Monday, 14 May 2018

चार साल मोदी सरकार: क्या बताएँगे !




इस माह के २६ तारीख़ को जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने शासन का चार साल पूरा करेंगे तो कर्नाटक के चुनाव परिणाम आ चुके होंगे. अगला एक साल काम करने से ज्यादा काम बताकर जनता को प्रभावित करने का होगा और वह भी एक ऐसे समय में जब विपक्षी एकता की रूप-रेखा राजनीतिक क्षितिज में दिखाई देने लगी है. यही वजह हैं कि दो दिन पहले प्रधानमंत्री ने सभी मंत्रालयों से रिपोर्ट माँगी है कि परोक्ष या प्रत्यक्ष तौर पर पिछले चार साल में कितने रोजगार पैदा हुए हैं और सरकारी योजनाओं ने सकल घरेलू उत्पाद में क्या योगदान किया है. दरअसल मोदी जानते हैं कि विपक्ष के हाल में देश की हीं नहीं कई विश्व संस्थाओं—जैसे अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आई एल ओ) -- ने भी भारत में बेरोजगारी की स्थिति पर चिंता व्यक्त की है और आंकड़ें पेश किये हैं. दो माह पहले भी पी एम ओ की एक आतंरिक रिपोर्ट में तमान अच्छे और अपूर्व सरकारी कार्यक्रमों के बावजूद क्रियान्वयन के स्तर पर अफसरशाही की उदासीनता की बात कही गयी थी. प्रधानमंत्री का दुःख उस समय उजागर हुआ जब विगत २१ अप्रैल को लोकसेवा दिवस (सिविल सर्विसेज डे) के अवसर पर अफसरों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा : सिस्टम बदलना होगा क्योंकि एक फाइल ३२ जगह घूमने के बाद भी “मोक्ष” नहीं पा रही है “.

अच्छी नीतियों की दो बानगियाँ देखें. आजाद भारत में पहली बार जबरदस्त कर सुधार के लिए जी एस टी लाई गयी, और कालाधन ख़त्म करने के लिए नोटबंदी. यह एक हाई स्कूल का बच्चा भी समझ सकता है कि ये दोनों नीतियां शुरू में जनता को तकलीफ भी देगी और भ्रष्ट लेकिन सिस्टम में ताकतवर लोगों को तकलीफ भी. सरकार को यह भी दर होगा कि वह जनाक्रोश की भागी बनेगी. लेकिन उद्देश्य बेहद सार्थक था लेकिन एक के कारण व्यापार पर असर पडा और दूसरी ने रोजगार की स्थिति और खराब की. इस का कारण अमल सही तरीके से न होना था. प्रधानमंत्री आवास योजना में राज्य और केंद्र-शासित प्रदेशों ने कुल ७४.४८ लाख आवास बनाने का लक्ष्य रखा लेकिन विगत ३१ मार्च तक (चार साल में ) मात्र ३३ लाख हीं बन सके. आरोप है कि इनमें से बड़ा भाग भ्रष्टाचार और गलत आंकड़ों की भेट चढ़ गया जैसा कि शौचालयों को लेकर भी आरोप है. आज शौचालय के नाम पर खोखे खड़े हैं जो आंधी में ढह रहे हैं.
पी एम् ओ ने इस रिपोर्ट में अफसरशाही उदासीनता पर नाराजगी भी व्यक्त की. बजट में इसीलिये दो नयी योजनायें दी ----- दस करोड़ गरीब परिवारों को पांच लाख का स्वास्थ्य बीमा मुफ्त (दुनिया का सबसे बड़ा स्वास्थ्य गारंटी योजना ) और किसानों को उनकी लागत का १५० प्रतिशत समर्थन मूल्य याने ५० प्रतिशत लाभ. अगर ये योजनायें चुनाव के साल में १० प्रतिशत भी अमल में आ सकें तो मोदी सन २०१४ से ज्यादा मजबूत स्थिति में हो सकते हैं लेकिन न तो यह स्पष्ट हुआ किसानों की लागत के लिए कौन सा फार्मूला लागू होगा ---- अलाभकारी ए-२ प्लस ऍफ़ एल या स्वामीनाथन द्वारा अनुमोदित सी -२ जो वाकई किसानों की तकदीर बदल सकता है. रबी खासकर गेहूं की खरीद के डेढ़ माह ख़त्म होने को हैं. साथ ही दस करोड़ परिवार के लिए स्वास्थ्य सेवा केवल पात्रता वाले कागज के टुकडे से नहीं बल्कि अस्पताल और डॉक्टरों की उपलब्धता से होता है. अभी तक इस दिशा चार माह बीतने के बाद भी कुछ भी काम नहीं हुआ है.
ऐसा नहीं है कि योजनाओं में कमी है या उन्हें अमल में लाने में कोई राजनीतिक इच्छा -शक्ति का कमी है. दरअसल जो तथ्य मोदी या पार्टी अध्यक्ष अमित शाह नहीं समझ रहे हैं वह है प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं और जन-प्रतिनिधियों का कट्टर हिन्दुत्त्व के भाव, संकेत और प्रतीकों को इन योजनाओं के मुकाबले तरजीह देना और हर दिन एक नया विवाद खड़ा करना ---कभी जिन्ना के नाम पर तो कभी लव जिहाद बता कर. जन-प्रतिनिधि शायद हीं मोदी के प्रधानमंत्री आवास योजना को लेकर अधिकारियों या जनता से संपर्क करता है. अधिकांश तो इन योजनाओं के बारे में जानते भी नहीं.

आइये , एक निरपेक्ष विश्लेषण के लिए तथ्यों पर गौर करें. एक हीं दिन अख़बारों में तीन ख़बरें थी. भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने देश के एक बड़े हिंदी दैनिक को दिए गए एक साक्षात्कार में कहा :जनता विकास चाहती है और भाजपा विकास करना जानती है. प्रजातंत्र को मजबूत करने में देश की सबसे बड़ी पार्टी के मुखिया का यह सन्देश बेहद गंभीरतापूर्ण, समीचीन और शिक्षाप्रद है. दूसरी खबर में एक वीडिओ वायरल हुआ और ख़बरों में आया जिसमें इसी पार्टी का एक सांसद किसी को आदेश दे रहा है “सभी गाड़ियाँ रोक दो. मुझे १० मिनट में वैशाली एक्सप्रेस यहाँ चाहिए”. इस ट्रेन से पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्रनाथ पाण्डेय सांसद के क्षेत्र में एक कार्यक्रम में भाग लेने उस स्टेशन पर आ रहे थे. वीडियो वायरल होने के कुछ घंटे बाद जब एक मीडियाकर्मी ने पूछा तो उनका जवाब था “मैं अपने एक कार्यकर्त्ता से बात कर रहा था न कि किसी रेल अधिकारी से”. याने अपने बचाव में दिया गया जबाव पहले वाले से भी ज्यादा डरावना ... कार्यकर्ता गाडी रोक सकता है या वैशाली एक्सप्रेस सांसद की इच्छानुसार मिनटों में इच्छित स्टेशन पर ला खडा कर सकता है. तीसरी खबर थी इसी पार्टी के एक विधायक ने अपनी एक जनसभा में बाल विवाह फिर से शुरू करने की वकालत इस आधार पर की कि ऐसा करने से “लव जेहाद रूक जाएगा”. विधायक ने बाल विवाह निरोधक कानून को बीमारी बताई और इस कानून को ख़त्म करना निदान. ८९ वर्ष पहले सन १९२९ में जब ब्रितानी हुकूमत ने यह कानून बनाया था तो सन १९२५ में केन्द्रीय लेजिस्लेटिव असेंबली में उस समय भी कुछ हिन्दू सदस्यों ने जैसे टी रंगैयाचारी आदि ने इसका विरोध यह कह कर किया था अगर लडकी दस साल से अधिक की हो जाती है तो कोई उससे शादी नहीं करता—खासकर जमींदार. आज कई दशकों बाद एक विधायक भी उसी कानून को बीमारी की जड़ बता रहा है. यह कुछ ऐसा हीं समाधान है कि अगर बलात्कार हो रहा है तो लड़कियों को घर से बाहर पढने भेजते हीं क्यों हो.

