Sunday, 2 November 2014

सवालों के घेरे में मंशा




प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक बार फिर अपने को जनता के संदेह के घेरे से ऊपर कर लिया। "मन की बात" के दूसरे प्रसारण में यह बताते हुए कि विदेशों में जमा कालाधन गरीबों का पैसा है और उसे वापस देश में लाना "मेरे लिए आर्टिकल ऑफ फेथ" है। कालेधन को लेकर सरकार के रवैये पर जो शंका पैदा हुई थी, वह एक बार फिर जाती रही। जनता भावुक है और विश्वास भी करती है लेकिन इसकी भी मियाद होती है। देखना है कि इसे कार्यरूप कब और कैसे दिया जाता है। 

जरूरत है "सफाई आंदोलन" की 
एक सवाल आज भी अतिशय भावातिरेक में जनता भले ही ना पूछ रही हो पर वह सवाल मन के कोने में बना है। काले धन का मात्र 10 प्रतिशत ही विदेश में है पर बाकी 90 प्रतिशत जो देश में पैदा होता है और पूरी अर्थव्यवस्था को दीमक की तरह चाट रहा है उसका क्या? मोदी जी के मन से यह भी उजागर होना चाहिए था कि देश के सकल घरेलू उत्पाद को जो आधे से ज्यादा कालाधन के रूप में बदल जा रहा है उस पर क्या सरकार "सफाई आन्दोलन" की ही तरह कोई ठोस कदम उठाएगी? 

बड़ी जद्दोजहद के बाद सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कालाधन खाताधारकों के नाम तो दिए पर शपथ पत्र में यह भी कहा था कि अगर नाम जनता में आए तो बाहरी देश वादाखिलाफी का आरोप लगाएंगे। 

पर गौर से देखें तो हकीकत इसके उलट है। अमरीकी कोर्ट में जब यही तर्क यूबीएस बैंक ने दिया तो न केवल अदालत ने इस तर्क की धज्जी उड़ा दीं बल्कि उस पर फाइन भी ठोक दिया था। आज सरकार की नैतिक जिम्मेदारी आम आदमी के प्रति ज्यादा है या किसी कागज के टुकड़े के प्रति, जिसमें उसने कुछ करार तमाम देशों से किए थे?

अगर अन्य देश ऎसे करार को तोड़कर इन बैंकों के रवैये को पटरी पर ला रहे हैं तो भारत सरकार इतना क्यों हिचक रही है। कालेधन पर सरकार को शुरू से ही आंदोलनरत रवैया अख्तियार करना चाहिए था, जो कि अभी नजर नहीं आया। सरकार की ओर से किया गया करार बाहर जमा हुए सफेद धन को लेकर था न कि कालेधन पर।

कालाधन तो इसकी जद में आता ही नहीं है, क्योंकि यह तो स्वत: ही अपराध की श््रेणी में आता है। लिहाजा जरूरत इस बात की थी कि एसआईटी शुरू से ही चार महीने में न केवल 627 नामों पर बल्कि उन तमाम लोगों पर, जिन पर शक है, एक कार्रवाई शुरू करती, जो कि अभी तक नहीं हो रही है। 

...तो होते सात गुना अमीर
अगर भारत में काले धन पर अंकुश पिछले 45 वषोंü से लगाया गया होता तो यहां रहने वाला हर व्यक्ति सात गुणा अमीर होता। कहना न होगा कि गरीबी का यह विदू्रप चेहरा दिखाई नहीं देता। आज स्थिति यह है कि हर रोज जब एक गरीब रात में सोने जाता है तो कोई 15 रूपए जो उसके विकास में खर्च किया जा सकता था, कालेधन के रूप में विदेशी बैंकों में गुप्त रूप से जा चुका होता है। 

स्थिति की भयावहता इस बात से जानी जा सकती है कि 1955-56 में, अर्थशास्त्री कारीडोर के अनुसार देश में कालाधन मात्र 4 से 5 प्रतिशत था, जो 1970 में वांगचू समिति के आकलन के अनुसार 07 प्रतिशत हो गया। 

बात यहीं नहीं रूकी और 1980-81 मे नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस के अनुसार यह प्रतिशत 18 से 20 हो गया। अनुमान है कि आज देश की जीडीपी का 50 प्रतिशत कालेधन के रूप में परिवर्तित होने लगा है।

मोदी के वादे पर सवाल
विदेशों में छिपाया काला धन लाने के मुद्दे पर पहली बार केंद्र सरकार की मंशा पर अंगुली उठने लगी है और इसकी आंच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक पहुंच सकती है। वित्तमंत्री अरूण जेटली का तर्क लोगों को रास नहीं आ रहा है। 

उदाहरण के लिए स्विट्जरलैण्ड के साथ जिस डीटीएए (डायरेक्ट टैक्स अवॉयडेंस एग्रीमेंट) के अनुच्छेद 24 की बात कहकर जेटली मोदी सरकार को भी पूर्ववर्ती यूपीए सरकार के समकक्ष खड़ा कर रहे हैं और मोदी के प्रति जनता के मन में शंका उत्पन्न होने लगी है वह एक गलत तर्क है। 72 लोगों में 17 ऎसे लोग हैं, जिन पर पहले से ही मुकदमे की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और उनके नाम उजागर करने में कोई अड़चन नहीं है। 

