Tuesday, 2 September 2014

भाजपा में आडवाणी युग के अंत के मायने



आरम्भ और अंत एक शाश्वत प्रक्रिया है—“गीता के वासांसि जीर्णानि यथा विहाय” की तरह. यह व्यक्तियों के लिए भी होता है, समाज के लिए भी और संस्थाओं के लिए भी. भारतीय जनता पार्टी में आये बदलाव को शीर्ष पर मात्र एक व्यक्ति के आने और एक व्यक्ति के जाने के रूप में नहीं लिया जा सकता. प्रश्न यह है कि यह प्रसव पीड़ा इतनी तकलीफदेह क्यों है? अगर आडवाणी इस नए जन्म के अपरिहार्य शर्त  के रूप में किसी की अपरिहार्य मौत का अहसास एक साल पहले कर लेते और धीरे से अपने को दूर कर लेते तो ना तो यह प्रसव पीड़ा इतनी दुखदायी होती ना हीं मौत इतनी अगरिमामय और गुमनाम.  

भाजपा के संविधान के अनुच्छेद २५ में पार्टी के संसदीय बोर्ड को निर्बाध शक्तियां दी गयी हैं. यह १२-सदस्यीय संस्था वर्तमान हीं नहीं भविष्य की नीति और नीति-परिवर्तन कर सकती है. इस अनुच्छेद के अनुसार “बोर्ड को पार्टी द्वारा भविष्य में अपनायी जाने वाली नीतियों और नीति परिवर्तन के विषय में निर्णय लेने का अधिकार होगा”, याने बोर्ड के पास असीमित शक्तियां हैं. साथ हीं इसी अनुच्छेद में दो बार बोर्ड को मार्गदर्शक बताया गया है.

अब प्रश्न यह है कि अगर आडवाणी की मार्गदर्शक के रूप में उपादेयता है तो फिर वह इस बोर्ड में क्यों नहीं? बोर्ड से बड़ा मार्गदर्शक मंडल कौन हो सकता है? फिर बोर्ड को पार्टी के संविधान से शक्तियां मिली हैं जो कि नए पांच –सदस्यीय मार्गदर्शक मंडल को नहीं है. इसलिए भाजपा के लोगों का यह कहना कि “आडवाणी जी हमारे पिता के रूप में , परिवार के मुखिया की रूप में और दिशा देने वाले ध्रुव तारे के रूप में बने रहेंगे” आम लोगों की समझ को कम आंकना होगा. सभी समझ रहे हैं कि आडवाणी के दिन गए. मार्गदर्शक मंडल दरअसल बाँझ संस्था रहेगी. फिर भाजपा कितने मार्गदर्शक रखेगी? राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मातृ –संगठन के रूप में मार्ग दिखाती है , बोर्ड पार्टी के संविधान के अनुसार मार्गदर्शक है और एक पिटे-लुटे लोगों को ठिकाने लगाने की मानिंद पांच-सदस्यीय मार्गदर्शक मंडल बनाया गया है जिसमें अटल बिहारी वाजपेयी , आडवाणी . मुरली मनोहर जोशी हैं और साथ हीं प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी और राजनाथ सिंह भी.

लिहाज़ा यह बात स्वयं सिद्ध है कि मोदी को अभी भी मीडिया और जन आलोचना की कहीं ना कहीं चिंता रहती है. वह आडवाणी को दूध की मक्खी की तरह ना निकल कर धीरे से अशक्त करना चाहते हैं. यह एक अच्छी नीति है , और कुछ हद तक शालीन भी. स्वयं अपने को और साथ हीं राजनाथ सिंह को उस मंडल में डालना भी इसी बात के संकेत हैं कि मीडिया इसे पुराना समान रखने वाला घर का कोना न समझे इसलिए कुछ नए सामान भी साथ में रख दो.

अब प्रश्न है कि इतना हो –हंगामा क्यों. क्या मीडिया मोदी के प्रति दुराग्रह के भाव से यह सब कुछ कर रहा है? यह सच है कि इस देश की जनता ने मोदी को नेता स्वीकार किया है और उनसे उनके वादे के मुताबिक तमाम अपेक्षाएं रखी हैं. मोदी पर यह नैतिक दबाव है कि वह “परफॉर्म “ करें. जाहिर है कि मोदी अपने रास्ते में कोई अवरोध नहीं चाहेंगे. पार्टी भी ठीक रहे इसलिए एक अमित शाह की ज़रुरत है, जो आँख के इशारे पर कुछ भी करने को तैयार हो, सरकार ठीक रहे इसलिए मंत्रियों पर लगाम की ज़रुरत है और सब कुछ ठीक रहे इसलिए संघ का वरदहस्त की ज़रुरत है.

इस पैरामीटर पर मोदी बिलकुल ठीक हैं. आडवाणी ने पार्टी को बुरी स्थिति में ला दिया था. सन १९९८ के आम चुनाव में अधिकतम (इस साल के परिणाम को छोड़ कर) २५.६ प्रतिशत वोट मिले थे लेकिन आडवानी की सरपरस्ती में २००४ और २००९ के चुनावों में यह प्रतिशत लगातार घटता हुआ पार्टी को जहाँ मात्र १८.८ प्रतिशत पर ला आया वहीं मोदी के आने से यह प्रतिशत ३१.३ तक पहुँच गया और पार्टी पूर्ण बहुमत हासिल कर इतिहास बनाने लगी. तो यह साफ़ है आडवाणी की बदलते समाज में उपादेयता ख़त्म होने लगी. सर्वस्वीकार्य वाक्य हो गया “मोदी हीं बचा सकते हैं गिरती भाजपा को, ख़त्म होते देश को”. लिहाज़ा अगर मोदी अपने मन की टीम लाते है तो कोई गलत बात नहीं है.

आडवाणी उस समय भी गरिमामाय नहीं दिखे जब मोदी के केन्द्रीय चुनाव समिति में आने के बाद उन्होंने पत्र लिखा , मीडिया को दिया और पूछा कि “ कहाँ गयी श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पंडित दीनदयाल की पार्टी”. दरअसल यह सवाल तो उनसे पूछा जाना चाहिए था. पार्टी की जन-स्वीकार्यता उनके काल में घटी थी ना कि मोदी की वज़ह से. उनका आरोप कि मोदी के आने से मुखर्जी और पंडित दीनदयाल की पार्टी बदल गयी , गले के नीचे नहीं उतरता. अगर उनका ऐसा मानना था तो एक हीं दिन में इस्तीफ़ा वापस क्यों? क्या उनके घर जा कर किया गए मान-मनव्वल से पार्टी फिर पटरी पर आ गयी? यहीं पर आडवाणी अपने गरिमा से नीचे आते दिखाई देते हैं.

मोदी के आलोचकों का , जिनमें मैं भी हूँ, यह मानना है कि मोदी विरोध के स्वर के प्रति सहनशील नहीं हैं और यही वजह है आडवाणी के सीन से गायब होने की. लेकिन शायद आलोचक यह नहीं समझ पते हैं कि अगर शीर्ष पर बैठा नेता पूरी तरह से जनोपदेय है, सही दिशा में सोच रहा है और जनता उस सोच को मौन समर्थन दे रही है तो फिर विरोध के स्वर हैं हीं क्यों? हम विरोध के मूल कारणों में जाएँ तो पता चलेगा कि वह विरोध स्वयं स्वार्थ-सिद्धि के लिए था हालाँकि नाम पार्टी में भटकाव का दिया गया. हर विरोधी यही तर्क देता है. इंदिरा गाँधी ने भी आपातकाल लगाया तो यही तर्क दिया था.

लेकिन मोदी के फॉर्मेट की एक समस्या है. जब तक वह उपादेय हैं, जब तक जनता को वह “परफॉर्म” करते हुए लगते हैं तब तक “एकल व्यक्ति” प्रभाव के औचित्य को कोई चुनौती नहीं है लेकिन जैसे हीं कुछ गलतियाँ होने लगती हैं और मोह –भंग की स्थिति आती है तब एकल नेतृत्व का सिद्धांत ढहने लगता है और इस गिराव को रोकना मुश्किल हो जाता है. यही वजह है कि एक विश्वसनीय सपोर्ट-सिस्टम समानांतररूप से रखना ज़रूरी होता है. मोदी के पास वह मज़बूत सिस्टम संघ के समर्थन के रूप में मौजूद है.