ये सांसद या विधायक अगर उसी शिद्दत से जिससे ट्रेन रुकवाने का माद्दा रखते हैं , प्रधानमंत्री के कार्यक्रमों पर सरकारी तंत्र से अमल करवाते तो मोदी का शसन दुनिया में एक एक आदर्श शसन माना जाता. लेकिन ये शायद हीं अपने क्षेत्र में मोदी के कार्यक्रम और नीतियों के बारे में जनता को बताने गए हों या ठीक से जानते भी हों लेकिन सुशासन पर कलक के रूप में अपनी मोहर जरूर लगा दे रहे हैं.

आज अगर मोदी को २०१४ वाली जन-स्वीकार्यता फिर से हासिल करनी है तो पूरे एक साल तक कट्टर हिन्दुवाद के तथाकथित अलंबरदारों पर पाबन्दी लगानी होगी और स्वास्थ्य बीमा योजना और किसानों की आय बढ़ने वाली योजनाओं पर २४ घंटे काम करना होगा भाजपा के विधायक और सांसदों को क्षेत्र में जा कर इन कार्यों का प्रचार और अमल के स्तर पर निगरानी करनी होगी.

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Wednesday, 9 May 2018

नीतीश एक बार फिर पल्टी मारने की फ़िराक में ?




पिछले अप्रैल १५ को पटना में जो “दीन बचाओ देश बचाओ” रैली हुई थी उसमें बिहार के हीं नहीं आस-पास के कई राज्यों के मुसलमान और दलित शामिल हुए थे. इस रैली में मंच से आयोजकों ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जम कर तारीफ की और एक बार भी राज्य में हुए सांप्रदायिक तनाव और झगड़ों का जिक्र नहीं किया. माना जा रहा है कि यह रैली नीतीश के शाह पर हीं हुई थी और सरकारी अमला ने इसके लिए गाडियों तक उपलब्ध कराई थी. अनौपचारिक रूप से जिलों के अफसरों को निर्देश था कि वे रैली के बैनर लगी गाड़ियों को न रोकें. सत्ता में एक बार फिर से सहयोगी बनी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नीतीश के इस रवैये से सतर्क हो गयी है. लोक- सभा चुनाव मात्र के कुछ महीने बाद होने है. नीतीश के इस भाव के पीछे दो कारण है और दो विकल्प हैं. पहला कारण, रामनवमी के दौरान नए रास्तों से जुलूस निकलने की जिद के बाद करीब आधा दर्जन जिलों में हुई हिंसा, और दूसरा जिलों में कैडर के स्तर पर सत्ता में वर्चस्व को लेकर बढ़ता वैमनस्य. भाजपा के एक वर्ग चाहता है कि अगर जिले में कलेक्टर नीतीश की जनता दल (यूनाइटेड) के मन से हो तो एस पी भाजपा की राय से. जाहिर है भाजपा अपना विस्तार करना चाहेगी और इसके लिए शासक वर्ग से अपने लोगों के काम करना चाहेगी ताकि वोटर आधार बढे. नीतीश की पार्टी को ऐसे में कहीं न कहीं सिकुड़ना पडेगा या दोयम दर्जे के दल के रूप में धीरे-धीरे अपने अस्तित्व को भाजपा के बार-अक्श विलीन करना होगा याने नीतीश भाजपा के रहमो-करम पर अपनी राजनीतिक औचित्य बनाने को मजबूर होंगे. यही वजह है कि इस रैली के संयोजक और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव मौलाना वली रहमानी के दाहिने हाथ खालिद अनवर को नीतीश ने विधान परिषद् का सदस्य भी बनाया. इस रैली में बिहार हीं नहीं, झारखण्ड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के मुसलमानों ने भाग लिया था. रैली की व्यापकता भविष्य में विपक्षी गठबंधन के संकेत के रूप में देखा जा सकता है और साथ ही उस भविष्य में नीतीश की उसमें सक्रिय भूमिका भी हो सकती है.
नीतीश ने इसके प्रतिकार के दो रास्ते तलाशे हैं. पहला : राज्य के चुनाव एक साल पहले याने लोक-सभा के चुनाव के साथ २०१९ में हीं कराये जाएँ. ऐसी स्थिति में नीतीश भाजपा से यह सौदा कर सकते हैं—“राज्य हमारा और देश तुम्हारा” याने जदयू को ज्यादा सीटें विधान सभा चुनाव में और भाजपा को ज्यादा सीटें लोक सभा के लिए. दूसरा विकल्प है फिर एक बार वापस लालू यादव-तेजस्वी यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल के साथ २०१५ चुनाव की पुनरावृति करते हुए समझौता करना. “दीन बचाओ , देश बचाओ “ रैली में मुस्लिम-दलित वर्ग का जमवाड़ा था. एक ऐसे समय में जब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद तत्काल प्रतिक्रिया के अभाव में दलित भाजपा से नाराज है, दलित-मुस्लिम गठजोड़ शायद दूसरे विकल्प के लिए आगे का रास्ता खोल सकेगा. उधर मुसलमानों के अलावा पिछड़ी जातियों में यह भाव पनप रहा है कि लालू यादव के साथ अन्याय हुआ है क्योंकि वह पिछड़ी जाति से आते हैं. यहाँ तक कि उच्च जाती के और दबंग भूमिहार वर्ग ने भी जहानाबाद के उप चुनाव में राजद को वोट दिए. जहाँ लालू के पुत्र तेजस्वी यादव इन भूमिहार और ब्राह्मणों को साधने में लगे हैं (मनोज झा को राज्य सभा सदस्त बनाना इसी कड़ी में है) नीतीश का दलित और मुसलमानों को एक मंच पर लाना भाजपा के लिए अलार्म की घंटी बन गयी है. बहरहाल न तो भाजपा इस पर कुछ कहने की स्थिति में है न नीतीश पाने पत्ते पूरी तरह खोल रहे हैं.
उधर जहाँ केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने इसी रामनवमी के दौरान हुए दंगों के लिए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से रिपोर्ट मांगी वहीं बिहार में इसी अवसर पर भागलपुर, मुंगेर, औरंगाबाद, समस्तीपुर, रोहतास में हुए दंगों के लिए नीतीश सरकार से कुछ भी नहीं कहा क्योंकि डर था कि नीतीश के रिपोर्ट में कुछ ऐसे संगठनों के नाम आयेंगे जो भाजपा के नजदीक हैं.
बिहार में सब कुछ ठीक नहीं है. हो भी नहीं सकता. अगर भारत में प्रजातंत्र कहीं एक जगह अपने पूर्ण विकृत स्वरुप में है तो वह बिहार में. भ्रष्टाचार के अनेक मामलों में लालू यादव का २३ साल बाद जेल जाना भले हीं अदालती प्रक्रिया के तहत हुआ हो, जनता के एक बड़े वर्ग में इस नेता के प्रति सहानुभूति पैदा कर देता है. हाल के उप-चुनाव के नतीजे इसका ताज़ा उदाहरण हैं. जनता यह नहीं पूछती कि न्याय की तराजू इतने सालों तक क्यों नहीं हिली और कैसे यह सिस्टम एक भ्रष्टाचार के आरोपी हीं नहीं चार्ज-शीटेड नेता को चुनाव-दर-चुनाव “संविधान में निष्ठा” की शपथ व्यक्त करवा कर देश के मंत्री पद से नवाजता है? कैसे इस राज्य की जनता किसी खतरनाक और दर्ज़नों हत्याओं में आरोपी शहाबुद्दीन को एक बार नहीं पांच बार प्रजातंत्र के सबसे बड़े मंदिर--- लोक सभा—में चुन कर भेजती हैं ताकि वह कानून बना सके?
लोकोक्ति तो थी “यथा राजा तथा प्रजा” पर प्रजातंत्र में यह उलट गयी और “यथा प्रजा तथा राजा” के रूप में दिखाई देने लगी. राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का भले हीं अपना जनाधार नगण्य हो लेकिन यह प्रजातंत्र का विद्रूप चेहरा हीं है कि वह पिछले १३ साल से बिहार का “भाग्य” सुधार रहे हैं. इतने साल बाद भी प्रजा उन्हें नहीं समझ पायी और जब नीतीश ने भारतीय जनता पार्टी का दस साल से ज्यादा का “शासकीय साथ” छोड़ कर अंपने धुर विरोधी लालू यादव का—जिनको डेढ़ दशक से ज्यादा समय से कोसते आये थे , हाथ थाम लिया और उन्हें अल्पसंख्यकों और पिछड़ों का सबसे बड़ा मसीहा बताया और भाजपा को सांप्रदायिक बताने लगे. अभी सुहाग की मेहंदी सूखी भी नहीं थी कि पाला बदला जो दुनिया के प्रजातंत्र में एक अनूठी अनैतिकता कही जा सकती है, फिर भाजपा के साथ सरकार बना ली. राजनीति में नैतिकता के पतन का या जनमत के साथ इतना बड़ा धोखा शायद इससे पहले नहीं हुआ था.
परन्तु शायद भारत की खासकर धुर जातिवाद में बंटे बिहार की राजनीति में नैतिकता पर खड़ा रहना और जनमत के साथ धोखा न करना जंगल कानून में समानता का सिद्धांत शामिल करने जैसा है.


