Thursday, 10 December 2015

कांग्रेस: यह कैसी आत्मघाती व अलोकतांत्रिक “स्ट्रेटेजी” है !


अभी दो हफ्ते भी नहीं हुए जब भारतीय संविधान को कांग्रेस की देन बताते हुए पार्टी नेताओं ने इसकी संस्थाओं के प्रति सम्मान की सीख सत्ता पक्ष को दी थी. लेकिन ८ दिसंबर,२०१५ को संसद में पैदा किया गया गतिरोध कांग्रेस के ठीक विपरीत आचरण का प्रतीक बन गया.  लगभग १३० साल पुरानी कांग्रेस पार्टी कहीं बौद्धिक जड़ता की शिकार होती जा रही है. उसे मुद्दे और उनके प्रति समाज में अपेक्षित प्रतिक्रिया की समझ कम हो गयी है. यह समझ हीं किसी राजनीतिक पार्टी के प्रसार, उसके दीर्घायु होने और उसकी विश्वसनीयता की कसौटी होती है. जिन दलों में शीर्ष स्तर पर जन-जीवन से कटे लोग पार्टी के नीति-नियंता बन जाते हैं उन दलों की समझ क्षीण हो जाती है.     इस समझ से पैदा हुई राजनीतिक सूझ-बूझ, जिद की हद तक जन –नैतिकता के मानदंडों पर खड़े दिखने की ललक और दूरदर्शी रणनीतिकारों का आज कांग्रेस में नितांत अभाव है. प्रतिस्पर्धी राजनीति का, जो भारत में प्रैक्टिस की जाती है, पहला तकाजा है कि चूंकि राजनीति में जन-स्वीकार्यता जन-संदेशों का खेल है लिहाज़ा हर पार्टी दूसरी पार्टी की गलतियों का फायदा उठती है, अपने से कोई गलत सन्देश न देने की कोशिश करती है और और दूसरी पार्टी की छोटी गलती को ताड़ बना कर परोसती है. लेकिन इस जद्दो-जेहद के भी कुछ नियम होते हैं. इस लड़ाई में संवैधानिक मान्यताओं, प्रजातान्त्रिक परम्पराओं या तत्कालीन मानवीय मूल्यों की अवहेलना हुई तो उस पार्टी या उसके नेता से जनता मुंह मोड़ने लगती है.

एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (ए जे एल) – यंग इंडियन्स विवाद को कांग्रेस नेतृत्व जिस तरह “हैंडल” कर रहा है वह सिद्ध करता है कि इस पार्टी की समझ कुछ ऐसे नेताओं में जिनका जन जीवन ए सी कमरों से बाहर नहीं आया हो, के बीच महदूद रह गयी है. तभी तो हाई कोर्ट द्वारा अपील ख़ारिज होने के बाद पार्टी के शीर्ष लोग रात भर “स्ट्रेटेजी” बनाते रहे और निकला एक निहायत बेहूदा और पार्टी के लिए घातक कदम. पार्टी नेतृत्व इसे "प्रतिशोध की राजनीति" बता रहा है़।

पूरी दुनिया में एक स्थापित लोक- सिद्धांत है कि अगर आप पर कोई आरोप लगे तो पहले उसे तर्कों के आधार पर गलत सिद्ध करते हैं और फिर अगर ज़रुरत पड़े तो कुछ समय बाद उस गलत आरोपों के सूत्रधारों के नाम बताते हैं, उनकी संलिप्तता और उस संलिप्तता का आशय बताते हैं. परन्तु कांग्रेस के “महान” रणनीतिकारों ने रात भर जग कर इसके उलट पहले सरकार की मंशा को कोसा, फिर न्यायपालिका पर परोक्ष रूप से आरोप चस्पा किया (क्योंकि न्यायपालिका के आदेश को अगर सरकार से जोड़ा जाएगा तो नागरिक शास्त्र के कक्षा १० का बच्चा भी समझ सकता है कि यही सन्देश जाता है) और फिर संसद का काम-काज टप किया. मुकदमें को लेकर तैयारी का यह आलम है कि हाई कोर्ट से अपील ख़ारिज होने के बाद “मरता क्या न करता” के भाव में निचली अदालत में सोनिया गाँधी के पक्ष प्रस्तुत किया जा रहा था. जब मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट ने हाई कोर्ट के आर्डर की प्रतिलिप चाही तो वह प्रतिलिपि बचावपक्ष के पास नहीं थी. उसे भी उपलब्ध कराया तो आरोपकर्ता सुब्रह्मनियम स्वामी ने.  

ज़रा गौर करें. यह विवाद न्यायपालिका के जेरे बहस है. ट्रायल कोर्ट ने कांग्रेस के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष क्रमशः सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी और तीन अन्य कांग्रेस नेताओं को इस आधार पर अदालत में उपस्थित होने का सम्मन भेजा है कि वे यंग इंडियन्स में प्रमुख शेयरहोल्डर्स हैं. उन पर आरोप है कि उन्होंने ए जे लिमिटेड के  १००० से ज्यादा शेयरधारकों से पूछे बिना सारे शेयर सोनिया –राहुल (दोनों के कुल ७६ प्रतिशत शेयर) वाली कंपनी –यंग इंडियंस –को दे दिए और ए जे लिमिटेड की अचल संपत्ति---खासकर दिल्ली के बहादुर शाह जफ़र मार्ग स्थिति हेराल्ड हाउस और लखनऊ के कैसरबाग स्थिति नेहरु भवन और बगल की जमीन ---का सही आंकलन नहीं किया गया.  ऊपरी अदालत में अपील करना हर व्यक्ति या संस्था का अधिकार है. इन नेताओं ने दिल्ली हाई कोर्ट में उपस्थिति के आदेश के खिलाफ अपील की लेकिन वह ख़ारिज हो गयी. बल्कि हाई कोर्ट ने केस की मेरिट में न जाते हुए भी अपील ख़ारिज करने का कारण बताते हुए मामले में आपराधिक तत्व होने की बात कही.

नाराज कांग्रेस ने पूरे दिन देश की संसद नहीं चलने दी. लोक सभा में पांच बार और राज्य सभा में तीन बार व्यवधान रहा नतीजतन पूरा काम काज बाधित रहा. लेकिन बगैर यह बताये हुए कि नाराजगी किस बात पर है कांग्रेस ने व्यवधान जारी रखा. क्या कांग्रेस इस आधारभूत बात को नहीं समझ पा रही है कि अदालत की कारवाई को लेकर संसद को कैसे बाधित किया जा सकता है या सरकार पर “प्रतिशोधात्मक राजनीति” का आरोप कैसे लगाया जा सकता है? फिर ट्रायल कोर्ट तो छोडिये , दिल्ली हाई कोर्ट ने भी व्यक्तिगत उपस्थिति से राहत की अपील न केवल ख़ारिज की बल्कि मामले में “आपराधिक अंश” की बात भी कही. क्या इतनी पुरानी पार्टी से, जो गणतंत्र बनाने के ६५ साल में तीन –चौथाई से ज्यादा काल तक शासन में रही हो यह उम्मीद की जा सकती है कि न्यायपालिका ऐसी संस्था को राजनीतिक तवे पर सेंके और वह भी बगैर किसी आधार के?

क्या सरकार यह केस लड़ रही है? क्या सुब्रह्मनियम स्वामी को यह अधिकार नहीं है कि व्यक्ति और वकील के रूप में इस मामले को न्यायपालिका के पास ले जाएँ? और अगर भारतीय जनता पार्टी के नेता  के रूप में भी यह मामला अदालत में उठा रहे है या फिर (तर्क के लिए) अगर भारतीय जनता पार्टी भी ऐसा कर रही है क्या यह गैर-कनोनी है? अगर ऐसा हो तो क्या यह कहा जा सकता है कि अदालत का फैसला “राजनीतिक प्रतिशोध” का प्रतिफल है? सोनिया के सलाहकारों ने तीन गलतियाँ की. न्यायपालिका की गरिमा गिराने की कोशिश की, संसद में व्यवधान का औचित्य न सिद्ध करके जनता की नज़रों में गिरी (कल जब जी एस टी पर भी विरोध करेगी तो जनता इसे अब औचित्यपूर्ण नहीं मानेगी) और तीसरा: अगर निचली अदालत के खिलाफ अपील करने और हार जाने के बाद संसद में व्यवधान की जगह चुपचाप निचली अदालत के सम्मान का भाव प्रदर्शित करते हुए सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी अदालत पहुँचते तो जन-समर्थन इन कांग्रेस नेताओं के पक्ष में होता. कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि “वह डरेंगी नहीं , वह इंदिरा गाँधी की बहू हैं”. उन्हें याद करना चाहिए कि इंदिरा गाँधी ने अदालत का सम्मान करते हुए अपने को उपस्थित किया और उससे उपजा जन समर्थन उन्हें फिर वापस सत्ता में लाया.          