आडवाणी के संसदीय बोर्ड में ना लेने पर मीडिया का मुद्दा बनाना गलत इसलिए नहीं है कि भारत के एक उभरते जन-अवलंबन के प्रतीक मोदी के हर पहलू का विश्लेषण करना मीडिया का काम है ताकि सफलता नेतृत्व को बेलगाम न कर दे. इसे मीडिया के दुराग्रह के रूप में नहीं देखना चाहिए.
patrika/lokmat

Sunday, 24 August 2014

जजों की नियुक्ति: इस बदलाव के मूल कारणों पर जाएँ



है साहेब-ए-इंसाफ खुद इंसाफ का तालिब
मुहर उसकी है मीजान बदस्ते दीगरां है.

(आज न्याय का मालिक खुद न्याय चाह रहा है क्योंकि मुहर तो उसकी है लेकिन तराजू दूसरे के हाथ में है)
          ----------- फैज़ अहमद फैज़

न्यायिक नियुक्ति बिल संसद की दोनों सदनों से पारित हो चुका है. राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद अधिसूचना जरी कर जल्द हीं कानून बना दिया जाएगा. और उसके बाद फिर एक बार साहेब इंसाफ (न्याय का मालिक) के हाथ से न्याय की तराजू निकल जायेगी. प्रश्न मात्र बदलाव का नहीं है. उसके कारणों पर जाये तो पता चलेगा कि कैंसर कहीं ज्यादा गहरे चला गया है और मेटा- एस्टासिस के स्टेज पर पहुँच चुका है जिससे अन्य अंग भी प्रभावित होने लगे हैं.
यहाँ यह कहना गलत होगा कि न्यायपालिका में सब कुछ सही था और विधायिका और कार्यपालिका ने मिलकर इसके अधिकारों को हासिल करना चाहा. जिस देश की सर्वोच्च अदलत के तीन-तीन मुख्य न्यायाधीशों पर भ्रष्टाचार के आरोप लग रहें हो वह संस्था सही कार्य कर रही है यह कहना गलत होगा. आज़ादी के कोई ५० सालों में कम से कम सर्वोच्च न्यायलय की विश्वसनीयता पर आंच नहीं आयी थी. यह  सब गिरावट पिछले १५ सालों में सुनने को मिला. अगर किसी दो साल में सर्वोच्च न्यायलय के जो २३ जज रिटायर होते हैं उनमें २१ को अवकाश- प्राप्ति के तत्काल बाद कोई न कोई पद दे कर सारी सुविधाएँ और पगार सरकारों द्वारा बहाल कर दी जाती हैं तो सब न्यायपालिका में सब कुछ अच्छा नहीं है.
अगर गुजरात हाई कोर्ट का का एक मुख्य न्यायाधीश भास्कर भट्टाचार्य सार्वजानिक रूप से भारत के एक मुख्य न्यायाधीश पर आरोप लगता है कि चूंकि उनकी बहन को कलकत्ता हाई कोर्ट में हमने जज बनाने का विरोध किया इसलिए मुझे सर्वोच्च न्यायलय में जज नहीं बनने दिया गया, तो न्यायपालिका की छवि को चार चंद नहीं लगते. अगर कोई सुप्रीम कोर्ट का हीं रिटायर्ड जज जस्टिस काटजू कहता है कि अमुक मुख्य न्यायाधीश को हमने इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक जज के बारे में बताया और जांच में उसके एक दलाल से सम्बन्ध और भ्रष्टाचार के बारे में आई बी ने टेप भी दिए फिर भी वह जज बना रहा, तो न्यायपालिका किसी अन्य अवमानना की ज़रुरत नहीं है. जनता में भरोसा उठा इसके लिए “साजिशकर्ता” ढूँढने की ज़रुरत नहीं है. देश के सर्वोच्च न्यायलय की गरिमा गिरी है जो अदालत की अवमानना कानून के अनुसार अपराध है फिर भारत के वर्तमान मुख्य न्यायाधीश का यह रुदन क्यों? गलत है तो जस्टिस भट्टाचार्य और जस्टिस काटजू पर मुकदमा क्यों नहीं ? दरअसल ये आरोप सहीं हैं और न्यायाधीशों में नैतिकता का लोप जबरदस्त ढंग से पिछले कुछ सालों में हुआ है.
यह सही है कि एडवोकेट्स ऑन रिकार्ड्स एसोसिएशन बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया के क्रांतिकारी फैसले के पहले जजों की नियुक्ति सरकार के हाथ में थी और न्यायपालिका की भूमिका नगण्य थी. नतीजा यह होता था मुख्यमंत्री और मुख्य न्यायाधीश अगर पांच पद  खाली है तो “दो-मेरे, दो -आपके” का समझौता कर लेते थे और एक केंद्र की सरकार का आदमी जज हो जाता था. उत्तर प्रदेश में एक मुख्य मंत्री ने अपने जिले के एक वकील को जिसकी जिले में हीं साख बेहद खराब थी हाई कोर्ट का जज बना दिया.
लेकिन पिछले २१ सालों से यह काम न्यायपालिका के हाथों में है और वहां भी इसी तरह के आरोप देखने को मिल रहे हैं. तो फिर फर्क क्या है बदनाम राजनीतिक वर्ग में और अवमानना के अधिकार से सुसज्जित “मी लार्डों” में?
फिर अगर कोई संस्था नैतिक रूप से इतनी कमज़ोर हो जायेगी तो अन्य संस्थाएं चाहे खुद कितनी भी बुरी हों , भारी तो पड़ेंगी हीं. विधायिका या यूं कहिये कि राजनीतिक वर्ग को एक अच्छा मौका मिला, काटजू के खुलासे से. फिर क्या था. कांग्रेस, मायावती, मुलायम सिंह, लालू यादव , जयललिता की पार्टी से और क्या उम्मीद कर सकते हैं. इनमें से अधिकांश अदालतों में अपने कर्मों से अपने भाग्य को गिरवी रख आये हैं.      
न्यायपालिका पर नकेल कसने की ललक आज की नहीं है. संविधान निर्माताओं से लेकर ६५ साल तक राजनीतिक वर्ग इसको नियंत्रित करने की जुगत लगता रहा है. संविधान के अनुच्छेद १२४ की व्याख्या करते हुए डॉक्टर अम्बेदकर ने कहा था “जजों के अन्दर भी मानवोचित दुर्गुण हो सकते हैं लिहाज़ा नियुक्ति की पूरी जिम्मेदारी इन पर नहीं छोड़ी जा सकती है. कितनी विडम्बना है. जिस सर्वोच्च न्यायालय के जज की बुद्दिमत्ता पर पूरा देश, संविधान और व्यवस्था पूरा भरोसा रखते हुए उसके  फैसले पर व्यक्ति को अंतिम रूप से फंसी पर लटका देते है और जिन पांच-सदस्यीय जजों की संविधान पीठ के फैसले में कानून की ताकत होती है उन्हीं में से पांच सबसे सीनियर जजों में इतनी समझ नहीं है कि वे जजों की नियुक्ति कर सकें ? अगर ये जज अपने को भाई –भातीजावाद से ऊपर नहीं ले जा सकते, भ्रष्टाचारी जज को हटाना तो दूर उन्हें सत्ता के किसी  दबाव में प्रोन्नत कर देते हैं तो ६५ साल से जो लोग सजा पा चुके हैं या छूट गए है उनको लेकर समाज क्या सोचेगा?
१६ मई, १९५१ को (संविधान अंगीकार करने के मात्र १७ माह बाद पहले संविधान संशोधन पर बोलते हुए प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरु ने कहा था “हमने एक भव्य संविधान बनाया लेकिन वकीलों ने उसे अगवा कर लिया” .......  और “हम सर्वोच्च न्यायालय को संसद का तीसरा सदन नहीं बनने देंगे”. (पार्लियामेंट डिबेट , वॉल्यूम १२, भाग २, कॉलम ८८३२).
कम से कम उस समय तो जजों पर कदाचार के आरोप नहीं थे ना हीं वे जजों की नियुक्ति करते थे फिर यह दुराव क्यों?
एक अध्ययन में पाया गया कि १९६०वेन दशक के मध्य तक पाया गया कि सर्वोच्च न्यायलय में लगभग ७० प्रतिशत ऐसे मामले थे जिन में सरकार एक पक्ष होता था और व्यक्ति या निजी पार्टी दूसरा पक्ष. यह भी पाया गया कि इन मामलों में लगभग ४० प्रतिशत फैसलों में सरकारी को हारना पड़ा. उस दौरान जो ३२७२ फैसले देश की सबसे बड़ी अदलत में हुए उनमें ४८७ में किसी ना किसी कानून को चुनौती दी गयी थी और उनमें १२८ फैसलों में सर्वोच्च न्यायलय ने कानून को असंवैधानिक ठहराया.
शोधकर्ता जॉर्ज गड्बोईस के अनुसार दुनिया के किसी भी अन्य मुल्क में देश की सबसे बड़ी अदालत में सरकार को अपनी हीं जनता की मुखालफत वाले मामलों में देश की सबसे बड़ी अदालत में इतनी शिकस्त नहीं मिली.  
और फिर अगर यह बुद्दिमता या नैतिकता इन जजों में नहीं तो बंद कीजिये न्यायपालिका की दूकान और प्रजातंत्र का ड्रामा. छोड़ दीजिये पूरी न्याय-व्यवस्था ताकतवर के हाथों में. कम से कम यह तो पता चलेगा कि जो जीता वह किसी ताकतवर का आदमी था और उससे पंगा नहीं लेना चाहिए.
जूलियस सीज़र में एक कैसियस ब्रूटस से कहता है “ गलती हमारे भाग्य में नहीं है ब्रूटस, हमारे अपने अन्दर है क्योंकि हम सब बौने (अनैतिक) हैं”. आज शायद पूरा आंवा का आवां हीं ख़राब हो चुका है जिससे जज, मंत्री , संतरी और हमारे रहनुमा पैदा होता हैं.

