Sunday, 27 November 2016

काला धन: विपक्ष का कुतर्क




अद्भुत है इस देश के एक वर्ग की तर्क शक्ति जो सकारात्मक को नकारात्मक बना कर जन विमर्श में डालने की जबरदस्त सलाहियत रखता है. पूर्व-वित्त मंत्री और कांग्रेस नेता चिदंबरम के सवाल-जवाब के प्रारूप में लिखे गए ताज़ा लेख में यह बताने की कोशिश की गयी है कि काला धन कोई बड़ी समस्या नहीं है और दुनिया के सभी देशों में यह कमोबेश है. इस बात को सिद्ध करने के लिए उन्होंने वर्ल्ड बैंक के एक अध्ययन को लिया है जिसके अनुसार अमेरिका में छाया अर्थ-व्यवस्था (काले धन की अर्थव्यवस्था) सकल घरेलू उत्पाद (जी डी पी ) का ८.६ प्रतिशत, चीन में १२.७ प्रतिशत जापान में ११ प्रतिशत और भारत में २२.२ प्रतिशत है. उनका कहना है कि ब्राज़ील , रूस और दक्षिण अफ्रीका में तो यह भारत से भी ज्यादा है. याने पूर्व वित्त मंत्री के हिसाब से यह कोई खास समस्या नहीं है जिसके लिए जनता को इतने कष्ट में डाला जाये.

तर्क-शास्त्र में एक दोष का वर्णन है --- अपने मतलब के तर्क वाक्य छांट लेना और बाकि छोड़ देना. चिदाम्बरम ने अपने लेख में इसका खूब इस्तेमाल किया. वह भूल गए कि उनके शासन काल में हीं देश के एक प्रख्यात अर्थ-शास्त्री प्रोफेशन अरुण कुमार ने यह आंकड़ा गलत बताया और कहा कि भारत में काली अर्थ-व्यवस्था जी डी पी ६० प्रतिशत याने १.४० ट्रिलियन डॉलर है. विश्व बैंक के आंकडे का आधार गलत है और दूसरे चार अन्य अध्यनों में भी इसे ४० प्रतिशत से ७० प्रतिशत बताया गया है. कांग्रेसी कुतर्क का यह आलम है कि यू पी ए -२ में २०१२ में इस मुद्दे पर जारी श्वेत पत्र में श्नेडर गणना (गत्यात्मक बहु-संकेतक बहु-कारक आंकलन पद्यति ) को आधार माना गया जिसके अनुसार श्री लंका में भारत से तीन गुना काली अर्थ-व्यवस्था है । इसके उलट यह देश मानव विकास सूचकांक में भारत से काफी आगे है. चिदंबरम अपने तर्क के आधार पर यह भी कह सकते हैं कि श्री लंका की तरह भारत में भी काली अर्थ-व्यवस्था को दूना किया जाना चाहिए क्योंकि इससे मानव विकास बेहतर होता है.  

चिदंबरम के अन्य खुद हीं पैदा किये गए सवाल और उनके खुद हीं दिए गए जवाव देखिये. प्रशन :क्या नोटबंदी से भ्रष्टाचार रुकेगा? जवाब: नहीं. भ्रष्टाचारी नए नोट में घूस लेंगे? क्या इससे नकली नोट छपना बंद होंगे? नहीं, अगर वो पुराने नोटों की नक़ल कर सकते हैं  तो नए की भी कर लेंगे. प्रश्न: क्या इससे काला धन बंद होगा ? जवाब : नहीं, क्योंकि ऐसा करने वाले जिन क्षेत्रों – जैसे निर्माण, चुनाव या सोना की खरीद में यह सब करते रहेंगे. ये जवाब जितने सहज हैं उतना हीं बचकाने भी. इन सब जवाबों से यह निकलता है कि” लिहाज़ा यह कोई समस्या नहीं है और काला धन की समान्तर अर्थ व्यवस्था  चलती  रहनी चाहिए. और शायद यही कारण रहा कि ७० साल में इसे पाल-पोस कर दैत्याकार बना दिया कांग्रेस सरकार ने. यू पी ए -२ के शासन काल में काला धन पर एक श्वेत पत्र जारी किया गया उसमें भी यही आंकड़े दिए गए. और यहाँ तक बताया गया कि एशिया के अन्य देशों में तो यह समस्या दूनी ज्यादा है. कांग्रेस के ४५ साल के शासन में कभी कोई सार्थक प्रयास नहीं हुआ.

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नोटबंदी के ऐलान के बाद पहले २४ घंटों में देश की प्रतिक्रिया बेहद सकारात्मक रही. “सेठ फंसा”, “घूसखोर अफसर अब क्या करेगा” या “नेतवा की रात की नींद उड़ी” का ७० साल पुराना घुन लगा भाव अचानक मुखर हुआ. लेकिन उसके बाद यह प्रतिक्रिया नकारात्मकता में बदली और बढ़ती चली गयी. कमज़ोर वर्ग इस फैसले से दिक्कत में रहा और अभी भी है. इस दिक्कत को बेहतर ऐलान-पूर्व रणनीति के तहत कम किया जा सकता है. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी इसे माना.

लेकिन इसी बीच अर्थशात्रियों का एक वर्ग इस प्रयास के औचित्य पर प्रश्न उठाने लगा. उस का कहना था कि नोटबंदी मुख्य समस्या का समाधान नहीं है क्योंकि धन के रूप में काली कमाई और उससे उपजी संपत्ति का बहुत कम हिस्सा हीं नकदी के रूप में रहता है. उनका मानना है कि हमला कहीं और करना होगा. इस हमले से एक तो कुछ चोर हीं पकडे जायेंगे और दूसरा इस प्रयास के अनुषांगिक क्षति के रूप में कमज़ोर तबके की दिक्कतें अचानक बढ़ जायेंगी. यह भी तर्क है कि इससे अगर कुछ चोर पकडे भी गए तो इससे आगे चोरी न हो इसकी कोई गारंटी नहीं है. यह आखिरी तर्क कुछ ऐसा है जैसे यह कहना कि चोर को जेल भेजने से यह सुनिश्चित नहीं होता कि अब कोई चोर पैदा नहीं होगा लिहाज़ा चोर पकड़ना छोड़ कर समाज में नैतिकता का प्रचार –प्रसार किया जाना चाहिए. दरअसल अव्वल तो यह राज्य का कार्य नहीं है. उसके लिए दूसरी सामाजिक –नैतिक संस्थाएं और गैर-राज्य प्रक्रियाएं होती हैं (जो भारत में विलुप्त-प्राय हैं) और दूसरे  अगर राज्य को कहीं से शुरू करना है तो आखिर किस मुकाम से शुरू करे, खासकर उस स्थिति में जब पूरा “आवां का आवां” हीं खराब हो. जिस देश में सिपाही से लेकर मंत्री तक और ठेकेदार से लेकर जज तक भ्रष्ट पाए जाते हों उसमें काला धन पर अंकुश लगाना किसी क्रांति से कम नहीं और वह भी न केवल राज्य-नीत क्रांति बल्कि सामाजिक –नैतिक –व्यक्तिगत –आध्यात्मिक क्रांति.    

एक बात जो इस प्रयास को नाकाफी बताने वाले अर्थशास्त्री भूल रहे हैं वह यह कि मोदी सरकार ने यह कदम उस समय उठाया है जब टेक्नोलॉजी ने समाज के हर व्यक्ति की एक –एक गतिविधि पर नज़र रखना बेहद सहज कर दिया है. आप माल जाते है उसका टीवी फुटेज है, आप के घर पर सेठ की कार दिवाली का गिफ्ट लेकर आती है उसका फुटेज मिल सकता है (सी बी आई के डायरेक्टर के घर कौन दलाल कब कब गया यह आज भी एक बड़ा मामला है), आप अब ज्यादा दिन बेनामी संपत्ति नहीं रख सकते क्योंकि जिसके नाम संपत्ति ली है उसे रजिस्ट्री आफिस में हीं फोटो खिंचवाना है. आपसे उसका रिश्ता पता लगाना मुश्किल नहीं होगा. उन सभी सोने बेचने वालों से सीसीटीवी फुटेज ली जा रहीं हैं जिन्होंने नोटबंदी की रात सोना बेंचा.  

