Saturday, 24 March 2018

ज्यादा योजनायें , अधिक भ्रष्टाचार : सामूहिक सोच में क्रांति जरूरी




आखिर क्या वजह है कि ताज़ा वैश्विक भ्रष्टाचार सूचकांक में भारत सन २०१६ के मुकाबले सन २०१७ में दो खाने नीचे चला गया याने ७९ से ८१ पर? दरअसल यह सूचकांक भ्रष्टाचार को लेकर बनी जन -धारणा से बनता है. क्या वाकई भ्रष्टाचार बढ़ा है? जब भी कोई सरकार व्यापक स्तर पर जनोपदेय गरीबी -उन्मूलन या विकास के प्रोडक्ट लाती है तो यह भ्रष्ट तंत्र उसकी काट निकाल लेता है और जब जनता से पूछा जाता है कि “मोदी राज में कैसा चल रहा है’ तो उसका जेहन में सरकार के विकास कार्यों के प्रति तो उत्साह होता है (कि कुछ बदल रहा है) लेकिन जब भ्रष्टाचार को लेकर सवाल पूछा जाता है तो उसका जवाब उदासीन “अरे सब कुछ वैसे हीं है या..... बढ़ा है” में होता है. स्थानीय साहूकार से क़र्ज़ लेकर घूस देने के बाद उसका जवाब क्या होगा समझना मुश्किल नहीं है. वरना जब बहुत सारे जनहित के कार्यक्रम शुरू किये गए हैं और सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों के खिलाफ आज तक कोई छोटा आरोप भी नहीं है तो परसेप्शन क्यों खराब होगा ? दरअसल जन -धारणा बनती है जमीन पर रोज़मर्रा के जीवन में सामान्य नागरिकों द्वारा झेले गए भ्रष्टाचार के दंश से. और वह बदस्तूर कायम है बल्कि ज्यादा फण्ड आने से ज्यादा बढ़ा है.
आज देश में विकास व जनोत्थान के लगभग २०० योजनायें है लेकिन भ्रष्ट अफसर-जन प्रतिनिधि घटजोड़ ने सरकार के डायरेक्ट बेनिफिट ट्रान्सफर (प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण) जिसे डी बी टी के नाम से जाना जाता है की भी काट निकाल ली है. अब लाभार्थी से नाम की संस्तुति या चरणबद्ध पेमेंट के पहले हीं पैसा ले लिया जाता है. चूंकि इन गरीबों के पास एडवांस पैसा देने की कूवत नहीं होती तो ये बड़े लाभ के लिए स्थानीय महाजन से कर्जा महंगे व्याज (१०० का २० रुपया प्रतिमाह) पर लेते हैं ताकि ब्लाक का भ्रष्ट अफसर-ग्राम प्रधान (मुखिया) गठजोड़ उसे लाभार्थी बना कर उसे शौचालय, आवास, रोजगार के लिए सस्ता ऋण उपलब्ध करा सके. प्रशासनिक सिद्धांत है कि राज्य अभिकरणों और लाभार्थियों के बीच अगर ज्ञान की खाई बनी रही तो वह शोषण और तज्जनित भ्रष्टाचार को जन्म देती है. यही कारण है जिला पंचायत अध्यक्ष या ब्लाक प्रमुख तो छोडिये, मुखिया जी भी चुने जाने के एक साल के भीतर एस यू वी पर चलने लगते हैं. घुरहू -पतवारू के नाम मिलने वाले उन लाभों को भी जो सामान या यन्त्र के रूप में मिलते हैं हड़प जा रहे हैं.
लोक-प्रशासन के मान्य सिद्धांतों के अनुसार भ्रष्टाचार अगर राज्य अभिकरणों में लगे लोग (अफसरशाही) और गरीब लाभार्थी के बीच ज्ञान की खाई (नॉलेज गैप) कम हो तो लाभ के उत्पादों को लाभार्थी तक पहुँचाने में मानव भूमिका को कम से कम करने की कोशिश की जानी चाहिए. मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद इस बात पर सबसे ज्यादा जोर दिया गया. दिन-रात लग कर खाते खुलवाए गए और मोबाइल -आधार कार्ड से लिंक करके डी बी टी योजना लाई गयी. लेकिन चूंकि खतरा यह था कि गरीब लाभार्थी एक मुश्त पैसा मिलने पर शौचालय बनवाने की जगह फिर कहीं और खर्च कर देगा तो घूस-खोर अब एडवांस में पैसे लेने लगे.
दिल्ली से सटे एक जिले में जहाँ से एक केन्द्रीय मंत्री भी आते हैं एक लाभार्थी से कहा गया कि तुम शौचालय के लिए गड्ढा खुदवाओ और तुम्हारे खाते में २००० रुपये पहली क़िस्त के रूप में आ जायेंगे. वह क़िस्त तो आयी लेकिन आगे की क़िस्त के लिए पैसे की मांग होने लगी. उस गरीब की बकरी एक दिन गड्ढे में गिरी और उसकी टांग टूट गयी. घूस के पैसे न देने के कारण अगली क़िस्त में विलम्ब हुआ, गड्ढा भर गया. बकरी से होने वाली आय भी जाती रही, सरकारी कागजों में गाजियाबाद “ओ डी एफ” (खुले में शौच से मुक्त” ) घोषित भी हो गया. जिला प्रशासन, नगर निगम और मंत्री ने समारोह में ताली भी बजवा ली. किस्तों में (चरणों में काम होने पर जैसे भवन के लिए नीव डालने पर एक क़िस्त , फिर दीवाल खडी होने पर दूसरी ) पैसा सरकार इसलिए देती है क्योंकि उसे डर रहता है कि पैसे का इस्तेमाल अन्य मद में लाभार्थी कर सकता है, यहीं पर मुखिया, लेखपाल या निम्न स्तर से ऊपर तक की अफसरशाही की भूमिका आती है और भ्रष्टाचार का रेट भी बढ़ जाता है.
समस्या यह है कि मीडिया भी भ्रष्टाचार को तब तक वरीयता पर नहीं रखता जबतक कोई बड़ा नाम उससे न जुड़े. जन -शिक्षा जो मीडिया के मूल कार्यों में से एक है “तेरा नेता , मेरा नेता “ हर शाम स्टूडियो के शोर में खो जाता है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का राष्ट्रीय किसान उन्नति मेला में १७ मार्च, २०१८ को दिया गया बेहद स्पष्ट बयान जो भारत के किसानों का भाग्य बदलने वाला है उसे दिन-रात दिखाने के बजाय शाम को फिर उसी “दाढी-टोपी बनाम तिलक” फार्मूले पर डिस्कशन कराता रहा. क्योंकि इसमें एंकर या एडिटर के ज्ञान की जगह गले में ताकत से काम चल जाता है. भारतीय मीडिया अज्ञानी, नासमझ और तमाशेबाज़ है.
भ्रष्टाचार एक सामाजिक व्याधि है. दुनिया भर में प्रशासनिक इतिहास गवाह है कि जिन देशों में भ्रष्टाचार की जड़ें बेहद गहरी थी (सिंगापुर, मलेशिया से ब्राज़ील तक) और कालांतर में उनसे छुटकारा पाया जा सका उनमें सामाजिक क्रांति, सामूहिक सोच में बदलाव और वैज्ञानिक तर्क-शक्ति पहली शर्त रही. भारत में भ्रष्टाचार सन १९७० से “कोएर्सिव” से हट कर “कोल्युसिव” (समझौता) स्टेज पर पहुँच गया है जिसका खात्मा महज कानून बना कर या एक या दो संस्थाओं को अस्तित्व में ला कर नहीं किया जा सकता. मात्र योजनायें ला कर या “प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण” के जरिये इस कैंसर पर काबू पाना भी नामुमकिन है. बल्कि यह देखने में आ रहा है कि “ज्यादा योजना , ज्यादा भ्रष्टाचार” और “ज्यादा लोगों की शिरकत, बढे दर से भ्रष्टाचार”. इस भ्रष्टाचार से लड़ने में सभी सरकारें पिछले ७० साल से असफल रही हैं. अफसरशाही के हाथ से विकास को निकाल कर त्रि-स्तरीय पंचायत राज सिस्टम को दिया गया और साथ हीं एन जी ओ (गैर-सरकारी संगठन) को भी शामिल किया गया लेकिन दशकों बाद भी समस्या बढी हीं है कम नहीं हुई. आज मोदी सरकार को शायद कोई नया समाधान तलाशना होगा. जहाँ संस्थागत स्तर पर कड़े कानून ला कर आमूल-चूल परिवर्तन अपेक्षित है वहीं ग्राम ब वार्ड के स्तर पर लोगों में सामूहिक चेतना का स्तर “जीरो टोलरेंस” तक बढ़ाना पडेगा . जैसे हीं समाज या व्यक्ति समूह इसके खिलाफ जाति, धर्म या अन्य पहचान समूह के शिकंजे से निकल कर तथाकथित जन-प्रतिनिधियों -अफसरशाहों के खिलाफ तन कर खड़ा होगा यह कैंसर हारने लगेगा. चूंकि भ्रष्टाचार एक सामाजिक व्याधि है इसलिए इसे जब तक सामाजिक क्रांति के स्तर पर यह भाव नहीं विकसित किया जाएगा, परिणाम नकारात्मक ही रहेंगे.
lokmat

Sunday, 11 March 2018

त्रिपुरा: मानिक की बाँझ ईमानदारी बनाम मोदी पर भरोसा



मार्क्सवादी अवशेष विलुप्त होने की कगार पर क्यों ?

