Sunday, 3 November 2019

जासूसी कांड में इस्रायली कंपनी के बचाव से भारत सरकार की फजीहत


 
अमरीका के सेन फ्रांसिस्को की अदालत में व्हाट्सअप ग्रुप के डायरेक्टर ने एक बेहद संगीन रहस्योद्घाटन किया. अधिकारी कार्ल वूग के अनुसार एक इसरायली जासूसी कंपनी एनएसओ द्वारा अपने देश के हीं एक सॉफ्टवेयर—पेगासस—का  इस्तेमाल करके दुनिया भर के १४०० पत्रकारों और समाजसेवियों की, जिनमें करीब दो दर्जन भारत के हैं, एक-एक गतिविधि “ट्रैक” की और उनके व्हाट्सअप सहित सभी सन्देशों को हासिल किया. एनएसओ का अपने बचाव में कहना है कि वह ये जानकारियाँ केवल वैध सरकारी एजेंसियों को हीं बेचती हैं. याने दुनिया के देशों में सरकारों या उनकी एजेंसियों ने ने लक्षित लोगों के बारे में खुफिया जानकारी लेने के लिए इस कंपनी से समझौता किया होगा. व्हाट्सअप के निदेशक ने कोर्ट को यह भी बताया कि भारत के करीब दो दर्जन सामाजिक कार्यकर्ताओं और प्रत्राकारों भी इस खुफिया कंपनी की जड़ में थे. डायरेक्टर के बयान के अनुसार भारतीय लोगों के बारे में ये जानकारियाँ इस साल  मई माह के पहले तक के लगभग दो सप्ताह के काल में जुटाए गए. मई माह में देश का आम-चुनाव ख़त्म हुआ था. अधिकारी ने उन व्यक्तियों के जिनके बारे में आंकड़े जुटाए गए, नाम बताने से इनकार किया. लेकिन अमरीका के कुछ अख़बारों ने ये नाम उजागर किये. एनएसओ नमाक इस खुफिया कंपनी को जैसे हीं पता चला कि कनाडा की किसी सॉफ्टवेयर सुरक्षा कंपनी को उसकी गतिविधियों और तरीकों की जानकारी हो चुकी है तो उसने कई देश से अपने समझौते ख़त्म कर दिए और अब वह कह रही है कि उसने इस साल के सितम्बर माह से मानवाधिकार नीति अपना ली है. भारत की केंद्र सरकार ने अपने को दोष मुक्त करने के लिए व्हाट्सअप कंपनी से स्पष्टीकरण  माँगा है.  
यह सॉफ्टवेर इतना शक्तिशाली है कि एक बार भी लक्षित व्यक्ति ने अगर अपने मोबाइल फ़ोन पर “एक्सप्लॉइट लिंक” पर क्लिक कर दिया या व्हाट्सअप पर आयी “मिस्ड कॉल” पर रिंग कर दिया तो उसका फ़ोन, एसएमएस, व्हाट्सअप और उससे लिंक्ड सारे एकाउंट्स आदि इस सॉफ्टवेर ऑपरेटर की आज्ञा मानने लगेंगे. बताया जा रहा है कि हाल के कुछ तकनीकि परिवर्तनों के बाद यह सॉफ्टवेयर अब एक्सप्लॉइट लिंक क्लिक करने की इज़ाज़त भी नहीं मांगता. यहाँ तक कि यह सॉफ्टवेर लक्षित व्यक्ति के फ़ोन को यह निर्देश भी दे सकता कि कैमरा ओन करे, विडियो रिकॉर्ड करे और उसे बगैर फ़ोन में अंकित किये ऑपरेटर को भेज दे. इसका खुलासा तब हुआ जब सितम्बर, २०१८ में कनाडा की एक साइबर सिक्यूरिटी कंपनी ने पाया कि इस सॉफ्टवेर को इस्तेमाल कर रहे दुनिया के ४५ देशों की ३६ में से ३३ कंपनियां जिनमें भारत भी है, इसका शिकार हो रहे है. ऐसे पांच ऑपरेटर्स जो एशिया में यह सब कर रहे हैं उनमें से एक संगठन भारत में राजनीतिक थीम वाले डोमेन का इस्तेमाल कर रहा है. यह राज तब खुला जब पत्रकार खशूगी की हत्या के बाद अरब के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को यह शक हुआ की वे इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस की जद में हैं और उन्होंने कनाडा की एक साइबर सिक्यूरिटी कंपनी से बात किया. यह सब गोरखधंधा जून, २०१७ से सितम्बर, २०१८ के बीच के काल का है. सऊदी अरब नागरिक खशूगी की हत्या उसके इस्तांबूल में सऊदी दूतावास में हुई थी. आरोप है कि सरकार के खिलाफ बोलने वाले खाशूगी को सरकार के सीक्रेट एजेंटों ने क्ल्हतं कर दिया. इस राज के उजागर होने के बाद  पेगासस सेवाएं बेचने वाली इस्रायली कंपनी ने सऊदी अरब सरकार से अपना कॉन्ट्रैक्ट ख़त्म कर दिया. भारत के जिन पत्रकारों के तथ्य हासिल किये गए हैं उनमें एक रक्षा विषय का जानकार है जबकि एक किसी अखबार का संपादक जबकि कुछ छत्तीसगढ़ के मानवाधिकार कार्यकर्त्ता हैं. मोदी सरकार की मुसीबत यह है कि इस कंपनी का अपने बचाव में हर बार कहना कि वह सिर्फ वैध सरकारी एजेंसियों को हीं जानकारी देती है, सरकार को कटघरे में खडा कर रहा है.   
          
           जासूसी या निजता-भंग के अलावा अन्य खतरे भी     
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याद करें जांबाज अभिनन्दन पाकिस्तान की सीमा में इसलिए घुस गए कि पाकिस्तानी सेना ने भारत-स्थित कंट्रोलरूम और उनके बीच के संवाद को ब्लाक कर दिया था और इस पायलट को वापस लौटने के सन्देश मिलना बंद हो गए थे. जो इस्रायली सॉफ्टवेर पत्रकारों और कार्यकर्ताओं की गतिविधियाँ जान सकता है उसे अपने इलेक्ट्रॉनिक रक्षा उपकरणों को महफूज रखने या मध्यम वर्ग के बैंक खाते बचाने में भी सरकार इस्तेमाल कर सकती है. इससे पहले कि मध्यम वर्ग का विश्वास इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम से उठने लगे सरकार को एक “हैकिंग-मुक्त” व्यवस्था देनी होगी. सिर्फ इसलिए कि बड़े मुल्कों से होड़ में भारत भी है, इस सिस्टम को लेने के लिए लोगों को बाध्य करना खतरनाक हो सकता है. 
आज आपकी मोटरसाइकिल से लेकर मिसाइल तक इस टेक्नोलॉजी के बिना नहीं चल सकते. ट्रेन-परिचालन में भी अब इस तकनीकि का भरपूर इस्तेमाल कर रहा है. लाखों करोड़ रुपये का पूरा का पूरा शेयरबाज़ार भी इसी तकनीकि के भरोसे चल रहा है. जहाँ एक ओर मध्यम वर्ग तक को, कम बैंक ब्याज दर दे कर, शेयर में पैसे लगाने के लिए मजबूर किया जा रहा है, वहीँ किसी रिटायर्ड क्लर्क की जिन्दगी भर की कमाई कोई हैकर एक झटके में गायब कर सकता है. क्या सरकार इस हकीकत दो दो-चार हो युद्ध स्तर साइबर सिक्यूरिटी सुनिश्चित करेगी ? कानून मात्र जनता को कैशलेस इकॉनमी की ओर जाने के लिए मजबूर करने वाला न होकर पहले साइबर सिक्यूरिटी को सुनिश्चित करने वाला होना चाहिए, सख्त प्रावधानों के साथ ताकि इस अपराध को अंजाम देने के पहले अपराधी सजा की सोच कर हतोत्साहित हो क्योंकि यह सामान्य आर्थिक अपराध या हल्का दंडात्मक अपराध न होकर सिस्टम पर भरोसा उठाने वाला है लिहाज़ा असली देशद्रोह है.        
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Tuesday, 17 September 2019