फिर सन १९७७ और आज में अंतर है. मीडिया पलपल की खबर दिखा कर जन चेतना और समाज की तर्क शक्ति में व्यापक बदलाव कर चुकी है. अब आम जनता को पता है कि भ्रष्टाचार के मामले में अगर देश की निचली अदालत मात्र व्यक्तिगत उपस्थिति का सम्मन जारी करे और हाई कोर्ट उसके खिलाफ “आरोपी” के अपील को सख्त लफ़्ज़ों में ख़ारिज करते हुए कहे कि मामले में आपराधिक तत्व दिखाई देते हैं तो उसे राजनीतिक प्रतिशोध कह कर बचाव करना न्यायपालिका की अवमानना है.

संसद व्यवधान के बाद अपने पक्ष में कांग्रेस का तर्क प्रभाव डाल सकता था अगर यह अदालत के फैसले के बाद मीडिया के जरिये जनता तक अपनी बात तार्किक रूप से पहुंचाई गयी होती. कांग्रेस के तीन तर्क हैं. पहला: यंग इंडियन्स एक नॉन-प्रॉफिट संस्था है जो सेक्शन २५, कम्पनीज एक्ट, १९५६ के तहत गठित हुई है जिसकी सम्पत्ति या लाभ कोई सदस्य नहीं ले सकता; दूसरा, यंग इंडिया ने कोई ट्रांजेक्शन नहीं किया है. तीसरा, जो रियल स्टेट अर्जित हुई है वह भी कांग्रेस की हीं समय समय पर की गयी आर्थिक मदद का हीं नतीजा है. नेहरु परिवार और कांग्रेस आज तक भी अलग करके के जनता तो छोडिये कांग्रेस के लोग भी नहीं देख पा रहे हैं. लिहाज़ा सोनिया जब ए जे लिमिटेड था तो भी मालिक थी और यंग इंडियन के हाथ में आ गया तो भी मालिक वही हैं.

बहरहाल इस गलत “स्ट्रेटेजी” के चलते अब कांग्रेस पर नैतिक दबाव और साथ हीं जन मत का दबाव होगा कि जी एस टी बिल पास करे नहीं तो सन्देश यह जाएगा कि अपने नेताओं को संकट से उबरने के लिए यह कांग्रेस जन-कल्याण की अनदेखी कर सरकार पर अनैतिक दबाव बना रही है.

jagran

Sunday, 6 December 2015

दिल्ली, बिहार, ग्रामीण गुजरात, सब एक हीं सन्देश दे रहे हैं

    
   

पहले दिल्ली, फिर बिहार और अब गुजरात के ग्रामीण क्षेत्र. इनके चुनाव परिणाम एक सन्देश दे रहे हैं. अगर यह सन्देश सत्ता पक्ष या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नहीं पढ़ते तो “....विपरीत बुद्धि” चरितार्थ कर रहे हैं. आज १९ महीने के मोदी शासन के बाद अगर किसी कक्षा ७ के बच्चे से भी सन २०१४ के आम चुनाव के परिणाम, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की स्वीकार्यता के पीछे जनता की अपेक्षाएं और तज्जनित जबरदस्त मतदान (२००९ के १८.६ प्रतिशत से बढ़ कर ३१.३ प्रतिशत) से हासिल पूर्ण बहुमत की पूरी स्थिति बताते हुए यह पूछा जाये कि देश की सरकार और खासकर प्रधानमंत्री को क्या करना चाहिए तो वह अनायास हीं कह उठेगा उन अपेक्षाओं को पूरा करना चाहिए.

और ये मूल अपेक्षाएं क्या थीं? देश में उद्योग लगे ताकि युवाओं को रोज़गार मिले, किसान आर्थिक तंगी झेलने में असफल हो कर पास वाले आम के पेड़ से न लटके याने कृषि का विकास, भ्रष्टाचार पर प्रभावी अंकुश , देश में शांति का माहौल और राज्य की शक्तियों और अभिकरणों के सामर्थ्य का आतंकवाद पर दहशत. और इन्हें पूरा करने के सभी कारक मौजूद भी थे. उदाहरण के तौर पर भारतीय जनता पार्टी के पास लोक सभा में अपने २८२ सदस्य (बहुमत से दस ज्यादा) लिहाज़ा “गठबंधन धर्म का  अनैतिक दबाव भी नहीं, चूंकि पार्टी और मातृसंस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यह जानती है कि वोट मोदी को मिले हैं इसलिए यह भी दबाव नहीं कि “हमारी फैयाज़ दिली की वजह से तुम वहां हो और जब हम चाहें तुम्हे “पुनर्मूसको भव” की स्थिति में पहुंचा देंगे”. फिर क्यों ये महंत, ये साध्वी, ये उग्र हिंदूवादी क्यों विकास की दिशा बदल रहे हैं? क्यों नहीं इन्हें चुप कराया जाता. जो प्रधानमंत्री इतना शक्स्तिशाली हो कि रातों-रात अपनी पसंद का पार्टी अध्यक्ष ला सकता हो, जो प्रधानमंत्री अपने मंत्रियों में उस भय का संचार कर सकता हो कि वे डर के मारे किसी पी एम ओ के अदना अधिकारी का मुंह ताकते हों निर्देश के लिए, जो प्रधानमंत्री पार्टी के आडवानी , जोशी जैसे दिग्गजों को रेलवे की “एबंडोंड” (परित्यक्त) पटरी की तरह छोड़ रखा हो वह इतना कमज़ोर कैसे हो सकता है कि एक महंत या साध्वी उसके एजेंडा की ऐसी- तैसी महीने-दर-महीने करते रहे और देश का माहौल बिगड़ता रहे?

क्या इसके लिए “राकेट साइंस” जानने की जरूरत है कि देश का माहौल बिगड़ा है. क्या यह कह कर कि जो लोग पुरष्कार लौटा रहे हैं वह कांग्रेस और कम्युनिस्टों के पिट्ठू हैं या यह सब कुछ “कृत्रिम विप्लव” (मैन्युफैक्चर्ड रिवोल्ट) है मोदी और उनकी सरकार और उनकी पार्टी “डिनायल मोड़” में नहीं है?

फिर आखिर मोदी इसे रोकते क्यों नहीं? प्रश्न यह नहीं है कि संघ और उसके अनुषांगिक संगठन यह सब कुछ कर रहे हैं. संघ का राष्ट्र निर्माण की बुनियाद और भाव अलग है जो कई बार संविधान से टकराता है. विश्व हिन्दू परिषद् अगर राम मंदिर की मांग करता है तो इसमें कुछ भी नया नहीं. सरसंघचालक मोहन भागवत अगर मंदिर जीवन काल में बनाने की बात करते है तो इसमें चौंकाने की कोई बात नहीं. परन्तु सत्ता में रह कर जब कोई मंत्री डा. महेश शर्मा या कोई मंत्री जनरल वी के सिंह या कोई साध्वी निरंजन ज्योति संविधान की भावनाओं के अनुरूप बात नहीं करते तब यह माना जाता है कि या तो प्रधानमंत्री कमज़ोर हैं (जो कि वह नहीं हैं) या उनकी मौन सहमति है. अख़लाक़ के मरने पर जब दो सप्ताह प्रतिक्रिया देने में देश के प्रधानमंत्री को लगे तो सोचना यह पड़ता है कि २०१४ में जिस व्यक्ति से अपेक्षाएं की गयी थी वह निर्णय या तो गलत था या व्यक्ति बदल गया.

क्या मोदी से जन अपेक्षाएं चुनाव जीतने के बाद बदल गयी. क्या हैं ये आक्रामक हिन्दुत्त्व के नए मुद्दे और क्या इन्हें विकास के मुद्दे से जनता ज्यादा तरजीह देने लगी है? वह २०१४ के चुनाव के बाद क्या चाहती है? राम मंदिर बनवाना? गौ हत्या के खिलाफ आन्दोलन? मुसलमान लड़कों का हिन्दू लड़कियों से शादी का कुचक्र बता कर “लव जेहाद” के नाम पर एक नया “घृणा प्रतीक” खड़ा करना, जो राम—जादों को वोट न दे उसे हराम.... बताना, हर तीसरे दिन मुसलामानों को पाकिस्तान भेजना? अख़लाक़ को मारने वाली भावनाओं का उभार, देश की प्रमुख संवैधानिक, कानूनी और अर्ध-कानूनी संस्थाओं पर चुन-चुन के “अन्य” विचारधाराओं वाले लोगों के हटा कर एक ख़ास विचारधारा वाले लोगों को लाना?