सात दशक तक समाज कान में तेल डालकर सोता रहा “कोई नृप होहिं हमें का हानि” के भाव में और लोग अपनी जाति के कुख्यात छवि वाले लम्पट को भी प्रतिनिधि के रूप में प्रजातंत्र के मंदिरों –विधान सभाओं और संसद--को दूषित करने के लिए भेजता रहा. समाज की सोच की जड़ता यहाँ तक बढ़ी कि गाँव में बूढ़ी माँ बेटे की नौकरी लगने पर यह पूछने लगी कि “ऊपर की आमदनी कितनी है?”. भष्टाचार पूरे समाज में आत्मसात हो गया, जीवन पद्यति का भाग बन गया और महिमा-मंडित होने लगा. शादी के बाज़ार में एक सप्लाइ इंस्पेक्टर की कीमत इंटरमीडिएट के शिक्षक से ज्यादा होने लगी.

ऐसा नहीं था कि सरकारों को काला धन के बारे में आज पता चला है. अंग्रेज़ी शासन में भी इस व्याधि से मुक्ति के लिए अनेक समितियां बनी. सन १९३६ में अय्यर समिति ने सिफारिश की कि कर कानून में आमूलचूल बदलाव लाये जाएँ ताकि कम से कम कर –वंचना रोग की तरह न फैले. लेकिन इच्छा-शक्ति का नितांत अभाव रहा. आज जरूरत है कि भारतीय समाज इसे एक जन अभियान के रूप में ले और भ्रष्टाचार की ताबूत में आखिरी कील ठोके स्वयं को बदल कर और दूसरों पर बदलने का दबाव बना कर. केवल राज्य अभिकरण यह काम नहीं कर सकते.    

jagran

Thursday, 3 November 2016

औपचारिक संस्थाएं बनाम अतार्किक जन सोच


एक खबर के अनुसार उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब चुनाव के मद्दे नज़र चुनाव आयोग उन दलों पर शिकंजा कसेगा जो मतदातों से बड़े –बड़े और लुभावने वादे करते हैं. ऐसे दलों को एक शपथ पत्र देने होगा कि वे इन वादों को पूरा करेंगे और अपने घोषणा-पत्रों में भी उन वादों को पूरा करने के लिए अपेक्षित वित्त की व्यवस्था के बारे में विस्तार से देना होगा. अब मान लीजिये किसी दल ने कहा “सब  छात्रों को मुफ्त लैपटॉप” और दावा किया कि इसके लिए वित्त जुटाने के लिए भ्रष्टाचार दूर करके कर वसूली बढाया जाएगा. क्या चुनाव आयोग यह कह सकता है कि उसे भ्रष्टाचार ख़त्म करने के पार्टी के दावे पर विश्वास नहीं और क्या वह इस आधार पर पार्टी का चुनाव चिन्ह रद्द कर सकता है. उधर   सर्वोच्च न्यायालय की सात सदस्यीय संविधान पीठ के समक्ष एक बार २५ साल जन प्रतिनिधि कानून की धारा १२३ (३) के तहत आने वाला पुराना विवाद उस खडा हुआ है. अदालत ने सरकार सहित सभी पक्षों से पूछा है कि “क्या धर्म, जाति या जन-जाति के नाम पर यह कहते हुए कि अगर वोट मिलेगा तो उस समुदाय की रक्षा और विकास किया जाएगा, वोट माँगा गया तो इसे "भ्रष्ट आचरण  की संज्ञा दी जा सकती है"?, मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली इस संविधान पीठ ने इसी तरह के अन्य कई सवालों का जवाब जानना चाहा है। शायद हम नैतिकता और वैज्ञानिक सोच के प्रति जन-उदासीनता से जन्मे सवालों का समाधान औपचारिक संस्थाओं व प्रक्रियाओं के माध्यम से खोज रहे हैं.  

दरअसल अदालत की मजबूरी यह है कि सामाजिक या विश्वास के मुद्दे जब उसके पास आते हैं तो उन्हें तर्क और कानून की कसौटी पर कसा जाता हैं. अगर वह मुद्दा एक व्यापक समाज में विश्वास का मक़ाम हासिल कर चुका है तो चाहे वह कितना भी गलत क्यों न हो औपचारिक संस्थाओं या व्यवस्थाओं या क़ानूनों द्वारा उस विश्वास को ख़त्म नहीं किया जा सकता. याने कोई भी अदालत यह नहीं कह सकती कि यह मुद्दा कानून से परे है और इसे सुलझाना निरपेक्ष और विश्वसनीय समाज सुधारकों का काम है. वास्तव में आज भारत में इस तरह के समाजसुधारकों की नस्ल लगभग विलुप्त हो गयी है. अब कबीर, दादू या रहीम पैदा नहीं होते. अदालत के प्रश्न काफी गहरे हैं. दलित और आदिवासियों पर आज भी अत्याचार हो रहे हैं जब कि कानून दर कानून बनते गए और हर संशोधन में प्रावधानों को और सख्त किया जाता रहा. संविधान ने तो ७० साल पहले हीं छूआछूत ख़त्म कर दिया था.  

अदालत की चिंता को और अधिक विस्तार दिया जाये तो कई नए प्रश्न खड़े होते हैं. कुछ अन्य उदाहरण लें. अगर मायावती दलितों से वोट मांगे और वह कानून-सम्मत है तो फिर लालू यादव या मुलायम सिंह का यादवों की रक्षा और विकास के लिए वोट मांगना गलत क्यों? भारत में व्यक्ति की जाति या समुदाय के बारे में उसके नाम से और कई बार परिधान से पता चल जाता है. जब कोई ओवैसी ऊँचे पायचे का पाजामा और दुपल्ली टोपी लगाये या खास सलीके से कटी दाढी के साथ बिहार के किसनगंज में जहाँ एक सम्प्रदाय विशेष की आबादी ७० प्रतिशत है जा कर उनके हिफाजत का वायदा करते हुए वोट माँगता है तो क्या इसे समझने के लिए कि यह “धर्म के नाम पर वोट मांगना है” किसी आइन्स्टीन के दिमाग की ज़रुरत है? जन प्रतिनिधि कानून की धारा १२३ (३) के तहत कोई भी प्रत्याशी या उसका एजेंट या उसकी सहमति पाया व्यक्ति अपने धर्म, नस्ल, जाति, समुदाय या भाषा अथवा धार्मिक चिन्हों का इस्तेमाल करके उस प्रत्याशी के चुने जाने के अवसर को आगे बढ़ाता है या किसी अन्य प्रत्याशी के अवसर को प्रभावित करता है तो वह भ्रष्ट आचरण माना जाएगा.

भारत कुछ अलग किस्म का देश है जिसमें अनगिनत पहचान समूह है. सिर्फ़ इतना हीं रहता तो कोई बात नहीं थी. ७० साल में “फर्स्ट-पास्ट –द- पोस्ट “ सिस्टम की दोषपूर्ण चुनाव पद्यति के कारण राजनीतिक वर्ग ने इसे और धार दी है और कई बार नए पहचान समूह पैदा किये है जैसे “महादलित”. खास बात यह है कि राजनीतिक वर्ग इन पहचान समूहों को एक दूसरे से लड़ाता रहता है. अब समाजशास्त्र के नियमों को ध्यान दें तो अगर कोई मायावती (स्वर्गीय कांसी राम को न भूलें) होगा तो कोई लालू या मुलायम भी होगा, कोई कम्मा नेता होगा तो कोई कापू भी और कोई वोक्कालिगा होगा तो कोई लिंगायत भी. ऐसे में यह कैसे कह सकते हैं कि ओवैसियों के खिलाफ कोई वेदांती नहीं खड़ा होगा? कोई राम मंदिर नहीं राष्ट्रव्यापी मुद्दा बनेगा और राजनीतिक संवाद इसके इर्द-गिर्द नहीं घूमेगा. एक ऊँचे पायचे का पजामा पहन कर वोट मांगे तो ठीक लेकिन दूसरा तिलक लगा कर या गेरुआ पहन कर प्रत्याशी के पक्ष में खड़ा हो और धर्म विशेष के नाम पर वोट मांगे तो गलत !

