Thursday, 8 May 2014

मोदी को व्यापक व्यक्तित्व का स्वामी होना पडेगा


अगर मीडिया मैं हिम्मत हो तो राहुल गाँधी से अमेठी के विकास के बारे में सवाल पूछे”. “ये तो न्यूज़ ट्रेडर” हैं”. “चुनाव आयोग की निष्पक्षता संदिग्ध है” . “जितने दिग्गज पत्रकार बैठे थे निहथ्थे होगये जब मेरी छोटी बहन स्मृति ईरानी ने अमेठी के बारे में तथ्य देना शुरू किया”. “आपकी गलती नहीं है ये न्यूज़ ट्रेडर की मानसिकता है”.
उपरोक्त कुछ वक्तव्य भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रधानमंत्री के प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी के हैं. इनमें मोदी ने देश की दो संस्थाओं --मीडिया और चुनाव आयोग – की नीयत पर कीचड़ उछाला और उन्हें बौना दिखाया.
भाषण और वितंडावाद (डेमागागी) में अंतर होता है. चौराहे पर मदारी का खेल दिखने वाला “पापी पेट के वास्ते” का इमोशनल तर्क दे कर जमूरे की नाच का औचित्य ठहराता है. और दर्शकों ना केवल बंधे रहता है बल्कि खेल के बाद पैसे भी लेता है. मोदी ने अमेठी में कहा “ मैं यहाँ किसी को बुरा –भला कहने नहीं आया हूँ. अमेठी का ऐसा विकास करूंगा कि गुजरात के इंस्टिट्यूट यहाँ सीखने आयेंगे”. “भाइयों और बहनों , क्या गरीब माँ के गर्भ में पैदा होना गुनाह है?”. “अरे, अमेठी के लोगों को कम से कम एक शौचालय तो दे देते”. “चालीस साल से तीन की तीन पीढियां बर्बाद हो गयी और उनके सपनों को चूर-चूर करदिया”. “कहती हिं स्म्मृति कौन है?” भारत माँ के लाल से यह पूछने का तुम्हें किसने दिया अधिकार”?”
तर्क -शास्त्र में दो तरह के दोष होते हैं –औपचारिक और अनौपचारिक. मोदी ने दोनों का बखूबी इस्तेमाल किया अपने भाषणों में. अमेठी में एक दर्ज़न से ज्यादा देश के प्रमुख संस्थान और कारखाने केंद्र की मंज़ूरी और धन से लगाए गए हैं पर मोदी एक शौचालय को लेकर जार-जार रोये. उन्होंने कहा कि वह किसी की बुराई करने नहीं आये पर ४५ मिनट के वितंडावाद रुपी भाषण में ३० मिनट तक सोनिया, राहुल, प्रियंका और स्वर्गीय राजीव गाँधी की लानत-मलानत करते रहे.