lokmat

Saturday, 28 April 2018

दुनिया में प्रजातन्त्र अंतिम सांसें ले रहा है ?




एकल नेतृत्व से विश्व -शांति खतरे में

समाजशास्त्रीय व राजनीतिक सिद्धांतों के अनुसार समय के साथ समाज अपने को बेहतर ढंग से संगठित करता है, भावनात्मक सोच पर वैज्ञानिक समझ को तरजीह दे कर बेहतर संस्थाएं तैयार करता है. तर्क पर आधारित विकास के सही पैमानों पर जनमत तैयार करता है और व्यक्तिगत स्वातंत्र्य के साथ समतामूलक समाज बनाते हुए बेहतर जीवन की और बढ़ता है. इसीलिए जंगल राज से जहाँ शक्ति हीं सत्य होता था, हम कबायली संस्कृति से होते हुए, सामंतवादी व्यवस्था और फिर राजशाही और अंत में आज प्रजातंत्र तक पहुंचे, जिसके तहत शासन कौन करे, इसके चुनाव में सैधांतिक रूप से राजा और रंक में भेद मिटा और दोनों की राय से शासन चलने लगा. लेकिन अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में हाल की कुछ घटनाओं से लगने लगा है कि दुनिया में प्रजातंत्र फेल होने लगा है. एकल, गैर-प्रजातान्त्रिक नेतृत्व का वर्चस्व बढ़ रहा है और लगातार प्रजातान्त्रिक अनौपचारिक हीं नहीं औपचारिक संस्थाएं --- जैसे संसद या न्यायपालिका या स्वस्थ और निरपेक्ष जन-विमर्श के धरातल (हैबरमास के शब्दों में स्फिअर्स ऑफ़ पब्लिक डिस्कोर्स) कमजोर पड़ते जा रहे हैं या मात्र ताली बजाने की भूमिका तक महदूद हो गए हैं. हाल के वर्षों में संसद का हफ़्तों न चलना इसकी एक बानगी है. इन संस्थाओं के लगातार सिकुड़ने से आज पृथ्वी पर तीसरे विश्व युद्ध का संकट मंडरा रहा है. जाहिर है कि अगर ऐसा होता है तो यह ७८ साल पहले हुए दूसरे विश्व युद्ध से अलग होगा जिसमें तमाम छोटे बड़े देशों में परोक्ष या प्रत्यक्ष नाभिकीय क्षमता की वजह से दुनिया का बचना मुश्किल होगा.
पिछले १३ अप्रैल को अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने बगैर अपने देश की कांग्रेस (संसद) की अनुमति के सेना को सीरिया पर अटैक करने के आदेश दिए. अमरीकी संविधान ने बिना किसी लाग-लपेट के अपने पहले अनुच्छेद () () () में युद्ध घोषित करने की शक्तियां मात्र कांग्रेस (संसद) में निहित की है. राष्ट्रपति सेना के मुख्य कमांडर के रूप में यह आदेश तभी दे सकता है जब संसद उसे पारित कर दे. लेकिन गलती केवल ट्रम्प की हीं नहीं है पिछले ७७ वर्षों में (द्वितीय विश्व युद्ध में राष्ट्रपति रूजवेल्ट ने जापान पर हमले के पहले अनुमोदन लिया था) किसी भी अमरीकी राष्ट्रपति ने संसद से युद्ध प्रस्ताव पर पूर्व-अनुमोदन नहीं लिया. अगर किसी राष्ट्रपति ने कभी अपनी उदारता दिखाते हुए संसद को सूचित किया भी तो मात्र “सहयोग” के लिए न की “पूर्व-अनुशंसा” के लिए. अमरीकी कांग्रेस पिछले तमाम दशकों में हुए दर्ज़नों हमलों के दौरान एक बार भी अपनी शक्ति (संवैधानिक दायित्व) के लिए तन कर नहीं खडी हुई. निक्सन ने वियतनाम युद्ध में जब इसे नज़रंदाज़ किया तो संसद कुछ हरकत में आयी और एक १९७३ में नियम पारित किया कि अगर आपात जैसे स्थिति हो तो राष्ट्रपति युद्ध शुरू करने के ६० दिन में संसद की अनुशंसा हासिल करे वरना युद्ध ख़त्म करे. उधर अमरीकी राष्ट्रपतियों का कहना है कि संविधान के अनुच्छेद २ ने उन्हें सेना का मुख्य कमांडर बनाते हुए और विदेश नीति और दौत्य सम्बन्ध की जिम्मेदारी देते हुए उन्हें विदेशी जमीन पर अमेरीकी हित की रक्षा में निर्बाध शक्तियां दी हैं. लेकिन हकीकत यह है कि अमरीकी संविधान निर्माताओं ने दोनों के बीच एक संतुलन बनाया था. संविधान जेम्स मेडिसन ने कांग्रेस की शक्तियों की व्याख्या करते हुए थॉमस जेफरसन को एक पत्र में बताया : कार्यपालिका शक्ति का वह संकाय है जो युद्ध में ज्यादा दिलचस्पी रखता है और इसके लिए हमेशा तत्पर रहता है. इसीलिए बहुत अध्ययन के बाद यह शक्ति विधायिका में निहित की गयी है”. संविधान बनने के करीब ६० साल (१८४८ मे) तत्कालीन युवा सांसद अब्राहिम लिंकन ने इस मुद्दे पर अपने विचार देते हुए कहा था : राजाओं ने हमेशा युद्ध में झोंक कर जनता को गरीब किया है और इसे न्यायोचित ठहराने के लिए इसे जनता के हित में बताया है. यही वजह है कि संविधान ने यह शक्ति किसी एक व्यक्ति में निहित नहीं होने दी” . ट्रम्प को जनता का मत इसलिए नहीं मिला था कि उनकी प्रजातान्त्रिक मूल्यों में बेहद आस्था थी बल्कि इसलिए कि वह राष्ट्रवाद की एक नयी परिभाषा गढ़ रहे थे युवाओं को रोजगार दिलाने के और इस्लामिक आतंकवाद के खिलाफ अपने कड़े रुख के कारण.