एक और प्रश्न लें जो शायद सर्वोच्च अदालत के संज्ञान में होगा. एक व्यक्ति जिसकी स्वीकार्यता उस धर्म, जाति या अन्य पहचान समूह के अनुयाइयों के बीच है चुनाव मंच पर आता है लेकिन वह अपने प्रत्याशी के लिए विकास के नाम पर वोट माँगता है. लक्षित वोटर उसके कट्टर अनुयायी हैं लिहाज़ा वे प्रभावित हो कर वोट करते हैं. क्या इसे कानून सम्मत माना जा सकता है. उदाहरण के तौर पर कोई जैन मुनि या कोई लामा अपने अनुयाइयों को यह कहता है कि उसी पहचान समूह के अमुक व्यक्ति को वोट तो वह तुम्हारा विकास करेगा, तो क्या यह उचित ठहराया जा सकता है. ध्यान रहे कि मतदाता ने वोट इस आधार पर नहीं दिया कि उन्हें विकास को लेकर प्रत्याशी में विश्वास है बल्कि वोट देने की वजह मुनि या लामा के प्रति धार्मिक विश्वास है.

lokmat

इस कानून के उपरोक्त प्रावधान का मूल उद्देश्य यह था कि चुनाव के दौरान मतदाता के स्व –विवेक पर कोई भी अतार्किक भावनात्मक मुद्दे भारी न पड़ें. परन्तु अगर मतदाता जाति, धर्म , भाषा या नस्ल में हीं अपना भविष्य सुनिश्चित पाता है तो कानून उसे कैसे रोक सकता है? कानून तो बलात्कारियों और हत्यारों को भी फांसी की सजा देता है. फिर अगर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मौलिक अधिकार है और अगर अच्छे प्रजातंत्र के लिए डिबेट और जन-संवाद अपरिहार्य है तो रास्ता एक हीं बचताहै और वह है – मतदाताओं की सोच अर्थात् उन वास्तविक मुद्दों के प्राथमिकता जो वोटरोँ के अपने सम्यक विकास को सुनिश्चित करते हों.      

Thursday, 20 October 2016

तीन तलाक और उलेमाओं के एक वर्ग का पूर्वाग्रह




शायद हमने गलत समझ की वजह से पिछले ७० सालों में प्रजातंत्र को मजाक बना दिया है. या यूं कहें कि प्रजातंत्र मानसिक ऐय्यासी का अखाडा बन गया है जिसमें अभिजात्य वर्ग बौद्धिक जुगाली करते हुए देश की शांति, विकास और जीवन के गुणवत्ता को बाधित कर रहा है. समान नागरिक संहिता का विरोध,  भारत –विरोधी और पाकिस्तान-समर्थक नारे देश की छाती दिल्ली के जे एन यू में लगाने वालों में भी “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देखना”, एक साथ केंद्र और राज्य के चुनाव कराने की अवधारणा की कुछ क्षेत्रीय दलों द्वारा मुखालफत, आतंकवाद के खिलाफ प्रभावी कदम उठाने के लिए केंद्र को अधिक शक्ति देने के खिलाफ राज्यों का खड़ा होना, केंद्र के तमाम जन कल्याण के कार्यक्रमों के प्रति राज्य सरकारों का इस लिए उदासीन होना कि इसका श्रेय केंद्र की सरकार को मिलेगा कुछ उदाहरण है. गौर करें, भारत जिस किस्म का आतंकवाद पिछले ३० सालों से झेल रहा है उसका आयाम न केवल देश-व्यापी है बल्कि मूल रूप से वैश्विक है. आतंकवादी बाहरी मुल्कों से आते हैं, देश में भी पाकिस्तानी कुप्रयासों से उनकी पौध लगाई जाती है. हाल के दौर में पाकिस्तानी एजेंसियों ने बांग्लादेश और नेपाल को नर्सरी के रूप में विकसित किया है. लेकिन जैसे हीं केंद्र सरकार ने कुछ साल पहले कानून में बदलाव करके आतंकवाद –निरोधक राष्ट्रीय इकाई को राज्यों में स्थापित कर उन्हें राज्यों की पुलिस के समान अधिकार देने चाहे कई राज्य तन कर खड़े हो गए इस तर्क के साथ कि यह अर्ध-संघीय ढांचे के खिलाफ है और इससे उनकी स्वायत्तता बाधित होती है. अमरीका हमसे बड़ा संघीय संविधान है और जहाँ राज्यों को बेहद अधिक अधिकार हैं लेकिन जब ९/११ को वर्ल्ड ट्रेड टावर पर हमला हुआ उसके एक साल में वहां केंद्र ने निर्बाध शक्तियां होमलैंड सिक्यूरिटी एक्ट के तहत अपने पास ले लीं. किसी राज्य ने चूं भी नहीं किया.

हमारे देश में ताज़ा चर्चा है समान नागरिक संहिता को लेकर. याने क्या देश में “तीन तलाक” , “निकाह हलाला” और बहु-विवाह प्रथा बनी रहनी चाहिए या संविधान के अनुच्छेद १४, १९ और २१ के अनुरूप हर नागरिक को चाहे वह किसी भी धर्म का हो या किसी भी लिंग का, समान अधिकार होने चाहिए? और यह बात देश की सर्वोच्च अदालत ने पूछी है किसी राजनीतिक पार्टी ने नहीं या किसी धार्मिक-सामाजिक संगठन ने नहीं. देश की लॉ कमीशन ने १६ सवाल बना कर जनता से उनकी राय जाननी चाही है. अचानक आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड तन कर खडी हो जाती है तमाम उन बातों की दुहाई देते हुए जिनकी वजह से संविधान निर्माताओं को मजबूरी में कुछ प्रावधान करने पड़े (जैसे अनुच्छेद २५ में धर्म का प्रोपोगेशन”। लेकिन फिर इस दबाव को निष्क्रीय करने के लिए नीति निर्देशक तत्वों में फिर से एक बार समान नागरिक संहिता बनाना राज्य का कर्तव्य बताया. संविधान सभा की अल्प-संख्यक समिति के इसी दबाव की नतीजा था कि शिक्षा के लिए , संस्कृति के लिए और धर्म-आधारित व्यक्ति के सामूहिक अधिकार और धर्म-आधारित समूह के अधिकार का प्रावधान अनुच्छेद २६ से ३० तक में देखने को मिलता है. पाकिस्तान बनने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी, हर दूसरे दिन अल्प-संख्यक समिति अपने को अलग करने की धमकी देती थी. सत्ताधारी  दल उनका मान-मनौव्वल करता रहता था.

अब वर्तमान स्थिति पर. धर्म का मूल भाग और उस धर्म के अनुयाइयों द्वारा प्रयोग में लाये जाने वाली परम्परों में अंतर होता है. परम्पराएं धर्म का मूल भाग नहें होती. लिहाज़ा अनुच्छेद २५ में मिलने वाला मौलिक अधिकार परम्पराओं पर लागू नहीं होता. सर्वोच्च अदालत में दो माह पहले इसी मामले में दायर एक प्रति-हलफनामे में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने स्पष्ट रूप से कहा कि “तीन तलाक और बहु-विवाह अवांछित हैं”. अगर यह इस्लाम धर्म का मूल भाग होता तो अवांछित न होता. सर्वोच्च न्यायलय ने पहले भी कई फैसलों में यह स्पष्ट किया है.