धरातल पर लाने के पहले वैज्ञानिकों की शंका पर गौर करें वरना हानि संभव



बजट भाषण में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने और फिर विगत सोमवार को विश्व मंच से बोलते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने “संयुक्त राष्ट्र मरुँस्थलीकरण -प्रतिरोधी कन्वेंशन में शामिल देशों की १४ वें सम्मलेन में भारत की “जीरो बजट” खेती की योजना का संकल्प दोहराया. लेकिन देश के लब्ध-प्रतिष्ठित दर्जनों कृषि वैज्ञानिकों ने प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पंजाब सिंह के नेतृत्व में नीति आयोग के सदस्य रमेश चंद व भारतीय कृषि शोध परिषद् (आईसीएआर) महानिदेशक तिरलोचन महापात्र की मौजूदगी में एक गोष्ठी में न केवल इसे ख़ारिज किया है बल्कि इस योजना पर अमल से अनाज उत्पादन और उत्पादकता के भारी नुकसान की चेतावनी भी दी है. “वापस मूल की ओर” (बैक-टू-बेसिक्स) के सिद्धांत के तहत जीरो बजट खेती की योजना इस बजट में घोषित की गयी. लेकिन इन वैज्ञानिकों ने कहा कि जो पद्धति इस खेती में अपनाने की योजना है उसके बारे में न तो कोई प्रामाणिक आंकड़ा है न हीं वह वैज्ञानिक कसौटी पर कसा गया है. कृषि के इस पद्धति के पीछे सन २०२२ तक किसानों की आय दूनी करने के वादे का दबाव है. यह योजना इस सिद्धांत पर आधारित है कि पौधों को फ़ोटो-सिंथेसिस के लिए जरूरी नाइट्रोजन, कार्बन डाई ऑक्साइड, धूप और पानी प्रकृति मुफ्त में देती है केवल उसे हासिल करने का तरीका मालूम होना चाहिए. बाकि दो प्रतिशत पोषण माइक्रोबैक्टीरिया (जीवाणु) को जड़ों के भीतर सक्रिय करने से मिल सकता है जो देशी गाय के मूत्र, गोबर, गुड़, दाल आदि के घोल के छिडकाव से मिल सकेगा. लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि हवा में ७८ प्रतिशत नाइट्रोजन जरूर है लेकिन यह मुफ्त में उपलब्ध नहीं होता, न हीं पौधों को उपलब्ध हो सकता है (या पौधे उसे लेकर एमिनो एसिड में बदल कर प्रोटीन की तरह अपने लिए भोज्य बना सकते हैं) जब तक उसे अमोनिया या यूरिया के रूप में न दिया जाये अर्थात रासायनिक खाद.
हालांकि दुनिया में मशहूर वनस्पतिशास्त्री वेस जैक्सन ने करंज नामक अनाज को कुछ इसी तरह के सिद्धांत पर पिछले ६० साल से प्रचलित करना चाहा है लेकिन भारत में जीरो बजट खेती की अवधारणा का जन्मदाता महाराष्ट्र के सुभाष पालेकर को माना जाता है. वह इस कांफ्रेंस में नहीं आ पाए. आयोजकों का कहना है कि उन्होंने पालेकर को निमंत्रित किया था लेकिन पालेकर का कहना है निमंत्रण बगैर समय तय किया दिया गया था. पालेकर की जीरो बजट खेती के सफल होने की एक और शर्त यह है कि इसमें प्रयुक्त होना वाला गोबर और मूत्र केवल काली कपिला गाय का होना चाहिए. क्या देश में खेती की नीति काली कपिला गाय के गोबर -मूत्र के आधार पर बनाना और उसे पूरी दुनिया को घूम-घूम कर बताना भरतीय नेतृत्व की तर्क-क्षमता और वैज्ञानिक सोच पर प्रश्न-चिन्ह नहीं खड़ा करेगा. देश में विरले नेता हुए हैं जिनका दिमाग इतना जरखेज (उपजाऊ) रहा है जितना वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का. लेकिन योजनाओं को बगैर जमीन पर वैज्ञानिक और व्यावहारिक पुष्टि के घोषित करना नुकसान पहुंचा सकता है. मोदी-१ का पांच साल का कार्यकाल हो या पिछले १०२ दिन का, कुल गणना करें तो हर हफ्ते एक योजना, आइडिय, या विचार-सन्देश देश को अपने सबसे मकबूल नेता से मिलता है. एक देश, जिसमें आइडियाज न हों, धीरे-धीरे जड़वत होता जाता है. लिहाज़ा इस समाज को हर रोज चैतन्य रखना अच्छी उपलब्धि है. लेकिन अब समय है कि सरकार के कुल १९२७ दिन के कार्यकाल में एक निष्पक्ष विश्लेषण हो कि चैतन्यता का भाव वास्तव में जीवन गुणवत्ता में कितना बदलाव लाता है.
एक उदाहरण लें. मोदी-२ में कृषि को लेकर एक नया भाव पैदा हुआ है जो शायद “सन २०२२ तक किसानों की आय दूनी करने और बार -बार दोहराने’ के दबाव के कारण है. शायद मोदी सरकार को यह मालूम है कि किसानों की आय कम रहने का सबसे बड़ा कारण उत्पादकता न बढना है. भारत में जहाँ अनाज का उत्पादन बढ़ रहा है, उत्पादकता लगातार घटती जा रही है. इसके मूल में खेती की जमीन पर जनसँख्या का दबाव, किसानों का रासायनिक खादों और जल का अबुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग और बाज़ार की सुविधा का अभाव है. लिहाज़ा सरकार अब परम्परागत खेती की ओर उन्मुख होने का इरादा बना रही है (याने २००-४०० साल पुरानी खेती ---देशी बीज, देशी खाद और देशी बाज़ार. इसके संकेत सरकार के ५ जुलाई के बजट की पूर्व-संध्या पर संसद में जारी आर्थिक सर्वेक्षण को पढने से और प्रधानमंत्री के हाल के तमाम भाषणों से मिलता है. सर्वेक्षण के कृषि अध्याय (पेज १७२) का प्रारंभ वेस जैक्सन के इस कथन से होता है ---- प्रकृति में सर्वाधिक संधारणीय (सस्टेनेबल) पारिस्थितिकी विद्यमान है और चूंकि अंततोगत्वा कृषि प्रकृति से हीं जन्म लेती है, अतः एक धारणीय पृथ्वी के लिए हमारा मानक स्वयं प्रकृति की पारिस्थितिकी हीं होनी चाहिए”. स्वयं इस सर्वे में भी यह पाया गया है कि समस्या रासायनिक खाद के दुरुपयोग के कारण अब खेतों को दीर्घकालिक नुकसान हो रहा है. साथ हीं अगले ग्राफ में बताया गया है सिंचाई के पानी का भी अविवेकपूर्ण इस्तेमाल तमाम राज्य कर रहे हैं . ऐसे में बेहतर तो यह होता कि सरकार “स्वच्छ भारत” , “बेटी बचाओ, बेटी पढाओ” , “प्लास्टिक मुक्त भारत” की तरह हीं रासयनिक खाद खासकर नाइट्रोजन वाली खादों के खिलाफ “वैज्ञानिक खेती” का नारा देती तो एक बेहतर परिणाम मिल सकता था. चावल और गन्ना जो देश में सिचाई हेतु उपलब्ध जल का ६० प्रतिशत लेते हैं उनके लिए इसरायली तकनीकी का प्रयोग करना सार्थक प्रयास था. तमिलनाडु, कर्नाटका और महाराष्ट्र जो पानी की भयंकर दोहन गन्ने की खेती के लिए कर रहे हैं, उसमें वैज्ञानिक रूप से बदलाव लाना और ऐसी खेती लिए बिहार और उत्तरप्रदेश जैसे राज्यों को जहाँ सिंचाई जल उत्पादकता सबसे अच्छी है, प्रोत्साहित करना किसानों की आय बढाने का कारगर उपाय हो सकता है.
अचानक खेती को अवैज्ञानिक और परम्परागत तौर-तरीके पर ले जाना कुछ “राम के काल में पुष्पक विमान” , और “हाथी का मस्तक मानव में ग्राफ्ट करने के लिए गणेश भगवान् को उधृत करने “ की तरह न हो जाये. उपरोक्त कांफ्रेंस में शंका व्यक्त करने वाले वैज्ञानिक न तो वामपंथी विचारधारा वाले हैं न हीं “देश-विरोधी” बल्कि इनमें से कई मोदी काल में हीं कृषि विभाग में महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके हैं जैसे पंजाब सिंह जो वाजपेयी काल में सरकार के सबसे बड़ी संस्था – भारतीय कृषि शोध परिषद् – के महानिदेशक और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति रह चुके हैं. सरकार को इस रिपोर्ट पर चर्चा के बाद हीं “जीरो बजट” खेती को जमीन पर लाना मुनासिब होगा.