आजादी के ६८ साल में तीसरी बार देश ने नरेन्द्र मोदी के रूप में किसी नेता पर अपना सब कुछ न्योछावर करने की हद तक जन-स्वीकार्यता दी. पहली जन-स्वीकार्यता नेहरु को मिली थी.  जो जन –स्वीकार्यता नेहरु को मिली थी वह आजादी के  जश्न के नशे में झूमती भारतीय जनता के दुलारे (डार्लिंग ऑफ़ इंडियन मासेज) के रूप में थी उनसे कोई अपेक्षा नहीं थी. नेहरु वह अपेक्षा आज़ादी दिलाकर पूरी कर चुके थे. दूसरी इंदिरा गाँधी को मिली लेकिन वह दिक्-काल सापेक्ष थी और नेहरु को मिली जन-स्वीकार्यता से अलग थी. याने १९७१ में मिली फिर १९८० में. कभी दक्षिण में मिली तो उत्तर में नहीं. और कांग्रेस पार्टी को जो वोट (औसतन लगभग ३८ प्रतिशत) मिला वह आजादी के उपहार स्वरुप दो दशक तक चलता रहा. गरीबी रहे न रहे, ये वोट कांग्रेस को मिलते रहे क्योंकि जनता को उस पर भरोसा था. अशिक्षा और गरीबी के कारण देश की सामूहिक चेतना भी उस स्तर की नहीं थी कि जनता अपने कल्याण को समझे और उसे गवर्नेंस (शासन) से सीधे जोड़ सके. लेकिन नरेन्द्र मोदी की यह जन- स्वीकार्यता अलग थी. यह सशर्त थी. और मोदी ने भी उन्हें पूरा करने के वायदे पर अपनी राष्ट्रीय छवि बनाई. मोदी के व्यक्तित्व में चार तत्व भारत की जनता ने देखा ---- सुयोग्य प्रशासक, सफल विकासकर्ता, भ्रष्टाचार के खिलाफ जेहादी और छप्पन इंच छाती की वजह से आतंकवाद का विनाशक.   

क्या बेहतर न होता कि किसी एक महंत या साध्वी को माहौल खराब करने वाले बयां देने के कारण पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया जाता या मंत्रिमंडल से हटाया जाता यह कहते हुए कि अगर यह सब कुछ करना है तो सरकार से बाहर जाना होगा. क्या बेहतर नहीं होता कि अख़लाक़ के घर मोदी जाते और सख्त सन्देश सब को मिलता. क्या यह कह कर भाजपा अपने कर्तव्य की इतिश्री कर सकती है कि “अख़लाक़ का मरना कानून-व्यवस्था का प्रश्न है जो राज्य सरकार के दायरे में आता है?

सत्य को झुठलाकर टी वी चैनेलों के स्टूडियोज में तो भाजपा के अहंकारी प्रवक्ता गाल बजा सकते हैं और मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को अपनी वाकपटुता से इम्प्रेस कर सकते हैं लेकिन ताज़ा गुजरात के चुनावों में ग्रामीण क्षेत्रों में हार ने ने १९ महीने में तीसरी बार संकेत दिए हैं. अनसुना कर सकते हैं सत्ता में बैठे लोग, पर जनता बेहद निराश होगी और शायद दोबारा किसी नेता पर इस तरह का भरोसा नहीं करेगी. 
 
lokmat

Monday, 30 November 2015

बाबा साहेब को सच्ची श्रद्धांजलि है “संविधान दिवस”




इसमें कोई दो राय नहीं कि मोदी सरकार ने २६ नवम्बर को “संविधान दिवस” के रूप में मनाने का फैसला कर इस पवित्र दस्तावेज के जन्मदाता डॉ भीमराव अम्बेदकर (बाबा साहेब) को सच्ची श्रद्धांजलि दी है. इसके साथ हीं “संविधान” और “कानून” के प्रति जनता की “आदतन” निष्ठा की भावना को भी इससे मजबूती मिलेगी. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ठीक हीं कहा कि “अगर कोई संविधान से छेड़-छाड़ की सोचता भी है तो वह आत्महत्या कर रहा है”. भारतीय समाज का एक बड़ा वर्ग अभी तक आदतन कानून के प्रति एक अनादर का भाव रखता है और अगर ट्रैफिक सिपाही न हो या पकडे जाने का डर न हो तो दोपहर में भी सहज भाव से “लाल बत्ती” को ठेंगा दिखाते हुए वाहन आगे बढ़ा लेने में कोई हिचक उसे नहीं होती. लाइन में खड़े हो कर टिकट लेना अपनी तौहीन समझता है और भ्रष्टाचार के प्रति सहिष्णुता की सीमा दूसरे पर तो थोपता है परन्तु अपने करने को “स्थिति-जन्य  अपरिहार्यता” मानता है.    

बाबा साहेब को भारत के लोगों की तासीर पता थी. संविधान सभा में बोलते हुए उन्होने कहा “संवैधानिक नैतिकता कोई प्राकृतिक भावना नहीं है. इसे पैदा करना पड़ता है. हमें इस बात का अहसास होना चाहिए कि हमें अपने लोगों को अभी यह सिखाना होगा. प्रजातंत्र भारत की जमीन पर एक ऐसी फसल को खाद- पानी देने जैसा है जो मूल रूप से गैर-प्रजातान्त्रिक है” . बाबा साहेब के अलावा संविधान विशेषज्ञों और विश्व राजनीति के कई प्रमुख लोगों को भारत के संविधान के सफल होने में शक था. राष्ट्रमंडल देशों में  में संवैधानिक इतिहास के जाने-माने विद्वान् सर आइवर जेंनिंग्स ने भारत के गणराज्य बनने के लगभग एक साल बाद सन १९५१ में मद्रास विश्वविद्यालय में बोलते हुए कहा “भारतीय संविधान में केंद्र व राज्यों को लेकर बनाये गए प्रावधान बेहद जटिल हैं और संविधान सभा में वकील-राजनीतिज्ञों के वर्चस्व ने इसे और जटिल बना दिया है”. इनका मानना था कि ऐसा जटिल संविधान शायद हीं व्यावहारिक रूप से टिक नहीं पायेगा. ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री चर्चिल का मानना था कि भारत ने अगर गलती से भी प्रजातान्त्रिक व्यवस्था लेन की कोशिश की तो वहां अराजकता फ़ैल जायेगी.

भारतीय प्रजातंत्र ७० साल से चल रहा है. अराजक भी नहीं हुआ. एक बार आपातकाल लगा भी तो जनता ने जिस गुस्से का इज़हार किया उसका सदेश था कि दुबारा कभी कोई सत्ताधारी ऐसा करने की हिम्मत न करे”. मोदी ने भी लोक सभा में इस अवसर पर बोलते हुए इस बात की ओर इंगित किया.
  
लेकिन ऐसा नहीं कि सब कुछ सहज हीं होता रहा. भारत के गणराज्य बनने के बाद हीं संस्थागत तनाव शुरू हो गया. इसका मुजाहरा हमें संविधान को अंगीकार करने के तत्काल आठ महीने में मिलने लगा. संवैधानिक शक्तियों के तहत तत्कालीन नेहरु सरकार ने कई कानून बनाये जिनमें से लगभग ४० प्रतिशत सुप्रीम कोर्ट ने इस आधार पर गलत ठहराए कि राज्य को ऐसी शक्तियाँ संविधान नहीं देता. सबसे पहला मामला दिसम्बर, सन १९५० में उत्तर प्रदेश के जलालाबाद के सब्जी विक्रेता मुहम्मद यासीन ने म्युनिसिपैलिटी के नए एक आदेश के खिलाफ उठाया जो वहां की मंडी में किसी बिशम्भर पाण्डेय को विक्रेताओं से टैक्स बसूलने का एकाधिकार देता था. सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश को ख़ारिज किया.

दरअसल गणतंत्र बनने के पहले देश में सिर्फ तीन हाई कोर्टों – मद्रास, कलकत्ता और बॉम्बे – को हीं रिट जारी करने का अधिकार था और सरकार के खिलाफ किसी भी अभियोग के लिए अदालतों को भी गवर्नरजनरल से अनुमति लेनी होती थी. हमें राज्य की शक्तियों की उस औपनिवेशिक मानसिकता से अचानक बाहर आना था जो मुश्किल था. सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के खिलाफ प्रेस स्वतन्त्रता सम्बंधित रोमेश थापर मामले सरकार के कानून को गलत करार दिया. अदालतों ने सरकार द्वारा बनाये लगभग हर तीसरे नए कानून को असंवैधानिक करार दिया. न्यायपालिका के इस रवैये को लेकर नेहरु काफी नाराज हुए और १६ मई, १९५१ को लोक सभा में बोलते हुए  में उन्होंने कहा “हमने एक भव्य और बेमिसाल संविधान अंगीकार किया लेकिन काले कोट में वकीलों ने इसका अपहरण कर लिया, इसे चुरा लिया”. नेहरु सरकार ने तत्काल याने संविधान के प्रभाव में आने के डेढ़ साल में हीं पहला संशोधन पेश किया जिसमें मौलिक अधिकारों में खासकर अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर तीन नए निर्बंध (रेस्ट्रिकशंस) लगाये और साथ हीं संपत्ति सम्बन्धी अधिकार को बाधित किया. लेकिन खूबसूरती यह थी कि इन संस्थागत झगड़ों में संस्थाएं बलवती होती गयी और संविधान काम करता रहा.    

