Saturday, 3 March 2018

भ्रष्टाचार: क्यों हुई जन-अनुभूति और नकारात्मक




एक ताज़ा अध्ययन के अनुसार दुनिया के दो-तिहाई देश भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के मामले में पूर्व में तो छोडिये, हाल के वर्षों में भी कुछ नहीं कर रहे हैं. इनमें से अधिकांश में प्रजातान्त्रिक शासन है. क्या जनता को भ्रष्टाचार से कोई परहेज नहीं है, या फिर सत्ता के लिए उनका चुनाव गलत है अथवा यह मान लिया जाये कि सत्ता पर चाहे कोई बैठे, सिस्टम से भ्रष्टाचार ख़त्म नहीं हो सकता? ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के सन २०१७ के लिए जारी इस अध्ययन में भारत भ्रष्टाचार सूचकांक पर दो स्थान और पीछे (७९ से ८१ पर) खिसक गया है याने देश में इस शाश्वत सामाजिक व्याधि को लेकर जन-अनुभूति सन २०१६ के मुकाबले ज्यादा खराब हुई है. ध्यान रहे कि यह सर्वे जन-अनुभूति को लेकर किया जाता है और जब यह सर्वे किया गया होगा उस समय बैंक घोटाला नहीं हुआ था और साथ हीं नोटबंदी के प्रभाव को लेकर आम जनता में तकलीफ चाहे जो रही हो, इसे मोदी सरकार का भ्रष्टाचार के खिलाफ एक अच्छा प्रयास माना जाने लगा था.
आखिर इस जन-अनुभूति की वजह क्या है? प्रजातंत्र तो जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा शासन माना जाता है और भारत सहित कई देश इसे कई दशकों से प्रयोग में ला रहे हैं. अगर इन देशों का जी डी पी तमाम खाने फांदता हुआ २५ सालों में छठें स्थान पर आ सकता है (.६० लाख क्रोड़े रुपये) तो फिर जनता को क्यों लगता है कि भ्रष्टाचार ख़त्म करने में हमारा सत्ताधारी वर्ग उदासीन या अक्षम साबित हो रहा है? अगर एक निष्पक्ष विश्लेषण करें तो यह कह सकते कि पिछले चार साल के मोदी शासन में वर्तमान बैंक घोटाले को छोड़ कर कोई बड़ा भ्रष्टाचार सामने नहीं आया है. नोटबंदी में सबसे ज्यादा आहत भी भ्रष्ट लोग हुए और कष्ट के बावजूद आम जन यह माना कर “कि कुछ शुरू तो हुआ” , खुश हुआ. फिर जन -अनुभूति में नकारात्मकता घटने के बजाय क्यों बढी?
इस कारण जानने के लिए भारत में भ्रष्टाचार की बदलती प्रकृति को समझना होगा. भ्रष्टाचार दो तरह के होते हैं --- पहला भयादोहन (शेकडाउन सिस्टम) या सरकारी काम करने के पैसे जो कि भयादोहन का हीं एक परिष्कृत रूप है और दूसरा “सहमति से” (पेऑफ़ सिस्टम). द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग की १२ वॉल्यूम की विस्तृत रिपोर्ट के वॉल्यूम ४ में इन दोनों प्रकार के भ्रष्टाचार के स्वरूपों की व्यापक विवेचना करते हुए इन्हें “कोएर्सिव” और “कोल्युसिव” नाम दिया है. पहले किस्म के भ्रष्टाचार में पुलिस का ट्रक वालों से पैसा वसूलना, ग्राम प्रधान का सरकारी सब्सिडी दिलाने के लिए गरीबों से पैसा लेना या लेखपाल का कर्ज माफी की पात्रता के लिए नाम आगे बढ़ाना या शहरों में मकान का नक्शा पास करवाने, जन्म – या मृत्यु प्रमाण देने या पासपोर्ट सत्यापन में पैसे लेना होता है. पेऑफ़ या कोल्युसिव सिस्टम के भ्रष्टाचार बैंक घोटाला, -जी स्पेक्ट्रम या तमान बड़े घोटाले आते हैं जिनमें एक सहमति होती है जैसे पुल बनाने में इंजिनियर और ठेकेदार के बीच. इस भ्रष्टाचार से समाज अप्रत्यक्षरूप से लेकिन बड़ा नुकसान सहता है. भारत सहित दुनिया के तमान देशों में पेऑफ़ सिस्टम का भ्रष्टाचार १९७० से शुरू हुआ और आज यह व्यापक रूप ले चुका है. इस विषय के जानकारों का मानना है कि इस भ्रष्टाचार को ख़त्म करना बेहद मुश्किल होता है क्योंकि इसका शिकार व्यक्ति नहीं पूरा समाज होता है जो कि अमूर्त है और उदार प्रजातंत्र में अदालतें सबूत और गवाह चाहती हैं लिहाज़ा भ्रष्ट व्यक्ति आराम से कोर्ट से छूट जाता है. -जी स्पेक्ट्रम का हश्र सामने है.
इसमें कोई दो राय नहीं कि वर्तमान मोदी सरकार में मंत्रियों की संलिप्तता के मामले तो छोडिये, बड़े भ्रष्टाचार के मामले नहीं हुए हैं. फिर क्यों इस मुद्दे पर लोगों की धारणा सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक बढी है? मोदी सरकार भी इसे नहीं समझ रही है. यह पहले किस्म के भ्रष्टाचार के जारी रहने से और कम न होने से बढी है. इसके दो कारण हैं. जन-कल्याण योजनाओं जैसे उज्जवला, गरीबों को मकान या शौचालय पर अनुदान की राशि हीं नहीं व्यापकता भी बढी लेकिन इसकी डिलीवरी में कहीं न कहीं भ्रष्ट राज्य अभिकरण की अपरिहार्य भूमिका होती है लिहाज़ा यह भ्रष्टाचार बढ़ गया है. प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत राज्य सरकारों ने आवास सहायकों की अस्थायी नियुक्ति की. चूंकि ये घूस दे कर आये और इनका कार्यकाल अस्थायी है लिहाज़ा ये भी लूट में लग गए . गरीबी से नीचे रहने वाले लोगों में आवास के लिए पात्रता का प्रमाण ये हीं देते हैं अर्थात यह प्रमाणित करते हैं कि अमुक व्यक्ति के पास पक्का मकान नहीं है. फिर जब अगली क़िस्त का समय आता है तो उसके पहले भी इन्हें पिछले पैसे कितना काम हुआ का प्रमाण पत्र देना होता है. बिहार के नवादा जिले में एक विधायक को जब शिकायत मिली कि सुपात्र लोगों में से २२ के नाम पात्रता लिस्ट से गायब हैं और गौर-पात्रता वाले नाम जोड़ दिए गए है तो उसने आवास सहायक को बैठक में डांटा. उसने बताया कि मुखिया ने यह किया है. इस पर जब उससे विधायक ने कहा कि तुमने दस्तखत क्यों किया तो उसने बताया कि खंड विकास अधिकारी ने जबरदस्ती दस्तखत करवा लिए. याने मुखिया, सहायक , अधिकारी सभी इस लूट में शामिल हैं. तब उसने जिले के डी डी सी शिकायत की. अभी तक उस अधिकारी ने भी कुछ नहीं किया. जड़ें गहरी होती जा रही हैं. उत्तर भारत के राज्यों में इस तरह का भ्रष्टाचार हावी है. जाहिर है जब सर्वे में इन लाभार्थियों या लाभ से वंचित लोगों से पूछा जाएगा कि भ्रष्टाचार में पहले से कमी आयी या यह बढ़ा तो उसका जवाब भोगा हुआ यथार्थ के आधार पर होगा भले हीं वह मोदी और उनकी योजनाओं से खुश हो.
जन -प्रतिनिधि अपने इलाके में जा कर इस भ्रष्टाचार को कम करा सकते हैं पर अधिकांस बैठकों में सांसद शायद हीं कभी जाते हैं फिर इन परियोजनाओं के बारे में उनका ज्ञान भी सीमित होता है. प्रधानमंत्री का आदेश होई कि सांसद क्षेत्र में हर माह कम से कम तीन दिन बिताएं पर वे शाम को दिल्ली या राज्य की राजधानी से जिला मुख्यालय पहुंचते हैं अगले दिन क्षेत्र के बड़े लोगों के घर भोजन और सर्किट हाउस में रात बिता कर सुबह फिर दिल्ली के लिए रवाना –तीन का कोटा पूरा. नतीजा यह है कि जितनी विकास या जन कल्याण की योजनायें आयेंगी उतना हीं राज्य अभिकरणों में बैठे लोग भ्रष्टाचार करेंगे और उतना हीं कमज़ोर तबका त्रस्त होगा और नाराजगी बढ़ेगी.
अब ज़रा तस्वीर का दूसरा चौकाने वाला एक और पहलू देखें. सन २०१३-१४ में सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार कृषि क्षेत्र की कुल आय जी डी पी का मात्र १५ प्रतिशत थी या यूं कहें कि लगभग ४.६० लाख करोड़ थी लेकिन ९,१४,५०६ लोगों के दावा किया कि उनके पास कृषि आय है और यह भी कि उन्होने खेती से उस वर्ष २००० लाख करोड़ रुपये का उत्पादन किया. याने वास्तविक सरकारी उत्पादन आंकड़ों से ४०० गुना या उस साल में देश के कुल जी डी पी (९० लाख करोड़ रुपये) से २२ गुना ज्यादा (एक सांख्यिकी असम्भावना!). लेकिन न तो उस समय की यू पी ए -२ सरकार इस पर चौंकी न हीं वर्तमान सरकार ने आयोग बैठकर इस काला धन सफ़ेद करने के लिए कृषि आय का झूठा आंकड़ा देने वालों को जेल की हवा खिलाई. यही वजह है दुनिया के दो -तिहाई देश प्रजातंत्र होने के बावजूद इस दंश को झेलते रहेंगे.