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Sunday, 11 November 2018

आस्था बनाम संवैधानिक नैतिकता


ट्रैफिक पुलिस का एक अदना सा सिपाही चौराहे पर हाथ उठाकर बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ रोक देता है. उसे यह शक्ति कानून देता है. देश में प्रति 740 लोगों पर मात्र एक पुलिसवाला है. इसीलिये जुमला है --- सरकार इकबाल से चलती है. सुप्रीम कोर्ट के पास भी अपने आदेशों और फैसलों को मनवाने के लिए कोई एजेंसी नहीं होती. संवैधानिक व्यवस्था के तहत आदेशों का अनुपालन सरकार के हाथ में होता है. कोई सरकार अगर यह कह दे “जाओ, नहीं करेंगे” तो फिर क्या होगा? जो अवमानना का आदेश अदालत द्वारा होगा उसका भी अनुपालन सरकार को हीं करना होता है. अब एक दूसरी स्थिति देखें. अगर अदालत कोई आदेश देती है और जनता उसे नज़रंदाज़ करते हुए अपने मन के हिसाब से करती है और सरकार (या सत्ताधारी दल के नेता) सख्ती तो छोडिये, जनता को इसके लिए समर्थन देती हैं तो फिर इस व्यवस्था को ढहने से कौन रोक नहीं सकता?
हाल की दो घटनाएँ लें. सुप्रीम कोर्ट ने प्रदूषण की खतरनाक स्थिति देखते हुए देश की राजधानी, दिल्ली में दीपावली पर पटाखे न जलाने के या मात्र शाम के दो घंटे और  वह भी “हरित पटाखे” जलाने के आदेश दिए. इस पर्व को राम की रावण पर या अच्छाई की बुराई पर जीत के रूप में हर्ष प्रदर्शन के लिए आतिशबाजी की परम्परा के साथ मनाया जाता रहा है. याने आस्था का प्रश्न है. यह आस्था या परम्परा तब बनी होगी जब दिल्ली का आबादी दो करोड से ऊपर नहीं थी, गगनचुम्बी सोसाइटियों में फ्लैट के ऊपर फ्लैट नहीं बने थे और वायु प्रदूषण की कल्पना या माप का विज्ञान नहीं होगा और हर मिनट प्रदूषण के आंकड़े नहीं आते होंगे. आज देश की राजधानी एक गैस चैम्बर बन गयी है. दिवाली के अगले दिन प्रदूषण के आंकडे कुछ जगहों पर १८०० माइक्रोन अर्थात मानदंडों से ३० गुना ज्यादा रहे. यह स्थिति सांस की बीमारी हीं नहीं मौत की दावत साबित हो सकती है. लेकिन पुलिस मूकदर्शक के रूप में खडी रही और आस्था जीतती रही, भले हीं इस जीत में आस्थावानों के मौत का बुलावा भी रहा. बुराई पर बुराई की जीत में बदल गयी दीपावली.
इसके कुछ हीं दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने “संवैधानिक नैतिकता” (कॉनस्टीच्युशनल मोरालिटी) का सिद्धांत प्रतिपादित किया (हालाँकि यह पहले से भी प्रजातंत्र के मूल तत्वों में रहा है), जब उसके सामने सबरीमाला का मामला आया. इस मामले में आस्था और परम्परा कहती है कि रजस्वला की उम्र वाली महिलाओं का मंदिर में जाना (याने १० साल से ५० साल तक की आयु) वर्जित है. क्योंकि उस आयु में महिलाएं मंदिर को अपवित्र कर सकती हैं. उधर संविधान के अनुच्छेद १४ में विधि के समक्ष समानता” को मौलिक अधिकार में रखा गया है. अब अगर मान लें कि हज़ार साल पहले कोई परम्परा बनी और आस्था बनकार संस्था के रूप में विकसित हो गयी ( मसलन दक्षिण भारत के एक समुदाय में सैकड़ों शिशुओं को एक पहाडी पर बने मंदिर से नीचे फेंका जाता है जहाँ कुछ लोग चादर ले कर उन्हें रोकते हैं. अक्सर कई बच्चों की मौत हो जाती है) तो क्या आज हमें उसे जारी रखना चाहिए? इस समस्या को तोड़ा गहराई से समझना होगा. जब ये धर्म-आधरित आस्थाएं बनी थी तो प्रजातंत्र नहीं था , हर व्यक्ति को मौलिक अधिकार नहीं दिए गए थे, राजा और रंक का वोट सामान नहीं था और विज्ञान और तार्किक समझ नहीं थी. लिहाज़ा आस्था ने कई बार शोषण का कारण भी बन जाती थीं, ईश्वर तक पहुँचने या परलोक सुधारने का ठेका राजा की मदद से कुछ संभ्रांत वर्ग के पास हीं सिमट जाता था, और अक्सर जाति, लिंग और क्षेत्रीय विभेद को वैधानिकता प्रदान करता था. यहाँ तक की आज के आधुनिक दौर में भी यह आस्था हीं तो थी जिसके तहत आसाराम, राम-रहीम और बाबा रामपाल अर्ध-ईश्वर (डेमी -गॉड) बन कर भक्तों से बलात्कार करते रहे. सत्ता नतमस्तक होती रही. 
सुप्रीम कोर्ट जब तलाक की प्रथा ख़त्म करने के आदेश देता है तो जो वर्ग स्वागत करता है वही सबरीमाला में आस्था से छेड़खानी न करने की चेतावनी देता है. फिर अगर हाजी अली शाह दरगाह में सबरीमाला की तरह पवित्रता के नाम पर महिलाओं का प्रवेश वर्जित होना सुप्रीम कोर्ट ने गलत माना तो सबरीमाला में आस्था इतनी प्रबल क्यों? तर्क के सारे आधार तो एक हीं हैं.
ऐसे में जब देश की सर्वोच्च न्यायलय के सामने यह प्रश्न आता है कि दलित को मंदिर में जाने का अधिकार है कि नहीं, या महिलाएं शारीरिक कारणों से क्यों मंदिर में दर्शन से अपने जीवन के ४० साल वंचित रखी जाएँ या मेले में जानवरों के साथ ज्यादती (जली-कट्टू) को धर्म का अभिन्न अंग और आस्था का प्रश्न बना कर समाज मूक दर्शक बना रहे तो कैसे वह अदालत हाथ पर हाथ धरे बैठी रहे? उस पर देश की एक बड़ी राजनीतिक वर्ग की यह चेतावनी कि “सर्वोच्च न्यायलय आस्था के साथ छेड़खानी न करे” यही प्रदर्शित करती है कि हम आदिम सभ्यता की एक बार फिर मुड़ रहे हैं.
यहाँ एक समस्या और भी है. अगर एक वर्ग की आस्था दूसरे वर्ग की आस्था से टकरा रही है तो समाज, संविधान और उसकी संस्थाएं क्या चुपचाप देखती रहें और दोनों वर्ग एक दूसरे के खून के प्यासे बने रहें? हम अक्सर देखते हैं कि पुलिस के लिए एक भारी समस्या बन जाती है जब दो समुदायों के त्योहार एक हीं दिन पड़ते हैं और दोनों एक हीं सड़क से , एक हीं समय जुलूस निकालने की जिद पर अड़े रहते हैं. कुछ हीं माह पहले बिहार में इस मामले में तीन जगह दंगे हो चुके हैं. अगर सुप्रीम कोर्ट को आस्था से “छेड़-छाड़” नहीं करना चाहिए तो फिर पुलिस को भी यह अधिकार नहीं है. तब सोचिये देश में शांति की क्या हालत होगी?
कौन हैं सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी के बावजूद दीवाली में पटाखे फोड़ने वाले आर्थिक रूप से संपन्न दिल्लीवासी या केरल का “शिक्षित” पुरुष वर्ग ? दरअसल भारतीय समाज में इस बात की शिक्षा पाट्यक्रम में दी जानी चाहिए कि पहली आस्था संविधान में होनी चाहिए और कभी भी अगर धार्मिक आस्था और संवैधानिक व्यवस्था के बीच, अर्थात् अनुच्छेद १४ (कानून के समक्ष समानता का अधिकार) और अनुच्छेद २५ (अंतःकरण, धर्म के आचरण, प्रचार और प्रसार की स्वतन्त्रता) में टकराव हो तो सम्मानपूर्वक व्यक्तिगत स्वतन्त्रता को व्यापक समाज की स्वतन्त्रता के आगे समर्पित कर देना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने यही सिद्धांत सबरीमाला के मामले में प्रतिपादित किया है.

