Friday, 17 May 2013

पाक आवाम की जम्हूरियत पसंदगी एक शुभ संकेत



पाकिस्तान में पहली बार चुनाव के जरिये सत्ता परिवर्तन और नवाज शरीफ का तीसरी बार प्रधानमंत्री बनना भारत में एक वर्ग में उत्साह और दूसरे वर्ग में संशयपूर्ण आशावादिता से देखा जा रहा है. दोनों भाव के यथोचित तार्किक कारण हैं. उत्साह इसलिए कि इस चुनाव में भारत-विरोध पूर्णतः गायब था, मुद्दा बिजली, स्वास्थ्य, भ्रष्टाचार और शिक्षा था, सेना को नागरिक प्रशासन के अधीन लाने का इन्तखाबी ऐलान था और ताकतवर तहरीक-ए-तालिबान –ए पाकिस्तान की चेतावनी के बावजूद (बलूचिस्तान और फाटा क्षेत्र को छोड़ कर) अच्छे प्रतिशत में मतदान हुआ. ये सारे संकेत पाकिस्तानी समाज की सोच में बदलाव की ओर इंगित करता है. मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा है जो नयी हवा में सांस लेना चाहता है, बारूद की गंध में नहीं. संशय इसलिए कि जिस मुल्क ने अकारण पडोशी से तीन युद्ध किये हों, जिस देश के सेना और आतंकी संगठनों ने मिलकर भारत में दहशतगर्दी के तीन दशक का इतिहास रचा हो वह क्या अचानक गुलाब का फूल हाथों में लेकर दिल्ली पहुंचेगा.  
मानव सभ्यता गवाह है कि सामूहिक जन-चेतना में उत्तरोत्तर गुणात्मक परिवर्तन होता है. गुलाम परंपरा ख़त्म हुई, सती प्रथा का अंत हुआ, स्त्री-प्रताड़ना अवसान पर है. साथ हीं जर्मनी एक हुआ, छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटे यूरोप का संगठन यूरोपियन यूनियन बना. आदमी तासीरन अमन पसंद होता है केवल कुछ स्थिति- व काल- विशेष कारक और कुछ सामूहिक सोच में सही-गलत पहचानने की क्षमता का अभाव उसे दो-दो विश्व युद्ध करने पर आमादा करते है. राजाओं ने अपने रियासत बचने या बढ़ाने के लिए जंग किये तो कभी मूंछ या महिला के लिए. लोकतंत्र की खूबी यही है कि इसमें सामूहिक सोच ना केवल फैसले लेती है बल्कि इस सोच में भी गुणात्मक बदलाव आता है.    
यह तर्क बिलकुल सही है कि जो देश ६६ साल में ३० साल फौजी हुकूमत में रहा हो और जिसमें पहली बार सत्ता परिवर्तन बन्दूक से नहीं बल्कि बैलट से हुआ हो उसमें दहशतगर्दों को आवाम की जम्हूरियत पसंदगी अच्छी लगेगी? पूरे विश्व में और खासकर पडोसी भारत में हर कोई यह सवाल पूछ रहा है और हकीकत यह है कि उसके मन में संशय है. चुनाव जीतने के बाद पाकिस्तान मुस्लिम लीग (एन) के नेता और दो बार प्रधान मंत्री रहे नवाज शरीफ को अपनी पहली प्रतिक्रिया में कहना पड़ा कि वह भारत के साथ बेहतर सम्बन्ध बनायेंगे और भारत के लोगों को अमन का सन्देश भी दिया. उनकी जेहन से कश्मीर गायब था और पडोसी से बेहतर सम्बन्ध का जज्बा था. लेकिन यह भी उतना हीं सच है कि पंजाब सूबे से जीतने के लिए उन्हें और उनकी पार्टी को गुप्त रूप से कुछ आतंकी संगठनों –खासकर जमात-उद-दावा-- को साधना पड़ा है पिचले साल के पंजाब के बजट में अच्छा धन परोक्ष रूप से इन संगठनों की नज़र करना पड़ा है.  
यहाँ यह समझना भूल होगी कि एक प्रजातान्त्रिक चुनाव में नवाज शरीफ कोई क्रांति ला सकेंगे क्योंकि दशकों पुरानी जेहनियत व शासन का किरदार बदलने में वक्त लगता है. कुछ अवाम आगे आया कुछ सरकार (जिसे लगभग पूर्ण बहुमत मिला है ना कि बैसाखी पर चलने का  जनादेश). लेकिन एक मौक़ा है जब इस देश को भ्रष्ट सैन्य तंत्र-आई एस आई –दहशतगर्दी की शक्तिशाली गठजोड़ से निकाला जाये और पाकिस्तान को आधुनिक राज्य के रूप में विकास के रास्ते पर ले जाया जाये.
यह भी सच है कि पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति बेहद खराब है. वित्तीय घाटे का यह आलम है कि गत वर्ष यह ८.५ के आस –पास था. उद्योग ख़त्म हो गए है और शहरीकरण की दर केवल २० प्रतिशत है. याने ८० फीसदी लोग गाँव में रहते हैं जिनका देश के सकल घरेलू उत्पाद में योगदान मात्र २० प्रतिशत है. फाटा , नार्थ वजीरिस्तान, साउथ वजीरिस्तान  और बलूचिस्तान में आज भी दहशतगर्दों की साम्राज्य है , सेना या कानून का राज्य कहीं दूर-दूर तक नज़र नहीं आता. लेकिन इन सब के बावजूद अवाम में जो कुछ भी हो रहा है उसे लेकर बचैनी साफ़ मनर आती है. जनता अब तालिबानी ऐलानों से ऊब चुकी है. टी टी पी ने जिस तरह ऐलान किया कि लडकिय पड़ने घर से बहार नहीं जाएँगी और पुरुष डॉक्टर औरतों के शरीर को छूएंगे नहीं उससे महिलाओं की असमय मौत होने लगी. मलाला के किस्से ने पाकिस्तानी अवाम की चेतना को झकझोर दिया. कट्टरपंथी सोच पर तार्किक सोच हावी होने लगी.