इसे “भारत में भी मार्क्सवाद मर गया” कहें या यह कि “लाइफ सपोर्ट सिस्टम से एक और मशीन हटा ली गयी ताकि इसका दिल धडके लेकिन दिमाग काम न कर रहा हो”. विगत ३ मार्च, २०१८ को मार्क्सवाद का दिमाग भी जाता भी रहा जब उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के एक अन्य प्रमुख राज्य त्रिपुरा से भी “वाम” शासन का अंत हो गया. और वह भी किसके द्वारा --- “दक्षिण ध्रुव” की भारतीय जनता पार्टी के द्वारा. चुनाव के मार्फ़त न कि किसी खूनी क्रांति से जन -मत में आये इस बड़े बदलाव को सामान्य राजनीतिक विश्लेषण की परिधि में समझना गलत होगा. इस बदलाव के बाद की लेनिन का मूर्ति -भंजन की घटनाएँ भी इस गुपचुप लेकिन क्रांतिकारी बदलाव का विस्तार मात्र है. सभ्य समाज में व्यक्ति की तरह विचारधारा अंतिम सांसें लेते हुए मरणासन्न होती है या मरणासन्न होती हैं तो उसकी विदाई की प्रक्रिया भी शालीन रखने की परम्परा है लेकिन १०१ साल पहले हुए “रूसी क्रांति” की कोख से जन्मी इस शासन व्यवस्था में हर उत्तराधिकारी अपने या तो पूर्ववर्ती को मरवाता रहा या उसकी मूर्तियाँ खंडित करता रहा या फिर उसके योगदान को नकारने वाला इतिहास फिर से लिखवाता रहा. शोषण के खिलाफ समाज के एक लम्पट तबके को कार्यकर्ता के रूप में खडा करना और संवैधानिक -कानूनी शासन प्रक्रिया और संस्थाओं को इन लम्पटों के हाथों की कठपुतली बना कर “वैज्ञानिक चुनावी धाधली कर शासन में बने रहना” इन साम्यवादियों का शगल बन गया. समाज का कमजोर तबका इनके डर के मारे पोलिंग बूथ पर या तो जाता हीं नहीं था या फिर इन्हें दिखा कर वोट करता रहा. इनके खिलाफ खडी होने वाली पार्टियों के कार्यकरता को ये लम्पट वर्ग मारते रहे क्योंकि वैधानिक संस्थाओं और कानून को जेब में रख कर थाना-पुलिस इनके इशारे पर चलती थी.
पश्चिम बंगाल, केरला और त्रिपुरा में कई दशकों में साम्यवाद ने सर्वहारा क्रांति तो नहीं की बल्कि राज्य शक्ति को लम्पटता के साथ मिलकर एक नया शासन -तंत्र विकसित किया. समाज एक घुटन महसूस करने लगा. इनका शमन लोकतान्त्रिक तरीके से करने के हर रास्ते बंद हो गए थे. ऐसे में ममता बनर्जी के रूप में एक प्रति-लम्पट वर्ग को पैदा करना हीं एक मात्र रास्ता था. ममता ने जब उसी भाषा में जवाब दिया तो यह जनता के लिए भी और मार्क्सवादियों के लिए भी यह चौंकाने वाला प्रयास लगा. अभी तक तो वे यह समझते तो कि यह काम केवल उन्हीं की विरासत है. जैसे हीं जनता को लगा कि कोई नयी पार्टी उनके घुटन के खिलाफ मोर्चा ले सकती है और यह कि चुनाव में मार्क्सवादियों के खिलाफ वोट दे कर सुरक्षित रहा जा सकता है तो उन्होंने दशकों से पैठी मन की भड़ास निकल दी. ममत शासन में आयीं.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या उसके राजनीतिक विंग –भारतीय जनता पार्टी – के लिए इस तरह की राजनीति का काट संभव नहीं था. लेकिन उन्हें भी एक वर्ग ऐसा खड़ा करना पड़ रहा है जो इस सत्ता-लम्पटता के गठजोड़ को निष्प्रभ कर सके. केरल और त्रिपुरा में शुरू से हीं संघ के कार्यकर्ताओं की बेरहमी से लगातार हो रही हत्याओं के खिलाफ आज एक प्रति -रणनीति अपनानी पडी और आज संघ के लोग भी मजबूरन उसी भाषा में जवाब देने लगे हैं. शिकायत अब मार्क्सवादियों की तरफ से हो रही है कि उनके लोग भी मारे जा रहे हैं.
त्रिपुरा में चुनाव जीतने के लेनिन की मूर्ती तोडना इस क्रम का विस्तार है. यह गैर-मार्क्सवादी ताकतों की मजबूरी थी. यह वहां की जनता को इस बात का भरोसा दिलाने जैसे था कि तुमने सरकार बदल कर अपना काम तो कर दिया लेकिन डरने की कोई जरूरत नहीं है. सी पी एम् के दफ्तरों पर हमला करना भले हीं कानूनी रूप से और नैतिक रूप से गलत हो उससे तरह जैसे लेनिन की प्रतिमा तोड़ना लेकिन कई बार समाज में भरोसा दिलाने के लिए यह प्रयास अपरिहार्य होते हैं. यह मात्र प्रारंभिक प्रतिक्रया होती है और वह उन कार्यकर्ताओं द्वारा जो दशकों से कम्युनिस्टों के सत्ता-लम्पट कॉकटेल वर्ग का शिकार रह चुकीं हैं.
त्रिपुरा को हीं लें. २५ साल का शासन जिसमें २० साल एक ऐसे मार्क्सवादी मुख्यमंत्री के हाथ में बागडोर जो स्वयं बेहद ईमानदार रहा. मानिक सरकार को हाथ में झोला लेकर सब्जी खरीदते तस्वीर लोगों की जेहन में अक्स बना चुकी थीं. लेकिन सत्ता केवल व्यक्तिगत ईमानदारी के बूते जनमत अगर हासिल करती तो मनमोहन सिंह का प्रधानमंत्रित्व कभी ख़त्म नहीं होता. दरअसल कई बार यह ईमानदारी “बाँझ” होती है और निष्क्रियता की ओर उन्मुख करती है. त्रिपुरा में बेरोजगारी १९.९ प्रतिशत है याने हर घर का एक युवक बेरोजगार है. उद्योग लगे नहीं जिससे राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (जी एस डी पी) में औद्योगिक क्षेत्र का योगदान मात्र ९ प्रतिशत रहा जबकि राष्ट्रीय औसत ज़माने से २८ प्रतिशत के आस पास बना रहा है. कृषि आधारित अर्थ-व्यवस्था में पूँजी विकास नहीं होता नतीजतन लोग सत्ता के प्रति एक नाराज़गी पाले रहते है और जब भी कोई विकल्प मिलता है वे उसे थाम लेते हैं. यही कारण है कि इस राज्य की प्रति-व्यक्ति आय भी नागालैंड और मेघालय से भी कम रही. १४ प्रतिशत और राष्ट्रीय औसत से ३० प्रतिशत कम रही.
चुनाव नतीजों से साफ़ है कि सी पी एम का वोट भले हीं पिछले चुनाव के मुकाबले मात्र छः प्रतिशत हीं कम हुआ हो लेकिन द्वि-ध्रुवीय चुनाव में यह बड़ा मायने रखता है. यह भी सही है कि भाजपा और सी पी एम् के मत में अंतर भी मात्र ०.७ प्रतिशत का रहा लेकिन एफ पी टी पी (फर्स्ट -पास्ट--पोस्ट) चुनाव पद्धति में यह बड़ा अंतर इसलिए लाया कि लगभग हर चुनाव क्षेत्र में भाजपा को बढ़त हासिल हुई. फिर कांग्रेस सहित तमाम छोटी पार्टियों की जगह लोगों ने मोदी पर अपना विश्वास रखा. मोदी जिस तरह दौरा कर रहे थे और उत्तर -पूर्वी राज्यों को प्राथमिकता देने की बात कह रहे थे वह लोगों में घर कर गया. राजनीति में वादा तो हर पार्टी करती है पर किसी वादे पर जनता भरोसा करती है वह ज्यादा महत्वपूर्ण होता है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पोअर यह भरोसा इस क्षेत्र की जनता का बढ़ा है.
सन १८४८ में कार्ल मार्क्स द्वारा लिखे और साम्यवादियों के “बाइबिल” के रूप में जाने जाने वाले “कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो” की शरुआत में कहा गया है “ साम्यवाद का भूत पूरे यूरोप में छाया हुआ है और पुराने यूरोप की सभी ताकतें –सत्ता में बैठी या सत्ता के बाहर विपक्ष के रूप में खडी – इस भूत से छुटकारा पाने में लग गयी हैं और यही इसका सबूत है कि साम्यवाद एक बड़ी ताकत बन गया है”. इस दस्तावेज के अंत में भविष्यवाणी है कि पूरी दुनिया में एक क्रांति होगी और साम्यवाद दुनिया के सभी प्रकार के साम्यवादी सर्वहारा क्रांति के स्वरूपों के साथ गठजोड़ करेगा. “दुनिया के मजदूरों एक हो” के नारे के साथ यह दस्तावेज ख़त्म होता है. लगभग १५० साल दुनिया में यह विचारधारा सिर्फ किताबों में शोध के लिए सिमट कर रह गयी लेकिन ताज्जुब होता है कि भारत के मार्क्सवादी यही मानते रहे कि सर्वहारा क्रांति आयेगी. २६ अगस्त, सन २००० को मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता प्रकाश करात ने एक वार्षिक बैठक में इस बात पर गर्व किया कि भारत में आज भी (तब भी) उनकी पार्टी तीसरी ताकत है और आने वाले दिनों में यह विस्तार लेगी.
विगत ३ मार्च, २०१८ को मार्क्स गलत साबित हुए. दुनिया के सभी मार्क्सवादी भी और भारत में प्रकाश करात भी और उनके साम्यवादी साथी भी. साम्यवाद जो अपने हीं वैचारिक जिद्दीपन और ताज्ज़नित अहंकार से पैदा लम्पटवाद से पनपे कैंसर से घिर गया एक ऐसे रोगी की तरह जो मेटास्टेसिस (कैंसर का एक स्टेज जिसमें यह शरीर के अन्य अंगों में फ़ैलने लगता है. वजन कम होता गया. जब कोई विचारधारा मरती है तो उसे दफनाने का काम शालीनता से होना चाहिए. भारत में विगत ३ मार्च, २०१८ को साम्यवाद लगभग मर गया. केरल में इसके अवशेष बच रहे हैं वह भी इसलिए कि लम्पट और दुस्साहसी आतंक को कई बार जातिवादी और कांग्रेस जैसी ताकतों से भी खाद-पानी मिलता रहा है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने लोगों की कुर्बानी दे कर भी अगर असम में अपने अथक परिश्रम से सत्ता भाजपा को एक थाली में सजा कर दे सकता है तो केरल में भी यह स्थिति जल्द आ सकती है. तब एक बार फिर मार्क्स के उस कथन पर शक हो सकता है कि भारत साम्यवाद के पनपने के लिए बेहतरीन जमीन है.


