Monday, 23 May 2016

मीडिया को नहीं तो कम से कम न्यायपालिका को तो बख्श दो सरकार !!



फ़्रांस के समाजशास्त्री अलेक्सिस टाक्विल (१८३५) और ब्रिटेन के राजनीतिक दार्शनिक जॉन स्टीवर्ट मिल (१८६०) ने २५ साल के अंतराल में प्रजातंत्र के दो नये खतरों के प्रति आगाह किया था. पहले का मानना था कि “बहुमत के आतंक” के शिकार व्यक्ति के पास कोई बचने का चारा नहीं होता. दूसरे ने इस भय की ओर इंगित किया था कि “प्रजातंत्र मात्र एक शासन पद्धति न होकर असंगठित भीड़ की पसंद और नापसंद को देशवासियों पर बलात थोपने की प्रक्रिया है”.    

जब मोदी सरकार का एक वरिष्ठ मंत्री ६० दिन में दो बार (एक बार प्रेस नोट जारी करके) जन-मंचों से अपने प्रधानमंत्री को “भारत के लिए ईश्वर का उपहार” बताता है और उसे फटकार नहीं पड़ती या पद से इस सामंती चाटुकारिता के लिए हटाया नहीं जाता तो डर लगता है कहीं पूरे देशवासियों को शासन अपनी दंड –शक्ति से इस नए “दैवीय उपहार” की वंदना करने को मजबूर तो नहीं करेगा. तार्किक समाज में तो “संविधान” को देश की सामूहिक सोच का उपहार माना जाता है। उसी समाज से वोट लेकर मंत्री मंत्री बनता है और प्रधानमंत्री प्रधानमंत्री और उसी संविधान की शपथ के बाद मंत्रिमंडल शासन करता है. अगर इसके अतिरिक्त कोई “उपहार” है तो वह व्यक्तिगत सोच हो सकती है जो जन-धरातल पर व्यक्त नहीं की जानी चाहिए बल्कि कमरे के अन्दर “अर्चना” की जानी चाहिए. इसी भाव में जब एक अन्य मंत्री “भारत माता” की जय न बोलने वालों को “पापी” बताता है और ऐसे लोगों को कानून बना कर मजबूर करने की धमकी देता है तो भी डर लगता है. यह डर तब और बढ़ जाता है जब एक अन्य सबसे प्रभावी मंत्री न्यायपालिका पर जनता के बीच जा कर सतत हमला करता है.

क्या हो गया है भारतीय जनता पार्टी के विवेक को? “पापी” या “दैवीय उपहार” यह सभ्य और तार्किक समाज के शब्द नहीं हैं. और भारत के संविधान में तो हर नागरिक से “वैज्ञानिक सोच” विकसित करने की अपेक्षा (अनुच्छेद ५१ ज) में की गयी है तथा उद्देशिका में भी “उपासना की स्वतन्त्रता” दी है.

देश का प्रजातंत्र एक खतरनाक मोड़ पर है. भारतीय समाज अनगनित पहचान समूहों में बंटा है और सत्ता में जगह पाने की जबरदस्त लड़ाई चल रही है. राजनीति –शास्त्र के सिद्धांत के अनुसार प्रजातंत्र में जन-धरातल पर तो यह लड़ाई अनवरत रूप से चलती रहती है लेकिन सत्ता में आया दल निर्विकार भाव से कुछ पूर्व-स्थापित मूल्यों, संविधान और तज्ज़नित विधियों के अनुरूप शासन करता है. यहाँ एक लक्ष्मण रेखा होती है. जब पहचान समूह या समूहों के बल पर सत्ता में आया दल या दलों का गठबंधन दूसरे पहचान समूह या समूहों को एक सीमा से ज्यादा नज़रअंदाज या प्रताड़ित करने की कोशिश करता है तो मीडिया या न्यायपालिका तन कर खडी हो जाती है. यह प्रजातंत्र की खूबसूरती है कि जब कोई एक संस्था पाक्षिक, अनैतिक या अकर्मक होने लगती हो तो दूसरी संस्था उसे सही रास्ते पर लाने के लिए अपनी भूमिका में थोडा विस्तार करती है याने मीडिया का कवरेज बढ़ जाता है , भाषा तल्ख़ हो जाती है और न्यायपालिका का रुख सख्त.  

मोदी सरकार का एक मंत्री मीडिया को “प्रेस्टीच्यूट” (प्रेस और प्रोस्टीच्यूट --पैसे के लिए शरीर बेचने वाली/वाला-- का शाब्दिक वर्ण -संकर) कहता है. एक अन्य मंत्री “जो भारत माता की जय नहीं बोलेगा वह पापी है का “श्राप” देता है",  दूसरे दिन उन्हें पाकिस्तान भेजने का ऐलान करता है और तीसरे दिन उनको इस पाप से बचाने के लिए कानून बना कर मजबूर करने की धमकी देता है. जाहिर है यह धमकी केवल अल्पसंख्यकों के लिए नहीं बल्कि उन सभी देशवासियों के लिए है जो सताधारी दल के इस भाव से सहमति नहीं रखते. क्यों “भारत माता की जय” ? क्यों भारत पिता की जय नहीं ? क्यों मादर-ए-वतन जिंदाबाद नहीं? क्यों भारत के प्रति अमूर्त सम्मान नहीं जो “अद्वैतवाद” का मूल है ? क्यों जय भी बोलें तो एक खास भाव में? याने सत्ताधारी दल शब्द भी अपने चुनेगा, उसका मूर्त रूप कैसा हो यह भी तय करेगा और निष्ठां व्यक्त करने का तरीका भी वही बताएगा ! और अगर यह सब नहीं किया गया तो कानून भी बना देगा क्योंकि वह संसद में बहुमत में है. और जब कभी न्यायपालिका इस कुप्रयास को संविधान के मूल दांचे के विपरीत बताएगा तो न्यायपालिका पर अपनी सीमा लांघने का आरोप लगेगा !    

जब बहुसंख्यक पहचान समूह और सत्ता में काबिज लोग यकसां हो जाते हैं, जब उनके मंत्री घूम –घूम कर अल्प-संख्यक पहचान समूह को पाकिस्तान भेजने का ऐलान करते हैं और जब सत्ता में बैठा सबसे प्रखर मंत्री देश की बची-खुची और सबसे सम्मानित संस्था को पानी पी –पी कर जन मंचों से कोसने लगता है तो लगता है प्रजातन्त्र का टिकना मुश्किल होगा. इस खतरे के अंदेशे को तब और बल मिलता है जब ऐसे मंत्री पर कोई लगाम नहीं लगाया जाता. साफ़ दीखता है कि बहुसंख्यक का यह भाव राज्य की परोक्ष नीति बन गयी है.

जब यू पी ए के काल में २-जी स्पेक्ट्रम घोटाले को लेकर देश की हर संस्था ने सरकार के रवैये को गलत बताना शुरू किया, जब सी ए जी की रिपोर्ट के प्रकाश में मीडिया भ्रष्टाचार पर जबरदस्त कवरेज करते हुए सामूहिक चेतना में गुणात्मक परिवर्तन का सबब बना, जब सुप्रीम कोर्ट ने सत्ता में बैठे लोगों पर भरोसा न करते हुए भ्रष्टाचार के बड़े मामले में जाँच अपनी देखरेख में कराना शुरू किया और जब इस अदालत ने देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी को “पिंजड़े में बंद तोता” कहा तो भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के इन मंत्रियों को मीडिया, न्यायपालिका गलत नहीं लगी थी और उसी को आगे बढ़ाते हुए जनमत के आधार पर आना बुरा नहीं लगा था. नैतिकता तो तब होती जब घोषणा पत्र में मोदी को देशवाशियों के लिए “दैवीय उपहार” बताते और भारत माता की जय न कहने वालों को पापी प्रमुख बिन्दु होता? 