यहाँ एक सवाल उठता है. भारत का संविधान दुनिया के संविधानों का निचोड़ है. यह सबसे बड़ा है और लगभग तीन साल की जाने माने कानूनविदों और समाजदृष्टाओं की अथक मेहनत का परिणति है. फिर दिक्कत कहाँ है? अमरीका का संविधान सबसे छोटा लिखित संविधान है. यह सबसे पुराना -२२६ साल --होते हुए भी मात्र २७ बार बदला गया जबकि भारत का संविधान पिछले ६५ साल के अपने अस्तित्व में १०० से ज्यादा बार बदला गया. इन संशोधनों के तहत २३० अनुच्छेदों को बदला गया, ४१ नए जोड़े गए और साथ हीं अनुसूचियों में ३७ संशोधन किया गए. याने जहाँ अमरीका का संविधान औसतन हर साढ़े आठ साल में एक बार बदला जाता है भारत में हम अपने संविधान में लगभग हर छः महीने पर एक संशोधन किया जाता है. अगर अनुच्छेदों में संशोधन के हिसाब से देखा जाये तो हर तीन महीने में कोई न कोई अनुच्छेद या तो बदला जाता है या फिर नया जोड़ा जाता है.

इसका कारण क्या है? भारत का संविधान बनाने के पहले दुनिया के कम से कम आधा दर्ज़न प्रतिष्ठित प्रजातंत्रों के सिद्ध संविधानों को देखा गया और उनके सार को लेते हुए भारतीय स्थितियों के अनुरूप उन्हें ढाला गया जैसे संघीय ढांचा हो लेकिन केंद्र –राज्य सम्बन्ध इस तरह हो कि राज्यों को स्वायत्ता भी रहे और केंद्र का वर्चस्व भी. अमरीका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस और तमाम अन्य मुल्कों की सामाजिक संरचनाएं चूंकि अलग थी इसलिए हमने इसे अर्ध-संघीय बनाया. समता का अधिकार (अनुच्छेद १४) मौलिक अधिकार माना गया तो अल्प-संख्यक समुदाय के व्यक्तियों के सामूहिक अधिकार (कलेक्टिव राइट्स ऑफ़ इन्डिविजुअल्स)  को अनुच्छेद २७ और २८ के तहत और समूहों के अधिकार (राइट ऑफ़ कलेक्टीविटीज)  को अनुच्छेद २६, २९ और ३० के तहत अक्षुण रखा. फिर क्यों हमें संविधान में साल-दर साल या सत्र दर सत्र संशोधन करने पड़ते हैं?            

इसके दो प्रमुख कारण हैं. पहला हमें ऐसी संस्थाओं के प्रति जो हमारे खिलाफ भी हों सहनशीलता हीं नहीं बढानी पड़ेगी बल्कि उनका सम्मान भी करना होगा. अगर देश की संसद सर्वसम्मति से जजों की नियुक्ति का संवैधानिक संशोधन पारित करती है और देश के तमाम राज्य भी अनुमोदन करते है तो सुप्रीम कोर्ट को उस भावना को एक बार सम्मान देना चाहिए. भारत के इतिहास में कुछ अवसर छोड़ दिए जाये तो आमतौर पर सर्वोच्च न्यायलय के आदेशों के खिलाफ कानून लाने की परम्परा भारत के संसद में कम हीं देखने को मिलाती है. प्रधानमंत्री मोदी ने अपने शुक्रवार के भाषण में इस ओर इंगित भी किया और कहा कि भ्रष्टाचार के मामले में दोषी को तत्काल चुनाव के लिए योग्य ठहराने वाले आदेश के खिलाफ संसद कानून बना सकती थी लेकिन ऐसा नहीं किया गया. दूसरा: प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि के कारण, बढ़ती शिक्षा, नए टेक्नोलॉजी और मीडिया के बढ़ते प्रभाव के कारण राज्य के प्रति बदलती जन-अपेक्षाओं की वजह से कानून में बदलाव जरूरी होते हैं और कई बार संविधान संशोधन अपरिहार्य हो जाता है. जी एस टी बिल इसका ताज़ा उदहारण है.



lokmat

Sunday, 22 November 2015

कानून, लोक-नैतिकता और जनता का “विजडम” – गलत कौन ?



नवम्बर २०, २०१५, प्रजातंत्र के साथ ६५ साल से कानून और लोक नैतिकता के बीच चल रहे द्वन्द का एक नया रूप था. कुछ ने इसे प्रजातंत्र का मज़ाक कहा तो कुछ ने इसका इस्तकबाल किया. कानूनी और लोक-नैतिकता की एक रस्साकशी में इस बार कानून जीता. राष्ट्रीय जनता दल (राजद) सुप्रीमो लालू यादव के अर्ध-शिक्षित दोनों बेटों ने बिहार के मंत्री के रूप में शपथ ली, शाम को उनमें से एक उप-मुख्मंत्री घोषित हुआ. लगभग १८ साल पहले इन बच्चों की अशिक्षित माँ को रसोई घर से सीधे लाकर राज्यपाल द्वारा मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गयी, कानून-लोक नैतिकता का द्वन्द  फिर देखने को मिला था. राबड़ी देवी को सदन में बहुमत हासिल करने में ११२ साल पुरानी राष्ट्रीय पार्टी –कांग्रेस—और एक क्षेत्रीय दल—झारखंड मुक्ति मोर्चा --की मदद मिली थी. कानून असहाय देखता रहा. जो कानून लालू यादव को चारा घोटाले में मुख्यमंत्री पद छोड़ने को मजबूर करता है वह कानून उसी दिन राबड़ी को मुख्यमंत्री बनाने से लालू को नहीं रोक सकता था.          

एक नेता, जो प्रजातंत्र और नीम सामजिक चेतना-जनित पहचान समूह की राजनीति का उत्पाद होता है (जिसे कुछ बुद्दिजीवी “सामाजिक न्याय की ताकतें” और “सबाल्टर्न पॉलिटिक्स” (दबे कुचलों की राजनीति कहते हैं) अपने मुख्यमंत्रित्व काल में शासकीय कार्य के दौरान किये गए भ्रष्टाचार का आरोपी बनता है. केन्द्रीय जांच ब्यूरो जब मामले में प्रारंभिक तौर पर सच्चाई देखते हुए राज्यपाल से इस मुख्यमंत्री के खिलाफ पूछताछ की अनुमति मांगता है और राजनीतिक दबाव बनता है तो वह नेता घर की रसोई से उठाकर अपनी अशिक्षित पत्नी को मुख्यमंत्री बना देता है. शासन चलता रहता है. इस बीच जांच अपनी मंथर गति से आगे बढ़ता है और वह नेता देश की राजनीति में आता है और रेल मंत्री बन जाता है. याने जिस कानून के तहत उसे मुख्यमंत्री का पद छोड़ना पड़ता है वह कानून इस मामले में लागू नहीं होता जबकि भ्रष्टाचार में देश की जांच के सर्वोच्च संस्था उसे दोषी पाती है.