navodya times

Saturday, 10 March 2018

उत्तर प्रदेश में विकास मानक पर चौंकाने वाले परिणाम संभव


        नयी योजनायें किसानों का भाग्य बदल सकती हैं 
विकास-परक शासन बेहद जटिल और टेक्निकल होता जा रहा है. एक शासक के लिए यह समझना कि कैसे टेक्नोलॉजी का प्रयोग भ्रष्टाचार -मुक्त शासन और जन-कल्याण की योजनाओं की तीव्र डिलीवरी के लिए किया जाये, बेहद ज़रूरी होता जा रहा है. मुख्यमंत्री के रूप में वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसे बखूबी समझा था. बाद में कई अन्य मुख्यमंत्रियों ने कमोबेश इस पर अमल किया. ऐसे में किसी गेरुआवस्त्रधारी सन्यासी के हाथ में राजदंड थामना, और वह भी पहली बार, एक असामान्य प्रयोग था. हमारे जैसे विश्लेषकों को विश्वास नहीं था कि आक्रामक हिंदुत्व के अलावा उत्तर प्रदेश में महंत आदित्यनाथ योगी कुछ कर सकेंगें. और उस काल के सभी निरपेक्ष विश्लेषण यही मानते थे कि २२ करोड आबादी, सवा चार लाख करोड के बजट और शाश्वत शासकीय उन्नेदापन के शिकार और इसकी वजह से विकास के तमाम पैरामीटरों पर सबसे निचले पायदान पर खड़े इस प्रदेश में अगर कुछ बढेगा तो वह सामाजिक वैमनस्य और तनाव. लेकिन हम गलत साबित हुए. उत्तर प्रदेश सरकार हाल के कुछ फैसले विकास योजनाओं की बारीकियों की समझ रखने वालों के लिए हीं नहीं केंद्र सरकार के लिए भी चौंकाने वाले हैं. दरअसल इनमें से कुछ पर केंद्र सरकार भी अभी स्वयं हीं अमल करने की सोच रही है और साथ हीं राज्यों से उनके लिए नीति बनाने की गुजारिश करने जा रही है जब कि उत्तर प्रदेश उनपर अमल के मार्ग पर बढ़ गया है.   
किसी राज्य का विकास बहुत कुछ राज्य नेतृत्व पर निर्भर करता है. उत्तर भारत में कम से कम चार राज्य –उत्तर प्रदेश , मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ इस दिशा में लगातार कोशिश कर रहे हैं. मध्य प्रदेश के किसानों की उपज के उचित मूल्य के लिए “भावान्तर भुगतान योजना” को आज केंद्र भी देश के स्तर पर लागू करने जा रहा है, हालांकि तेलंगाना की इसी तरह की योजना ज्यादा बेहतर है. छत्तीसगढ़ का राशन वितरण एक उदाहरण है. उधर दक्षिण भारत बेहद प्रगतिशील और प्रशासनिक रूप से बेहतर राज्यों का मानना है कि उत्तर भारत के सरकारी निकम्मेपन की सजा योजना सहायता के मद में कटौती के रूप में उन्हें झेलनी पड़ती है. केंद्र का यह कहना है कि उसे पिछड़े राज्यों को मदद के लिए पैसा देना होता है. बिहार परिवार नियोजन में बुरी तरह असफल रहा लेकिन पिछड़े राज्य के नाम पर विशेष राज्य का दर्ज़ा मांग रहा है जो तमिलनाडु और केरल को खटकता है.     
उत्तर प्रदेश चिर अ-विकास की स्थिति से निकलना चाहता है. कुछ ताज़ा उदहारण देखें. आम तौर पर इन्वेस्टर समिट हर मुख्यमंत्री का शगल हो गया है. लाखों रुपये खर्च कर देश और विदेश के भी कुछ उद्योगपतियों का जमवाड़ा, कुछ दस्तावेजों पर इनके और किसी सरकारी अफसर के हस्ताक्षर जिसे सहमति पत्र या एम ओ यूं (मेमोरेंडम ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग) कहा जाता है और जिनका कोई खास मतलब नहीं होता लेकिन मीडिया को बताया जाता है कि इतने लाख करोड के निवेश का वादा हुआ. पांच साल बाद नया मुख्यमंत्री फिर ऐसा हीं आयोजन करता है. बिहार इसका जवलंत उदाहरण है. लेकिन लखनऊ में हाल हीं में संपन्न इस समिट के बाद मुख्यमंत्री हर रोज इन इन्वेस्टरों से बात कर रहे हैं और उनकी अन्तर-संरचनात्मक जरूरतों को पूरा करने के काम में लग गया हैं. खबर है कि उद्योगिक घराने इस बदलते प्रदेश पर भरोसा कर गंभीरता से निवेश करने जा रहे हैं. संगठित अपराध में कमी और पुलिस एनकाउंटर से निवेश का माहौल बन रहा है. नक़ल पर जबरदस्त लगाम को भी “योगी मीन्स बिज़नेस” (योगी को काम से मतलब है) के  क्रम में देखा जा रहा है. 