lokmat/ navodaya

Thursday, 1 March 2018

गाँधी-लोहिया-दीनदयाल-आंबेडकर का वैचारिक संगम एक अनूठा प्रयास


संविधान लगभग बन कर तैयार हो चुका था कि अचानक गाँधी के निकटतम सहयोगियों में एक श्रीमन्नारायण ने निर्माताओं से पूछा, “इस पूरे संविधान में गाँधी की ग्रामसमाज की अवधारणा की तो कहीं चर्चा भी नहीं है?” आननफानन में बमुश्किल तमाम इसे राज्य के नीति निर्देशक तत्वों में अनुच्छेद ४० के रूप में जोड़ा गया. यह अलग बात है कि इस अवधारणा पर अमल अगले ४२ साल तक नहीं किया गया. सन १९९२ में पंचायत राज एक्ट ७३ वें संविधान संशोधन के तहत लाया गया और ग्रामपंचायतों को अधिकार मिले. संविधान की प्रस्तावना में आर्थिक न्याय व अवसर की समानता की बात है परन्तु ७० साल में गरीब -अमीर के बीच खाई बढ़ती गयी है. तमाम मकबूल संस्थाओं के ताज़ा अध्ययन लगातार यह बता रहे हों कि भारत में गरीब-अमीर के बीच फासला बढ़ता जा रहा है. हाल के एक अध्ययन के अनुसार देश में १०१ अरबपतियों की संपत्ति बढ़कर कुल जी डी पी का १५ प्रतिशत हो गयी है जो पांच साल पहले १० प्रतिशत और १३ साल पहले पांच प्रतिशत हुआ करती थी. सन १९८८ से सन २०११ के बीच जहाँ सबसे नीचे तबके के १० प्रतिशत गरीबों की संपत्ति २०० रुपये से भी कम बढी है वहीं शीर्ष एक प्रतिशत की १८२ गुना. आज की आर्थिक -सामाजिक व्यवस्था में क्या हम संविधान में दी गयी प्रतिबद्धता के आस पास भी पहुँच पा रहे हैं? समाज सरचना की विदेशी अवधारणा पर आधारित व्यवस्था के लगभग सभी दोष अब सामने आ चुके हैं. और आज जरूरत एक नए मौलिक सोच की है.
राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने विगत ११ फ़रवरी को ग्वालियर में डॉक्टर लोहिया स्मृति व्याख्यान में लगभग इसी बात को एक बार फिर ध्वनित किया. उनका कहना था “ऐसा लगता है कि संसद से सड़क तक समाज के अंतिम व्यक्ति के हक़ में जन-चेतना की मशाल जलने वाले डॉक्टर लोहिया सामाजिक विषमताओं और शोषण की राजनीति को चुनौती देने के लिए हीं संभवतः पैदा हुआ थे ........ अपनी विचारधाराओं के आधारभूत तत्व को ग्रहण करते हुए समाज के अंतिम व्यक्ति के हित में काम करने की भावना के विभिन्न रूप महात्मा गाँधी, डॉक्टर आंबेडकर, डॉक्टर लोहिया और दीनदयाल उपाध्याय के चिंतन और संघर्ष में देखने को मिलते हैं. इन सभी विभूतियों ने देश की समस्याओं के एकांगी और विदेश समाधानों की जगह समग्र और जमीनी सुधारों पर जोर दिया. उनके रास्ते भले हीं अलग-अलग थे लेकिन उन सभी का एक हीं उद्देश्य था : भारत के लोगों को विशेषकर पिछड़े लोगों को बराबरी और सम्मान का हक़ दिलाना”.
भारतीय जनता पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी ने अपने एक अध्यक्षीय भाषण में कहा था : शासन प्रकिया चलाने में काफी हद तक विचारधारा की कोई भूमिका नहीं होती. आदर्श (आइडियल) और विचारधारा (आइडियोलॉजी) में अंतर होता है. हो सकता है कि कम्युनिस्टों और भारतीय जनता पार्टी के लोगों की विचारधारा अलग-अलग हो लेकिन दोनों का गंतव्य याने आइडियल एक ही है”.
जरा व्यावहारिक धरातल इन महापुरुषों के आदर्शों पर गौर करें जिनकी चर्चा राष्ट्रपति इस आशय से की कि इनकी समेकित सोच दिक्-काल के हिसाब से एक नया रास्ता देगी. एक ऐसे समय में जब गरीब -अमीर की खाई लगातार बढ़ रही हो, समाज में अभाव- ग्रस्त एक बड़ा तबका अवसर की समानता न मिलने से अपनी योग्यता नही दिखा पा रहा हो शायद आज नीति निर्धारण में इन सभी महापुरुषों की विचारधारा में एक सामजस्य बैठाना हीं सबसे सही रास्ता होगा.
जरा इन महापुरुषों के मूल विचारों में साम्य देखें. लोहिया के नारे : “राजा पूत निर्धन संतान, सबकी शिक्षा एक सामान” या “जो जमीन को जोते बोवे, वही जमीन का मालिक होवे”. पंडित दीनदयाल ने अपने चार बीज भाषणों में से अंतिम में कहा था : भगवान् की सर्वश्रेष्ठ कृति मानव अपने को खोता जा रहा है ... हमारी अर्थ व्यवस्था का उद्देश्य होना चाहिए – प्रत्येक व्यक्ति को न्यूनतम जीवन स्तर की आश्वस्ति .... प्रत्येक वयस्क और स्वस्थ व्यक्ति को साभिप्राय जीविका का अवसर देना. गाँधी का न्यासिता (ट्रस्टीशिप) का सिद्धांत और आंबेडकर के समतामूलक समाज की अवधारणा. ये सभी एक हीं दिशा में इंगित करते हैं.
उधर संघ परिवार के दिग्दर्शक पंडित दीनदयाल ने एकात्म मानववाद का सिद्धांत प्रतिपादित करते हुए अपने दूसरे भाषण में कहा था : विविधता में एकता अथवा एकता का विविध रूपों में व्यक्तिकरण हीं भारतीय संस्कृति का केन्द्रस्थ विचार है. यदि इस तथ्य को हमने हृदयंगम कर लिया तो फिर विभिन्न सत्ताओं के बीच संघर्ष नहीं रहेगा. यदि संघर्ष है तो वह प्रकृति का अथवा संस्कृति का द्योतक नहीं, विकृति का द्योतक है. ......देखने को तो जीवन में भाई-भाई के बीच प्रेम और वैर दोनों मिलते हैं, किन्तु हम प्रेम को अच्छा मानते हैं. बंधु-भाव का विस्तार हमारा लक्ष्य रहता है”. अर्थात विचारधारा याने रास्ते चाहे जैसे हों, गन्तव या आइडियल (आदर्श) एक हीं हैं.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नानाजी देशमुख ने देश में समाजवाद के प्रणेता और धुर समाजवादी चिन्तक डॉक्टर राम मनोहर लोहिया को सन १९६३ में संघ के शिविर में आने का न्योता भेजा. शिविर से बाहर निकलने पर लोहिया से पत्रकारों ने उनके आने का कारण पूछा. लोहिया का जवाब था , “मैं इन सन्यासियों को गृहस्थ बनाने गया था”. इसके कुछ हीं महीने बाद १२ अप्रैल, १९६४ को लोहिया और भारतीय जनता पार्टी के शीर्षपुरुष और अद्भुत विचारक पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने एक साझा बयान जारी किया जिसने तत्कालीन राजनीतिक विश्लेषकों हीं नहीं पूरे देश को चौंका दिया. आने वाले दो -तीन वर्ष विचारधारा के स्तर पर उत्तर और दक्षिण ध्रुव माने जाने वाले नेताओं में अजब सामंजस्य रहा और यहाँ तक की जौनपुर के उप चुनाव में डॉक्टर साहेब ने पंडित जी के लिए प्रचार किया. और यहीं से बजा कांग्रेस के एकल दल वर्चस्व (सिंगल पार्टी डोमिनेन्स) के अवसान का बिगुल और १९६७ में देश के दस राज्यों में संविद सरकार का आना. कहा जाता था कि उस समय जी टी रोड से यात्रा करते हुए अमृतसर से कलकत्ता तक बगैर किसी कांग्रेस शासन वाले राज्य से गुजरे पहुँचा जा सकता था.
राष्ट्रपति ने गरीबों के कल्याण के सन्दर्भ और इन तथ्यों के मद्देनज़र की पिछले ७० सालों में गरीब-अमीर के बीच की खाई बढ़ती जा रहा है और उनके कल्याण लिए अपेक्षित प्रयास नहीं हुए हैं एक नए प्रयास पर बल देने पर था कि इन महापुरुषों के कथन को आप्तवचन मानते हुए नीति-निर्धारण के मूल में गरीबों का कल्याण रखा जाये और ऐसा करने में यह न देखा जाये कि अमल में लेन का रास्ता समाजवाद की ओर से जाता है या पूंजीवाद की ओर से या वह अवधारणा किस व्यक्ति की है या वह किसी विचारधारा का प्रतिपादक रहा है.
अगर ७० के प्रजातंत्र के बाद भी गाँव के एक कामगार रोज कमरतोड़ मेहनत के बाद ५० साल की कमाई होती है वह एक अच्छे कंपनी का मेनेजर १७.५ दिन में कमाता है तो न तो हम संविधान की प्रस्तावना में किया वादे पर खरे उतारे न हीं असली गाँधी के सपनों की असली प्रजातंत्र ला पाए. शायद यही राष्ट्रपति का दर्द था.


