दिया जो कि 1920 में पूरी तरह से लागू किया गया। भारत में इसी कानून को 1923 में ऑफिशियल सीके्रट एक्ट के नाम से लागू किया गया। यह तब से भारत में लागू चला आ रहा है। इसका प्रयोग पंडित नेहरू के कार्यकाल में खासकर 1951-52 के कार्यकाल में बार-बार हुआ। आज सूचना का अधिकार कानून आने के बाद इसका औचित्य नहीं रहा और यह निष्प्रभ हो गया है। भारत के संविधान में पहला संशोधन भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करने के लिए ही था जो कि नेहरू के कार्यकाल के दौरान ही लाया गया था। इस संशोधन के अंतर्गत अभिव्यक्ति को स्वतंत्रता को बाधित करने के लिए तीन निर्बंध शामिल किए गए, जो कि मूल संविधान में नहीं थे। ये संशोधन थे कि लोक व्यवस्था , विदेशी राज्यों के साथ दोस्ताना संबंध और किसी को अपराध के लिए उकसाने पर राज्य मीडिया को अथवा किसी व्यक्ति को अभिव्यक्ति से रोक सकता है। दंडित कर सकता है। इस संविधान संशोधन की भी एक कहानी है। थापर बनाम स्टेट ऑफ मद्रास मामले में सरकार को सुप्रीम कोर्ट में उस समय मंुह की खानी पड़ी जब "क्रॉसरोड" अखबार का प्रसार रोकने के लिए राज्य ने एक सर्कुलर जारी किया कि इन जगहों पर इस अखबार का प्रसार नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने इस सर्कुलर को गलत ठहरा दिया। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश को प्रभावहीन करने के लिए नेहरू संविधान के इस प्रथम संशोधन को लाए थे, जिसमें अभिव्यक्ति की, मीडिया की स्वतंत्रता को बाधित करने के लिए लोक-व्यवस्था के निबंüध को शामिल किया गया। इस दौरान 195 अखबारों के खिलाफ कार्रवाई की गई।


rajsthan patrika

२०१५ और मोदी की चुनौतियाँ – बाहर से ज्यादा अन्दर की



चीनी दार्शनिक कन्फ़्यूशियस ने कहा था: “एक अच्छे राजा को तीन चीज़ों की ज़रुरत होती है--रसद, हथियार और प्रजा का विश्वास. अगर एक ऐसी परिस्थिति उत्पन्न हो जाये कि उसे ये तीनों उपलब्ध न हो सकें और चुनाव करना हो तो उसे पहले रसद छोड़ना चाहिए, उसके बाद हथियार और आखिर में प्रजा का विश्वास.” अगर उस ज़माने में आज के प्रजातंत्र की अवधारणा होती तो शायद कन्फ़्यूशियस यह भी जोड़ते कि प्रजा के विश्वास का मतलब मात्र “बहुसंख्यक का विश्वास या केन्द्रीय या राज्य विधायिकाओं में विश्वासमत हासिल करना” नहीं होता. 
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर जनता ने विश्वास किया है. इस विश्वास की प्रकृति थोड़ा अलग है. ना तो यह कांग्रेस के नेहरु-इंदिरा शासन काल के दौरान स्वतन्त्रता काल की थकान वाला ऊनीदापन से पैदा होने वाला विश्वास है ना हीं १९७५ के आपातकाल के गुस्से का अस्थाई भाव. ना हीं १९८४ के४ एक नेता की ह्त्या पर उमड़ी शोक-जनित क्षणिक दया का भाव. मोदी के प्रति इस विश्वास में मंदिर-मस्जिद से पैदा साम्प्रदायिक उन्माद अगर था भी तो गौड़ पक्ष की रूप में. सन २०१४ के चुनाव परिणाम इस बात की दस्दीक हैं. यह बात इस तथ्य से भी सिद्ध होती है कि मंदिर उन्माद में भी बहुसंख्यक हिन्दू ने १९९६, १९९८ और १९९९ में भारतीय जनता पार्टी को औसतन मात्र २४ प्रतिशत मत दिए थे जो कि २००४ और २००९ के चुनावों में घटते-घटते १८.८ प्रतिशत तक आ गए थे. २०१४ के चुनाव में अगर पार्टी को ३१ प्रतिशत (या डेढ़ गुने से ज्यादा मत मिले) तो यह किसी भारतीय जनता पार्टी को नहीं सिर्फ मोदी को. जनता में एक बदलते भारत की ऐसी तड़प थी जिसे एक नेतृत्व चाहिये था. याने मोदी की वजह से यह विश्वास नहीं पैदा हुआ बल्कि मोदी इस विश्वास की उपज थे. मोदी में जनता ने एक ऐसा शासक देखा जो निरपेक्षरूप से बेहतर शासन देगा यानि मंदिर बनाने, या धर्म-परिवर्तन के लिए लंपटतावादी सोच बढाने के बजाय विकास करेगा. एक ऐसा शासन जिसमें भ्रष्टाचार नहीं होगा, जहाँ विकास मतलब मात्र सकल घरेलू उत्पाद में बढ़ोत्तरी नहीं होगी बल्कि उस बढ़ोत्तरी का मानव विकास सूचकांक बेहतर करने  से सीधा रिश्ता होगा.