Sunday, 4 November 2018

दोष सिर्फ राजनीतिक वर्ग का हीं नहीं है !



दुनिया के जाने-माने अर्थशास्त्री और नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने अपनी बहुचर्चित पुस्तक “ द आइडिया ऑफ़ जस्टिस” में एक अध्ययन का जिक्र किया है. केरल स्वास्थ्य मानदंडों में भारत के अन्य राज्य तो छोडिये, चीन से भी आगे और लगभग यूरोप के समकक्ष है. इसका कारण स्वास्थ्य औरशिक्षा पर वहां  की सरकारों द्वारा पिछले तमाम वर्षों में किये गए प्रयास और खर्च है. इसके ठीक विपरीत सरकारी भ्रष्टाचार और उदासीनता के कारण बिहार और उत्तर प्रदेश इन स्वास्थ्य मानदंडों पर रसातल में लगातार बने हुए हैं. असामान्यरूप से जीवन प्रत्याशा और खासकर वृद्धावस्था की मृत्यु-दर बढी हुई है. लेकिन जब बीमारी को लेकर व्यक्तिगत-संतुष्टि (सेल्फ- पर्सीव्ड मोर्बिडिटी) का आंकलन किया गया तो केरल में लोग सबसे ज्यादा असंतुष्ट पाए गए और बिहार और उत्तर प्रदेश के लोग सबसे कम असंतुष्ट. इसके पीछे के कारण को खोजने पर सेन को पता चला कि “अभाव में भी संतुष्टि” का यह भाव बिहार और उत्तर प्रदेश के लोगों में इसलिए है कि  उन्हें कभी भी सरकारों से अपेक्षा नहीं रही क्योंकि वे जानते भी नहीं कि सरकार की भूमिका जन-जीवन को उठाने में क्या और कहाँ तक है. सेन की धारणा का मतलब यह है कि अशिक्षा, अज्ञानता और सत्ता, सरकार और राज्य अभिकरणों के प्रति “जाही विधि रखे राम, ताहि विधि रहिये” का दासत्व भाव आज भी उत्तर भारत के इन दो राज्यों में हीं नहीं बल्कि हिंदी पट्टी में भयंकर रूप से व्याप्त है. इसके ठीक विपरीत केरल में एक ज़माने से शिक्षा अव्वल रही है और सामूहिक चेतना विकास के तमाम पैरामीटर्स को लेकर तार्किक और सत्ता पर दबाव बनाने वाली रही है. एक कुंठित और तार्किकरूप से अवैज्ञानिक समझ वाले समाज सरकारों के लिए “मैनेज” करना ज्यादा आसान होता है क्योंकि भ्रष्टाचार करते हुए भी राजनीतिक दल उन्हें भावनात्मक आधार पर सहज हीं अपने पक्ष में कर लेती हैं. 
अब यहाँ सवाल हम विश्लेषकों से पूछा जाना चाहिये कि अगर समाज की समझ हीं पिछले ७० सालों में गाय, तलाक, मंदिर, मस्जिद से ऊपर नहीं बढ़ पा रही है तो दोष महज राजनीतिक वर्ग का हीं क्यों? अगर केरल ऐसे शिक्षित और तार्किक सामूहिक सोच वाले राज्य में भी सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को ठेंगा दिखाते हुए पुरुष समाज महिलाओं को प्रवेश नहीं दे रहा है “आस्था” के नाम पर तो राजनीतिक दल क्यों नहीं पक्ष और विपक्ष में खडी होंगी. यहाँ सवाल यह भी है कि अगर यह समझते हुए भी कि हर चुनाव के पहले आरक्षण, धार्मिक प्रतीकों और जातिवाद का मुद्दा “बोतल में बंद जिन” की तरह बाहर निकल आता है तो समाज की आँखों पर पर्दा क्यों पड़ा रहता है और वह चुनाव -दर चुनाव धोखा खाते हुए भी यह सन्देश नहीं दे पाता कि खूंखार अपराधी शहाबुद्दीन की जगह संसद नहीं सलाखों के पीछे है. शहाबुद्दीन कैसे चार बार प्रजातंत्र के सबसे “पवित्र मंदिर” लोक सभा में चुन कर आता है और क्यों किसी लालू यादव को यह सन्देश नहीं जाता कि भ्रष्टाचार और अपराध की प्रजातंत्र में जगह नहीं ?कैसे किसी राजनीतिक दल का नेता जनमंच से चेतावनी दे सकता है कि आस्था के मुद्दे से छेड़खानी करने से सुप्रीम कोर्ट बाज आये ?
दरअसल समाज का एक तबका जिनमें कुछ शिक्षित शहरी लोग हीं राजनीतिक वर्ग भी शामिल है, जन-मंचों पर, जैसे टी वी चैनलों पर चीख-चीख कर विकास की बात करते हैं और इसे सिद्ध करने के लिए “अपने पक्ष के चुनिन्दा आंकड़े” भी पेश करते हैं लेकिन वापस लौट कर  वह दल जाति और संप्रदाय के आधार पर टिकट दे देता है और यह तथाकथित शिक्षित शहरी वर्ग अपनी जाति के नेता के घर अपनी बेटे की नौकरी लगवाने या अपना तबादला रुकवाने या मलाईदार जगह करवाले के लिए पहुँच जाता है. 
अगर आस्था इतनी अक्षुण है तो फिर बलात्कारी बाबा आसाराम को जेल क्यों? वह तो आज भी लाखों लोगों का भगवान है? राम रहीम को आज भी खुला छोड़ दें और देख लें कि किस तरह राजनीतिक वर्ग भक्तों के वोट के लिए नतमस्तक होता है. तो फिर इस संविधान का क्या होगा जिसके अनुच्छेद १४ में समानता को मौलिक अधिकार माना गया और सर्वोच्च न्यायालय को उसे बनाये रखने की अपेक्षा की गयी. सबरीमाला मंदिर में तो सभी आयु की महिलाओं के मंदिर में प्रवेश का मामला था और भारत में एक बड़ा वर्ग इस फैसले के पूर्व इस मंदिर का नाम भी नहीं जनता था लेकिन राम मंदिर को भारत के १०० लोग अपनी अटूट आस्था के साथ देखते हैं और राम तो आराध्य देव माने जाते हैं. तो क्या राजनीतिक पार्टी के हिसाब से जहाँ भी समाज के किसी वर्ग की आस्था हो, अदालतों को मामले सुनाने का हक नहीं होना चाहिए. तब फिर चौराहे या सडकों पर एक मस्जिद, एक मंदिर हर रोज बनाये जाते रहेंगे और कुछ दिन में भक्त भी आने लगेंगे फिर आस्था मुकम्मल हो जायेगी. और तब सड़कें जाम हो जायेंगी क्यों पूजा और अजान के ऊपर कुछ भी नहीं. 
हम कैसा भारत अपनी आने वाली पीढी के लिए बनाने जा रहे हैं. अमर्त्य सेन ने इसका कारण बताया. उनके अनुसार हमारे तार्किक फैसले और किसी फैसले का चुनाव करते समय असली इच्छा में एक बड़ा अंतर रहता है. इसे “इच्छा की कमजोरी” (वीकनेस ऑफ़ द विल” कहते हैं. ग्रीक दर्शन में इसे “अक्रासिया” कहते हैं. भारत के समाज दर्शन में इसे “अपूर्ण आत्म-नियंत्रण” भी माना गया है. 
कितना साम्य है , केरल के उस शिक्षित व तार्किक समाज में जो सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ महिलाओं को पुरुषसत्ताक जकडन से निकलने नहीं देना चाहता और इसमें उसे दोनों पक्षों की तरफ से या खिलाफ राजनीतिक वर्ग रोटियां सेंकने खड़े हैं और उत्तर प्रदेश और बिहार का बीमार समाज जो शिक्षा और स्वास्थ्य के अभाव में तिल-तिल कर मर रहा है लेकिन “आस्था” और “भावनात्मक” मुद्दों पर सर्वोच्च न्यायालय से भी दो-दो हाथ करने को उद्धत है. तभी उत्तर प्रदेश के गेरुआधारी योगी मुख्यमंत्री आदित्यनाथ “अन्य” विकल्पों की बात कह रहे हैं तो बिहार के केन्द्रीय मंत्री गिरिराज किशोर इस अदालत से जनवरी में पीठ बनाये जाने के फैसले के अगले दिन कहा कि “मुझे डर है कि कहीं हिन्दुओं के सब्र का बांध न टूट जाये” . जाहिर है आस्था या की बात आस्था वालों को अच्छी लगेगी और अगली बार फिर कोई गिरिराज, कोई लालू या शहाबुद्दीन या कोई ओबैसी संसद की शोभा बनेंगे. और बिहार में ७० साल की आज़ादी के बाद भी (विश्व स्वास्थ्य संगठन के ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार) कुपोषण के कारण हर दूसरा बच्चा ठूंठ (स्टंटेड) या कमजोर (वेस्टेड) पैदा होता रहेगा और बड़ा होकर अशिक्षत और अस्वस्थ होते हुए भी आस्था का झंडा ऊँचा करता रहेगा. उधर बिहार के मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने लोक सभा चुनाव की तैयारी के साथ अपने दलित प्रेम का मुजाहरा करते हुए ताज़ा ऐलान किया “किसी में ताकत नहीं जो अनुसूचित जाति व जनजाति का आरक्षण ख़त्म कर सके”.