 नवाज शरीफ के लिए देश को एक आधुनिक राज्य के रूप में बदलना कोई एक दिन का काम नहीं होगा. जो सेना पिछले कई दशकों से भारत –विरोध के नाम पर अमरीकी इमदाद हड़प रही थी वह  आसानी से हथियार डाल देगी यह सोचना गलत होगा. सेना, आई एस आई , कट्टरपंथी एक साथ मिल कर सरकार को झुकाने की कोशिश करेंगे. जिस सेना ने पिछले २००१ -२००८ के बीच अमरीकी इमदाद में आये ११८० करोड़ डॉलर या प्रति वर्ष कोई १२ हज़ार करोड़ पाकिस्तानी रुपये में से ८० प्रतिशत ना केवल हड़प ले रही हो बल्कि उसका कोई लेखा जोखा पाकिस्तानी संसद तक को ना देती हो वह नवाज की सरकार को आसानी से अपने वादे पूरा करने के लिए छोड़ देगी यह सोचना गलत होगा. पाकिस्तान में सेना के अफसरों का रहन-सहन भारत के किसी पुराने ज़माने के राजा से ज्यादा शानदार है.
 . पाकिस्तान एक असफल राज्य है. उसे खोने को कुछ नहीं है. औसतन हर रोज १० आदमी आतंकवादी हमलों में मारे जाते हैं, हर तीसरे दिन एक धमाका होता है, उद्योग-शून्यता के कारण बेरोजगार युवक आत्मा-घाती दस्तों का कच्चा माल बन रहे हैं, “फाटा” क्षेत्र में “आत्मघाती बेल्ट” बनाने के कुटीर उद्योग में बदल चुका है. पिछले ६५ सालों में शिक्षा दर ५२ प्रतिशत से मात्र ५६ प्रतिशत हुई है. बजट का ३० प्रतिशत रक्षा के नाम पर ताकतवर सेना उदरस्थ कर लेती है. सिंध-पंजाब झगडा, बलूच समस्या, मुहाजिर (जो भारत से गए हैं) के प्रति मूल पाकिस्तानियों का रवैया, शियाओं और अन्य सम्प्रदायों के प्रति हिंसा और सबसे बढकर फाटा (फेडरली एडमिनिस्टर्ड ट्राइबल एरिया ) क्षेत्र से फैलते हुए तहरीक-ए-तालिबान का पाकिस्तान के अन्य भागों में खूंखार वर्चस्व आदि कुछ ऐसी समस्याएं हैं जिन्होंने इस देश के अंतर को खोखला कर दिया है.  नतीजा यह हुआ कि विकास की दौड़ में देश पीछे होता गया. आजादी से आज तक साक्षरता का स्तर मात्र पांच प्रतिशत हीं बढ़ सका. जाने-अनजाने में धर्म जिसे गैर-राजनीतिक सामाजिक सीमा क्षेत्र में होना चाहिए था राज्य का मूल मन्त्र बन गया और पाकिस्तान एक इस्लामिक देश हो गया.
ऐसा नहीं कि भारत में यह प्रवृति नहीं उभरी. इमरजेंसी, धार्मिक कट्टरवाद की कोशिशें यहाँ भी हुई पर वे परवान नहीं चढ़ पायीं. जन-भावना और संस्थागत मजबूती के तहत ऐसे ताक़तों को मुंहकी खानी पड़ी या यह अहसास हो गया कि यहाँ उन्हें दूर तक ज़िंदा रहने के कारक नहीं मिलेंगे. वह बहुसंख्यक अतिवाद हो या अल्पसंख्यक आतंकवाद जनता ने बैलट के जरिये हमेशा इन्हें ख़ारिज किया. चुनाव का आंकड़ा गवाह है कि बहुसंख्यक अतिवाद से स्वयं बहुसंख्यक हिन्दुओं को इतना परहेज़ था कि भारतीय जनता पार्टी को आज तक के इतिहास में सात मतदातायों में से मात्र एक ने हीं वोट दिया. सन्देश साफ़ था. मंदिर ह्रदय के पास है पर मस्जिद गिरा कर नहीं. जबकि  पाकिस्तान में इंन्होनें स्थाई भाव अख्तियार कर लिया. जनता को ना चाहते हुए भी इसमें बन्दूक के डर से लोगों को शरीक होना पडा. नतीजा यह रहा कि पूरे राज्य का चरित्र बदल गया.  
साथ हीं आधुनिक पाकिस्तान में कट्टरपंथ को दम तोड़ना हीं होगा ऐसे में जो लोग कट्टरवाद की दूकाने  चला रहे है और पूरे समाज को खोखला कर रहें है वे भी नयी सरकार के लिए अडचने पैदा करेंगे लेकिन जन-भावना का ताक़त और सोची-समझी कूटनीति के जरिये इन्हें काबू में लाया जा सकता है उसी तरह  जिस तरह भारत के पंजाब में आतंकवाद को काबू में कर लिया गया.  
हमें भूलना नहीं चाहिए कि भारत और पाकिस्तान के बीच एक अजीब प्यार और घृणा का मिश्रित सम्बन्ध है नवाज शरीफ के भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पाकिस्तान-स्थित पंजाब सूबे के है जबकि पाकिस्तान के भावी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ भारत –स्थित पंजाब प्रांत के हैं. पाकिस्तान एक जम्हूरियत के रूप में विकसित करे यह दोनों देशों के लिए कई मायनों में फायदेमंद रहेगा. 
sahara(hastakshep)   