फिर अगर पाकिस्तान और बांग्लादेश सहित दुनिया के २२ देश जिसमें अधिकांस इस्लामिक राज्य हैं, इस शोषक और पुरुष-प्रधान कुप्रथा को छोड़ चुके हैं तो भारत में क्यों बनाये रखने पर मुसलमान उलेमाओं का एक वर्ग जोर दे रहा है? मधु किश्वर बनाम बिहार राज्य में इसी अदालत ने कहा था कि अगर कोई प्रथा या  कस्टम मौलिक अधिकारों को बाधित करता है तो गैर-कानूनी है. सबसे पहले मिस्र ने इस तीन तलाक की प्रथा से निजात पाई और वह भी आज से ८७ साल पहले सन १९२९ में कानून संख्या २५ बना कर. दरअसल इस्लाम के चार स्कूलों में से एक –हन्बली --के विद्वान् इब्न तैमियह ने १३ वीं सदी में पहली बार तीन तलाक़ के व्याख्या करते हुए कहा था कि एक बैठक में तीन बार तलाक कहना मुकम्मल नहीं माना जाएगा और इसे एक बार कहा हुआ तलाक समझा जाएगा. मिस्र ने यह बदलाव इसी के मद्दे नज़र किया था. लेकिन इसके बाद पूरी दुनिया के इस्लामिक देशों में इसे माना जाने लगा और तदनुरूप कानून बनाए गए. सूडान ने इसे १९३५ में लागू किया. कालान्तर में धुर इस्लामिक राष्ट्र जैसे इराक, जोर्डन , इंडोनेशिया , संयुक्त अमीरात और क़तर भी तैमियाह की व्याख्या के अनुरूप कानून लाये। 

                    टर्की और पाकिस्तान
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उधर एक अन्य धारा का प्रतिनिधित्व करते हुए मुस्तफा कमाल के शासन में टर्की में सन १९२६ में स्विस नागरिक संहिता को अंगीकार किया गया. यह संहिता पूरे यूरोप की सबसे प्रगतिशील संहिता मानी जाते थी. लेकिन किसी मुसलमान ने नहीं कहा कि यह इस्लाम के खिलाफ है. पाकिस्तान में १९५५ में तत्कालीन प्रधानमंत्री मुहम्मद अली बोगरा ने पहली पत्नी को तलाक दिए बगैर अपनी सेक्रेटरी से शादी कर ली। पूरे पाकिस्तान में गुस्से का सैलाब आ गया. महिला संगठनों ने प्रदर्शन शुरू किये. मजबूरन एक कमीशन बनाया गया जिसने १९५६ में व्यवस्था दी कि एक बैठक में तीन बार कहा गया तलाक एक बार माना जाएगा. और तब से सुधार शुरू हुआ.

आखिर क्या वजह है कि भारत के उलेमाओं का एक वर्ग इस्लाम को इतना कमज़ोर मानता है कि स्त्रियों को समान अधिकार देने की व्यवस्था में उसे खतरा नज़र आ रहा है ? दरअसल कमज़ोर भारतीय इस्लाम नहीं है बल्कि देश के उलेमा हैं जिन्हें अपनी संस्था के अस्तित्व पर खतरा नज़र आने लगा है.
पूरी दुनिया की न्याय व्यवस्था में माना जाता है कि जीने का अधिकार तब तक सम्पूर्ण नहीं हो सकता जब तक जीने का विश्वास और गरिमा के साथ जीना शामिल न हो. प्रश्न  यह भी नहीं है कि कितनी मुसलमान औरतें इस प्रथा की शिकार हैं. अगर एक भी है तो वह प्रथा सभी समाज पर दाग है.

आधुनिक धर्म-निरपेक्षता के सिद्धांत के जनक होल्याके ने नैतिकता की परिभाषा देते हुआ कहा “नैतिकता व्यक्ति के उन्नयन पर आधारित होती है और उसका किसी भगवान् या भविष्य की दुनिया के  वादे से कोई मतलब नहीं होता. लिहाज़ा इसे कभी भी भगवान और धर्म से परे रखना चाहिए. भारत एक धर्म-निरपेक्ष देश है जिसमें व्यक्ति स्वातंत्र्य सर्वोपरि है. इसे बनाये रखने में मुस्लिम उलेमाओं के सभी वर्ग मदद करे तो शायद यह इस्लाम की भी बड़ी सेवा होगी.

jagran

Thursday, 14 July 2016

संवैधानिक प्रावधानों का सम्मान ज़रूरी

“मन की बात” मात्र आकाशवाणी से माह में एक बार कुछ पलों के लिये भले हीं हो यह माना जाता है कि मन निर्मल होता है और वह काल- और स्थिति –सापेक्ष नहीं होता बल्कि व्यक्ति का शाश्वत आभूषण होता है. देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी “मन की बात “ करते हैं. एक निर्मल सन्देश का भाव होता है और देश भी उसे यथावत ग्रहण हीं नहीं करता अपितु अमल में लाता है. लेकिन जब देश के हीं दो राज्यों में छल करके सत्ता में आने का कुचक्र किया जाता है और उसे सुप्रीम कोर्ट “असंवैधानिक” करार देता है तो शंका होती है कि “निर्मल मन” से यह कैसी “गंगा” ?

सुप्रीम कोर्ट ने मात्र दो महीने के भीतर दो फैसले दिए और दोनों में केंद्र और राज्यपाल की भूमिका पर प्रश्न चिन्ह लगा और दोनों राज्यों में कांग्रेस की सरकारें पुनर्प्रतिष्ठापित की गयीं. ताज़ा फैसला जो कि अरुणाचल प्रदेश के बारे में है एक तरह से राज्यपाल को “दोषी” ठहराने की तरह है. विश्वास नहीं होता कि राज्यपाल की संस्था “दिल्ली दरबार” को खुश करने के लिए इस हद तक गिर सकती है. संविधान निर्माताओं ने इस संस्था को बेहद सम्मानित स्थिति देने चाहा था और इसी वजह से देश की दो संस्थाओं --- राष्ट्रपति और राज्यपाल – के शपथ का प्रारूप अनुच्छेद में रखा जबकि बाकि सभी संस्थाओं का ---- प्रधानमंत्री से लेकर विधायक तक और सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश से लेकर हाई कोर्ट के जज तक --शपथ-प्रारूप अनुसूची में रखा. और साथ हीं जहाँ राष्ट्रपति व राज्यपाल संविधान के परिरक्षण, संरक्षण और अभिरक्षण की शपथ लेते हैं वहीं बाकि लोग यहाँ तक कि भारत के प्रधान न्यायाधीश को भी संविधान में निष्ठा की शपथ लेनी होती है.

लेकिन यहाँ सवाल सिर्फ राज्यपाल की भूमिका का नहीं है. संविधान के अनुच्छेद ३५६ में स्पष्टरूप से लिखा गया है कि “राज्यपाल की रिपोर्ट पाने या अन्यथा (याने किसी भी अन्य रिपोर्ट या सूचना के आधार पर) अगर राष्ट्रपति इस बात से संतुष्ट है कि राज्य संवैधानिक प्रावधानों .......  “ . अर्थात केंद्र सरकार (१) राज्यपाल की बात मानने को बाध्य नहीं है  और  (२) वह अन्य साधनों से भी तथ्यों व स्थिति का पता लगा सकती है. इसलिए राज्यपाल के फैसले पर अगर राष्ट्रपति शासन लगाया गया है तो इस कृत्य का आरोप मात्र राज्यपाल पर नहीं बल्कि केंद्र पर लगता है. दूसरा १९९४ में सुप्रीम कोर्ट के नौ–सदस्यीय संविधान पीठ का फैसला आज भारत में राज –काज (ऐसे मामलों) में बोम्मई जजमेंट के नाम से ध्रुव तारे की तरह दिशा बताता है. उस फ़ैसलै में स्पष्टरूप से राज्यपाल को क्या करना चाहिए और क्या नहीं, केंद्र को किस बात का संज्ञान लेना चाहिए और कितना यह सब दिया गया है. लिहाज़ा केंद्र जब भी चाहे राज्यपाल (अगर वह केंद्र के इशारे पर काम नहीं कर रहा है) के फैसले को नज़रंदाज़ कर सकता है.