Jagran

Wednesday, 3 October 2018

विकास से शाश्वत परहेज करने वाले ये चार राज्य



विश्व बैंक ने एक नया शब्द -समूह बनाया है --- रिफ्युजिंग-टु-डेवेलप-कन्ट्रीज (आर डी सीज) याने हिंदी में कहें तो “विकास से परहेज करने वाले देश” (विपद). इसका प्रयोग बैंक ने दक्षिण एशियाई देशों की विकास के प्रति स्पष्ट संभावनाएं रहते हुए भी उदासीनता को लेकर विगत सोमवारको जारी अपनी एक रिपोर्ट में किया है. अगर भारत के विकास विश्लेषक इसका प्रयोग करना चाहें तो उत्तर भारत के कम से कम चार बड़े राज्यों के लिए जिनमें से कुछ के लिए एक ज़माने में अर्थशास्त्री आशीष बोस ने “बीमारू” राज्य शब्द -संक्षेप गढ़ा गया था, कर सकते हैं. याने “विकास से परहेज करने वाले क्षेत्र” (विपक्ष). इस रिपोर्ट के ७२ घटें पहले संयुक्तराष्ट्र विकास कार्यक्रम (यू एन डी पी) ने भी एक रिपोर्ट जारी की जो दुनिया के देशों के अलावा भारत के राज्यों में लोगों की गरीबी -जनित अभाव की स्थिति को लेकर है जिसे बहु-आयामी गरीबी सूचकांक (मल्टी -डायमेंशनल पावर्टी इंडेक्स –एम् पी आई) कहते है. दरअसल इस सूचकांक को सन २०१० में मानव विकास सूचकांक के सभी तीन पैरामीटर्स --–जीवन -स्तर, शैक्षणिक और स्वास्थ्य-संबंधी--- और उनसे पैदा हुए अभाव के कुल दस पैरामीटर्स को लेकर बनाया गया है. इसके अनुसार जहाँ केरल हमेशा की तरह अव्वल रहा है वहीँ बिहार हमेशा की तरह सबसे नीचे के पायदान पर. शायद विंस लोम्बार्डी के उस मशहूर कथन को चरितार्थ करते हुए --- विनिंग इज अ हैबिट, अनफोर्चुनेटली सो इज लूजिंग” (जीतना एक आदत होती है , दुर्भाग्य से हारना भी). इस नयी रिपोर्ट में बताया गया था कि जहाँ भारत ने पिछले दस सालों में याने २००५-०६ से २०१५-१६ तक अपनी गरीबी (५५ प्रतिशत से २८ प्रतिशत) आधी ख़त्म कर ली वहीँ कुछ राज्य जैसे बिहार, झारखण्ड, उत्तर प्रदेश , और मध्य प्रदेश अभी भी घिसटते हुए चल रहे हैं और इनमें देश के कुल गरीबों का आधे से ज्यादा (१९.६० करोड़) शाश्वत गरीबी और तज्जनित अभाव की गर्त से निकलने की आस में तिल-तिल कर मर रहे हैं. यू एन डी पी के वे दस पैरामीटर्स हैं : पोषण, बाल मृत्यु , स्कूल जाने का काल, स्कूल में उपस्थिति, खाना बनाने वाले ईंधन की उपलब्धता, स्वच्छता, पेय जल, बिजली के उपलब्धता , घर और संपत्ति.. रिपोर्ट के अनुसार, इन दस पैरामीटर्स में से सात में बिहार, दो में झारखण्ड (और उनमे से एक में मध्य प्रदेश भी साथ में )और एक में उत्तर प्रदेश सबसे नीचे हैं जबकि ठीक इसके उलट केरल दस में से आठ में , एक में दिल्ली और एक में पंजाब सबसे ऊपर हैं.    
आखिर वजह क्या है इस हिंदी पट्टी के कुछ राज्यों के शाश्वत उनीदेपन का या यूं कहें कि विकास न करने की जिद की ? मोब लिंचिंग (भीड़ न्याय) में तो यही राज्य भारत में सबसे अव्वल हैं? अर्थात इन समाजों में सामूहिक चेतना जबरदस्त है जो गाय, बैल , वन्दे मातरम , धार्मिक उन्माद को लेकर अचानक सड़क पर हीं न्याय कर डालती है फिर जो हाथ किसी को मारने के लिए उठते हैं वही बच्चे को पोषक भोजन खिलाने के लिए क्यों नहीं या उस ठेकेदार के खिलाफ आवाज उठाने में क्यों नहीं जो उसके गाँव से निकलने वाली सड़क ऐसी बनाता है जो एक बरसात के बाद तालाब में तब्दील हो जाती है, या उस व्यक्ति या व्यक्ति-समूह के खिलाफ आवाज उठाने में क्यों नहीं जो महीनों और सालों अनाथ आश्रम में मासूम बच्चियों से बलात्कार करते रहे हैं ? कैसे कोई खतरनाक आपराधिक पृष्ठभूमि वाला गुंडा चुनाव-दर -चुनाव इसी जनता के मत हासिल करते हुए देश के प्रजातंत्र के सबसे “पवित्र” मंदिर पहुँच जाता है? क्या तब यह सामूहिक चेतना विलुप्त हो जाती है ? राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (चौथा चक्र) के रिपोर्ट का जिक्र करते हुए बिहार के समाज कल्याण विभाग ने भी माना है कि प्रदेश में पैदा होने वाला हर दूसरा बच्चा (४८.३ प्रतिशत) कुपोषण -जनित ठूंठपन (नाटा) या कम वजन का हो रहा है याने भविष्य में एक बीमार नागरिक के रूप रहेगा—शारीरिक हीं नहीं मानसिकरूप से भी. 
विकास से परहेज का एक और उदाहरण देखें. प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना अपनी पूर्ववर्ती तीन योजनाओं के मुकाबले एक बेहद अच्छी योजना है लेकिन बिहार एक एकेला राज्य था जिसने शुरू से हीं इसका विरोध किया किसी न किसी बहाने. राज्य की अपनी स्वयं की योजना अमल के अभाव में दम तोड़ रही है नतीजा यह कि हाल में नाबार्ड द्वारा जारी किसानों की आय संबंधी रिपोर्ट के अनुसार झारखण्ड, उत्तर प्रदेश , बिहार और मध्य प्रदेश सबसे नीचे है वहीँ पंजाब और हरियाणा सबसे ऊपर. यू एन डी पी के रिपोर्ट के अनुसार इन गरीबों में जहाँ अनुसूचित जनजाति का हर दूसरा व्यक्ति है उच्च जाति का हर सातवाँ , ईसाई समाज का हर छठवां और मुसलमान समुदाय का हर तीसरा.  
     आपराधिक उदासीनता का कारण
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   परिवार नियोजन के अमल में पिछले कई दशकों से पूरी तरह असफल या आपराधिकरूप से उदासीन रहने वाला अगर कोई राज्य  रहा है  तो वह है बिहार. आज बिहार का आबादी घनत्व ११०५ व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर राष्ट्रीय औसत से तीन गुना ज्यादा है जबकि उत्तर प्रदेश का लगभग दूना. इस वर्ष के १० मार्च को जनसँख्या नियंत्रण पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुपालन में एक कार्यक्रम में बोलते हुए केंद्र सरकार के परिवार नियोजन विभाग के उपायुक्त एस के सिकधर ने बताया कि बिहार की सरकार लगभग हर दूसरे दंपत्ति को परिवार नियोजन के आधुनिक उपादान उपलब्ध करने में असफल रही है. यह शायद उदासीनता की पराकाष्ठा है और वह भी तब जबकि सरकारें यह जानती हैं कि देश में सर्वाधिक जनसँख्या वृद्धि दर में अव्वल बिहार की गरीबी और तज्जनित अभाव का कारण भी यही जनसँख्या है. इस पर तुर्रा यह कि जहाँ जागरूक दम्पत्तियों को आधुनिक गर्भ निरोधक उपादान उपलब्ध नहीं हैं वहीँ इनके प्रति जागरूकता भी नगण्य (मात्र तीन से चार प्रतिशत ) है. दशकों तक सरकारों की तरफ से जागरूकता अभियान के अभाव में बिहार में हर आठवां बच्चा १८ साल से कम की मां द्वारा पैदा किया जाता है यही वजह है कि बाल- एवं जननी- मृत्यु दर भी ज्यादा है. उधर राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की एक रिपोर्ट के अनुसार झारखण्ड में हर चौथे दिन मानसिकरूप से बीमार महिला की ईंट से मर कर हत्या कर दी जाती है यह मानते हुए कि डायन है और पूरे गाँव को खा जायेगी. साथ दशकों से प्रजातान्त्रिक ढंग से चुनी सरकारें बिहार या झारखण्ड में अपेक्षाकृत अशिक्षित जनता को यह नहीं समझा पायी कि भीड़ किसी महिला को जान से नहीं मार सकती और न हीं “डायन” का डर हटा पाई. 
शायद लोम्बार्डी सही थे --- हार इन हिंदी पट्टी के राज्यों की आदत है . 