क्यों न्यायपालिका मजबूर होती है इस संस्थाओं को दिशा-निर्देश देने के लिए. देश के माहौल में जब सांप्रदायिक आवेश पैदा करना मंत्री का शगल हो जाएगा तो अखलाक मारा जाता है. मंत्री पूछता है “क्या सरकार ने मारा , क्या भाजपा ने मारा ?”. नहीं लेकिन मंत्री जब माहौल बनाता है तो एक वर्ग में उन्माद बढ़ता है और वह वर्ग मंत्री या पार्टी को खुश करने के लिए अखलाक के यहाँ कौन सा गोश्त पका है ढूढने निकल पड़ता है.

१९ वीं सदी के पूर्वार्ध में अमरीका में जैकसोनियन प्रजातंत्र की पूरे यूरोप में धूम थी. फ़्रांस के राजनीतिक चिन्तक अलेक्सिस टाकविल्ल उत्सुकतावश इसका अध्ययन करने उस सदी के तीसरे दशक में अमरीका पहुंचे. लौट कर सन १८३५ में उन्होंने “अमरीका में प्रजातंत्र” शीर्षक एक पुस्तक लिखी जिसमें उन्होंने “बहुमत के आतंकवाद” से आगाह किया. उनका कहना था “प्रजातंत्र  की कमियों को लेकर अब तक की यूरोपीय अवधारणा से हट कर जो सबसे बड़ा ख़तरा है वह बहुमत के आतंक का है. अगर कोई व्यक्ति इस आतंक से प्रताणित होता है तो वह किसके पास जाये ? जनमत के पास जो कि उसी बहुमत वाले के पास है ; विधायिका के पास जिसमें उसी बहुमत के लोग चुने गए है ; कार्यपालिका के पास जो उसी बहुमत की सरकार द्वारा नियुक्त की गयी है ; न्यायपालिका के पास जो इसी बहुमत के लोगों द्वारा चुने जाती हैं?” . भारत के संविधान में एक गनीमत है कि यूरोप या अमरीका से से हट कर न्यायपालिका स्वतंत्र है और यही एक सहारा है. लेकिन उसे भी लक्ष्मण रेखा दिखाई जा रही है.

lokmat/ hindustan


Sunday, 15 May 2016

“जंगल राज” में भी कुछ मर्यादाएं होती हैं पर बिहार के "नव - प्रजातंत्र " में वे भी नहीं




१५ अगस्त, १९४७ की बात है. देश आजादी का जश्न मना रहा था. हल्की बारिश हो रही थी. वाराणसी के पास एक स्टेशन था –कोढ़ रोड जिसे आज ज्ञानपुर कहते हैं. उस स्टेशन के सहायक स्टेशन मास्टर फुन्नन सिंह भी अति उत्साह में ऑफिस में बैठे थे. ट्रेन आने का टाइम हो गया था. लेकिन एक भी आदमी टिकट लेने नहीं आया. फुन्नन सिंह अचम्भे में कार्यालय के बाहर निकले तो देखा सैकड़ों लोग प्लेटफार्म पर खड़े हैं. उन्होंने चिल्लाकर सबसे कहा “अरे भाई टिकट ले लो , ट्रेन आने वाली है”. भीड़ का जवाब था “अरे अब किस बात का टिकट. अब ये अंग्रेजों की ट्रेन थोड़े ना है, आज से ये हमारी ट्रेन है”.   

बिहार में आज अपराधियों का भी यही भाव है मानो कह रहे हों --- कैसा कानून, अब ये हमारा शासन है. सीवान में एक हिंदी अखबार के पत्रकार की गोली मार कर सरे शाम फल-मंडी में हत्या करना "जंगल राज “ को शर्मशार करता है. जानवरों के भी कुछ कानून होते हैं. प्रजातंत्र के दार्शनिकों को कोई नया शब्द गढ़ना होगा “नए बिहार” के “सुशासन” को लेकर. लेकिन शब्द गढ़ने से क्या होगा? “जंगल राज” कहा गया था तो क्या जनता ने समझ लिया था इसका मतलब? नहीं, उसने कानून-रूपी नयी गाड़ी को अपना माना और फिर शुरू हो गया तांडव. उसने “जाति देखी”. उसने अपना “रोबिनहुड” पैदा किया और फिर उसे सत्ता की शक्ति का अदृश्य कवच पहना दिया. वर्षों से जेल में रहे एक खतरनाक अपराधी को एक राजनीतिक दल ने बाकायदा अपनी पार्टी का पदाधिकारी बनाया. कानून को “फ्री की ट्रेन” समझने वालों ने लोगों को मारना शुरू किया.

कैसे शुरू होता है यह सिलसिला, इसे समझने की ज़रुरत है. सिस्टम पर विश्वास नहीं लिहाजा जनता अपने पहचान समूह में फिर से वापस चली जाती है और उसमें तलाशती है एक रोबिनहुड  -- याने वह डकैत जो उसके विचार में अमीरों को तो लूटता है पर गरीबों की शादी में उस लूट का कुछ अंश दान के रूप में दे देता है. कार्ल मार्क्स ने भी तो यही कहा था --- राज्य का उद्भव शोषण-जनित वर्ग संघर्ष को ख़त्म करने के अभिकरण के रूप में होता है लेकिन कालांतर में राज्य के अभिकरण स्वयं शोषक हो जाए हैं. तो किसी ठाकुर जाति के लोगों को किसी अपनी जाति  के गुंडे में या किसी मुसलमान समाज के लोगों को एक मुसलमान गुंडे में अपना रहनुमा देखने में क्या दिक्कत है? कुछ दिन में हीं इस रािबनहुड को मतदान के ज़रिये  राज्य की शक्तियों से भी नवाज़ दिया जायेगा। राकी और शहाबुद्दीन को भी यह मालूम है कि जनता के बीच भी अपने को रािबनहुड के रूप मे स्थापित करने के लिये किसी बेगुनाह निहत्थे आदित्य या राजदेव रंजन को तो मारना ही पड़ेगा। चूँकि फिर कोई चश्मदीद गवाह आदित्य या रंजन नहीं बनना चाहेगा लिहाज़ा गवाह बदल जायेंगे और मीडिया ख़ामोश। अदालत को गवाह और सबूत चाहिये जो सरकार और पुलिस जुटाती है। जब सत्ता मे भी राकी और शहाबुद्दीन की ज़रूरत होने लगे तो पुलिस क्या करेगी।
       
आदित्य सचदेव को मारने वाला रॉकी लाईसेंसी पिस्तौल रखता है और उसका का पिता एक क्षेत्रीय बाहुबली है. इसे समझने के लिए आइंस्टीन का दिमाग नहीं चाहिए कि बाहुबली क्यों और कैसे पैदा होते हैं और उनका बेटा कैसे उन्हीं नक़्शे कदम पर चलता रोबिनहुड की महिमामंडित संस्था पर बैठता है. किसी राजद या किसी जदयू को यह समझने में देर नहीं लगती कि बाहुबली का बल सत्ता का संरक्षण पा कर रामचरित मानस के उस बालि की तरह हो जाता है जिसके सामने अगर शत्रु खड़ा भी हो जाये तो उसकी आधी शक्ति बालि के पास पहुँच जाती है. लिहाज़ा ऐसे भावी “राबिनहुडों” को तैयार करने के लिए पहले चरण में किसी नितीश कुमार को या किसी लालू यादव को उसकी माँ में देश का रहनुमा नज़र आने लगता है. और उसे चुनाव की जलालत न झेलनी पड़े लिहाज़ा विधान परिषद् में ला कर इस “नव-प्रजातांत्रिक प्रक्रिया” के तहत महिमामंडित किया जाता है. लालू यादव का जेल में बंद खतरनाक अपराधी शहाबुद्दीन को पार्टी में पद से नवाजना भी उससी "नव-प्रजातंत्र” का हिस्सा है.