                                             मोदी के पक्ष में तीन स्थितियां
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मोदी के पक्ष में राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक तीनों करक हैं. २४ साल बाद किसी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला है याने गठबंधन का सही-गलत दबाव नहीं है. अन्तर-राष्ट्रीय बाज़ार में तेल की कीमतों में जबरदस्त गिरावट का सरकार को सन २०१५ में लगभग ढाई लाख करोड़ रुपये का फायदा मिलगा जिससे राजकोषीय घटा कम होगा और विदेशी पूंजी निवेश के लिए माहौल बनेगा, अर्थ-व्यवस्था मज़बूत होगी. इसके साथ हीं जज्बे से भरा युवा वर्ग तकनीकी रूप से विधेश में अपनी पैठ बनाने में सक्षम हो रहा है और अगले वर्ष कमाया हुआ कोई ९० अरब डॉलर (पांच लाख करोड़ रुपये ) भारत में भेजेगा.
लेकिन नकारात्मक पहलू यह है कि अबकी बार रबी का रकबा कम हुआ है और कृषि उत्पादन कम होने की भारी आशंका है. लिहाज़ा एक जबरदस्त भ्रष्टाचार मुक्त सरकारी मशीनरी की ज़रुरत है जो कि ग्रामीढ़ भारत को इन लाभों को भेज सके और कृषि उत्पादन को नयी दिशा में अग्रसर कर सके. “मेक इन इंडिया” के नारे के तहत लोगों को रोजगार मुहैय्या हो सके. विकास की एक अन्य शर्त है कि देश में माहौल शांत और विकास की ओर उन्मुख हो.   
मोदी के प्रति इन सब का विश्वास है. लेकिन यह विश्वास भी शाश्वत नहीं होता. इसकी भी एक मियाद होती है. ऐसे में अगर प्रधानमंत्री के सामने चुनौतियाँ सन २०१५ में होने वाले दिल्ली और बिहार के चुनाव जीतने की हीं नहीं है बल्कि वह विश्वास भी कायम करने की है जो जनता ने उन पर रखा है. मोदी को भूलना नहीं चाहिए कि ऐसा हीं विश्वास दिल्ली की जनता ने अरविन्द केजरीवाल को दिया था लेकिन छह महीने में वह विश्वास कम होने लगा.
मोदी को यह भी ध्यान रखना होगा कि सन २०१४ के आम चुनाव में जो १० लोग मत देने गए थे उनमें मात्र तीन (३१ प्रतिशत) ने हीं उन्हें अपना समर्थन दिया. ताज़ा झारखण्ड और जम्मू-कश्मीर के चुनाव इस बात की गवाही हैं कि अगर मुख्य -विपक्ष कांग्रेस का अपने गठबन्धनों को कायम रखती तो परिणाम कुछ और होते.
उदाहरण के लिए बिहार को लें. जहाँ कांग्रेस ने अपनी अदूरदर्शिता का फायदा इन दोनों राज्यों में भारतीय जनता पार्टी को बढ़त दिलाकर दे दिया वहीं बिहार के दोनों पूर्व मुख्यमंत्रियों –नीतिश कुमार और लालू प्रसाद यादव—ने अपनी वर्षों पुरानी दुश्मनी दफना कर गठबंधन की राजनीति का एक नया आगाज़ किया. इस गठबंधन पर लोगों का विश्वास भी बढ़ा है और इसकी अनुगूंज से उत्तर हीं नहीं दक्षिण भारत की गैर-कांग्रेस और गैर-भाजपा दल भी मुतास्सिर हुए बिना नहीं रह सके हैं. एक बार फिर “जनता परिवार” साथ होने लगा है. जो भी राजनीतिक विश्लेषक बिहार को ठीक से समझते हैं वे वह कह सकते हैं अगर कांग्रेस ने “एकला चलो रे” वाली पुरानी भूल ना दोहराई तो २०१५ के उत्तरार्ध में होने वाले विधानसभ चुनाव में मोदी का विजय रथ का घोड़ा यहीं थम जाएगा. जनता परिवार अगर आपसी कलह का शिकार न हुआ तो वोटों का बिखराव रूकेगा. इसके बाद मोदी को राजनीतिक तौर पर लगातार देश के अन्य हिस्सों में चुनौती मिलती रहेगी.
मोदी की जो सबसे बड़ी चुनौती सन २०१५ में रहेगी वह है संघ परिवार से. बाबरी मस्जिद ढहने के बाद के एक नहीं आधे दर्जन आम चुनावों ने सिद्ध कर दिया कि हिन्दू मूलरूप से उदारवादी है और कट्टरवादी धार्मिक उन्माद से अपने को दूर रखता है. वर्ना देश की ८० प्रतिशत आबादी हिन्दू है फिर भी आज तक इस पार्टी को पिछले ३० सालों के मंदिर आन्दोलन के दौरान औसतन आठ में से दो हिन्दू हीं क्यों वोट देता.
प्रजातंत्र की एक खराबी यह भी है कि सत्ता में जब भी परिवर्तन होता है तो समाज का एक बड़ा लम्पट वर्ग सशक्तिकरण की झूटी एवं स्व-घोषित चेतना से सुसुज्जित हो कर भ्रष्टाचार या अन्य आड़े-तिरछे या कानूनेतर कामों में लिप्त होने लगता है. उदाहरण के तौर पर हाल हीं में एक हिन्दू संगठन के नेता ने गोडसे की मूर्ति लगाये जाने की वकालत करते हुए एक टीवी चैनल के डिस्कशन में तीन बातें कहीं: (१) गाँधी लाखों लोगों के हत्यारे थे (२) नेहरु ने उनकी हत्या कराई थी और (३) इस हिन्दू संगठन ने मोदी और भारतीय जनता पार्टी को २०१४ के चुनाव में जिताने में अपनी पूरी शक्ति लगा दी थी. पहली दो बातें तो उस नेता या दल की सोच के निम्न स्तर को समझते हुए ख़ारिज की जा सकती है पर तीसरी बात यह साबित करती है कि प्रधानमंत्री के सुशासन में क्या-क्या अवरोध आने शुरू हो गए हैं और कैसे उनकी विश्वसनीयता घटने की स्थिति तैयार होने लगी है.