jagran

Saturday, 17 February 2018

किसानों का दबाव समूह जातिवाद ख़त्म होने के नए लक्षण



सत्ता में किसानों का डर एक बेहतर प्रजातंत्र का आगाज़ 

हाल की दो बेहद कल्याणकारी सरकारी घोषणाओं पर नज़र डालें. केंद्र की मोदी सरकार को एक साल बाद होने वाले आम चुनाव के पहले के अंतिम पूर्ण बजट में किसानों को उनकी उपज के लागत मूल्य का ५० प्रतिशत लाभ देने का ऐलान किया. साथ हीं १० करोड गरीब परिवारों को पांच लाख रुपये तक का स्वास्थ्य बीमा देना भी बजट वादे में शामिल था. जाहिर है अधिकांश गरीब चाहे वह किसान-मजदूर हो या औद्योगिक श्रमिक उनकी जड़ें गावों में हीं है लिहाज़ा यह लाभ भी आमतौर पर उनके हीं हित में रहेगा. एक हफ्ते के भीतर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने किसानों का दो लाख रुपये तक का क़र्ज़ माफ़ करने का हीं नहीं बल्कि गेंहू का न्यूनतम समर्थन मूल्य दो हज़ार रुपये प्रति कुंतल करने का (वर्तमान में राष्ट्रीय केंद्र द्वारा घोषित दर १७३५ प्रति कुंतल है) और साथ हीं जिन किसानों ने इससे नीचे के मूल्य पर बेचा है उन्हें भी बकाया राशि देने का ऐलान किया. इस घोषणा के अभी कुछ हीं घंटे बीते थे कि राजस्थान के मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया ने भी किसानों का ५० हज़ार रुपये तक का क़र्ज़ माफ़ करने की घोषणा की. इन दोनों राज्यों में कुछ हीं महीने में चुनाव होने हैं. और इन दोनों राज्यों में किसान गुस्से में है. मध्य प्रदेश में किसानों पर फायरिंग, जिसमें छः किसान मारे गए, के कारण और राजस्थान में उपज का मूल्य बेहद कम होने के कारण. राजस्थान के उप- चुनाव में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी की करारी हार किसानों के गुस्से का ताज़ा उदाहरण है. गुजरात के विधान सभा चुनाव में भी इसके संकेत मिलाने लगे थे जब सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा० को राज्य के कुल ३३ जिलों में से अपेक्षाकृत ग्रामीण क्षेत्र के १५ जिलें में से सात में एक भी सीट नहीं मिली और बाकि आठ के हर जिले में मात्र एक-एक सीट मिली. आज चूंकि देश के ३६ में से १९ राज्यों में या यूं कहें कि केंद्र के अलावा देश की ६८ प्रतिशत आबादी पर इस दल का राज्य सरकारों के जरिये शासन है लिहाज़ा किसानों को भी कोई कंफ्यूजन नहीं है कि नाराजगी की दिशा क्या होनी चाहिए.
देश के ६८ साल के प्रजातंत्र में पहली बार किसान एक दबाव समूह के रूप में उभरा है. अभी तक मंचों से “किसान भाइयों” कह कर नेता अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेता था. इस राजनीतिक उनीदेपन का नतीजा यह हुआ कि पिछले २५ साल से लगातार हर ३६ मिनट पर एक किसान आत्महत्या करता रहा और इसी अवधि में हर रोज़ २०५२ किसान खेती छोड़ते रहे. किसान दबाव समूह नहीं बन पाया अगर कभी कोशिश हुई भी तो वह जाति समूह में बाँट दिया गया और राजनीतिक दल उनके उपज का सही मूल्य दिलाने की जगह उन्हें और उनके बच्चो को आरक्षण दिलाने के सब्ज-बाग़ दिखा कर वोट लेने लगे. समाज बांटता गया और राजनीतिक वर्ग सत्ता सुख भोगता गया.
एक उदाहरण देखें. सन २०१४ के आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के घोषणा पत्र के पृष्ठ ४४ में कृषि, उत्पादकता और उसका पारितोषिक शीर्षक चुनावी वादे में कहा गया है “ ऐसे कदम उठाये जायेंगे जिससे कृषि क्षेत्र में लाभ बढे और यह सुनिश्चित किया जाएगा कि लागत का ५० प्रतिशत लाभ हो”. लेकिन चुनाव के कुछ हीं महीने बाद केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दिनांक २० फ़रवरी, २०१५ को अपने हलफनामे में कहा ‘किसानों के उत्पाद के लागत का ५० प्रतिशत अधिक देना संभव नहीं है क्योंकि इससे बाज़ार में दुष्परिणाम होंगे”. इसी बीच २०१६-१७ नए सरकार के प्रति अद्भुद उत्साह दिखाते हुए किसानों ने मेहनत की , ज्यादा रकबे में खेती कर और रिकॉर्ड २७६ मिलियन टन उत्पादन कर लेकिन जहाँ पिछले दो साल इंद्र भगवान् रूठे रहे, इस साल कीमतें जमीन से नहीं उठीं नतीजतन किसान का क्रोध सभी सीमायें पार कर गया.
इन सात दशकों में अब किसान यह समझने लगा है कि आलू यादव जी का हो या पंडित जी का या फिर किराये पर खेती कर रहे किसी जाटव का , अगर उसकी लागत पांच रुपये प्रति किलो है (जो कृषि लागत के एक्सपर्ट्स भी मानते हैं) और फसल तैयार होने पर उसकी कीमत दो रुपये या चार रुपये मंडी में मिल रही है तो वह अब समझने लगा है कि उसके परिवार का निवाला छीनने वाला कोई उच्च जाति का जमींदार नहीं बल्कि शीर्ष पर सत्ता में बैठा नेता है चाहे वह किसी भी राजनीतिक दल का क्यूं न हो. उसे न तो किसी मुलायम ने राहत दी न हीं किसी मायावती ने. मध्य प्रदेश में और महाराष्ट्र में प्याज और दाल का भी यही हाल हुआ और आंध्र प्रदेश और तेलंगाना का किसान भी टमाटर सड़क पर उडेलता मिला.
मोदी सरकार गुजरात चुनाव के बाद यह समझ गयी कि राजनीति अब परम्परागत तरीके से नहीं हो सकती क्योंकि किसानों के इस आन्दोलन के पीछे पहली बार न तो कोई राजनीतिक पार्टी है न हीं कोई नेता. यह स्व-स्फूर्त है और यही कारण है कि पूरे देश की सरकारें आज इस बात पर नज़र रख रही हैं कि किसान की उपज की अधिकाधिक मूल्य खाली घोषणाओं में न रहे बल्कि अमल में भी लाया जाये.
उत्तर प्रदेश ने अखिलेश सरकार के मुकाबले कई गुना अधिक गेंहू की खरीददारी (.७ मिलियन टन) की हालाँकि शपथ लेने के बाद मुख्यमंत्री योगी का वादा आठ मिलियन टन खरीद का था. योगी का प्रयास अच्छा था लेकिन कुछ महीनों बाद आलू के गिरते भाव से प्रदेश का किसान आहत है.
बहरहाल प्रधानमंत्री मोदी इस बार यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि वादा पूरी तरह मुकम्मल हो और यही वजह है कि इस हफ्ते हुई प्रदेशों के खाद्य सचिवों की बैठक में भी गेंहू की खरीद का टारगेट तो पिछली साल के ३३ मिलियन टन से घटा कर ३२ मिलियन कर दिया गया है लेकिन हिदायत यह है कि ये टारगेट पूरा होने चाहिए और वह भी बिना किसी भष्टाचार के. पिछले साल इस टारगेट के मुकाबले ३०.०८ मिलियन टन हीं गेंहू की खरीद हुई थी. उत्तर प्रदेश का टारगेट चार मिलियन टन रखा गया है जबकि राज्य में सरकारी विक्रय केन्द्रों से विभिन्न जनकल्याण योजनाओं में गरीबों को अनाज बांटने के लिए छः मिलियन टन गेंहू की ज़रुरत होती है.
ऐसा माना जा रहा है कि मोदी सरकार अबकी बार हर संभव कदम उठायेगी कि किसानों को आगामी अप्रैल में गेंहू और अक्टूबर में धान की सरकारी खरीद में कोई कोताही न हो और चूंकि तमाम बड़े राज्यों में भी भाजपा की सरकारें हैं इसलिए इस योजना को अमल मदन लेन में दिक्कत पेश नहीं आयेगी.
बहरहाल किसानों की एक राष्ट्र-व्यापी गैर-राजनीतिक दबाव समूह में परिवर्तित होना बेहतर होते प्रजातंत्र की शुरुआत है और जातिवाद के दंश का खात्मे की भी. एक विकासपरक राजनीति के लिए भारतीय जनता पार्टी के लिए हीं नहीं सभी राजनीतिक दलों के लिए भी स्वस्थ राजनीति करने का सुनहरा अवसर बशर्ते वे इसे अवसर समझें.