प्रश्न यह नहीं है कि इस “नव-प्रजातंत्र “ में रोबिनहुड पैदा किये जा रहे हैं. प्रश्न यह है कि औपचारिक प्रजातंत्र, जिसमें एक संविधान होता है और कानून के राज की अपरिहार्य शर्त होती है, के प्रसाद में बैठ कर कुछ नेता इसे ईंट-दर-ईंट तामीर कर रहे हैं और वह भी औपचारिक प्रजातंत्र की इमारत को गिरा कर और उसी की ईंटों द्वारा.

यही वजह है कि आदित्य सचदेवा की बीच सड़क पर की गोली मार कर के गयी हत्या के बाद भी प्रदेश का मुख्यमंत्री कहता है “इसमें रॉकी की माँ का क्या दोष है ?”. कितनी निश्छल है यह स्वीकारोक्ति. लेकिन अगले २४ घंटे में हीं शायद नितीश कुमार को पता चला कि “निर्दोष माँ” के घर में प्रतिबंधित शराब भी मिलती है. हालांकि अदालत में यह भी कहा जा सकता है कि किसी अदने नौकर ने यह शराब रखी है और वह नौकर उसे स्वीकार भी कर लेगा जैसे रॉकी का कहना है कि वह घटना के समय दिल्ली में था और सभी गवाहों ने अचानक “किसी को भी आदित्य को गोली मारते नहीं देखा” कहना शुरू किया है. फिल्म अभिनेता सलमान की ड्राइवर ने भी “बाद” में अपना जुर्म कबूल लिया था.

नितीश कुमार को राजनीतिक दार्शनिक जर्मी बेन्थैम की मशहूर उक्ति “कानून और नैतिकता की केंद्र बिंदु एक होता है परन्तु परिधि अलग-अलग” मालूम होनी चाहिए. मैकआइवर ने कहा था “कानून का अनुपालन सामाजिक व्यवस्था के प्रति लोगों की प्रतिक्रिया के रूप में होती है” और बिहार में इसके उलट अपराधियों के हौसले सत्ता की गुणवत्ता के प्रतिक्रिया के रूप में सडकों पर दिखाई दे रहे हैं. 

सीवान में पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या बिहार में प्रजातंत्र के घाव का बदबूदार मवाद है और अगर इसे छोड़ दिया गया तो यह मेटा-स्टासिस के स्टेज का कैंसर बन कर न केवल मीडिया को बल्कि पूरे बिहार को अपनी आगोश में ले लेगा. तब शायद सत्ताधारी भी न बच पायें.


lokmat

Friday, 6 May 2016

वो, हम और “डील” --- कुछ अनछुए पहलू


भारत में घोटाले की बाद पहले चरण में “चिट्टी-चिट्ठी और जांच-जांच” खेलते हैं और अगर मामले  की आंच राजनीतिकों तक जाये तो “दूध का दूध और पानी का पानी” के जुमले फेंकते  हैं क्योंकि सभी राजनेता जानते हैं कि “तोता खाली टांय –टांय करता है”

भ्रष्टाचार को लेकर हमारी संस्थाएं संवेदन-शून्य हो चुकी हैं.  तुलसीदास के मूढ़ की तरह हैं जिनपर “जगत-गति” व्याप्त हीं नहीं होती ये संस्थाएं और इनके “बलवान लोग” “पागुर” (जुगाली)  करते रहते हैं. जरा दो राष्ट्रों ---- इटली और भारत-- की संस्थाओं की भ्रष्टाचार को लेकर प्रतिक्रिया देखें समझ में आ जाएगा भारत की सरकारों व  उनकी संस्थाओं का "भैंस-भाव”. चार साल। दो सरकारें। और संसद में इस बात पर पाँच घंन्टे बहस कि पैरामीटर किसने बदले अर्थात दोनो एक दूसरे की क़मीज़ के धब्बे दिखाते रहे।

अगुस्ता हेलीकाप्टर कंपनी की होल्डिंग कंपनी फिनमेकनिका के एक पूर्व वरिष्ठ कर्मचारी लोरेंजो ने एक पत्र भेजा जिसमें भारत द्वारा की गयी १२ हेलीकॉप्टरों की खरीद में “घूस” देने की बात कही. पत्र पाने के एक हफ्ते के अन्दर देश की सैन्य पुलिस – अरमा दी करबेनिएरि – ने जाल बिछा दिया. कंपनी के सी ई ओ ओरसी के इर्द गिर्द. उसके मोबाइल को और ईमेल को सर्विलांस और इंटरसेप्टर पर डाल दिया गया. गुप्त कैमरे लगाये गए और वायर टेप का जाल बिछा दिया गया. एक टीम छाया की तरह ओरसी और कंपनी के एक अन्य अधिकारी के पीछे लग गयी. कई रातों गुप्त छापे  मार कर इसके कार्यालय और घर में मौजूद दस्तावेजों की नक़ल तैयार कर लीं गयी. शिकार पांच महीने में हीं जाल में फंस गया. फ़रवरी १२, २०१३ को अल सुबह उत्तरी मिलान राज्य से ६० किलो मीटर दूर ऐल्प्स की पहाड़ियों की तलहटी में बसे सस्तो कालंडे शहर के मकान से ओरसी को गिरफ्तार कर लिए गया. अगले एक साल में देश की निचली अदालत ने ओरसी और उसके दूसरे अधिकारी को दो साल की सजा सुना दी लेकिन ज्यादा दर पर हेलिकॉप्टर बेचने के आरोप में). अगले दो साल में हीं मिलान के अपील कोर्ट (हाई कोर्ट) ने सजा पलटते हुए स्पष्ट रूप से भ्रष्टाचार के मामले में याने दलालों को और भारतीय लोगों को घूस देने के आरोप में चार और साढ़े चार साल के सजा सुना दी. याने एक चिट्ठी से खबर मिलने और हाई कोर्ट से सजा होने में मात्र चार साल. जब ओरसी को गिरफ्तार किया गया तो उस देश के तीन बार प्रधानमंत्री रहे बर्लुस्कोनी ने नाराजगी जताते हुए एक इंटरव्यू में कहा “ दुनिया में व्यापार करने के लिए घूस देना एक अनिवार्य शर्त है और ओरसी की गिरफ्तारी से इटली की  सरकार “आर्थिक आत्महत्या “ कर रही है. भारत जैसे देशों में बगैर घूस के कुछ होता हीं नहीं है”. ध्यान देना होगा कि इटली में किसी को घूस नहीं मिला, १२ हेलीकॉप्टरों को तीन गुने दाम पर बेंच कर ओरसी और कंपनी ने देश का कोई अहित नहीं किया और कंपनी में सरकार के बड़े शेयर हैं. 

