Monday, 6 November 2017

विकास: रणनीति बदलनी होगी


भूख से मुक्ति भी “स्वच्छ भारत” की तरह अभियान बने 

विश्व स्तर पर व्यापारिक, आर्थिक, जीवन संतुष्टि व मानव विकास के १६ सूचकांकों में पिछले तीन सालों में भारत दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले १० सूचकांकों पर नीचे गिरा है जब कि तीन पर लगभग समान स्तर पर रहा और बाकी तीन पर बेहतर हुआ है. इसका मतलब यह है कि दुनिया के अन्य देश खासकर विकसित देशों में सरकारें बेहतर प्रदर्शन कर रहीं हैं. ऐसे में जब प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी के प्रति देश में एक विश्वास बना और तीन साल पहले जनता ने भारतीय जनता पार्टी को सन २००९ के मुकाबले डेढ़ गुना (प्रतिशत के रूप में १८.६ से बढ़ा कर ३१.७) वोट दे कर जिताया तो आज साढ़े तीन साल बाद अब समय आ गया है कि मोदी सरकार अपने विकास की नीति का पुनरावलोकन करे. इसमें दो राय नहीं है कि मोदी की विकास की समझ और इच्छा अभूतपूर्व है और यह भी सच है कि उनकी अप्रतिम ईमानदारी और निष्ठा देश सत्तावर्ग में एक चिर-अपेक्षित दहशत के रूप में विद्यमान हैं फिर समस्या कहाँ है? शायद राज्य सरकारें विकास की नीति को जनता तक नहीं ले जा सकी हैं. ध्यान रहे कि भारत के संविधान के अनुसार अर्ध-संघीय व्यवस्था है जिसमें अधिकतर विकास के कार्य राज्य सरकारों के माध्यम से होते हैं. हालांकि आज देश की ६८ प्रतिशत आबादी पर भारतीय जनता पार्टी राज्य सरकारों के माध्यम से शासन कर रही हैं और मोदी या पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के सन्देश उनके लिए ईश्वरीय आदेश से कम नहीं होते. इससे अब उम्मीद बंधती है कि राज्य सरकारें विकास कार्यों को गति देंगी. मोदी सरकार की अद्भुत फसल बीमा योजना भी इसी राज्य सरकारों के इसी निकम्मेपन की वजह से असफल हो रही है और एक साल के भीतर (ऋण न लेने वाले) मात्र ३.७ प्रतिशत किसानों को हीं बीमित किया जा सका है   
विश्व की तमान विश्वसनीय रेटिंग संस्थाओं जिनमें संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुषांगिक संगठन भी है की ताज़ा रिपोर्ट को अगर एक साथ रखा जाये तो पता चलता है इन तीन सालों में तमाम विकासशील देशों ने विकास के मामले में काफी रफ़्तार पकड़ी है. इनमें वो देश भी हैं जिन्हें एक दशक पहले तक सबसे नीचे पायदान पर शाश्वत रूप से पाया गया था जैसे निकारागुआ , घाना और सोमालिया. जिन तीन मानकों पर भारत दुनिया के कुछ देशों से बेहतर कर सका है वे हैं : व्यापार करने में सुगमता, विश्व प्रतिस्पर्धा सूचकांक और विश्व इनोवेशन (नवोंमेषण) सूचकांक. जिन अन्य तीन में भारत लगभग समान स्तर पर रहा या थोडा ऊपर-नीचे के खाने में पहुंचा वे हैं : विश्व मानव सूचकांक, विश्व शांति सूचकांक और करप्शन परसेप्शन (भ्रष्टाचार अनुभूति) सूचकांक. 
लेकिन जिन १० पैरामीटर्स पर देश तीन सालों में बुरी तरह पिछड़ा है वे हैं : विश्व भूख सूचकांक जिसमें इन तीन वर्षों में भारत अन्य देशों की अपेक्षा काफी नीचे चला गया. सन २०१४ में हम दुनिया के १२० देशों में ५५ नंबर पर थे लेकिन २०१७ में यह देश ११९ देशों में १०० नंबर पर है. यह एक बड़ी गिरावट है जो उस पैरामीटर पर हैं जो भारत को दुनिया की नज़रों में वास्तविकरूप से “समृद्ध” बताने की पहली शर्त है. देश जी डी पी (सकल घरेलू उत्पाद ) वृद्धि दर से नहीं बल्कि उस उत्पाद वृद्धि से गरीब के आंसू पोंछने में सफलता से आंका जाता है. यहाँ यह भी ध्यान रखना होगा कि सन २०१४ में हीं भारत ने खाद्य सुरक्षा कानून बनाया याने हर गरीब को भूख से निजात का कानूनी वादा. पर हकीकत यह थी कि देशव्यापी भ्रष्टाचार का दंश राज्य सरकारों की अकर्मण्यता से  मिल कर भूखे के पेट तक अनाज पहुँचाने में बड़ा रोड़ा बना रहा. मोदी सरकार को इस पर शायद सबसे ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है. अगर बुलेट ट्रेन विकास के इंजन का एक पहिया है तो दूसरा शाश्वत भूख से निजात दिलाना दूसरा. साथ हीं अगर “व्यापार करने में सुगमता” के पैरामीटर पर भारत सन २०१४ में १८९ देशों में १४२ वें नंबर से कूद कर सन २०१७ में १९० देशों में १०० नंबर पर आ गया और देश के वित्त मंत्री अरुण जेटली ने पूरी उत्साह से प्रेस कांफ्रेंस कर बताया कि भारत कैसे तरक्की कर रहा है तो उन्हें उस दिन भी प्रेस कांफ्रेंस करना चाहिए था जिस दिन भूख सूचकांक में हमारा देश घाना, वियतनाम, मलावी, बांग्लादेश और नेपाल तो छोडिये, रवांडा, माली और नाइजीरिया और कमरून से भी पीछे चला गया. हमारा सत्ताधारी वर्ग पिछले २५ सालों में जी डी पी बढ़ने पर कसीदे तो काढ़ता रहा “भारत महान “ बताता हुआ,  पर भूख से मरते -बिलबिलाते नवनिहालों पर केवल “खाद्य सुरक्षा कानून”  बना कर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लिया. 
अन्य नौ पैरामीटर्स जिनपर देश फिसला है वे हैं : मानव संसाधन (सन २०१३ में दुनिया के १२२ देशों में ७८ लेकिन २०१७ में १३० देशों में १०३), कनेक्टिविटी में २०१४ में २५ देशों में १५ पर आज ५० देशों में ४३, एफ डी आई भरोसा में २५ देशों में ७ से आज ८, खुशी के पैमाने पर १५८ देशों में ११७ से आज १५५ देशों में १२२, बौद्धिक संपदा में ३० देशों में २९ से ४५ देशों में ४३, आर्थिक स्वतन्त्रता में १८६ में १२० से आज १४३, समृधि में १४२ देशों में १० से १४९ देशों में १०४, टिकाऊ विकास में १४९ देशों में ११० से १५७ देशों में ११६ और मेधा प्रतिस्पर्धा में ९३ देशों में ३९ से ११८ देशों में ९२. 
आज सरकार को पूरे विकास के प्रति दृष्टि बदलनी होगी. सबसे चौकाने वाली स्थिति दो पैरामीटर्स को लेकर है – भूख कम करने और मेधा प्रतिस्पर्धा में भारत का विश्व स्तर पर बेहद नीचे जाना. अगर देश के व्यापार सुगमता में ३० अंकों की बढ़ोत्तरी पर वित्त मंत्री प्रेस कोनेफेरेंस कर सकते हैं तो मेधा प्रतिस्पर्धा में ५३ अंकों की गिरावट पर भी उन्हें चिंता दिखानी होगी. भारत की मेधा जो हमारे करोड़ों युवा में पैदा होनी चाहिए थी वह अन्य देशों को मुकाबले अगर कम रही तो “ युवा शक्ति” का क्या मतलब होगा जिसके बारे में प्रधानमंत्री अपने भाषणों में जिक्र करते हैं. समस्या न तो मोदी या वित्त मंत्री के प्रयासों में है न हीं  सरकार की नियत या नैतिकता में. केवल प्रयासों की दिशा मोड़नी  होगी और प्रथम चरण में भूख पर काबू पाने की कोशिश उसी तरह अभियान के रूप में करनी होगी जिस तरह “स्वच्छ भारत” आज हर अधिकारी-मंत्री की जुबान पर है और हर अधिकारी -मंत्री के हाथ में झाडू.                          
कुपोषण-जनित व्याधियों में चिकित्सा सिद्धांत के अनुसार बच्चों का शारीरिक हीं नहीं मानसिक और शारीरिक विकास बाधित होता है. अगर भूख को नहीं जीतेंगे तो भारत की युवा शक्ति बीमार नागरिक के रूप में खडी होगी. सरकार को समझना होगा कि अगर भूख और कुपोषण से बच्चे कम वजन के, ठूंठ (स्टंटेड) याने छोटे कद के और मानसिकरूप से कुंद होंगे तो जाहिर हैं मेधा की कमी होगी और विश्व स्तर पर वे कहीं भी नहीं टिक पाएंगे. सरकार को डिलीवरी का माडल बदलना होगा ताकि राज्य सरकारों का शाश्वत उनीदापन और भ्रष्ट तंत्र इन नौनिहालों के रुदन को ख़त्म करने में सक्रिय हो सके या फिर संविधान संशोधन के जरिये इन्हें डिलीवरी में कोताही या भ्रष्टाचार करने पर प्रशासनिक कार्रवाई का अधिकार केंद्र के हाथों में हो.