संस्थाओं को ढाहना और उन पर इतनी कालिख पोत देना कि उसका असली चेहरा नज़र ना आये यह तथाकथित सामाजिक न्याय की बांग देने वाली पार्टियों का शगल रहा है. इस किस्म की राजनीति का अभ्युदय सन १९९० मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू होने का बाद या यू कहिये कि १९८४ में कांशी राम के बहुजन समाज पार्टी बनाने के बाद हुआ. दरअसल इससे एक झूठी सशक्तिकरण की चेतना उस वर्ग में अचानक विकसित होती है जो सदियों से दबा –कुचला रहा है. इसके लिए पार्टियों को ना तो सिद्धांत पर टिकने की प्रतिबद्धता की दरकार होती है ना हीं कैडर –सृजन के लिए मेहनत करने की जहमत लेनी होती है. लालू यादव का चरवाहा स्कूल, ज़िला पुलिस कप्तान को सार्वजनिकरूप से अपमानित करना, मुख्य सचिव स्तर के अधिकारी से अपने कार्यकर्ताओं के बीच खैनी बनाने की फरमाइश करना इसी श्रेणी में आते हैं. मायावती का उच्च जाति के अफसरों से पैर छुवाना भी इसी किस्म की राजनीति है. दलित वर्ग या पिछड़ा समूह यह समझता है कि हमारा नेता सामाजिक न्याय दिला रहा है कप्तान को अपमानित कर के . एक नशा सा इस वर्ग में छ जाता है. वह भूल जाता है कि इस नौकरी, विकास , सड़क, शिक्षा उसकी पहली ज़रुरत है. नेता राज करता रहता है.
परन्तु जब भारतीय जनता पार्टी के नेता, गुजरात के मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री पद के सबसे प्रबल दावेदार नरेन्द्र मोदी दिन में चार बार मीडिया को “न्यूज़ ट्रेडर” कह कर या चुनाव आयोग ऐसी सफल संस्था की निष्पक्षता को सार्वजनिकरूप से चुनौती देते हैं तब डर लगता है. कांशी राम , मायावती या लालू प्रसाद देश के प्रधानमंत्री नहीं हैं. पूरे देश की जनभावनाओं के किसी काल खंड में संबल भी नहीं रहे हैं. उनके बारे में मालूम है कि दोषपूर्ण फर्स्ट-पास्ट--पोस्ट चुनाव पध्यती के कारण वह दलित-मुस्लिम या दलित-ब्राह्मण या फिर यादव-मुस्लिम या कुर्मी-उच्च जाति या कुर्मी-मुस्लिम गठजोड़ बना कर २० से ३० प्रतिशत वोटों पर कब्ज़ा ज़माने के कारण सीट हासिल करते हैं और हर बार चुनाव में यही आसन खेल फिर शुरू कर देते हैं. लेकिन जब मोदी मीडिया को न्यूज़ ट्रेडर कहते हैं ---वह मीडिया जिसके बारे में कांग्रेस सहित अन्य दलों का आरोप हैं कि वह मोदी की गोद मैं बैठा है—तब लगता है कि लालू, माया या मुलायम ब्रांड की राजनीति और मोदी की राजनीति में कोई मौलिक भेद नहीं है.