Wednesday, 15 May 2013

बुद्धिमानों की सजा है ---- बुरे लोगों का शासन





कांग्रेस के सेल्फ-गोल का नया नमूना है दिग्विजय-कपिल का न्यायपालिका पर आक्षेप
कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में यू पी ए -२ का शासन लगभग अवसान पर है. भ्रष्टाचार, कुशासन और संस्थाओं को तोड़ने-मरोड़ने के आरोपों के बीच इसके दो नेताओं – दिग्विजय सिंह और मंत्री कपिल सिब्बल में सेल्फ-गोल की अद्भुत क्षमता है. दोनों ने अबकी बार सुप्रीम कोर्ट को अपने निशाने पर लिया है –कुतर्कों के सहारे. दिग्विजय का कहना है कि सर्वोच्च न्यायलय ने अपनी टिप्पणियों के ज़रिये (तोता प्रकरण) सी बी आई जैसी संस्था का मनोबल नीचा किया है जबकि सिब्बल ने इस बात पर जोर दिया है कि न्यायपालिका में जनता का विश्वास और मजबूत करना होगा. मतलब यह कि फिलवक्त  न्यायपालिका में  जन-विश्वास अपेक्षित नहीं है. तर्क-शास्त्रीय रूप से इसका मतलब यह भी है कि कार्यपालिका और विधायिका में जनता का अपेक्षित विश्वास जनता का है.
क्या दोनों नेताओं का कथन हास्यास्पद नहीं है. सी बी आई का मनोबल तब गिरता है जब कमरे में बुलाकर मजमून बदलवाए जाते है और तब भी जब भ्रष्टाचार का आरोप दो-दो मंत्रियों पर हीं नहीं परोक्ष रूप से कार्यपालिका के सर्वोच्च पद –प्रधान मंत्री -पर लगता है. सिब्बल ने यह भी कहा कि कानून की प्रक्रिया आर्थिक विकास में बाधक नहीं होनी चाहिए. मतलब कि न्यायपालिका वर्तमान आर्थिक विकास की नीतियों में बाधक है. यानि राजा हो या बंसल, इन्हें खुली छूट होनी चाहिए “आर्थिक विकास करने देने की.  
कोई ढाई हज़ार साल पहले विख्यात दार्शनिक प्लेटो की  ताकीद थी “ बुद्दिमानों की सबसे बड़ी सजा यह होती है कि वे बुरे लोगों का शासन झेलें क्योंकि उन्होंने स्वयं शासन में भाग लेने से इनकार किया”. गाँधी ने इसे प्रकारांतर से कहा “ आप जिस तरह की दुनिया चाहते हैं उसके लिए स्वयं अपने को बदलें”.
इस प्रजातंत्र के मंदिर --लोक सभा-- में ५४३ सदस्यों में १६३ आपराधिक मुकदमों में फंसे हैं. ये लोग बन्दूक के बल पर नहीं आ गए हैं. ये जनता द्वारा चुने गए हैं. इनमें १०३ पर गंभीर किस्म के आरोप हैं और इनमे से ७४ पर जघन्य (हीनस) किस्म के. “एथिक्स” शब्द यूनानी मूल शब्द “एथिकोस” से बना है जिस का मतलब होता है “आदत से पैदा हुआ”. शायद हमारी आदत बदल गयी है. अन्यथा ९० वें दशक के पूर्वार्ध में हवाला काण्ड में केंद्र के सात मंत्री और एक नेता विरोधी दल (लोक सभा) एक झटके में इस्तीफा न देते. मामले का नतीजा अदालत में सिफर इसलिए रहा कि सी बी आई ने जांच में “अपेक्षित साक्ष्य” नहीं दिए और जिसके लिए सर्वोच्च न्यायलय ने सन १९९७ में सी बी आई को कड़ी फटकार हीं नहीं लगायी इसे सीधे केंट्रीय सतर्कता आयोग के अधीन काम करने को कहा और एक जबरदस्त दिशा- निर्देश भी दिए. यह फैसला अपने आप में कानून की ताक़त रखता था. लेकिन चूंकि आदत राज्य अभिकरणों को अंगूठे के नीचे रखने की थी इसलिए सुरमे कोर्ट के फैसले को रद्दी की टोकरी के हवाले कर दिया गया. नैतिकता का पैमाना भी इस दौरान बदल गया इसलिए वह क़ानून खोजा जा रहा है जिसके तहत सरकार के कानून मंत्री को हीं नहीं आरोप में घिरे कोयला मंत्रालय और प्रधान मंत्री कार्यालय को भी यह अधिकार हो कि सी बी आई को आदेश दे सके. सर्वोच्च न्यायलय के आदेश के बावजूद  सी बी आई भी वहीं, संस्थाएं भी वहीं और समूची सरकार भी वहीं और ज़ाहिरन प्रधानमंत्री भी वहीं.
“आदत से पैदा हुआ भ्रष्टाचार” हमरे खून में शुरूआती दौर के “रिटेल में भ्रष्टाचार” से बढ़ सिस्टमिक भ्रष्टाचार” बनकर दौड़ता रहा. यह जीवन-पध्यती बन गया. भारत सरकार की २००७ की “शासन में नैतिकता” सम्बन्धी रिपोर्ट में इसे “कोल्युसिव” (मिलजुल कर) भ्रष्टाचार की संज्ञा दी. आज़ादी के प्रारंभ के कुछ दशकों तक यह भ्रष्टाचार “कोएर्सिव” (भयादोहन) के रूप में रहा जिसके तहत कमजोरों या गरीबों से उनके सही काम करने के पैसे लिए जाते थे यह कह कर कि “नहीं करेंगे तो क्या कर लोगे”. बाद में जब सत्ता के हाथ में “विकास” का कार्य आ गया और बजट के माध्यम से लाखों करोड़ रुपये आने लगे तो अफसर-नेता गठजोड़ को लगा “क्या मिलता है भोली-भाली जनता से चार-चार पैसे लूटने में और फिर हल्ला भी ज्यादा होता ”. और तब जन्म हुआ “कोल्युसिव” (मिल-जुल कर) किस्म के भ्रष्टाचार का. २-जी, सी डब्ल्यू जी, कोयला घोटाला इसी अफसर-नेता कोल्युसिव ज्ञान की उपज हैं. इस किस्म के भ्रष्टाचार में एक कमजोर या गरीब व्यक्ति नहीं बल्कि पूरा समाज हीं परोक्ष रूप से प्रभावित होता है लेकिन इसमें कोई एक व्यक्ति नहीं शिकार होता. चूंकि नार्थ ब्लाक के कार्यालय में (जहाँ परिंदा भी पर नीहें मार सकता) डीलें होती है इसलिए गवाह नहीं होता. हमारी अपराध न्याय प्रणाली गवाह, व साक्ष्य पर आधारित है और जज सत्य का खोज नहीं बल्कि अंपायर का काम ज्यादा करता है इसलिए भ्रष्टाचारी  मंत्री को मौका मिलता है “दूध का दूध” का जुमला फेंक कर पद बने रहने का.
सुशासन के सिद्धांतों में एक के अनुसार नैतिक मान-दंड अगर संस्थाओं का बल ना मिले तो धीरे-धीरे दम तोड़ देते हैं. चूंकि भारत का भ्रष्टाचार नए स्वरूप  --- कोल्युसिव – में फलने –फूलने लगा अतः यह ज़रूरी हो गया कि इन संस्थाओं को पंगु बनाया जाये. ये पंगु होंगे तो नैतिक मान-डंडों को सहारा देने वाला कोई नहीं होगा. नतीज़तन जजों को, आई बी और सी बी आई निदेशकों को, “बात-मानने के लिए विश्वसनीय” अफसरों को रिटायरमेंट के बाद पांच साल के लिए घोड़ा-गाडी और लाल-बत्ती के साथ हीं मोटी आय की व्यवस्था की जाने लगी. जब सर्वोच्च अदालत ने हवाला फैसले में “सिंगल डायरेक्टिव” (जिसके तहत सी बी आई संयुक्त सचिव या ऊपर के अधिकारी के खिलाफ जांच के पहले सरकार से अनुमति लेनी होती है) को गैर-कानूनी बताया तो तत्कालीन संसदीय समिति ने फिर से सी वी सी विधेयक में दुबारा इस प्रावधान को ला कर २००३ में कानून बना  दिया. सी बी आई फिर दन्त –विहीन संस्था हो गयी. मायावती के खिलाफ जांच के लिए सी बी आई की अपील पर तत्कालीन राज्यपाल ने अनुमति नहीं दी .      
हमने आज़ादी मिलने के साथ हीं व्यापक तौर पर ब्रिटेन के प्रजातंत्र व प्रशासनिक व्यवस्था का अनुकरण किया. लेकिन उनके समाज का “एथिक्स” या “आदत से पैदा हुई नैतिकता”  और हमारी “आदत से पैदा हुई नैतिकता में फर्क था और है. एक उदाहरण लें. कुछ साल पहले टोनी ब्लेयर की सरकार के दो मंत्रियों को महज इस आरोप पर इस्तीफा देना पड़ा कि एक मंत्री के कार्यालय से एक फ़ोन किया गया था जिसमें मंत्री के बच्चे की आया (दाई) को वीसा जल्दी देने की सिफारिश की गयी थी और दूसरे मंत्री के कार्यालय से यह सिफारिश की गयी थी कि एक व्यक्ति को जो सरकार के एक जनोपयोगी कार्यक्रम में चंदा देता था, उसे ब्रिटेन की नागरिकता दे दी जाये. इन मंत्रियों ने ना तो “दूध का दूध , पानी का पानी” होने का या  जांच रिपोर्ट का इंतज़ार किया ना हीं “अंतिम अदलत के फैसले का”, ना हीं “मैं स्वयं किसी भी जांच के लिए तैयार हूँ “ का भाव ले कर देश की छाती पर मूंग दलते रहे.
 ६२ साल पहले नेहरु ने एच जी मुद्गल को ना केवल संसद सदस्यता से निकाला बल्कि यह भी सुनिश्चित किया कि यह इस्तीफ़ा दे कर ना निकलने पाए. मुद्गल पर आरोप इतना हीं था कि उन्होंने पैसे लेकर सर्राफा व्यापारियों के लिए संसद में सवाल पूछा था.
इन ६२ सालों में देश का जी डी पी बढ़ता गया, कारें बदती गयी और आदतों से पैदा हुए  नैतिकता का अवसान और तज्जनित भ्रष्टाचार भी बढ़ता गया. “भारत महान” के कर्णभेदी नारे में गरीब की चीत्कार दबाती रही. शासन की गुणवत्ता तिरोहित होती गयी.
आज ज़रुरत है कि अच्छे लोग शासन प्रक्रिया से भागें नहीं बल्कि भाग लें ताकि बुरे लोगों को इससे छुटकारा दिलाया जा सके. 
bhaskar