तीन मूल प्रश्न हैं. क्या कुछ गलत हुआ है, और अगर हुआ है तो गलती कहाँ हुई है और किसने किया है? साथ हीं एक और प्रश्न है यह गलती (अगर है) कानूनी है या लोक नैतिकता के स्तर पर. और अगर इस सब का उत्तर मिल जाये तो यह प्रश्न –क्या कानून और लोक नैतिकता में अन्योन्याश्रितता का सम्बन्ध नहीं है याने क्या दोनों एक दूसरे के पूरक नहीं हैं ? न्याय तो यही कहता है कि जो लोक नैतिकता है उसी के अनुरूप कानून बनता है फिर ६५ साल में यह विभेद क्यों? अगर लालू अदालत की नज़र में भ्रष्ट है और उन्हें कानूनन अगले छः साल तक चुनाव लड़ने याने लोक –जीवन से बाधित किया जाता है तो जनता उन्हें क्यों वोट देती है. क्या जनता के लोक-नैतिकता के पैमाने अलग है? और अगर जनता वोट देती है तो क्या यह माना जाये कि सन्देश यह है कि “भ्रष्टाचारी भी चलेगा किंग-मेकर के रूप में”? क्या यह भी सन्देश जनता का है कि लगभग तीन लाख करोड़ रुपये के बजेट वाले और ११ करोड़ आबादी वाले इस राज्य का नियंता और रहनुमा एक ऐसा लड़का (या लड़के) होगा जो “अपेक्षित” और “उपेक्षित” में अंतर नहीं जनता. आज विकास बेहद जटिल हो गया है. क्या “कुख्यात” आई ए एस अधिकारी उसे हर रोज़ भ्रमित नहीं करेंगे. और अगर यह कहा जाये कि मुख्यमंत्री नीतीश की देखरेख में सब कुछ रहेगा तो इन “रबर स्टैम्प”  की ज़रुरत क्यों है? मुख्यमंत्री के बाद के तीनों पद (वरीयता के अनुसार) क्रमशः लालू के पुत्र तेजश्वी, तेज प्रताप और और लालू की पार्टी के हीं अनुभवी अब्दुल बारी के पास होंगे. याने अगर नीतीश बिहार से बाहर हैं तो कोई तेजश्वी या कोई तेज प्रताप मंत्रिमंडल की बैठक की सदारत करेगा और बारी और राजीव रंजन सिंह (लल्लन सिंह) इन बच्चों के मातहत होंगे.  

इस व्यवस्था में यह साफ़ है नीतीश कुमार लालू यादव के सामने अपने घुटनों के बल रहे. लालू के हीं आदेश पर नीतीश के निकट रहे और सक्षम श्याम रजक को मंत्रिमंडल से आदेश पर बाहर किया गया. अगर घुटनों के बल हीं बैठना था तो भारतीय जनता पार्टी से सम्बन्ध –विच्छेद को नैतिक आधार का जामा क्यों पहनाया? भाजपा तो दस साल साथ रहने पर ऐसा नहीं की थी?

कहने को नीतीश सत्ता के लिए साष्टांग दंडवत में लालू के कदमों में आकर भी  समाजवादी, लालू यादव भ्रष्टाचार के आरोप में अदालत द्वारा जन-जीवन से हटाये जाने के बाद भी समाजवादी, मुलायम अपने बेटे को मुख्यमंत्री पद दिलवाकर और तमाम अपराधियों को उत्तर प्रदेश मंत्रिमंडल में बनाये रखने के बाद और नीतीश –लालू गठबंधन के खिलाफ चुनाव लड़ते हुए भी समाजवादी. क्या लोहिया ने इसी समाजवाद का तसव्वुर किया था.

फिर इन सब से हट कर एक और प्रश्न खड़ा होता है --- इस तरह की लोक-नैतिकता का प्रश्न उठाने वाले हम स्वतंत्र विश्लेषक कहीं अभिजात्यवर्गीय पूर्वाग्रह के शिकार तो नहीं? क्यों नहीं जब तक अंतिम अदालत से “दूध का दूध” नहीं हो जाता हम लालू यादव को युधिष्ठिर मानते और देश पर राज करने देते? जगन्नाथ मिश्र करें तो कोई “ब्रांडिंग” नहीं और लालू करें तो लोक-नैतिकता का सवाल? कांग्रेस या भाजपा जयललिता (भ्रष्टाचार में निचली अदालत से सजा पाने के बाद) का साथ लें तो नैतिकता का सवाल नहीं, लेकिन नीतीश ३६० डिग्री पलटी मारें तो “अनैतिक” और “सत्ता के लिए कुछ भी करने को तत्पर” की संज्ञा? अगर उस समय आय से अधिक संपत्ति मामले में सी बी आई के राडार पर रहे समाजवादी नेता मुलायम सिंह सभी “सेक्युलर” ताकतों को झटका दे कर अविश्वास मत के दिन केंद्र में सत्ताधारी कांग्रेस का साथ दें तो कांग्रेस पर कोई आरोप नहीं क्योंकि २००९ में जनता उसे फिर चुनती है.    

इन सब से भी एक बड़ा अन्य प्रश्न है. अगर जनता लालू के शासन -काल को “जंगल राज” नहीं मानती और लगातार २० प्रतिशत से ऊपर (इस बार ४२ प्रतिशत) वोट देती है तो हम विश्लेषक को क्या अधिकार है गलत बयानी का. आखिर जनता की अदलात हीं तो किसी भी प्रजातंत्र की “भव्य” इमारत की नीव होती है. कांग्रेस के के. कामराज भी अशिक्षित थे पर लोक बुद्दिमता में कई तत्कालीन नेता उनसे सीखते थे. संभव है तेजश्वी और तेज प्रताप को कल शासन चलाना आ जाये और अगर नहीं भी आये तो बिहार के समाज के १५ प्रतिशत यादव का गलत या सहीं सशक्तिकरण तो कर हीं सकते हैं –यही तो लालू की ताकत है और यही नीतीश का डर भी रहेगा. अंत में हम विश्लेषकों की भी एक कमजोरी है (जो राजनीतिज्ञों में भी है) हम जनता के “विजडम” को कभी गलत नहीं कहते और यह कह कर कन्नी काट लेते है कि “वह सब जानती है”. 

lokmat/patrika


Sunday, 15 November 2015

समाजशास्त्रियों, चुनाव विश्लेषकों के लिए पहेली है बिहार के परिणाम




भाजपा व संघ के शीर्ष नेतृत्व को यह दूसरा “वेक-अप” काल बहरा कर सकता है


बिहार चुनाव के दौरान एक मध्यम वर्ग के परिवार में चार साल के बच्चे ने जैसे हीं अपने टी वी सेट पर देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का चेहरा देखा, उसकी भौहें तन गयी, मुट्ठी भींच गयी और बोला “भाइयों- बहनों”. मार्केटिंग के सिद्धांत के अनुसार “प्रोडक्ट” का “ओवर-एक्सपोज़र” (ज्यादा प्रचार) नहीं होना चाहिए वर्ना ग्राहकों का मन उससे उचट जाता है. मोदी ओवर-एक्सपोज़र के शिकार हो गए हैं. यही वजह है कि २९ क्षेत्रों में ३० रैलियां करने के बाद भी १६ क्षेत्रों में उनका प्रत्याशी हार गया. अगर घर का बच्चा उस शैली में बोले तो शुरू में वह “जन-स्वीकार्यता का घरेलूकरण” होता है पर अगर डेढ़ साल बाद भी वही नारे बोले तो वह “कंज्यूमर फटीग” (ग्राहक का उबना) होता है. एक राज्य के चुनाव को खुद अपने दम पर लड़ना ओवर एक्सपोज़र हीं नहीं था, आत्म-विश्वास का विद्रूप पक्ष भी था. शायद रणनीतिकार भूल गए कि एक काल विशेष में “ब्लैक” में बिकने वाला प्रोडक्ट भी कंज्यूमर फटीग का शिकार बनता है. फिर इन्हें क्यों लगता है कि इतनी पुरानी पार्टी को टिटिहरी की तरह केवल एक हीं व्यक्ति गिरने से  बचा सकता है और उसे जनाभिमुख कर सकता है (याने अन्य कोई करेगा तो आसमान की तरह पार्टी के गिरने का  डर है).      

बिहार चुनाव के नतीजों सेफोलोजी (चुनाव विज्ञान) के लिए हीं नहीं समाजशास्त्र के लिए भी चुनौती बन गए हैं. लेकिन भारतीय जनता पार्टी शायद इस दूसरे “वेकअप” काल (जगाने वाला अलार्म) को भी नहीं सुन पा रही है. लिहाज़ा पार्टी के गुरूर का यह आलम था कि चैनलों पर बैठने वाले प्रवक्ताओं को हार के दिन आदेश मिला कि कहो कि “यह चुनाव भाजपा या मोदी या एन डी ए के खिलाफ नहीं है बल्कि नीतीश के गठबंधन को “सकारात्मक” जनमत है ताकि वह काम करें”. अगर २४३ सीटों में भाजपा नेतृत्व वाली एन डी ए को ५८ सीटें हीं हासिल हो और जनता इतने घमासान चुनावी युद्ध के मद्दे नज़र विपक्षी महागठबंधन को १७८ सीटें दे (याने लगभग तीन-चौथाई) तो क्या इसे भी जनता का भाजपा दुत्कार देना नहीं कहेंगे? “दुत्कारना इसलिए क्योंकि इस पार्टी को कुत्त्तों से बेहद प्यार है और अक्सर लोगों की तुलना इस जानवर से करती है.