lokmat

Thursday, 26 October 2017

टीपू का सच और कोविंद का राजपुरुष -भाव


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मोदी सरकार को भी इस भाव के लिए साधुवाद

ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित सत्य के अनुरूप राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने टीपू सुल्तान को अंग्रेजों के खिलाफ लड़ते हुए जान देने वाला बतायाकर्णाटक विधान सभा के ६० साल पूरे होने के उपलक्ष्य में कर्नाटक विधान सौदा (विधान सभा भवनमें राज्य विधायिका के दोनों सदनों के संयुक्त सत्र में बोलते हुए उन्होंने ने पद की गरिमा अक्षुण्ण रखते हुए अपनी छवि एक स्टेट्समैन (राजपुरुषके रूप में स्थापित कीचूंकि भारतीय संविधान में राष्ट्राध्यक्ष के भाषण का विषयवस्तु केंद्र सरकार के माने जाते हैं लिहाज़ा मोदी सरकार को भी इस धन्यवाद का पात्र माना जाना चाहिएयह अलग बात है कि कर्णाटक भारतीय जनता पार्टी इस भाषण को लेकर सकते में है क्योंकि वह अभी तक जबरदस्त टीपू -विरोध में आन्दोलन करती रही है और हाल हीं में केंद्र सरकार के इस राज्य से आने वाले एक मंत्री ने तो टीपू को आतताई और बलात्कारी तक कहा और कर्नाटका सरकार को आगामी १० नवम्बर को सुल्तान का जन्म-दिवस न मनाने की ताकीद की थीउधर कांग्रेस राष्ट्रपति के इस उदगार पर बेहद खुश नज़र आ रही हैराष्ट्रपति के इस भाषण में सत्य के प्रति एक आग्रह और उनकी विद्वता की झलक भी देखी जा सकती हैइससे यह भी स्पष्ट होता है कि एक समुदाय से आने वाले प्रतिमानों को अतार्किक और बेजा दुराग्रह से नीचा दिखने के इस प्रयासों से न तो राष्ट्रपति खुश हैं न हीं मोदी और उनकी सरकार.
अब जरा ऐतिहासिक तथ्यों पर गौर करें जिन्हें तोड़ने -मरोड़ने की कोशिश की गयीटीपू सुलतान के बारे में उत्तर भारत के पाठ्यक्रमों में कुछ दशक पहले एक पाठ आया जिसमें यह बताया गया कि मैसूर में टीपू सुल्तान के धर्म-परिवर्तन अभियान के डर से तीन हज़ार ब्राह्मणों ने आत्महत्या कर लीइस पाठ के लेखक हरिप्रसाद शास्त्री थे जो उस समय कलकत्ता विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के विभागाध्यक्ष थेतत्कालीन प्रख्यात इतिहासकार बी डी पाण्डेय ने अचानक जब यह तथ्य पाठ्यक्रम में देखा तो उन्होंने प्रोफेसर शास्त्री को पत्र लिखकर जानना चाहा कि यह तथ्य उन्हें कहाँ से मिलाकई पत्र लिखने के बाद अंत में प्रोफेसर शास्त्री का जवाब आया कि उन्होंने यह जानकारी मैसूर गजेटियर से हासिल की हैप्रोफेसर पाण्डेय ने तब मैसूर विश्वविद्यालय के इतिहास के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर श्रीकान्तिया को पत्र लिख कर इस तथ्य के बारे में जानना चाहाजवाब आया “ऐसा कोई तथ्य मैसूर गजेटियर में उल्लिखित नहीं है”बल्कि पता यह चला कि टीपू सुल्तान का प्रधानमंत्री पुन्नैया नाम का एक ब्राह्मण था और सेनापति जेनरल कृष्णा राव भी एक ब्राह्मण थासाथ हीं प्रोफेसर श्रीकान्तिया ने १५६ ऐसे मंदिरों की लिस्ट भेजी जिनके रखरखाव के लिए टीपू शाही खजाने से हर माह पैसा मुहैया करवाता थायह भी जानकारी मिली कि तत्कालीन शंकराचार्य (श्रृंगेरी मठसे उनकी बेहद करीबी रिश्ते थेध्यान रहे कि गज़ेटीयर अंग्रोजों का बनाया हुआ है न कि मुसलमान शासकों का.प्रोफेसर शास्त्री का यह पाठ बिहार बंगाल असम तत्कालीन उड़ीसा उत्तर प्रदेश राजस्थान और मध्य प्रदेश के हाई स्कूल के पाठ्यक्रम में थाप्रोफेसर पाण्डेय जो उड़ीसा के राज्यपाल रहे और राज्यसभा के सांसद भी ने कलकत्ता विश्वविद्यालय के वाईस-चांसलर प्रोफेसर आशुतोष मुख़र्जी को पत्र लिख कर इन तथ्यों और सम्बंधित दस्तावेजों से अवगत करायातब जा कर यह पाठ तमाम राज्यों के पाठ्यपुस्तक से बाहर किया गयालेकिन सबसे ताज्जुब की बात यह थी कि कुछ साल बाद सन १९७२ में ब्राह्मणों के टीपू सुल्तान के शासनकाल में आत्महत्या का किस्सा फिर से उत्तर प्रदेश के पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया गयाइस घटनाक्रम का जिक्र प्रोफेसर पाण्डेय ने राज्य सभा में किया जो आज भी संसद के रिकार्ड्स में दर्ज है.
राष्ट्रपति ने टीपू सुल्तान की शहादत और उनके युद्ध कौशल जिसका आज भी दुनिया में लोहा माना जाता है और जिसे प्रक्षेपास्त्र का दुनिया में जनक कहा जाता है की बात कह कर एक तरह से देश को इतिहास की निरपेक्ष समझ विकसित करने का आह्वान किया है.
हमने कभी भी यह जानने की कोशिश नहीं की कि अंग्रेजों ने किस तरह मक्कारी से हिंदू और मुसलमानों के बीच तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर पेश कियाउनकी मंशा की कुछ बानगी देखें :
14 जनवरी 1887 को लॉर्ड क्रॉस ने लॉर्ड डफरिन को पत्र लिखा “धर्म के आधार पर बंटवारा जो हमने किया है उससे हमें ज़बरदस्त फ़ायदा पहुंचा है और हमें उस दिन का इंतज़ार है जब भारत में शिक्षा एवं पाठ्यक्रम संबंधी इंक्वायरी कमिटी के कुछ अच्छे परिणाम मिलेंगे
…….. ब्रिटिश सेकेट्री ऑफ स्टेट(विदेश मंत्रीने 1862-63 के तत्कालीन गवर्नर जनरल एल्गिन को एक चिट्ठी लिखी थी। चिट्ठी में कहा गया था “हमने अपनी सत्ता भारत में इसलिए बरकरार रखी क्योंकि हमने सफलतापूर्वक मुसलमानों को हिंदुओं से लड़वाया। हमें यह सिलसिला जारी रखना होगा। तुमसे जो संभव बने सुनिश्चित करो कि दोनों समुदायों के बीच में मैत्री ना रहे
…….. ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रह चुके रैम्से मेक्डोनल्ड ने भी अपनी एक पुस्तक में इस बात का जिक्र किया था कि “हिंदुस्तान में मुसलमानों को विशेष रियायत देने का मकसद दोनो समुदायों में फूट डालना था
   उपरोक्त तीन तथ्य इस बात की तस्दीक है कि सन्1857 की बगावत के बाद अंग्रेज़ शासकों ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत किस तरह हिंदू और मुसलमानों को अलग करने की सफल कोशिश की और अगले 80साल देश पर शासन करते रहे। लेकिन इस पूरी रणनीति के जो अन्य दो दुखद पहलू रहे वे यह कि भारत का बंटवारा हुआ और उससे भी बड़ा जख्म रहा भारत में ही हिंदू और मुसलमानों के बीच न पटने वाली खांई। अंग्रेजों ने इतिहास बदल दिया और तत्कालीन भारतीय इतिहासकारों का एक वर्ग उनके जाल में इस कदर फंसा कि आज तक उसका प्रभाव देखने को मिल रहा है।
   यहां कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि मुगल शासकों का एक वर्ग अतिवादी नहीं था या सोमनाथ मंदिर गजनवी ने नहीं तोड़ा था। या फिर मीर बाकी ने अयोध्या में मंदिर नहीं तोड़ा था। लेकिन अगर इन्हीं तथ्यों को पाठ्यक्रम का हिस्सा बना दिया जाए और अन्य सकारात्मक तथ्यों को दबा दिया जाए तब दो समुदायों के बीच जो दरार पड़ेगी वह शताब्दियों तक मिटना मुश्किल होगा और अंग्रेजों ने यही किया।
   आज जब हम पाकिस्तान बनने और आजादी हासिल करने के ७० साल बाद जब तथ्यों का विश्लेषण करते हैं तब भी कई बार हमारे दिलो-दिमाग से टीपू सुल्तान की गलत व्याख्या कहीं मन में अटकी रहती है। नतीजा यह होता है कि भारत में ही रहने वाले दो समुदायों के बीच में “अस वर्सेज़ देम” (हमारे बनाम उनकेका एक शाश्वत भाव बना रहता है।  
  क्या आज हमें यह तथ्य नहीं बताना चाहिए कि मध्यप्रदेश के सतना के नज़दीक मैहर में बाबा अलाउद्दीन खां मुसलमान होने के बावजूद नियमित रूप से माँ शारदा के मंदिर में जाने के बाद ही अपना रोज़मर्रा का काम शुरू किया करते थे। इतना ही नहीं उन्होंने अपने पोते का नाम ध्यानेश खां और आशीष खां रखा। बाबा अलाउद्दीन खां के शिष्यों में कई हिंदू शिष्य थेक्या संघ को यह नहीं मालूम कि मुस्लिम लीग के सम्मेलन में मुहम्मद इक़बाल ने जब अलग मुस्लिम राज्य की बात कही तब दारूल-उलूम से जुड़े मौलाना हुसैन अहमद मदनी इस बात का विरोध करने वाले शुरूआती व्यक्तियों में से एक थे। यही वजह थी कि गांधी जी के नमक सत्याग्रह में तकरीबन12 हज़ार मुसलमानों ने हिस्सा लिया था।
   भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास नामक पुस्तक में प्रोफेसर ताराचंद्र ने साफ लिखा है कि देवबंद के दारूल-उलूम ने हर उस आंदोलन का समर्थन किया जो भारत से अंग्रेज़ों को खदेड़ने के लिए चलाया गया था। दारूल उलूम के प्रमुख की ज़िम्मेदारी मौलाना महमूद-उलहसन को मिली तो उनकी ज़िन्दगी का मकसद भी देश की आज़ादी था।
   आज जरूरत इस बात की है कि भारतीय समाज को इतिहास का दूसरा पक्ष दिखाया जाए और समाज का दुराग्रह विहीन बुद्धिजीवी वर्ग आजादी के मकसद को कामयाब करने के लिए दो समुदायों के बीच नैसर्गिक एकता बहाल करने को उद्यत हों 