हाल में रूस में पुतिन की लगातार २० सालों में चौथी जीत पर नज़र डालें. पुतिन ने अपने प्रमुख विरोधी की उम्मेदवारी को ठीक चुनाव के पहले ख़ारिज करवा दिया. चुनाव प्रचार के दौरान उनका एक छोटा भाषण देशवासियों के मन को भाया जब उन्होंने कहा “रूस की नाभिकीय क्षमता दुनिया में सर्वश्रेष्ठ है पर दुनिया हमें सम्मान नहीं दे रही है. लेकिन अब उन्हें रूस को सम्मान देना पड़ेगा”. जाहिर है यह एक धमकी थी परमाणु युद्ध के दम पर अपनी चौधराहट हासिल करने की. जनता ने इसे भी पसंद किया. आज सीरिया को लेकर पुतिन अमरीका के खिलाफ जंग के लिए कभी भी कदम बढ़ा सकते हैं. और तब विश्व युद्ध को रोकना मुश्किल होगा.
चीन में माओत्से तुंग के बाद पहली बार तमाम अन्य संस्थाओं को ठेंगा दिखाते हुए शी जिनपिंग ने आजीवन पद पर रहने के लिए संविधान बदला. कहीं एक भी प्रदर्शन नहीं हुआ. इसका कारण था विरोध के स्वर को खत्म करना. एक उदाहरण : मानव अधिकार के अलमबरदार और अधिवक्ता यू वेन्शेंग ने राष्ट्रपति जिनपिंग को एक खुला पत्र लिखा जिसमें उन्होंने राष्ट्रपति के अधिनायकवादी शासन की निंदा की और अन्य राजनीतिक सुधार और सही प्रजातंत्र की बहाली की वकालत की. अगले दिन वह अपने बच्चे को स्कूल छोड़ने के लिए पैदल जा रहे थे कि पुलिस की एक जीप उन्हें उठा कर ले गयी. उनका आज तक पता नहीं चला. एक आवाज भी इसके खिलाफ नहीं उठी और एक आन्दोलन भी एकल नेतृत्व के अधिनायकवाद के खिलाफ आज तक नहीं हुआ. जन-शासन के नाम पर ७८ साल पहले आये साम्यवाद की या यूं कहें कि एक नए तरह के प्रजातंत्र की ऐसी परिणति कि जनता के बीच से “उफ़” की कराह भी न निकले यह सोचने वाली बात है. जनता इस बात से खुश है कि विश्व मानचित्र में चीन का परचम हीं नहीं लहरा रहा है बल्कि उसके समर्थन से उत्तर कोरिया और पाकिस्तान आज दुनिया के लिए ख़तरा बन गए हैं.
टर्की में हिंसा, सरकारी दहशत और विरोधियों पर जुल्म करते हुए अर्दोगन ने फिर चुनाव जीत लिया. इस नेता ने संविधान की ऐसी -तैसी करते हुए न केवल चुनाव जीता बल्कि प्रजातंत्र ख़त्म करते हुए संसद की संस्था और प्रधानमंत्री का पद ख़त्म किया , स्वयं कानून बनाने का अधिकार प्राप्त करते हुए न्यायपालिका पर नियंत्रण का फैसला लिया. यह तानाशाह अब २०३४ तक सत्ता में बना रह सकता है.
चुनाव जीतने के लिए अर्दोगन ने धुर -राष्ट्रवादी पार्टी एम् पी एच तक से हाथ मिलाया. टर्की के इस तानाशाह का कहना था “प्रजातंत्र एक ट्रेन की तरह है जिससे यात्री अपने गंतव्य पर पहुँच कर उतर जाता है और फिर पलट कर देखता भी नहीं “. शायद उसका धुर-राष्ट्रवादियों का साथ लेना ट्रेन से गंतव्य तक पहुँचने की मानिंद था.
समस्या क्या है? शायद जनता अपनी सामूहिक चेतना की गुणवत्ता नहीं बढ़ा पा रही है प्रजातंत्र के बावजूद और धुर -राष्ट्रवाद और राष्ट्र को ताकत के दम पर दुनिया में लोहा मनवाने की भावना के साथ एकल नेतृत्व को स्वीकार कर रही है नतीजतन संसद , न्यायपालिका या अन्य प्रजातान्त्रिक संस्थाएं जो नेता को अधिनायक बनने से रोकती हैं लगभग ख़त्म होती जा रही है. राष्ट्रवाद जरूरी है पर उसके लिए एकल नेतृत्व का विकल्प आज दुनिया को विश्व युद्ध की आग में झोंकने की स्थिति में आता जा रहा है. क्या प्रजातंत्र एकल नेतृत्व के लिए एक ट्रेन बन कर रह जाएगा ?