वैचारिक सांद्रता वाले दलों जैसे भाजपा या सी पी आई और सी पी एम् के साथ एक बड़ी समस्या है कि वह सत्ता मिलने के बाद तत्काल अहंकारी हो जाते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि उनके विचार का अनुमोदन जनमत से हो चुका है तो ये मीडिया , या विपक्ष कौन होता है आलोचना करने वाला. लिहाज़ा “वेक-अप काल भी उसे “मैन्युफैक्चर्ड रिवोल्ट” (कृत्रिम विप्लव) लगता है. यही वजह है कि दिल्ली में हारने के बावजूद इनका अहंकार बढ़ता गया. ऐसी पार्टियाँ जब अवसान की स्थिति में आती हैं तो या तो मीडिया को “बिका हुआ” अथवा “दुराग्रही”  बताती है या विपक्ष के लोगों में राष्ट्रद्रोही और समाजविरोधी खोजने लगती हैं. पार्टी अध्यक्ष का प्रेस कांफ्रेंस में या चैनलों को दिए गए इंटरव्यू में जवाब में वह गुरूर साफ़ दिखाई देता था. इस क्रम में भाजपा की हार के कारणों पर जवाव था “उन्होंने जातिवादी राजनीति की जिसका हमें नुकसान हुआ”. ऐसा लगा कि रामबिलास पासवान और जीतन मांझी पिछले कई जन्मों से समाजवादी या राष्ट्रवादी रहे हों और जाति प्रथा के खिलाफ आन्दोलन कर रहे हों. स्वयं प्रधानमंत्री ने जुलाई २५ और अक्टूबर १५ तक मोदी ने १२ रैलियां कीं और कहीं भी अपनी जाति या “अति-पिछड़ा “ शब्द का प्रयोग नहीं किया लेकिन सरसंघचालक के आरक्षण नीति पर पुनार्विचार करने के वक्तव्य के बाद की १८ रैलियों में उन्होंने अपनी जाति, अपनी गरीब परिवार में को भाषण का मुख्य मुद्दा बनाया. क्या यह जातिवादी राजनीति नहीं थी? यह अलग बात है कि सरसंघचालक का यह वक्तव्य चुनाव में भाजपा की हार का एक बड़ा कारण बना और बैकवर्ड एकता मजबूत हुई.   

                            भाजपा के प्रति आक्रोश
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एन डी ए को कुल ३४ प्रतिशत वोट मिले जो पिछले साल (जिसमें जीतन मांझी नहीं थे ) के लोक सभा चुनाव में मिले मत प्रष्ट से ५ प्रतिशत कम हैं. यह भी तब जब कि मतदान का प्रतिशत पिछले लोक सभा चुनाव के मुकाबले अप्रत्याशित रूप से पांच प्रतिशत बढा है. याने लोगों में भाजपा को हराने की हद तक गुस्सा था. लेकिन इसका एक पक्ष और है. जहाँ एन डी ए को पांच प्रतिशत कम मत मिले वहीं महागठबंधन को भी तीन प्रतिशत (पिछले लोक सभा चुनाव के मुकाबले) कम मत मिले. और इन सबका का कारण यह कि मतदाता न तो मोदी के “भाषण के विषय वस्तु” से खुश था न हीं नीतीश-लालू गठजोड़ पर पूरी तरह मुतमईन. बल्कि असाधारण रूप से उभरे इस गुस्से की वजह से मतदातों का २४ प्रतिशत मत “अन्य” के खाते में पडा. ये अन्य न तो जीतते हैं न सरकार बनाते हैं बस वोट बेकार कराते हैं. भाजपा के खिलाफ गुस्से का एक और कारण था –कैंडिडेट का गलत चुनाव. यही कारण था भाजपा सांसद और भारत सरकार के पूर्व गृह-सचिव आर के सिंह के सार्वजनिक रूप से अपनी पार्टी के नेताओं पर आरोप लगाया कि “टिकट बेंचा गया है”. गलत प्रत्याशी देने का नतीजा यह हुआ कि लोगों (हर चार में से एक) ने “अन्य” को वोट दिया.   


                          समाजशास्त्रीय चुनौती : क्या बैकवर्ड एकता उभरी
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अगर भाजपा को दलितों का वोट नहीं मिला और पासवान –माझी की पार्टियों को सवर्णों का तो ई बी सी (अति-पिछड़ा) भी मोदी से प्रभवित नहीं रहा. यह अलग बात है कि समाजशास्त्रियों के लिए यह पहेली रहेगी कि पारस्परिक रूप से द्वंदात्मक भाव रखने वाले यादव और कुर्मी-कोइरी  या यादव और अति-पिछड़ा वर्ग कैसे नीतीश –लालू गठबंधन को पचा पाए और उसे अपना मत दे सके. यादव एक दबंग जाति है जमीन पर कब्जा है लिहाज़ा कमजोरों का शोषण यही जाति सबसे ज्यादा करती है. उसे सत्ता में लाने के लिए शोषित लोग उसे वोट दें यह बात समाजशास्त्रीय सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है. तो क्या यह बैकवर्ड एकता की दस्तक है? क्योंकि न तो लालू में न हीं नीतीश में इस तरह के सर्व-समाहन वाले गुण अभी तक देखने को मिले. लेकिन टिकट बटवारे को लेकर जो परिपक्वता दोनों नेताओं ने दिखाई या पूरे चुनाव प्रचार में नीतीश ने जिस गाम्भीर्य का परिचय दिया वह मोदी के लिए भी एक सीख हो सकती है.                
  


                      बिहार के मिजाज़ की समझ में गलती
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बिहार का भी इतिहास कुछ और होता अगर “बाहरी” मोदी इस राज्य के बारे में हीं नहीं देश के मिजाज़ के बारे में भी कुछ और तथ्य जान गए होते. पहला यह कि आक्रामक हिन्दुत्त्व से यह मीलों दूर रहना चाहता है. यही वजह है कि भारतीय जनता पार्टी (अगर पिछले चुनाव को छोड़ दें )तो सबसे अधिक वोट प्रतिशत १९९९ में रहा है और उसके बाद लगातार गिरता रहा है. और १९९९ में भी   हर छः हिन्दू जिसे मताधिकार प्राप्त था, में से मात्र एक ने इसे वोट किया. शीर्ष-पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी का उदार चेहरा इसे भाता था लेकिन लाल कृष्ण आडवानी का “कट्टरपंथी चेहरा” (जो गलती से आडवानी के व्यक्तित्व से चिपक गया था जबकि वह कभी भी कट्टर नहीं रहे हैं) उसे डराता रहा है. जब जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या कोई अतिवादी हिन्दू संगठन किसी पर कालिख पोतता है या पिच खोदता है या “वो बनाम हम “ का राग अलापता है और उसे अमल में लेन के लिए दंगे करता है तो अधिकाँश हिंदू उससे चिढ कर या तो किसी और दल की ओर हो जाता है या वापस अपने सदियों पुराने जाति की खोह में चला जाता है. इसे समझने के लिए किसी आइंस्टीन का दिमाग नहीं चाहिए कि अगर ९९९४ में विश्व हिन्दू परिषद् राम मंदिर मुद्दे को परवान चढाता है तो उसी साल कांशी राम बहुजन समाज पार्टी बनाते हैं अगले चार साल बाद कोई मुलायम सिंह यादव, कोई लालू प्रसाद यादव या कोई नीतीश कुमार जातिवादी शक्तियों की पौध खडी करने लगता है. समाजशास्त्र का प्रारंभिक अध्ययन से हीं पता चलता है कि राष्ट्रीय पार्टी बनने की शर्तें बिलकुल अलग है और मूल शर्त है सर्व समाहन की नीतिगत क्षमता और नेता का अतिउदार और व्यापक व्यक्तित्व.

                      मोदी की आक्रामक शैली चिढाती है लालू की गुदगुदाती है
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मोदी की शक्ति लालू के संवाद धरातल पर आ कर खेलने में नहीं थी. “भाइयों-बहनों, एक मेरे इस गाल में पांच चांटा मरता है तो दूसरा उस गाल में ”या “भाइयों-बहनों, साठ हज़ार कि सत्तर हज़ार , कि आस्सी हज़ार , कि एक लाख करोड ? “ कहीं सोच के स्तर पर छोटापन जाहिर करता है. बिहार के लोगों ने इसे प्रधानमंत्री स्वर एक हल्का वक्तव्य माना.  लालू का “काला कबूतर” , धुएं में मिर्चा डाल कर “ एक शैली है जो सशक्तिकरण का स्वाद लिए यादव और पिछड़े वर्ग को गुदगुदाता है.        