मोदी की दूसरी चुनौती यह होगी कि क्या वह इस बात को भूलते हुए कि उनको यहाँ तक लाने में मातृसंस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अप्रतिम भूमिका रही है, याने क्या वह यह बता सकेंगे कि हमेशा के लिए नहीं तो कम से कम पांच साल के लिए सड़क बनवाना, फैक्ट्री लगवाना, अस्पतालों या शिक्षण संस्थाओं या रेलवे टिकट बुकिंग में भ्रष्टाचार कम करना, किसान को खाद और पानी मुहैया करवाना मुसलमान को हिन्दू बनाने से ज्यादा प्रभावी और सार्थक कदम होगा क्योंकि गरीब मुसलमान बने या हिन्दू वह गरीब हीं रहेगा.                        
आज़ादी के ६५ साल में यह विश्वास टूटता गया था. हमें लगने लगा था कि ऱाजा पांच साल में एक बार आता है, हमारे मरते विश्वास को “कोरामिन” का इंजेक्शन दे कर कुछ क्षण के लिए जिन्दा करता है और फिर वह शासन (या शोषण) करने चला जाता है. उसने यह मान लिया था कि शोषण उसकी नियति है याने खरबूजा चाकू पर चले या चाकू खरबूजे पर , कटेगा खरबूजा हीं. मोदी को अपना विश्वास दे कर जनता ने यह अपेक्षा की है कि “राजा अपनी तीसरी चीज (जनता का विश्वास) कायम रखेगा.” क्या मोदी इस विश्वास पर खरे उतरेंगे? दूसरी स्थिति यह बन सकती है कि देश सांप्रदायिक रूप विभाजित हो जाये और अल्पसंख्यकों में दहशत का माहौल घर कर जाये. मोदी चुनाव तो जीत जायेंगे पर विश्वास हार जायेंगे. “बगैर विश्वास का राजा” !!!! सोच के हीं डर लगता है. 

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Tuesday, 23 December 2014

झारखंड के परिणाम के मायने ?

झारखण्ड में भारतीय जनता पार्टी की जीत के बारे में अनुमान लगना कोई राकेट साइंस नहीं था. एक तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी थे जो अपनी पार्टी भारतीय जनता पार्टी की कमियों के बावजूद जनता को लुभा रहे थे तो दूसरी तरफ अवसादग्रस्त कांग्रेस थी और उसके साथ हीं आदिवासी वोटों को बंटती क्षेत्रीय पार्टियाँ थीं.
नए राज्य के रूप १४ सालों में नौ मुख्यमंत्री और तीन बार राष्ट्रपति शासन याने एक शासन काल औसतन १३ महीने का. मानव विकास सूचकांक पर २४वेन पायदान पर. भ्रष्टाचार में कई मुख्यमंत्री जेल में तो कई पर गंभीर आरोप. सारे के सारे आदिवासी मुख्यमंत्री और इनमें से अधिकांश समय भारतीय जनता पार्टी का शासन. फिर भी अगर जनता ने इस पार्टी को चुना तो इसे सामाजशास्त्र और चुनाव शास्त्र के नए पैमाने पर देखना होगा. पूरे चुनाव में लगभग यह भी संकेत मिलते रहे कि भारतीय जनता पार्टी अबकी बार आदिवासी मुख्यमंत्री के रूप में पेश नहीं करेगी. फिर मोदी पर इतना विश्वास क्यों?  
इन प्रश्नों के उत्तर जानने के पहले हमें कुछ अन्य तथ्य समझने होंगे. भारत में प्रचलित चुनाव पध्यति -- फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट (एफ पी टी पी)— की एक बड़ी खराबी है किसी पार्टी के पड़े मतों के प्रतिशत और हासिल हुआ सीटों के प्रतिशत में कोई अनुपात नहीं होता. कई बार किसी पार्टी को पिछले चुनाव से ज्यादा मत प्रतिशत मिलते हैं लेकिन सीटें घट जाती है और कई बार मत प्रतिशत कम हो जाता है लेकिन सीटें बढ़ जाती हैं. आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को मत मिले ३१ प्रतिशत लेकिन सीटें ५२ प्रतिशत. झारखण्ड में भी यही स्थिति रही है. भारतीय जनता पार्टी की सीटें जीतने और मत प्रतिशत हासिल करने में अनुपात वही नहीं रहा.
यहाँ दो किस्म के विश्लेषण किये जाते हैं. यह बात सहीं है कि आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को कुल ८१ सीटों में से ५६ सीटों पर बढ़त मिली थी लेकिन विधान सभा में इन सभी सीटें जीत नहीं रहीं. साथ हीं मत प्रतिशत भी आम चुनाव के मुकाबले १३ प्रतिशत कम रहा. लेकिन तर्क-शास्त्र का तकाजा है कि हम तुलनेय के बीच हीं तुलना करते हैं और इस अधर पर हमें पिछले विधान सभा में बी जी पी की क्या स्थिति रही थी इसके मुकाबले अब की बार पार्टी कहाँ है यह देखना होगा. और तब हम यह कह सकते हैं कि जहाँ झारखण्ड मुक्ति मोर्चा (जी एम् एम् ) ने आदिवासी क्षेत्रों में मोदी के प्रभाव को काफी हद तक प्रभावहीन किया और वह सत्ता में रहने के बावजूद वहीं तमाम आदिवासी नेता चुनाव हारे भी.