Navodys 

Saturday, 21 October 2017

अपने अधिकारों के प्रति भी जनता का उनिदापन !


उत्तर भारत के बड़े राज्य के समृद्ध शहर के संभ्रांत इलाके में हाल हीं में पानी की किल्लत हुई. सम्बंधित विकास प्राधिकरण के पास इस क्षेत्र में पानी देने की जिम्मेदारी है. शहर के बड़े इलाके में गंगा का पानी गंगनहर के जरिये सप्लाई होता है और हर साल पहले से हीं घोषणा होती है कि अमुक दिन नहर की डीसिल्टिंग (नहर तल से बालू निकलना) के कारण एक महीने के लिए जल सप्लाई नलकूपों से की जायेगी . लिहाज़ा यह कोई उत्तराखंड में अचानक आयी प्राकृतिक आपदा नहीं थी. प्राधिकरण के अधिकारियों को इसका संज्ञान पहले से लेना था लेकिन एक बड़े इलाके में जल आपूर्ति कई दिनों तक बाधित रही क्योंकि पंप काम नहीं कर रहे थे. इस पूरे प्रकरण में निवासियों की तरफ से तीन तरह की सामूहिक/व्यक्तिगत प्रतिक्रियाएं देखने को मिली. एक तो वे लोग थे जो “कोऊ नृप होहिं हमें का हानि” के स्थितिप्रज्ञं भाव में आ कर टैंकर के पास लाइन लगाने लगे या आस-पास की बिल्डिंग में लगे गैर-कानूनी बोरेवेल से पानी ढोने लगे; दूसरे वे थे जो आपस में बात करते हुए तो अधिकारियों और अंततोगत्वा सरकार के खिलाफ तो “सिस्टम सड गया है” के शाश्वत भाव में लानत -मलानत करते रहे लेकिन कभी सड़क पर खड़े होने या इस क्रोध को सामूहिकरूप से प्रकट करने के भाव में नहीं आये; तीसरे वे लोग जो आर्थिकरूप से सक्षम थे और अगले हीं दिन ५०००० खर्च करके निजी बोरेवेल लगवाना शुरू कर दिया (हालाँकि निजी बोरिंग गैरकानूनी है क्योंकि भूगर्भ की जल संपदा निजी संपत्ति नहीं है). जाहिर है जब आप कुछ गैर-कानूनी करते हैं तो पुलिसवाला भी चोर पकड़ना छोड़ कर आप में बड़ा अपराधी देखता है और फिर आप के अपराध को नज़रंदाज़ करने की कीमत ले जाता है. आखिर वह भी तो आपका सेवक है. चूंकि प्राधिकरण के लोग पानी भले न दें लेकिन गैर-कानूनी काम उन्हें जनता की ओर से बर्दाश्त नहीं लिहाज़ा उनका भी हिस्सा.

इस समस्या का जनता की ओर से नैतिक और विधान -सम्मत प्रतिकार क्या था? जनता एक सोच विकसित करे और सब लोग सड़क पर आयें. प्रजातंत्र में इतना दम तो है हीं कि जैसे हीं यह सब सोशल मीडिया पर वाएरल होगा, स्थानीय विधायक भी आयेगा और साथ हीं औपचारिक मीडिया भी इसका संज्ञान लेगा. मुख्यमंत्री कार्यालय भी सक्रिय होगा. प्राधिकरण के अधिकारी सकते में होंगे और यह समस्या हमेशा के लिए ख़त्म होगी. पूरे प्रजातंत्र में सरकार के उनीदेपन से जगाने का यही सबसे कारगर तरीका रहा है और गाँधी ने तो प्रजातंत्र न होते हुए भी इसी का इस्तेमाल कर अंग्रेजों को भगाया.