बिहार के वोटरों में पिछले लोक सभा चुनाव के मुकाबले इस चुनाव के दौरान जन संवाद के धरातल के नीचे जाने का क्षोभ इस कदर था कि न केवल महागठबंधन का तीन प्रतिशत वोट कम हुआ बल्कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एन डी ए) का पांच प्रतिशत जबकि मतदान का प्रतिशत पांच अंकों से बढा. याने गुस्सा था कि जायेंगे, वोट देंगे लेकिन तुम्हें नहीं. यही कारण है नोटा (इनमें से कोई नहीं) के खाने में भी इस बार दूने से ज्यादा मत पड़े जबकि बिहार में शिक्षा का स्तर राष्ट्रीय औसत से १० प्रतिशत  कम है. यही कारण है कि “अन्य” के खाने में पिछले लोक सभा चुनाव के १७ प्रतिशत के मुकाबले २४ प्रतिशत वोट गए जबकि माना यह जाता था कि बिहार के चुनावी इतिहास में ऐसा “बहु-दलीय द्विध्रुवीय चुनाव शायद पहले नहीं देखा गया था. अगर यह आठ प्रतिशत वोट जो बेकार गए भाजपा को मिलते तो चुनाव की तस्वीर कुछ और हीं होती.

  कहा जाता है कि दुनिया का इतिहास आज कुछ और हीं होता अगर क्लियोपेट्रा की लम्बी नाक जो उसकी बेपनाह खूबसूरती में चार चाँद लगाती थी, थोड़ी छोटी होती या नेपोलियन बोनापार्ट को जून १८, १८१५ (ठीक दो सौ साल पहले) सबेरे दस्त न आने लगते जिसकी वजह से सेना को कूच करने में दोपहर हो गयी और वेलिंगटन के ड्यूक की मदद के लिए प्रूसिया का ब्लूचार भी पहुँच भी वॉटरलू गाँव (ब्रुसेल्स) पहुँच गया. बिहार देश के सबसे कद्दावर नेता और प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी का “वॉटरलू” साबित हो सकता है. मोदी बिहार का हीं नहीं देश का मिजाज़ नहीं समझ पा रहे हैं. बिहार में जबरदस्त शिकस्त दूसरा वार्निंग सिंग्नल है पहला दिल्ली चुनाव में हार के साथ मिला था. लार्ड ऐक्टन ने कहा था “पॉवर करप्ट्स” (सत्ता भ्रष्ट करती है) पर भारत में शायद सत्ता अंधी भी करती है और सहज तथ्य भी नहीं दिखाई देते यह इस चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी , उनकी भारतीय जनता पार्टी, लालबुझक्कड़ अध्यक्ष अमित शाह और मातृसंस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की चुनाव के समय की दो महीनों की गतिविधियों से समझा जा सकता है. 

साथ हीं यह देश व्यक्तित्व में किसी भी किस्म का “हल्कापन” अपने नेता में बर्दाश्त नहीं करता. विदेशी मूल की कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को दस साल सर-माथे पर रखा सिर्फ यह जानने के बाद की इस महिला में “प्रधानमंत्री पद” के प्रति भी कोई मोह नहीं है. यह त्याग चाहता है, घंटे-दर-घंटे, जलसा-दर-जलसा डिजाइनर कपडे पहनने वाला नेता नहीं.   

shuklapaksha

Saturday, 14 November 2015

टीपू का सही आंकलन तथ्यों को जानने के बाद भी नहीं


सहीं प्रतिमान न बनाने के पीछे अंग्रजों की साजिश, राजनीति और बाज़ार
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इतिहासकार बी डी पाण्डेय ने राज्य सभा के पटल पर २९, जुलाई, १९७७ को कुछ चौंकाने वाले तथ्य रखे. उन्होंने बताया कि मैसूर के शासक टीपू सुलतान के बारे में उत्तर भारत के सात राज्यों में बच्चों के पाठ्यक्रमों में एक पाठ है जिसमें गलत तथ्य पढ़ाया जा रहा है. पाठ के अनुसार मैसूर के ३००० ब्राह्मणों ने आत्म-हत्या कर ली क्योंकि शासक टीपू सुल्तान की तरफ से दबाव डाला जा रहा था कि वे इस्लाम धर्म अख्तियार करें. पाण्डेय ने बताया कि जब उन्होंने छान-बीन की तो पाया कि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था बल्कि इसके उल्टा टीपू १५६ मंदिरों के रखरखाव के लिए शाही-खजाने से हर माह रकम देता था, उसके सम्बन्ध तत्कालीन जगद्गुरु शंकराचार्य से बेहद मधुर थे और उसके राज्य के प्रधानमंत्री पुन्नैया और सेनापति कृष्णा राव ब्राह्मण थे. इस चौंकाने वाले तथ्य के बावजूद ना तो तत्कालीन सत्ताधारी जनसंघ ने, ना हीं विपक्षी कांग्रेस ने कोई मांग की कि इन हकीकत का पता लगाया जाये और बच्चों को सही तस्वीर दी जाये. तबसे लेकर आज तक ३८ साल बीत चुके हैं. कांग्रेस, वामपंथी दल, तीसरा मोर्चा,   भारतीय जनता पार्टी (जनसंघ का नया अवतार) कई बार शासन में आ चुके हैं लेकिन किसी ने तथ्यों को पता करने की ज़रुरत नहीं समझी. लेकिन अचानक टीपू को लेकर देश के दोनों राष्ट्रीय दलों में इस शासक के मरने के २१६ साल बाद तलवारें खिंच गयी हैं. शायद राजनीति में हकीकत या वैज्ञानिक सोच से ज्यादा भावना मदद करती है.
       
पाण्डेय जो कि इतिहासकार-प्रोफेसर होने के अलावा सांसद और ओड़िसा के राज्यपाल भी रह चुके थे सदन में बताया कि जब उन्होंने बच्चों के पाठ्यक्रम में देखा कि टीपू को ३००० ब्राह्मणों की आत्महत्या का कारण बताया जा रहा है तो उन्होंने उस लेख के लेखक का पता जाना. लेखक थे कलकत्ता विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के विभागाध्यक्ष, महामहोपाध्याय हर प्रसाद शास्त्री. प्रोफेसर पाण्डेय ने मैसूर विश्वविद्यालय के इतिहास के विभागाध्यक्ष और जाने-माने इतिहासकार प्रोफेसर श्रीकान्तिया को पत्र लिख कर तथ्य जानना चाहा. श्रीकान्तिया का जवाब था “समूचे मैसूर गजेटियर में कहीं भी इस घटना का उल्लेख नहीं है कि टीपू के दबाव के चलते हजारों ब्राह्मणों ने आत्महत्या की”. उन्होंने यह भी लिखा कि “इतिहास के विद्यार्थी के रूप में उनकी व्यक्तिगत जानकारी भी है कि ऐसे कोई घटना नहीं हुई थी”. इसके बाद प्रोफेसर पाण्डेय ने पाठ के लेखक हर प्रसाद शास्त्री को पत्र लिख कर पूछा कि इस तथ्य का सोर्स क्या है. पत्र का जवाब नहीं आया. दोबारा एक पत्र भेजा गया लेकिन फिर भी कोई जवाब नहीं. तब प्रो. पाण्डेय ने कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर आशुतोष मुख़र्जी को पत्र लिख कर इस गलती के ओर ध्यान दिलाया. और तब जा कर सात राज्यों –उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, ओडिसा, पश्चिम बंगाल, राजस्थान और असम में पाठ्यक्रम से यह लेख हटाया गया.

प्रोफेसर पाण्डेय ने राज्य-सभा को यह भी बताया कि कुछ साल बाद उन्हें पता चला कि यह लेख फिर से उत्तर प्रदेश में कक्षा सात के पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया गया है.   

                      प्रतिमान बनाने की दूषित प्रक्रिया      
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प्रतिमान बनाना (आइकॉन-बिल्डिंग प्रोसेस) हर समाज के लिए अपरिहार्य, बेहद पवित्र और सबसे औचित्यपूर्ण प्रक्रिया है. प्रतिमान हमें उस समय मदद करता है जब समाज फिसलने लगता है मानवीय बुराइयों के कारण या बाजारू या अन्य ताकतों के दबाव में. तब ये प्रतिमान खूंटे की तरह काम करते हैं और समाज इन्हें पकड़ कर उस फिसलन से अपने को बचाता है. राम, कृष्ण, नानक, शिवाजी, राणाप्रताप, गाँधी, भगत सिंह , अशफाकुल्लाह खान, नेहरू और कलाम हमारे आइकॉन बने.