इस चुनाव का सबसे बड़े सन्देश यह है कि महज आदिवादी नेता होना अब २८ प्रतिशत आदिवासियों का वोट हासिल करने का दारोमदार नहीं रहा. शायद आदिवादी आज अपने को इन नेताओं द्वारा ठगा महसूस कर रहे हैं.   
झारखण्ड चुनाव के नतीजों को भी इससे चश्में से देखना होगा. एफ पी टी पी के सबसे अच्छे परिणाम तब आते है जब एक तरफ एक मजबूत राजनीतिक दल या नेता की स्वीकार्यता हो तो दूसरी तरफ उतना हीं सुगठित विरोधी एकता हो. इस चुनाव में या आम चुनाव में भी एक तरफ मोदी एक जबरदस्त जन स्वीकार्यता ले कर विकल्प के रूप में रहे तो दूसरी तरह इस स्वीकार्यता को प्रभावहीन करने का विकल्प रहा हीं नहीं. या रहा तो बंटा रहा. आदिवासी नेताओं की अपनी विश्वसनीयता ख़त्म होती गयी और वे आपस में बंटे रहे जिसकी वजह से १४ सालों में मात्र अस्थिरता, भ्रष्टाचार और कुशासन का बोल-बाला रहा.
झारखण्ड आदिवासी बाहुल्य (२८ प्रतिशत) वाला राज्य है. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एन सी आर बी) के आंकड़ों के अनुसार यहाँ हर छह दिन में एक औरत को, जो मनोविकार से पीड़ित है और जिसे मनो-चिकित्सक द्वारा इलाज की दरकार है पत्थरों से या अन्य रूप से सामूहिक तौर पर मार दी जाती है यह मानते हुए कि वह डायन है और पूर गोंव को खा जायेगी. याने समाज का एक वर्ग है जो अभी भी चेतना, अपेक्षित जानकारी और तर्क-शक्ति के स्तर पर बेहद नीचे है और लम्बे समय से शोषण का शिकार रहा है. अलग राज्य की मांग एल लम्बे समय से जाली आ रही थी जिसे १४ साल पहले अंजाम दिया गया. आदिवासी नेता उभरे सत्ता में आये, अधिकांश ने भ्रष्टाचार किया. आदिवासी स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया लेकिन प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के लिए देश के हर कोने का शोषक यहाँ डेरा डालने लगा. नतीज़तन आदिवासियों का प्रतिशत कम होता रहा. गरीबी बढ़ती रही.
ऐसे में जो राजनीतिक व्यवहार शहरी या बाहर से आये वर्ग का हो वही यहाँ के मूल निवासियों यह एक पहेली है. संपन्न शहरी वर्ग या गैर-आदिवासी भी भारतीय जनता पार्टी या उसके नेता नरेन्द्र मोदी को वोट दे और दूसरी तरफ आदिवासी भी इसको चुनाव विज्ञान की दृष्टि से समझना कुछ दुरूह कार्य है.
प्रश्न यह है कि अगर भारतीय जनता पार्टी १४ सालों में ज्यादातर समय शासन में रही और आदिवासी मुख्यमंत्री रहे, फिर भी अपनी सारी कमियों के बावजूद जनता ने  मोदी पर इतना विश्वास क्यूं किया? इसमें कोई दो राय नहीं है कि झारखण्ड की जनता ने पूरे देश की तरह हीं मोदी को भारतीय जनता पार्टी के नेता के रूप में नहीं बल्कि एक परा-पार्टी नेतृत्व के रूप में देखा याने पार्टी की नकारत्मक छवि मोदी की छवि को धूमिल नहीं कर पाई .
दूसरी ओर जो वर्ग इस पार्टी की कमियों से नाराज था (और वह एक बड़ा वर्ग रहा है) उसे यह नहीं समझ में आ रहा था कि वह किसे विकल्प के रूप में चुने जो मोदी से बेहतर हो. कांग्रेस को पूरे चुनाव के दौरान लकवाग्रस्त पाया गया. बाकि पार्टियों में बिखराव अपनी चरम पर था.
बिहार में नीतीश कुमार ने जहाँ इस स्थिति को पहचान लिया और इस बिखराव को रोकने के लिए और सषक विकल्प देने के लिए अपने धुर –विरोधी लालू प्रसाद यादव से चुनाव के डेढ़ साल पहले हीं हाथ मिला लिया झारखण्ड के गैर-भाजपा नेताओं में यह विवेक नहीं दिखा. कांग्रेस यह कार्य कर सकती थी लेकिन वह कहीं मरणासन्न अवस्था में कोने में सिमटी दिखाई दी .
भारतीय जनता पार्टी की इस जीत के पीछे संघ का वर्षों का कार्य भी एक नियामक भूमिका में रहा है. और अब केंद्र के समर्थन से शायद मोदी और पार्टी की एक-सूत्रीय कार्य होगा नक्सलवाद को ख़त्म करना. इसके लिए जो भी बल  प्रयोग करना पड़े या प्रभावित क्षेत्रों में विकास करना पड़े न नयी सरकार करेगी ताकि देश भर में एक सन्देश जाये और दूसरी और संघ अपने प्रभाव को आदिवासी क्षेत्रों में और विस्तृत कर पाए.