अब जरा तस्वीर का दूसरा पहलू देखिये. ठीक उसी वक्त जब इतालियन मिलिट्री पुलिस को पूर्व कर्मचारी लोरेंजो की चिट्ठी मिली, भारत में भी प्रतिरक्षा मंत्रालय, एन्फोर्समेंट डायरेक्टरेट और गृहमंत्रालय को भी एक चिट्ठी और कुछ “सीक्रेट” दस्तावेज़ भेजे गए. अमरीका के एक पूर्व हथियार दलाल और वकील एल्मोंड एलन द्वारा भेजे गए गुप्त दस्तावेजों में भारत की मिलिट्री के सात “सीक्रेट” दस्तावेज भी थे. एक दस्तावेज वायु सेना का अगले पांच साल में हथियार खरीद की योजना से सम्बंधित था दूसरा मानव-रहित विमान खरीदने की योजना के बारे में, तीसरा हेलीकाप्टर खरीदने के बारे मे, चौथा “रॉ” द्वारा उपयोग में लाये जाने वाले सुर्विलांस विमान की खरीद के बारे में और पांचवां नेवी के लिए अगली पीढी की सबमरीन खरीदने के बारे में. पत्र में कहा गया था अंतरराष्ट्रीय दलालों को भारत की रक्षा सम्बंधित सीक्रेट दस्तावेज  थोक के भाव उपलब्ध रहते हैं.

भारत के सरकारी संस्थाएं अब “चिट्टी चिठ्ठी” और “जाँच-जाँच” खेलने लगीं. जैसे गिद्ध को किसी घोंसले में मांस का टुकडा दिखाई देता है.  सी बी आई से कहा गया पता लगाये, एन्फोर्समेंट डायरेक्टरेट से भी हकीकत बताने का इसरार हुआ. एन्फोर्समेंट डायरेक्टरेट का कहना था सी बी आई ऍफ़ आई आर नहीं दे रही है जबकि सी बी आई रक्षा मंत्रालय द्वारा सभी तथ्य न देना देरी का कारण बताने लगी. अधिकारियों की एक टीम अमरीका पहुँच गयी शिकायतकर्ता एलन से पूछ-ताझ के नाम पर १५ दिन अमरीका में मौज करने। शायद “भारतीय सीक्रेट दस्तावेज का स्रोत” तलाश करने का यही सबसे बेहतरीन तरीक़ा भी है। हालांकि तथ्य यह ही कि भारत सरकार के आधिकारिक “एग्जामिनर” ने अपनी रिपोर्ट में यह घोषित कर दिया था कि दस्तावेज बेहद सीक्रेट हैं. 

बहरहाल सी बी आई ने उस साल येन केन प्रकारेण में मुकदमा दर्ज किया. लेकिन कोई निष्कर्ष नहीं निकला. इस बीच इनकम टैक्स के अधिकारियों से भी जानकारी चाही गयी लेकिन उस विभाग ने कहा “पहले तथ्य तो बताइये”. पहले से गिरफ्तार अभिषेक वर्मा तक जांच को ले जा कर मामला ठन्डे बस्ते में डालने के कोशिश सबने मिल कर की. याने अगुस्ता डील पर कोई रोक नहीं लगाई गयी नहीं किसी अधिकारी के खिलाफ सर्विलांस या छापा मारा गया कम से कम इस बात की चिंता करते हुए कि देश की सेना के गुप्त कागजात और योजनायें विदेशी दलालों तक कैसे पहुँची. टीम घर में जांच करने के बजाये अमेरिका में बैठे “व्हिसलब्लोअर” के घर पहुँचती है जब कि चोर घर में बैठे थे. सी बी आई शायद ऍफ़ आई आर भी न लिखती अगर उसे यह आभास न होता कि ऑगस्टा डील पर भी स्वयं इटली की सरकार ने ग्रहण लगा गया दिया है.

जब १२ फ़रवरी, २०१३ को फिनमेकनिका का सी ई ओ ओरसी इटली की मिलिट्री पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया जाता है तो भारत में खलबली मचती है क्योंकि असली भ्रष्टाचार का दावानल तो इधर हीं आता. तब भारत के रक्षा मंत्री कहते हैं “घोटाला हुआ है” मानो उन्होंने आइंस्टीन की तरह कोई “सापेक्षता का सिद्धांत प्रतिपादित किया हो”. सी बी आई मार्च में केस तो रजिस्टर करती है और उसमें पूर्व वायु सेना प्रमुख त्यागी की नाम भी रहता है पर त्यागी किन किन दलालों से मिले यह बात जब चार साल बाद मिलान अपील कोर्ट का फैसला आ जाता है और देश में आक्रोश की ज्वाला फूट पड़ती है तब सी बी आई पूछती  है. पहले दिन त्यागी इनकार करते हैं दूसरे दिन जब उनकी इटली में दलालों और अधिकारियों मुलाकात संबंधी रजिस्टर में दर्ज नाम दिखाए जाती हैं तो कबूल करते हैं. इस बीच मीडिया के सवालों पर वह उन्हें “इनह्यूमन” (पशुवत) भी कहना नहीं भूलते. बताया जाता है त्यागी कई बार इन दलालों से मिल चुके हैं और वह भी पद पर आने के एक महीने में और डील के दौरान. उनके रिश्तेदार इसी धंधे में बताये जाते हैं. क्या त्यागी पर हाथ डालने के लिए भी इतालियन कोर्ट के फैसले का इन्तेजार करना ज़रूरी था? क्या हमारे वायु सेना चीफ विदेश में किससे मिले इसकी जानकारी दूतावास का काम नहीं है? क्या देश में उन के भतीजे किस धंधे में लगे हैं यह इंटेलिजेंस को नहीं जाननी चाहिए?   

भारत में घोटाले की बाद पहले चरण में “चिट्टी-चिट्ठी और जांच-जांच” खेलते हैं और अगर मामले  की आंच राजनीतिकों तक जाये तो “दूध का दूध और पानी का पानी” के जुमले फेंकते  हैं क्योंकि सभी राजनेता जानते हैं कि “तोता खाली टांय –टांय करता है”. जब मामला किसी “नालायक” इटली सरकार द्वारा इससे आगे बढ़ाया जाता है और हमारे राजनेताओं के पास चुल्लू भर पानी नहीं होता तो हम उस देश की अदालत को अपने देश की अदालत से “लेटर रोगेटरी” भेजवा देते हैं. 

सी ए जी की रिपोर्ट अगस्त, २०१३ में याने इटली में ओरसी की गिरफ्तारी के सात महीने बाद संसद पटल पर रखी गयी जिसमें कहा गया “कॉन्ट्रैक्ट निगोशिएटिंग समिति” ने हेलीकाप्टर का जो निम्नतम (आधार कीमत) रखा है वह जो कीमत निर्माताओं द्वारा ऑफर की गयी है उससे गैर-वाजिब रूप से ज्यादा है. लेकिन भारत में सरकारों और उनकी संस्थाओं को इस तरह की रिपोर्टों से कोई खास फर्क नहीं पड़ता. “ऐसी रिपोर्टें तो ७० साल से आ रही हैं, लेकिन कभी देश में क़यामत हुई क्या” का शाश्वत भाव सत्ताधारी वर्ग में रहता है.