rajsthan patrika

Friday, 15 August 2014

मोदी: एक राजनेता का समाज- सुधारक के रूप में भाषण


मोदी के भाषण में जनता से सीधे कनेक्ट की अद्भुत क्षमता


चूंकि भारत में द्वंदात्मक प्रजातंत्र है लिहाज़ा मीडिया का मूल काम सत्ता की गलतियों से, नेता की कमियों और सरकार की खामियों से जनता को बाबस्ता करना है. इस पैमाने पर मैं आम तौर पर प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी का आलोचक रहा हूँ. लेकिन अद्भुत था लाल किले की प्राचीर से किसी प्रधानमंत्री का वह भाषण. किसी भी दृष्टिकोण से उस भाषण में कोई दोष निकालना मात्र हठधर्मिता होगी. वह किसी राजनेता का परंपरागत “हम बनाम वे” के भाव में दशकों को दिया जा रहा भाषण नहीं था. बल्कि लगता था कि एक ऐसा समाज- सुधारक भावना के संतुलित अतिरेक में बोल रहा है. यह कहना मुश्किल होगा कि प्राचीर पर मोदी स्टेट्समैन बड़े थे या समाजसुधारक बड़े.
वह मोदी का आत्मविश्वास हीं था प्रधानमंत्री के रूप में स्वतंत्रता दिवस भाषण को बगैर लिखे बोला. जिस तरह का देश में माहौल है उसमें बगैर किसी बुलेट-प्रूफ केबिन में बंद हुए धाराप्रवाह ४५ मिनट बोलना अपनी सुरक्षा बलों पर भरोसा दर्शाता है. मैंने नेहरु को भी सुना है. अटल बिहारी वाजपेयी को भी इसी प्राचीर से बोलते हुए सुना है. पर मोदी का भाषण ना केवल अलग था बल्कि पहली बार लगा कि कोई प्रधानमंत्री अभिभावक भी, तो समाजसुधारक भी. शासन का मुखिया भी है तो सेवक भाव भी रखता से. आध्यात्मिक गुरु भी है तो गरीबों का मसीहा भी.
अद्वैतवाद से अवमूल्यन तह लगभग हर पहलू पर एक सन्देश देकर मोदी ने ना केवल अपने को जनता से कनेक्ट किया बल्कि उसे सोचने पर मजबूर किया कि क्या वे यही भारत अपनी अगली पीढी के लिए छोड़ जायेंगे?
क्या पिछले ६६ सालों में आपने कभी किसी प्रधानमंत्री को यह कहते सुना कि माँ-बाप अगर अपने बेटे से पूछे कि तुम कहाँ जा रहे हो , किसलिए जा रहे हो, तो आज यह बलात्कार की घटनाएँ ना होंगी ? यह गहरी बात है. एक ऐसे समय में जब अभिभावकों का अपने बेटों पर नियंत्रण कम हो रहा है और नतीज़तन लम्पटता चरम पर हो (किशोरों द्वारा किये गए बलात्कार व अन्य अपराध इसके गवाह है) मोदी का उलाहना हर अभिभावक के लिए गहरी नसीहत है. मोदी के इस अपील में ना तो कोई वोट पाने की हवास थी ना हीं कोई अपने को उचित ठहराने की ज़द्दोजेहद. एक निर्दोष गुज़ारिश थी. परिवार को फिर से संगठित कर सोशल पुलिसिंग को या पारिवारिक नियंत्रण को फिर से बहाल करने की. युवा पौध में विकृति घर से शुरू होती है यह समाजशास्त्रीय सत्य है. इसी पौध को फिर से जंगल की झाड़ी ना बना कर बाग में तराशे फलदार पेड़ लगाने की ललक.
तीन बार इस इसरार के साथ कि “मेरी बात के राजनीतिक मायने ना निकले जाएँ” मोदी ने शासन में पनपे आपसी दुराव का ज़िक्र करते हुए कहा “सरकार के हीं दो विभाग एक दूसरे के खिलाफ अदलत में गए थे, एक विभाग और दूसरे विभाग में कोई ताल-मेल नहीं था”. ठीक इसके पहले प्रधानमंत्री ने विपक्ष को साथ लेकर चलने की प्रतिबद्धता जताई और हाल में ख़त्म हुए संसद सत्र के दौराम सभी पार्टियों के सकारात्मक भाव की जबरदस्त प्रशंसा की. कहीं “वो बनाम हम” का भाव नहीं था.
दुखती रगों को मात्र छूना हीं नहीं, उन पर हल्का से दबाव डाल कर मवाद निकलना मोदी की भाषण कला का अहम् अंग है. लाल किले की प्राचीर से बोलते हुए एक बार फिर प्रधानमंत्री ने उन रगों को झकझोरा. “मीडिया लिखता है नयी सरकार के आने का बाद अफसर समय से आने लगे. यह खबर किसी भी प्रधानमंत्री को खुश कर सकती है पर मुझे दुःख हुआ कि सरकारी कर्मचारी का समय पर आना भी मीडिया की खबर है.” दरअसल पिछले ६६ सालों में हम अफसरों के गैरजिम्मेदाराना रवैये के इतने आदी हो चुके हैं कि अब उनका समय से आना भी खबर बन जाता है.
अपने भाषण की शुरुआत हीं मोदी ने अपने को प्रधान सेवक” कह शुरू किया और यहीं से शुरू हुए जनता से उनका “कनेक्ट”. याद आता है स्वामी विवेकानंद का शिकागो भाषण जिसमें संबोधन “ब्रदर्स एंड सिस्टर्स” कह कर संबोधन करते हीं पूरा अमरीका उनका मुरीद हो गया.
आजकल गुरुओं का जमाना है. कोई “लव गुरु” कहलाता है तो कोई “मैनेजमेंट गुरु”. मोदी को “कनेक्ट गुरु कहना गलत नहीं होगा. आज के भाषण के विशेष पहलू हैं : जनता को भोवोत्तेजित (इंस्पायर) कर के अपने अन्दर झांकने के उत्कंठा पैदा करना और यह विश्वास दिलाना कि तुम एक कदम बढ़ो हम दस कदम बढेंगे”. पिछले कुछ दशकों में राजनेताओं में यह क्षमता खो दी थी कि उनकी बातों पर जनता विश्वास करे.
जनता से कनेक्ट होने के कुछ और नमूने देखिये. “हल से हरियाली” , “कम. मेक इन इंडिया” (आओ और भारत में उत्पादन करो), “केमिकल से फार्मास्यूटिकल तक” , “संसद मॉडल ग्राम योजना”, “डिजिटल इंडिया”. “आदर्श ग्राम” “जीरो-डिफेक्ट , जीरो इफेक्ट” “प्रधानमंत्री से प्रधान सेवक” “प्रधानमंत्री जनधन योजना” “बेटियों पर इतने बंधन , बेटों पर कोई नहीं”. ये जुमले आम राजनीतिक जुमलों से हट कर थे. इनके ज़रिये मोदी ने जनता से सीधा संवाद बनाया लाल किले के भाषण से.
दंगों के वातावरण पर भी उसी गरिमा से मोदी ने प्रहार किया. कहीं कोई हिन्दू-मुसलमान टाइप परम्परागत या धर्मनिरपेक्षता की दुहाई नहीं. सीधा संवाद. “आओ , हम मरने –मारने की दुनिया को छोड़ कर जीवन देने वाला समाज बनायें”.
मोदी ने इन सब के अलावा जो सबसे क्रांतिकारी घोषणा की वह थी , “हर गरीब परिवार को एक लाख का बीमा”. आजाद भारत में शायद यह पहली बार सोचा गया कि सोशल सिक्यूरिटी का कवच दे कर गरीबों को भी “भविष्य की चिंता” के दंश से मुक्त किया जाये. देश में नए आंकड़े के अनुसार सात करोड़ के करीब गरीब परिवार हैं. परिवार के मुखिया के निधन पर परिवार के सदस्य यतीम हो जाते हैं , शिक्षा न मिलने से बच्चे लम्पटता या अपराध की ओर उन्मुख होते हैं और कमी के आभाव में ऐसे परिवार गरीबी की उस गर्त में चले जाते हैं जहाँ से निकलना असंभव होता है. मोदी की यह योजना दूरगामी और क्रांतिकारी दे ने परिणाम वाली है.
अपने को देश की सीमाओं से बाहर निकलते हुए मोदी ने पूरे सार्क देशों की गरीबी पर अघात किया और सन्देश था –हम सब मिलकर इससे लड़ें. यह चीन द्वारा पाकिस्तान या नेपाल को दी जाने वाली कुटिल मदद से काफी अलग थी, एक निर्दोष भरोसा दिलाने का प्रयास था.
कुल मिलकर लाल किले से हुए मोदी का भाषण विश्व की यूनिवर्सिटीज में “हाउ टू कनेक्ट विद द मासेज” (कैसे हो जनता से तादात्म्य) पढाये जाने लायक था.