Tuesday, 7 May 2013

भ्रष्टाचार, कानून और “दूध-पानी” का रिश्ता



डी एम् के नेता करूणानिधि की ८० वर्षीय पत्नी हीं नहीं बेटी और तमाम नजदीकी रिश्तेदार कुछ कंपनियों में डायरेक्टर हैं. भारत के मंत्री का बेटा भी कुछ कम्पनियों में डायरेक्टर है,  ए मंत्री का भांजा इतना प्रतिभाशाली है कि तीन साल पहले दो कमरे किराये के मकान से “आर्थिक विकास “ करता हुआ ६० करोड़ का आलिशान बंगला बनवा लेता है. बसपा उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के भाई से लेकर तमाम रिश्ते-नातेदार जमीन के धंधे में “अपना आर्थिक विकास” करते हैं. सोनिया गाँधी क दामाद रोबर्ट वाड्रा भी रियल एस्टेट के धंधे में व्यापार कौशल दिखाते हैं. भाजपा के पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी भी अपना व्यापार कौशल दिखाते हुए, और वह भी विदर्भा में जहाँ किसान पानी के बिना त्राहि-त्राहि कर रहा है, आत्म-हत्या कर रहा है, पूर्ति ग्रुप को एक साधारण रिटेलर की स्थिति से इतना ऊपर पहुंचा देते हैं कि इनकम टैक्स को बताना पड़ता है कि कंपनी ने ७००० करोड़ रुपये की कर चोरी की है.
भारतीय संविधान में अनुच्छेद १९ (जी) में सभी नागरिकों को व्यापार करने का अधिकार है. रिश्तेदार होने से नागरिक अधिकार ख़त्म नहीं होते ना हीं बूढ़े होने, महिला होने या फिर रियल एस्टेट का धंधा करने से ये मौलिक अधिकार बाधित होते हैं. कानून से दो और अधिकार भी मिले हैं ---- एक व्यक्ति तब तक दोषी नहीं जब तक अदालत के अंतिम चौखट से ऐसा ऐलान नहीं दिया जाता. और चूंकि दोषी नहीं तो फिर मीडिया क्यों ऐसे “तेजस्वियों” की,  जिनकी भूमिका देश के जी डी पी को  बढाने में “अप्रतिम” है , पगड़ी उछलती है? वाड्रा के मामले में कांग्रेस के मनीष तिवारी को तब बताना पडा कि “भारत के नागरिक के रूप में उन्हें भी बिज़नेस करने का अधिकार है” .  
यही वजह है कि आज सरकार के लोगों को हीं नहीं मुख्य सत्ताधारी पार्टी  को हर बार जब बेजा “पगड़ी उछलती” है तो कुछ जुमले निर्विकार भाव से कहने पड़ते हैं. “जब मंत्री ने (या पार्टी अध्यक्ष ने) खुद कह दिया कि वह हर जांच के लिए तैयार हैं तो फिर क्यों हंगामा?” या “मामले  की जांच हो रही है कृपया इस तरह के सवालों से जांच प्रभावित ना करें” या “मामला अदालत के विचाराधीन है इसलिए कुछ भी कहना गलत होगा” या “जांच के बाद दूध का दूध, पानी का पानी हो जायेगा, अभी से क्यों शोर मचा रहे हैं?”.
समसे जोरदार तर्क तो यह रहा कि जब मीडिया ने कांग्रेस के एक सांसद व “आमतौर पर” प्रवक्ता सत्यव्रत चतुर्वेदी से पूछा “सी बी आई डायरेक्टर क्यों गए कानून मंत्री के यहाँ सलाह लेने?” तो उनका “आत्म-श्लाघा-जनित-क्रोध” (सेल्फ-राइटिअस इन्डिग्नेसन)  दिखने लगा. रिपोर्टर को हिकारत से देखते  हुए उन्होंने कहा “सी बी आई डायरेक्टर अगर कानून मंत्री के पास नहीं जाएगा तो क्या नेता विरोधी दल से सलाह लेगा?” कितना पावरफुल तर्क है. कुछ ऐसा हीं जैसा अगर जेबकतरे से पुछा जाये कि “क्या तुमने सेठ की जेब काटी? और जेबकतरे का जवाब हो “सेठ की ना कटता तो क्या किसी भिखमंगे की काटता?”. इस जवाब में साम्यवाद का भाव भी है, विचारात्मक नैतिकता भी है और सिस्टम पर अटूट विश्वास भी है. सत्ता में बैठे लोगों को जी डी पी बढ़ने की चिंता भी है ताकि भारत खुशहाल हो और यही वजह है मंत्री का बेटा या भांजा रातों-रात अरबपति बन जाता है. साथ हीं सिस्टम पर अगाध विश्वास भी. तभी तो कोई जनार्दन द्विवेदी या कोई सत्यव्रत चतुर्वेदी को कहना पड़ता है “भाजपा को इस्तीफा माँगने की बीमारी हो गयी है या फिर लोगों को न्याय-व्यवस्था पर भी विश्वास नहीं है”. मायावती का भी यही मानना है कि जाँच से पहले इस्तीफा मांगना गलत है. उन्हें याद है कि किस तरह एक राज्यपाल ने नियम का सहारा लेता हुए उनके खिलाफ आय से अधिक संपत्ति के मामले में सी बी आई को मुकदमा चलने की इज़ाज़त नहीं दी और किस तरह सी बी आई ने लालू के मामले अदालत के निर्णय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील नहीं की लेकिन नरेन्द्र मोदी के खिलाफ की. यह सब “करने या ना करना के लिए” के “उपयुक्त” कानून का हीं तो सहारा लिया गया.  क्यों विपक्ष या मीडिया यह बात नहीं समझता कि कानून अपना काम करता है कुछ साल में जांच होगी और कुछ दशक में फैसला फिर भी हंगामा क्यों?
मीडिया की इन्हीं बेवकूफियों की वजह से दो दिन पहले खांटी वकील, भारत सरकार के मंत्री और कांग्रेस के “इंटेलेक्चुअल संकटमोचन” कपिल सिब्बल को कहना पड़ा कि “मीडिया भ्रष्ट है और इसे सरकार के अच्छे काम नज़र हीं नहीं आते”. शायद उनका इशारा इस बात पर था कि इस भ्रष्ट मीडिया में ऐसे पाकसाफ सरकार का यही हश्र होना है. लगभग यही आरोप गडकरी के लोगों ने भी मीडिया पर लगाये थे यह कहते हुए कि जब गडकरी स्वयं जांच मांग रहे हैं तो मीडिया कुछ लोगों के इशारे पर वितंडा क्यों खड़ा कर रही है? शायद सरकार की नाराजगी इस बात पर भी हो कि सी बी आई का डायरेक्टर तो कानून मंत्री के चौखट तक सजदा करता है पर यह (मीडिया) कौन सी चिड़िया है जो “व्यक्ति के आर्थिक विकास” को लेकर देश को “गुमराह” कर रही है और विदेश में “भारत महान” के साख पर बट्टा  लगा रही है. कोई ताज्जुब नहीं इस विकास की विरोधी मीडिया पर एक बार फिर से अंकुश लगने की कोशिश की जाये. इस तरह की “भ्रष्ट” मीडिया को बेलगाम छोड़ने का मतलब तो होगा कि एक साल बाद होने वाले चुनाव में जनता को भ्रमित हो जाये गी और नतीजतन  “एक विकास-परक” सरकार को सत्ता से हाथ धोना पडेगा. साथ हीं नैतिकता से ओतप्रोत सिस्टम को बदलने का दवाब बढ़ जायेगा.
एक अन्य तर्क भी सत्ता पक्ष दे रहा है. “इन लोगों को जनता के चुने प्रतिनिधियों और प्रजातंत्र के मंदिर रुपी संसद पर विश्वास नहीं है लेकिन गैर-चुने अफसरों की स्वतंत्र संस्था पर ज्यादा विश्वास है”. सत्ता पक्ष का दृढ विश्वास है कि स्वतंत्र जांच एजेंसी में कोई गाँधी तो होगा नहीं और अगर बाई-चांस हो गया तो वह “वर्तमान प्रजातंत्र” के लिए घातक  भी होगा यही वजह है कि एन डी ए की सरकार हो या यू पी ए की किसी ने भी १९९७ में सुप्रीम कोर्ट द्वारा विनीत नारायण केस में सी बी आई को जांच में स्वतंत्र रहने के लिए दी गयी व्यवस्था को कूड़े की टोकरी में डाल दिया. आखिर देश को प्रजातंत्र के रास्ते पर ले जाना जो था.
अब संसद की स्थिति पर गौर करें. दुनिया के किसी भी परिपक्व प्रजातंत्र में दल-बदल कानून नहीं है. लेकिन भारत में कोई सांसद (जनता का प्रतिनिधि) अपनी मर्जी से अगर वोट देता है तो उसकी सदस्यता ख़त्म करने का स्पष्ट कानून है. यानि संसद में चाहे कुछ भी बहस करा लें अंत में नतीजा वही होगा जो दल का नेता चाहेगा. और नेता क्या चाहेगा यह इस बात से तय होगा कि उसका बेटा या रिश्तेदार “अपने (और देश के ) आर्थिक विकास” में क्या योगदान कर रहें हैं. अभिव्यक्ति की आज़ादी का इतना बड़ा मखौल भारतीय प्रजातंत्र में हीं हो सकता है. चूंकि प्रजातंत्र में बहुमत हीं अहम् होता है लिहाज़ा जिस दल या दल समूह का बहुमत है वही जनता की आवाज है वही कानून है और वही सत्य है. अगर मायावती या मुलायम इस बहुमत को बदल दें तो जनता की आवाज की व्याख्या बदल जायेगी, सत्य बदल जाएगा लेकिन वे भी ऐसा क्यों करें आखिर उनके और उनके परिवार के लोगों की आय से अधिक संपत्ति के मामले में सी बी आई की जांच भी तो एक सत्य है.
लिहाजा आने वाले वर्षों या दशकों तक हम “दूध का दूध” , “कानून अपना काम कर रहा है” “हम जांच के लिए तैयार हैं” “मामला अदालत के विचाराधीन है” और “मीडिया भ्रष्ट है , नकारात्मक है” या संसद में विश्वास रखें” के भाव में सत्ता पक्ष के करुनानिधियों, बंसलों, राजाओं, कलामाडियों या उनके रिश्तेदारों के “व्यापारिक कुशलताओं” को झेलते रहेंगे और प्रजातंत्र मजबूत होता रहेगा.      
bhaskar

Tuesday, 23 April 2013

बलात्कार : बीमार समाज में केवल कानून से समाधान मुश्किल ?