लेकिन उत्तर भारत के अर्ध-शिक्षित और “सत्ता को माई-बाप” समझने वाले व्यापक समाज में तो छोडिये, अपेक्षाकृत और तथाकथित रूप से शिक्षित और माध्यम वर्ग में भी वही उनिदापन देखने को मिल रहा है. दरअसल आधुनिक शिक्षा से नैतिकता और स्थितियों, अधिकारों और राज्य अभिकरणों की भूमिका की गहरी समझ नहीं बनती बल्कि व्यक्तिगत जीवन में किसी तरह से जिन्दा रहने की “स्किल” विकसित करने का भाव हीं प्रबल रहता है याने “सर्वाइवल इमपरेटिवस” उसे सिस्टम के खिलाफ सामूहिक एक्शन करने से विरत करते हैं. उसका आचरण नैतिकता को मूर्खता समझ कर ख़ारिज करता है और ट्रेन में टी टी को २००० रुपये देकर बर्थ हासिल करने को महारथ मानता है. पूरी दुनिया में भ्रष्टाचार दो तरह के होते हैं. एक “भयादोहनजे (शेकडाउन) जरिये ” और दूसरा “समझौता (पे-ऑफ या कोल्युसिव) करके”. भारत में (दुनिया के पिछड़े समाजों में भी ) सन १९७० तक भयादोहन वाला भ्रष्टाचार प्रमुख था लेकिन इसके बाद अचानक सरकार ने गरीबों के और ग्रामीणों के विकास के नाम पर काफी पैसा खर्च करना शुरू किया. चालाक अधिकारियों और अभियंताओं और मक्कार नेताओं के बीच एक अलिखित समझ विकसित हुई कि पुल बनाओ विकास के नाम पर, बालू -सीमेंट का अनुपात १;१ की जगह १;४ रखो ; पुल ३० साल बाद गिरेगा और तब तक यह इंजिनियर पैसे के दम पर प्रोन्नति पाकर इंजिनियर इन चीफ बन चुका होगा और ठेकेदार मंत्री. दोनों में सिस्टम को दबाने की काफी शक्ति आ चुकी होगी. यह दूसरे तरह का भ्रष्टाचार ख़त्म नहीं होता क्योंकि इसमें व्यक्ति की जगह समाज शिकार होता है और समाज बिना सामूहिक एक्शन के एक भ्रष्ट सिस्टम को सही रास्ते पर ला नहीं सकता. भारत को इस किस्म के भ्रष्टाचार ने आज पूरी तरह से अपने शिकंजे में जकड रखा है.
अब ज़रा गहराई से गौर करें. जनता को पानी देने में असफल कौन हुआ? प्राधिकरण और उसके अधिकारी क्योंकि वे अपने दायित्व के प्रति संजीदा नहीं थे. भुक्तभोगी कौन था ? आम जनता. पानी उपलब्ध करना इस एजेंसी का मूल कार्य है न कि जमीन किसानों से लेकर बिल्डरों को देना और उन्हें जमीन के गर्भ का जल निकाल कर कई मंजिल नीचे तक बेसमेंट बनाना और इस संपदा को गैर-कानूनी रूप से ख़त्म करते हुए घूस के जरिये अपना घर भरना. याद होगा कि यादव सिंह नाम का एक ऐसा हीं नोयडा का जूनियर इंजिनियर कुछ हीं वर्षों में चीफ इंजिनियर बना. जब पकड़ा गया तो पुलिस को उसके अघोषित स्थानों से सैकड़ों करोड़ की संपत्ति मिली. लेकिन यह संपत्ति उसे बिल्डरों से मिली न की जनता को पानी न देने के एवज में. हम जो किस्सा बता रहे हैं वह एक अन्य किस्म का भ्रष्टाचार है जिसमें जनता अपने आप को शिकार बनाने के लिए प्रशासन को आमंत्रित करती है. अगर यही जनता सामूहिक शक्ति और नैतिक दायित्व का परिचय देती तो सड़क पर आती और व्यय-शून्य सोशल मीडिया पर अपने सड़क पर आने की गांधीवादी सामूहिक तेवर के तहत सरकार की अभिकरण और उसके अधिकारियों को मजबूर करती कि वे सुस्ती छोड़ कर अपने दायित्व का निर्वहन करें. लेकिन यह सब करने के लिए अपने अधिकारों को समझना पड़ता और संभव है उसे छिनने वालों के खिलाफ कुछ घंटे सड़क पर आना होता. लेकिन विडम्बना यह है कि वह इसकी जगह अपने अधिकार अपहर्ता सरकारी नौकर को घूस दे कर अपने यहाँ गैर-कानूनी रूप से बोरिंग करा लेता है बगैर यह सोचे हुए कि कल जब बिजली जायेगी तो उसे जनरेटर खरीदना होगा जिसका धुआं पडोसी को डॉक्टर के यहाँ जाने को मजबूर कर सकता है या पड़ोसी के बच्चे की परीक्षा की तैयारी जनरेटर के शोर से बाधित होगी. अब अगर रोड खराब है तो क्या ये रोड बनवा सकते हैं या अगर अपराधी रोज उनके परिवार की महिलाओं के चैन खीच कर भाग जाता है या रात भर दारू पीकर बड़ी गाडी चलाते हुए एक रईसजादा मोर्निंग वाक कर रहे बूढ़े पिता को रौंदता हुए निकला जाता है तो तो क्या ये शहर में अपने लिए नयी सड़क बनायेगे?

हमें अपनी समझ और सामूहिक सोच की गुणवत्ता बेहतर करनी होगी अगर एक नया भारत बनाना है.

नीदरलैंड्स के प्रधानमंत्री मार्क रूट अपनी साइकिल से चल कर राजमहल पहुंचे और परम्परा के अनुसार राजा को नए मंत्रिमंडल के गठन की सूचना दी. महल में केवल एक अंगरक्षक की फोटो नज़र आ रही है. एक भी अधिकारी न तो उन्हें “रिसीव” करने के लिए है न हीं सिक्यूरिटी या सीक्रेट सर्विस का चश्मा लगाये एजेंट. यह देश प्रतिव्यक्ति आय में या मानव विकास के स्तर पर ऊपर के पांच देशों में है. यहाँ न मीडिया का कैमरा न हीं कोई रिपोर्टर दिखाई दे रहा है. समृद्ध और विकसित प्रजातान्त्रिक देशों में मीडिया काफी मजबूत है परन्तु उनकी खबर की अवधारणा शायद अलग है. उनके लिए “हनीप्रीत ने जेल में चाय के साथ नमकीन भी खायी” या मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की पत्नी करवाचौथ कैसे मानती हैं” ब्रेकिंग न्यूज़ नहीं होती।

jagran/ lokmat 

Saturday, 14 October 2017

ये भूख है कि ख़त्म हीं नहीं होती



हर साल की तरह इस साल का भी विश्व भूख सूचकांक गुरुवार को जारी हुआ है. पिछले २५ सालों में देश के गरीबों और उनके बच्चों को भूख से निजात दिलाने में हम बागलादेश, नेपाल और रवांडा से भी पीछे हो गए हैं. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मकबूल संस्था अन्तर्राष्ट्रीय खाद्य नीति शोध संस्थान के मुताबिक दुनिया के ११९ देशों में हमारा नंबर १००वां है. जबकि तमाम गरीब मुल्क इस दौरान अपने लोगों को भूख से उबारने में काफी सफल रहे हैं. इस भूख को नापने के चार आधार होते हैं --- कुपोषण, बाल मृत्यु दर, बच्चों का कद छोटा होना और उनका वजन आयु के हिसाब से कम होना. इन चारों आधार पर माना जाता है कि जिस समाज में भूख का स्तर खराब है उस समाज के बच्चे शारीरिक हीं नहीं मानसिक, नैतिक और आध्यात्मिक रूप से भी कमजोर होते है। शायद भारत में व्याप्त भ्रष्टाचार और सत्ता वर्ग की समाज के प्रति आपराधिक उदासीनता इस तथ्य के आधार पर समझी जा सकती है.
जरा गौर करें. सन २०१४ में यू पी ए -२ की मनमोहन सरकार ने चुनाव के चंद दिनों पहले खाद्य सुरक्षा कानून बनाया और हर गरीब (भूखों) को मुफ्त में ३५ किलो ग्राम राशन देने का ऐलान किया. यह योजना आज अमल में है. अगर यह योजना धरातल पर सही अमल में होती तो आज भूख में भारत की स्थिति रवांडा से भी पीछे न होती. लेकिन शायद भ्रष्टाचार का दंश यहाँ भी गुल खिला रहा है. हाल हीं में प्रधानमंत्री मोदी ने अधिकारियों की एक बैठक में उन अधिकारियों की क्लास ली जिन्होंने आंकड़े पेश करते हुए बताया कि कार्यक्रमों पर अमल की स्थिति बेहतर है. “आप के आंकड़ों के अनुसार तो भारत में स्वर्णिम युग आ गया है लेकिन फिर मीडिया में जो हकीकत है वह तो कुछ और बयां कर रही है. कृपया यह सब बदलें और परिणाम पर ध्यान दें”. जाहिर है शायद मोदी को भी यह समझ में आ गया है कि आंकड़े और हकीकत में कितना बड़ा अंतर है. अगर खाद्य सुरक्षा के तहत हर गरीब परिवार को मुफ्त ३५ किलो राशन मिल रहा है तो बच्चे कम वजन के क्यों हो रहे हैं और अगर जननी सुरक्षा योजना अपनी जगह पर दुरुस्त है तो बाल मृत्यु और मातृ मृत्यु दर में अपेक्षित बदलाव क्यों नहीं आ रहा है?