jagran 


Sunday, 10 August 2014

एक भ्रष्टाचारी जज और बौनी होती संस्थाएं




सर्वोच्च न्यायलय के पूर्व जज और प्रेस कौंसिल ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काटजू के बयान से उपजे विवाद से देश के सड़ते सिस्टम की गहरी जड़ों का पता चलता है. यह पता चलता है कि कैसे देश के तत्कालीन ६७ करोड़ मतदाताओं द्वारा सन २००४ में तथाकथित प्रजातान्त्रिक तरीके से चुनी गयी सरकार को इस बात का खतरा था कि मद्रास हाई कोर्ट में एक अदने से भ्रष्ट अतिरिक्त जज का प्रभाव इतना हो सकता है कि देश की सरकार गिर सकती है. इटली की सत्ता पर माफिया प्रभाव भी इस प्रभाव के सामने फीका नज़र आता है. यह भी समझ में आता है कि ६५ साल बाद भी हमारा प्रजातंत्र एक ढकोसला मात्र है.
सरकारें संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ लेती हैं फिर अपने गिरने के डर से किसी डी एम् के से समर्थन लेती हैं , फिर वह डी एम के उस सरकार में शामिल होता है और मजबूर करता है कि उसके द्वारा नामित मंत्री को स्पेक्ट्रम घोटाला कर के देश को १.७६ लाख करोड़ का चूना लगाने दे. यह सहयोगी दल मजबूर करता है केंद्र सरकार को कि वह भ्रष्ट जज को नियमित करे. सरकार का प्रधानमंत्री और कानून मंत्री देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था की कॉलेजियम को निष्क्रिय करता हुआ जज की नियुक्ति करवा लेता है. आखिर वह कौन सी मजबूरी थी तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश की या कॉलेजियम के अन्य चार में से दो जजों की जो ऐसा करने को मजबूर होते हैं? उनकी तो कोई सरकार नहीं थी जिसके गिरने का ख़तरा था? उन्हें तो संविधान निर्माताओं ने बेहद मजबूत पाये पर खड़ा किया था और अगर वे सरकार की बात नहीं मानते तो उनको कुछ भी आंच नहीं आती. संवैधानिक व्यवस्था हमारे निर्माताओं ने इतनी पुख्ता कर डी है कि अगर देश की पूरी संसद भी चाहती तो उन्हें नहीं हटा सकती थी. देश के सर्वोच्च या उच्च न्यायलय के जज को मात्र “सिद्ध दुराचार” के आधार पर हीं हटाया जा सकता है वह भी एक जटिल और अलग संसद में विशेष बहुमत की प्रक्रिया के ज़रिये.
इसी सर्वोच्च न्यायलय की नौ –सदस्यीय संविधान पीठ ने एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया के १९९४ के फैसले में कॉलेजियम की व्यवस्था करके जजों की नियुक्ति का पूर्ण अधिकार अपने पास लिया था. फैसले का आधार यही था कि सरकारों को इन नियुक्तियों में प्राथमिकता देने से नियुक्तियों का राजनीतिकरण हो रहा है. और था भी ऐसा हीं. कोई मुख्यमंत्री अपने दो आदमी लाता था तो कोई केंद्र में बैठा कानून मंत्री अपने दो और इस बन्दर बाँट में न्यायपालिका भी अपने एक –आध आदमी रख लेता थी. जब यह फैसला आया तो पूरे देश में यह विश्वास बना कि अब देश की न्यायपालिका में अच्छे लोग योग्यता के आधार पर आएंगे. हम सब लोग जो उस समय न्यायपालिका की रिपोर्टिंग करते थे यह विश्वास करने लगे कि फैसले से न्यायपालिका में अमूल-चूल सुधार होगा.
आज २२ साल जब यह पता लगा कि सत्य पर तन कर खड़े रहने की असली शक्ति ना तो न्यायपालिका में है , ना हीं किसी सत्ता दल या गठजोड़ में बल्कि यह शक्ति किसी भ्रष्ट अस्थाई अतिरिक्त जज की चेरी है. हमारा वो मतदान करना , वो संसद में वाद-विवाद , वो सी ए जी का २-जी स्पेक्ट्रम में हुए घोटाले का खुलासा और मीडिया में महीनों तक इस मुद्दे पर जनता को बताना किसी मतलब का नहीं था. वही पार्टी जिसने २००५ में इस जज की नियुक्ति अवैध तरीके से दबाव बना कर कराई उसी को हमने फिर वोट दे कर २००९ में जीता दिया. घोटालों के पर लग गए, कामनवेल्थ खेल घोटाला. कोयला घोटाला होता रहा. सी बी आई के निदेशक को बुलाकर कानून मंत्री अपने मुताबिक निर्देश देता रहा. देश का प्रजातंत्र चलता रहा. एक साल नहीं, दस साल नहीं, पूरे ६५ साल. और अब देखने से लगता है कि यह बढ़ता जा रहां है. अगर १९५१ में सर्राफा व्यापारियों के हित-साधन के लिए सांसद एच जी मुद्गल द्वारा पैसे लेकर संसद में सवाल पूछना पंडित नेहरु को इतना बड़ा अपराध लगा कि मुद्गल को संसद से अपमान करते हुए (उन्हें इस्तीफा नहीं देने दिया गया) हटाया गया तो इन ६५ सालों में हमने यही सिखा कि एक भ्रष्ट जज की नियुक्ति के लिए एक ऐसे पार्टी जो कई बार तमिलनाडु में सत्तानशीं रहीं है प्रधानमंत्री कार्यालय को ब्लैकमेल करती है और कार्यालय सत्ता न जाने देने के लिए झुक कर दोहरा हो जाता है. डी एम् की मात्र एक उदाहरण है. हमाम में जा कर देखना होगा.
अरुण सौरी ने अपनी एक किताब की शुरुआत में एक वैज्ञानिक प्रयोग का उल्लेख किया है. एक मेढक को गरम पानी वाले बर्तन में डालो. वह तुरंत कूद कर निकलना चाहेगा. परन्तु इसी मेढक को एक सामान्य तापमान वाले पानी के बर्तन में डालो. उस बर्तन को धीरे धीरे गरम करो. वह मेढक चुप-चाप तैरता रहेगा और यहाँ तक जब वह पानी उबलने लगेगा तो भी वह उसी में मर जाएगा पर भागने का कोई उपक्रम नहीं करेगा. इसका कारन यह माना गया कि पानी के धीरे –धीरे गरम होने से उसमें एक जड़ता आ जायेगी और वह उस संज्ञा –शून्य हो कर स्थिति से बचने का कोई प्रयास नहीं करेगा.
भारतीय समाज में भी वह जड़ता आ गयी है. यह मुद्दा भी संसद में कुछ दिन चर्चा का सबब बन कर दम तोड़ देगा जैसे तमाम भ्रष्टाचार के मामलों में हुआ. यही नहीं मेढक तो विवेकहीन होता है लिहाज़ा पानी के उबाल तक चुप-चाप पड़ा मर जाता है हमें ईश्वर ने दिमाग दिया है लिहाज़ा उसका इस्तेमाल कर अपने बच्चे की नौकरी लगवाने के लिए घूस देने लगते हैं, रेलवे में रिजर्वेशन के लिए दलाल तलाशते हैं और ठेका मिला तो १:३ की जगह १:१३ का मसला लगा कर लाभ को इंजिनियर के साथ बाँट लेते हैं , कुछ और बैंक बैलेंस बढा लेते हैं. यह नहीं सोचते को जिस बच्चे की नौकरी के लिए घूस दिया है वह एक सड़ते भारत में ताउम्र रहेगा और फिर अपने बच्चे की नौकरी लिए वह भी घूस हीं देगा. उसे यह अहसास भी नहीं हो पा रहा है कि अगर भ्रष्ट जज न होता , अगर २-जी स्पेक्ट्रम में १.७६ लाख करोड़ का घोटाला ना होता और अगर देश में ये भ्रष्टाचारी काले धन के सामानांतर हीं नहीं बल्कि अर्थ-तंत्र को खोखला करने वाला एक प्रभावी तंत्र विकसित नहीं कर चुके होते तो उसके बच्चे की नौकरी स्वतः हीं लगती और जीवन बेहद सहज होता. १.७६ लाख करोड़ रुपये से पूरे भारत को मुफ्त भोजन एक साल तक कराया जा सकता था.
  यह प्रश्न किया जा रहा है कि जस्टिस काटजू को यह इल्हाम आज क्यों आया. यह एक अजीब तर्क है. हम गुनगुनाते पानी के मेढक हो गए हैं और भ्रष्ट जज की नियुक्ति में दिखाई दे रही सिस्टम की सडांध हमें तकलीफ नहीं देती और हम जस्टिस काटजू में खामी खोजने लगते हैं. ताकि भविष्य में भी कोई व्यक्ति हिम्मत ना करे ऐसे मुद्दे उठाने की कि हमें पानी की गर्मी के अहसास से कूदने की मेहनत  करनी पड़े. धीरी-धीरे गरम होते पानी में मरना हमारी नियति हो चुकी है.  
 