लिहाज़ा तीन महीने बाद बेहद ईमानदार छवि वाले रक्षा मंत्री अन्थोनी ने दिसम्बर, २०१३ को आकाशवाणी की तरह ईश्वरीय वचन कहे जो भ्रष्टाचार से युगों से दबे –कराहते लोगों को अच्छा लगा--- “हेलीकाप्टर समझौते में घपला हुआ है”. प्रश्न था कि हुआ है तो आगे क्या? इस पर रक्षामंत्री ने कहा “ब्रिटिश और इतालावी सरकारों ने ज्यादा जानकारी देने से इस आधार पर मना कर दिया कि मामला अभी अदालत में है”.

अब जरा गौर कीजिये जब इसी इतालवी सरकार ने भारत से जानकारी माँगी तो भारत की सरकार ने मात्र सी ए जी की रिपोर्ट पकड़ा दी. इस बात पर इटली की सरकार जो नाराज मिलान की अपील अदालत ने भी इस बात का जिक्र किया कि भारत से कोई सहयोग नहीं मिला. 

इन सब के बावजूद आज देश की पार्लियामेंट में बहस इस बात पर है कि “मैंने तो नहीं तह तक जाँच नहीं किया दम हो तो तुम करके दिखादो”. और शायद यह सरकार भी सफल न हो क्योंकि

गैर मुमकिन है कि हालात की गुत्थी सुलझे, 
अहले दानिश ने बहुत सोच के उलझाया है .
jagran/naiduniya

Monday, 2 May 2016

कराहती न्यायपालिका - समाधान क्या है?


न्यायपालिका कराह रही है. देश के मुख्य न्यायाधीश सार्वजनिकरूप से रो पड़ते हैं. जजों की कमी है लिहाज़ा जनता को दशकों तक न्याय नहीं मिल पा रहा है. देर से हीं सही अगर न्याय मिलता भी है तो जरूरी नहीं की सही हो क्योंकि अमरीका में एक जज चार दिन में एक केस निपटाता है जबकि भारत में रोजाना आठ केस. या यूं कहें कि हर ४५ मिनट एक जज केस पढ़ भी लेता है पक्ष-विपक्ष की दलीलों को को सुन भी लेता है और फैसला लिख भी देता है. अगर न्यायपालिका में छुट्टियों का आंकलन शामिल कर दिया जाये तो शायद हर केस को निपटने का समय घट कर मात्र २५ मिनट हीं रहेगा. इनमें वे केस भी शामिल हैं जिनमें अभियुक्त को फांसी भी हो सकती है या जेल की सजा भी. वे केस भी शामिल हैं जिनमें गरीब बुढिया की एक मात्र दुकान  कोई मक्कार भतीजा हड़प जाना चाहता है और बुढ़िया सड़क पर भीख माँगने को मजबूर हो जाती है या जहर पी कर मौत को गले लगा लेती है. इस रफ़्तार से केस निपटाने में शायद आइंस्टीन का दिमाग भी फेल हो जाये.

लेकिन ठहरिये ! हमें अपने को कोसने की आदत हो गयी है. हर बात पर हम अमरीका और चीन से तुलना करते हैं और फिर “भारत कभी सोने की चिड़िया थी, अँगरेज़ सोना लूट ले गए और पिछले ७० सालों में बचा पीतल भ्रष्ट राजनीतिक वर्ग और सड़े सिस्टम की भेंट चढ़ गया” के भाव में बताते हैं कि कैसे चीन शिक्षा में बजट की इतना प्रतिशत , स्वास्थ्य में उतना और हथियार खरीदने में उससे भी ज्यादा खर्च करता है. हम भूल जाते हैं कि भारत का आबादी घनत्व ३६८ प्रति किलोमीटर स्क्वायर है जबकि चीन का १४२, इंग्लैंड का २१६, ब्राज़ील का २४, रूस का ८.३ अमरीका का ३२ है. मूल रूप से कृषि –आधारित अर्थ व्यवस्था में जब संसाधनों पर इतना दबाव पडेगा तो विकास की रफ़्तार धीमी तो रहेगी हीं और उस पर से कोढ़ में खाज के रूप में भ्रष्टाचार.

फिर हम कहाँ से शुरू करें? हमारी प्राथमिकता क्या है? घुरहू , पतवारू या छेदी को पहले पेट में अनाज चाहिए, अनाज के लिए खेत को पानी चाहिए, दलित के बीमार पत्नी और बच्चे के लिए अस्पताल चाहिए  शिक्षा चाहिए. घर में शौचालय चाहिए. बीमार रहेंगे तो बचेंगे नहीं (बाल मृत्यु दर ३.७ प्रतिशत है) , बच गए तो पढ़ –लिख नहीं पाएंगे (गरीबों और दलितों महिलाओं में साक्षरता आज भी कई राज्यों में ३५ प्रतिशत से कम है). और इस तरह के तमाम अभाव में जीने वाले लोगों की संख्या ७५ प्रतिशत है. ऐसे में तात्कालिकता के पैमाने पर उन्हें न्याय की ज़रुरत शायद उतनी नहीं जितनी जीवन की अनिवार्य शर्तों की.

अब न्याय न मिलने का या देर से मिलने का या न्याय की गुणवत्ता खराब होने का एक खतरनाक पहलू देखें. बिहार का आबादी घनत्व देश के मुकाबले तीन गुना ज्यादा है याने १०५६ व्यक्ति प्रति किलोमीटर स्क्वायर या अमेरिका के आबादी घनत्व से ३० गुना ज्यादा. इस राज्य में जमीन पर इतना दबाव है कि ७० प्रतिशत हत्याएं परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से जमीन को लेकर हो रही हैं. अंग्रेज़ी की कहावत “डॉग इट्स डॉग वर्ल्ड” (ऐसी दुनिया  जिसमें कुत्ता कुत्ते को खाता हो) बिहार में चरितार्थ हो रही ही. लिहाज़ा सिर्फ न्याय व्यवस्था दुरुस्त करने से शायद हीं स्थिति बेहतर हो सके. समाज में अभाव, अशिक्षा, रोजगार के अल्प अवसर की वजह से व्याप्त लम्पटता और राज्य अभिकरणों के भ्रष्ट लोगों और गुंडों-राजनीतिक वर्ग के बीच पनपा समझौता अभियोजन को प्रभावित करता है और न्याय प्रक्रिया को भी निष्पक्ष नहीं रहने देता. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक सजा की दर में बिहार देश के सभी राज्यों से पीछे है. सन २०१४ में अगर १०० लोगों पर आपराधिक मुकदमें थे तो केवल १० को सजा हो पाई जब कि सन २०१३ में १५.६ को हुई थी. राष्ट्रीय औसत ४५ प्रतिशत है।

इन सब का नतीजा यह है कि इन राज्यों में न केवल न्याय-व्यवस्था से बल्कि पूरे तंत्र से जनता का विश्वास उठ जाता है और हार कर वह थाने या ब्लाक में जा कर अपनी समस्या बताने की जगह मोहल्ले के उस गुंडे को तलाशने लगता है जो हाल हीं में खद्दर पहनने लगा है. ऐसे राजनीतिक रॉबिनहुड किसी न किसी जाति के होते हैं और वे अपनी जाति के लोगों के लिए “संकटमोचन का रूप” धारण कर लेते हैं. बिहार के हाल के चुनावों में जाति का संयोजन और जद (यू) –राजद की विजय का सहीं विश्लेषण इस बात को दर्शाता है. यह रॉबिनहुड शीर्ष पर बैठे नेताओं के लिए भीड़ जुटा सकता है और अवसर हो तो बाँहों की ताकत भी दिखा सकता है. अपराध के लिए जाने जाने वाले और वर्षों से जेल में बंद शहाबुद्दीन को राजद का पदाधिकारी बनाना यह सिद्ध करता है कि प्रजातंत्र की मूल अवधारणा कहीं दम तोड़ चुकी है.