भारतीय समाज में एक बड़ा भ्रम-द्वन्द चल रहा है. एक भारत है जिसमें अशिक्षा, अज्ञानता, गरीबी, अतार्किकता और इन सबसे पैदा हुआ मनोविकार सामाजिक व्याधि का भयंकर स्वरुप ले रहा है और दूसरी और उन्मुक्ति की बयार के तहत नारि-स्वतन्त्रता से उद्भूत तर्क यहाँ तक आ गया है कि कम कपडे पहनने से अगर कामुकता बढ़ती है तो वह देखने वाले का दोष है. जावेद अख्तर साहेब ने संसद में पश्चिमी देशों की संस्कृति का हवाला देते हुए यह सवाल दागा कि वहां के खुलेपन से बलात्कार की घटनाएँ क्यों नहीं बढ़ती हैं. जावेद साहेब के तर्क में एक दोष यह है कि बदलाव को जरूरी नहीं कि हर समाज एक हीं भाव से ले. गाँव से नौकरी करने आया अशिक्षित युवा अपराध करके जब अपने गाँव में किसी रिश्तेदार के यहाँ छिपता है तो उसे लगता है कि अब कोई पकड़ नहीं सकता क्योंकि जिस शहर में उसने अपराध किया है वहां शायद हीं कुछ लोग उसे पहचानते है और बिरले हीं उसके घर का पता जानते हैं. उसे नहीं मालूम कि मीडिया, शहरी जनाक्रोश और इस तरह के अपराध के प्रति जबरदस्त प्रतिक्रया स्थिति को कितना गंभीर बना देगी.
इस समस्या को दो तरह से देखने की ज़रुरत है. पहला, क्या देश में अपराध न्याय प्रणाली ठीक काम कर रही है? दूसरा, क्या सामाजिक व्याधि का स्वरुप धारण करने वाली इस समस्या को महज क़ानून और न्याय –पध्यति की समस्या मान कर समाधान किया जा सकता है या नैतिक-मूल्यों की पुनर्स्थापित  का जबरदस्त प्रयास करने की ज़रुरत आ पड़ी है. शायद दोनों बातें एक साथ अमल में लाने से हीं समस्या का निदान संभव है.
उदाहरण के तौर पर लें. पिछले ४० सालों में बलात्कार के मामले में सजा की दर ४७ प्रतिशत से घट कर २३ प्रतिशत पर आ गयी है. याने  हर चार बलात्कार के आरोपियों में से तीन छूट जाते हैं. ध्यान देने की बात यह है कि चूंकि भारत में बलात्कार कलंक के रूप में लिया जाता है इसलिए बलात्कार की शिकार महिलायों में से बेहद कम हीं अदालत का दरवाजा खटखटाती हैं. जब चार में तीन बलात्कारी छूट जायेंगे तो इन महिलाओं और उनके परिवार की क्या स्थिति होगी यह समझना मुश्किल नहीं है.
जस्टिस मलिमथ समिति की रिपोर्ट में और सर्वोच्च न्यायलय के कई फैसलों में कहा गया है कि इस किस्म के अपराधों में जजों को अपना नज़रिया बदलना होगा और “तार्किक सन्देह  से परे दोष-सिद्धि” (प्रूफ बियॉन्ड रिज़नेबल डाउट) के सिद्धांत की जगह “संभाव्यताओं का बाहुल्य” (प्रेपोंडेरेंस ऑफ़ प्रोबबिलिटीज) के सिद्धांत को अंगीकार करना होगा. जस्टिस मलिमथ ने एक बीच का रास्ता सुझाया और वह था --- “स्पष्ट और सुगम” (क्लीन एंड कन्विन्सिंग) का सिद्धांत. लेकिन शायद अदालतों ने अभी भी पुराने सिद्धांत पर हीं चलना जारी रखा. नतीजा यह हुए कि बलात्कार की शिकार महिला और उसके परिवार का विश्वास इस सिस्टम से उठता गया और दूसरी और बलात्कारी भी यह समझने लगा कि मामा के घर चला जाएगा तो  कौन पकड़ पायेगा या पकड़ा भी गया तो मेडिकल सर्टिफिकेट लगा कर या गवाहों को धमका कर बच जायेगा.      
देश की राजधानी में हुए घृणित बाल-बलात्कार काण्ड के साथ कुछ और अपराध पर नज़र डालें. दिल्ली में हीं पुलिस के एक कांस्टेबल ने रोज-रोज के झगड़े से तंग आ कर गुस्से में पहले अपने बाप को और फिर बचाने आई माँ को चाकू से मार कर बगल के प्लाट में फ़ेंक दिया. मेरठ के पास एक कस्बे में दो रुपये के लिए एक दुकानदार को एक व्यक्ति ने गोली मार दी. दिल्ली में एक कार दूसरी कार से आगे निकल गयी तो पीछे वाले ने दौड़ा कर उस कार वाले को रोका और साथियों के साथ मिल कर जम कर पिटाई की. बिहार में एक मानसिक रूप से बीमार औरत को डायन मान कर गांववालों ने पत्थरों से मार कर ख़त्म कर दिया था क्योंकि उन सभीं का मानना था कि यह डायन पूरे गाँव को खाने आई है.
भारतीय समाज बीमार है. सेक्स-हिंसा की घटनाएँ कोई अचानक नहीं बढ़ गयीं हैं. केवल इसका जन धरातल पर आना और इसके प्रति जागरूकता (मीडिया के कवरेज की वजह से) बढ़ गया है. जो कांस्टेबल अपने माँ-बाप को चाकू से मार कर बगल के प्लाट में फ़ेंक देता है उसे भारतीय दंड संहिता (आई पी सी) के धारा ३०२ के बारे में मालूम था. उसे यह भी मालूम था कि बगल के प्लाट में शवों को फेंकने से वह बाख नहीं सकता. दो रुपाई के लिए गोली मारने वाला भी जानता था कि गोली की कीमत तीस रुपये से कम नहीं है. पत्थर मारने वाले ग्रामीणों को कहीं नहीं लगा कि वे कोई गलती कर रहे है. शायाद वो गाँव को बचा रहे थे डायन से. अगर सहज में हीं शराब और आसानी से मोबाइल में पोर्नो फिल्म मोबाइल पर डाउनलोड की जा सकती है तो उसकी परिणति गीता के श्लोक पढने में नहीं होगी यह बात उन लोगों भी मालूम होनी चाहिए जो कड़े कानून बनाने की बात कर रहे हैं.
समाज की बीमारी के लिए भी सरकार को दोष देना, राज्य-अभिकरणों को कोसना और कानून-दर –कानून बना कर उसका हल खोजना अभिजात्य वर्ग की आदत हो गयी है. और यह रास्ता इस वर्ग के लिए आसान भी पड़ता है कि इंडिया गेट पर कुछ मोमबत्ती जलाओ, नारे लगाओ और पुलिस “हाय-हाय” करो. हर घर में नैतिक शिक्षा की बात और गाँधी पैदा करने की सलाह देने का माद्दा ना तो राजनीतिक वर्ग में है ना हीं इंडिया गेट पर मोमबत्ती जलने वालों में. क्योंकि तब तो उन्हें भी अपने को बदलना पडेगा.  लेकिन कहने का आशय यह नहीं है कि सिस्टम पर दबाव ना बनाया जाये और पुलिस को दो हज़ार रुपये दे कर मामले को दबाने की छूट दे दी जाये. इंडिया गेट पर जो हो रहा है वह बिलकुल सही है पर सिर्फ उससे या बलात्कारी को फांसी देने के प्रावधान बना देने से समस्या का निदान नहीं हो सकता. अगर होता तो घरेलू झगडे में कांस्टेबल माँ-बाप की चाकू से ह्त्या ना करता ना हीं दो रुपये के झगडे में दुकानदार की जान जाती.
एक पुराने आंकलन के अनुसार दुनिया में तीन करोड़ तीस लाख कानून हैं और हर साल कुछ हज़ार कानून और जुड़ जाते है पर ह्त्या, बलात्कार या अन्य हिंसा की घटनाएँ घटी नहीं बल्कि बढ़ी हैं.
विज्ञापन में जब एक ख़ास पाउडर लगाये युवक के पीछे अर्ध-नग्न युवतियां भागती हैं तो शहर में तथ्य को समझाने वाला युवक पाउडर खरीदता है पर गाँव से आया कम जानकारी रखने वाला युवक लड़कियों को “ऐसे होती हैं यहाँ की लड़कियां” के भाव में देखने लगता है और तब अगर वह कंडक्टर या ड्राइवर या खलासी है तो इन्हें “शिकार” समझ लेता है.  दो अलग-अलग समझ व वैल्यू सिस्टम के बीच इस खाई को जल्द पाटना होगा. कानून का खौफ और नैतिक शिक्षा दोनो की जरूरत है और साथ हीं इस दो संस्कृतियों के तहत पनपने वाली समझ (परसेप्शन) के बीच की  खाई को भी पाटना होगा.

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Monday, 15 April 2013

क्या नितीश बाबू, अब चलनी सूप को नहीं हंस रहा है?