rajsthan patrika

मोदी कहां फंसेंगे ?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को गहराई से समझना पडेगा कि क्यों पार्टी में कोई संगीत सोम (उत्तर प्रदेश का विधायक) पैदा होता है. क्यों उसकी हैसियत इतनी बढ़ जाती है कि सहारनपुर दंगों में उसे गाज़ियाबाद –स्थित घर में हीं नज़रबंद रखा जाता है जबकि कानून में प्रिवेंटिव डिटेंशन का प्रावधान है और पार्टी में ऐसे लोगों को बाहर करने का. क्यों अचानक भारतीय जनता पार्टी का उत्तर प्रदेश का अध्यक्ष एक पुलिस कप्तान को चुनौती देता है कि “तुम नज़रों पर चढ़ गए हो, आने दो प्रदेश में हमारी सरकार”. क्यों अचानक देश के सबसे बड़े राज्य में दंगे बढ़ जाते हैं. हम यह तो समझ सकते हैं कि क्यों सत्ताधारी समाजवादी पार्टी में आज़म खान पैदा होते हैं. क्यों राज ठाकरे, अबू आज़मी या अकबरुद्दीन ओवैसी  बदस्तूर देश की राजनीतिक छाती पर मूंग दलते हुए अपनी शक्ति बढ़ाते हैं और उसका मुज़ाहरा करते हैं. क्यों कोई युवा मुख्यमंत्री नीम-अवचेतना में चला जाता है और क्यों पार्टी के मुखिया और तथाकथित समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव को गलतियाँ सरकार में नहीं मीडिया में दिखाई देती हैं. पर क्या भारतीय जनता पार्टी या मोदी इसी स्तर पर संगीत सोम सरीखे लोगों को लाकर या दंगों में “हम बनाम वो” (अस वर्सेज देम) का भाव रख कर समस्या का निदान तलाशेंगे?
आइंस्टीन ने कहा था “उन महत्वपूर्ण समस्याओं का, जिनका हमें सामना करना पड़ता है, तब तक समाधान नहीं निकल सकता, जब तक हमारी सोच का स्तर वही रहता है जिस सोच के स्तर पर हमने वे समस्याएं पैदा की थी”. इस “अस-वर्सेज-देम” के भाव से ना तो फिलस्तीन समस्या, न इराक या लखनऊ की शिया-सुन्नी समस्या , ना हीं कश्मीर समस्या का हल आज तक हो पाया है. फिर क्या संगीत सोम, आज़म खान, अबू आज़मी और ओबैसी से इतनी बड़ी समस्या दोनों समुदाय या राजनीतिक वर्ग दूर करवाना चाहता है?
जो मोदी को थोडा-बहुत जानते हैं वह यह भी जानते हैं कि यह उन कुछ थोड़े से नेताओं में हैं  जो  बेहतर परफॉर्म करने की बारे में सोचते हैं. वे यह भी मानते हैं कि इनकी सिंगल-पॉइंट दिली कोशिश होगी कि अल्पसंख्यक उनसे भय खाना तो दूर उन पर भरोसा रखे. किसी भी नेता के लिए यह उपलब्धि का सबसे अच्छा मकाम होता है जब आपसी वैमनस्य रखने वाला हर वर्ग उस पर पूरा भरोसा रखे. लेकिन इस तरह के मकाम तक पहुँचने के दो तरीके हैं. पहला : नेता अपने प्रति विश्वास का सहारा लेता हुआ वैमनस्य रखने वाले दोनों वर्गों का ध्यान इस मुद्दे से हटाने के लिए उन्हें अच्छे और समृद्ध जीवन की ओर प्रेरित करे. टमाटर और प्याज का भाव दोनों को अखरता है. रोज़गार दोनों को चाहिए.
खतरा यह है कि अल्पसंख्यक वर्ग में लम्पटतावाद फिर धरातल पर आ जाता है जब  मुलायम या लालू शासन में आते हैं और ठीक उसी तरह कई सोम खड़े हो जाते हैं जब शासन उनके मन माफिक हो जाता है. पर कालांतर में समझ में आता है यह लम्पटतावाद पूरे शासन पध्यती (सिस्टम ऑफ़ गवर्नेंस) के लिए चुनौती बन जाता  है.  
यूरोपीय समाज के संविदा-आधारित व्यवस्था से हट कर हम भारतीय सम्बन्ध-आधारित समाज हैं. हम प्यार उंडेलते हैं. निष्ठा परोसते हैं, अपने रहनुमा पर देर से अविश्वास होता है. इसीलिए हमारे विश्लेषण में निरपेक्ष भाव से देखने की क्षमता भी देर से आती है. लिहाजा हमारा समाज अभी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अगले एक साल तक सकारात्मक नज़रों से देखेगा.  
हमने नेहरु को भारतीय जन-मानस का “चहेता” (डार्लिंग ऑफ़ इंडियन मासेज) दशकों तक माना. इंदिरा गाँधी को आपातकाल के बाद फिर वापस लाये. उनकी हत्या के बाद रिकॉर्ड समर्थन से राजीव को लाये. बोफोर्स घोटाले के बाद राजीव गाँधी  को नज़रों से उतारा लेकिन फिर अगले २५ सालों तक कोई ऐसा नेता या पार्टी नज़र नहीं आयी कि हम तन-मन-धन से वही प्यार उंडेल सकें. मोदी में हमें वही `चहेता’ दिखाई दिया.