देश में पुलिस –आबादी अनुपात वैश्विक औसत से आधी है, उत्तर प्रदेश में चौथाई और बिहार में उससे भी कम. तो क्या ज़रूरी नहीं कि पुलिस की  संख्या बढ़ाई जाये? क्या जिन राज्यों में पुलिस की संख्या औसत से ज्यादा है वहां अपराध कम हुए हैं? क्या सजा की दर बढ़ी है ? नहीं? ऐसे तमाम उदहारण हैं जिनमें अपराधी को सेशंस कोर्ट से सजा हुई। अपराधी ने हाई कोर्ट में अपील की। हाई कोर्ट ने सेशंस कोर्ट को डांट लगते हुए सज़ा को “ससम्मान रिहाई” में बदल दिया लेकिन फिर जब राज्य सर्वोच्च न्यायलय पहुंचा तो देश की सबसे बड़ी अदालत ने हाई कोर्ट को गलत ठहराते हुए और सेशंस के फैसले की प्रशंसा करते हुए अपराधी की सजा फिर बहाल कर दी. अगर राज्य सरकार ऊपर की अदालत में न जाती तो अभियुक्त सीना तान कर घूमता. या अभियुक्त खेत बेंच कर या कोई और अपराध करके पैसे खर्च करके अच्छा वकील खड़ा न करता तो कई साल पहले हीं जेल की सलाखों के पीछे होता. क्या न्याय प्रणाली दोषपूर्ण नहीं है?

दरअसल भारत के मुख्य न्यायाधीश का सार्वजनिक मंच से भावातिरेक में आना गंभीर है लेकिन समस्या का निदान मात्र जजों की संख्या बढ़ाने  से नहीं होगा. व्याधि कहीं और है और वह एक नहीं कई हैं और हर व्याधि दूसरी व्याधि को जन्म दे रही है. 
 
lokmat/jagran

Sunday, 17 April 2016

अजीत डोभाल की सर्वोच्च अदालत के जजों को ब्रीफिंग एक अच्छा प्रयास

सुरक्षा सलाहकार का देश की सबसे बड़ी अदालत के जजों को दी गयी इस सलाह और सपष्टीकरण को गहराई से समझना होगा
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पिछले हफ्ते भोपाल में एक अनौपचारिक लेकिन तयशुदा अवसर पर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने भारत के मुख्य-न्यायाधीश सहित सुप्रीम कोर्ट के एक दर्ज़न से अधिक जजों को देश के आतंरिक एवं बाहरी सुरक्षा खतरों से अवगत कराया. अपनी इस ब्रीफिंग में उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर सरकार के कदमों को पक्ष-विहीन प्रयास माना जाना चाहिए. यह अलग बात है कि तत्काल जाने माने वकील प्रशांत भूषण ने इस ब्रीफिंग को यह कहते हुए गलत बताया कि इसमें जजों के सामने मानवाधिकार पक्ष से कोई बोलने वाला नहीं था. प्रशांत भूषण इसमें भी अदालती प्रक्रिया की अपेक्षा करने लगे. शायद यही भाव देश के सुरक्षा एजेंसियों को आतंकवाद से लड़ने में दिक्कत कर रहा है. वकील महोदय शायद यह नही समझ सके कि खुली अदालत में देश के सुरक्षा खतरों पर जजों को ब्रीफ करना संभव नहीं था.   
सुरक्षा सलाहकार का देश की सबसे बड़ी अदालत के जजों को दी गयी इस सलाह और सपष्टीकरण को गहराई से समझना होगा.--- खासकर के इस बात को कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में सरकार के प्रयासों को पक्ष-विहीन समझा जाना चाहिए. राष्ट्रीय सुरक्षा को ख़तरा किससे है? आतंकवाद से. यह आतंकवाद आमतौर पर कौन करा रहा है ? पाकिस्तान का आई एस आई और मध्य-पूर्व का इस्लामिक स्टेट. कौन कर रहा है ? देश के हीं कुछ गुमराह लोग जो एक धर्म-विशेष से सम्बन्ध रखते हैं. यह सही है कि उस धर्म-विशेष का आतंकवाद से कुछ लेना –देना नहीं है और वह धर्म अमन का सन्देश देता है लेकिन आतंकवादी तो इस धर्म-विशेष का हीं सहारा ले रहे हैं अपने कुकृत्य के औचित्य को ठहराने के लिए. ऐसे में जब सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा दायित्वों का निर्वहन करने के लिए उन्हें पकडती है तो सरकार को पक्षीय मान लिया जाता है. दुर्भाग्यवश वर्तमान सरकार जिस पार्टी की है उसकी पैठ एक अन्य धर्म-विशेष के लोगों में है. चूंकि देश की अदालतों के यह जिम्मेदारी होती है कि वे सुनिश्चित करें कि राज्य अभिकरण मानव अधिकारों का हनन न कर सकें लिहाज़ा कई बार फैसले करने में यह भाव प्रबल हो जाता है.
 
दरअसल यह दिक्कत तब से शुरू हुई जब से पाकिस्तान के आई एस आई ने दस साल पहले अपनी रणनीति बदली. भारत में पाकिस्तान-संयोजित आतंकवाद के चार चरण हैं. १९८० से १९९० तक पी टी पी  एम (पाक- ट्रेंड पाक मिलिटेंट) चरण था. इसमें आई एस आई अपने युवाओं को धर्म के नाम पर गुमराह करके उन्हें आतंकवाद की ट्रेनिंग देता था और फिर उन्हें हथियार और पैसे दे कर भारत में आतंकवादी घटम को अंजाम देने के लिए भेज देता था. इस मॉडल की दिक्कत यह थी कि अगर आतंकवादी पकड़ा जाता था तो भारतीय सुरक्षा एजेंसी उनका पाकिस्तानी चेहरा दुनिया में दिखा देती थी उनका गाँव, उनकी ट्रेनिंग के बारे में उन्हीं की जुबानी सुनाकर. अमरीका और विश्व के अन्य देश समझ जाते थे कि आतंकी  कौन सा देश है. पाकिस्तान की दुनिया में किरिकिरी होती थी. आई एस आई ने इसे बदला. और पी टी आई एम् चरण १९९० से शुरू हुआ. इसमें भारत के हीं धर्म के नाम पर गुमराह युवकों को पाकिस्तान में ट्रेनिंग , हथियार और पैसे दिए जाते थे और उनका भारत में आतंकी घटनाओं के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा. अगर कभी ये आतंकवादी पकडे गए तो पाकिस्तान यह कह कर बचने की कोशिश करता था कि “आतंकवादी भारत का है, मुझसे क्या मतलब”. लेकिन इसमें भी दिक्कत आयी क्योंकि वह भारतीय आतंकवादी ट्रेनिंग की जगह और हथियार किसने दिया यह सब खुलासा कर देता था. पाकिस्तान को सन २००० तक आते -आते यह रणनीति भी बदलनी पडी. उसने भारत के हीं कुछ आतंकवादी संगठनो के जरिये “होम –ग्रोन “ (घर में पैदा हुआ) आतंकवाद शुरू किया और इन गुमराह युवाओं की ट्रेनिंग भी बांगलादेश और नेपाल में की जाने लगी. पर इसमें भी भारतीय इंटेलिजेंस एजेंसी की चौकसी के कारण ज्यादा सफलता नहीं मिली. लेकिन आई एस आई ने अपना आधार बना लिया था. चौथे चरण में आई एस आई द्वारा मोड्यूल सिस्टम और स्लीपर सेल की रणनीति को समेकित किया गया. हथियार कोई केरल का मोड्यूल लाता था. आतंकवादी बंगाल से आते थे और घटना आन्ध्र प्रदेश या उत्तर प्रदेश के शहर में होती थी. उदाहरण के तौर पर : केरल के मोड्यूल को आदेश होता था कि मेरठ के फलां दूकान में छः बम और तीन पिस्टल रख दे. उसका काम यही ख़त्म हो जाता था. बंगाल वाले सेल को आदेश था कि वह फलां धार्मिक स्थल के पास टाइमर लगे इन बमों को रख दे. अपना काम करने की बाद वह भी वापस चला जाता था. यूपी के सेल से यह कहा जाता था कि बम फटने के कुछ समय पहले वह इस या उस धर्म-विरोधी पर्चे बिहार में बाँट दे. याने कोई भी मोड्यूल या सेल दूसरे मोड्यूल या सेल के लोगों ने क्या किया या कौन हैं नहीं जान पाता था. लेकिन देश में माहौल तनावपूर्ण बना रहता था.
 