एक अन्य फैसला जो हाल में लिया गया है वह है “एक जिला, एक उत्पाद” का. यह कन्सेप्ट जापान से निकला था जो चीन के आलावा दक्षिण एशिया के तमाम में कारगर साबित हुआ. योगी सरकार ने हाल हीं में इसे एक अभियान का स्वरुप दिया है और अधिकारियों की समिति इसके आधार पर जिलों को और उनमें तैयार किये जाने वाले उत्पादों का चयन कर चुकी हैं. जैसे आगरा में चमड़ा ऊत्पादन, फिरोजाबाद में कांच की चूड़ियाँ, मथुरा में बाथरूम-फिटिंग्स तो इलाहाबाद में अमरुद और प्रतापगढ़ में आवला और कौशांबी में केला प्रोसेसिंग. इस जापानी अवधारणा का लाभ यह होगा कि एक जिले में स्किल्ड वर्कर आसानी से उपलब्ध हो सकेंगे और तकनीक के स्तर पर भी केन्द्रित (फोकस्ड) विकास किया जा सकेगा. साथ हीं खरीददारों को जगह -जगह नहीं जाना होगा. उत्पाद अगर कृषि आधारित है तो किसानों को उपज के विपणन के लिए स्थानीय स्तर पर बेहतर मूल्य मिल सकेगा. इस उत्पादों पर आधारित उद्योगों के लिए स्पेशल राहत पैकेज भी दिया जाएगा.    
प्रदेश कैबिनेट ने ६ मार्च, २०१८ को फैसला लिया कि मंडी एक्ट में संशोधन करके निजी क्षेत्र के लोगों (याने स्थानीय किसान-उत्पादक संगठनों) को अधिकार दिया जाएगा कि वे अपनी मंडी स्थापित करें ताकि किसानों को प्रतियोगी बाज़ार मिले और वे अपनी उपज का उचित मूल्य ले सकें. यह नीति एक माह पहले केंद्र सरकार को सौपी गयी दलवई समिति की रिपोर्ट में दी गयी संस्तुति में है. किसानों की आय दूना करने के लिए सलाह देने वाली दलवई समिति की १४ वॉल्यूम की रिपोर्ट में पांच मुख्य संस्तुतियां हैं. सबसे महत्वपूर्ण संस्तुति यह है कि संविधान में संशोधन कर कृषि विपणन को समवर्ती सूची में लाया जाये ताकि किसानों को अपने उत्पाद बेचने के लिए अंतर -राज्यीय बाज़ार मिल सके. उसी संस्तुति में यह भी कहा गया है कि किसान-उत्पादक संगठन (एफ पी ओ) इन मंडियों को स्थानीय स्तर पर चलायें. गाँव के साप्ताहिक बाज़ार भी मंडियों का स्वरुप लें और सही मूल्य न मिलने पर सरकारी गोदामों में किसान अपना अनाज रख सकें और इस उत्पाद के एवज में उन्हें जरूरत का क़र्ज़ भी दिया जाये जो किसान तब वापस करे जब उसे अपने उत्पाद का अच्छा दाम मिले. याने वे सदियों से हो रहे स्थानीय साहूकार और अढ़तिया के शोषण का शिकार न बन सकें. संस्तुति के अनुसार ये मंडियां राष्ट्रीय विपणन ग्रिड के जरिये जुडी होंगी ताकि किसानों को अपने उत्पाद बेंचने के लिए व्यापक विकल्प मिले.  
इसी क्रम में कोई तीन हफ्ते पहले योगी सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया जिसके तहत किसानों अपनी जमीन बगैर लैंड -यूज (जो बेहद दुरूह प्रक्रिया है) बदलवाए कृषि -आधारित उद्योगों के लिए दीर्घ-कालिक लीज पर दे सकता है. इसका लाभ यह होगा कि उद्यमी निवेश कर सकेंगे और सस्ते किराये पर भूमि उपलब्ध होगी. बुंदेलखंड के किसानों को जिनकी उपज बेहद कम है, यह आजीविका का बड़ा साधन बन सकेगा.     
ऐसा लग रहा है कि योगी दलवाई समिति की रिपोर्ट के अनुरूप हीं किसानों के लेकर अपनी नीति तैयार कर रहे हैं. हालाँकि अपेक्षित और तीव्र सफलता के लिए केंद्र से भी उसी रफ़्तार से राष्ट्रीय योजनायें बनाना जरूरी होगा. गैर-भाजपा राज्य आम तौर पर संविधान में संशोधन कर केंद्र की शक्तियों को बढाने का विरोध करते रहे हैं लेकिन आज देश के २१ राज्यों में भाजपा का शासन है लिहाज़ा वह दिक्कत भी लगभग ख़त्म है.    
शहरों में जिस तरह नगर निकायों की कार्य शैली बदली है और घर-घर आ कर आवाज देकर नगर निगमों और विकास प्राधिकरणों के कर्मचारियों द्वारा कूड़ा माँगा जा रहा है वह इस नयी कार्यशैली का परिचायक है. यह अलग बात है कि कुछ लोगों और अधिकारियों का गठजोड़ (जिसे प्रशासनिक सिद्धांतों के तहत कोल्युसिव करप्शन के रूप में जाना जाता है) इन प्रयासों के खिलाफ जन -भावना भड़काने में लगा है. लेकिन मुख्यमंत्री को यह भी जानना आवश्यक है कि ऐसे तमाम शहर हैं जिनमें भ्रष्ट अफसरों के द्वारा फर्जी शौचालय के आंकड़ें दे कर “खुले शौचालय मुक्त” (ओपन डेफिकेशन फ्री) जिले का दर्ज़ा हासिल कर लिया गया है. ग्राम प्रधान और लेखपाल से लेकर बी डी ओ तक अभी भी विकास के पैसे हड़पने में आकंठ डूबे हैं. 
जाहिर है स्वच्छ भारत से न तो किसी नरेन्द्र मोदी को वोट मिलते हैं न हीं नक़ल रोकने से किसी योगी को. लेकिन जब अभी तक जंग लगे उदासीन सत्ता की सकारात्मक धमक से कोई अपराधी मरता है या नकलची इम्तहान छोड़ता है या कूड़े की गाडी अल-सुबह घर के सामने पहुँच कर “सर्वसम्मानित नागरिकों को सूचित किया जाता है कि कूड़ा गाडी आपके द्वार पर आयी है और आप अपने घर का कूड़ा इसमें डाल कर शहर को स्वच्छ रखने में मदद करें” की गुहार लाउडस्पीकर से लगाती है तो सरकार की मंशा पर शक नहीं किया जा सकता बल्कि उसे जन-समर्थन की जरूरत होती है. 