jagran





Tuesday, 22 May 2018

सत्यमेव जयते याने जो जीता वही सत्य



भारतीय प्रजातंत्र की परिभाषा लिंकन के प्रजातंत्र से अलग है। इसी साल की ३१ जनवरी को ब्रिटेन में एक मंत्री लार्ड माइकेल बैट्स ने सदन में कुछ मिनट लेट पहुँचने पर पद से इस्तीफ़ा यह कहते हुए दिया कि सदन में प्रश्नकर्ता को जवाब देने के लिए वह निश्चित समय पर न पहुँच सके जो कि असभ्यता (डिसकर्टसी) है”. आज से लगभग ९० साल पहले ब्रिटेन की लेबर पार्टी के प्रधानमंत्री राम्से म्क डोनाल्ड की सरकार को इस बात पर इस्तीफा देना पड़ा कि “कैम्पबेल घटना” में राजनीतिक कारणों से एक व्यक्ति के ऊपर से आपराधिक मुकदमें उठाने का फैसला लिया था”.
गणतंत्र बनने के दिन से हीं मुण्डकोपनिषद का श्लोक ३:: ६ “सत्यम एव जयते न अनृतम” (सत्य की हीं जीत होती है, असत्य की नहीं” भारत का ध्येय वाक्य था, है और रहेगा. याने अगर जब कर्नाटक चुनाव के परिणाम आये और भारतीय जनता पार्टी को सबसे ज्यादा १०४ सीटें मिलीं तो वह सत्य था लेकिन जब परिणाम आने के कुछ हीं घंटों में कांग्रेस ने ७८ सीटें जीत कर भी जनता दल (एस) के नेता जो मात्र ३८ सीटें हासिल कर पाए, साझा सरकार में मुख्यमंत्री बनाने का फार्मूला बनाया तो सत्य अचानक उधर जाने लगा. उधर संविधान के “अभिरक्षक”, “परिरक्षक” और “संरक्षक” ने रूप में शपथ लेने वाले राज्य के राज्यपाल वजूभाई वाला ने फिर सत्य पलट दिया और भाजपा के येद्दियुरप्पा को शक्ति -परीक्षण का समय दे कर और अगले २४ घंटों में शपथ दिलवा कर सत्य की दिशा फिर मोड़ दी. देश की सर्वोच्च न्यायलय के न्यायाधीशों ने शपथ तो संविधान में निष्ठा (न कि अभिरक्षण) की ली थी लेकिन त्रि-सदस्यीय बेंच ने इस काम में आगे बढ़ते हुए इस समय सीमा को घटा कर १५ दिन से २४ घंटे कर दिया. शायद उन्हें भी लगा कि इस देश के विधायक समय और मौका मिलने पर सत्य बदलने की क्षमता रखते हैं. और हुआ भी यही. सत्य ने एक बार फिर पल्टी मारी जब चारों तरफ सी घिरे ए सी बसों में कांग्रेस और जनता दल (एस) के विधायकों को बाज की तरह झपटने वाले भारतीय जनता पार्टी के “सत्य के रक्षक” नहीं छीन पाए. और अंत में मुख्यमंत्री को फिर भी इस नए अयाचित सत्य का दामन थामते हुए बगैर अंतिम सत्य (फ्लोर टेस्ट) का सामना किये पद छोड़ना पड़ा.
सोचने की बात यह है कि अगर सत्य की हीं जीत होती है तो क्या सत्य भी काल -सापेक्ष या स्थिति -सापेक्ष होता है? मई १९, २०१८ के २ बजे तक का सत्य कुछ और था और जब विधायक प्रलोभन में (शायद समयाभाव और स्थिति-विहीनता के कारण ) नहीं आ पाए तो सत्य कुछ हीं घंटों में बदल गया? अगर कांग्रेस सर्वोच्च न्यायालय नहीं जाती तो आज सत्य का स्वरुप कुछ और होता या अगर भाजपा रिसोर्ट/होटलों का किला तोड़ने में सफल होती तो भी सत्य कुछ और होता या फिर अगर कांग्रेस २४ घंटे पहले जिस दल के खिलाफ तमाम आरोप लगाते हुए जनता के वोट हासिल कर ७८ सीटें लाई थी उसी के मुखिया के हाथ प्रदेश की बागडोर देने की हद तक न गयी होती तो भी सत्य कुछ और होता. और अंत में, अगर भारतीय जनता पार्टी वाजपेयी की पार्टी होती और नैतिकता (यह भी सत्य स्थापित करने का एक टूल होता है जिसे हर कोई अपनी अनैतिकता को ढकने के लिए इस्तेमाल करता है) के आधार पर यह कहती कि जनता ने हमें पूर्ण बहुमत नहीं दिया है लिहाज़ा हम सरकार बनाने का दावा नहीं पेश करेंगे, तो सत्य कुछ और होता. इस अंतिम विकल्प का मतलब यह नहीं कि भाजपा का सत्य (यहाँ पर सत्ता पाना) के प्रति की कोई आग्रह नहीं है बल्कि यह शुद्ध रणनीति होती कि इन्हें भी (कुमारस्वामी को ) राज्यपाल संविधान की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत १५ दिन का समय देते और इस दौरान मिले समय को भाजपा के रणनीतिकार “सत्य की खोज” में गुपचुप रूप से पूरी तल्लीनता के साथ लग कर कांग्रेस और जद() के “छुट्टा” उपलब्ध विधायकों को अपने पाले में कर फ्लोर टेस्ट में सरकार गिरा सकते थे. लेकिन शायद इन रणनीतिकारों का सत्य के प्रति आग्रह इतना प्रबल था कि वह अपने सत्याग्रह को रोक नहीं पाए और कई घुमाव के बाद आखिरकार सत्य उनके हाथ आते-आते फिसल गया क्योंकि “अंतरात्मा की आवाज” मात्र २४ घटें में नहीं जगती. कई वादे और उन पर भरोसे के साथ साथ नकदी का आदान -प्रदान भी आत्मा जगाने में उत्प्रेरक की भूमिका निभाता है.