मीडिया में सब कुछ अच्छा हो यह कहना गलत होगा. लेकिन क्या कोई व्यक्ति यह कह सकता है कि सत्ताधारी कांग्रेस को मीडिया ने कभी भी बक्शा है? आज सत्ता पक्ष के खिलाफ अगर जनमत बना है तो यह केवल मोदी के तथाकथित और अतिशय प्रचारित गुजरात माडल का कमाल नहीं है. लेकिन कांग्रेस ने तो कभी भी मीडिया को “खबरों के सौदागर” (न्यूज़ ट्रेडर) नहीं कहा. मीडिया के बारे में चाहे जो भी आरोप लगे यह ना तो मोदी ना हीं राहुल गांधी या अन्य कोई यह आरोप लगा सकता है कि वह किसी को बक्श देता है. यह भारतीय मीडिया के डी एन ए के खिलाफ है. किसी को ज्यादा , किसी को कम हाईलाइट करना यह मीडिया के व्यक्तिगत पसंद- नापसंद पर ज़रूर होता है पर मीडिया किसी की खबर जो नकारात्मक और गंभीररूप से जनसरोकार वाली हो, ना दिखाए यह संभव नहीं है क्योंकि दर्शक या पाठक अगले दिन हीं उसे ख़ारिज कर देगा.
न्यूज़ ट्रेडर है कह कर मोदी यह बताना चाहते हैं कि मीडिया का उद्देश्य जन सरोकार नहीं सौदागरी है. ब्राडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन या न्यूज़ ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन की लगभग पांच साल के जीवन काल में शायद हीं कभी इतना घिनौना आरोप सत्ता पक्ष ने लगाया हो.
अभी तक भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री के प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी का व्यक्तित्व का आक्रामक होना स्थितियों को देखते हुए समीचीन था. उनकी व्यग्यात्मक शैली, उनका संस्थाओं पर प्रहार और “शहजादा”, माँ-बेटे “ की सरकार, “दामाद श्री” “दिल मांगे मोरे” और “न्यूज़ ट्रेडर्स” के फॉर्मेट में हमला भी प्रतिद्वान्दात्मक प्रजातंत्र का अपरिहार्य कारक मान कर नज़रंदाज़ किया जा सकता था. इसकी भी अनदेखी की जा सकती है कि देश के प्रधानमंत्री पद के प्रबलतम दावेदार ने चुनाव आयोग पर जबरदस्त आरोप लगाये हैं निष्पक्षता को लेकर. लेकिन इतने बड़े राष्ट्र को सक्षमरूप से चलाने के लिए एक ऐसे व्यक्तित्व की ज़रुरत है जो सर्व-समाहन का भाव रखता हो. जिसमें प्रतिशोध की जगह सर्व-समाहन की व्यापकता हो.
मीडिया में हिम्मत हो तो गाँधी परिवार से सवाल करें अमेठी और रायबरेली के विकास को लेकर”. पूरा देश जानता है कि मीडिया ने किस तरह यूपीए-२ और मनमोहन सरकार को एक क्षण भी नहीं बक्शा. और शायद मोदी के राष्ट्री परिदृश्य में उभरने का यह एक बड़ा कारण रहा है. लिहाज़ा मीडिया की हिम्मत को चुनौती देने और उसे “न्यूज़ ट्रेडर” बताना उसी वितंडावाद का हिस्सा है.