मान लीजिये कि केंद्र में शासन कर रही भारतीय जनता पार्टी का यह तर्क मान भी लिया जाये कि अगर कोई पार्टी अपनी आतंरिक कलह के कारण टूट भी रही है तो क्यों न उसका फायदा उठाते हुए सरकार बनायी जाये, तो क्या यह देखना जरूरी नहीं कि दल-बदल विरोधी कानून, २००३ के प्रावधानों को ठेंगा न दिखाया जाये. इस कानून के अनुसार दल-बदल तभी वैध होगा जब किसी दल के दो-तिहाई विधायक पार्टी छोड़ें और किसी दूसरे दल में शामिल हों. इन दोनों राज्यों में टूटने वाले कांग्रेस विधायको की संख्या क़ानूनी सीमा से काफी कम थी. लिहाज़ा इसे किसी भी किस्म का समर्थन देना अनैतिक हीं नहीं गैर-कानूनी भी था. लेकिन भारतीय जनता पार्टी के कुछ उत्साही नेताओं ने न केवल इन्हें भड़काया बल्कि इन्हें अपने होटलों में ठहराया और बाद में अपनी पार्टी में शामिल किया.

शायद पार्टी के शीर्ष नेताओं में संवैधानिक मर्यादाओं के प्रति अपेक्षित निष्ठा नहीं है जिसका नतीजा यह होता है कि आरोप की आंच सीधा प्रधानमंत्री मोदी तक पहुँच जाती है. कोई भी “सक्षम” प्रधानमंत्री यह नहीं चाहेगा कि देश को नयी उंचाइयों तक ले जाने के वायदे के लिए जनता में सरकार और उसके मुखिया के प्रति एक अपेक्षित विश्वास कहीं कम हो. राज्यों में चुनी हुई कांग्रेस सरकारों को असंवैधानिकरूप से हटाने के मामले में  तो मोदी को इस तर्क का भी लाभ नहीं मिल सकता कि “भारत माता की जय बोलने” या गौ मांस खाने वालों को पाकिस्तान ्भेजने के संघीय दुराग्रह से प्रधानमंत्री मजबूर हैं. फिर इस तरह के फैसले लेने का प्रयोजन भी क्या था – दो छोटे-छोटे राज्यों में छल करके सरकार बनाना? उत्तराखंड में तो वैसे भी कुछ माह में चुनाव होने वाले हैं. शायद प्रधानमंत्री को छोटी सोच वाले पार्टी व सरकार के रणनीतिकारों से बचना होगा.    

फिर सुप्रीम कोर्ट के दोनों फैसलों से देश भर में जो सन्देश गया वह यह कि राज्य की गैर-भाजपा सरकारों के प्रति केंद्र का अनैतिक हीं नहीं दमनकारी और वैमंस्य्तापूर्ण रवैया है. ऐसे में “सहकारी संघवाद” (को-ऑपरेटिव फेड़ेरालिस्म) के मोदी डॉक्ट्रिन का क्या होगा? विकास के लिए राज्यों का सहयोग अपरिहार्य है. क्या मोदी के तमाम जनोपयोगी कार्यक्रमों पर उसी शिद्दत से राज्य सरकारें अमल करेंगी? क्या मोदी को यह नहीं मालूम कि केंद्र अधिकांश कार्यक्रम उदासीनता की चौखट पर दम तोड़ देंगे अगर राज्यों का साथ न मिला? पर यह ओछी हरकत क्यों?              

अगले हफ्ते प्रधानमंत्री ने अंतर-राज्यीय परिषद् की बैठक बुलाई है. शायद मकसद है फिर से एक बार केंद्र –राज्य संबंधों में दुराव कम करना और विकास को आगे बढ़ने के लिए उनकी मदद मांगना जिसमें जी एस टी बिल के लिए राज्य सभा में समरथन हासिल करना भी शामिल है.  

भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति के आर नारायणन ने सन २०० में गणतंत्र दिवस की स्वर्णजयंती समारोह के अवसर पर देश की संसद से राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा था “आज हमें विचार करना होगा कि संविधान ने हमें असफल किया है या हमने संविधान को”. आगे उन्होने देश के प्रथम राष्ट्रपति डर राजेंद्र प्रसाद के कथन को उधृत किया --- अगर लोग जो चुने जा रहे हैं चरित्रवान और ईमानदार व्यक्तित्व वाले सक्षम (लोग) हैं तो वे एक खराब संविधान से भी बहुत कुछ हासिल कर सकते हैं लेकिन अगर उनमें ये कमियां हैं तो एक बेहतरीन संविधान भी देश की मदद नहीं कर सकता”.

lokmat

Wednesday, 6 July 2016

मोदी और उनकी सरकार का दुराग्रहपूर्ण विश्लेषण



ताज़ा मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर एक अंग्रेज़ी अखबार लिखता है “ स्मृति ईरानी को हटा कर प्रकाश जावडेकर को उनकी जगह पर बैठा कर संघ (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) ने अपनी बाँहों की ताकत एक बार फिर दिखाई”. मुझे याद आता है कि जब स्मृति ने मानव संसधान मंत्री के रूप में शपथ लिया था  तो इसी अख़बार ने घोषित किया कि चूंकि स्मृति संघ के नजदीक हैं इसीलिये मोदी को उनको इस पद पर लेना पड़ा. पिछले दो साल से भारत के ये “लाल बुझक्कड़” विश्लेषक (जिसमें कई बार मैं भी शामिल होता हूँ) जनता को बताते रहे कि किस तरह स्मृति ईरानी के ज़रिए संघ अपना एजेंडा लागू करवाने के लिए विभाग के तमाम पदों पर संघ के लोगों को बैठा रहा है. याने स्मृति मंत्री बनी तो भी संघ के कारण और हटीं भी तो संघ के बाजू की ताकत और इस बीच यह आरोप भी कि मंत्री संघ के इशारे पर शिक्षा के जरिए हिन्दुत्त्व ला रहीं है.

यहाँ हम उन विश्लेषकों की बात नहीं कर रहे हैं जिनका भारतीय जनता पार्टी, हिन्दुत्त्व, संघ और तत्संबंधी सभी अन्य विचारों, अवधारणाओं और संस्थाओं के खिलाफ लिखना या बोलना एक शाश्वत भाव है बल्कि उनकी, जो निरपेक्ष भाव से विश्लेषण करने का दावा करते हैं. क्या हम दुराग्रही नहीं होते जब इस विस्तार के सकारात्मक मूल भाव को छोड़ कर इसमें भी संघ, पॉलिटिक्स और आक्रामक हिन्दुत्त्व देखने लगते हैं? उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश , उत्तराखंड और पंजाब में चुनाव हैं लेकिन राजस्थान, मध्य प्रदेश में फिलहाल नहीं. इस विस्तार में राजस्थान से चार मंत्री और मध्य प्रदेश से तीन मंत्री लिए गए हैं जब कि उत्तर प्रदेश से भी तीन , उत्तराँचल से एक और पंजाब से एक भी नहीं. लेकिन हम “लाल बुझक्कड़ विश्लेषक” टी वी चैनेलों के डिस्कशन में और लेखों में यह कह रहे हैं कि यह विस्तार आगामी चुनाव के मद्देनज़र, धर्म और जाति को साधने के लिए किया गया है. हम तर्कशास्त्रीय दोष के शिकार हैं या बीमार मानसिकता के यह समझ में नहीं आता जब इसमें भी राजनीति देखते हैं कि मोदी ने यू पी में ब्राह्मण वोट को साधने के लिए महेंद्र पाण्डेय को, दलित में पासी वोट के लिए कृष्णराज को और पटेल (कुर्मी) वोट के लिए अनुप्रिया पटेल को मंत्रिपरिषद में जगह दी. अगर यह तर्क है तो पंजाब को क्यों छोड़ दिया. इस पर हम विश्लेषक उसी हठधर्मिता से कहते हैं “हालांकि अहलुवालिया पश्चिम बंगाल से राज्य सभा में हैं लेकिन हैं तो सिख हीं न”. शायद उन्हें नहीं मालूम कि अहलुवालिया हमेशा बिहार में रहे हैं और पंजाब में उन्हें शायद हीं कोई जनता हो? २०१४ के चुनाव में जब पार्टी को उत्तर प्रदेश में ४२ प्रतिशत मत मिले और ७२ सीटें तब भाजपा सरकार में भी नहीं थी फिर कैसे २०१२ के १५ प्रतिशत के मुकाबले ४२ प्रतिशत वोट मिले?