हम अपने को दुनिया का सबसे बड़ा प्रजातान्त्रिक देश होने का दावा करते हैं. याने तंत्र प्रजा के अनुरूप और उसकी इच्छा से चलता है. तो कौन है जो इन २२ करोड़ गरीबों के मुंह में निवाला न पहुँचाने का सबब बन रहा है. क्या बाकि १०० करोड ? क्या वे उदासीन हैं इस समस्या को लेकर क्योंकि उन्होंने रोटी जीत ली है. क्या यही वजह है कि आज मुद्दा रोटी न होकर “गाय और गौ मांस” हो गए हैं. क्या यह वही वर्ग है जो किसी अखलाक के यहाँ कौन सा मांस पका है इसे देख कर या किसी गौ व्यापारी पहलू खान को ट्रक पर गाय ले जाते पकड़ता है और फिर गुस्से में उन्हें मार देता है, या वन्दे मातरम न कहने वालों को पाकिस्तान भेजने को उद्धत हो जाता है . या फिर वह वर्ग जो ड्राइंग रूम में चिप्स खा कर राष्ट्रवाद की नयी पहचान बनाते हुए “भारत को महान “ बता रहा है.
कुछ आंकड़े देखें. सन १९९२ में भूख की समस्या को लेकर घाना, वियतनाम , म्यांमार , मलावी , बांग्लादेश , नेपाल , नाइजीरिया, लाओ (पी डी आर ), कैमरून , माली और रवांडा भारत के समकक्ष खड़े थे लेकिन २५ सालों में घाना ने इस सूचकांक को ४१. ९ से घटाकर १६.२ किया, वियतनाम ने ४०.२ से १६, बगल के अपेक्षाकृत कमजोर माने जाने वाले म्यांमार ने ५५.६ से २२., मलावी ने ५८.२ से २२., बांग्लादेश ने (जिसकी पैदाइश हीं ४५ साल पुरानी है ) ५३.६ से २६., पडोसी नेपाल ने (जो एक संविधान नहीं बना पा रहा है) ४२.५ से २२ , अफ्रीकी देश (जो गरीबी और भूखमरी के लिए बदनाम माने जाते थे ) – निजीरिया , कैमरून और रवांडा ने क्रमशः ४८.५ से २५.; ४० से २०.१ और ५३.३ से ३१.३१.४ किया. इसके ठीक अलग भारत के प्रजातान्त्रिक रूप से चुनी हुई सत्ता में बैठे लोगों की आपराधिक उदासीनता का यह आलम है कि इन २५ वर्षों में देश अपनी भूख के इस सूचकांक को ४६.२ से मात्र ३१.४ तक हीं ला पाया. फिर भी हम भारत महान की बांग दे कर २२ करोड भूखों को रात में सोने को मजबूर करते रहे हैं.
आखिर क्यों नहीं हमें अपने पर कोफ़्त होती है इन रिपोर्टों को देख कर. भूख पर हर साल रिपोर्ट देने वाली यह संस्था तो किसी विपक्षी पार्टी की नहीं है. न हीं उन लोगों की जो मोदी की निंदा करके रात में आराम से सोते हैं ? हाँ सत्ता वर्ग यह सूचना दे कर नींद को और गहरा कर सकता है कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान हमसे पीछे है. लेकिन हम यह नहीं बताते कि चीन ने इस भूखमरी पर काबू पते हुए अपने को २९ वें स्थान पर पहुँचाया है.
दूसरी ओर पिछले ५५ साल में हमारे राजनेताओं ने हर चुनाव में “गरीबी हटाओ” का लगातार नारा देकर हमारे वोट हासिल कर सत्ता पर कब्ज़ा जमाया. सन १९७१ में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरागांधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया और तब से यह सिलसिला आज तक चलता रहा. यहाँ तक कि वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी पिछले साल की जून ७ को अमरीका के उद्योगपतियों के बीच बोलते हुए कहा कि भारत दुनिया की अर्थ-व्यवस्था का इंजन बन चुका है. इस बात को वित्त मंत्री ने भी लगभग एक साल बाद समृद्ध देशो वाले जी -२० के सम्मेलन में दोहराया. विरोधाभास यह कि २.५३ ट्रिलियन डॉलर के सकल घरेलू उत्पाद के साथ हम आज दुनिया के सात बड़ी अर्थ-व्यवस्था वाले समूह में हो कर अपनी मूंछें ऐंठ रहे हैं और शायद इसीलिए हम अपने को दुनिया की ११७ ट्रिलियन डॉलर की कुल अर्थ-व्यवस्था का इंजन समझने लगे हैं. समझ में नहीं आता कि विश्व अर्थ-व्यवस्था में मात्र २ प्रतिशत का योगदान दे कर इंजन कैसे बन सकते हैं . ऐसा तो १६ वीं और १७वीं सदी में जब हम विश्व अर्थ-व्यवस्था में ३२ प्रतिशत योगदान करते थे तब भी किसी बादशाह अकबर ने नहीं कहा था. न हीं किसी सम्राट अशोक ने ३०० ईसा पूर्व ऐसा दावा किया था.


अभिजात्य वर्ग और अक्सर मध्यम वर्ग को बुलेट ट्रेन अच्छी लगती है , दुकानों की जगह माल विकास की चुगली खाते दीखते हैं और हमारे प्रधानमंत्री का दुनिया के बड़े देशों में स्वागत और गले मिलना अपने बढ़ते कद का अहसास देता है पर तब एक दन्त कथा की याद आती है कि मोर अपनी खूबसूरत पंखों को फैला कर झूम उठता है पर जब अपनी पतली टांगों पर नज़र जाती है तो सर जमीन पर पटक देता है . शायद हम अपने विकास की वरीयता भूल गए हैं. बेहतर होगा कि बुलेट ट्रेन भी आये, शापिग काम्पलेक्स भी बने पर वरीयता इस भूख को मिटने की हो