और फिर हम यह क्यों मान लें कि येद्दियुरप्पा का इस्तीफा हीं मूल सत्य है. अभी तो उन्हीं की तरह कुमारस्वामी की भावी सरकार का भी फ्लोर टेस्ट बाकि है. कार्यकर्त्ता के स्तर पर अभी से हीं कांग्रेस और जद() के बीच रोज झगडे शुरू हो गए हैं. थोडा इन्तेजार करने पर फिर भाजपा को सत्य पलटने का मौका मिल जाएगा और वह सत्य नैतिकता की तराजू पर भी जन-अभिमत में खरा उतरेगा.
मई १५ के चुनाव नतीजों के बाद हमारे पास तीन मूल्य “सत्य” थे. पहला : भाजपा सबसे बड़ी होकर उभरी पर स्पष्ट बहुमत नहीं था. कांग्रेस सत्ता -विरोधी भाव (एंटी-इनकम्बेंसी) के बावजूद मतों में भाजपा से १.८ प्रतिशत ज्यादा रही. लेकिन संविधान का सत्य सदस्यों की संख्या के आधार पर होता है लिहाज़ा भाजपा बजाहिर तौर पर सबसे बड़ी जीत की हकदार थी. लेकिन एक सत्य और भी बचा था फ्लोर परीक्षण में स्पष्ट बहुमत पाना जिसमें सत्य उसे गच्चा दे गया. नतीजा यह कि ३८ सदस्य वाली पार्टी ने ७८ सदस्य वाले राष्ट्रीय दल के साथ मिलकर सत्य को दबोच लिया. और आज सत्यमेव जयते नानृतम (सत्य की हीं जीत होती है झूठ की नहीं “ का मतलब कई बार बदलते हुए फिलहाल इस तर्क वाक्य में समाहित हो गया कि “जो जीता वही सत्य”.
अब्राहिम लिकन का प्रजातंत्र “जनता द्वारा , जनता के लिए और जनता की सरकार” भारत में शायद एक नए दौर से गुजर रहा है जिसमें जनता शब्द वोक्कालिगा, लिंगायत, हिन्दू , मुसलमान , आरक्षण , अल्पसंख्यक का दर्ज़ा दिलाने का वादा आदि की संख्यात्मक गुणवत्ता में, जीतने के बाद पद और पैसे के लालच में आने या न आने में एक नयी परिभाषा गढ़ रहा है. और यह आज से नहीं बल्कि गणतंत्र बनने के बाद जैसे हीं हमने मुण्डकोपनिषद का यह ध्येय वाक्य अंगीकार किया, तब से इस नयी परिभाषा से लिंकन की परिभाषा को परिमार्जित करते रहे हैं. याने जो जीता वही सत्य .
तत्कालीन कुछ भारतीय और अंग्रेज विद्वानों को लिंकन की प्रजातंत्र की परिभाषा बदलने की भारत के समाज की क्षमता का भान था. लगभग सौ साल से अँगरेज़ मना करते रहे कि ब्रितानी संसदीय प्रणाली भारत के लिए अभी उपयुक्त नहीं है लेकिन तत्कालीन नेताओं की जिद के तहत यह व्यवस्था अपनाई गयी. इसका नतीजा यह रहा कि संसदीय फॉर्मेट तो हमने ब्रिटेन का ले लिया पर उसको चलने के लिए जो व्यक्तिगत और सामूहिक नैतिक संबल चाहिए था वह नदारत रहा.


lokmat

Monday, 14 May 2018

चार साल मोदी सरकार: क्या बताएँगे !




इस माह के २६ तारीख़ को जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने शासन का चार साल पूरा करेंगे तो कर्नाटक के चुनाव परिणाम आ चुके होंगे. अगला एक साल काम करने से ज्यादा काम बताकर जनता को प्रभावित करने का होगा और वह भी एक ऐसे समय में जब विपक्षी एकता की रूप-रेखा राजनीतिक क्षितिज में दिखाई देने लगी है. यही वजह हैं कि दो दिन पहले प्रधानमंत्री ने सभी मंत्रालयों से रिपोर्ट माँगी है कि परोक्ष या प्रत्यक्ष तौर पर पिछले चार साल में कितने रोजगार पैदा हुए हैं और सरकारी योजनाओं ने सकल घरेलू उत्पाद में क्या योगदान किया है. दरअसल मोदी जानते हैं कि विपक्ष के हाल में देश की हीं नहीं कई विश्व संस्थाओं—जैसे अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आई एल ओ) -- ने भी भारत में बेरोजगारी की स्थिति पर चिंता व्यक्त की है और आंकड़ें पेश किये हैं. दो माह पहले भी पी एम ओ की एक आतंरिक रिपोर्ट में तमान अच्छे और अपूर्व सरकारी कार्यक्रमों के बावजूद क्रियान्वयन के स्तर पर अफसरशाही की उदासीनता की बात कही गयी थी. प्रधानमंत्री का दुःख उस समय उजागर हुआ जब विगत २१ अप्रैल को लोकसेवा दिवस (सिविल सर्विसेज डे) के अवसर पर अफसरों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा : सिस्टम बदलना होगा क्योंकि एक फाइल ३२ जगह घूमने के बाद भी “मोक्ष” नहीं पा रही है “.