कुछ सप्ताह पहले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार विपक्षियों पर तंज कसते हुए भोजपुरी का एक मुहावरा कहा था “सूप हँसे तो हँसे, चलनी का हँसे जिसमें सहस्त्र छेद”. दिल्ली में अप्रैल १४ को ख़त्म हुए जनता दल (यू)  के दो -दिवसीय अधिवेशन में यू पी ए -२ के शासन काल में जारी महगाई, भ्रष्टाचार और केंद्र द्वारा कथित “भेद-भाव” आदि अपने पुराने मुद्दे को बिलकुल दरकिनार करते हुए नीतीश कुमार ने अपने हमले को गुजरात के मुख्य मंत्री नरेन्द्र मोदी तक हीं महदूद रखा और बताया कि मोदी विकास मॉडल “हवाबाजी है” जिसमें कुपोषण है, पानी-बिजली की किल्लत है और गरीबों का समावेश नहीं है.      
लगभग ६३ साल के प्रजातान्त्रिक अनुभव के बाद एक शुभ संकेत है कि देश में राजनीतिक संवाद के चरित्र बदल रहा है. जाति, धर्म, अन्य संकीर्ण अवधारणाओं से हट कर राजनेता भी, समझे या ना समझें, विकास की शब्दावली का प्रयोग करने लगे है. मुख्यमंत्रियों में होड़ लगी है कि “मेरी विकास की कमीज़ उसके विकास की कमीज़ से ज्यादा सफ़ेद है”  या “अमुक मुख्य मंत्री की विकास की कमीज में पैबंद लगे हैं”. इससे प्रजातंत्र में गुणात्मक परिवर्तन आ सकता है. गरीब जो आज तक राजनीतिज्ञों की मानसिक अय्यासी का प्रतीक बन गया था एक क्रियाशीलता का भाव बन गया है. लेकिन मुश्किल यह है कि विकास की चर्चा “हाथी और छः अंधों” का किस्सा बनाता जा रहा है. और हर सत्ता में बैठा व्यक्ति अपने हिसाब से हठी को कभी खम्भा, कभी दीवार, कभी रस्सी बता रहा है. जबकि हकीकत यह है कि विकास की एक हीं परिभाषा है और वह है--- क्या आभाव-जनित अक्षमता हटा कर व्यक्ति को वह मौका मिल रहा है कि वह अपना उन्नयन अपनी इच्छानुसार कर सके.  
होड़ अच्छी है. मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने हाल हीं में एक टीवी इंटरव्यू में कहा कि नीतीश कुमार जिस साइकिल योजना पर इतराए घूमते है वह दरअसल मूलरूप से मेरी योजना थी. यानि नीतीश कुमार “हवाबाजी” कर रहे हैं.  
दरअसल विकास राजनीतिक जन संवाद का महत्वपूर्ण हिस्सा तो बना है लेकिन शायद इसके मर्म को ना समझने के कारण नेता प्रतिद्वंदी राजनीति में इसे झींटा-कशी से ऊपर नहीं ले जा पा रहे हैं. विकास के बहुत सारे आयाम होते है लिहाज़ा ये नेता कहीं का ईंट , कहीं का रोड़ा लगा कर अपने दूकान खड़ी कर रहे हैं और दूसरे की गिरा रहे हैं.
विकास का एक उदाहरण ले. इंदिरागांधी ने १९८० से उदारीकरण की नीति अपनाई जिसे १९९१ में मनमोहन सिंह के नेत्रित्व में नरसिम्हा राव ने “स्टेट पालिसी” के रूप में अंगीकार किया और देश की अर्थ-व्यवस्था को वैश्विक अर्थ-व्यवस्था से एकीकृत किया. २००१ में इसे नव उदारीकरण के रूप में और पुख्ता किया गया जो आज तक जारी है. १९८० से लेकर आज तक भारत औसतन ६.५ प्रतिशत की जबरदस्त विकास दर (माने सकल घरेलू उत्पाद में सालाना वृद्धि) हासिल करता रहा. नतीज़तन ३१ साल बाद भारत दुनिया के १० देशों में है सकल घरेलू उत्पाद के साइज़ के स्तर पर. इसका १.९ ट्रिलियन डॉलर की अर्थ-व्यवस्था केवल के दस देशों का पास हीं है. लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू देखिये. मानव विकास सूचकांक ( एक ऐसा पैमाना जिससे यह मापा जाता है कि दरअसल आम आदमी के जीवन की गुणवत्ता कितनी बढ़ी है)  पर भारत १९८० में १३२ वें स्थान पर था. २०११ पर भी ठीक उसी स्थान पर है. यही नहीं संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार २०१२ में भारत एक खाना और फिसल कर १३५ वें पायदान पर आ गया है. उधर देश के प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह से लेकर पूरा मंत्रिमंडल हीं नहीं कांग्रेस के नेता हांफ-हांफ कर चमकते भारत का बखान करते रहे.            
अब ज़रा राज्यों के विकास पर आ जाएँ. बिहार के मुख्य मंत्री ने सही कहा कि मोदी का विकास एक चलावा है. एन एस एस ओ के आंकड़े गवाह है राज्य में ग्रामीण रोजगार घटा है, कुपोषण पर अंकुश नहीं लग सका है, उद्योग के प्रति सरकारी झुकाव की वजह से श्रमिकों की स्थिति बदतर हुई है, कृषि विकास महज नगदी फसक की वजह से है जिसमें कम पैसे वाले किसान हिस्सा नहीं ले पा रहे है. यह भी सत्य है कि औद्योगिक माहौल के दावे के और “वाइब्रेंट गुजरात” के पांच अधिवेशन के बावजूद ऍफ़ डी आई (विदेशी पूँजी) का निवेश घटा कर मात्र २.३८ प्रत्रिशत रहा गया है.  लेकिन नीतीश कुमार अर्ध सत्य बता रहे है यह कह कर कि बिजली नहीं है. कुछ क्षेत्र में बिजली के ट्रांसमिशन की समस्या ज़रूर है लेकिन वह सर्वव्यापी नहीं है. गुजरात बिजली निर्यात को सक्षम है. माहौल बदला है उद्यमिता बड़ी है. कानून व्यवस्था पर विश्वास पिछले दस साल के इतिहास को देख कर बड़ा है. भ्रष्टाचार के प्रति मोदी की छवि शून्य-सहिष्णुताकी है. कठोर शासक जो कार्य को अंजाम ना देने वाले को नहीं बख्सेगा का सन्देश है. राज्य सकल घरेलू उत्पाद (जी एस डी पी)  का सामाजिक क्षेत्र में खर्च राष्ट्रीय औसत से भी कम है जो चिंतनीय है. कुल मिलाकर कुछ कमियां हैं तो कुछ असाधारण उपलब्धियां भी.
अब बिहार को देखे. पूर्ववर्ती सरकार (लालू-राबरी) के मुकाबले कुछ स्थिति बेहतर हुई है. मसलन जी एस डी पी विकास दर में राज्य एक साल पहले तक देश में प्रथम था, हालांकि ताज़ा आंकणों के अनुसार अब मध्य प्रदेश प्रथम हो गया है. साइकिल योजना के तहत जब गाँव की लड़कियां साइकिल से स्कूल जाती है तो सत्ता की सार्थकता के प्रति अच्छा भाव आता है. बच्चों के स्कूल जाने में परिमाणात्मक वृद्धि हुई है. लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता लगातार गिर रही है. कक्षा ५ के ७२ प्रतिशत छात्र कक्षा २ का ज्ञान नहीं रखते. जी एस डी पी वृद्धि का कारण किसानों की मेहनत से अनाज का पैदावार ११ मिलियन टन से बढ़ कर १६.५ मिलियन टन होना है जिसमें इंद्रा भगवान् की कृपा भी शामिल है.
बिहार के नकारात्मक पहलू स्पष्टरूप से राज्य सरकार की आपराधिक अकर्मण्यता दिखाते है. विख्यात अर्थशास्त्री जीन ड्रेज के नेत्रित्व वाले दल ने पाया कि राज्य भयंकर गरीबी के बावजूद केंद्र द्वारा भेजा गया अनाज मात्र ४५ प्रतिशत हीं गरीबों को वितरित करता है जबकि आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, छत्तीसगढ़ ऐसे राज्य ८५ से ९७ प्रतिशत तक अनाज उठाते है.  मंरेगा के कार्यक्रमों में जबरदस्त भ्रष्टाचार व्याप्त है. राष्ट्रीय बीमा योजना के तहत भ्रष्टाचार की वजह से “पुरुषों की बच्चेदानी निकाल ली जा रही है (जिसे इश्वार ने नहीं दिया है). पुलिस अत्याचार के तमाम किस्से टीवी चैनलों में रोज दिखाई देते है. हर दूसरे बच्चा कुपोषण का शिकार है. ९६ प्रतिशत लोग आज भी रोशनी के लिए मिटटी के तेल के सहारे हैं. बिहार मानव विकास पर सबसे नीचे ३२ वें पायदान पर है.
क्या इन सब के बावजूद मोदी के विकास मॉडल पर हमला करने की जगह अपना विकास मॉडल बेहतर करना नीतीश की राज्य में स्वीकार्यता के लिए उपयुक्त नहीं होगा?

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विकास” का भारतीय राजनीतिक डिक्शनरी में आना शुभ संकेत