हाल के दो हफ़्तों में मोदी ने इंटरव्यू देना शुरू किया. इस दौरान जब भी उनकी प्रशस्ति के अलावा असहज करने वाले सवाल कुछ पत्रकारों ने पूछे तो मीडिया को लेकर उनकी जुगुप्सा और पत्रकारों के प्रति घृणा छलक कर बाहर आ जाती थी. शायद भविष्य में मीडिया पर अंकुश लगाने के लिए एक ऐसा वातावरण मोदी की स्कीम में है.

lokmat
 

Monday, 28 April 2014

“दामाद श्री” बनाम “टाफी” --- भ्रष्टाचार को लेकर पार्टियाँ कितनी गंभीर ?


कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी के दामाद, पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गाँधी के जीजा और प्रियंका के पति रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ भूमि की खरीद में करोड़ों रुपये अर्जित करने का मामला भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने चुनाव के नौ चरणों में से छटवें चरण के ख़त्म हो जाने के बाद पुरजोर तरीके से उठाया. उधर कांग्रेस के प्रधानमंत्री के दावेदार राहुल गाँधी ने भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी पर किसानों की ४५,००० एकड़ जमीन कौड़ियों के भाव (टाफी की कीमत पर) उद्योगपति अडानी को देने का दावा किया.
दरअसल जनता के मन में इन दोनों प्रतिस्पर्धी आरोपों को लेकर कई शंकाएं जन्म ले रही हैं. वाड्रा को जमीन देने का मामला दो साल पहले उठा था और पाया गया कि हरियाणा और राजस्थान में भारत के सबसे ताकतवर गाँधी परिवार के दामाद को वहां की तत्कालीन कांग्रेस सरकारों ने किसानों की जमीन “लैंड यूज “ में परिवर्तन कर के दे दिया. यह मामला सबसे पहले आप पार्टी के संयोजक अरविन्द केजरीवाल ने उठाया था. कुछ दस्तावेज भी दिए थे जिसमें किसानों की जमीन को हरियाणा सरकार ने जनहित में अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए अस्पताल के लिए अधिग्रहित किया और वाड्रा की कंपनी को सौंप दिया. रातों रात सैकड़ों करोड़ रुपये वाड्रा ने कमा लिए. लैंड सीलिंग कानून की अवहेलना भी की गयी.
उसी तरह कांग्रेस के आरोप के मुताबिक अडानी को कुछ वर्षों में मोदी ने ४५,००० एकड़ खेती वाली किसानों की जमीन एक रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से दी और वह वह भी किसानों के विरोध के बावजूद हालांकि अडानी ने इसे गलत बताया है और कहा है कि सबसे सस्ती जमीन तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने उन्हें दी थी).
प्रश्न यह है कि क्या इतने बड़े भ्रष्टाचार (उद्योगपतियों को सरकारी पक्षपात कर लाभ देना भी उसी श्रेणी में आता है) के दोनों मामले पहले नहीं उठाये जा सकते थे? क्या आरोप लगने वाली दोनों पार्टियाँ वाकई भ्रष्टाचार को लेकर गंभीर हैं? अगर हैं तो क्या ये मामले दो साल पहले हीं किसी राजनीतिक दल को सड़कों पर उतरने के लिए प्रयाप्त नहीं थे?
राजनीतिक वर्ग ने भ्रष्टाचार ऐसे गंभीर मुद्दे को भी फुटबाल का खेल बना दिया है. लगता नहीं है कि इन दोनों राष्ट्रीय दलों में भ्रष्टाचार को लेकर “शून्य सहिष्णुता” का भाव कहीं दूर –दूर तक भी है. वाड्रा का मामला तब भाजपा के जेहन में आता है जब राहुल गाँधी अडानी-मोदी संबंधों आरोप लगाते हैं. भाजपा की गैरजिम्मेदारी का एक अन्य उदाहरण लें. राजस्थान में कुछ महीने से इस पार्टी की सरकार है. “दामाद श्री “ शीर्षक फिल्म और किताब जारी कर भाजपा ने यह आरोप लगाया कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने “दामाद श्री: “ रोबर्ट वाड्रा को गैरकानूनी रूप से जमीन दे कर करोड़ों कमवाया. लेकिन क्या यह आज कुछ माह से इसी पार्टी की राज्य सरकार के होते हुए यह नहीं कर सकती थी कि जांच कराये और अगर वाड्रा और तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने भ्रष्टाचार किया था और, कानून तोड़े गए थे तो “दामाद श्री” को लाभ पहुंचाने के लिए तो उनके और तत्कालीन सरकार के लोगों के खिलाफ कार्रवाई करे.
क्या कांग्रेस पार्टी से अपेक्षा नहीं थी कि गुजरात में अगर “किसानों की जमीन जबरदस्ती कौड़ियों के भाव किसी अडानी को दी गयी थी तो पिछले एक साल में जबरदस्त आन्दोलन करे और सडकों पर आये.
दरअसल दोनों ने ये मुद्दे भ्रष्टाचार के खिलाफ किसी “जोरे टालरेंस” के भाव में आकर नहीं उठाये हैं बल्कि उन्हें यह पता चला है कि यह मुद्दा चुनाव के दौरान जनता में “बिकता” है. अगर मोदी टाफी बाँटते हैं तो सोनिया के दामाद भी टाफी के भाव हीं जमीन खरीदते हैं फर्क इतना है कि वह खरीदने के तुरंत बाद करोड़ों का फायदा लेकर बेंच देते हैं जबकि अडानी जमीन अपने पास रखते हैं , कुछ उद्योग लगाते हैं. जमीन का भाव दोनों ओर बढ़ता है.
कहा जाता है कि चाकू खरबूजे पर चले या खरबूजा चाकू पर, कटता खरबूजा हीं है. ना तो वाड्रा की जमीन ने रातों-रात सोना उगलना शुरू किया ना हीं अडानी और टाटा के हजारों एकड़ जमीन ने अनाज की जगह हीरे उगले. पर नुकसान उन किसानों का हुआ जिनके जीविका का एक मात्र साधन जन हित के नाम पर सरकारों ने छीन लिया. गुजरात में भले हीं कृषि क्षेत्र में पिछले ११ सालों में १० प्रतिशत विकास दर लगातार रहां हो पर एन एस एस ओ की रिपोर्ट के मुताबिक़ गरीब किसानों में रोजगार के अवसर कम हुए हैं क्योंकि वे जी डी पी बढ़ने वाले नकद फसल (कैश क्रॉप) बोने की हिम्मत नहीं कर सकते थे जो संपन्न किसान कर सकते थे. नतीजतन , ग्रामीण क्षेत्र में बेरोजगारी बढ़ी, गरीब –अमीर के बीच का अंतर बढा हालांकि मोदी ने जी डी पी दिखा कर अपने को विकासकर्ता के रूप में देश भर में सफलतापूर्वक प्रतिस्थापित कर लिया.
जनता का इन दोनों राष्ट्रीय दलों की संजीदगी पर शक होने का एक अन्य कारण भी है. वाड्रा पर फिल्म व किताब निकालने वाली भारतीय जनता पार्टी वोट के लिए येद्दीयुरुप्पा को या श्रीरामलू को पार्टी में वापस लेने में रंच मात्र भी गुरेज नहीं करती जिन्हें पार्टी ने हीं भ्रष्टाचार के आरोप में निकाला था. उधर मोदी को भ्रष्ट बताने वाली कांग्रेस रेल मंत्री के रूप में भ्रष्टाचार के हीं आरोप में हटाये गए पवन बंसल को फिर टिकट देने में और आदर्श घोटाले में आकंठ डूबे और हटाये मुख्यमंत्री पद से हटाये गए अशोक चह्वाण को फिर वापास लेने में किसी शर्म का इज़हार नहीं करती.
ऐसे में आम-जनता यह समझ में नहीं आ रहा है कि वह वाड्रा जमीन घोटाले में कांग्रेस से नाराज हो या मोदी-अडानी दुर्गठजोड़ को लेकर भाजपा से . उसे यह भी विश्वास नहीं हो पा रहा है कि सत्ता में आने पर क्या वाकई इन में कोई भी भ्रष्टाचार के खिलाफ अपने वाड्रा और येद्दीयुरुप्पा को बचाएगा या दूसरे पार्टी के अशोक चह्वाण और रेड्डी बंधुओं को जेल भेजेगा. कहीं ऐसा तो नहीं कि चुनाव के बाद दोनों प्रमुख दल “हम्माम में दोनों” के भाव में जनता को भ्रष्टाचारियों का भोजन बनाते रहेंगे.