lokmat

Friday, 22 September 2017

सौहार्द्र : मुसलमानों की भी जिम्मेदारी है




सन १९४४ की बात है. भारत की आजादी को लेकर अंग्रेजों ने बटवारे का पेंच फंसा दिया. महात्मा गाँधी और मुस्लिम लीग के मुहम्मद अली जिन्ना के बीच ऐतिहासिक १८ दिन लम्बी बातचीत चली. पर जिन्ना को ब्रितानी हुकूमत की शह थी. लिहाज़ा विवेक और तार्किकता जिद पर भारी नहीं पड़ सकती थी. सातवें दिन यानी १५ सितम्बर को गाँधी ने जिन्ना को एक पत्र लिखा: “हम दोनों की बातचीत के दौरान आपने पुरजोर तरीके से कहा कि भारत में दो देश हैं –हिन्दू और मुसलमान...'। जितनी अधिक हमलोगों के बीच बहस आगे बढ़ रही है उतनी हीं अधिक चिंताजनक मुझे आपकी तस्वीर दिखाई दे रही है........ इतिहास में मुझे एक भी घटना की याद नहीं आती जब धर्मान्तरण करने वाले लोग या उनके वंशज अपने मूल धर्म के लोगों से अलग उसी राष्ट्र में एक नए राष्ट्र का दावा करें. अगर भारत इस्लाम के आने के पहले एक राष्ट्र था तो इसे एक रहना होगा भले हीं उस राष्ट्र के तमाम लोगों ने अपना पंथ बदल लिये हो “.
बहरहाल ३५ महीने बाद हीं पाकिस्तान बन गया. लेकिन आगे की घटना देखिये.
बंटवारे के दौरान और बाद के कई  महीनों तक लाखों हिन्दू -मुसलमान एक दूसरे को मारते रहे . हिंसा का तांडव अभी चल हीं रहा था। संविधान सभा को अपना अपना कार्य करते हुए कोई एक साल से ज्यादा हो चुके थे. पूरा देश इस विभाजन से सकते की हालत में था. दिसम्बर , १९४७ को मुस्लिम लीग (जो बँटवारे के बाद बचे-खुचे सदस्यों से बना रह गया था) ने संविधान के प्रारूप में दो संशोधन प्रस्ताव रखे। पहला था --भारत में रहने वाले मुसलमानों के लिए अलग लोक सभा सीटों में आरक्षण। लेकिन दूसरा उस संकट में मुसलमान नेताओं की मनोदशा बताता है। यह संशोधन प्रस्ताव था --मुसलमानों  को पृथक मतदाता श्रेणी में रखना (याने सेपरेट एलेक्टोरेट --- एक ऐसी मांग जो अंततोगत्वा  फिर एक अन्य देश बनाने का मार्ग प्रशस्त करती. इस संशोधन को देख कर पूरा देश स्तब्ध रहा गया . पटेल ने बेहद भावातिरेक में कहा “मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि इतने बढे झंझावात में फंसे देश के अनुभव के बाद भी इनमें कोई बदलाव आया भी या नहीं जो ऐसी मांग कर रहे हैं. "
आज ७० साल बाद सोशल मीडिया पर एक विडिओ वायरल हो गया है जिसे लाखों लोगों ने देखा. बांग्ला टीवी चैनलों ने इसे दिखाया। राज्य की राजधानी कोलकता में इसी सितम्बर १२  को पश्चिम बंगाल अल्पसंख्यक फेडरेशन के तत्वावधान में १८ संगठनों ने रोहिंग्या शरणार्थियों को भारत में रहने की अनुमति देने की मांग को लेकर एक रैली आयोजित की। रैली में बोलते हुए एक युवा नेता मौलाना शब्बीर अली वारसी चीच-चीख कर कह रहा था “आप इस गलतफहमी में न रहें कि मुसलमान कमज़ोर है. तुम हमारी हिस्ट्री नहीं जानते . हम कर्बला वाले हैं , हम हुसैनी मुसलमान है . अगर हम ७२ भी है तो लाखों का जनाजा निकाल सकते हैं. ................. “ . मंच से आवाज आती है – बहुत खूब. भीड़ से अल्लाहो अकबर के नारे) इस नेता का चीखना और तेज होता है, “दिल्ली की सरकार से मैं बताना चाहता हूँ कि  ये रोहिंग्या हमारे भाई है. इनका और हमारा कुरआन एक है , जो इनका खुदा वो हमारा खुदा....... दुनिया में मुसलमान कहीं भी हो हमारा भाई है.........”. भीड़ हाथ उठाकर कहती है ---- नाला-ए -तदबीर , अल्लाहोअक्बर . नेता आगे कहता है, “ये बंगाल है , गुजरात नहीं, आसाम नहीं , यूपी नहीं , मुज़फ्फरनगर नहीं. मीडिया यहाँ बैठी है. मेरा चैलेंज है. अभी बंगाल में किसी मां ने वो औलाद पैदा नहीं किया जो एक भी रोहिंग्या मुसलमान को निकाल सके”.  भीड़ पागल की हालत में नारे लगाने लगती। प्रश्न इस नेता के आपत्तिजनक भाषण का नहीं है. प्रश्न उस भीड़ का है जो इसे न केवल अनुमोदित कर रही थी बल्कि इन वाक्यों से एक तादात्म्य प्रदर्शित कर रही थी, कुछ भी कर गुज़रने के भाव में।
अब जरा इस कुतर्क को समझें. यह नेता दुनिया के मुसलमानों को अपना भाई मान रहा है पर वह जिससे खून का रिश्ता रहा है या जिस मिट्टी में पला है उसी को चुनौती दे रहा है. इस्लाम से पहले इसके पूर्वज भारतवासी थे. लेकिन क्या आपने कभी किसी सभा में भारत के टुकडे करने वाले कश्मीरी नारों के खिलाफ अन्य भाग के मुसलमानों को इतने गुस्से में देखा है.? खालिद और उसके लोग जे एन यू में कौन सी आजादी मांग रहे थे और न मिलने पर “भारत तेरे टुकडे होंगे इंशाल्लाह “ का ऐलान कर रहे थे? याने धार्मिक रिश्ता वैश्विक है और वह जहाँ की मिटटी में सांस ली है उसके रिश्ते पर भारी पड़ती है. तर्क-वाक्य के विस्तार की प्रक्रिया के तहत यह कहा जा सकता है कि पाकिस्तान का मुसलमान हमला करे तो वह जायज है क्योंकि वह भाई है. सेमिटिक धर्मों की यह एक बड़ी समस्या है उनकी प्रतिबद्दता में राष्ट्र नहीं है. परा-राष्ट्रीय  निष्ठा जो मूलरूप से विश्व भर में फैले उन  धर्मनुयाइयों के प्रति होती है वह उन्हें राष्ट्र की अवधारणा से दूर ले जाती है. ऐसे में देश क्या करे? हिन्दुओं का भाव कैसे गीता के “स्थितिप्रज्ञ” सरीखा बना रहे. आज जरूरत  है कि मुसलमान भी इस बात को समझे कि अगर दुनिया के मुसलमान एक हैं और वो कहीं से भी आयें तो यह बक़ौल इस नेता के यह भारत की जिम्मेदारी है कि उन्हें उदार दिल के साथ आत्मसात करे , तो फिर कल ये ४०,००० रोहिंग्या  भी तो इसी तरह चीख-चीख कर चिल्लायेंगे और चुनौती देंगे और कर्बला का इतिहास बताएँगे. यहाँ के मूल होंगे तो पाकिस्तान बनायेंगे या अलग मतदाता श्रेणी की बात करेंगे।
जहाँ एक ओर अपेक्षा के जाती है कि सत्ता किसी दल विशेष द्वारा हासिल होने का मतलब यह नहीं कि उग्र हिन्दु किसी अखलाक के घर गौमांस तलाशें और फिर उसे मार दें और न हीं ट्रक से दूध के व्यापार के  लिए वैधरूप से गाय ले जा रहे पहलू खान को सरे आम पीट-पीट कर मार दें वहीं “उनकी मां ने वह लाल पैदा नहीं किया” कहना भी अमनपसंद औसत मुसलमानों द्वारा ऐतराज़ का सबब होना चाहिये न कि उन्माद का कारण। स्वयं मुसलमानों को ऐसे भाषणों पर रोक लगाना होगा क्योंकि किसी ममता या अन्य राजनीतिक दलों को सिर्फ वोट से मतलब है जानें तो आती जाती रहती हैं।
हम निरपेक्ष विश्लेषक अख़लाक़ के मारे जाने पर उग्र हिन्दुत्व को कोसने लगते है स्वयं को तटस्थ साबित करने का होड़ में, पर क्या कभी कट्टरता के इस पहलू पर ऐतराज़ जताया है। आतंकी घटना होती है तो हमारा तर्क होता है कि आतंकी का कोई धर्म नहीं होता। हम झूठ बोलते है। उसे धर्म ही वैचारिक प्रतिबद्धता देता है और धर्मानुयाई शरण और वे ही उसका महिमामंडन भी करते हैं।

punjab kesri

Sunday, 10 September 2017

अज्ञानी व अनैतिक मीडिया देश के सम्यक सोच के लिए घातक


स्वस्थ जन-संवाद को कुंठित करते ये न्यूज़ चैनल 
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कोई दस साल पहले जब प्राइम-टाइम स्लॉट को बाबा, भूत-भभूत और “एलियन” के शिकंजे से छुडा कर स्वस्थ स्टूडियो –डिस्कशन की ओर लाया गया तो उद्देश्य था जन-संवाद के धरातल में लोकोपयोगी मुद्दे लाना. अपेक्षा थी कि एंकर उस मुद्दे पर यथासंभव जानकारी अपनी रिसर्च यूनिट से हासिल कर पूरी तरह सत्य के निकट पहुँचने की कोशिश करे, याने पक्ष-विपक्ष दोनों पहलू से समाज को अवगत कराएगा. राजनीतिक संवाद में पार्टियों के प्रमुख लोग होंगे और सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक या अन्य मामलों में उस विषय के प्रतिनिधि व जानकार और स्वतंत्र विश्लेषक जिनकी जानकारी और निरपेक्ष तर्क-शक्ति विषय को ट्रैक पर रखेगी.

यह प्रयास दो कारणों से किया गया. पहला: घटिया विषय-वस्तु देने से समाज में मीडिया और खासकर एडिटरों को छवि काफी गिरने लगी थी और दूसरा: प्रजातंत्र के बेहतर संचरण के चार मूल तत्व होते हैं ; (१) बहुमत का शासन, (२) अल्प-संख्यकों के अधिकार की रक्षा, (३) संवैधानिक शासन पद्धति और (४) विमर्श से शासन क्योंकि  चुनाव जीत कर सरकार चलाना कोई साइकिल स्टैंड का ठेका लेना नहीं है और सरकार से उसके कार्यों का हिसाब लगातार लेना, जन-विमर्श के जरिये उसे अमुक कार्य करने या न करने के लिए उद्दत करना और अगले चुनाव में उसे ख़ारिज करने या फिर बहाल करने का भय बनाये रखना इसी विमर्श का हिस्सा होता है। और इसी अवधारणा के कारण मीडिया की भूमिका स्वस्थ प्रजातंत्र में अपरिहार्य मानी जाती है.