इस विस्तार का सीधा सन्देश है कि “मोदी सरकार विवाद नहीं विकास चाहती है लिहाज़ा परफॉरमेंस हीं एक मात्र आधार रहेगा. प्रकाश जावडेकर सर झुका कर बगैर किसी विवाद में पड़े बेहद रफ़्तार से पर्यावरण को लेकर देश में हीं नहीं विदेश में काम करते रहे. मनोज सिन्हा जो स्वयं इंजीनियर रहे है चुपचाप रेलवे में अपना योगदान देते रहे। मोदी में  क्षमता पहचानने की सलाहियत है। स्मृति आक्रामक व्यक्तित्व की वजह से विवाद में रहीं. प्रधानमंत्री विवाद नहीं चाहते लिहाज़ा उनकी जगह प्रकाश जावडेकर को लाया गया. एक विख्यात सर्जन, एक पर्यावरणविद , एक सर्वोच्च न्यायलय का वकील , कई पूर्व अफसर और सभी पढ़े-लिखे सांसद इस विस्तार में जगह पाए. इसकी वजह यह थी कि विकास अब काफी टेक्निकल हो गया है और नेता चाहे कितना भी लोकप्रिय हो आज का विकास समझने की सलाहियत के लिए आधुनिक शिक्षा और समझ की ज़रुरत होती है.

यही वजह है कि तीन दिन पहले एक प्रमुख हिंदी अखबार के सम्पादक ने जब मोदी जी से इंटरव्यू में पूछा कि इन ढाई सालों के शासन के दौरान में कोई मलाल , तो उनका जवाब था कि मीडिया के एक वर्ग को जो २०१४ में हमारे हारने का दावा करता रहा, उसे हम ढाई साल में विकास को लेकर अपनी सदाशयता के बारे में “कन्विंस” नहीं कर पाए.

शायद मोदी सही थे और हम दुराग्रही. यह अलग बात है इसी में विश्लेषकों का एक वह वर्ग भी है जो निरपेक्ष विश्लेषण और वह भी केवल तथ्यों की आधार पर करता है और उसके विश्लेषण को सरकार को गंभीरता से लेना होगा.  
      
दुराग्रहपूर्ण विश्लेषण का एक और पहलू है। मीडिया में एक वर्ग “सेक्युलर विश्लेषकों” का है.  “भारत माता की जय” कहने पर इसरार करने वालों के खिलाफ इस “सेक्युलर बुद्धिजीवियों “ ने हजारों लेख लिख मारे. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर एस एस) के लानत –मलानत की. लेकिन इनमें से किसी एक ने भी यह नहीं लिखा कि संघ के शिक्षा प्रकल्प द्वारा संचालित असम के एक स्कूल के एक मुसलमान छात्र सरफ़राज़ ने पूरी असम बोर्ड की परीक्षा में टॉप किया है. आज संघ के स्कूलों में ३०,००० से ज्यादा मुसलमान छात्र पढ़ रहे हैं. क्या कभी किसी बुद्धिजीवी ने सुना कि इन संघ-संचालित आधुनिक शिक्षा पद्धति में मुसलमानों से साइंस छोड़ कर हिन्दू धर्म अंगीकार करने का दबाव डाला गया? सरफराज के अगर पूरे असम में टॉप किया है तो वह गीता के श्लोकों और वैदिक ऋचाओं को पढ़ कर नहीं? लेकिन इन सेक्युलर बुद्धिजीवियों को सांप सूंघ गया इस खबर के बाद. किसी ने एक शब्द भी नहीं लिखा संघ के प्रयासों को लेकर. कम से सरकार की नहीं तो सामाजिक संगठनों के प्रति तो हम नैतिक ईमानदारी दिखा हीं सकते हैं.

“कोई धर्म आतंकवादी नहीं होता और आतंकवादियों का कोई धर्मं नहीं होता” यह कायरतापूर्ण जुमला अक्सर इस वर्ग के द्वारा हर आतंकी घटना के बाद फेंका जाता है. लेकिन वे यह नहीं बताते कि आतंकवादी का तो धर्म होता है. और वे  उसी धर्म में अपने  “अस्तित्व का कारण” ढूढते है और उसी के तले वे फलते-फूलते हैं. लिहाज़ा यह कहना की आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता सत्य को न पहचानने की कायरता है , “बाँझ” सोच है. कबूल करें कि आज इस्लामिक आतंकवाद दुनिया के लिए एक बड़ा ख़तरा है. इसे कम करने के दो हीं उपाय हैं. पहला कि इस धर्म के सच्चे अनुयायी इस आतंकवाद के प्रति “जीरो टोलेरेन्स” रखें. मस्जिदें और मदरसे इनके पनाहगार न बनें, ना  हीं इन्हें किसी किस्म का प्रश्रय पूरे समाज से मिले. लेकिन मुश्किल है कि ओसामा बिन लादेन को भी मुस्लिम समाज ने महिमामंडित होने पर ऐतराज नहीं जताया ना हीं ऐसे कदम उठाये जिससे आतंकवादी तत्वों में अपने समाज से एक सख्त सन्देश जाये कि अगर शरीया कानून  के तहत बलात्कारी संगसार किया जा सकता है तो आतंकवादी भी. उसे कहीं न कहीं यह सन्देश मिलता रहा कि यह हथियार इस्लाम को दबाने वालों के खिलाफ उठाया जा रहा है लिहाज़ा यह अल्लाह का काम है.  

अगर एक समुदाय के गुमराह युवा धर्म से अपने औचित्य का सर्टिफिकेट ले कर दुनिया की शांति के लिए भारत के सुख-चैन में बाधक बन रहे हों तो इसे रोकना हर नागरिक का चाहे वह किसी भी धर्म का हो पहला कर्तव्य है. दूसरा : अगर लड़ाई धर्म के नाम पर है और गरीबी या भौतिक-अभाव को लेकर नहीं, तो राज्य से ज्यादा भूमिका उस धर्म के अनुयाइयों की बनती है और बुद्धिजीवियों की भी. केवल मोदी –विरोध के शाश्वत भाव से शायद हम कुछ दिन में असली बौद्धिक जगत में अपनी स्वीकार्यता हीं नहीं उपादेयता भी खो देंगे. लिहाज़ा विश्लेषण हो लेकिन दुराग्रही भाव से नहीं.        

lokmat

Tuesday, 28 June 2016

मोदी साक्षात्कार के निहितार्थ


कोई बड़ा नेता यू हीं इंटरव्यू नहीं दे देता, खासकर देश का प्रधानमंत्री और वह भी नरेन्द्र मोदी जैसा. इसके पीछे कोई उद्देश्य होता है जो काल, स्थिति और मैसेज को ध्यान में रख कर किया जाता है. फिर इसी के अनुरूप  माध्यम और संस्था और भाषा का चुनाव होता है.

देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी राष्ट्र को संबोधित भी कर सकते थे. प्रेस कांफ्रेंस भी कर सकते थे या किसी ज्यादा प्रसार वाले अखबार या ज्यादा टी आर पी वाले हिंदी चैनल को भी यह इंटरव्यू भी दे सकते थे. पर उन्होंने एक अंग्रेज़ी का टी वी चैनल हीं क्यों चुना और फिर खुद हिंदी में हीं क्यों बोला, यह जानना जरूरी है.