lokmat

Friday, 2 February 2018

बजट: किसानों और गरीबों के लिए “अच्छे दिन” अगर अमल हो

सरकार ने किसानों को उनकी लागत का १५० प्रतिशत समर्थन मूल्य देने का जो वादा इस बजट में किया है वह खरीफ की फसल से लागू होगा और इस साल के खरीफ की खरीददारी लगभग ख़त्म हो चुकी है लिहाज़ा यह अगले खरीफ से हीं लागू हो सकेगा याने अगले नवम्बर के आसपास. इन लोगों के अनुसार मोदी सरकार अगर चुनाव अक्टूबर माह के आसपास कराती है तो यह वायदा कभी पूरा नहीं हो सकेगा


       
बजट २०१८, जो वर्तमान मोदी सरकार का आखिरी पूर्ण बजट है, सरकार की चुनाव -पूर्व मंशा का बेहद जटिल दस्तावेज है. इसमें सरकार ने शहरी मध्यम व् उच्च वर्ग की अपेक्षाओं को लगभग नज़रंदाज़ करते हुए बृहत ग्रामीण भारत पर अपना दांव लगाया है. शायद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को गुजरात चुनाव के बाद यह अहसास हुआ कि किसानों को नाराज़ कर वह चुनाव की वैतरणी पर नहीं कर पाएंगे. यही वजह है कि इस बजट पर  आपको दो तरह की प्रतिक्रिया देखने को मिलगी. शहरी माध्यम व उच्च वर्ग इससे निराश हुआ है और इसका तत्काल परिणाम सेंसेक्स में आयी ४०० पॉइंट की गिरावत से साफ़ जाहिर हुआ. लेकिन गहराई से और निरपेक्ष भाव से किया गए विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि बजट में जो घोषणाएं की गयी है वे  ग्रामीण भारत के लिए पिछले कई दशकों से अपेक्षित अनोखा व सकारात्मक प्रबद्धता से इस सरकार को बांधती है और भारत के कृषि के लिए यह क्रांतिकारी बजट कहा जा सकता है. किसानों के लागत मूल्य पर ५० प्रतिशत बढ़ा कर उनके उत्पाद की खरीद करने की सरकारी प्रतिबद्धता और १० करोड गरीब परिवारों (याने ५० करोड लोगों को) को पांच लाख का स्वास्थ्य बीमा शायद एक मजबूत अर्थ-व्यवस्था की सामाजिक सुरक्षा की दिशा में पहली जरूरत थी. कहना न होगा कि इन १० करोड़ गरीब परिवारों में किसान , मजदूर और निम्न आय वर्ग का बड़ा तबका लाभान्वित होगा.  
लेकिन यहाँ पर एक पेंच है. जो लोग सरकार की मंशा पर प्रश्न चिन्ह लगते हैं उनका कहना है कि सरकार ने किसानों को उनकी लागत का १५० प्रतिशत समर्थन मूल्य देने का जो वादा इस बजट में किया है वह खरीफ की फसल से लागू होगा और इस साल के खरीफ की खरीददारी लगभग ख़त्म हो चुकी है लिहाज़ा यह अगले खरीफ से हीं लागू हो सकेगा याने अगले नवम्बर के आसपास. इन लोगों के अनुसार मोदी सरकार अगर चुनाव अक्टूबर माह के आसपास कराती है तो यह वायदा कभी पूरा नहीं हो सकेगा. लेकिन जो सरकार की मंशा में विश्वास रखते हैं उनके अनुसार कोई भी सरकार जो चुनाव जीतना चाहती है और जो नाराज किसानों को खुश करना चाहती है वह इस वायदे से मुकरने पर किसानों के आक्रोश का शिकार हो सकती है. इनका मानना है कि आगामी रबी की फसल के दौरान भी वह अपने वादे को पूरा करना चाहेगी. एक अनुमान के अनुसार इसमें सरकार का कुल खर्च लगभग ६० हज़ार करोड आयेगा. चुनाव पूर्व ऐसा खर्च किसी सरकार के लिए कोई बहुत मुश्किल काम नहीं होगा. रबी की फसल की खरीददारी आगामी अप्रैल माह से शुरू होनी है. और यह वादा खिलाफी सरकार को बेहद महंगी पड़ सकती है. सरकार में बैठे लोगों का यह कहना है कि इस बार मोदी सरकार किसानों की अनदेखी शायद हीं कर पाए. ध्यान देने की बात है कि दो दिन पहले संसद में पेश आर्थिक सर्वेक्षण में सरकार ने साफ़ तौर पर माना था कि किसानों की वास्तविक आय पिछले चार सालों में नहीं बढी है.        
पहली बार किसानों के उत्पाद के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य को लागत के ५० प्रतिशत ज्यादा देने का संकल्प जो फिलहाल खरीफ की फसलों पर लागू होगा कृषि की बेहतरी की दिशा में एक बड़ा कदम है. ऐसा वादा सन २०१४ के चुनाव के घोषणा पत्र में किया गया था लेकिन अगले हीं वर्ष सरकार इससे मुकर गयी और सुप्रीम कोर्ट में अपने हलफनामे में सरकारी पक्ष ने इसे देने में अपनी असमर्थता व्यक्त की थी. विपक्षी दलों ने इसे एक बड़ा मुद्दा बनाया था. जाहिर है खरीफ की फसल की सरकारी खरीददारी अब अवसान पर है लेकिन चूंकि सन २०१९ में चुनाव होने हैं लिहाज़ा अप्रैल माह से शुरू होने वाले रबी की खरीददारी में इस सरकार को यह योजना बहाल करनी हीं होगी. इसका मतलब यह हुआ कि आने वाले कृषि उत्पादों पर किसान को इस चिर-अपेक्षित मांग का बड़ा लाभ मिलना लगभग तय है. किसानों की फसल का लागत मूल्य तय करने का काम सी ए सी पी नाम की संस्था करती है. और इसे दो पैमानों पर मापा जाता है --- ए -२ और सी -२ . स्वामीनाथन समिति की रिपोर्ट के अनुसार सी -२ पैमाने पर जिसमें किसान और उसके परिवार का अपना श्रम और जमीन की कीमत भी शामिल है सम्मिलित होता है. अगर यह मान लिया जाये कि सरकार ए -२ के आधार पर हीं कीमतें सुनिश्चित करेंगी तो भी यह किसानों के लिए एक बड़ी राहत होगी. उदाहरण के तौर पर    धान की कीमत सी -२ आधारित फार्मूले के अनुसार १४२६ रुपये प्रति कुंतल है और अगर इस पर ५० प्रतिशत बढ़ा कर समर्थन मूल्य तय किया गया तो धान का समर्थन मूल्य लगभग २१३९ रुपये प्रति कुंतल होगा. भारत के इतिहास में इतना बड़ा लाभ किसानों को आज तक नहीं मिला है. इस गणना को अगर आगामी रबी और खासकर गेहूं की फसल पर लागू किया गया तो गेंहू का समर्थन मूल्य भी करीब १९०० रुपये प्रति कुंतल हो जाएगा . उत्तर भारत के किसानों के लिए, जहाँ गेंहू की खेती सबसे ज्यादा होती है, यह वरदान साबित होगा. यही वजह है कि प्रधानमंत्री ने बजट के तत्काल बाद के अपनी प्रतिक्रिया में बताया कि बजट में लगभग १४.