इन २५ साल्लों में समाज बदला. सूचना की विस्तार हुआ. सोशल मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के ज़रिये नागरिकों की जनमत बनाने –बिगाड़ने में भूमिका बड़ी. तर्क-शक्ति बड़ी. सामूहिक सोच में गुणात्मक परिवर्तन आया. लिहाज़ा अब “चहेते” को ज्यादा समय नहीं मिलेगा. मोदी के लिए साल भर से ज्यादा समय नहीं है इस जन समर्थन को रोके रखने का. साल भर में अगर नहीं दिखा कि एक सार्थक प्रयास हो रहा है उन वायदों को वफ़ा करने का जो जनता से मार्च-अप्रैल में किये गए थे तो जनता को विमुख होने में ज्यादा देर नहीं लगेगी.
मोदी को चुनौती जितनी बाहर से है उससे ज्यादा भीतर से है. एक तरफ मुलायम –लालू और अब नितीश की राजनीति है जो वैमनस्यता पर हीं राजनीतिक जुगाली करती हुई ज़िंदा रहती है. दूसरी ओर पार्टी और संघ का एक निचला वर्ग है जो यह समझ रहा है कि यह शासन हमारा है और अब हम हमेशा के लिए इस समस्या समाधान करके रहेंगे. वे इस यह प्रचंड मत को एक लाइसेंस के रूप में ले रहे हैं.
अगर मोदी को सफल बनाना है तो संघ को भी चुनाव के बाद निचले स्तर पर पैदा हुए “उत्साह” के भाव को रोकना होगा. ज़ाहिर ही कि संघ कभी नहीं चाहेगा कि मोदी असफल हों.फिर मोदी को भी मुख्य लड़ाई भ्रष्टाचार से लडनी है, महंगाई से लड़नी है , रोज़गार की कमी से लडनी है ना कि दो गुटों के वैमनस्य से.
फिर अल्पसंख्यकों में भी दानिश्वर (बुद्धिमान) समाज का विश्वास जीतना होगा कि इस वर्ग की बहबूदी के लिए सरकार कृतसंकल्प है ताकि वे इस समुदाय के लम्पट गुटों पर लगाम लगा सकें. आज अवसर है कि प्रधानमंत्री मोदी भारत की जनता से अपील करें कि कुछ समय के लिए यह वैमनस्य दर-किनार करें. संघ भी इसमें बड़ी भूमिका निभा सकता है. और जब यह दोनों पहल करेंगे तो सभी मुलायम या लालू या नितीश मजबूर हो जायेंगे इसी रस्ते पर चलने पर. यही मज़बूरी देश के लिए एक नया रास्ता बना सकेगी. सत्ता में बैठे लोगों की निष्पक्षता के प्रति हीं नहीं उनकी कार्यशीलता के प्रति भी पूरे भारत में एक नया विश्वास जगाना होगा जो चुनाव की राजनीति से हट कर होगा. जब तक राजनेता चुनाव की राजनीति से ऊपर नहीं उठेंगे या उन्हें मजबूर नहीं किया जायेगा “अस वर्सेज देम” का भाव बना रहेगा और नतीजा होगा मानव विकास सूचकांक (ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स) पर भारत का १३५ वें नंबर पिछले २५ साल से बना रहना.   .

lokmat

Saturday, 9 August 2014

दो वैल्यू सिस्टम और त्रिशंकु के रूप में पिसता भारतीय समाज


कोलकाता को ४२ वर्षीय महिला ने फेसबुक पर १५ दिन की “चैट” के बाद वीरभूमि के रहने वाले एक ३३ वर्षीय युवक को अपने घर बुलाया. जब वह युवक महिला के घर पहुंचा तो महिला ने पाया कि फेसबुक पर दी गयी तस्वीर से यह युवक अलग है , नाटा है और मोटा है. याने बदसूरत है. युवक उससे शारीरिक सम्बन्ध बनाने का दबाव डालने लगा. महिला के ऐतराज़ करने पर उस युवक उस महिला की चाकू मार कर हत्या कर दी. फेसबुक पर जिस रफ़्तार से दोस्ती, शादी और तलाक हो रहे है उसे देख कर भारतीय समाज में एक लगातार फैलाते विकार से अजीब खतरा पैदा हो गया है. लिव-इन रिलेशन और कुछ दिन बाद अनबन से उपजी दुर्भावना से साथ रहने वाली महिला का पुरुष मित्र पर बलात्कार का मुकदमा भी उसी पतन की तार्किक परिणति है.

जैसे हमने अपने अर्थ-व्यवस्था को वैश्विक अर्थ-व्यवस्था (मूल रूप से पश्चिम के संपन्न राष्ट्रों से संचालित) में समेकित (इंटीग्रेट) किया है जिसके तहत २००७-०८ में पैदा हुए अमरीकी वित्तीय बाज़ार का संकट भारत के कृषि पर असर डालता है, शायद उसी तरह जाने-अनजाने में अपने वैल्यू सिस्टम को भी पश्चिमी वैल्यू सिस्टम में समाहित कर रहे हैं. या पूरा का पूरा पश्चिमी वैल्यू सिस्टम अंगीकार कर रहे हैं. कोलकाता की महिला को किसी युवक से महज़ १५ दिन के ट्वीट से दोस्ती करने से रोकना पश्चिमी वैल्यू सिस्टम के अनुसार नारी स्वातंत्र्य को बाधित करने वाला है. यह माना जाता है कि भारत में जो इसकी मुखालफत में आवाज़ उठता है वह दकियानूसी, गैर-प्रगतिशील और नारी स्वतन्त्रता न चाहने वाला करार दिया जाता है. हमारा कानून भी सहमति पर आधारित शारीरिक संबंधों की इज़ाज़त देता है (अगर इसमें धन का आदान-प्रदान नहीं है) और यहाँ तक की विवाहेतर सम्बन्ध भी तब तक मान्य है जब तक पत्नी इसकी शिकायत नहीं करती.    