jagran

Saturday, 3 March 2018

भ्रष्टाचार: क्यों हुई जन-अनुभूति और नकारात्मक




एक ताज़ा अध्ययन के अनुसार दुनिया के दो-तिहाई देश भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के मामले में पूर्व में तो छोडिये, हाल के वर्षों में भी कुछ नहीं कर रहे हैं. इनमें से अधिकांश में प्रजातान्त्रिक शासन है. क्या जनता को भ्रष्टाचार से कोई परहेज नहीं है, या फिर सत्ता के लिए उनका चुनाव गलत है अथवा यह मान लिया जाये कि सत्ता पर चाहे कोई बैठे, सिस्टम से भ्रष्टाचार ख़त्म नहीं हो सकता? ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के सन २०१७ के लिए जारी इस अध्ययन में भारत भ्रष्टाचार सूचकांक पर दो स्थान और पीछे (७९ से ८१ पर) खिसक गया है याने देश में इस शाश्वत सामाजिक व्याधि को लेकर जन-अनुभूति सन २०१६ के मुकाबले ज्यादा खराब हुई है. ध्यान रहे कि यह सर्वे जन-अनुभूति को लेकर किया जाता है और जब यह सर्वे किया गया होगा उस समय बैंक घोटाला नहीं हुआ था और साथ हीं नोटबंदी के प्रभाव को लेकर आम जनता में तकलीफ चाहे जो रही हो, इसे मोदी सरकार का भ्रष्टाचार के खिलाफ एक अच्छा प्रयास माना जाने लगा था.
आखिर इस जन-अनुभूति की वजह क्या है? प्रजातंत्र तो जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा शासन माना जाता है और भारत सहित कई देश इसे कई दशकों से प्रयोग में ला रहे हैं. अगर इन देशों का जी डी पी तमाम खाने फांदता हुआ २५ सालों में छठें स्थान पर आ सकता है (.६० लाख क्रोड़े रुपये) तो फिर जनता को क्यों लगता है कि भ्रष्टाचार ख़त्म करने में हमारा सत्ताधारी वर्ग उदासीन या अक्षम साबित हो रहा है? अगर एक निष्पक्ष विश्लेषण करें तो यह कह सकते कि पिछले चार साल के मोदी शासन में वर्तमान बैंक घोटाले को छोड़ कर कोई बड़ा भ्रष्टाचार सामने नहीं आया है. नोटबंदी में सबसे ज्यादा आहत भी भ्रष्ट लोग हुए और कष्ट के बावजूद आम जन यह माना कर “कि कुछ शुरू तो हुआ” , खुश हुआ. फिर जन -अनुभूति में नकारात्मकता घटने के बजाय क्यों बढी?
इस कारण जानने के लिए भारत में भ्रष्टाचार की बदलती प्रकृति को समझना होगा. भ्रष्टाचार दो तरह के होते हैं --- पहला भयादोहन (शेकडाउन सिस्टम) या सरकारी काम करने के पैसे जो कि भयादोहन का हीं एक परिष्कृत रूप है और दूसरा “सहमति से” (पेऑफ़ सिस्टम). द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग की १२ वॉल्यूम की विस्तृत रिपोर्ट के वॉल्यूम ४ में इन दोनों प्रकार के भ्रष्टाचार के स्वरूपों की व्यापक विवेचना करते हुए इन्हें “कोएर्सिव” और “कोल्युसिव” नाम दिया है. पहले किस्म के भ्रष्टाचार में पुलिस का ट्रक वालों से पैसा वसूलना, ग्राम प्रधान का सरकारी सब्सिडी दिलाने के लिए गरीबों से पैसा लेना या लेखपाल का कर्ज माफी की पात्रता के लिए नाम आगे बढ़ाना या शहरों में मकान का नक्शा पास करवाने, जन्म – या मृत्यु प्रमाण देने या पासपोर्ट सत्यापन में पैसे लेना होता है. पेऑफ़ या कोल्युसिव सिस्टम के भ्रष्टाचार बैंक घोटाला, -जी स्पेक्ट्रम या तमान बड़े घोटाले आते हैं जिनमें एक सहमति होती है जैसे पुल बनाने में इंजिनियर और ठेकेदार के बीच. इस भ्रष्टाचार से समाज अप्रत्यक्षरूप से लेकिन बड़ा नुकसान सहता है. भारत सहित दुनिया के तमान देशों में पेऑफ़ सिस्टम का भ्रष्टाचार १९७० से शुरू हुआ और आज यह व्यापक रूप ले चुका है. इस विषय के जानकारों का मानना है कि इस भ्रष्टाचार को ख़त्म करना बेहद मुश्किल होता है क्योंकि इसका शिकार व्यक्ति नहीं पूरा समाज होता है जो कि अमूर्त है और उदार प्रजातंत्र में अदालतें सबूत और गवाह चाहती हैं लिहाज़ा भ्रष्ट व्यक्ति आराम से कोर्ट से छूट जाता है. -जी स्पेक्ट्रम का हश्र सामने है.
इसमें कोई दो राय नहीं कि वर्तमान मोदी सरकार में मंत्रियों की संलिप्तता के मामले तो छोडिये, बड़े भ्रष्टाचार के मामले नहीं हुए हैं. फिर क्यों इस मुद्दे पर लोगों की धारणा सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक बढी है? मोदी सरकार भी इसे नहीं समझ रही है. यह पहले किस्म के भ्रष्टाचार के जारी रहने से और कम न होने से बढी है. इसके दो कारण हैं. जन-कल्याण योजनाओं जैसे उज्जवला, गरीबों को मकान या शौचालय पर अनुदान की राशि हीं नहीं व्यापकता भी बढी लेकिन इसकी डिलीवरी में कहीं न कहीं भ्रष्ट राज्य अभिकरण की अपरिहार्य भूमिका होती है लिहाज़ा यह भ्रष्टाचार बढ़ गया है. प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत राज्य सरकारों ने आवास सहायकों की अस्थायी नियुक्ति की. चूंकि ये घूस दे कर आये और इनका कार्यकाल अस्थायी है लिहाज़ा ये भी लूट में लग गए . गरीबी से नीचे रहने वाले लोगों में आवास के लिए पात्रता का प्रमाण ये हीं देते हैं अर्थात यह प्रमाणित करते हैं कि अमुक व्यक्ति के पास पक्का मकान नहीं है. फिर जब अगली क़िस्त का समय आता है तो उसके पहले भी इन्हें पिछले पैसे कितना काम हुआ का प्रमाण पत्र देना होता है. बिहार के नवादा जिले में एक विधायक को जब शिकायत मिली कि सुपात्र लोगों में से २२ के नाम पात्रता लिस्ट से गायब हैं और गौर-पात्रता वाले नाम जोड़ दिए गए है तो उसने आवास सहायक को बैठक में डांटा. उसने बताया कि मुखिया ने यह किया है. इस पर जब उससे विधायक ने कहा कि तुमने दस्तखत क्यों किया तो उसने बताया कि खंड विकास अधिकारी ने जबरदस्ती दस्तखत करवा लिए. याने मुखिया, सहायक , अधिकारी सभी इस लूट में शामिल हैं. तब उसने जिले के डी डी सी शिकायत की. अभी तक उस अधिकारी ने भी कुछ नहीं किया. जड़ें गहरी होती जा रही हैं. उत्तर भारत के राज्यों में इस तरह का भ्रष्टाचार हावी है. जाहिर है जब सर्वे में इन लाभार्थियों या लाभ से वंचित लोगों से पूछा जाएगा कि भ्रष्टाचार में पहले से कमी आयी या यह बढ़ा तो उसका जवाब भोगा हुआ यथार्थ के आधार पर होगा भले हीं वह मोदी और उनकी योजनाओं से खुश हो.
जन -प्रतिनिधि अपने इलाके में जा कर इस भ्रष्टाचार को कम करा सकते हैं पर अधिकांस बैठकों में सांसद शायद हीं कभी जाते हैं फिर इन परियोजनाओं के बारे में उनका ज्ञान भी सीमित होता है. प्रधानमंत्री का आदेश होई कि सांसद क्षेत्र में हर माह कम से कम तीन दिन बिताएं पर वे शाम को दिल्ली या राज्य की राजधानी से जिला मुख्यालय पहुंचते हैं अगले दिन क्षेत्र के बड़े लोगों के घर भोजन और सर्किट हाउस में रात बिता कर सुबह फिर दिल्ली के लिए रवाना –तीन का कोटा पूरा. नतीजा यह है कि जितनी विकास या जन कल्याण की योजनायें आयेंगी उतना हीं राज्य अभिकरणों में बैठे लोग भ्रष्टाचार करेंगे और उतना हीं कमज़ोर तबका त्रस्त होगा और नाराजगी बढ़ेगी.
अब ज़रा तस्वीर का दूसरा चौकाने वाला एक और पहलू देखें. सन २०१३-१४ में सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार कृषि क्षेत्र की कुल आय जी डी पी का मात्र १५ प्रतिशत थी या यूं कहें कि लगभग ४.६० लाख करोड़ थी लेकिन ९,१४,५०६ लोगों के दावा किया कि उनके पास कृषि आय है और यह भी कि उन्होने खेती से उस वर्ष २००० लाख करोड़ रुपये का उत्पादन किया. याने वास्तविक सरकारी उत्पादन आंकड़ों से ४०० गुना या उस साल में देश के कुल जी डी पी (९० लाख करोड़ रुपये) से २२ गुना ज्यादा (एक सांख्यिकी असम्भावना!). लेकिन न तो उस समय की यू पी ए -२ सरकार इस पर चौंकी न हीं वर्तमान सरकार ने आयोग बैठकर इस काला धन सफ़ेद करने के लिए कृषि आय का झूठा आंकड़ा देने वालों को जेल की हवा खिलाई. यही वजह है दुनिया के दो -तिहाई देश प्रजातंत्र होने के बावजूद इस दंश को झेलते रहेंगे.