५ लाख करोड़ रुपये ग्रामीण भारत के कल्याण पर खर्च किये जा रहे हैं . उनका जोर इस बात पर था कि किसानों के लिए बढ़ा समर्थन मूल्य एक बड़ी न्यामत सरकार की ओर से ग्रामीणों को है. 
सरकार के पास एक तरफ कुआं था और दूसरी तरफ खाई. अगर मध्यम और उच्च वर्ग को खुश करने के लिए आय -कर और कारपोरेशन कर में अपेक्षित छूट देती तो राजस्व कम आता और तब कल्याणकारी योजनाओं के लिए खर्च करने का मतलब होता राजस्व घाटे में भारी बढ़ोत्तरी जो किसी भी अर्थ व्यवस्था के स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं माना जाता. दूसरी और अगर किसानों के लिए और गरीबों के लिए अपना पिटारा न खोलती तो मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग मुंह फेर लेता . ऐसे में मोदी सरकार ने दूसरा विकल्प चुना. 
अगर किसी गरीब का पांच लाख रुपये तक का इलाज़ सरकार की किसी योजना से मुफ्त होने लगे तो यह आज़ाद भारत में सामाजिक सुरक्षा का एक बड़ा मकाम कहा जा सकता है. आज के बजट में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने स्पष्ट रूप से कहा कि देश के ५० करोड लोगों को इस योजन का लाभ मिलेगा. क्या कोई सरकार चुनाव के पूर्व के वर्ष में यह हिमाकत करेगी कि ऐसा वादा करे और फिर मुकर जाये या उचित क्रियान्वयन न करे ? 
शहरी उच्च व् मध्यम वर्ग इस बात से भी निराश हुआ कि जहाँ एक ओर बैंक में जमा पूंजी पर ब्याज दरें लगातार कम हो रही हों और इस वर्ग को मजबूर हो कर अपना पैसा म्यूच्यूअल फण्ड में या इक्विटी में लगाना पड़ रहा है वहीं आज के बजट में म्यूच्यूअल फण्ड से होने वाले एक लाख से अधित के लाभ पर १० प्रतिशत टैक्स का प्रावधान कर दिया है. नाराजगी का दूसरा कारण है “इस हाथ से देने और उस हाथ से लेने “ की नीति जो इस बजट में दिखाई दी. जहाँ इनकम टैक्स में नौकरी पेशा लोगों के लिए ४० हज़ार का स्टैण्डर्ड डिडक्शन का प्रावधान कर २.९० लाख (पहले २.५० था) तक करमुक्त किया गया है वहीं मेडिकल और ट्रांसपोर्ट पर मिलाने वाले ३० हज़ार रुपये तक के छूट को समाप्त कर दिया गया है याने कुल लाभ महज १० हज़ार रुपये तक के छूट का ही रहा. 
बहरहाल इस बजट से मोदी सरकार अब वचनबद्ध हो चुकी है कि या तो किसानों के रबी के उपज का समर्थन मूल्य अगले अप्रैल से ५० बढ़ाये या आठ राज्यों के चुनाव में हीं नहीं बल्कि २०१९ के आम चुनाव में भी किसानों और खेतिहर मजदूरों के कोपभाजन बने. एक साल बीतने में ज्यादा वक्त नहीं लगता और नहीं वर्तमान सरकार को पूर्ण बजट पेश करने का फिर मौका मिलेगा.  

jagran

Friday, 26 January 2018

क्या भारत में दो देश है ?

       
   
     
भारत का संविधान आज से ६८ साल पहले २६ नवम्बर को अंगीकृत किया गया. इसकी उद्देशिका कहती है “हम भारत के लोग ......... समस्त नागरिकों को ....अवसर की समानता प्राप्त करने के लिए ..... दृढ संकल्प हो कर .... इस संविधान को अंगीकृत .... करते हैं”.

लेकिन ६८ साल बाद हम भारत के लोगों की तस्वीर कुछ अलग दिखाई देती है. कुछ रिपोर्ट एक गरीबी से कराहते भारत को दिखाते है तो दूसरे रिपोर्ट एक चमकते भारत की तस्वीर बयान करते हैं. जनता के लिए मुश्किल हो गया है कि भारत को अपना समझे.  
वर्ल्ड इकनोमिक फोरम (जहाँ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बताया कि भारत में समावेशी आर्थिक विकास हो रहा है) ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि भारत इस समावेशी विकास में दुनिया के ७४ देशों में दो स्थान फिर फिसल कर ६२ वें नंबर पर आ गया है. जबकि पाकिस्तान ने अपने अंक में पांच रैंक ऊपर (४७ वें स्थान पर) चला गया है.   
ऑक्सफाम की रिपोर्ट के अनुसार पिछले वर्ष (२०१७) जो पूंजी पैदा हुई उसमें ऊपर के एक प्रतिशत लोगों के पास देश की ७३ प्रतिशत पूंजी आयी जबकि ९९ प्रतिशत मात्र २७ प्रतिशत. साथ हीं देश की ६७ करोड गरीबों की पूंजी मात्र एक प्रतिशत बढी. भारत में अब १०१ अरबपति हैं जिनमें ३७ प्रतिशत को (बगैर कोई काम किये) विरासत में यह दौलत मिली है. विश्व असमानता रिपोर्ट के अनुसार सन २०१४ में इस एक प्रतिशत बड़े वर्ग के पास मात्र २२ प्रतिशत पूँजी आयी थी.
आई एल ओ की रिपोर्ट के अनुसार भारत में बेरोजगारी की दर (३.४ से ३.५ ) बढी है और अगले तीन साल तक बढ़ती रहेगी जबकि दुनिया में औसत दर (५.८ से ५.६ ) घटी है और घटती रहेगी.