राष्ट्र को संबोधित करना एकल संवाद होता है जैसे “मन की बात”. इसमें यह आभास नहीं मिलता कि जनता के सवालों का जबाव मिल रहा है. प्रेस कांफ्रेंस बेलगाम होता है और कई बार मूल आयाचित सन्देश प्रश्नों के अम्बार में खो जाता है. भारतीय जनमानस में औपनिवेशिक मानसिकता की वजह से आज भी अंग्रेज़ी को बौद्धिकता का पर्याय माना जाता है और साथ हीं कुछ हद तक बौद्धिक ईमानदारी का भी. लेकिन साथ हीं अंग्रेज़ी सवालों का हिंदी में जवाब ८० करोड़ से ज्यादा हिंदी बोलने और समझने वालों को अपने नेता की बात बोधगम्य बनाती है. दो साल से ज्यादा के शासन काल में निरपेक्ष विश्लेषकों के मन में हीं नहीं, जनता का मन में भी कुछ शंकाएं जन्म लेती हैं और उन शंकाओं का समाधान मात्र इसी तरीके से किया जा सकता था.

इस ८८ मिनट के इंटरव्यू में चार प्रमुख अन्तर्निहित सन्देश जो  प्रश्नों के उत्तर के रूप मे  थे प्रधानमंती देना चाहते थे. एक यह कि अगर देश का विकास सर्वोपरि है तो हर तीसरे दिन कोई सत्ता –पक्ष का नेता या मंत्री या भगवाधारी  भावनात्मक मुद्दे उठा क्यों उठा रहा है? क्यों कोई मंत्री “भारत माता की जय “ न कहने वालों को पाकिस्तान जाने की सलाह दे देता है और क्यों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के किसी अनुषांगिक संगठन का पदाधिकारी “मुसलमान –मुक्त भारत” की बांग दे देता है? शंका यह होती है कि मोदी ऐसे कद्दावर नेता के शीर्ष पर रहते हुए यह विरोधाभास क्यों. क्या इन गैर-विकास मुद्दों से माहौल खराब करने वालों को कोई मौन सहमति तो नहीं है?

प्रधानमंत्री ने बेहद खूबसूरती से इस इंटरव्यू के सवालों के जरिये यह साफ़ किया कि वह इस “ब्रांड की राजनीति” से अपने को अलग हीं नहीं रखते बल्कि एक चेतावनी भी थी कि एक सीमा के आगे इसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. साक्षात्कार में सवाल आया ---पार्टी के लोग इस तरह के मुद्दे उठाते हैं” और मोदी का जवाब था-- पार्टी हीं नहीं किसी के द्वारा भी अगर इस तरह की बात होती है तो वह गलत है और यह वे लोग करते हैं जो मीडिया में अपने प्रचार को आतुर रहते हैं. इसका सन्दर्भ ध्यान देने लायक है. तीन दिन पहले, हाल हीं में भारतीय जनता पार्टी द्वारा राज्य सभा भेज गए सुब्रह्मनियम स्वामी का रिज़र्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन पर अनर्गल आरोप लगाना और इस प्रक्रिया में मोदी सरकार के दूसरे कद्दावर नेता और वित्त मंत्री अरुण जेटली परोक्ष रूप से हमला करना. सन्देश यह जा रहा था कि यह हमला इतना सामान्य नहीं जितना दिखाई देता है और यह भी कि स्वामी पर संघ का वरदहस्त है. जेटली चीन यात्रा बीच में हीं रोक कर भारत वापस लौटना अनायास हीं नहीं है.

प्रधानमंत्री का सन्देश साफ़ था कि भविष्य में ऐसी स्थितियां पैदा करने वालों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. शायद इससे सन्देश का विस्तार करते हुए मोदी ने यह भी कहा कि टीवी चैनलों के डिबेट में वह देखते हैं कोई प्रवक्ता कुछ कह रहा है. वह इनमें से कइयों को पहचानते भी नहीं हैं लेकिन मीडिया इन्हें ऐसे प्रोजेक्ट करता है जिससे वह अपने कद से बड़े हो जाते हैं. आशय यह था कि ये प्रवक्ता क्या कहते हैं पार्टी या सरकार की नीतियों के बारे में इससे सरकार के काम-काज की विश्लेषण नहीं किया जाना चाहिए. मोदी का यह सन्देश इसलिए भी सामयिक था क्योंकि पिछले कुछ दिनों से यह सोच उभरी है कि ये प्रवक्ता अहंकारी और असहिष्णु होते जा रहे हैं.

विदेश यात्राओं को लेकर मोदी ने यह बताना चाहा कि वह इसलिए व्यक्तिगत रूप से विश्व के तमाम नेताओं से मिल रहे हैं क्योंकि जमीनी पृष्ठभूमि से होने की वजह से उनके बारे में अन्य देशों में उनके बारे में अपरिपक्व जानकारी है जिससे कई बार देश का नुकसान हो सकता है. शायद उनका आशय गुजरात दंगों के बाद कुछ देशों द्वारा बनाई गयी उनकी छवि के सन्दर्भ में था. उनका यह याद दिलाना कि अमरीकी अख़बारों में उनकी हाल की यात्रा के दौरान यह बताया  कि बराक ओबामा की भारत के साथ मैत्री का वर्तमान मकाम अमरीकी राष्ट्रपति की कूटनीतिक सफलता का ध्योतक है मोदी के सन्देश का
सार था.

मंहगाई को यह कह कर कि दो सालों में जिस तरह का सूखा रहा और जिस तरह किसानों ने घबरा कर दलहन की जगह गन्ना बोने शुरू किया जिससे दाल  की कीमतों में वृद्धि हुई, कोशिश की कि जनता को आश्वस्त किया जाये कि स्थिति नियंत्रण में लाई जा सकेगी. हालांकि दलहन की पैदावार लगातार पिछले कई वर्षों से कम हुई है जबकि न्यूनतम समर्थन मूल्य यो पी ए सरकार ने भी बेतहाशा बढाया.

एक राजनीतिक सन्देश भी था जिसमें यह प्रयास था कि विपक्ष और कांग्रेस को अलग किया जाये. एक प्रशन के उत्तर में उन्होंने संसद में गतिरोध का आरोप विपक्ष पर लगाना गलत है और बगैर नाम लिए उन्होंने कांग्रेस को इसका दोषी बताया. गरीब राज्यों के लोगों के कल्याण से जी एस टी बिल को जोड़ते हुए उन्होंने यह कोशिश की कि जनता कांग्रेस के रवैये के प्रति नाराज हो और गैर -कांग्रेस विपक्षी दल  बिल के साथ हों.

महंगाई को छोड़ कर बाकि संदेश अपेक्षाकृत तार्किक और ग्राह्य कहे जा सकते हैं पर आगे जनता यह भी देखेगी कि क्या कोई मंत्री गिरिराज या कोई महंत या कोई सुब्रह्मनियम स्वामी फिर तो नहीं पुराना राग अलापने लगा. अगर ऐसा होता है जनता की शंका बनी रहेगी.  

nai duniya/ lokmat

Sunday, 26 June 2016

एन एस जी की हकीकत बनाम मोदी के प्रयास


हम भारतीय आदतन उत्सव-धर्मी हैं. देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी यह बात जानते हैं. लिहाज़ा वह हर काम जो मोदी की जानिब से होता है वह उत्सव का स्वरुप ले लेता है. “स्वच्छ भारत अभियान” , “अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस” , “विदेश यात्रा”, “राष्ट्रवाद” “ओबामा का भारत आना” और ताज़ा “एन एस जी की सदस्यता” आदि कुछ उदाहरण हैं. ऐसा नहीं कि विकास के काम कुछ कम हुए हैं. नयी “फसल बीमा योजना”, “मृदा परीक्षण”, “यूरिया पर नीम की परत” “गरीबों का बैंक खाता” ये कुछ सार्थक प्रयास हैं लेकिन शायद भारतीय जनता पार्टी के स्वभाव में हीं “भावनात्मक अतिरेक से अपने औचित्य को सही ठहराना” है नतीजतन जिन योजनाओं को जन –अभियान बनाना चाहिए वह हाशिये पर रहे. और यह आभास दिया जाने लगा कि मोदी जी की हर विदेश यात्रा सिकंदर की तरह “विश्व विजय अभियान” है.