लगभग ६५ साल के आजादी के बाद देश में राजनीतिक संवाद का धरातल बदल गया है. आज से कुछ दशक पहले तक विकास, गरीब, मानव विकास, शिक्षा और खाद्य केंद्र सरकारों का हीं मुद्दा होते थे. इन्दिरा गांधी ने सातवें दशक के पूर्वार्ध में “गरीबी हटाओ” का नारा दिया, प्रिवी पर्स ख़त्म किया और बैंकों का राष्ट्रीकरण किया. हालाँकि तब तक जन-आक्रोश अपनी चरम पर पहुँचाने लगा था और देश में सत्ता वर्ग ने कुछ हीं वर्षों में जयप्रकाश नारायण-नीत देशव्यापी आन्दोलन के मद्दे नज़र इमरजेंसी लगायी. गरीबी हटाओ का नारा कभी सत्ता पाने की राजनीतिक होड़ में ओझल होता गया और कभी भ्रष्टाचार की भेट चढ़ता गया. राजीव गाँधी को कहना पड़ा “रुपये में १५ पैसा हीं जनता तक पहुंचता है.
तब से आज तक के चार दशकों में प्रजातंत्र की जड़ें कुछ पुख्ता हुई. साक्षरता दर बढ़ी, प्रतिव्यक्ति आय  खरामा –खरामा ऊपर हुई, समाज की तर्क शक्ति बेहतर हुई और मीडिया सशक्त हुई. नतीजतन राज्य अभिकरणों से अपेक्षा बढ़ी. यह अलग बात है कि इसी बीच १९८४ से फिर से देश को संकीर्ण व् अतार्किक पहचान समूहों में बांटने का एक जबरदस्त और सफल प्रयास हुआ. इस वर्ष जहाँ एक ओर हिंदूवादी ताकतों और उसके राजनीतिक प्रगटीकरण –भारतीय जनता पार्टी – ने राम मंदिर का मुद्दा परवान चढ़ाया वहीं कांशी राम ने दलितों की पार्टी --बहुजन समाज पार्टी—को जन्म दिया. चूंकि हर संकीर्ण अवधारणा का एक विपरीत न्याय (पोएटिक जस्टिस) होता है, मंडल कमीशन की रिपोर्ट के रूप में बहुसंख्यक हिन्दू समाज को एक बार फिर टूटना पड़ा जातिवादी समूहों में. और तब पैदा हुआ तथाकथित “सामाजिक न्याय शक्ति” (सोशल जस्टिस फ़ोर्स). उसमे से निकले मुलायम और लालू सरीखे नेता.  जातिवादी राजनीति फिर पुख्ता हुई. जो कि आज तक कमर पर हाथ रखे प्रजातंत्र को मुंह चिढा रही है.
लेकिन सामाजिक पहचान समूह (सोशल आइडेन्टिटी ग्रुप्स) के सशक्तिकरण की झूठी चेतना पर राज करने वाले क्षेत्रीय दल भी आज विकास की भाषा बोलने लगे है. राज्यों के मुख्यमंत्रियों के बीच इस बात की होड़ लगी है कि उन्हें विकास का मुखिया कहा जाये. मैं कुछ साल पहले तक अगर किसी मुख्य मंत्री का इंटरव्यू करता था तो विकास के मापक शब्दों को वह यह कह कर ताल देता था कि यह टेक्निकल बात हम अपने अधिकारियों से पूछे तो अच्छा रहेगा. मानव विकास सूचकांक या बाल मृतु दर (आई एम् आर ) उसके लिए अजूबा होते थे. गरीबी की बात करने पर वह एक बात कहता था “हम गरीबों के आंसू पोछेंगे और हमारे शासन में गरीबी ख़त्म होगी. लेकिन आज किसी नरेन्द्र मोदी , किसी रमन सिंह, किसी शिवराज सिंह, किसी नीतीश या किसी अशोक गहलोत को अगर प्लानिंग कमीशन के अधिकारियों से बात करते देखें तो यह अहसास नहीं होगा कि विकास कोई टेक्निकल सब्जेक्ट है जिससे राज-नेताओं का कोई सीधा रिश्ता नहीं है.
मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री ने हाल हीं में एक न्यूज़ चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा “आज जिस नीतीश कुमार अपना माडल बता कर बेंच रहे हैं वह दरअसल मेरे माडल है मैंने स्कूल जाने वाली लड़कियों के लिए साइकिल योजना सबसे पहले शुरू की थी”. एक होड़ मची है “वोकास माडल” बताने की. 
किसी गरीब मुल्क में विकास का पैमाना राजनीतिक स्वीकार्यता का पर्याय बने इसका सीधा मतलब होता है कि गरीब अब राजनीतिज्ञों की मानसिक अय्यासी का शब्द ना हो कर एक चाबुक है. अब चूंकि विकास का भ्रष्टाचार से  गुजरात के मुख्य मंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी दस साल की विकास यात्रा से २००२ के गुनाह साफ़ कर रहे हैं और एक हद तक उन्हें जन-स्वीकार्यता भी हासिल हो रही है.  शायद जनता भी यह समझने लगी है कि अपराध का फैसला न्यायालय करेगी लेकिन कोई राजनेता अगर दस साल से राज्य के विकास लिए जी तोड़ मेहनात कर रहा है या ऐसा करता दिखाई देता है तो वह उनसे अच्छा है जो विकास तो दूर भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुए हैं. और अगर नहीं डूबे हैं तो उस ओर से मुंह मोड़ रखे हैं. जनता शायद यह भी मानने लगी है कि “बाँझ ईमानदारी” का कोई मतलब नहीं होता.
राज्य के मुखिया अपने –अपने मॉडल परोश रहे हैं. एक मोदी माडल है तो एक नीतीश मॉडल है, अक्सर  गहलोत और शिवराज भी अपने माडलों का ज़िक्र कर रहें है. दरअसल हर माडल में कुछ खराबी है तो कुछ अच्छाई. मसलन मोदी का कहना है कि उनके माडल में संतुलित विकास किया गया है और अर्थ=व्यवस्था के तीनों  क्षेत्र (कृषि, उद्योग व् सेवा) का जी एस डी पी (सकल राज्य घरेलू उत्पाद ) की ३३-३३ प्रतिशत की भागीदारी है. शायद कृषि –आधरित अर्थ-व्यवस्था में जहाँ देश का ६२ फी सदी व्यक्ति रहता हो इससे अच्छी व्यवस्था नहीं हो सकती. लेकिन गहराई से जांच करने पर पता चलता है कि कृषि विकास दर बढ़ने का कारण कुछ पैसे वाले किसानों का कैश क्रॉप की तरफ मुद जाना है. कृषि क्षेत्र में रोजगार कम हुए हैं और जमीन की उपलब्धता आम किसानों से हट कर बड़े किस्सनों के पास चली गयी है. साथ हीं उद्योगिक विकास तो हुआ है परन्तु श्रमिकों की माली हालत बदतर हुई है और रही अभिकरण उद्योगपतियों के हित-साधन में लगे हैं. इस आपाधापी में मानव विकास के प्रयास भी कम हो रहे हैं नतीज़तन राज्य का बाल मृतु दर अपेक्षित रूप से नहीं घटा है. सामजिक क्षेत्र में व्यय और जी एस डी पी का अनुपात कम हुआ है.
विकास की रह पर चलने की दो अडचनें मुख्य हैं. पहला : अगर विकास का स्तर पहले से हीं अधिक रहा है तो ऐसे में आंकड़ों में प्रतिशत के रूप में विकास उतना नहीं दिखाई देता. गुजरात इसका उदाहरण है. गुजरात या महाराष्ट्र पहले से हीं आर्थिक मामलों में विकसित रहे हैं. गुजरात के समाज में हीं उद्यमिता है और अमूल जैसा कोआपरेटिव प्रयास कई दशकों से विश्व के लिए उदाहरण है. उसके विपरीत उन राज्यों में जहाँ विकास बेहद कम रहा है तो उसमे थोड़ा सा भी प्रयास रंग लाता है और विकास के आंकड़े बेहतर करने में कम वक़्त लगता है और गति तेज होती है. बिहार इसका उदाहरण है. लालू सरकार की अकर्मण्यता के बाद एक विश्वास का वातावरण बना. कृषि उद्पादन में आई अचानक ५० प्रतिशत की वृद्धि ने राज्य का जी डी पी बढ़ा दिया है. बिहार के पास अभी भी करने के लिए काफी गुंजाइस है खासकर जनसँख्या-वृद्धि दर अभी भी घटने का नाम नहीं ले रही है. राज्य में सडकों के बन जाने से एक माहौल तो बना है परन्तु समाज में उद्यमिता ना होने के कारण औद्योगिक विकास परवान नहीं चढ़ रहा है.
एक अन्य पहलू पर गौर करें. जहाँ बिहार आबादी घनत्व ११०२/वर्ग किलोमीटर है वहीं राजस्थान और मध्य प्रदेश का क्रमशः १६५ और २३६. इसका सीधा मतलब है कि बिहार में जन विकास कार्यक्रमों की डिलीवरी बहुत आसन है इन दो राज्यों के मुकाबले. यानि जहाँ एक सम्मान को दस हज़ार लोगों में वितरित करने में बिहार को कुछ गाँवों में हीं घूमने पडेगा वहीं इन दोनों राज्यों के डिलीवरी अभिकरणों को कई जिले या तहसील जाना पड़ सकता है. बिहार में जन वितरण प्रणाली को और बेहतर करने की ज़रुरत है.
इन सबमें बेहतर है छत्तीसगढ़ का विकास मॉडल खासकर खाद्य एवं चिकित्सा को लेकर. रमन सिंह ने राज्य में सभी के लिए चिकित्सा बीमा की योजना शुरू की और साथ हीं गरीबों के लिए सस्ते और मुफ्त अनाज के कई योजनायें बेहद सफल ढंग से चल रहीं हैं. लाभार्थी कहीं से भी अपना मोबाइल दिखा कर सस्ता अनाज हासिल कर सकता है. बिजली के उपलब्धता के कारण कृषि विकास दर बेहतर हुई है और नए उद्योगों के आने से श्रमिकों का पलायन कम हुआ है.
कुल मिलकर विकास का राजनीतिक डिक्शनरी में आना भारत जैसे मुल्क के लिए एक शुभ संकेत है.

sahara (hastkshep)