लेकिन मोदी की व्यापक जन-स्वीकार्यता के पीछे का एक कारक और है जो भूलना नहीं चाहिए. वह यह कि जहाँ भी चुनाव हो रहे हैं वहां भाजपा शासन में नहीं रही है इसे एंटी-इन्कोम्बेन्सी का दंश नहीं झेलना पडा है. असली टेस्ट तब होगा जब भाजपा शासन के बाद चुनाव हो.   


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Sunday, 21 December 2014

सांप ट्रेनिंग नहीं मानता, नहीं कोई सांप “अच्छा” होता हैं


सांप ट्रेनिंग नहीं मानता. बीन की धुन पर फन हिलाने का दृश्य धंधे के लिए मदारी करता है. दरअसल सांप के कान हीं नहीं होते तो सुनेगा कैसे, बीन हो चाहे बांसुरी? तीन साल पहले अक्टूबर, २०११ में अमरीकी विदेशमंत्री हिलेरी क्लिंटन ने पाकिस्तान के शीर्ष अधिकारियों से एक बैठक में कहा था कि अपने आँगन में सांप पालोगे और चाहोगे कि “ वह केवल पडोसी (भारत) को (अच्छे तालिबानी की तरह) काटे, यह संभव नहीं है”. सांप बढ़ते गए. पाकिस्तान की गली , मोहल्ले. चौराहे इनसे पटे पड़े हैं. पाकिस्तान की आर्मी अगर पांच लाख सैनिकों की है तो देश में आतंकवादी २.५० लाख से ऊपर पहुँच चुके हैं. इसके तीन गुना सक्रिय समर्थक हैं. बाकि लोग दहशत में इनके सामने सज्दारेज़ हैं.
राष्ट्र और उसके समाज की सम्यक उन्नति की एक शर्त है कि वह कुछ खास लम्हों में सामूहिक सोच में गुणात्मक परिवर्तन करे और संयुक्तरूप से तन के खड़ा हो. इस सोच को विकसित करने में शिक्षा, तर्क-शक्ति, तथ्यों का जन-संवाद के धरातल में पूर्णरूप से आना जरूरी होता है. उधर आतंकवाद के जिंदा रहने की एक हीं शर्त है—व्यकतिगत भय. पेशावर बाल नरसंहार के बाद आज जब थोडा बहुत सामूहिक प्रतिकार की जन चेतना का भाव बनने लगा है तो तहरीक-ए-तालिबान-ए-पाकिस्तान  ने ताज़ा धमकी दी है कि वे राजनेताओं और सैनिक अधिकारियों के बच्चों को निशाना बनायेंगे.  सामान्य आदमी तो छोडिये, जज, सेनाधिकारी, राजनेता, पुलिस अधिकारी सब के परिवार है, बच्चे हैं और रिटायरमेंट हैं. सांप घर में हीं फुफकारने लगा है.
आज़ादी के पहले २५ सालों यह मात्र छिटपुट कट्टरपंथ के रूप में रहा. लेकिन उसके बाद धीरे-धीरे यह बढ़ता गया. राज्य अभिकरणों ने इसका इस्तेमाल करना शुरू किया. सैनिक शासकों ने इसका इस्तेमाल भारत और अफ़ग़ानिस्तान के खिलाफ किया तो राजनेता भुट्टो ने एक कदम आगे बाद कर. पाकिस्तान का संविधान १९७३ में औपचारिकरूप से धर्मनिरपेक्ष से धर्म-सापेक्ष हुआ  और इसे एक इस्लामिक राज्य बना दिया गया. एक कदम और बढ़ाते हुए मदरसा शिक्षा को राज्य के नियंत्रण से बाहर कर दिया गया. सैनिक शासक जिया क्यों पीछे रहते. उन्होने मदरसे के शिक्षा हासिल करने वालों को एम् ए के समकक्ष डिग्री की मान्यता देदी. आतंकवाद की पौध लगने लगी. मदरसों की संख्या जो पाकिस्तान की आज़ादी के समय मात्र २४५ थी वह पाकिस्तान के शिक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार सन २००० में ६७६१ हो गयी. आज एक अनुमान के अनुसार आज पाकिस्तान में करीब १२,००० मदरसे हैं जिनमें से ६००० केवल पंजाब सूबे में हैं. विडम्बना यह है कि आज़ादी के ६५ साल में पाकिस्तान की साक्षरता में मात्र १० प्रतिशत की हीं वृद्धि हुई है.
तालिबानीकरण की प्रक्रिया में पहले तो गरीब अपने बच्चों को इस लिए मदरसा भेजता था क्योंकि वहां खाना भी मिलता था और रहने को भी जो सरकार के नियंत्रण वाले औपचारिक विद्यालयों में नहीं उपलब्ध था. सन २००४ में एक बार सरकार ने चाहा कि सरकारी मदद इन मदरसों को बढा दी जाये बशर्ते इनमें अन्य विषयों की शिक्षा भी उपलब्ध हों. मदरसों ने इसे ख़ारिज कर दिया. आज ये मदरसे ना केवल आतंकियों की पौध लगते हैं बल्कि उन्हें एक उद्योग के रूप में तालिबानियों को बेंच कर पैसे कमाते हैं. उधर फाटा क्षेत्र में और उत्तरी एवं दक्षिणी वजीरिस्तान गाँव में सुसाइड बम की बेल्ट बनाने का कुटीर उद्योग बन गया है और इन बेल्टों से लैस आत्मघाती बाल दस्तों को अन्य आतंकी संगठनों को बेंच रहे हैं.