यह सत्य है कि कोई भी समाज सभ्यता या संस्कृति के मार्च को रोक नहीं सकता मात्र देर कर सकता है. पहनावे में बदलाव, संबंधों की गुणवत्ता में बदलाव, मूल्यों की जकड से बाहर होने की तड़प समाज को गतिशील बनाती है. मार्क्सवादी सिद्धांत की माने तो आर्थिक सम्बन्ध भी कई बार सामाजिक संस्थाओं में बदलाव का बडा कारण बनाते हैं. संयुक्त परिवार की संस्था में टूटन भी इसी कारण है. वैल्यू सिस्टम भी बदलेगा हीं. लेकिन ज़रूरी नहीं कि हम पश्चिमी वैल्यू सिस्टम हीं अंगीकार करें. क्या हम एक नया वैल्यू सिस्टम जो हमारे पूर्व के सिस्टम के आगे का पड़ाव हो नहीं ला सकते? समस्या इसलिए पैदा हो रही है कि सम्प्रेषण के नए साधनों का इस्तेमाल कर हम पश्चमी वैल्यू सिस्टम को अंगीकार करने में बेहद तेज़ी कर रहे हैं.

कभी बैंकाक, रोम या पेरिस जाएँ. आठ इंच की पेंट पहने लड़की को ओर विदेशी तो छोडिये उस देश का युवक भी “दूसरी नज़रों से”  नहीं देखता क्योंकि यह उसके यहाँ का सामान्य पहनावा है. भारत की समस्या यह है कि भारतीय महिलाओं ने  अभी  कोई दो दशकों से (आमतौर पर) छः मीटर की साड़ी छोडी है और शलवार या जींस पर आयीं हैं. गाँव का एक मजदूर जब शहर में आता है तो उसका वैल्यू सिस्टम और समझ पुराना होता है जिसमें उसको यह बताया गया है कि शहरों में जो महिलाएं कम कपडे पहनती हैं वे “अच्छी” नहीं होती और कई बार “उपलब्ध” होती हैं. लिहाज़ा जब वह अकेले में या एकांत में या अपने समूह के साथ किसी महिला को कम कपडे पहने, या सिगरेट या शराब पीते देखता है तो अपने वैल्यू सिस्टम से आंकता है और जब उसे तात्कालिक ऐसा परिवेश नहीं मिलता जो नए वैल्यू सिस्टम के अवरोध के रूप में होता है (जैसे सी सी टी वी, एअरपोर्ट के माहौल की दहशत या सिक्यूरिटी गार्ड) तो उसे लगता है कि वह इस महिला के साथ कुछ कर सकता है.

यही महिला अगर एअरपोर्ट से फाइव स्तर होटल के एक वेल-ट्रेंड ड्राईवर की गाड़ी में बैठे तो उस पर शारीरिक हमले की गुंजाइस कम हो जाती है क्योंकि वह ड्राईवर नए वैल्यू सिस्टम को समझने लगता है. पुलिस, कानून, सी सी टी वी और होटल में नौकरी छूटने का डर भी उसके अन्दर होता है. लेकिन यही डर माध्यम या निम्न वर्ग के रिहायशी रूट पर चलने वाले उस ड्राइवर, कंडक्टर या खलासी को नहीं होगा जब वह यह पायेगा कि १६ दिसम्बर की कडकडाती ठंड रात में १० बजे एक लड़का और एक लडकी सीट के पीछे बैठ प्यार की बात या प्यार कर रहे हैं.  यही डर उस वीरभूमि के युवक भी को नहीं होगा जो ट्वीट पर गलत अकाउंट बना कर अपनी फोटो की जगह किसी स्मार्ट युवक की तस्वीर लगा कर आया है. उन दोनों को नारी स्वतंत्रता का पश्चिमी मतलब नहीं मालूम, मात्र यह मालूम है कि ऐसे लोग “उपलब्ध” या “कमज़ोर” होते हैं और इनके साथ अपनी काम पिपासा शांत की जा सकती है.

जब हम गाहे –बगाहे (आजकल कुछ ज्यादा हीं) सुनते हैं किसी मंत्री ने कहा “औरतें कम कपडे ना पहने” तब एक जबरदस्त प्रतिक्रिया “आधुनिकता के हिमायती” बुद्धिजीवियों के द्वारा होती है. लगता है मानो भूचाल आ गया हो. प्रश्न यह नहीं है कि कम कपडे पहने या ज्यादा. प्रश्न यह है कि दो वैल्यू सिस्टम को जब आप झटके से जोड़ते हैं तो यह समस्या आती है. आधुनिकता या नारी स्वातंत्र्य के लिए जार-जार आंसू बहाने वाले यह नहीं सोच पा रहे हैं इस तरह के स्वातंत्र्य की शर्तें हैं जबरदस्त कानून और उन्हें अमल में लेन वाली ताकतवर संस्थाएं, सी सी टी वी से हर क्षण और हर जगह नज़र रखना, न्यायपालिका की फौरी कार्रवाई का खौफ और महिलाओं में स्थिति को समझने की सलाहियत.       

भारतीय समाज में हजारों साल से संस्थाएं विकसित हुई थी. परिवार, प्राथमिक संबंधों पर आधरित सामाजिक तानाबाना, विवाह के जन्म-जन्मान्तर के रिश्ते, माँ-बाप का बच्चों के प्रति शर्त-शून्य अगाथ ममत्व, “सोशल पुलिसिंग” की अद्भुत व्यवस्था ये सभी समाज में व्यक्ति के नैतिक-चारित्रिक फिसलाव से रोकते थे. इस लिहाज़ से भारतीय समाज तथाकथित पश्चिमी समाजों से अलग रहा है. पश्चिमी समाज “कॉन्ट्रैक्ट” (संविदा) पर आधारित रहा है जहाँ ना तो प्यार या ममत्व में पूर्ण समर्पण है ना हीं व्यक्तिगत नैतिकता के प्रति सार्थक आग्रह. भारत का समाज संबंधों पर आधारित रहा है.

किसी भी समाज में धार्मिक संस्थाओं की इस पतन को रोकने में एक बड़ी भूमिका रही है. भारत में हजारों साल से ये संस्थाएं रहीं है. पर हाल के दौर में इनकी भूमिका हीं नहीं विश्वसनीयता भी ख़त्म हो चुकी है. व्यक्तिगत पसंद-नापसंद वाले बाबा हैं. संस्थाएं या मूल्य विकसित करना इन बाबाओं की  हैसियत से बाहर है. पुरानी रूढ़ियाँ भी एकल परिवार और शहरीकरण के कारण दम तोड़ चुकी हैं. जब इनमें से एक-आध बाबा बलात्कार के मामले में सलाखों के पीछे चला जाता है या उसकी अकूत संपत्ति का खुलासा होता है तो बाख –खुचा विश्वास भी ख़त्म हो जाता है.

नया वैल्यू सिस्टम तो आएगा पर क्या उसे बगैर पूरे समाज को तैयार किये लाना नयी समस्याओं को पैदा नहीं करेगा? क्या यह बेहतर नहीं होगा कि नारी स्वतन्त्रता के पश्चिमी भाव से हट कर हम इस नारी स्वतंत्रता का मात्र कम कपडे तक हीं महदूद ना करें बल्कि इसमें दुर्गा की शक्ति दे ना कि निर्भया (दिल्ली बलात्कार कांड, १६ दिसम्बर, ) की बेचारगी? क्या यह उचित नहीं होगा कि पहले बदलते वैल्यू सिस्टम से उस बस कंडक्टर और खलासी को भी रू-ब-रू कराएँ और तब उसे दिल्ली में गाडी का चलने का लाइसेंस दें. और जब तक यह प्रक्रिया , कानून, टेक्नोलॉजी का अपराध रोकने में प्रयोग पश्चिमी समाज के स्तर तक ना आ जाये, कम कपडे ना पहनने की वकालत करें?   
 