lokmat

Tuesday, 17 April 2018

हिंदू : देर हो इससे पहले पुनर्परिभाषित करें


अपनों से हीं लड़ने वाले ये कौन ?


एक हीं दिन अख़बारों में तीन घटनाएँ छपीहाथरस में संजय जाटव और शीतल जाटव अपनी प्रस्तावित शादी का जुलूस कस्बे के ठाकुर बहुल क्षेत्र से ले जाना चाहते हैंठाकुरों की न्यूज़ चैनलों के कैमरे पर धमकी थी कि अगर जुलूस इधर से निकला तो भविष्य में दलितों पर हमले को नहीं रोका जा सकतासकते में आये प्रशासन का कहना है पहले कभी इस इलाके से कोई दलित शादी की बरात ले कर नहीं गया है लिहाज़ा अनुमति नहीं दी जा सकतीसंविधान में अनुच्छेद १९() (में प्रदत्त “भारत में कहीं भी स्वतत्र रूप से घूमने का अधिकार” हर नागरिक को मौलिक अधिकार के रूप में दिया गया है इस अधिकार को राज्य जनहित में केवल “युक्तियुक्त निर्बंध” (रिज़नेबल रेस्ट्रिक्शनसे हीं बाधित कर सकता हैलिहाज़ा जाटव परिवार ने हाईकोर्ट में गुहार लगाईं हैदूसरी घटना बिहार के नालंदा जिले में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के गाँव सिलाव की हैबजरंग दल पहली बार रामनवमी का जूलूस इस गाँव के मुस्लिम आबादी वाले इलाके से ले जाना चाहता थाजुलूस के मुहाने पर पहुँचने पर प्रशासन से झड़प और फिर जबरदस्त हिंसा हुईसंविधान में उन्हें भी वही अधिकार है जो दलितों को ठाकुर मोहल्ले में हैतीसरी खबर थी राजस्थान के करौली जिले के हिन्दुआन कस्बे से जहाँ दलितों ने कहा है कि वे इस्लाम धर्म अपनाएंगे क्योंकि हिंदू धर्म में उनके लिए कोई स्थान नहीं हैइस क्षेत्र में दलित संगठनों द्वारा आहूत भारत बंद के अगले दिन हजारों गैर -दलितों ने वहां के स्थानीय दलित विधायक भाजपा की राजकुमारी जाटव के घर पर हमला कर आगजनी कीउत्तर प्रदेश या बिहार के इस क्षेत्र में हीं नहीं भारत के तमाम भाग में ये बजरंग दल की नयी पैदायश और विस्तार है और इनमें बेरोजगार युवक से लेकर कोचिंग इंस्टिट्यूट के मालिकस्थानीय ट्रेडर्स और राजनीति में जगह तलाशते माध्यम आयु के लोग शामिल हैं.
अगर हाथरस में दलित युवा संजय जाटव और उसकी भावी पत्नी बारात ठाकुर इलाके से निकालने में सफल होते हैं या इस प्रक्रिया में तनाव हिंसा में बदल जाता है तो इन दोनों को किसी मायावती अखिलेश या राहुल गाँधी की पार्टी से टिकेट मिल सकता है और जीत भी हासिल हो सकती हैयाने रातों रात विधायक या सांसदअन्य दलितों के लिए बड़ा लुभान राजनीतिक चारागाहउधर बिहार में रातोंरात बनी बजरंग दल की इकाई के लोग भी जानते हैं कि सत्ता “अपनी” है और “शांति भंग” और “बलवा” की धाराएँ वे डिग्रियाँ हैं जो उन्हें भाजपा का टिकेट दिलाएंगी और सत्ता सुख में हिस्सासत्ता के साथ होने या भविष्य में होने का केवल आभास मात्र हीं इन भावों को बुलंद परवाज बना देता हैराजनीति में बहुमत का शासन होता हैलेकिन बहुमत का मतलब आधे से ज्यादा नहीं बल्कि अन्य से ज्यादा होता हैलिहाज़ा एक नेता या दल अचानक किसी जाति विशेष को आरक्षण दिलाने का वादा करता हैअगर जाति में भी कोई उप जाति है तो उसे अलग से लाभ का विश्वास दिलाता हैअगर नहीं है तो जाति में हीं एक नयी उप-जाति पैदा कर देता है मसलन महादलितअगर पहचान समूह है तो उसे धार्मिक अल्पसंख्यक बनाने का उपक्रम करता है जैसे लिंगायतों को हिन्दुओं से अलग एक नया धर्म समूहयह सब कुछ संविधान के अनुच्छेद १५(और १६ () – पिछड़ों के लिए – या अनुच्छेद २६ से ३० तक धार्मिक अल्पसंख्यकों या उनके समूह को प्रदत्त अधिकारों के नाम परकोई ताज्जुब नहीं कि कल साईं बाबा के अनुयाइयों को अलग धर्म बताना राजनीतिक वर्ग का नया चारागाह बन जायेयह सब क्यों हो रहा हैराजशाही में दंड का भय दिखा कर शोषण हीं नहीं धर्म परिवर्तन किया जाता रहा था तो अब बहुमत बैलट के जरियेचूंकि बहुमत माने आधे से ज्यादा न होकर अन्यों से ज्यादा है इसलिए समाज बांटता जा रहा हैयहाँ तक कि न्याय भी बहुमत से होता है याने तीन बनाम दो से सर्वोच्च न्यायलय भी सत्य का फैसला करता है.