अब जरा तस्वीर का दूसरा पहलू देखें.
आई एम एफ की रिपोर्ट के अनुसार भारत अगले दो सालों में दुनिया का सबसे तेज विकास करने वाला देश बन कर अपनी जी डी पी विकास दर सन २०१८ में ७.४ प्रतिशत और सन २०१९ में ७.८ प्रतिशत हासिल कर सकता है.
........ दुनिया के तमाम सी ई ओ को लेकर हुए एक सर्वे में जापान को पछाड़ कर भारत दुनिया का पांचवां सबसे आकर्षक निवेश गंतव्य
......... आई एम एफ की रिपोर्ट के आने के बाद सेंसेक्स में रिकॉर्ड उछाल
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उपरोक्त दो रिपोर्ट समूह भारत की एकदम उल्टी तस्वीर पेश करते हैं. जाहिर है पहले समूह की रिपोर्टें दुनिया के सी ई ओ को खुश करती है और स्टॉक मार्किट भी आह्लादित हो कर सेंसेक्स को आसमान पर पहुंचा देता है. संभ्रांत वर्ग को लगता है कि भारत बदल रहा है. लेकिन दूसरी रिपोर्ट समूह यह साफ़ दिखाती है कि देश की अर्थव्यवस्था शायद सबसे संकट के दौर में है. अगर गरीब-अमीर के बीच की खाई लगातार बढ़ती रहेगी, अगर बेरोजगारी अगले कई साल तक बढ़ती रहेगी और अगर जी डी पी विकास दर समावेश न होकर एक वर्ग विशेष को हीं लाभ पहुंचाएगी तो क्या गरीब सेंसेक्स में उछाल को देखकर अपनी भूख मिटा लेगा ?
भारत के अन्दर दो देश अस्तित्व में हैं. एक जो विरासत में पाए पैतृक संपत्ति से या शेयर में पैसे लगा कर बगैर कुछ किये मालामाल हो रहा है वहीं ६७ प्रतिशत किसान और खेतिहर मजदूर के लिए दो जून की रोटी मुहाल हो रही है. पिछले चार सालों में शुरू के दो साल इंद्र भगवान् के मुंह फेर लेने की कारण किसान सूखे की मार झेलता रहा और तीसरी साल अनाज, दलहन, प्याज, आलू, कपास और अन्य फसल की पैदावार तो इस किसान ने अपनी कर्मठता से रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचाई लेकिन उनके दाम जमीन पर आ गए क्योंकि उपज बढ़ने पर राज्य अभिकरणों के पास उनके विपणन और भंडारण की समुचित व्यवस्था नहीं हो सकी. किसानों ने अपने अनाज और सब्जियां सडकों पर फेंकना शुरू किया. नतीजतन चौथे साल याने इस साल हताश किसानों ने कम खेती की. अनाज का ज्यादा उत्पादन हो तो कीमत कम करके व्यापारी मालामाल और अनाज कम पैदा हो तो ऊँची कीमतों से मध्यम वर्ग के उपभोक्ता की कमर पर वार. याने दोनों स्थितियों में व्यापारी खुश, शेयर मार्किट के लोग खुश. याने चाकू खरबूज पर गिरे या खरबूज चाकू पर , कटेगा खरबूज हीं.    
दावोस में मोदी ने बताया कि सन २०२५ तक भारत की अर्थव्यवस्था की साइज़ दो गुना बढ़ कर पांच ट्रिलियन डॉलर हो जायेगी. उन्होंने दुनिया भर से आये राष्ट्राध्यक्षों को हीं नहीं उद्योगपतियों को भी बताया भारत की “सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया..... मा कश्चित् दुःख भाग्भवेत (सभी लोग सुखी हो, सभी निरोग हो ... और किसी को भी देख न हो ).    
लेकिन ऑक्सफाम के रिपोर्ट के अनुसार गाँव का एक कामगार ५० साल में जितना पैसा कमाता है उतना किसी शीर्ष गारमेंट कंपनी का एक मैनेजर मात्र १७.५ दिन में कमाता है. या यूं कहें कि जितना यह मोती तनख्वाह पाने वाला मैनेजर एक साल में कमाता है उतना कमाने कि लिए उस कामगार को ९४१ वर्ष लगेंगे अर्थात लगभग सौ पीढी.
क्या खता की है इन कामगारों ने? क्या ये कम फावड़ा चलाते हैं या इनके फावड़ा चलने से वह कारु का खजाना नहीं निकलता जो एक सी ई ओ अपने ए सी चैम्बर में बैठ कर एक लोकलुभावने विज्ञापन दे कर या एक शेयर मार्किट का खिलाड़ी मार्किट पहचान कर रातोंरात करोड़ों पैदा कर लेता है.
फिर क्या है कि ७० सालों में भी वह कामगार वहीं रहा और उसका फावड़े में वह दम नहीं आ सका जो एक बड़े बाप का बेटा शेयर मार्किट से हासिल कर लेता है ? और फिर उसी पैसे की एक प्रतिशत में लगातार इकट्ठा होने का जश्न मन कर दुनिया के सी ई ओ कहते हैं कि निवेश के लिए भारत दुनिया का पांचवां आकर्षक गंतव्य है. शायद उन्हें या शेयर मार्किट के खिलाडियों को इससे मतलब नहीं होता कि गरीब -अमीर की खाई बढ़ती जा रही है या बाल मृत्यु दर में अपेक्षित बेहतरी नहीं हो पाई है.
अगर किसान खेती छोड़ रहा है तो इसलिए नहीं कि कल से उसका बेटा शेयर मार्किट में पूंजी लगाकार बैठे बैठे देश की कुल पूँजी का ७३ प्रतिशत हासिल कर लेगा बल्कि इसलिए कि शायद मजदूर बनना अन्नदाता बनने से बेहतर जिन्दगी दे सके. यह अलग बात है कि वहां भी आई एल ओ की रिपोर्ट के अनुसार आगे तीन साल में रोजगार के अवसर कम मिलेंगे.      
उदारीकरण के बाद स्थिति और बिगड़ी है. इन बड़े लोगों (ऊपर के एक प्रतिशत )  के पास कुल २०.९० लाख करोड की संपत्ति है जो भारत के बजट के लगभग बराबर है. सन २००० में इनके पास ३७ प्रतिशत पूंजी थी जो सन २००५ में ४२ प्रतिशत हुई, सन २०१० में ४८ प्रतिशत एंड सन २०१२ में ५२ प्रतिशत और आज “सबका साथ , सबका विकास “ के नारे के बाद यह पूंजी ५८ प्रतिशत हो गयी है.


Tuesday, 23 January 2018

क्या अब किसानों के दिन बहुरंगे ?