जब सब संस्थाएं ढहने लगती हैं तो एक उम्मीद होती है न्यायपालिका से. लेकिन पाकिस्तान में वह शुरू से हीं कमजोर और मौकापरस्त रही. १९५८ में जब पहली बार गें अय्यूब खान के शासन की वैधता को लेकर मशहूर “दोषी” केस सुप्रीम कोर्ट में आया तो इसे कोर्ट ने बेशर्मी की हद तक जाते हुए इसे  “क्रांतिकारी वैधानिकता का सिद्धांत” बताते हुए सही ठहराया. मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अगर क्रांति सफल हो जाती है तो इसकी वैधानिकता स्वतः सिद्ध हो जाती है”. जनरल याहिया खान के सत्ता हथियाने को भी अदालत ने १९६९ में “राज्य की ज़रुरत के सिद्धांत” के आधार पर सही माना. जनरल जिया और जनरल मुशर्रफ भी सुप्रीम कोर्ट के हिसाब से सही थे. हल्लंकी की बाद में इस शीर्ष कोर्ट का शिकंजा मुशर्रफ पर कसने लगा.      
इस परिप्रेक्ष्य में एक हाल की घटना लें. आसिया बीबी जामुन से छोटा जंगली फल फालसे चुनने वाली एक मजदूर थी. लाहौर के ३० किलोमीटर दूर के एक गोंव के अकेली ईसाई परिवार की सदस्य थी. पडोसी मुसलमान महिला जो साथ में हीं फल चुन रही थी उससे बैर भाव रखती थी. वैसे भी अल्पसंख्यक ईसाई हे दृष्टि से देखे जाते थे. काम के दौरान कुएं से पानी निकाल कर लाने को कहा गया. उसने पानी निकला और पास के बर्तन से उस पानी से थोडा पी लिया. झगडा हुआ कि वह छोटे धर्म को मानने वाली होकर भी पानी के लिए बर्तन कैसे जूठा कर सकती है. बैर रखने वाली महिला ने कहा कि इसने मुहम्मद साहेब की शान में अपशब्द कहे. पाकिस्तान की दंड संहिता की धारा २९५ (ग) जो ईशनिंदा को लेकर बनाया गया है के तहत उसे फांसी की सजा निचली अदालत से हुई. लाहौर उच्चन्यायलय ने इस सजा को बरकरार रखा हालांकि पूरे विश्व के नेताओं ने आसिया को छोड़े जाने की अपील की. उधर एक करोड़ पाकिस्तानियों ने कहा अगर मौका मिला तो आसिया बीबी को वह खुद मौत के घाट उतरेंगे.
अब गौर करें. पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर ने आसिया बीबी की सजा को गलत माना और उससे मिलने जेल चले गए. कुछ दिन में हीं उनके सुरक्षा गार्ड मुमताज़ कादरी ने उनकी गोली मारकर हत्या कर दी और मौके पर हीं पकड़ा गया. जज ने उसे फांसी की सजा तो दे दी लेकिन वह इसका अंजाम जानता था लिहाज़ा उसी दिन डर के मारे पाकिस्तान छोड़ कर परिवार के साथ अन्य मुल्क में बस गया. पूरे देश के मुसलामानों का और वकीलों का बड़ा वर्ग कादरी की सजा के खिलाफ खड़ा हो गया. कादरी को हीरो माना जाने लगा. इस्लामाबाद और रावलपिंडी के वकीलों के एक वर्ग ने ऐलान किया कि जिस किसी जज ने इस सजा को बहाल रखा वह ज़िंदा नहीं रहेगा. जब कादरी अदालत में पेश होने जा रहा था तो एक वकील ने कादरी को चूमा. वह वकील कुछ दिन बाद जज बना दिया गया है. आज वह फैसला करता है.
आसिया बीबी को मारने की हसरत रखने वाले, तासीर को मारने वाले, कादरी को हीरो बनाने वाले, पेशावर में स्कूली बच्चों को गोली से भूनने वाले, ईसा मसीह को सूली पर चढाने वाले, सुकरात को ज़हर देने वाले और गलेलिओ को खगौलिक खोज के लिए जेल में डालने वाले – ये सभी एक हीं मानसिकता के रहे हैं, केवल सोच को अमल में लाने के जज्बे का अंतर है.  और ये अपने कृत्य को गलत तो छोडिये एकदम दिल से सही मानते हैं. उन्हें लगता है कि एक बड़ा पुण्य का काम किया जा रहा है उनके द्वारा.
आम- जन तो छोडिये, पाकिस्तान के संविधान, १९७३ के अनुच्छेद ६२ (च) के अनुसार वही मुसलमान सांसद हो सकता है जो इस्लाम की यथोचित शिक्षा रखता हो याने अगर चुनाव अधिकारी उससे किसी कुरान-ए-पाक की आयत बोलने को कहे और वह न जानता हो तो उसका नामांकन हीं रद्द कर सकता है.