lokmat/ navodaya

Thursday, 1 March 2018

गाँधी-लोहिया-दीनदयाल-आंबेडकर का वैचारिक संगम एक अनूठा प्रयास


संविधान लगभग बन कर तैयार हो चुका था कि अचानक गाँधी के निकटतम सहयोगियों में एक श्रीमन्नारायण ने निर्माताओं से पूछा, “इस पूरे संविधान में गाँधी की ग्रामसमाज की अवधारणा की तो कहीं चर्चा भी नहीं है?” आननफानन में बमुश्किल तमाम इसे राज्य के नीति निर्देशक तत्वों में अनुच्छेद ४० के रूप में जोड़ा गया. यह अलग बात है कि इस अवधारणा पर अमल अगले ४२ साल तक नहीं किया गया. सन १९९२ में पंचायत राज एक्ट ७३ वें संविधान संशोधन के तहत लाया गया और ग्रामपंचायतों को अधिकार मिले. संविधान की प्रस्तावना में आर्थिक न्याय व अवसर की समानता की बात है परन्तु ७० साल में गरीब -अमीर के बीच खाई बढ़ती गयी है. तमाम मकबूल संस्थाओं के ताज़ा अध्ययन लगातार यह बता रहे हों कि भारत में गरीब-अमीर के बीच फासला बढ़ता जा रहा है. हाल के एक अध्ययन के अनुसार देश में १०१ अरबपतियों की संपत्ति बढ़कर कुल जी डी पी का १५ प्रतिशत हो गयी है जो पांच साल पहले १० प्रतिशत और १३ साल पहले पांच प्रतिशत हुआ करती थी. सन १९८८ से सन २०११ के बीच जहाँ सबसे नीचे तबके के १० प्रतिशत गरीबों की संपत्ति २०० रुपये से भी कम बढी है वहीं शीर्ष एक प्रतिशत की १८२ गुना. आज की आर्थिक -सामाजिक व्यवस्था में क्या हम संविधान में दी गयी प्रतिबद्धता के आस पास भी पहुँच पा रहे हैं? समाज सरचना की विदेशी अवधारणा पर आधारित व्यवस्था के लगभग सभी दोष अब सामने आ चुके हैं. और आज जरूरत एक नए मौलिक सोच की है.
राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने विगत ११ फ़रवरी को ग्वालियर में डॉक्टर लोहिया स्मृति व्याख्यान में लगभग इसी बात को एक बार फिर ध्वनित किया. उनका कहना था “ऐसा लगता है कि संसद से सड़क तक समाज के अंतिम व्यक्ति के हक़ में जन-चेतना की मशाल जलने वाले डॉक्टर लोहिया सामाजिक विषमताओं और शोषण की राजनीति को चुनौती देने के लिए हीं संभवतः पैदा हुआ थे ........ अपनी विचारधाराओं के आधारभूत तत्व को ग्रहण करते हुए समाज के अंतिम व्यक्ति के हित में काम करने की भावना के विभिन्न रूप महात्मा गाँधी, डॉक्टर आंबेडकर, डॉक्टर लोहिया और दीनदयाल उपाध्याय के चिंतन और संघर्ष में देखने को मिलते हैं. इन सभी विभूतियों ने देश की समस्याओं के एकांगी और विदेश समाधानों की जगह समग्र और जमीनी सुधारों पर जोर दिया. उनके रास्ते भले हीं अलग-अलग थे लेकिन उन सभी का एक हीं उद्देश्य था : भारत के लोगों को विशेषकर पिछड़े लोगों को बराबरी और सम्मान का हक़ दिलाना”.
भारतीय जनता पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी ने अपने एक अध्यक्षीय भाषण में कहा था : शासन प्रकिया चलाने में काफी हद तक विचारधारा की कोई भूमिका नहीं होती. आदर्श (आइडियल) और विचारधारा (आइडियोलॉजी) में अंतर होता है. हो सकता है कि कम्युनिस्टों और भारतीय जनता पार्टी के लोगों की विचारधारा अलग-अलग हो लेकिन दोनों का गंतव्य याने आइडियल एक ही है”.
जरा व्यावहारिक धरातल इन महापुरुषों के आदर्शों पर गौर करें जिनकी चर्चा राष्ट्रपति इस आशय से की कि इनकी समेकित सोच दिक्-काल के हिसाब से एक नया रास्ता देगी. एक ऐसे समय में जब गरीब -अमीर की खाई लगातार बढ़ रही हो, समाज में अभाव- ग्रस्त एक बड़ा तबका अवसर की समानता न मिलने से अपनी योग्यता नही दिखा पा रहा हो शायद आज नीति निर्धारण में इन सभी महापुरुषों की विचारधारा में एक सामजस्य बैठाना हीं सबसे सही रास्ता होगा.
जरा इन महापुरुषों के मूल विचारों में साम्य देखें. लोहिया के नारे : “राजा पूत निर्धन संतान, सबकी शिक्षा एक सामान” या “जो जमीन को जोते बोवे, वही जमीन का मालिक होवे”. पंडित दीनदयाल ने अपने चार बीज भाषणों में से अंतिम में कहा था : भगवान् की सर्वश्रेष्ठ कृति मानव अपने को खोता जा रहा है ... हमारी अर्थ व्यवस्था का उद्देश्य होना चाहिए – प्रत्येक व्यक्ति को न्यूनतम जीवन स्तर की आश्वस्ति .... प्रत्येक वयस्क और स्वस्थ व्यक्ति को साभिप्राय जीविका का अवसर देना. गाँधी का न्यासिता (ट्रस्टीशिप) का सिद्धांत और आंबेडकर के समतामूलक समाज की अवधारणा. ये सभी एक हीं दिशा में इंगित करते हैं.
उधर संघ परिवार के दिग्दर्शक पंडित दीनदयाल ने एकात्म मानववाद का सिद्धांत प्रतिपादित करते हुए अपने दूसरे भाषण में कहा था : विविधता में एकता अथवा एकता का विविध रूपों में व्यक्तिकरण हीं भारतीय संस्कृति का केन्द्रस्थ विचार है. यदि इस तथ्य को हमने हृदयंगम कर लिया तो फिर विभिन्न सत्ताओं के बीच संघर्ष नहीं रहेगा. यदि संघर्ष है तो वह प्रकृति का अथवा संस्कृति का द्योतक नहीं, विकृति का द्योतक है. ......देखने को तो जीवन में भाई-भाई के बीच प्रेम और वैर दोनों मिलते हैं, किन्तु हम प्रेम को अच्छा मानते हैं. बंधु-भाव का विस्तार हमारा लक्ष्य रहता है”. अर्थात विचारधारा याने रास्ते चाहे जैसे हों, गन्तव या आइडियल (आदर्श) एक हीं हैं.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नानाजी देशमुख ने देश में समाजवाद के प्रणेता और धुर समाजवादी चिन्तक डॉक्टर राम मनोहर लोहिया को सन १९६३ में संघ के शिविर में आने का न्योता भेजा. शिविर से बाहर निकलने पर लोहिया से पत्रकारों ने उनके आने का कारण पूछा. लोहिया का जवाब था , “मैं इन सन्यासियों को गृहस्थ बनाने गया था”. इसके कुछ हीं महीने बाद १२ अप्रैल, १९६४ को लोहिया और भारतीय जनता पार्टी के शीर्षपुरुष और अद्भुत विचारक पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने एक साझा बयान जारी किया जिसने तत्कालीन राजनीतिक विश्लेषकों हीं नहीं पूरे देश को चौंका दिया. आने वाले दो -तीन वर्ष विचारधारा के स्तर पर उत्तर और दक्षिण ध्रुव माने जाने वाले नेताओं में अजब सामंजस्य रहा और यहाँ तक की जौनपुर के उप चुनाव में डॉक्टर साहेब ने पंडित जी के लिए प्रचार किया. और यहीं से बजा कांग्रेस के एकल दल वर्चस्व (सिंगल पार्टी डोमिनेन्स) के अवसान का बिगुल और १९६७ में देश के दस राज्यों में संविद सरकार का आना. कहा जाता था कि उस समय जी टी रोड से यात्रा करते हुए अमृतसर से कलकत्ता तक बगैर किसी कांग्रेस शासन वाले राज्य से गुजरे पहुँचा जा सकता था.
राष्ट्रपति ने गरीबों के कल्याण के सन्दर्भ और इन तथ्यों के मद्देनज़र की पिछले ७० सालों में गरीब-अमीर के बीच की खाई बढ़ती जा रहा है और उनके कल्याण लिए अपेक्षित प्रयास नहीं हुए हैं एक नए प्रयास पर बल देने पर था कि इन महापुरुषों के कथन को आप्तवचन मानते हुए नीति-निर्धारण के मूल में गरीबों का कल्याण रखा जाये और ऐसा करने में यह न देखा जाये कि अमल में लेन का रास्ता समाजवाद की ओर से जाता है या पूंजीवाद की ओर से या वह अवधारणा किस व्यक्ति की है या वह किसी विचारधारा का प्रतिपादक रहा है.
अगर ७० के प्रजातंत्र के बाद भी गाँव के एक कामगार रोज कमरतोड़ मेहनत के बाद ५० साल की कमाई होती है वह एक अच्छे कंपनी का मेनेजर १७.५ दिन में कमाता है तो न तो हम संविधान की प्रस्तावना में किया वादे पर खरे उतारे न हीं असली गाँधी के सपनों की असली प्रजातंत्र ला पाए. शायद यही राष्ट्रपति का दर्द था.