कृषि विपणन को समवर्ती सूची में ला कर राष्ट्रीय मार्किट ग्रिड से जोड़ें’ ताकि छोटे किसानों का
बारगेनिंग क्षमता बढे
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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक टी वी इंटरव्यू बेहद सपष्ट तौर पर कहा कि किसानों की समस्या को समझना और निदान करना केंद्र और राज्य सरकारों की हीं नहीं मेरी भी बड़ी जिम्मेदारी है और किसानों की स्थिति को लेकर कोई आलोचना होती है तो वह गलत नहीं माना जा सकता. लेकिन इसके साथ हीं उन्होंने फसल बीमा योजना जिसमें लागत की मात्र २ प्रतिशत अंश दे कर किसान बीमा करा सकता है और बाकी सरकारें देती हैं, का जिक्र किया. कहना न होगा कि अगर राज्य सरकारें भी वैसा हीं उत्साह दिखाएँ तो यह योजना किसानों का भाग्य बदल सकती है. उन्होंने भारत में हीं यूरिया के बढे उत्पादन और उपलब्धता का तथा नीम-लेपित यूरिया से खेती में होने वाले लाभ का भी जिक्र किया.
इसी बीच केंद्र की केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी और बहुचर्चित किसानों की आय दोगुनी करने (सन २०२२ तक) की योजना जिसकी घोषणा प्रधानमंत्री ने पिछले २८ फ़रवरी, २०१६ को बरेली की एक जन सभा में की थी, एक कदम आगे बढी जब पिछले हफ्ते अशोक दलवई समिति ने अपनी १४ वॉल्यूम की विस्तृत इसे रिपोर्ट सौपी. पहले की तमाम समितियों और आयोगों से अलग इस रिपोर्ट कुछ क्रांतिकारी सुझाव है जैसे कृषि विपणन को समवर्ती सूची में शामिल करके कुछ नये कानून बनाना, कृषि उत्पाद की मार्केटिंग को देश -व्यापी विपणन नेटवर्क से जोड़ना, लघु व सीमान्त किसानों को खेती को एक साथ सामूहिक खेती के लिए प्रोत्साहित करना और इसके लिए उत्पादक और ग्राम स्तर पर किसानों के संगठन तैयार करना ताकि उनका शोषण न हो सके और सरकारी मदद योजनाओं की डिलीवरी के लिए नयी इलेक्ट्रॉनिक सूचना तकनीकि का प्रयोग करते हुए फसलों का सही आंकलन करना. समिति के अनुसार इन सभी योजनाओं को मुकम्मल करने में अगले चार सालों में करीब साढ़े छः लाख करोड रूपये के निवेश की जरूरत होगी. इसके लिए निजी उपक्रमों को कृषि विपणन में और रणनीति में २६ प्रतिशत तक की साझेदारी के लिए कानून बनाने की सिफारिश भी है.
इन सिफारिशों के अमल में आने पर सबसे ज्यादा लाभ उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड , केरल , पश्चिम बंगाल आदि राज्यों को मिलेगा जहाँ लघु व सीमान्त किसान ९० प्रतिशत से ज्यादा है और उनकी खेती अनुत्पादक होती जा रही है. उत्तर भारत के राज्यों में जनसँख्या नियंत्रण पर अपेक्षित सफलता न मिलने के कारण इन राज्यों की कृषि भूमि परिवारों में बंटती जा रही है और अलाभकर खेती बढ़ती जा रही है. सन १९५१ में जहाँ ६.९९ करोड भूमिधर थे आज उनकी संख्या ११.८८ करोड हो गयी है और औसत प्रति किसान खेती का रकबा घट कर मात्र १.१५ हेक्टेयर रह गया जो कि २२ साल पहले तक १.४१ हेक्टेयर था (इसके ठीक उलट अमेरिका में प्रति किसान औसत ४५० हेक्टेयर जमीन है और यह बढ़ती जा रही है). भारत में ९.०२ करोड कृषक परिवार हैं (जो खेती करते हैं) जिनमें से ६.२६ करोड के पास एक हेक्टेयर से भी कम खेती है याने उस परिवार की मासिक आय मात्र ६४२६ रूपये रह गयी है. इसके अलावा जहाँ १९५१ में भूमिहीन खेतिहर मजदूरों की संख्या मात्र २.७३ करोड थी वह आज लगभग छः गुना बढ़ कर १४.४३ करोड हो गयी है. रिपोर्ट में जो सबसे चौंकाने वाला तथ्य है वह यह कि पहली बार २०११ की जनगणना में खेतिहर मजदूरों को संख्या खेती करने वाले किसानों से बढी है अर्थात किसान खेती छोड़ कर मजदूर बनता जा रहा है क्योंकि खेती अलाभकर व्यवसाय हो गयी है.
मोदी सरकार के वायदे के मुताबिक अब मात्र चार साल हीं बचे है. आगामी बजट तैयार हो चुका है लिहाज़ा उसमें इस रिपोर्ट की अनुशंसा को शामिल किये जाने की संभावना लगभग नहीं है. दूसरे पिछले तीन वर्षों में शुरू के दो वर्ष किसान सूखे की मार झेलता रहा और तीसरे साल जब उसने रिकॉर्ड २७६ मिलियन टन अनाज का उत्पादन किया तो मूल्य जमीन पर आ गए. इस वर्ष उस सदमें में किसानों ने फसल का रकबा भी कम कर दिया है और दलहन की फसल से फिर मुंह मोड़ लिया है. ऐसे में वायदा पूरा करना और वह भी बेहद कम समय में आसमान से तारे तोड़ने की तरह होगा. लेकिन २०१९ के आम चुनाव के मद्दे नज़र किसानों को लेकर सरकार तत्पर दीखती है.
यह रिपोर्टों आजादी के पहले और स्वतंत्र भारत में बनी दर्ज़नों रिपोर्टों से काफी अलग है. अभी तक किसी रिपोर्ट ने लगातार छोटी होती जोत और तज्जनित अलाभकर खेती की समस्या पर ध्यान नहीं दिया था. समिति ने आंकड़ों के साथ बताया कि किस तरह छोटी होती प्रति किसान स्वामित्व के कारण खेती में लघु व सीमान्त किसान निवेश करने में अक्षम हो रहे थे लिहाज़ा उनकी आय लगातार घटती जा रही थी. दरअसल समिति इस समस्या के निदान के लिए एक तरह से सामूहिक विपणन की तरफ किसानों को प्रेरित करने की पुरजोर हिमायत कर रही है.
समिति ने इस महत्वाकांक्षी योजना के लिए दो मोर्चों पर अलग-अलग व्यापक परिवर्तन की बात कही है. पहला कृषि उत्पादन की जगह उत्पादकता बढ़ाना याने लागत कम करना और दूसरा उन उत्पादों की ब्रिक्री के लिए अलग संस्थाएं विकसित करना. केंद्र सरकार को कृषि विपणन को समवर्ती सूची में डालने के लिए संविधान में संशोधन करना होगा. दूसरा गैर-भाजपा शासित राज्य सरकारें इस परिवर्तन को अपनी अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण मान कर विरोध कर सकती हैं. हालांकि इस समय देश के १९ राज्यों में भाजपा या उसके सहयोगी पार्टियों की सरकारें हैं.
आज भारत में ८६ प्रतिशत किसान लघु व सीमान्त किसान है याने उनके पास मात्र दो हेक्टेयर से कम जमीन है. खेती की नयी तकनीकि का इस्तेमाल करने और फसल पैटर्न को बदलना और नकदी फसल को ओर उन्मुख होना उनकी क्षमता के बाहर होता है. इनके उत्पादों को व्यापारियों को कम कीमतों पर आर्थिक कमजोरी के चलते तत्काल बेचना उनकी मजबूरी होती है. समिति ने सिफारिश की है कि इस तरह के उत्पादनों का पूर्व-आंकलन और फसल कटने की बाद का आंकलन करने के बाद ऐसी व्यवस्था की जाये कि किसान को उत्पादन के अनुरूप ऋण देने की व्यवस्था हो. इसके लिखे भण्डारण इकाई की पर्ची को आधार माना जाये. ऋण मिलाने से लाभ यह होगा कि किसान वाब अपना उत्पाद तब तक किसान रोक सकता है जब तक उसे उचित मूल्य न मिले.
अभी तक कृषि उत्पादों की मार्केटिंग की राष्ट्रव्यापी व्यवस्था के अभाव में किसान स्थानीय व्यपारियों को अपना अनाज बेचने को मजबूर होता था. उपज के अंतर -राज्य आवागमन पर प्रतिबन्ध के कानून को बदलना पहली जरूरत के रूप में करना होगा. राज्यों से रिपोर्ट में अपेक्षा की गयी है कि वे संचार की नयी तकनीकि का प्रयोग कर कीमतों की सूचना किसानों और उनके संगठनों से साझा करेंगे. ये संगठन गाँव के स्तर पर और उत्पादक के स्तर पर बनाये जायेंगे.
समिति की यह भी अनुशंसा है कि वर्त्तमान कृषि विपणन नेटवर्क को पांच गुना विस्तार दिया जाये याने कम से कम ७००० ग्रामीण /उत्पादक स्तर के विपणन संगठन बनाये जाएँ जिनमें प्रति संगठन कम से कम १००० किसान या १००० हेक्टेयर का रकबा हो. कंपनी कानून में संशोधन करके इन कृषक संगठनों में २६ प्रतिशत शेयर की सीमा के साथ निजी भागेदारी को प्रोत्साहित किया जाये और इन संगठनों को सहकारी समितियों के अनुरूप समझा जाये. इसके साथ हीं १०,००० थोक और २०,००० ग्रामीण रिटेल बाज़ार की स्थापना करनी होगी जो वर्तमान में इसका मात्र पांचवां हिस्सा है.
समिति की एक अन्य अहम अनुशंसा के अनुसार राज्य सरकारें वर्तमान वेयरहाउसों और अनाज भंडारों को भी मार्केट के रूप में तब्दील करें ताकि ट्रांसपोर्ट खर्च बचे और साथ हीं गावों में लगने वाले साप्ताहिक बाज़ारों को जिनकी संख्या २०,००० के आस पास है प्राथमिक ग्रामीण कृषि मार्केट इकाई का दर्ज़ा दें.
कुल मिलकर समिति की रिपोर्ट ने कृषि व्यवसाय की सभी कमजोरियों को पहचान कर उनके उपचार की हिकमत की है लेकिन इसके लिए राज्य सरकारों को भी अपना रवैया बदलना होगा और साथ हीं डिलीवरी में होने वाले भ्रष्टाचार पर प्रभावी अंकुश लगाना होगा. यह तभी सम्भव होगा जब लाभ पहुँचाने की प्रक्रिया में मानव भूमिका को कम करते हुए इलेक्ट्रॉनिक सूचना व आंकलन को प्रयोग में लाया जाये. देखना है कि २०१९ के आम चुनाव के पहले सरकार कितना कर पाती है.

lokmat


Saturday, 13 January 2018

ये क्या हुआ “मी लॉर्ड्स” ????????