अपराध-न्याय शास्त्र में “मेंस रिया “ (अपराध करने के पीछे का उदेश्य) बेहद महत्वपूर्ण होता है. पुलिस की समस्या यह थी कि उसे सारी कड़ी मिल नहीं पाती थी और अगर केरल मोड्यूल तक पहुँच भी गयी तो यह नहीं समझ में आता था कि अगला काम बंगाल के व्यक्ति ने क्यों किया. फ़र्ज़ कीजिये कि उसने अपने इंटेलिजेंस सामर्थ्य के तहत इस देश-व्यापी छापों में इन्हें पकड़ा भी तो अदालत में मुश्किल होती थी. अदालत को मेंस रिया के सिद्धांत की कसौटी पर यह नहीं समझ में आता था कि केरल के व्यक्ति ने बम क्यों रखा क्योंकि दूकानदार तो मेरठ का था. जज को यह भी नहीं औचित्यपूर्ण लगता था परचा बांटने के लिए कोई बैंगलोर से बिहार या बंगाल क्यों जाएगा. फिर चूंकि हर जिले का अपराध वहां की पुलिस देखती है लिहाज़ा मेरठ(यू पी) , नवादा (बिहार), मेदनीपुर (पश्चिम बंगाल)  और कोट्टायम (केरल) का क्या रिश्ता है यह भी अदालतों की समझ में नहीं आता था. लिहाज़ा आतंक के आरोपी छूट जाते थे. और आतंक के मामलों में सजा की दर बेहद कम होने लगी.
एन आई ए के गठन के पीछे केंद्र का यही तर्क था. राज्यों द्वारा एन.सी.टी.सी का विरोध भी “हमारे इलाके में तुम कैसे” के रूप में देखा जाना चाहिए। अमेरिका में वर्ल्ड ट्रेड टावर पर हुए ९/११/२००१ के हमले के बाद अगले कुछ हफ़्तों में देश में दो कानून आये—यू एस पेट्रियट एक्ट , २००१ और यू एस होमलैंड सिक्यूरिटी एक्ट, २००२. इन दो कानूनों के तहत सिक्यूरिटी एजेंसी किसी की बात सुनाने के उपकरण लगा सकती है , किसी भी संदिग्ध व्यक्ति की संपत्ति की बगैर बताये जांच कर सकती है और देश के किसी भी भाग में किसी की भी जाँच व गिरफ्तारी कर सकती है. अमेरिका संविधान में राज्यों को भारत से कहीं अधिक शक्तियां हैं लेकिन एक भी राज्य ने “अपने अधिकारों के हनन” का मामला उठा कर इस कानून को नहीं रोका. ब्रिटेन में आतंक निरोधक कानून , १९७६ के तहत किसी भी संदिग्ध व्यक्ति को बगैर कारण बताये ४५ दिनों तक हिरासत में रखा जा सकता है. यह कानून हाउस ऑफ़ कॉमन्स में महज दो घंटे की चर्चा के बाद पारित हो गया. सन १८८४ में वहां  की पुलिस को आतंक रोकने के लिए और ज्यादा शक्तियां दी गयीं.
इसके ठीक उलट भारत में अनेक राज्यों के इस विरोध के कारण कि केन्द्रीय एजेंसी को इतनी शक्ति का मतलब राज्य की शक्तियों का अतिक्रमण होगा, अदालतों को भी आतंकवाद के नए खतरे के तहत अपराध-न्याय शास्त्र का चश्मा बदलना होगा देश की सुरक्षा के लिए. मानवाधिकार उनका भी होता है जो आतंकवाद के शिकार होते हैं.  

jagran

Monday, 4 April 2016

अंग्रेज़ी शब्दों से परहेज़ कहीं दुराग्रह तो नहीं ?


Friday, 1 April 2016

दल-बदल कानून में जबरदस्त खामी, गैर-कानूनी हरकत का परिणाम अपरिहार्य

मूल्यविहीन राजनीति—एक खतरनाक संकेत



उत्तराखंड के संवैधानिक संकट ने एक बार फिर साबित कर दिया कि सन २००३ में हुए संविधान संशोधन के बावजूद वर्तमान दल-बदल कानून में जबरदस्त खामी है. अगर कांग्रेस के नौ विधान सभा सदस्य पार्टी व्हिप के खिलाफ जाते हुए धन-विधेयक के खिलाफ वोट करते तो उनका कृत्य गैर-कानूनी होता क्योंकि संविधान की १०वी अनुसूची (पैर २) इसकी इज़ाज़त नहीं देता लेकिन इस गैर-कानूनी हरकत पर उनकी सदस्यता तो बाद में जाती पहले सरकार गिर जाती. यह जानते हुए भी कि सदस्य या कुछ सदस्यों का (जब तक कि वे विधायक दल की कुल संख्या के २/३ से कम नहीं है और साथ हीं दूसरी पार्टी में विलय की घोषणा नहीं करते—पैरा ४) यह कृत्य गलत है उन्हें सजा बाद में मिलेगी लेकिन उनके इस गैर-कानूनी हरकत का परिणाम अपरिहार्य होगा, कानून कुछ नहीं कर सकता.

उत्तराखंड में संविधान की धज्जियाँ उडीं. सबने उड़ाईं. जब मुख्यमंत्री और स्पीकर को पता चला कि कुछ बागी (जिनकी संख्या कम होने से कानून इज़ाज़त नहीं देता) ऐसा कुछ करने जा रहे हैं तो उन्होंने भी उसी कानून के उल्लघन का सहारा लिया. याने सदस्य मत-विभाजन की मांग करते रहे, स्पीकर ने बजट ध्वनिमत से पास कर दिया. अगर कानून यह होता कि व्हिप का उल्लंघन होने पर उलंघनकर्ता की सदस्यता तत्काल स्वतः समाप्त और मतदान दोबारा हो तो स्पीकर को सरकार बचाने के लिए इस अनैतिक हरकत का सहारा न लेना पड़ता. पर हम्माम में नहाने की शायद शर्त हीं है अनैतिक बनना। फिर शुरू हुआ खरीद-फरोख्त और सदस्यों को अगवा (?) करके रिसोर्ट में छिपाने का दौर. राज्यपाल ने बहुमत सिद्ध करने के लिए सरकार को ज्यादा समय दे कर जाने अनजाने में इस प्रक्रिया को और हवा दे दी. अगर सदन पर शक्ति परीक्षण होता तो फिर वही ढाक के तीन पात. मात्र नौ सदस्य (जो कांग्रेस विधायक दल का मात्र एक-चौथाई होता है) भारतीय जनता पार्टी से मिल कर सरकार गिरा देते. लिहाज़ा स्पीकर ने उन्हें निकालने का फैसला कर लिया था.