स्टूडियो डिस्कशन के जरिये हमारा प्रयास था कि सार्थक मुद्दों पर बहस के माध्यम से दर्शकों को दोनों पक्ष के तथ्य दे दिए जाएँ और फिर उन्हें जन-विमर्श के धरातल पर छोड़ दिया जाये ताकि अगले दिन सुबह चाय की दूकानों, कार्यालयों और अन्य विमर्श के “कोनोँ” इसे लोग डिस्कस करें और प्रजातंत्र की जड़ें अतार्किक, अवैज्ञानिक व भावनात्मक मुद्दों के बाढ़ में बह न जाएँ. साथ हीं चूंकि भारत सरीखे परम्परागत देश में वैज्ञानिक सोच लाने के लिए कोई क्रांति हुई हीं नहीं (जो हुई वह गलत या सही संविधान में हीं कैद रह गयी जैसे दलित प्रताड़ना व जातिवाद से छुटकारा, भ्रष्टाचार उन्मूलन, सम्प्रदायवाद के दंश से मुक्ति) लिहाज़ा डिस्कशन का एक बड़ा फायदा यह होता कि समाज की तर्क-शक्ति बेहतर होती और वह भाव-शून्य और तथ्य पर आधारित सोच विकसित करता.

लेकिन कुछ हीं वर्षों में यह सब कुछ पटरी से उतर गया और उद्देश्यों के ठीक उल्टा होने लगा. एडिटर को लगा कि इसमें देश-व्यापी पहचान बनती है, सत्ता सीधे प्रभावित होती है और उसकी फेस-वैल्यू उसे तनख्वाह आसमानी करवाने में मदद करती है. लिहाज़ा चेहरा रंगा-पोतवा कर वह हर शाम घंटे –दो घंटे की कवायद को अपनी पत्रकरिता की “गणेश-पूजा” मानने लगा. भूत-भभूत, बाबाओं और “गाय ले जाने वाले आकाशीय एलिएंस" दिखाने से अभी-अभी छूटे इन संपादकों को पढ़ने की आदत नहीं रही लिहाज़ा शाम के “डिस्को” के लिए विषय का चुनाव भी राधे-माँ, आसाराम और “दो के बदले दस सिर” से ऊपर नहीं बढ़ पाया. दरअसल इसमें संपादक-एंकर महोदयों को पढ़ना नहीं होता. खाली हांफ-हांफ कर राष्ट्रवाद में तनमन न्योछावर करने के भाव में आना होता है. अंग्रेज़ी चैनल के एक संपादक ने तो “राष्ट्रवाद” को अपनी पत्रकारिता का अपरिहार्य गुणक बता कर अपने को बौद्धिक ईमानदारी का अलमबरदार बताना शुरू किया। तमाम हिंदी चैनलों के युवा एंकर –एडिटरों ने इस स्टाइल को यथावत अंगीकार कर लिया. राष्ट्रवाद को लेकर वही गुस्सा, गैर-भाजपाइयों और गैर हिंदुवादी पैनालिस्टों को खासकर कांग्रेस के प्रवक्ताओं को अ-राष्ट्रवादी मानते हुए इन एंकर –एडिटरों  द्वारा बाकि का काम तथाकथित “राष्ट्रवादी पेनलिस्टों पर छोड़ देना जो अगले पांच मिनट में अपने “प्रतिद्वंदियों” पाकिस्तान भेजने की बात कह कर अपने को विजयी घोषित कर लेगा इस नये फ़ॉर्मेट की बुनियाद बन गया।  इसमें न तो एंकर-एडिटर महोदय को पढ़ने की जरूरत है न हीं दलों से जुड़े पैनालिस्टों को. बस आवाज बुलंद (लंग  पॉवर से) और बदतमीज़ी की हद तक दूसरे को न बोलने देने की सलाहियत हीं तो चाहिए. “तेरा नेता बनाम मेरा नेता” का लाभ यह है कि प्रवक्ता दिल्ली बैठे शीर्ष नेतृत्व की नज़रों में चढ़ जाता है और कई बार मंत्री पद से नवाज़ दिया जाता है या राज्य-सभा में जगह मिल जाती है.

राम रहीम मुद्दे पर दिन रात वह तहखाना दिखाया जा रहा है जिसमें इन लालबुझक्कडों के अनुसार बाबा सुरंग से लड़कियों को मंगवाता था बलात्कार करने के लिए. इन में से कई संपादकों के चैनलों में हाल हीं में यह बाबा इन्हीं संपादकों को अपनी फ़िल्म प्रोनोशन के लिये इन्टरव्यू दे चुका है। लेकिन तब इन संपादकों को बाबा नैतिकता की प्रतिमूर्ति लगा। किसी एंकर-एडिटर ने इस बात पर चर्चा नहीं की कि कैसे देश में पारम्परिक व औपचारिक धार्मिक आर्डर ख़त्म हुए या जातिवाद , छुआछूत को प्रश्रय देते रहे जिसकी प्रतिक्रिया में कमज़ोर और अज्ञानी वर्ग इन बाबाओं के चंगुल में फंसता गया; इसमें सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों और बाज़ार की ताकतों और सत्ता-बाबा गठजोड़ की क्या भूमिका थी? संविधान में संशोधन करके सन १९७६ से  “वैज्ञानिक सोच विकसित करना” हर नागरिक का कर्तव्य माना गया लेकिन क्या सरकार ने इसके लिए कोई फण्ड या विभाग या कोई अन्य उपक्रम किया. या फिर किसी मीडिया हाउस ने क्या कभी इसके लिए कोई अभियान चलाया. बाबा से हम विज्ञापन लेते रहे और जब “फंस” गया तो उसके “बेड-रूम” की अय्याशी हफ़्तों-दर-हफ़्तों दिखाने लगे. कहाँ है जरूरत पढने की? एक और उदाहरण  लें. कुछ हफ्ते पहले देश के स्वास्थ्य को लेकर सरकार की एक विस्तृत रिपोर्ट आयी. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एन ऍफ़ एस एच) की यह चौथी रिपोर्ट है (तीसरी सन २००७ में आयी थी). इतनी वृहद् रिपोर्ट जिसमें देश के हर जिले में स्वास्थ्य की कितनी बुरी स्थिति है पर प्रमाणिक व्योरा था. पढने पर पता चला कि देश में स्वास्थ्य की स्थिति बेहद खराब है. क्या इन “सर्वज्ञं” एंकर-एडिटरों को इस पर जन-विमर्श तैयार नहीं करना चाहिए था7th ?  लेकिन इसके लिए इनको कई दशकों तक पढ़ना पड़ता तब इस टॉपिक का महत्व समझ पाते. लिहाज़ा शाम को ये फिर “किसी बाबा के बेड –रूम “ में घुस गए. जाहिर है जब संपादक महोदय न्यूज़ रूम में ऐसे टॉपिक का चुनाव करेंगे तो रिपोर्टर खबर लायेगा “बाबा रोज शाम को काम-शक्ति वर्धक दावा खाता था”. दो दिन पहले एक प्रमाणिक रिपोर्ट में बताया गया कि भारत में लगातार गरीब-अमीर खाई बढ़ रही है (जिन्नी गुणक) के पैमाने पर. तमाम अंतर-राष्ट्रीय संस्थाएं लगातार चीख-चीख कर बता रही हैं कि भारत का आर्थिक मॉडल गलत है और इसमें गरीब और गरीब बन रहा है और अमीर और अमीर. लेकिन क्या आपने एक दिन भी कोई चर्चा सुनी है? कारण ? एंकर महोदय को पढ़ना पडेगा. मीडिया में लाखों रुपये महीने की तन्खवाह, रातों-रात सेलेब्रिटी बन कर बे –पनाह “पहचान” , हर शाम महज घंटे-दो घंटे के लिए राष्ट्रवाद या “बाबा की ऐय्यासी”  को लेकर गुस्से के भाव ने भारत के सार्थक  जन संवाद को कहीं दूर फेंक दिया है.
इनमें से एक अपेक्षाकृत बेहतर वसूलों वाले संपादक का बचाव सुनिए: “संपादक कोई प्रोफेसर थोडे न होता है. १३ घंटे काम करता है. अगर वह ऑफिस में संविधान और गूढ़ रिपोर्ट पढेगा तो चैनल चल चुका.” शायद उसे नहीं मालूम था कि संपादक प्रोफेसर से ज्यादा पढता है और तब जब समाज से सम्मान मिलता है वह अलग होता है. पंडित भीमसेन जोशी और मीका में अन्तर समझना होगा।    

Jag

Wednesday, 6 September 2017

मेडिकल रिसर्च: अधकचरे ज्ञान की मार्केटिंग दुनिया के लिए ख़तरा



घी या मक्खन कम खाना दिल के लिए नुकसानदायक : नया अध्ययन 
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“दिल मजबूत रखना हो तो वसा का सेवन बढाएं, कार्ब कम करें”
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कौन देगा हिसाब ४० साल में दुनिया के करोड़ों लोगों की मौत का ?