rajsthan patrika


Tuesday, 8 April 2014

जो सपने अच्छे बेंचेगा वही राजा बनेगा


तो फिर से एक बार घोषणा-पत्र की बाढ़ आयी. १६ वीं लोक सभा का चुनाव है तो ज़ाहिर है १६वीं बार दोनों प्रमुख राष्ट्रीय दलोंकांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (दोनों के काल विशेष में नाम क्या रहे हैं यह महत्वपूर्ण नहीं है)--- ने सपने बेंचे. पांच साल ये सपने पैदा करते रहे हैं और चुनाव आने पर उन्हें अमल में लाने का वादा करते हैं मसलन सबको नहीं तो गरीबों को तो शर्तिया) घर, सबको रोजगार , सबको स्वास्थ्य या सबको सुरक्षा, विकास, किसान, गरीब, अल्पसंख्यक, अन्तर-संरचना, विनिवेश आदि कुछ जुमले हैं जो ६४ साल से हमें बेंचे जाते हैं. हम पांच साल उन्हीं सपनों की आगोश में फिर सो जाते हैं दुष्यंत कुमार के "न हो कमीज़ तो पावों से पेट ढक लेंगे" की मानिंद.

अब जनता किस दल को वोट करेगी यह इस बात पर निर्भर करता है कि कोई दल कैसे ज्यादा सपने बेंचता है. उदाहरण के तौर पर कांग्रेस ने हाई स्पीड ट्रेन देने की बात कही लेकिन मोदी के भारतीय जनता पार्टी ने "हाई स्पीड स्वर्ण चतुर्भुज बुलेट ट्रेन". है ना अन्तर? एक में शब्दों की चुस्ती नहीं है जो बसों में पुदीने के अर्क से बड़ी से बड़ी बीमारी ठीक करने का नुस्खा बेंचने वाले सेल्समेन में होती है क्योंकि उसे दूसरी बस में जाना होता है. लेकिन दूसरे में स्वर्ण, बुलेट और चतुर्भुज जैसे लुभावने शब्द हैं.

कांग्रेस ने पहले से हीं राष्ट्रीय विकास परिषद् बनाया है जिसमें सारे मुख्मंत्री हैं पर भारतीय जनता पार्टी इसे "टीम इंडिया " का नया नाम देते हुए एक संगठन बनायेगी जिसमें सभी मुख्यमंत्रियों से विकास के बारे में राय ली जायेगी. हालांकि यही काम परिषद् का भी था. भाजपा ने इसे संघीय ढांचे के लिए ओर विकास को राज्य की ज़रूरतों के अनुरूप बनाने की संज्ञा दे कर सपनों को और आकर्षक बनाया. कांग्रेस ने वायदा किया कि वह सबको मकान का अधिकार देगी जबकि भाजपा ने सबको सीधे घर देने का सपना दिया. ज़ाहिर है अधिकार फलीभूत हो हो इस पर उनींदी जनता को शंका हो सकती है पर सीधे घर मिलेगा का वायदा अपील करता है.

सपनों की पैकेजिंग में भी कांग्रेस में वह धार नहीं थी जो भाजपा के पैकेजिंग में. कांग्रेस महंगाई ख़त्म करने का वायदा करती है जो उसके पांच साल के वर्तमान शासन काल में बढ़ती रही वहीं भाजपा ने महगाई के लिए एक फण्ड बनाने की बात कही. जनता को लगा कि महंगाई रुके रुके पर फण्ड कोई ऐसे चीज होगी जो दिखा कर सब्जी वाले से , दूध वाले से , किराना वाले से सस्ता माल लिया जा सकता है.

पैकेजिंग का हीं कमाल है कि भाजपा ने प्रशासनिक सुधार , पुलिस सुधार , -गवर्नेंस , बहु-राष्ट्रीय स्टूडेंट आदान-प्रदान प्लान की बात की है. कांग्रेस ने भी करों में छूट की बात की पर वह उतनी विश्वसनीय नहीं थी जितना यह वायदा कि भाजपा का "टैक्स टेररिज्म" (कर आतंकवाद) ख़त्म करेगी . यह अपील करता है कि राज्य कोई आतंक करता है और कोई दल सत्ता में आने पर इसे ख़त्म कर देगा. भाजपा शब्दों के गढ़ने और उसे जन-भावना से सीधे जोड़ने में विशेष दक्षता रखती है और हो भी क्यों . मातृ संस्था राष्ट्री स्वयंसेवक संघ की ट्रेनिंग में हिंदी पर जोर जो रहता है.

कांग्रेस के घोषणा-पत्र के पेज संख्या २५ के १४ वें बिंदु में भी "पूर्ण शक्ति केंद्र " को ब्लॉकस्तर पर स्थापित करने की बात है ताकि जनता को "एकल खिड़की" के जरिये जागरूकता, सूचना और सरकारी योजनाओं को और कार्यक्रमों को अमल में लाने की बात मालूम हो सके. लेकिन इसी सपने को भाजपा के कुछ इस तरह पेश किया है " हर गाँव को ऑप्टिक फाइबर से जोड़ा जाएगा ". सन्देश यह है कि गरीब ओड़िसा के गाँव का चावल अमीर महाराष्ट्र और केरल में अच्छे दाम पर किसान बेंच सकेगा. इस वादे में सपने को और पुख्ता किया गया है.