लेकिन भारत में हमने पिछले दो सौ साल से कुछ गलत आइकॉन बनाने का धंधा भी शुरू किया. इसके तीन मुख्य कारण हैं. पहला अंग्रेजों ने “राज” सुनिश्चित करने के लिए करीब १०० साल से ज्यादा गलत तथ्य पेश किये या सही तथ्य छुपाये. लिहाज़ा हम अपने प्रतिमानों का सही आंकलन नहीं कर पाए. दूसरा: आज हम राजनीति की वजह से गलत प्रतिमान खड़े कर रहे हैं. कोई “बापू” के हत्यारे नाथूराम गोडसे का मंदिर बनवा रहा है तो किसी सत्ताधारी दल को कर्णाटक में अचानक टीपू सुल्तान के जन्म-दिवस की याद आयी. कई बार यह भी कोशिश हो रही है है कि दूसरे के प्रतिमानों को अपना बना कर पेश करो याने “प्रतिमानों की चोरी”. तीसरा और सबसे खतरनाक है बाजारू ताकतों का जन-संचार माध्यमों का इस्तेमाल कर त्रुटिपूर्ण प्रतिमान बनाना या सही प्रतिमानों को दबाना. टीवी के मनोरंजन कार्यक्रम के किसी डांस शो का १३ वर्षीय युवा किशोरों के लिए आइकॉन बन जाता है पर एक रिक्शा चालक का बेटा (या बेटी) जो यो पी बोर्ड में टॉप करता है या आई आई टी की परीक्षा में (बगैर किसी महंगी कोचिंग के) शीर्ष के १०० बच्चों में होता है वह हमारे नौनिहालों का प्रतिमान नहीं बन पाता. बाज़ार यह समझता है कि समाज अगर गंभीर चिंतन करेगा तो १० रुपये किलो का आलू ब्रांडेड चिप्स के नाम पर ५०० रुपये किलो दे कर नहीं खरीदेगा इसलिए समाज का आइकॉन डांस करने वाले को तो बनाओ पर रिक्शा चालक के बोर्ड टापर बच्चे को नहीं.

अंग्रेजों की साजिश के कुछ नमूने. भारत में आधुनिक शिक्षा के जनक लार्ड मैकाले के साथ हीं एक साजिश शुरू होती है युवाओं में बौद्धिक स्तर पर एक खास किस्म की “परजीवी” मानसिकता लेन की जिसे १८५७ के ग़दर के बाद हिन्दू-मुसलामन विभेद की रूप में विकसित किया गया. इसके लिए इतिहास लेखन में तथ्यों को या तो छुपाया गया गलत तथ्य दिए गए. 

ब्रिटेन का तत्कालीन विदेश मंत्री वुड भारत के गवर्नर जनरल एल्गिन को १९६२ में लिखता है, “भारत में हम अपनी प्रभुता मात्र इसलिए बनाये रहे कि हमने दो सम्प्रदायों को एक-दूसरे के खिलाफ करने में सफलता हासिल की. आप इसे आगे बढाने के लिए जो भी संभव हो करते रहें ताकि दोनों इकठ्ठा न हो सकें.”

इसके बाद २६ मई, १८८६ को विदेशमंत्री हैमिलटन भारत में लार्ड कर्ज़न को लिखता है “पश्चिमी शिक्षा उदारवाद और स्वतंत्र चिंतन को जन्म देती है. यह खतरनाक है. अगर हिंदुस्तान में हमें अपना शासन बनाये रखना है तो शिक्षण पाठ्यक्रमों में ऐसे तत्व डाले जाये जो दोनों सम्प्रदायों के बीच की खाई को बाधा सकें”. एक साल के अन्दर हीं  १४ जनवरी, १८८७ को विदेश मंत्री क्रोस का पत्र डफरिन को आता है और पाठ्यक्रमों में बदलाव से दोनों के बीच खाइयाँ बढ़ी हैं और यह हमारे हित में है. हमें अच्छे परिणाम की उम्मीद है”.       


कर्णाटक की कांग्रेस सरकार को टीपू सुल्तान को आइकॉन बनाने की याद इस शासक के मरने के २१६ साल बाद आयी. लेकिन इसी कांग्रेस के शासन काल में दशकों तक उत्तर भारत के आधा दर्ज़न से अधिक राज्यों में बच्चों के पाठ्यक्रमों में बताया जाता रहा कि मैसूर में इस शासक के हिन्दुओं के धर्म-परिवर्तन के लिए दबाव के कारण ३००० ब्राह्मणों ने आत्महत्या की. यह तथ्य आजतक ना तो किसी ने जांच करने की कोशिश की कि हकीकत क्या थी. हिन्दुओं के उग्र भाव को कुरेदने के लिए विश्व हिन्दू परिषद् इसका विरोध करने के लिए कर्णाटक बंद करा रहा है और एक अन्य संगठन नाथू राम गोदे का मंदिर तो “धर्म-निर्पेक्ष” वर्ग इसे स्वतंत्रतता की दुहाई दे रहा है.

lokmat 

Sunday, 8 November 2015

बिहार के नतीज़े भाजपा के लिए फिर चेतावनी

इसमें कोई दो राय नहीं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को विकास की पूरी समझ है. उनकी मेक इन इंडिया और स्किल इंडिया जैसी योजनाएं देश की तकदीर बदल सकती हैं. मुश्किल यह है कि बीच-बीच में उनकी पार्टी सदियों पीछे चली जाती है, पार्टी के नेता लव जिहाद, घर वापसी जैसे मुद्दे उठाने लगते हैं. देश के मुसलमानों को पाकिस्तान भेजे जाने की बातें होने लगती हैं. इस तरह के बयानों पर कोई रोक भी नहीं लगाई जाती. ऐसे भड.काऊ बयान देने वाले पार्टी के एक भी महंत या साध्वी पर भाजपा ने कार्रवाई की होती तो आज उसे बिहार में यह दिन देखने की नौबत नहीं आती. 
बिहार चुनाव में बैकवर्ड कंसॉलिडेशन ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो कि शुभ लक्षण नहीं है. निश्‍चित तौर पर लालू प्रसाद यादव जातिवादी राजनीति करने में माहिर हैं, वर्ना कौन सोच सकता था कि कुर्मी और यादव एक साथ आ जाएंगे? लेकिन अगर नीतीश कुमार ने जातिवादी राजनीति की तो भाजपा भी तो जीतन राम मांझी को अपने साथ ले आई? इसलिए वह इसका ठीकरा दूसरों के सिर नहीं फोड. सकती. 
ऐसा लगता है कि भाजपा ने सिर्फ आर्थिक विकास को ही सब कुछ समझ लिया, जबकि सोशल जस्टिस भी विकास का एक रास्ता है. भाजपा को बिहार चुनावों में आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत के आरक्षण संबंधी बयान ने भी नुकसान पहुंचाया. हालांकि भागवत के बयान का आशय यह नहीं था कि आरक्षण व्यवस्था को खत्म कर दिया जाए, बल्कि ऐसे जरूरतमंद लोगों को भी आरक्षण का लाभ दिया जाए जिन्हें नहीं मिल रहा है. लेकिन चुनावों के कई दिन पहले दिए गए उनके बयान का वास्तविक आशय भाजपा चुनाव के आखिरी दिन तक स्पष्ट नहीं कर सकी, जिसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ा है. 
बिहार चुनाव के इन परिणामों का एक नतीजा यह होगा कि थर्ड फोर्सेस और कांग्रेस अब नीतीश कुमार के नेतृत्व में मिलकर देश भर में भाजपा का एक मजबूत विकल्प देने की कोशिश करेंगी. हालांकि भाजपा के लिए दरवाजे अभी भी बंद नहीं हुए हैं. नरेंद्र मोदी अगर अपनी पॉलिसी को बदल लें, विकास के जिस वादे के बल पर वे सत्ता में आए हैं, उस पर ही अपना ध्यान केंद्रित करें और अपनी पार्टी के कट्टरपंथी तत्वों द्वारा बीच-बीच में दिए जाने वाले उत्तेजक भाषणों पर अंकुश लगा सकें तो अभी भी वे देश को विकास के पथ पर आगे ले जा सकते हैं और अपनी पार्टी का भविष्य भी उज्ज्वल बना सकते हैं.
लेकिन यह तो तय है कि सांप्रदायिकता की राजनीति अब देश में चल नहीं सकती. दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद बिहार चुनाव के नतीजों ने दूसरी बार साबित कर दिया है कि जनता सिर्फ विकास चाहती है, विकास से इतर कोई भी राजनीति उसे स्वीकार्य नहीं है। विधानसभा के चुनाव परिणाम केंद्र की भाजपा सरकार के लिए दूसरी चेतावनी हैं. पहली चेतावनी दिल्ली विधानसभा के चुनावों में मिली थी, जिसे वह समझ नहीं पाई.

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