अच्छी नीतियों की दो बानगियाँ देखें. आजाद भारत में पहली बार जबरदस्त कर सुधार के लिए जी एस टी लाई गयी, और कालाधन ख़त्म करने के लिए नोटबंदी. यह एक हाई स्कूल का बच्चा भी समझ सकता है कि ये दोनों नीतियां शुरू में जनता को तकलीफ भी देगी और भ्रष्ट लेकिन सिस्टम में ताकतवर लोगों को तकलीफ भी. सरकार को यह भी दर होगा कि वह जनाक्रोश की भागी बनेगी. लेकिन उद्देश्य बेहद सार्थक था लेकिन एक के कारण व्यापार पर असर पडा और दूसरी ने रोजगार की स्थिति और खराब की. इस का कारण अमल सही तरीके से न होना था. प्रधानमंत्री आवास योजना में राज्य और केंद्र-शासित प्रदेशों ने कुल ७४.४८ लाख आवास बनाने का लक्ष्य रखा लेकिन विगत ३१ मार्च तक (चार साल में ) मात्र ३३ लाख हीं बन सके. आरोप है कि इनमें से बड़ा भाग भ्रष्टाचार और गलत आंकड़ों की भेट चढ़ गया जैसा कि शौचालयों को लेकर भी आरोप है. आज शौचालय के नाम पर खोखे खड़े हैं जो आंधी में ढह रहे हैं.
पी एम् ओ ने इस रिपोर्ट में अफसरशाही उदासीनता पर नाराजगी भी व्यक्त की. बजट में इसीलिये दो नयी योजनायें दी ----- दस करोड़ गरीब परिवारों को पांच लाख का स्वास्थ्य बीमा मुफ्त (दुनिया का सबसे बड़ा स्वास्थ्य गारंटी योजना ) और किसानों को उनकी लागत का १५० प्रतिशत समर्थन मूल्य याने ५० प्रतिशत लाभ. अगर ये योजनायें चुनाव के साल में १० प्रतिशत भी अमल में आ सकें तो मोदी सन २०१४ से ज्यादा मजबूत स्थिति में हो सकते हैं लेकिन न तो यह स्पष्ट हुआ किसानों की लागत के लिए कौन सा फार्मूला लागू होगा ---- अलाभकारी ए-२ प्लस ऍफ़ एल या स्वामीनाथन द्वारा अनुमोदित सी -२ जो वाकई किसानों की तकदीर बदल सकता है. रबी खासकर गेहूं की खरीद के डेढ़ माह ख़त्म होने को हैं. साथ ही दस करोड़ परिवार के लिए स्वास्थ्य सेवा केवल पात्रता वाले कागज के टुकडे से नहीं बल्कि अस्पताल और डॉक्टरों की उपलब्धता से होता है. अभी तक इस दिशा चार माह बीतने के बाद भी कुछ भी काम नहीं हुआ है.
ऐसा नहीं है कि योजनाओं में कमी है या उन्हें अमल में लाने में कोई राजनीतिक इच्छा -शक्ति का कमी है. दरअसल जो तथ्य मोदी या पार्टी अध्यक्ष अमित शाह नहीं समझ रहे हैं वह है प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं और जन-प्रतिनिधियों का कट्टर हिन्दुत्त्व के भाव, संकेत और प्रतीकों को इन योजनाओं के मुकाबले तरजीह देना और हर दिन एक नया विवाद खड़ा करना ---कभी जिन्ना के नाम पर तो कभी लव जिहाद बता कर. जन-प्रतिनिधि शायद हीं मोदी के प्रधानमंत्री आवास योजना को लेकर अधिकारियों या जनता से संपर्क करता है. अधिकांश तो इन योजनाओं के बारे में जानते भी नहीं.

आइये , एक निरपेक्ष विश्लेषण के लिए तथ्यों पर गौर करें. एक हीं दिन अख़बारों में तीन ख़बरें थी. भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने देश के एक बड़े हिंदी दैनिक को दिए गए एक साक्षात्कार में कहा :जनता विकास चाहती है और भाजपा विकास करना जानती है. प्रजातंत्र को मजबूत करने में देश की सबसे बड़ी पार्टी के मुखिया का यह सन्देश बेहद गंभीरतापूर्ण, समीचीन और शिक्षाप्रद है. दूसरी खबर में एक वीडिओ वायरल हुआ और ख़बरों में आया जिसमें इसी पार्टी का एक सांसद किसी को आदेश दे रहा है “सभी गाड़ियाँ रोक दो. मुझे १० मिनट में वैशाली एक्सप्रेस यहाँ चाहिए”. इस ट्रेन से पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्रनाथ पाण्डेय सांसद के क्षेत्र में एक कार्यक्रम में भाग लेने उस स्टेशन पर आ रहे थे. वीडियो वायरल होने के कुछ घंटे बाद जब एक मीडियाकर्मी ने पूछा तो उनका जवाब था “मैं अपने एक कार्यकर्त्ता से बात कर रहा था न कि किसी रेल अधिकारी से”. याने अपने बचाव में दिया गया जबाव पहले वाले से भी ज्यादा डरावना ... कार्यकर्ता गाडी रोक सकता है या वैशाली एक्सप्रेस सांसद की इच्छानुसार मिनटों में इच्छित स्टेशन पर ला खडा कर सकता है. तीसरी खबर थी इसी पार्टी के एक विधायक ने अपनी एक जनसभा में बाल विवाह फिर से शुरू करने की वकालत इस आधार पर की कि ऐसा करने से “लव जेहाद रूक जाएगा”. विधायक ने बाल विवाह निरोधक कानून को बीमारी बताई और इस कानून को ख़त्म करना निदान. ८९ वर्ष पहले सन १९२९ में जब ब्रितानी हुकूमत ने यह कानून बनाया था तो सन १९२५ में केन्द्रीय लेजिस्लेटिव असेंबली में उस समय भी कुछ हिन्दू सदस्यों ने जैसे टी रंगैयाचारी आदि ने इसका विरोध यह कह कर किया था अगर लडकी दस साल से अधिक की हो जाती है तो कोई उससे शादी नहीं करता—खासकर जमींदार. आज कई दशकों बाद एक विधायक भी उसी कानून को बीमारी की जड़ बता रहा है. यह कुछ ऐसा हीं समाधान है कि अगर बलात्कार हो रहा है तो लड़कियों को घर से बाहर पढने भेजते हीं क्यों हो.

ये सांसद या विधायक अगर उसी शिद्दत से जिससे ट्रेन रुकवाने का माद्दा रखते हैं , प्रधानमंत्री के कार्यक्रमों पर सरकारी तंत्र से अमल करवाते तो मोदी का शसन दुनिया में एक एक आदर्श शसन माना जाता. लेकिन ये शायद हीं अपने क्षेत्र में मोदी के कार्यक्रम और नीतियों के बारे में जनता को बताने गए हों या ठीक से जानते भी हों लेकिन सुशासन पर कलक के रूप में अपनी मोहर जरूर लगा दे रहे हैं.

आज अगर मोदी को २०१४ वाली जन-स्वीकार्यता फिर से हासिल करनी है तो पूरे एक साल तक कट्टर हिन्दुवाद के तथाकथित अलंबरदारों पर पाबन्दी लगानी होगी और स्वास्थ्य बीमा योजना और किसानों की आय बढ़ने वाली योजनाओं पर २४ घंटे काम करना होगा भाजपा के विधायक और सांसदों को क्षेत्र में जा कर इन कार्यों का प्रचार और अमल के स्तर पर निगरानी करनी होगी.

lokmat