अब ज़रा निष्पक्ष विश्लेषण करेंजब प्रजातंत्र में सत्ता के साथ होने या भविष्य में होने का अहसास देश में इतनी अशांति पैदा कर सकता है तो देश में मुसलमान मात्र कुछ सौ साल तक शासन में थे.इस्लाम का विस्तार किन कारणों से हुआ इसे समझने के लिए आइंस्टीन का दिमाग नहीं चाहिएफिर अंग्रेजों ने किस तरह मुसलमानों का भारत को गुलाम बनाये रखने के लिए किस तरह इस्तेमाल किया यह भी समझना मुश्किल नहीं हैबाद में जब आजादी के बाद प्रजातंत्र आया तो धर्म-निरपेक्षता का कैसा स्वरुप बना यह सबने देखाहैदराबाद की गोकुल बेकरी आतंकियों ने बम विस्फोट किया तो शहर का पुलिस आयुक्त इसी “सेक्युलर” मुख्यमंत्री के पास गया और साक्ष्य देते हुए एक मुस्लिम इलाके में छापा मारने की इजाजत चाहीजाहिर था आतंकवादियों को पनाह देने वाले विरोध करते और पुलिस बल प्रयोग भी कर सकती थीलिहाज़ा मुख्यमंत्री ने उसे डांट कर भगा दिया यह कहते हुए कि चुनाव सर पर हैं और इस पुलिस अधिकारी को “धर्म निरपेक्षता “ की समझ नहीं हैगजनी से गोरी तकऔरंगजेब से आदिल शाह तक और लार्ड क्लाइव से लेकर लार्ड माउंटबेटन तक का इतिहास हिन्दुओं के दिमाग में कौंधता रहता हैतर्क-शास्त्र में एक दोष का जिक्र है ---- अपनी बात सिद्ध करने के लिए इतिहास के चुनिन्दा तर्क वाक्यों को हीं लेना और उसे वर्तमान पर चस्पा कर देनायाने अकबर को महान बताते हुए दीन-इलाही से उसकी धर्मनिरपेक्षता साबित करना और यह बताना कि वर्तमान में भी हिन्दुओं को मुसलमान को उसी नज़र से देखा जाना चाहिएयह नहीं बताया जाता कि औरंगजेब ने क्या किया और मुस्लिम शासन में नीचे तक के मुसलमान ओहदेदार हिन्दुओं पर क्या-क्या जुल्म ढाहते रहे और उन्हें जबरदस्ती धर्म-परिवर्तन करा कर “इस्लाम की सेवा” करते रहेइतिहास की याद सिर्फ भारत के संविधान के “धर्म-निरपेक्ष” तक हीं महदूद नहीं रहती महमूद गजनवी तक भी जाते हैफिर वर्तमान में जब यही हिंदू वाराणसी के संकटमोचन मंदिरधनतेरस के दिन दिल्ली के पहाड़गंज या मुंबई के ताज होटल में जाता है यह समझ कर कि भारत में घूमने या मंदिर में पूजा करने की स्वतंत्रता है तो उसे किसी इस्लामिक आतंकवादी के बम विस्फोट का शिकार होना पड़ता है.
लिहाज़ा वर्तमान में हिन्दुओं का मुसलमानों के खिलाफ आक्रामक होना समझ में आता हैइतिहास गवाह है धर्म के आधार पर बनी समाज की परस्पर विरोधी इकाइयाँ एडजस्टमेंट करती हैं शक्ति दिखाकरलेकिन यह मात्र शक्ति दिखाने तक हीं सीमित होना चाहिएसमाज के तटस्थ लेकिन तार्किक बुद्धिजीवियों को आक्रामकता की सीमा सुनिश्चित करनी चाहिए ताकि सभ्य समाज बनाने की ३००० साल की मेहनत व्यर्थ न जाये और फिर हम आदिम सभ्यता की ओर न चले जाएँमुसलमानों में भी ऐसे वर्ग को धार्मिक कट्टरपंथ को सुधारात्मक आन्दोलन तक जा बदलना होगा.
लेकिन अब जरा तस्वीर का दूसरा पहलू देखियेइन ३००० सालों में दलितों पर अत्याचार हुए इसमें किसी को भी विवाद नहीं हैतो जब कुछ सौ साल के मुसलमान शासन में हिन्दुओं को इतने अत्याचार झेलने पड़े जिसका आज संगठित रूप से प्रतिकार न्यायोचित है तो अगर दलित हजारों साल की प्रताड़ना के प्रतिकार के रूप में एक “भारत बंद “ कर रहा है तो ठाकुर साहेब या पंडित जी की धमकी क्योंआज भी अगर उसे घोड़े पर चढ़ कर ठाकुरों के मुहल्लें से बारात निकालने पर धमकियाँ मिले तो इसे हाथरस जिले में ठाकुर-बनाम -दलित की संज्ञा देना वैसा हीं कुतर्क होगा जैसा अकबर को धर्मनिरपेक्ष मान कर आज के मुसलमानों में भी धार्मिक कट्टरता न होने की बात कहनाक्या वैसा हीं उग्र प्रतिकार दलितों को नहीं करना चाहिए जैसे हिंदू किसी अख़लाक़ या किसी पहलू खान या किसी जुनैद को मार कर कर रहा हैक्यों न दलित समूह आज किसी ठाकुर ब्राह्मण को “बाबा साहेब की जय “ न बोलने पर गैर -हिंदू करार देदरअसल उच्च वर्ग का दलितों के प्रति आज भी बरकरार दुराग्रह हिंदू धर्म का कोढ़ है जिसे तार्किक बुद्धिजीवियों को आन्दोलन के रूप में खड़ा करना होगाअगर किसी दलित आई ए एस के बेटे को किसी गरीब ब्राह्मण के बेटे से कम नंबर मिलने पर भी आरक्षण के कारण आई ए एस बनाया जाता है तो समाज की वही तर्क चलेगा जो मुसलमानों के खिलाफ आज हिन्दुओं का है ---- जाति के आधार पर खडी समाज की इकाइयाँ एडजस्टमेंट कर रही हैऔर जहाँ तक उच्च जाति का यह दावा कि आरक्षण का लाभ किसी दलित आई ए एस के बेटे को न दे कर किसी गरीब दलित बेटे को मिले यह मांग दलित वर्ग से आनी चाहिएउच्च जाति के लोग केवल दलितों की इस मांग के साथ खड़े हो सकते हैं और वह भी तब जब दलितों की बारात अपने मोहल्ले से ख़ुशी से निकलने देंहिंदू धर्म में (या जीवन पद्धति में सोच के स्तर पर उसी सुधार की ज़रुरत है जो मुसलमानों को सही इस्लाम को समझने के लिए सुधारात्मक आन्दोलन की है.