ऐसे में एक हीं चारा बचता है भरपूर जनसमर्थन के साथ सैनिक प्रतिष्ठान का दृढ-संकल्प के साथ इसे नेस्तनाबूद करना क्योंकि वही इस तरह के हिंसक उन्माद का मुकाबला कर सकता है. एक बार अगर यह शुरू हो गया तो बाकि संस्थाएं भी तनब कर खडी हो सकती हैं.

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Sunday, 14 December 2014

संघ का भ्रम-द्वन्द और मोदी की परेशानी



छाती ५६ इंच फिर भी संसद के सदनों में घूम-घूम कर माफ़ी की गुहार. आखिर क्यों? डेढ़ साल पहले जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी राष्ट्रीय राजनीतिक क्षितिज पर आये तब हीं से जनता को लगा कि सड़ी-गली राजनीति का दौर ख़त्म होगा और राजनीतिक संवाद में “पैराडाइम शिफ्ट” होगा. लेकिन क्यों संसद के इस सत्र में   इतिहास में पहली बार दस दिन के अन्दर हीं प्रधानमंत्री को अलावा, सत्तारूढ़ पार्टी के दो (जिसमें एक मंत्री है) और विपक्ष के एक सदस्य को सदन में अपने वक्तव्य  के लिए माफी मांगनी पडी? क्यों संविधान के अभिरक्षण और परिरक्षण की शपथ लेने वाला राज्यपाल मंदिर बनाने की बात कह कर सर्वोच्च न्यायलय में चल रहे विवाद को प्रभावित करता है तो दूसरी तरफ “घर-वापसी” का रेट खोल दिया गया है? बड़ी उम्मीद थी ८७ करोड़ वोटरों को कि विकास होगा, भ्रष्टाचार कम होगा, नौकरी का माहौल पैदा होगा , ट्रेनें समय पर चलेंगी, सदन में बहस होगी तो विकास को लेकर.   लेकिन “आगरा धर्म परिवर्तन” , “रामजादे बनाम हरामजादे” “ताजमहल या तेजोमहालय (शिवमंदिर)” से ऊपर ना तो पार्टी बढ़ पा रही है न मोदी के नेतृत्व की सरकार. पिछले १९० दिनों के शासनकाल में हर तीसरे दिन प्रतीक की राजनीति का सबसे घिनौना चेहरा-- “साम्प्रदायिक वितंडावाद”-- देखने को मिल रहा है.  
यहाँ दो प्रश्न खड़े होते हैं. आखिर मोदी की मजबूरी क्या है? और दूसरा क्यों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके अनुषांगिक संगठन हिन्दुत्व की गरिमा को इतना नीचे धकेल रहे हैं? संघ एक विचारवान, वैचारिकरूप से प्रतिबद्ध, अनुशासित और बेहद व्यापक संगठन है. क्या यह अपने लोगों को रोक नहीं पा रहा है या इतनी जल्दी में है कि “युद्ध में सब कुछ जायज है” के भाव में आ गया है और नतीज़तन मोदी की विश्वसनीयता को हीं जाने-अनजाने में आघात पहुंचा रहा है? क्या उचित न होता कि अगले पांच बर्षों तक मोदी को सिर्फ देश के विकास में हीं संलग्न रखते और पूरे समाज को यह सन्देश देते कि “यह होता है सुशासन” और इससे सामाजिक समरसता बढा कर पारस्परिक दुराव से ग्रस्त कई खानों में बंटे हिन्दू समाज को हीं नहीं अल्पसंख्यकों को भी अपने साथ करते?
धर्म-परिवर्तन का हीं मुद्दा लें. इसमें संघ का भ्रम-द्वन्द साफ़ झलकता है. एक तरफ संघ तथाकथित धर्म-निरपेक्षता के जवाब में बताता रहा है कि दरअसल धर्म और पंथ अलग-अलग हैं. पूजा-पध्यती अलग हो सकती है पर चूंकि हिन्दू या सनातन धर्मं जीवन पध्यती है लिहाज़ा मुसलमान या ईसाई चाहे कोई पूजा-पध्यती रखे वे भी सनातन धर्म के वृहत छाते के हीं अन्दर हैं. सरसंघचालक मोहन भगवत ने हाल हीं में मुसलमानों को भी हिन्दू मान कर इस संघीय अवधारणा पर मुहर लगाई है. अब अगर मुसलमान भी हिन्दू है तो फिर किस की घर वापसी? वह तो घर हीं में हैं न? खाली उसने पूजा-पध्यती हीं तो अलग रखी है. फिर विवाद किस बात का. दूसरा संघ ऐसे सधे और रणनीतिकुशल विचारकों का इतना भौंडा प्रदर्शन कि धर्म-परिवर्तन के लिए चिट्ठी लिखी जाती है यह कहते हुए कि मुसलामन को हिन्दू बनाने में पांच लाख रुपये देने है और ईसाई को हिन्दू बनाने में दो लाख. और यह चिट्ठी भी मीडिया को लीक हो जाती है. संघ के पास अपनी इज्ज़त छिपाने के लिए एक चार-इंच का कपड़ा भी नहीं रह जाता.