पिछले महीने की २९ तारीख को प्रस्तुत एक अध्ययन ने चिकित्सा की दुनिया में खलबली मचा दी है. पिछले ४० साल से बनी अवधारणा जिसका पूरे विश्व के डॉक्टरों ने और समाज ने ध्रुव -सत्य समझ कर पालन किया वह गलत साबित हुई है. नये अध्ययन के मुताबिक कम वसा खाने से दिल की बीमारियों (सी वी डी) का ही नहीं कई अन्य बीमारियों का ख़तरा भी ज्यादा होता है साथ हीं ज्यादा कार्बोहाइड्रेट युक्त भोजन भी इस खतरे को बढ़ाता है. अब तक दुनिया के डॉक्टर यह बताते थे कि ज्यादा “फैट” (घी, मक्खन, तेल, सूखे मेवों आदि से मिलने वाले तीन प्रकार के वसा) के सेवन से दिल की बीमारियों का सीधा समानुपातिक रिश्ता है. गदक्षिण एशियाई देशों खासकर भारत के खानपान को लेकर हुए इस अध्ययन के भाग में माना गया है कि गरीब वर्ग जो उर्जा के लिए अधिक मात्र में अनाज का सहारा लेता है  और जो आर्थिक कारणों से घी-तेल का सेवन नहीं कर पाता वह दिल की बीमारियों के साथ-साथ अन्य बीमारियों को भी जन्म देता है.  

यह व्यापक अध्ययन पांच महाद्वीपों के उच्च, माध्यम और निम्न आय वाले १८ देशों के १३५३३५ लोगों पर कनाडा के हैमिलटन -स्थित म्क्मास्टर यूनिवर्सिटी के पापुलेशन हेल्थ रिसर्च इंस्टिट्यूट के शोधकर्ताओं की टीम ने “प्योर” ( प्रोस्पेक्टिव अर्बन-रूरल एपिड़ेमोलोजी) अध्ययन कार्यक्रम के तहत किया गया. इस रिपोर्ट को पिछले माह के अंतिम सप्ताह स्पेन के बार्सिलोना में हुए यूरोपियन सोसाइटी ऑफ़ कार्डियोलॉजी कांग्रेस में जब प्रस्तुत किया गया तो पूरे विश्व के चिकित्सा वर्ग में चर्चा का एक तूफान सा आ गया है. तमाम देशों से अपील की जा रही है कि वे भोजन के लेकर अपने गाइडलाइन्स को बदलें और डॉक्टरों से भी अपनी चार दशक पुरानी मान्यताओं को तिलांजलि देने को कहा जा रहा है.

चिकित्सा विज्ञानं के अनुसार व्यक्ति को ऊर्जा जिन तीन पदार्थों से मिलती है वे हैं --- कार्बोहायड्रेट, फैट और प्रोटीन. दुनिया के तमाम बड़े देशों ने अपने यहाँ कम वसा और ज्यादा “कार्ब” को प्रोत्साहित करने के लिए कानून बनाये थे. ब्रिटेन के नेशनल हेल्थ सर्विस (एन एच एस) के वेबसाइट पर दिएगये देशवाशियों के सन्देश में भी आज भी दिखाई देता है “वसा का सेवन किसी भी कीमत पर ३० प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए और उसकी जगह स्टार्च-युक्त कार्बोहाइड्रेट्स (अनाज) का अनुपात अधिक होना चाहिए”. 

उधर इस अध्ययन दल के अगुवा डॉ महशिद देहघन ने इस नए अध्ययन पर बोलते हुए  कहा “ शरीर के लिए आवश्यक ऊर्जा के लिए ६० प्रतिशत से अधिक कार्बोहायड्रेट का सेवन दिल हीं नहीं कैंसर व डिमेंशिया सरीखे कई घातक बीमारियों को बढ़ाता है. इसे १० प्रतिशत कम करने के साथ वसा के सेवन (जिसमें सैचुरेटेड वसा जैसे घी और मक्खन भी हैं) बढ़ाया जाना बेहतर विकल्प है”.

इसे भारतीय निम्न व मध्यम वर्गीय खान-पान के अनुरूप इस तरह समझा जा सकता है। आप तीन रोटी खाते है फिर चावल और दाल भी लेते है और फिर आपकी पत्नी या माँ एक रोटी और खाने का इसरार करती है। अब उन्हे यह कहना होगा कि रोटी एक हीं खाओ पर घी लगी और साथ में सब्ज़ियाँ, सलाद और सस्ते फल का सेवन बढ़ा दो।

नए अध्ययन के अनुसार दिल की बीमारियों के अलावा डीमेंशिया (भूलने की बीमारी,) कैंसर आदि भी पुरानी अवधारणा –जनित खान –पान से बढ़ने के संकेत मिले हैं.

ब्रिटेन के जाने –माने हृदय चिकित्सक प्रोफ जेरमी पीअरसन ने इस शोध पर प्रतिक्रिया में कहा कि ब्रिटेन के स्वास्थ्य विभाग को जनता के लिए दी गयी अपनी खाद्य सम्बंधित एडवाइजरी में अमूल-चूल परिवर्तन करना होगा. इस अध्ययन के बाद हमें अपने कार्बोहायड्रेट की मात्र पर न कि वसा की मात्र पर अंकुश लगाना  होगा”. लगभग यही विचार ब्रिटेन के हीं एक अन्य प्रसिद्द कार्डियोलॉजिस्ट असीम मल्होत्रा ने व्यक्त करते हुए कहा “यह सही वक्त है कि दुनिया अपनी अब तक की अपनी अवधारणा में यू-टर्न ले और जिस वसा को “अछूत” समझना बंद करे”.

डॉ देहघन के अनुसार हम यह मानते आये हैं कि कुल वसा और खासकर सैचुरेटेड फैटी एसिड (जो घी मक्खन से मिलता है) को कार्बोहायड्रेट और अनसैचुरेटेड फैट से विस्थापित करने से एलडीएल कोलेस्ट्रोल कम किया जा सकता है और जिससे दिल की बीमारियाँ कम होंगी. यह अवधारणा केवल यूरोपीय लोगों के खान पान को देख कर हीं बनाई गयी. लेकिन दक्षिण एशिया के लोग गरीबी के कारण एक अलग किस्म का भोजन करते हैं जिसमें वसा की मात्र कम होती है और यह कमी जानलेवा होती है. साथ हीं पुराने अध्ययन में यह बात शामिल नहीं कि अगर वसा एलडीएल कोलेस्ट्रोल बढ़ता है तो साथ हीं एच डी एल (अच्छा कोलेस्ट्रोल) भी बढ़ाता है नतीजतन दोनों का अनुपात समान रहता है.

डा देहघन की टीम के अनुसार एल डी एल कोलेस्ट्रोल (जो कि खान –पान नियमन का मूल आधार है) वसा का दिल की बीमारियों पर क्या प्रभाव होता है , जानने के लिए विश्वसनीय कारक नहीं है. इसकी जगह एपीओबी (अपोलिपोप्रोटीन बी) और एपीओए-१ (अपोलिपोप्रोटीन ए-१) के अनुपात को आधार माना  जाना चाहिए था.  

प्रश्न है रिसर्च की विश्वसनीयता क्यों नहीं ?
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यहाँ प्रश्न यह उठाता है कि अगर पुरानी अवधारणा गलत थी तो क्यों सैकड़ों गलत या अधकचरे निष्कर्षों की बुनियाद पर पूरी दुनिया के लोगों को चार दशकों से मौत के मुंह में झोंका जा रहा है. क्यों यूरोप के लोगों और उनके खान-पान पर किये गए अध्ययनों को मानने के लिए भारत सरीखे गरीब मुल्कों के लोगों को मजबूर किया जाता रहा है?  कौन देगा हिसाब उन करोड़ों मौतों का जो गलत अवधारणा के कारण विश्व समुदाय ने झेली हैं?      

क्या आज सही समय नहीं है कि या तो विश्व स्वास्थ्य संगठन के स्तर पर नियम बनाये जाएँ कि चिकित्सा शोध तभीं जन-प्रयोग में लाये जाएँ जब व्यापक नमूनों को जो विश्व के हर भाग, संस्कृति , आर्थिक वर्ग के आधार पर लिए गए हों और जिन पर दीर्घ काल तक प्रयोग करके के किसी वैश्विक मानक संगठन द्वारा सत्यापित किये गए हों.        

lokmat