यहाँ अगर हम ओबामा से “दोस्ती” , “अमरीका की भारत के पक्ष में पैरोकारी” , मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रेजीम (एम् टी सी आर) की सदस्यता को मोदी डोक्ट्रिन की सफलता माने तो चीन सहित एक नहीं दस-दस देशों द्वारा भारत का एन एस जी की सदस्यता के खिलाफ खड़ा होना क्या विफलता नहीं कही जायेगी ? इनमें वे भी देश थे जिन्होंने ने हाल में “मोदी विश्व फहत” अभियान में एन एस जी की सदस्यता पर समर्थन का स्वयं मोदी को आश्वासन दिया था.    

हर राजनीतिक दल का राजनीति करने का अपना तरीका होता है. शायद कांग्रेस की अपनी रणनीति में  अपने सफल प्रयासों को उत्सव में बदलने की कला नहीं रही. इसके दो उदाहरण लें. सन २००८ में अमेरिका का १२३ समझौता और एन एस जी का भारत के लिए “वेवर” जिसके तहत वह तमाम सदस्य देशों से यूरेनियम खरीद सकता हो, अपने आप में ऐतिहासिक उपलब्धि थी. वही चीन था और वही भारत था जिसने परमाणु प्रसार संधि पर हस्ताक्षर नहीं किया था लेकिन हम सफल रहे. लेकिन तत्कालीन कांग्रेस के नेतृत्व वाली यू पी ए -१ की सरकार को संसद में लगभग हार की कगार पर खड़ा होने की स्थिति आ गयी थी. दूसरा उदाहरण है १९६६-६७ का. देश हीं नहीं दुनिया के इतिहास में शायद पहली बार प्रमुख अनाज -गेहूँ -- का उत्पादन एक साल के भीतर डेढ़ हुना गुआ था याने १२ मिलियन टन से १७ मिलियन टन. लेकिन किसी को पता भी नहीं चला कि हरित क्रांति ने किसानों का कितना बड़ा हित किया. उस साल याने १९६७ में कांग्रेस १० राज्यों में चुनाव हार गयी. आज भारत की कुल अनाज पैदावार २६५ मिलियन टन है और इन ५० सालों के दौरान कांग्रेस ४० साल शासन में रही. लेकिन आभास यह रहा कि पार्टी ने देश के विकास के लिए कुछ भी नहीं किया. और देश रसातल में पहुँच गया. आज सन्देश यह जा रहा है कि सिर्फ भारतीय जनता पार्टी और नरेन्द्र मोदी हीं देश को बचा सकते हैं.

अब जरा गौर करें एन एस जी की सदस्यता के मुद्दे पर. अमेरिका में मोदी और ओबामा के संयुक्त वक्तव्य में कहा गया कि भारत उस देश से छः परमाणु रिएक्टर खरीदेगा. कंपनी का नाम है –वेस्टिंगहाउस और टेक्नोलॉजी डिज़ाइन का नाम ए पी-१०००. यह टेक्नोलॉजी अभी पूरी तरह मान्यता नहीं हासिल कर पाई है. अमेरिका की हीं कई राज्यों के अभिकरणों ने --- फ्लोरिडा पॉवर एंड लाइट तथा टेनेसी घाटी प्राधिकरण -- इसके साथ हुए सौदे रद्द कर दिए हैं या रियेक्टरों की संख्या घटा दी है. इन अभिकरणों को जिस दर पर ये रियेक्टर सप्लाई किये गए हैं अगर उसी  दर पर भारत को भी किया जाएगा तो इसकी स्थापना कीमत ७० करोड़ प्रति मेगा वाट होगी जो भारत में अब तक उपलब्ध दर से सात गुनी ज्यादा  होगी. लिहाज़ा इस दर पर प्रारंभिक स्तर पर बिजली २५ रुपये प्रति यूनिट पड़ेगी. क्या देश इस स्थिति में है कि इतनी लगत पर रियेक्टर लगाये और इतनी महंगी बिजली ले? क्या इसके लिए वैश्विक टेंडर अपेक्षित नहीं था और क्या खरीदने के प्रस्ताव के पहले हर पहलू की जांच कर ली गयी थी?
जब प्रधानमंत्री हाल की अमरीका यात्रा (अभियान?) पर थे तो अचानक देश के अख़बारों और टी वी चैनलों पर खबर आयी एक “बड़े फतह” की. भारत “मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रेजीम” (एम् टी सी आर) का सदस्य बन गया. देश का शायद हीं कोई पढ़ा-लिखा व्यक्ति और देश के अधिकांश पत्रकार इसके बारे में पहले से जानते थे लेकिन जैसे हीं विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने भारत से मोदी की विदेश यात्रा को कवर करने गए रिपोर्टरों को इसे  “ऐतिहासिक सफलता” के रूप में बताया तो लगा जैसे मोदी डोक्ट्रिन का भूचाल आ गया. देश में इस “सफलता” का उत्सव शुरू हो गया. इसमें कोई दो राय नहीं कि इसकी सदस्यता मिलने से हमें वैश्विक मिसाइल टेक्नोलॉजी तक पहुँच मिली और यह एक कूटनीतिक उपलब्धि है लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि २.३ ट्रिलियन डॉलर की भारतीय अर्थ-व्यवस्था पर हर देश पलक पावडे बिछाए बैठा है क्योंकि हम बड़े आयातक है. अमेरिका से दोस्ती इसलिए भी है कि हम लगभग चार लाख करोड़ रुपये के रियेक्टर खरीद रहे हैं. रक्षा उपकरणों की खरीद अलग.

शायद हर कदम को राष्ट्रव्यापी उत्सव में बदलने की मोदी के रणनीतिकारों की आदत ने एन एस जी को लेकर होमवर्क नहीं किया था. दरअसल अगर किया होता तो जान जाते कि सदस्यता के लिए जितनी राजनीतिक पूंजी खर्च की गयी है वह बेमानी थी और रंचमात्र भी लाभ नहीं था. इन रणनीतिकारों को एन एस जी की गाइडलाइन्स में सन २०११ में पैरा ६ और ७ में किये गए संशोधन को पढ़ लेना चाहिए था. ये पैरा किसी भी सदस्य देश को किसी भी ऐसे सदस्य देश को जो परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर न किया हो, संवर्धित यूरेनियम और री-प्रोसेसिंग सम्बंधित टेक्नोलॉजी नहीं देंगे. लिहाज़ा अगर भारत सदस्य बन भी जाता है तो उसे यह लाभ नहीं मिलेगा और अगर इसमें संशोधन करना भी हो तो चीन नहीं होने देगा. लिहाज़ा यह पूरा प्रयास “बाँझ सफलता” के अलावा कुछ नहीं था.

दक्षिणपंथी बुद्धिजीवियों का एक वर्ग है जो आब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन से पुष्पित –पल्लवित होता है. मोदी सरकार के किसी प्रयास पर यह बौद्धिक पालिश चढाता है. इस दौरान यह बताया जाने लगा कि नेहरु ने अगर अमेरिकी राष्ट्रपति कैनेडी की परमाणु रियेक्टर देने की पेशकश स्वीकार कर ली होती तो न तो चीन १९६२ में हमला करने की जुर्रत करता न पाकिस्तान १९६५ में, ना हीं आज एन एस जी की सदस्यता के हम मोहताज़ होते. वे शायद भूल रहे हैं कि तब कश्मीर भी हाथ से लिकल गया होता क्योंकि सुरक्षा परिषद् में सोवियत संघ हमारे पक्ष में खड़ा न होता. वे यह भी भूल रहे है कि विश्व शांति में नेहरु का क्या योगदान रहा. उन्हें तात्कालिक परिस्थिति का भान होता तो जानते कि पर्यावरण  उस समय मुद्दा नहीं था और बिजली पैदा करने के लिए हमारे पास कोयले का विशाल भंडार था जिससे कम लागत और कम पूंजी निवेश में हम बिजली की दिक्कत दूर कर सकते थे. उस समय हमारी हैसियत अनाज के लिए कटोरा लेकर घूमने वाली थी, परमाणु रियेक्टर लगाने की नहीं ?      

lokmat