Monday, 16 April 2018

फेक न्यूज: सरकार तो पीछे हट गयी पर क्या मीडिया संजीदा है?



कहा जाता है कि संसाधनों पर उच्च वर्ग का हीं अधिकार होता है. लेकिन पिछले २ अप्रैल को दलित संगठनों द्वारा आहूत भारत बंद के दौरान झूठ प्रचारित कर दलितों को सड़क पर लाने के किये सोशल मीडिया का जबरदस्त इस्तेमाल किया. पहला मेसेज वायरल हुआ कि दलितों के आरक्षण के अधिकार ख़त्म किये जा रहे हैं और यह कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला उसी दिशा में एक पहल है. जबकि हकीकत यह है कि इस आदेश का आरक्षण से कोई लेना देना नहीं है. दूसरा: एक विडिओ वायरल हुआ जिसमें विलाप करती एक मां की गोद में एक घायल बच्ची है. बताया गया कि यह बच्ची पथराव में घायल हुई है और चूंकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलित संख्य काफी है और वे ताकतवर भी है लिहाज़ा यह विडिओ इस इलाके में ज्यदा दिखा लेकिन हकीकत यह थी वह एक पुराना विडिओ था और बिहार के मुजफ्फरपुर में माडीपुर गाँव की एक घटना का था. तीसरा : इधर इस आन्दोलन के खिलाफ खड़े उच्च जाति के एक वर्ग ने एक विडिओ वायरल किया जिसमें हनुमान जी की खंडित मूर्ति दिखाई गयी थी यह बताते हुए कि दलितों ने इसे तोडा है. हकीकत यह थी कि यह विडिओ दक्षिण भारत के एक राज्य में हुआ २७ मई , २०१७ में हुए एक प्रदर्शन के समय का है. और इसका दलित -आहूत भारत बंद से कोई लेना देना नहीं था .
भारत के संविधान में अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य के मौलिक अधिकार –अनुच्छेद १९() () के खिलाफ “युक्तियुक्त निर्बंध” (रिज़नेबल रेस्ट्रिक्शन) लगाने के कुल आठ आधार---अनुच्छेद १९() में वर्णित हैं और पिछले ७० साल में सरकारों ने इन निर्बंधों को तहत करीब तीन दर्जन कानून बनाये हैं जो मीडिया को अंकुश में रख सकते हैं. आज से एक दशक पहले तक देश में मोटेतौर पर केवल औपचारिक मीडिया ---- अखबार या न्यूज़ चैनल --- हुआ करते थे. इनका मूर्तरूप होता था, स्थायी पता होता था जिसकी सरकार को हीं नहीं पूरे समाज को जानकारी होती थी, मकबूल एडिटर और जाने माने मालिक हुआ करते थे. किसी भी खबर के कानून सम्मत न होने की स्थिति में इन पर कार्रवाई हो सकती थी. तकनीकी के विकास और शिक्षा एवं प्रति -व्यक्ति आय की वृद्धि के साथ हर नागरिक में हर विषय अपने को अभिव्यक्त करने की इच्छा परवान चढी और ट्विटर, फेसबुक और सोशल मीडिया के ज़माने में यह व्यक्ति अपने -अपने ज्ञान और तर्क शक्ति के मुताबिक अद्वैतवाद से अवमूल्यन तक हर विषय पर बोलने लगा. पूर जन-विमर्श अधकचरे ज्ञान पर आधारित हो गया. जो कमी थी वह टी वी स्टूडियो में “तेरे नेता , मेरा नेता “ के टीआरपी बटोरू एक्सरसाइज ने पूरी कर दी.
इधर चूंकि अधिकांश सोशल मीडिया या एकाउंट्स रातों रात अस्तित्व में आये जिनके असली कर्ताधर्ता का पता अक्सर गलत होता है और तथ्य के नाम पर फेक न्यूज परोस कर “हिट्स” बटोरते हैं और आर्थिक लाभ हासिल करते हैं, आज पूरे विश्व में एक नया संकट पैदा हो गया है. फेक न्यूज इसी प्रक्रिया की उत्पत्ति है. यह शब्द-युगल मात्र २० माह पहले व्यापक प्रचालन में आया. खासकर अमरीकी राष्ट्रपति के चुनाव में ट्रम्प को लेकर. आज यह दुनिया के प्रजातंत्र को लेकर एक बड़ा खतरा बन गया है. और देशों के बीच परस्परिक तनाव का सबब बन गया है. पेड न्यूज़ से तो भारत जूझ हीं रहा था लेकिन अब फेक न्यूज़ एक नयी समस्या के रूप में सामाजिक तनाव पैदा करने लगा है. फेक न्यूज़ की परिभाषा जानबूझ कर गलत जानकारी देना और भ्रामक प्रचार /वितंडावाद पैदा करके किसी व्यक्ति, संस्था या समूह के खिलाफ वैमनस्य पैदा करने के प्रयास के रूप में किया जा सकता है. इस प्रयास के खिलाफ भारत में अनेक कानून पहले से हीं अस्तित्व में हैं और औपचारिक मीडिया आमतौर पर इस कुप्रयास में नहीं पाया गया है लेकिन सोशल मीडिया में यह बीमारी तेजी से बढ़ रही है. औपचारिक मीडिया भ्रामक हेडलाइंस तो देता है जैसे एक अंग्रेज़ी अखबार का शीर्षक था “और फिर उन्होंने याकूब के गले में फांसी पर लटका दिया”. औपचारिक मीडिया का दृष्टिकोण और उस पर आधारित तथ्य तो चुनिन्दा हो सकते हैं “सेलेक्टिव अप्प्रोप्रिएशन ऑफ़ फैक्ट्स” के तर्क दोष के तहत लेकिन वे जानबूझ कर झूट को सच कह कर नहीं दिखा सकते.
फेक न्यूज पर भारत सरकार के सूचना प्रसारण मंत्रालय को प्रधानमंत्री की पहल पर और मीडिया के दबाव में अपने कदम वापस लेने पड़े. प्रधानमंत्री जमीन से जुड़े होने के कारण सूक्षम और स्थूल प्रजातान्त्रिक मूल्यों की पहचान हीं नहीं हैं बल्कि उन्हें अक्षुण रखने समझ भी है. मीडिया संगठनों ने तत्काल हीं इस पहल के लिए नरेन्द्र मोदी को साधुवाद दिया. दरअसल फेक न्यूज की समस्या मूलरूप से औपचारिक मीडिया ---अखबार और न्यूज चैनलों --- की नहीं है. कारण यह है कि औपचारिक मीडिया मूर्तरूप में और कानूनी तौर स्थापित और सर्व-विदित रूप से विद्यमान रहता है और इसका मालिक या एडिटर समाज का जाना माना व्यक्ति होता है. मंत्रालय ने गलती यह की कि जिस औपचारिक संस्था के नाम यह आरोप मढ़ दिया वह वास्तव में सोशल मीडिया की समस्या है.
दरअसल फेक न्यूज की समस्या से भारत हीं नहीं पूरा विश्व खासकर सैकड़ों वर्ष पुराने ब्रिटेन, अमेरिका, फ़्रांस , जर्मनी भी काफी प्रभावी हो रहा है. त्रासदी यह है कि तथाकथित पढ़ेलिखे पश्चिमी समाज में भी लोग इससे काफी प्रभावित दीख रहे हैं. बज्जफीड के एक सर्वे के अनुसार सन २०१६ में अमरीकी चुनाव में जो सबसे ज्यादा प्रभावशाली २० सही ख़बरें जो १९ औपचारिक मीडिया संस्थाओं द्वारा रिलीज़ की गयी थी उनके मुकाबले २० फेक न्यूज़ जो फेसबुक के जरिये सामने आये थे उनको लोगों ने ज्यादा देखा और प्रभावित हुए.
पर क्या इसके बाद किसी भी मीडिया संगठन ने इस मुद्दे –फेक न्यूज – पर कोई संजीदा चर्चा की? इन संगठनों की प्रतिक्रिया क्या थी ---सरकार मात्र इस आधार पर कि “किसी खबर के फेक होने की शिकायत आयी है” किसी रिपोर्टर की मान्यता निलंबित नहीं कर सकती. लेकिन इससे क्या फेक न्यूज के भेड़िया का आना भी हमेशा के लिए टल गया. क्या यह सच नहीं है कि खबर के नाम पर अर्ध-सत्य परोसना, उतने हीं तथ्यों पर जोर देना जिससे एक पक्ष या दूसरे पक्ष की विचारधारा को बल मिले यह भी फेक न्यूज की श्रेणी में आता है.
तकनीकि के विकास का सबसे बड़ा लाभ यह हुआ है कि ज्ञान जो संपन्न वर्ग के परकोटे में विश्राम करता था और रईशजादों की चेरी हुआ करता था आज गरीब के मोबाइल में कैद किया जा सकता है-- याने ज्ञान का समाजवाद. भारत सरकार द्वारा चुनाव या बजट में किये गए वादे, बाबरनामा, ऋग्वेद काल में गाय की स्थिति, ट्रेन में नशे में पुलिस का हुडदंग मंत्री के व्हाट्स अप पर डालना – ये सभी किसी राजा या किसी रंक को सामान भाव से और लगभग शून्य- कीमत पर उपलब्ध हैं. कपास की खेती की या ड्रिप सिचाई की नयी तकनीक, बीमारियों के बारे में मौलिक जानकारी ताकि कोई डॉक्टर-नर्सिंगहोम शोषण न कर सके, कानून की ताज़ा स्थिति और नागरिक अधिकार यह सब कुछ व्यक्ति चंद मिनटों में जान व समझ सकता है. जानने के अधिकार के तहत हासिल तथ्यों से सोशल मीडिया के जरिये मुद्दों पर सामूहिक चेतना विकसित की जा सकती है.
भारत जैसे देश में जहाँ सामाजिक-धार्मिक पहचान समूह हजारों की तादात में हीं नहीं हैं बल्कि पारस्परिक शाश्वत द्वन्द के भाव में रहते हैं, ऐसे में भले हीं सरकार ने फेकन्यूज पर अपना कदम वापस ले लिया हो क्या औपचारिक मीडिया या संस्थाओं ने अपने को बेहतर करने के लिए एक भी बैठक कर चर्चा की.? क्या सोशल मीडिया के प्लेटफार्म आत्म-नियमन ले लिए कटिबद्ध हो सकेंगे. अगर नहीं तो यह भेडिया फिर आ सकता है.