यह भारत की हीं नहीं, दुनिया की न्याय बिरादरी में एक भूकंप की मानिंद था. भारत में न्यायपालिका और खासकर सर्वोच्च न्यायालय एक ऐसी संस्था थी जिस पर समाज का अद्भुत भरोसा होता था खासकर तब जब वह हर संस्था से न्याय की उम्मीद छोड़ चुका होता था. शुक्रवार को इस न्यायालय के चार वरिष्ठ जजों द्वारा प्रेस कांफ्रेंस करके एक संयुक्त पत्र जारी करना जिसमें देश की सबसे बड़ी अदालत के मुख्य न्यायाधीश पर न्याय -सम्मत तरीके से कार्य न करने का आरोप लगाना और यह कहना कि अगर हम स्थिति के खिलाफ आज तन कर न खड़े होते तो आज से २० साल बाद समाज में से कुछ बुद्धिमान यह कहते कि हम चार जजों ने ‘अपनी आत्मा बेंच’ दी थी” ने ७० साल पुराने लोकतंत्र की जड़ें हिला दी. जजों ने आगे कहा “हम इस मामले में चीफ जस्टिस के पास गए थे लेकिन वहां से खाली हाथ लौटना पडा “. इस प्रेस कांफ्रेंस के पांच मिनट भी नहीं हुए थे कि दर्ज़नों वरिष्ठ वकीलों ने पक्ष -विपक्ष में मीडिया में तर्क देना शुरू कर दिया. अगर वकील प्रशांतभूषण ने मीडिया में आ कर बेसाख्ता मुख्यन्यायाधीश के “चहेते “ जजों का नाम और वे मामले जो उन्हें सौंपे गए बताना शुरू किया तो पूर्व न्यायाधीश जस्टिस सोधी ने इन चार वकीलों के कदम को न्यायलय की गरिमा गिराने वाला , हास्यास्पद और बचकाना बताया. बहरहाल कुल मिलकर आज एक और सबसे मकबूल और विश्वसनीय संस्था भी व्यक्तिगत अहंकार या वर्चस्व की भेंट चढ़ गयी. जब प्रेस कांफ्रेंस में जजों से पूछा गया कि क्या वह मुख्य न्यायाशीश के खिलाफ महा-अभियोग लाने के पक्षधर हैं तो उनका बेबाक जवाब था “यह समाज को तय करना है”. याने सुप्रीम कोर्ट के ये चार जज एक तरह से इससे इनकार नहीं कर रहे हैं. ध्यान रहे कि भारत में पांच सदस्य हो तो वह संविधान पीठ के रूप में कार्य करता है और उसके फैसले में कानून की ताकत होती है.
हमने अभी तक कभी -कभी कमजोर आवाज में केन्द्रीय बार कौंसिल और राज्य बार एसोसिएशनों द्वारा कभी कभी जजों के खिलाफ व्यक्तिगत मामलों में आरोप लगते हुए देखा था लेकिन पिछले ७० साल में एक बार भी ऐसा नहीं देखने में आया कि सर्वोच्च न्यायलय के हीं चार वरिष्ठ जज अपने मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ प्रेस कांफ्रेंस करें और वह भी केसों के आबंटन में तथाकथित पक्षपात को लेकर. उनका कहना था कि कौन केस किस बेंच के पास जाएगा यह मुख्य न्यायाधीश के अधिकार क्षेत्र में होता है लेकिन यह प्रक्रिया भी कुछ स्थापित परम्पराओं के अनुरूप चलायी जाती है जैसे सामान प्रकृति के मामले सामान बेंच को जाते हैं और यह निर्धारण मामलों की प्रकृति के आधार पर न कि केस के आधार पर होता है. इसके आगे बढ़ते हुआ प्रशांतभूषण ने उन केसों और जजों के नाम बताने शुरू किये. इन चार जजों का और वकीलों का जन धरातल पर यह सब कुछ करना हर हालत में अवमानना की श्रेणी में आता है.
आधुनिक न्यायशास्त्र का मूल सिद्धांत कहता है “आप चाहे जितने भी बड़े क्यों न हों, कानून आपसे बड़ा होता है”. अदालत की अवमानना कानून, १९७१ के सेक्शन २(सी) () के अनुसार ऐसा कोई बयान जो अदलत की गरिमा को गिराता है” अदालत की अवमानना है”. इस सेक्शन के उप-खंड () और () को एक साथ पढ़ें तो इन चार जजों का बयान अवमानना की श्रेणी में आता है. अगर किसी सामान्य पर्त्रकार ने या रिपोर्टर ने कहा होता कि जजों को केसों का आबंटन भेद-भाव के तहत किया जा रहा है तो इसे सीधा अवमानना मान कर अदालत उस मीडिया प्रतिष्ठान के चेयरमैन से लेकर चपरासी तक को तलब कर लेता. लेकिन आज भारत में पहली मर्तबा बार हीं नहीं बेंच भी बंटा हुआ है और यह विभेद एक दूसरे पर खुले-आम आरोप लगाने में देखा जा सकता है.
क्या कोई और विकल्प नहीं ?
सर्वोच्च न्यायलय हीं नहीं उच्चन्यायालय के पास भी दो तरह के कार्य होते हैं. पहला न्याय का निष्पादन करना और दूसरा न्याय प्रशासन देखना. यह दूसरा काम आम तौर पर मुख्य न्यायाधीश के हाथ में होता है. जजों के पास केवल फैसले का काम होता है. और कॉलेजियम की व्यवस्था के बाद से पांच सबसे सीनियर जज नए जजों की नियुक्ति में भी भाग लेते हैं. यह बात सही है कि सर्वोच्च न्यायालय हीं नहीं, हाई कोर्ट के जज भी भारत के संविधान द्वारा अभिरक्षित हैं और उन्हें मात्र महा -अभियोग लगा कर हीं हटाया जा सकता है.
कुछ जानकारों का मानना है कि अगर इन चार जजों को मुख्य न्यायाधीश की कार्य प्रणाली से ऐतराज था तो वे सभी जजों की बैठक में जो सवेरे होती है इस मुद्दे को लेकर जाते और एक आम सहमति का प्रयास किया जाता. एक अन्य राय के मुताबिक ये जज अपने फैसले में भी मुख्यन्यायाधीश के केस आबंटन प्रर्किया के खिलाफ “स्वयंसंज्ञान” लेते हुए फैसला दे सकते थे जो स्वतः सार्वजानिक होता और जिससे यह ध्वनि न निकलती कि सार्वजानिक तौर पर सामूहिकरूप से कुछ जज मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ सड़क पर आ गए हैं.
बहरहाल इस प्रेस कांफ्रेंस के बाद भारत की सबसे बड़ी पंचायत की जिस गारिम को क्षति पहुँची है उसकी अनुगूंज आने वाले कई दिनों तक हीं नहीं वर्षों तक सुनायी देगी.
शायर मीर इस दिन का भान करते हुए ताकी मीर ने कहा :
कहता है दिल कि आँख ने मुझको किया खराब
कहती है आँख यह कि मुझे दिल ने खो दिया
लगता नहीं पता कि सही कौन सी है बात
दोनों ने मिल के “मीर” हमें तो डुबो दिया “.

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