अगर सपने पुराने हों तो कुछ नए सपने बेचना भी एक कला होती है लिहाज़ा भाजपा एक और नारा है "कम पानी से ज्यादा उत्पादन". जिस देश में ६५ साल के "स्वप्न की सौदागरी" में ३५ प्रतिशत हीं सिंचित जमीन किसानों को मिल पाई हो उसके किसान को लगेगा कि अब जिस खेत में किराये पर पम्पिंग सेट लगा कर अनाज पैदा करता था अब बगैर पानी के हीं अनाज पैदा करेगा और अच्छे दामों पर केरल का कोई व्यापारी कर ले जायेगा.

इस देश में आर्थिक विषमता एक शाश्वत भाव है. "एक धनवान की बेटी ने निर्धन का दमन छोड़ दिया " का गुस्सा आज ६५ साल बाद भी भी गरीब के सपनों को तोड़ता है लिहाज़ा भाजपा ने गरीब और शहरी क्षेत्र की खाई को पाटने का संकल्प किया है. पार्टी अगर शासन में आयी तो गरीब का युवा भी अपनी लम्बी कार अमीर की बड़े बंगले के सामने खडी कर "चाँद सितारों की बात कर सकेगा". हालाँकि आई एच डी एस (इंडिया ह्यूमन डेवेलपमेंट सर्वे ) के ताज़ा आंकडे बताते हैं यह शाश्वत खाई कांग्रेस के नेतृत्व वाली यू पी शासन में कम हुई है और राष्ट्रीय नमूना सुर्वेक्षण संगठन (एन एस एस ) के आंकडे भी इस बात की तस्दीक है कि ग्रामीड़ भारत में शहरी भारत के मुकाबले खर्च के प्रतिशत में ज्यादा वृद्धि है.

भाजपा जानती है कि लगभग नौ करोड नए युवा जिनकी उम्र १८ से २३ है पहली बार वोट देंगे और उनमें से अधिकांश -मेल, ट्विटर , व्हाट्स एप " से जुड़े हैं वह नयी हवा में नए सपने देखना चाहते है और उसे अपने पिताजी, दादा जी और दादा के पिता जी के अपूर्ण सपनों से ज्यादा नए सपनों की चिंता है. लिहाज़ा भाजपा ने "ब्रांड इंडिया " का नारा दिया है. जिसमें एक्सपोर्ट (निर्यात) पर जोर होगा. भारत के युवाओं को अमरीका या तो नौकरी देगा नहीं तो सर्विसेज एक्सपोर्ट (सेवा निर्यात ) के नाम पर अमरीका यहीं कर मोटी तनख्वाहों पर बेरोजगार युवकों को रखेगा. बिहार के शिक्षित युवा को इस किस्म के नए सपने बेंचने के लिए भाजपा की रेसिपी (पाकशास्त्र ) में "टीम इंडिया " "गाँव तक ऑप्टिकल फाइबर" , गोल्डन क्वाड्रीलेटरल बुलेट ट्रेन" , "ईगवर्नेंस" और "सागर माला " आदि हैं तो.

लेकिन भारत जैसे धर्मं- भीरु देश में अगर भगवान् का नाम नहीं आया तो बात नहीं बनती. लिहाज़ा घोषणा-पत्र जरी करने के अवसर पर पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने अपने भाषण में कहा कि "ईश्वर कुछ अच्छा काम करवाना चाहता है इसलिए उसने मोदी जी को चुना है". राजा को दैवीय अभिमत से पुख्ता कर प्रजा पर संप्रभुता देने की चालाकी के पीछे भी यही तर्क था और तब से आज तक शोषण होता रहा.

lokmat