jagran

नए भारत में अनपढ़ नौनिहाल : ताज़ा सरकारी सर्वे



देश कैसे बदल पायेगा ?

उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले के खेरागाँव प्राइमरी स्कूल के एक टीचर-इंचार्ज ओम प्रकाश पटेरिया ने अपने रिटायर होने के ठीक एक दिन पहले याने विगत ३० मार्च को स्कूल के एक कमरे में मिटटी का तेल डाल कर आत्महत्या कर ली. मरने के पहले कक्षा के ब्लैकबोर्ड पर मुख्यमंत्री के नाम एक सन्देश लिखा : “गाँव का प्रधान, एक शिक्षक और मध्याह्न भोजन का सरकारी इंचार्ज उनसे घूस की मांग कर रहे थे और न देने पर प्रताड़ना करने की धमकी दे रहे थे“. प्राइमरी स्कूलों में मध्याह्न भोजन की योजना इसलिए शुरू की गयी थी कि गरीब अपने बच्चों को कम से कम पढने के लिए भेजें. बिहार की सन २०१६ में शुरू की गयी एक योजना “उत्प्रेरण” का उद्देश्य था ड्राप-आउट रेट (पढाई छोड़ने की दर) कम करना. इसमें गरीबों के उन बच्चों को जिनके अभिभावकों ने पढाई से हटाकर खेती और अन्य कामकाज में लगा दिया था, नजदीक के हीं किसी नामित विद्यालय के छात्रावास में ११ महीने रख कर , मुफ्त भोजन , कपड़ा चप्पल, कम्बल -बिस्तर और हर जरूरत का सामान देते हुए फिर से पढने के लिए उद्धत करना ताकि वे फिर से पढाई कर सकें. जाँच में पाया गया कि करोड़ों रुपये खर्च के बाद भी यह योजना इसलिए फेल हो गयी कि यादव गरीबों को अपनी लड़कियों का दलित गरीबों की बेटियों के साथ रहना गवारा नहीं था, कुछ अपनी बेटियों को रात में छात्रावास में छोड़ने को तैयार नहीं हुए. यह सब देखकर मुखिया -शिक्षक भ्रष्ट गठजोड़ ने फर्जी उपस्थिति और व्यय दिखा कर सारी रकम हड़प ली. कल्याणकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार, योजनाओं के प्रति अज्ञानता व चिर-बदहाली निकलने की इच्छा की कमी, जातिवाद के आधार पर जीते जन-प्रतिनिधि की दबंगई और अंत में सामूहिक चेतना के अभाव में इस भ्रष्ट व्यवस्था को तोड़ने की शक्ति का न होना देश को आगे बढ़ने नहीं दे रहा है. नतीजतन “भारत की डेमोग्राफिक डिविडेंड” (सांख्यिकी लाभांश) दरअसल मात्र एक जुमला भर रह गया है. मानसिक जड़ता की वजह से जनता भी चुनावों में मंदिर -मस्जिद या जाति से ऊपर उठाकर यह नहीं सोच पा रही है कि अपने बच्चों का आगे के ६० से ८० साल का भविष्य अभाव की किन स्थितियों में गुजरेगा. राजनीतिक वर्ग के लिए इससे अच्छी स्थिति मिल नहीं सकती--- जन-प्रतिनिधि को विकास में “हिस्सा” और वोट कुछ किये बगैर.
राष्ट्रीय उपलब्धि सर्वेक्षण की पहली और ताज़ा रिपोर्ट में ये दोनों राज्य सबसे नीचे के पायदान पर पाए गए. यही नहीं “बीमारू” शब्द को चरितार्थ करते हुए मध्य प्रदेश, राजस्थान भी दक्षिण भारत या पश्चिम भारत के राज्यों के मुकाबले कहीं दूर-दूर तक खड़े नहीं दिखे. उधर शिक्षाविद चीख -चीख कर कहते हैं कि शिक्षा के मद में खर्च कम होने से यह सब हो रहा है और इसे जी डी पी का कम से कम ६ प्रतिशत करें (वर्तमान में यह मात्र ०.६ प्रतिशत है). लेकिन ऊपर के दो उदाहरण साफ़ बताते हैं कि पिछले ७० साल से सरकारी खर्च से मुखिया, शिक्षा विभाग का अमला और शिक्षक अपनी जेबें और भर लेते हैं. नौनिहाल गरीबी की उस शाश्वत-गर्त से नहीं निकल पाता. जरूरत है इन योजनाओं की ईमानदार अनुश्रवण (मोनिटरिंग) की और ज्यादा से ज्यादा मनुष्य की जगह टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल की.
विगत नवम्बर में राष्ट्रीय उपलब्धि सर्वेक्षण के नाम पर देश में बुनियादी शिक्षा की स्थिति पर एक अध्ययन कराया. देश भर के लगभग सभी ७०१ जिलों के १,१०,००० स्कूलों के लाखों बच्चों के ज्ञान की जाँच में तस्वीर कुछ और निकली. सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय के आदेश पर राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसन्धान एवं प्रशिक्षण परिषद् (एन सी ई आर टी ) ने कक्षा ३, ५ और ८ के छात्रों का तीन स्तर पर मूल्यांकन किया. कक्षा ३ और ५ के छात्रों का मूल्यांकन तीन विषयों --- इनविरानमेंटल स्टडीज (पर्यावरण सम्बंधित ज्ञान), भाषा और गणित की समझ को लेकर किया जबकि कक्षा ८ के छात्रों का आंकलन भाषा , गणित , विज्ञान और सामाजिक विज्ञान की समझ के आधार पर किया गया.
रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश और बिहार की स्थिति सबसे ज्यादा खराब निकली जहाँ बच्चों की लर्निंग (अधिगम या सीखने की क्षमता) ऊँची कक्षाओं में घटती गयी. इस चार बीमारू राज्यों के बच्चे अन्य राज्यों के बच्चों के मुकाबले तो छोडिये राष्ट्रीय औसत से काफी नीचे पाए गए. राष्ट्रीय औसत पर कक्षा तीन के ६३ से ६७ प्रतिशत बच्चे पर्यावरण, भाषा और गणित में, कक्षा पांच के ५३-५८ प्रतिशत बच्चे और कक्षा आठ के मात्र ४० फीसदी बच्चे हीं इन विषयों पर सही समझ रखते थे. याने जैसे जैसे ऊपर की कक्षा में बच्चे जा रहे हैं उनकी समझ क्षीण होती जा रही है. भाषा की समझ के स्तर पर सबसे अच्छी उपलब्धि वाले राज्य त्रिपुरा, दमन और दिव, पुद्दुचेरी और मिजोरम थे , जबकि बिहार , राजस्थान , हरियाणा और छत्तीसगढ़ सबसे फिसड्डी रहे. कुल पैरामीटर्स पर बीमारू राज्यों के बच्चों का प्रतिशत राष्ट्रीय औसत से काफी कम रहा. शिक्षाविद इसका कारण बताते हैं उत्तर भारत के इन राज्यों में आज भी रटने की आदत. शिक्षक भी अपने आराम के लिए प्रश्नों को समझाने के बजाय उत्तर रटवाने पर बल देता है.
इसी साल आयी अंतर्राष्ट्रीय ख्याति- प्राप्त “असर” की रिपोर्ट के साथ अगर सरकार द्वारा कराये इस सर्वे को एक साथ मिलकर देखें तो यह भी पता चला कि गाँव के बच्चे शहरों के बच्चों से बेहतर और पिछड़ी जातियों के बच्चे सवर्ण बच्चों से अच्छी समझ रखते हैं. सबसे बुरी स्थिति दलित बच्चों की समझ को लेकर पाई गयी. सर्वे में यह भी देखा गया कि आधारभूत ज्ञान और संख्यात्मक गणित जैसे छोटे-छोटे गुणा-भाग की समझ न होने की वजह से बड़े क्लास में बच्चे खराब प्रदर्शन कर रहे हैं. मंत्रालय की वेबसाइट पर उपलब्ध सर्वे में दिए गए नक़्शे से साफ़ पता चलता है कि भाषा की समझ में, मणिपुर, पश्चिम बंगाल, सिक्किम , मिजोरम, हिमाचल प्रदेश और नागालैंड को छोड़ कर समूचा समूचा उत्तर भारत राष्ट्रीय औसत से काफी नीचे है. गणित की समझ के स्तर पर भी बीमारू राज्य राष्ट्रीय औसत से बेहद नीचे हैं.
चिंता की बात यह है “सुशासन बाबू” एक दशक से ऊपर के शासन काल में भी बिहार शिक्षा के सभी पैमानों पर सबसे नीचे के पायदान पर पाया गया. कमोबेश यही स्थिति उत्तर प्रदेश सहित अन्य बीमारू राज्यों की रही.
उधर “असर” के सर्वे में पाया गया कि १४ से १८ साल के आधे से ज्यादा बच्चे घड़ी के अनुसार दो समय के बीच के अंतराल को नहीं बता पा रहे हैं जैसे अमुक व्यक्ति इतने बजे सोया और इतने बजे जागा तो वह कितने घंटे सोता रहा. असर की रिपोर्ट दो माह पहले आयी रिपोर्ट के अनुसार इन बीमारू राज्यों –खासकर उत्तर प्रदेश , बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान --में साक्षरता और अधिगम (लर्निंग) की स्थिति सबसे खराब है. उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश की साक्षरता मात्र ६९.७२ प्रतिशत है जो कि राष्ट्रीय औसत से पांच फीसदी कम है.
दावा तो यह है कि भारत दुनिया का सबसे युवा देश होगा और इसका सांख्यिकी लाभांश देश को विकास की पटरी पर फुल स्पीड दौडायेगा लेकिन बच्चा जैसे जैसे युवा बन रहा है ज्ञान और समझ खोता जा रहा है. अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तो छोडिये भारत में हीं उत्तर भारत और खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार के बच्चे शायद हीं “सेवा -योग्य” (एम्प्लोयबुल) माने जाएँ. बेरोजगार युवा या तो समाजके लिए बोझ होगा या भावनात्मक रूप से आसानी से प्रभावित किया जाने वाला “बारूद का ढेर” जो भविष्य में समाज के लिए ख़तरा बन सकता है. अगर देश इसके भरोसे सांख्यिकी लाभांश चाहता है इन योजनाओं को भ्रष्टाचार मुक्त करना होगा और शिक्षा को स्वच्छ भारत की तरह अभियान के रूप में लेना होगा ताकि सामाजिक चेतना किसी मुखिया को किसी टीचर -इंचार्ज से पैसे न उगाहे और लोग भ्रष्ट तंत्र के खिलाफ तन के खड़े हों.


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