jansatta

Tuesday, 22 July 2014

सही समय है कांग्रेस में आमूल-चूल परिवर्तन का


कांग्रेस की लुप्त होती आतंरिक प्रतिरोधी क्षमता  


यूनानी कहावत है “मछली सर से सड़ना शुरू होती है”. चिकित्सा विज्ञानं की सर्वसिद्ध मान्यता है कि सड़ांध की प्रक्रिया रोकने के लिए याने बैक्टीरिया (परजीवी विषाणु) के हमले को निष्प्रभ करने के लिए  ईश्वर ने एंटीबाडीज (प्रतिरोधी कणिकाएं) बनाई हैं. जितनी हीं ज्यादा “सक्रिय” ये कणिकाएं होंगी उतनी हीं सड़ांध के खिलाफ प्रतिरोधी क्षमता.
 संगठन, वे राजनीतिक हों या गैर-राजनीतिक, में भी जीव की तरह परजीवियों के हमले से बचने के लिए अन्दर से हीं एंटीबाडीज का अस्तित्व होता है. अधिक जिजीविषा (जीने की इच्छा) वाले दलों में इन एंटीबाडीज को मरने नहीं दिया जाता और ज़रुरत पर इन्हें अति-सक्रिय बना दिया जाता है. यह काम शीर्ष पर बैठे सही सोच वाले नेताओं के समूह द्वारा किया जाता है. कई बार इस सड़ांध का अहसास शीर्ष नेतृत्व की स्थिति देख कर लगाया जा सकता है.
उदाहरण के लिए देश के दो दलों भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस को लें. इस चुनाव से पहले के तीन चुनावों में लगातार पार्टी के जन समर्थन गिरता रहा था. नेतृत्व में सुस्ती जनित –सड़ांध का ख़तरा साफ़ नज़र आने लग था. संघ के समझ में आ गया और उसने अपने सारे पूर्वाग्रह को दरकिनार करते हुए नरेन्द्र मोदी को विकसित करना शुरू किया. भाजपा के अन्दर भी परजीवियों के खिलाफ प्रतिरोधी कणिकाएं “सक्रिय” हुई. नतीजा सामने है.
अब कांग्रेस को लें. हाल के आम चुनावों में जबरदस्त हार हुई.  यह इतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना हार के बाद भी पार्टी में प्रतिरोधी कणिकाओं का निष्क्रिय रहना और परजीवियों का यथास्थिति बनाने में सफल होना. शीर्ष नेतृत्व में पार्टी को उबारने का आत्मग्लानी-जनित सार्थक गुस्सा तो छोडिये इस हार पर आत्मग्लानी का भी नितांत अभाव दिखाई दिया. नेतृत्व जब संसद में मंहगाई पर चल रही बहस में सो रहा हो तो प्रतिरोधी कणिकाएं कैसे “सक्रिय” हो सकती हैं? परजीवियों ने फिर सर उठाया और घटना पर पार्टी की प्रतिक्रया आयी—--- “कई बार गंभीर चिंतन में भी आँखे बंद हो जाती हैं”. नेतृत्व सोता रहे यह परजीवियों को रास आता है. जीवंत राजनीतिक दलों का भी एक अन्तर्निहित स्वाभिमान होता है जो इनकी गत्यात्मकता (डाईनेमिस्म) सुनिश्चित करता है. कांग्रेस यह गत्यात्मकता खो रही है. .
आत्मग्लानी का एक हल्का सा भाव दिखाते हुए ए के एंटोनी से कहा गया कि हार के कारणों की खोज करें. लगा कि पार्टी में जिजीविषा है. कारण खोजने के लिए राकेट साइंस का ज्ञान जरूरी नहीं था. सडक पर खड़ा पहला आदमी भी बता सकता था कि कारण क्या थे. ईमानदारी निरपेक्ष (अब्सोल्यूट) होती है.  स्वयं गलत न करना परन्तु गलत को देख कर मुंह फेर लेना भी बेईमानी के वर्ग में माना जाता है. लिहाज़ा एंटोनी व्यक्तिगत रूप से भले हीं ईमानदार माने जाते हों अगर अपनी रिपोर्ट में उन बातों को बचा गए जिन से शीर्ष नेतृत्व पर आंच आती हो तो वह नैतिक रूप से ईमानदार तो नहीं कहे जायेंगे. मनमोहन सिंह भी व्यक्तिगत रूप से ईमानदार थे लेकिन रीढ़ तन नहीं पाई जब १०, जनपथ प्रधानमंत्री की संस्था को दस साल तक बौना साबित करता रहा.
उन्हें भी सभी अन्य पार्टी चाटुकारों की तरह राहुल गाँधी में वे सारे गुण नज़र आते रहे जो “भारत के भविष्य को सुधारने” के लिए ज़रूरी थे. सभी परजीवियों के स्वर में स्वर मिलते हुए उन्होंने भी राहुल को पार्टी की हीं नहीं देश की कमान संभालने के लिए “सबसे उपयुक्त” मन. प्रश्न यह नहीं है कि इन परजीवियों ने किस तरह जनवरी के तीसरे सप्ताह में हुए कांग्रेस अधिवेशन में “राहुल को प्रधानमंत्री प्रत्याशी घोषित करो” का नारा लगाया”. प्रश्न यह भी नहीं है कांग्रेस हार गयी. प्रशन यह है कि परजीवी अभी भी भारी पड़ रहे हैं जब पार्टी में अंग शिथिल पड़ रहे हैं और मवाद दिखाई दे रहां है.
कभी पार्टी के उन लोगों से बात करें जो अपने जीवन का तीन दशक इसमें खपा चुके हैं और आगे तीन दशक का काल बाकी है. उनके व्यक्तिगत अनौपचारिक कथन में एक अजीब नैराश्य , बेचारगी और “राजनीतिक तौर पर जीने की अभिलाषा का लोप” दिखाई देता है. रसायन -शास्त्र में उत्प्रेरक के बारे में कहा जाता है कि यह रासायनिक क्रिया में भाग तो नहीं लेता परन्तु इसकी मौजूदगी से क्रिया की रफ़्तार बढ़ जाती है.
एंटोनी अगर अपनी रिपोर्ट में राहुल गाँधी को बचने की जगह साफ़गोई से कहते कि गलती ना तो हारने में थी ना हीं संसद में मंहगाई पर बहस के दौरान सोने में बल्कि परजीवी विषाणुओं द्वारा यह बताने में कि “कई बार गहन चिंतन से भी आँखें बंद हो जाती हैं”. एंटोनी परजीवी बैक्टेरिया नहीं हैं लिहाज़ा उन्हें तो अपनी रिपोर्ट में बताना चाहिए था कि कांग्रेस अधिवेसन में “राहुल लाओ” का नारा लगने वाले हीं पार्टी के परजीवी विषाणु है जो पहले अंग को शिथिल करते है फिर उस अंग के शिथिल होते हीं उसे खाने में जुट जाते हैं.
 पार्टी को मजबूत बनाने के लिए एंटीबाडी का सृजन करने वाले एंटीजन (प्रतिजन) हैं. सिर्फ ज़रुरत है उन्हें पहचानने की और उपयुक्त वातावरण देने की. मध्य प्रदेश से किसी एक गुफरान का खड़ा होना इस बात की तस्दीक है. लेकिन दिल्ली के स्तर पर कुछ गुफरान-रुपी प्रतिरोधी कणिकाओं को पैदा करना ज़रूरी है अगर इसे सडन से बचाना है. वरना राहुल –सोनिया प्रशस्ति करते हुए हुए ये परजीवी कभी महंगाई पर अपनी विपक्षी की भूमिका की जगह वैदिक-हाफिज मिलन को हीं देश के लिए घातक बता कर पार्टी को असली प्रतिरोधी क्षमता को कम करते जायेंगे.
किसी भी प्रजातंत्र, में खासकर उन प्रजातान्त्रिक व्यवस्थाओं ,में जो द्वंदात्मक सिद्धांत पर आधारित हो जैसे भारत, मजबूत विपक्ष और निष्पक्ष मीडिया की जबरदस्त भूमिका होती है. कांग्रेस के लोक सभा में मात्र ४४ सदस्य हैं यह इतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना यह कि वे सत्ता पक्ष को जनोपदेय नीति से हटने पर कितना जनसमर्थन हासिल कर पाते हैं और सरकार को सही रस्ते पर चलने पर मज़बूत कर सकते हैं. कांग्रेस में आज ज़रूरी हो गया है कि नयी कोशिकाओं को पैदा करे , परजीवियों को ख़त्म करे और प्रजातंत्र के हित में अपने को बदले.

nai duniya