अब बारी थी केंद्र सरकार की याने भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार की. उसको संविधान के अनुच्छेद ३५५ की याद आयी जिसके तहत उसकी जिम्मेदारी है कि यह सुनिश्चित करे कि राज्यों में सरकार संविधान के अनुरूप चले. उसने भी अर्ध-सत्य का सहारा लिया याने जहाँ से विधान-सभा के स्पीकर ने “गैर-कानूनी” फैसला लिया था (अर्थात मतदान न करा कर बजट को ध्वनि मत से पास मान लिया था). केंद्र को यह नहीं दिखा कि उसके कुछ क्षण पहले कांग्रेस के असंतुष्ट विधायकों, जिनकी संख्या कम होने से कानून इज़ाज़त नहीं देता कि वे व्हिप के खिलाफ जाये और पार्टी विरोधी गति-विधि के तहत एक अन्य पार्टी से मिलकर सरकार गिराने के कार्य में लगें, ने संविधान का अनुपालन नहीं किया. यहाँ दल-बदल कानून की स्पष्ट कमजोरी है कि वह एक्शन में तब आता है जब गैर-कानूनी हरकत से क्षति या लाभ हो चुका होता है. 

उत्तराखंड के संकट ने दो बातें साफ़ कर दी हैं. संविधान की इमारत चाहे कितनी हीं पुख्ता बना लीजिये, रंग-रोगन करा लीजिए लेकिन उसकी देखभाल करने वाले अगर मजबूत नैतिक स्नायु वाले नहीं है तो यह भव्य इमारत ईंट दर ईंट गिरती रहेगी. हमने ३५ साल तक दल-बदल विरोधी कानून नहीं बनाया था तो भी “आया-राम, गया-राम” संस्कृति संविधान को मुंह चिढाती रही और रातों-रात दल-बदल कर कोई सांसद या विधायक संप्रभुता का प्रतीक लाल बत्ती लगाये मंत्री पद की “संविधान में अपनी निष्ठा” की झूठी शपथ लेता रहा. जब सन १९८५ में यह कानून बना तो उसके बाद स्पीकर और दबंग नेता इस कानून की व्याख्या के नाम पर खुलकर तांडव करते रहे. जब सन २००३ में इसे और सख्त बनाने के नाम पर ९१वेन संशोधन के तहत बदला गया तो अब चुने हुए जन-प्रतिनिधि तो ब्लैकमेल तो नहीं करती बल्कि वह काम पार्टी के नेता सामूहिक रूप से करने लगे. याने कानून न रहे तो जन-प्रतिनिधि पैसे या पद ले लिए निष्ठा बदलेगा और कानून बनेगा तो पार्टी का नेता सामूहिक रूप से यही काम करेगा. दूसरा निष्कर्ष यह कि कानून नैतिकता का प्रश्नों का समाधान नहीं हो सकता.

देश भर में करीब ४२०० विधायक और ८०० सांसदों के द्वारा संचालित संसदीय व्यवस्था पिछले ६६ साल के प्रजातंत्र में कोई एक घटना नहीं है जिसमें किसी सांसद या विधायक ने सिद्धांत के आधार पर पार्टी छोड़ हो या दूसरी पार्टी अपनाई हो. शायद प्रजातंत्र की इस स्वदेशी कारखाने में नैतिक माल नहीं बनता. अरुणाचल प्रदेश और उत्तरांचल भले हीं इसके ताज़ा उदाहरण हो लेकिन यह सिलसिला भारत के गणराज्य बनाने के साथ हीं शुरू हो जाता है. सन १९५२ में दल बदल कर टी प्रकाशम् के मुख्यमंत्री पद  हासिल किया. चार साल बाद पट्टम थानू पिल्लई ने राज्यपाल पद पाने के लिए अपना दल बदला. उत्तर प्रदेश में एक समय के विपक्ष के नेता गेंदा सिंह और नारायण दत्त तिवारी ने रातों-रात कांग्रेस बन गए. १७ साल बाद देश में पहली बार कांग्रेस का वर्चस्व टूटा और जो अभी तक आना-जाना कांग्रेस की तरफ होता था उल्टा होने लगा. १० राज्यों में संयुक्त विधायक दल के सरकारें बनी. राजनीति में अनैतिकता का पहला घिनौना नाच शुरू हुआ. देश के ४००० विधायकों में २००० से ज्यादा ने कम से एक बार और सैकड़ों ने कई बार दल-बदल किया और इनमें से कुछ ने तो मात्र ४८ घंटों में तीन बार पार्टियाँ बदली-- कुछ ने सत्ता के लिए तो कुछ ने पैसे लेकर. इसे “आया राम , गया राम” की संस्कृति कहा गया. स्वयं चन्द्रशेखर, और चौधरी चरण सिंह ने अपनी मूल पार्टी छोड़ कर और दल बदल कर प्रधानमंत्री पद सुशोभित किया. राव वीरेंद्र सिंह (हरयाणा), गोविन्द नारायण सिंह (मध्य प्रदेश) और सरदार लक्ष्मण सिंह गिल (पंजाब) मुख्यमंत्री बनाने के लिए कांग्रेस से बाहर आये. इन दल-बदल की घटनाओं के पीछे कोई सिद्धांत नहीं था बल्कि पद- या धन लोलुपता थी.
जबरदस्त मांग उठी दल-बदल के खिलाफ कानून लाने की. लोक सभा ने एक समिति बनाई. १९८४ में राजीव गाँधी ने इंदिरागांधी की हत्या के बाद मिली जबरदस्त बहुमत के बाद इस व्याधि पर रोकने का विचार मुकम्मल किया. संविधान के ५२ वें संशोधन के रूप में सर्वसम्मति से यह विधेयक पारित हुआ. दोबारा सन २००३ में ९१ वें संविधान संशोधन के तहत इसे और “सख्त” बनाया गया याने अब कोई पार्टी एक-तिहाई संख्या के दम पर अलग पार्टी नहीं बना सकता. साथ हीं अगर कोई विधायक दल टूटता है तो उसके सदस्यों की वैधता की दो शर्तें होंगी: (१) विधायक दल की संख्या का दो-तिहाई बहुमत और (२) किसी अन्य किसी अन्य दल में विलय. इस कानून के बाद भी कुछ भी नहीं बदला. हाँ दल-बदलुओं के “भाव” और बढ़ गए. उत्तराखंड और अरुणाचल में हाल की घटनाएँ यही सिद्ध करती हैं कि अनैतिकता के प्रश्न कानून से हल नहीं किये जा सकते. दुनिया में कोई तीन करोड़ कानून हैं लेकिन न तो भ्रष्टाचार रुका, नहीं हत्याएं या बलात्कार कम हुए.
  
lokmat