Monday, 1 April 2013

सामजिक कुचेतना” में सार्थक जन-मुद्दों की अनदेखी



कुंठित सामाजिक सोच और बेपटरी होते जन-मुद्दे
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राजस्थान के करौली जिले में एक परिवार के आठ लोगों ने भगवान के दर्शन न होने पर हंसते हुए लड्डू में जहर डालकर खा लिया . पांच की मौत हो गयी जबकि तीन अस्पताल में मौत और जिंदगी की बीच झूल रहे है. उन्होंने यह कदम इसलिए उठाया क्योंकि उनका विश्वास था कि भगवान उनकी पूजा पर दर्शन देंगे चूंकि भगवान प्रगट नहीं हुए तो उन्होंने स्वयं भगवान् के पास जाने का फैसला किया. अपने इस कृत्य की उन्होंने वीडिओ रिकॉर्डिंग भी की. रिकॉर्डिंग में पाया गया कि उन्होंने सिरिंज से अपना खून निकाल कर भगवान् की पूजा-अर्चना भी की थी. 
देश किसी गंभीर “सामूहिक कुचेतना” की बीमारी से ग्रस्त है. जिन समाजों में तर्क-शक्ति का नितांत आभाव होता है उनमें जन-संवाद कुतर्क के रास्ते पर चला जाता है यानी कुंठित भावना के आधार पर फैसले होने लगते है. समाज दिमाग से सोचने की जगह दिल से सोचने लगता है. मंदिर-मस्जिद को मुद्दा मान लेता है लेकिन भ्रष्टाचार को नहीं. जाति पर वोट करता है, अपराधी में रोबिनहुड देखता है और उसको सत्ता में लाने के लिए वोट देने को उचित टहराने के लिए बताता है कि “ वह (अपराधी) अमीरों के सताता है गरीब की बेटी की शादी में मदद करता है.” शायद यही वजह है कि देश की वर्तमान लोक सभा में १६२ सांसद गंभीर अपराधों के मामलों में फंसे हैं.  
जरा गौर करे. जो परिवार भगवान से मिलने ले लिए हंसते हुए सामूहिक रूप से जहर खा लेता हो उससे कहीं भी वोट डलवाया जा सकता है, कोई दीवार जो भगवान या अल्लाह तक पहुँचाने में बाधा बन रही हो, गिरवाया जा सकता है. आतंक की घटनाएँ करवाई जा सकती हैं , आत्मघाती दस्ते तैयार किये जा सकते है. कुल मिलकर देश को या भारतीय समाज को उसी जड़ता में जकडे रखा जा सकता है जिसके तहत हमने सदियों से सती- प्रथा, बाल विवाह, स्त्री-प्रताड़ना, बाल मजदूरी, बंधुआ मजदूर , जाति-व्यवस्था, धर्मान्धता सरीखे कुरीतियों को कायम रखा.
शासक-वर्ग के लिए कितना आसन होता होगा कि जहाँ समाज के एक बड़े हिस्से को भगवान खोजने में लगा रहे और दूसरी तरफ कोई राजा देश लूटता रहे. कोई मंत्री-अफसर गठजोड़ राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य योजना के मद में आये आठ हज़ार करोड़ रुपये में से छह हज़ार करोड़ रुपये डकार जाये और अज्ञानी जनता फिर किसी ओझा, तांत्रिक या फ़क़ीर के यहाँ जा कर बेटा पैदा होने के लिए जादू टोना करने लगा रहे. और इधर कानून जब कभी हाथ बढ़ाये भी तो मंत्री-अफसर अपने गुर्गों से शामिल लोंगों में से कुछ को जेल के भीतर हीं ख़त्म कर देते हैं. अदालत को गवाह चाहिए, सबूत चाहिए लिहाज़ा दोनों ख़त्म कर दो. 
यही वजह है कि देश का सकल उत्पाद (जी डी पी) बढ़ता जा रहा है और मानव विकास घटता जा रहा है. पिछले ३१ सालों में ६.५ के जबरदस्त विकास दर से हम आज विश्व के दस देशों में हैं और मानव विकास सूचकांक (एच डी आई ) में जहाँ ३१ साल पहले १३४ वें नंबर पर थे आज भी वहीं हैं. बल्कि ताज़ा आंकड़ों के अनुसार एक खाना और नीचे आ गए हैं.
राजनीति-शास्त्र के सिद्धांत के अनुसार प्रजातंत्र में सरकारें जनमत के दबाव पर चलती हैं और यह जनमत तैयार होता है पब्लिक स्फीयर (जन धरातल) पर होने वाली चर्चाओं से. लेकिन अगर जन –चेतना कुंठित कर दी जाएँ यानि भगवान के साक्षात् दर्शन ना मिलने पर जहर खाने तक हीं सिमट जाये तो मानव विकास का मुद्दा उभर हीं नहीं सकता. लिहाज़ा अगर जन-संवाद को ऐसा मोड़ दे दिया जाये कि मुद्दा संजय दत्त की सजा कम करने के आगे बढ़ हीं ना पाए तो सत्ता पक्ष आराम से २-जी में घपला करता रह सकता है. टीवी में बाबाओं व तथाकथित अर्ध –भगवानों द्वारा “समोसे के साथ हरी चटनी खाओ” कह कर अंध-भक्तों को समृधि का रास्ता बताता हो उस समाज में मानव विकास सूचकांक का कोई मतलब नहीं रह जाता.  
जिस कुंठित सोच के तहत एक पूरा का पूरा परिवार ईश्वर के साक्षात् दर्शन ना मिलने पर जहर खा लेता है या मनोविकार से ग्रस्त महिला को सामूहिकरूप से ईंट से यह सोच कर मार देता है कि डायन है और गाँव को खाने आई है उस समाज की सोच में और इस कुछ तथाकथित पढ़े –लिखे लोगों के इस तर्क में कि “संजय दत्त कि सजा इसलिए कम कर देनी चाहिए कि “उनहोंने गांधी फिल्म में काम कर के गाँधी का सन्देश हमें दिया है और फिर डेढ़ साल की सजा भी तो काट चुका है“ कोई ज्यादा अंतर नहीं है. जनमत इसलिय तैयार किया जा रहा है अगर अदालत तार्किक हो तो उसे ठेंगा दिखाते हुए कार्यपालिका क्षमा –दान दे दे. तर्क को वजन देने के लिए गाँधी का सन्देश का सहारा ले लिया जाता है. संजय दत्त खलनायक में भी कुछ सन्देश देते हैं पर वह तर्क का भाग नहीं बन पाया ना यह बात सामने आई कि ३३ साल का व्यक्ति क्यों बच्चा माना जाता है. 
ये ही वे कारण है जिनकी वजह से भ्रष्टाचार सरीखा मुद्दा धीरे –धीरे ठंडा पड़ गया और अन्ना या केजरीवाल अलग –थलग पड़ गए. जन-आक्रोश इस बात पर नहीं बनता कि क्यों अपराधी (या आरोपी?) को अंतिम  अदालत से सजा ना मिलने तक देश की छाती पर मूंग-दलते हुए संसद में बैठने का अधिकार है. दोषी सिस्टम के खिलाफ शाश्वत-भाव से लड़ने के लिए जिस तर्क शक्ति की ज़रुरत है वह भारतीय समाज में पनपने नहीं दी गयी लिहाज़ा भ्रष्टाचार आज मुख्य मुद्दा नहीं बन पाया. मुद्दा है तो यह कि कोई मुलायम किसी सरकार को बचाएगे कि नहीं या तीसरा फ्रंट बनेगा कि नहीं. कोई बेनी किसी मुलायम को किस तरह की गाली से नवाजेगा या कोई नीतीश या नवीन अपने राजनीतिक ऊँट को इस करवट बैठायेगा या उस करवट और कोई दिग्विजय किस आतंकवादी ओसामा के नाम के पहले “मिस्टर” लगायेगा या कोई गृह मंत्री किसी हाफिज सईद नाम के बाद “जी”. 
बिहार के कई जिलों में पुरुषों की बच्चेदानी (प्रकृति ने ऐसा कोई चमत्कार आज तक नहीं किया) निकाल कर गरीबों के स्वास्थ्य बीमा का पैसा हड़प लिया पर मुद्दा बना “बिहार का स्वाभिमान”. जन्तर-मंतर पर रैली हुई इस बात को लेकर ना कि इस बात को लेकर क्यों बिहार मानव विकास के हर संकेतक पर आज भी सबसे नीचे है.
सत्ता-धारी बर्ग की तरह हीं बाजारू ताकतों को भी समाज कुंठित और अतार्किक रहना सुहाता है. १० रुपये किलो का आलू अगर ४०० रुपये किलो खिलाना है तो उसके लिया एक ऐसा समाज चाहिए जो भगवन के नाम पर जहर खा ले और पैसे हों तो “चिप्स” खा ले. अगर वह माध्यम वर्ग का है तो पडोसी के घर की लम्बी गाड़ी उसकी भी जिंदगी की साध बन जाती है. कोई पोंटी चड्ढा मुख्यमंत्रियों की नाक का बाल बन कर अरबों कम लेता है और कोई कांडा जनप्रतिनिधि हीं नहीं मंत्री बन कर कुछ भी कर लेता है.
इनमें से कोई जन-मुद्दा नहीं बन पाता. इस बात की भी चर्चा नहीं होती कि कैसे खुफिया एजेंसी की निदेशक या सी आई ए का मुखिया रिटायरमेंट की बाद राज्यपाल  क्यों बना दिया जाता या आयोगों की चारागाह में बाकि ज़िन्दगी चरने के लिए छोड़ दिया जाता. साथ हीं क्यों अगर कोई जज क्षमतावान है (और बुढापे की बीमारियों ने असर दिखाना नहीं शुरू किया है) तो उसकी रिटायरमेंट की उम्र बढाने की जगह उसे रिटायर होने के बाद फिर से किसी आयोग में बैठा कर नीली बत्ती और बंगले से नवाजा जाता है. 
समाज को इन सबसे छुटकारा पाना है तो ईश्वर की खोज सही मुद्दों में करनी होगी और जहर खाने की जगह निरंतरता के साथ जनमत का दबाव बनाना होगा. 

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