फिर किसकी घर वापसी? जो लोग  छोड़ कर गए उसमें अधिकांश तो घर में भी रह कर सदियों तक अछूत हीं रहे था और तभी तो घर बदला था. क्या संघ ने वे कुरीतियाँ ख़त्म कर दी हैं? कितने आन्दोलन संघ द्वारा किये गए हैं हिन्दू धर्म में निचले तबके को  समान अधिकार दिलाने के? लगभग ८८ साल के अपने जीवन में संघ के शीर्ष नेतृत्व में (गुरु जी के काल में)  ने ना तो स्वतान्त्रता आन्दोलन में भाग लिया (हालांकि स्वयंसेवक छटपटाते रहे), न हीं दिल से समाज सुधार की दिशा में कोई सायास कदम उठाये. एकचालाकानुवर्ती (एक नेता द्वारा चालित)  ब्राह्मणवादी व्यवस्था से स्वयं जकडे संघ ने रज्जू भैया के कार्यकाल में “समरसता की कोशिश भी कि तो बेमन ढंग से. शीर्ष नेताओं ने बड़े आडम्बर और लाव-लश्कर के साथ बनारस (वाराणसी) के डोम राजा के घर खाना तो खाया लेकिन अन्य जगहों पर दलितों के यहाँ पानी न पीकर कार में रखी मिनरल वाटर की बोतल से पानी पीते रहे. समरसता का आन्दोलन दृढ- इच्छाशक्ति के अभाव में असफ़लत रहा. हिन्दू समाज के अन्य बुराइया जैसे बाल –विवाह, विधवा प्रताड़ना, दहेज़ परंपरा पर सरकारी कानून के अलावा संघ ने अपनी तरफ से शायद हीं कुछ सार्थक प्रयास किये हों.
ऐसा नहीं हैं कि संघ के पास अच्छे , उदारवादी विचारकों की फौज नहीं हैं पर लगता है कि उनपर वह वर्ग भारी पड़ रहा है जो मोदी की सत्ता की आंच में अपने को सेंकने में ज्यादा दिलचस्पी ले रहा है. वर्ना ८९ साल के इस संगठन को क्या यह समझ में नही आ पाया कि भ्रष्टाचार एक सामाजिक व्याधि है और इसके खिलाफ जनमत बनाना भी इसका हीं काम था ना कि किसी अन्ना हजारे का. ना तो संघ अपना मूल कार्य --हिन्दू धर्म यानि अपने घर को बेहतर  करना ताकि परिवार के सभी सदस्यों को समान दर्ज़ा मिले कर सका --ना हीं भ्रष्टाचार ऐसे सामजिक व्याधि के खिलाफ में चरित्र –निर्माण का बीड़ा उठा पाया. नौ दशक के जीवन काल में संघ एक शाश्वत भाव लेकर चला और वह था “उनका और हमारा “ (अस वर्सेज देंम). आज जब सत्ता साथ में है तो संघ समर्थित एक वर्ग लम्पटवादिता की राह से या उश्रिंखलता के जरिये “घर-वापसी” अभियान चलाया जा रहा. अलीगढ के एक भाजपा सांसद का दावा है कि हजारों ईसाई दिसम्बर २५ को “घर-वापसी” करेंगे. क्या यह संघ से अपेक्षित नहीं था कि पहले वह अपना घर रहने लायक बना ले. घर वापसी की ललक तो सब में रहती है. इसके लिए कोई रेट तय करने की ज़रुरत नहीं होती. 
एक और पक्ष लें. मोदी इतने कमज़ोर रहते तो अपने मन का पार्टी अध्यक्ष ना बना पाते ना हीं पार्टी के दिग्गज नेताओं को हाशिये पर ला सकते. लिहाज़ा अगर उत्तर प्रदेश के उप-चुनाव में कोई गेरुआधारी आदित्यनाथ चुनाव का मुखिया बनाया जाता है तो मोदी के “विकासकर्ता” के स्वरुप पर शक होने लगता है. यह शक तब और भी पुख्ता हो जाता है जब एक कीर्तन करने वाली फर्स्ट-टाइमर सांसद साध्वी निरंजनज्योति इतने विशाल भारत की मंत्री बनाई जाती है और अगले सत्र में हीं वह सदन की गरिमा रसातल में पहुंचाते हुए कहती है कि “या ते रामजादों को वोट दें या हरामजादों को”. शायद कीर्तन सुनने वाले कुछ लोग इस पर ताली बजाते हो पर संसद शर्मसार हो गया.
विडम्बना यह कि मोदी ने उस मंत्री के कहे पर दोनों सदनों में माफ़ी तो मांगी लेकिन फिर वही प्रतीक और अलगाव की राजनीति ! शाम तक पार्टी के प्रवक्ता ने कहा “चूंकि साध्वी दलित वर्ग की हैं (हालाँकि वह अति-पिछड़े वर्ग की हैं) इसलिए विपक्ष उनको लक्षित कर रहा है. प्रधानमंत्री ने अगले दिन हीं इस सधिव को दिल्ली चुनाव प्रचार करने याने उसे अपनी भाषा में बोलने की इज़ाज़त दे दी.

मोदी और संघ को चुनना पडेगा अपना रास्ता. अगर यही रास्ता है तो वह अनैतिक, गैर-प्रजातान्त्रिक , घृणा फ़ैलाने वाला होगा और जनता निराश हो जायेगी क्योंकि मोदी पर उसने अपनी सारी बोली लगा दी थी. वैसे भी ताज़ा सरकारी रिपोर्ट के अनुसार कृषि उत्पादन पांच साल में सबसे कम होगा क्योंकि रबी का रकबा काफी कम हुआ है. इन सात महीनों के शासन काल में मोदी सरकार कम से कम किसानों को प्रोत्साहित कर सकती थी इस रकबे को बढाने के लिए जो नहीं हुआ. अच्छे दिन आयेंगे पर शायद फिर किसी और के लिए.   

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