jagran

Saturday, 17 February 2018

किसानों का दबाव समूह जातिवाद ख़त्म होने के नए लक्षण



सत्ता में किसानों का डर एक बेहतर प्रजातंत्र का आगाज़ 

हाल की दो बेहद कल्याणकारी सरकारी घोषणाओं पर नज़र डालें. केंद्र की मोदी सरकार को एक साल बाद होने वाले आम चुनाव के पहले के अंतिम पूर्ण बजट में किसानों को उनकी उपज के लागत मूल्य का ५० प्रतिशत लाभ देने का ऐलान किया. साथ हीं १० करोड गरीब परिवारों को पांच लाख रुपये तक का स्वास्थ्य बीमा देना भी बजट वादे में शामिल था. जाहिर है अधिकांश गरीब चाहे वह किसान-मजदूर हो या औद्योगिक श्रमिक उनकी जड़ें गावों में हीं है लिहाज़ा यह लाभ भी आमतौर पर उनके हीं हित में रहेगा. एक हफ्ते के भीतर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने किसानों का दो लाख रुपये तक का क़र्ज़ माफ़ करने का हीं नहीं बल्कि गेंहू का न्यूनतम समर्थन मूल्य दो हज़ार रुपये प्रति कुंतल करने का (वर्तमान में राष्ट्रीय केंद्र द्वारा घोषित दर १७३५ प्रति कुंतल है) और साथ हीं जिन किसानों ने इससे नीचे के मूल्य पर बेचा है उन्हें भी बकाया राशि देने का ऐलान किया. इस घोषणा के अभी कुछ हीं घंटे बीते थे कि राजस्थान के मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया ने भी किसानों का ५० हज़ार रुपये तक का क़र्ज़ माफ़ करने की घोषणा की. इन दोनों राज्यों में कुछ हीं महीने में चुनाव होने हैं. और इन दोनों राज्यों में किसान गुस्से में है. मध्य प्रदेश में किसानों पर फायरिंग, जिसमें छः किसान मारे गए, के कारण और राजस्थान में उपज का मूल्य बेहद कम होने के कारण. राजस्थान के उप- चुनाव में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी की करारी हार किसानों के गुस्से का ताज़ा उदाहरण है. गुजरात के विधान सभा चुनाव में भी इसके संकेत मिलाने लगे थे जब सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा० को राज्य के कुल ३३ जिलों में से अपेक्षाकृत ग्रामीण क्षेत्र के १५ जिलें में से सात में एक भी सीट नहीं मिली और बाकि आठ के हर जिले में मात्र एक-एक सीट मिली. आज चूंकि देश के ३६ में से १९ राज्यों में या यूं कहें कि केंद्र के अलावा देश की ६८ प्रतिशत आबादी पर इस दल का राज्य सरकारों के जरिये शासन है लिहाज़ा किसानों को भी कोई कंफ्यूजन नहीं है कि नाराजगी की दिशा क्या होनी चाहिए.
देश के ६८ साल के प्रजातंत्र में पहली बार किसान एक दबाव समूह के रूप में उभरा है. अभी तक मंचों से “किसान भाइयों” कह कर नेता अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेता था. इस राजनीतिक उनीदेपन का नतीजा यह हुआ कि पिछले २५ साल से लगातार हर ३६ मिनट पर एक किसान आत्महत्या करता रहा और इसी अवधि में हर रोज़ २०५२ किसान खेती छोड़ते रहे. किसान दबाव समूह नहीं बन पाया अगर कभी कोशिश हुई भी तो वह जाति समूह में बाँट दिया गया और राजनीतिक दल उनके उपज का सही मूल्य दिलाने की जगह उन्हें और उनके बच्चो को आरक्षण दिलाने के सब्ज-बाग़ दिखा कर वोट लेने लगे. समाज बांटता गया और राजनीतिक वर्ग सत्ता सुख भोगता गया.
एक उदाहरण देखें. सन २०१४ के आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के घोषणा पत्र के पृष्ठ ४४ में कृषि, उत्पादकता और उसका पारितोषिक शीर्षक चुनावी वादे में कहा गया है “ ऐसे कदम उठाये जायेंगे जिससे कृषि क्षेत्र में लाभ बढे और यह सुनिश्चित किया जाएगा कि लागत का ५० प्रतिशत लाभ हो”. लेकिन चुनाव के कुछ हीं महीने बाद केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दिनांक २० फ़रवरी, २०१५ को अपने हलफनामे में कहा ‘किसानों के उत्पाद के लागत का ५० प्रतिशत अधिक देना संभव नहीं है क्योंकि इससे बाज़ार में दुष्परिणाम होंगे”. इसी बीच २०१६-१७ नए सरकार के प्रति अद्भुद उत्साह दिखाते हुए किसानों ने मेहनत की , ज्यादा रकबे में खेती कर और रिकॉर्ड २७६ मिलियन टन उत्पादन कर लेकिन जहाँ पिछले दो साल इंद्र भगवान् रूठे रहे, इस साल कीमतें जमीन से नहीं उठीं नतीजतन किसान का क्रोध सभी सीमायें पार कर गया.
इन सात दशकों में अब किसान यह समझने लगा है कि आलू यादव जी का हो या पंडित जी का या फिर किराये पर खेती कर रहे किसी जाटव का , अगर उसकी लागत पांच रुपये प्रति किलो है (जो कृषि लागत के एक्सपर्ट्स भी मानते हैं) और फसल तैयार होने पर उसकी कीमत दो रुपये या चार रुपये मंडी में मिल रही है तो वह अब समझने लगा है कि उसके परिवार का निवाला छीनने वाला कोई उच्च जाति का जमींदार नहीं बल्कि शीर्ष पर सत्ता में बैठा नेता है चाहे वह किसी भी राजनीतिक दल का क्यूं न हो. उसे न तो किसी मुलायम ने राहत दी न हीं किसी मायावती ने. मध्य प्रदेश में और महाराष्ट्र में प्याज और दाल का भी यही हाल हुआ और आंध्र प्रदेश और तेलंगाना का किसान भी टमाटर सड़क पर उडेलता मिला.
मोदी सरकार गुजरात चुनाव के बाद यह समझ गयी कि राजनीति अब परम्परागत तरीके से नहीं हो सकती क्योंकि किसानों के इस आन्दोलन के पीछे पहली बार न तो कोई राजनीतिक पार्टी है न हीं कोई नेता. यह स्व-स्फूर्त है और यही कारण है कि पूरे देश की सरकारें आज इस बात पर नज़र रख रही हैं कि किसान की उपज की अधिकाधिक मूल्य खाली घोषणाओं में न रहे बल्कि अमल में भी लाया जाये.
उत्तर प्रदेश ने अखिलेश सरकार के मुकाबले कई गुना अधिक गेंहू की खरीददारी (.७ मिलियन टन) की हालाँकि शपथ लेने के बाद मुख्यमंत्री योगी का वादा आठ मिलियन टन खरीद का था. योगी का प्रयास अच्छा था लेकिन कुछ महीनों बाद आलू के गिरते भाव से प्रदेश का किसान आहत है.
बहरहाल प्रधानमंत्री मोदी इस बार यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि वादा पूरी तरह मुकम्मल हो और यही वजह है कि इस हफ्ते हुई प्रदेशों के खाद्य सचिवों की बैठक में भी गेंहू की खरीद का टारगेट तो पिछली साल के ३३ मिलियन टन से घटा कर ३२ मिलियन कर दिया गया है लेकिन हिदायत यह है कि ये टारगेट पूरा होने चाहिए और वह भी बिना किसी भष्टाचार के. पिछले साल इस टारगेट के मुकाबले ३०.०८ मिलियन टन हीं गेंहू की खरीद हुई थी. उत्तर प्रदेश का टारगेट चार मिलियन टन रखा गया है जबकि राज्य में सरकारी विक्रय केन्द्रों से विभिन्न जनकल्याण योजनाओं में गरीबों को अनाज बांटने के लिए छः मिलियन टन गेंहू की ज़रुरत होती है.
ऐसा माना जा रहा है कि मोदी सरकार अबकी बार हर संभव कदम उठायेगी कि किसानों को आगामी अप्रैल में गेंहू और अक्टूबर में धान की सरकारी खरीद में कोई कोताही न हो और चूंकि तमाम बड़े राज्यों में भी भाजपा की सरकारें हैं इसलिए इस योजना को अमल मदन लेन में दिक्कत पेश नहीं आयेगी.
बहरहाल किसानों की एक राष्ट्र-व्यापी गैर-राजनीतिक दबाव समूह में परिवर्तित होना बेहतर होते प्रजातंत्र की शुरुआत है और जातिवाद के दंश का खात्मे की भी. एक विकासपरक राजनीति के लिए भारतीय जनता पार्टी के लिए हीं नहीं सभी राजनीतिक दलों के लिए भी स्वस्थ राजनीति करने का सुनहरा अवसर बशर्ते वे इसे अवसर समझें.


lokmat

Friday, 2 February 2018

बजट: किसानों और गरीबों के लिए “अच्छे दिन” अगर अमल हो

सरकार ने किसानों को उनकी लागत का १५० प्रतिशत समर्थन मूल्य देने का जो वादा इस बजट में किया है वह खरीफ की फसल से लागू होगा और इस साल के खरीफ की खरीददारी लगभग ख़त्म हो चुकी है लिहाज़ा यह अगले खरीफ से हीं लागू हो सकेगा याने अगले नवम्बर के आसपास. इन लोगों के अनुसार मोदी सरकार अगर चुनाव अक्टूबर माह के आसपास कराती है तो यह वायदा कभी पूरा नहीं हो सकेगा


       
बजट २०१८, जो वर्तमान मोदी सरकार का आखिरी पूर्ण बजट है, सरकार की चुनाव -पूर्व मंशा का बेहद जटिल दस्तावेज है. इसमें सरकार ने शहरी मध्यम व् उच्च वर्ग की अपेक्षाओं को लगभग नज़रंदाज़ करते हुए बृहत ग्रामीण भारत पर अपना दांव लगाया है. शायद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को गुजरात चुनाव के बाद यह अहसास हुआ कि किसानों को नाराज़ कर वह चुनाव की वैतरणी पर नहीं कर पाएंगे. यही वजह है कि इस बजट पर  आपको दो तरह की प्रतिक्रिया देखने को मिलगी. शहरी माध्यम व उच्च वर्ग इससे निराश हुआ है और इसका तत्काल परिणाम सेंसेक्स में आयी ४०० पॉइंट की गिरावत से साफ़ जाहिर हुआ. लेकिन गहराई से और निरपेक्ष भाव से किया गए विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि बजट में जो घोषणाएं की गयी है वे  ग्रामीण भारत के लिए पिछले कई दशकों से अपेक्षित अनोखा व सकारात्मक प्रबद्धता से इस सरकार को बांधती है और भारत के कृषि के लिए यह क्रांतिकारी बजट कहा जा सकता है. किसानों के लागत मूल्य पर ५० प्रतिशत बढ़ा कर उनके उत्पाद की खरीद करने की सरकारी प्रतिबद्धता और १० करोड गरीब परिवारों (याने ५० करोड लोगों को) को पांच लाख का स्वास्थ्य बीमा शायद एक मजबूत अर्थ-व्यवस्था की सामाजिक सुरक्षा की दिशा में पहली जरूरत थी. कहना न होगा कि इन १० करोड़ गरीब परिवारों में किसान , मजदूर और निम्न आय वर्ग का बड़ा तबका लाभान्वित होगा.  
लेकिन यहाँ पर एक पेंच है. जो लोग सरकार की मंशा पर प्रश्न चिन्ह लगते हैं उनका कहना है कि सरकार ने किसानों को उनकी लागत का १५० प्रतिशत समर्थन मूल्य देने का जो वादा इस बजट में किया है वह खरीफ की फसल से लागू होगा और इस साल के खरीफ की खरीददारी लगभग ख़त्म हो चुकी है लिहाज़ा यह अगले खरीफ से हीं लागू हो सकेगा याने अगले नवम्बर के आसपास. इन लोगों के अनुसार मोदी सरकार अगर चुनाव अक्टूबर माह के आसपास कराती है तो यह वायदा कभी पूरा नहीं हो सकेगा. लेकिन जो सरकार की मंशा में विश्वास रखते हैं उनके अनुसार कोई भी सरकार जो चुनाव जीतना चाहती है और जो नाराज किसानों को खुश करना चाहती है वह इस वायदे से मुकरने पर किसानों के आक्रोश का शिकार हो सकती है. इनका मानना है कि आगामी रबी की फसल के दौरान भी वह अपने वादे को पूरा करना चाहेगी. एक अनुमान के अनुसार इसमें सरकार का कुल खर्च लगभग ६० हज़ार करोड आयेगा. चुनाव पूर्व ऐसा खर्च किसी सरकार के लिए कोई बहुत मुश्किल काम नहीं होगा. रबी की फसल की खरीददारी आगामी अप्रैल माह से शुरू होनी है. और यह वादा खिलाफी सरकार को बेहद महंगी पड़ सकती है. सरकार में बैठे लोगों का यह कहना है कि इस बार मोदी सरकार किसानों की अनदेखी शायद हीं कर पाए. ध्यान देने की बात है कि दो दिन पहले संसद में पेश आर्थिक सर्वेक्षण में सरकार ने साफ़ तौर पर माना था कि किसानों की वास्तविक आय पिछले चार सालों में नहीं बढी है.        
पहली बार किसानों के उत्पाद के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य को लागत के ५० प्रतिशत ज्यादा देने का संकल्प जो फिलहाल खरीफ की फसलों पर लागू होगा कृषि की बेहतरी की दिशा में एक बड़ा कदम है. ऐसा वादा सन २०१४ के चुनाव के घोषणा पत्र में किया गया था लेकिन अगले हीं वर्ष सरकार इससे मुकर गयी और सुप्रीम कोर्ट में अपने हलफनामे में सरकारी पक्ष ने इसे देने में अपनी असमर्थता व्यक्त की थी. विपक्षी दलों ने इसे एक बड़ा मुद्दा बनाया था. जाहिर है खरीफ की फसल की सरकारी खरीददारी अब अवसान पर है लेकिन चूंकि सन २०१९ में चुनाव होने हैं लिहाज़ा अप्रैल माह से शुरू होने वाले रबी की खरीददारी में इस सरकार को यह योजना बहाल करनी हीं होगी. इसका मतलब यह हुआ कि आने वाले कृषि उत्पादों पर किसान को इस चिर-अपेक्षित मांग का बड़ा लाभ मिलना लगभग तय है. किसानों की फसल का लागत मूल्य तय करने का काम सी ए सी पी नाम की संस्था करती है. और इसे दो पैमानों पर मापा जाता है --- ए -२ और सी -२ . स्वामीनाथन समिति की रिपोर्ट के अनुसार सी -२ पैमाने पर जिसमें किसान और उसके परिवार का अपना श्रम और जमीन की कीमत भी शामिल है सम्मिलित होता है. अगर यह मान लिया जाये कि सरकार ए -२ के आधार पर हीं कीमतें सुनिश्चित करेंगी तो भी यह किसानों के लिए एक बड़ी राहत होगी. उदाहरण के तौर पर    धान की कीमत सी -२ आधारित फार्मूले के अनुसार १४२६ रुपये प्रति कुंतल है और अगर इस पर ५० प्रतिशत बढ़ा कर समर्थन मूल्य तय किया गया तो धान का समर्थन मूल्य लगभग २१३९ रुपये प्रति कुंतल होगा. भारत के इतिहास में इतना बड़ा लाभ किसानों को आज तक नहीं मिला है. इस गणना को अगर आगामी रबी और खासकर गेहूं की फसल पर लागू किया गया तो गेंहू का समर्थन मूल्य भी करीब १९०० रुपये प्रति कुंतल हो जाएगा . उत्तर भारत के किसानों के लिए, जहाँ गेंहू की खेती सबसे ज्यादा होती है, यह वरदान साबित होगा. यही वजह है कि प्रधानमंत्री ने बजट के तत्काल बाद के अपनी प्रतिक्रिया में बताया कि बजट में लगभग १४.५ लाख करोड़ रुपये ग्रामीण भारत के कल्याण पर खर्च किये जा रहे हैं . उनका जोर इस बात पर था कि किसानों के लिए बढ़ा समर्थन मूल्य एक बड़ी न्यामत सरकार की ओर से ग्रामीणों को है. 
सरकार के पास एक तरफ कुआं था और दूसरी तरफ खाई. अगर मध्यम और उच्च वर्ग को खुश करने के लिए आय -कर और कारपोरेशन कर में अपेक्षित छूट देती तो राजस्व कम आता और तब कल्याणकारी योजनाओं के लिए खर्च करने का मतलब होता राजस्व घाटे में भारी बढ़ोत्तरी जो किसी भी अर्थ व्यवस्था के स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं माना जाता. दूसरी और अगर किसानों के लिए और गरीबों के लिए अपना पिटारा न खोलती तो मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग मुंह फेर लेता . ऐसे में मोदी सरकार ने दूसरा विकल्प चुना. 
अगर किसी गरीब का पांच लाख रुपये तक का इलाज़ सरकार की किसी योजना से मुफ्त होने लगे तो यह आज़ाद भारत में सामाजिक सुरक्षा का एक बड़ा मकाम कहा जा सकता है. आज के बजट में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने स्पष्ट रूप से कहा कि देश के ५० करोड लोगों को इस योजन का लाभ मिलेगा. क्या कोई सरकार चुनाव के पूर्व के वर्ष में यह हिमाकत करेगी कि ऐसा वादा करे और फिर मुकर जाये या उचित क्रियान्वयन न करे ? 
शहरी उच्च व् मध्यम वर्ग इस बात से भी निराश हुआ कि जहाँ एक ओर बैंक में जमा पूंजी पर ब्याज दरें लगातार कम हो रही हों और इस वर्ग को मजबूर हो कर अपना पैसा म्यूच्यूअल फण्ड में या इक्विटी में लगाना पड़ रहा है वहीं आज के बजट में म्यूच्यूअल फण्ड से होने वाले एक लाख से अधित के लाभ पर १० प्रतिशत टैक्स का प्रावधान कर दिया है. नाराजगी का दूसरा कारण है “इस हाथ से देने और उस हाथ से लेने “ की नीति जो इस बजट में दिखाई दी. जहाँ इनकम टैक्स में नौकरी पेशा लोगों के लिए ४० हज़ार का स्टैण्डर्ड डिडक्शन का प्रावधान कर २.९० लाख (पहले २.५० था) तक करमुक्त किया गया है वहीं मेडिकल और ट्रांसपोर्ट पर मिलाने वाले ३० हज़ार रुपये तक के छूट को समाप्त कर दिया गया है याने कुल लाभ महज १० हज़ार रुपये तक के छूट का ही रहा. 
बहरहाल इस बजट से मोदी सरकार अब वचनबद्ध हो चुकी है कि या तो किसानों के रबी के उपज का समर्थन मूल्य अगले अप्रैल से ५० बढ़ाये या आठ राज्यों के चुनाव में हीं नहीं बल्कि २०१९ के आम चुनाव में भी किसानों और खेतिहर मजदूरों के कोपभाजन बने. एक साल बीतने में ज्यादा वक्त नहीं लगता और नहीं वर्तमान सरकार को पूर्ण बजट पेश करने का फिर मौका मिलेगा.  

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