साथ ही बाकी के 55 लोगों पर तत्काल मुकदमें की प्रक्रिया शुरू करके इस अनुच्छेद के प्रावधानों को निरस्त किया जा सकता है, क्योंकि इसी अनुच्छेद के पैरा (2) में जननीति के तहत अगर किसी व्यक्ति पर मुकदमे की प्रक्रिया शुरू हो गई है तो उसका नाम उजागर किया जा सकता है। पर क्या हुआ नरेन्द्र मोदी का 100 दिन में कालेधन को विदेश से वापस लाने के वादे का? क्या यह अनुच्छेद उस समय नहीं था, जब यह वादा किया गया था? 

आखिर इसे कैसे रोकेंगे 
जनता ने वोट मोदी को दिया है लिहाजा आज सवाल भी उन्हीं से पूछे जाएंगे। आज मुद्दा सिर्फ इतना ही नहीं है कि कालाधन वापस कैसे लाएं? असली मुद्दा यह है कि आज से इसको रोका कैसे जाए और इसके लिए क्या-क्या कदम उठाए जाएं। जब सरकार पुराना कालाधन वापस लाने में ही अपेक्षित दिलचस्पी नहीं ले रही है तो वर्तमान कर ढांचे को सख्त बनाने में कितना सक्रिय होगी यह देखना अभी बाकी है।

सर्वोच्च न्यायालय में जो बेचारगी का भाव से सरकार ने दिखाया है उसने शायद इस "अभियान" को एक बड़ी क्षति पहुंचाई है। इस हलफनामे के बाद जब कभी भारत की सरकार विदेशी बैंकों से नाम या जमा धन राशि के आंकड़े मांगेगी तो उसका जवाब एक ही होगा - "आपने स्वयं ही अपने सर्वोच्च न्यायलय में इस अनुबंध के प्रावधान का उल्लेख करते हुए कहा है कि नाम उजागर नहीं किए जा सकते तो हमसे यह क्यों मांग रहे हैं?" प्रधानमंत्री के महज यह कहने से कि "न खाऊंगा न खाने दूंगा" जनता हफ्ते-दो हफ्ते तो खुश नजर आएगी पर उसके बाद परिणाम के बारे में भी पूछना शुरू करेगी।

पर उम्मीद मोदी से ही है
देश के अधिकांश बुद्धिजीवियों से लेकर सड़क पर खोमचा लगाने वाले तक को मोदी में एक ऎसा नेता दिखाई दे रहा है जो देश के भविष्य को बदल देगा। दशकों बाद किसी नेता के लिए यह भाव आया है अन्यथा देश "कोऊ नृप होहीं हमें का हानि" के मोड में चला गया था। इतिहास गवाह है एक नेता, उसके द्वारा विकसित सिस्टम या उसकी नीतियों ने पूरे समाज को नयी ऊंचाइयों पर पहुंचाया है। नेता में हमें भरोसा होना तो जरूरी है, पर इस भरोसे को हर क्षण तर्क पर भी कसा जाना चाहिए। 

patrika

Sunday, 26 October 2014

काला धन पर ढुलमुल रवैया से मोदी की छवि पर आंच


अगर भारत में काले धन पर अंकुश पिछले ४५ वर्षों से लगाया गया होता तो यहाँ रहने वाला हर व्यक्ति सात गुना अमीर होता याने भारत दुनिया के मध्य वर्ग आय समूह के देशों में होता उसकी आय $ १५०० से बढ़ कर $१०,५०० या लगभग ८० हज़ार रुपये से बढ़ कर ५.२५ लाख रुपये होती. कहना न होगा कि  गरीबी का यह विद्रूप चेहरा ना दिखाई देता. आज स्थिति यह है कि हर रोज जब एक गरीब रात में सोने जाता है तो कोई १५ रुपया जो उसके विकास में खर्च किया जा सकता था , काले धन के रूप में विदेशी बैंकों में गुप्त रूप से जा चुका होता है. एक अनुमान के अनुसार अगर काले धन पर अंकुश लगा होता तो देश के सकल घरेलू उत्पाद विकास दर (जी डी पी ग्रोथ रेट) हर साल पांच प्रतिशत ज्यादा होता.
स्थिति की भयावहता इस बात से जानी जा सकती है कि १९५५-५६ में , अर्थशास्त्री कारीडोर के अनुसार देश में काला धन मात्र ४ से ५ प्रतिशत था जो १९७० में वांगचू समिति के आंकलन के अनुसार ७ प्रतिशत होगया. बात यहीं नहीं रुकी और सन १९८०-८१ मे नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ पब्लिक फाइनेंस के अनुसार यह प्रतिशत १८ से २० हो गया. जाने माने अर्थशास्त्री और काले धन पर विशेष अध्ययन करने वाले प्रोफेसर अरुण कुमार के अनुसार १९९५-९६ के आते आते देश की जी डी पी का ५० प्रतिशत काले धन के रूप में परिवर्तित होने लगा जो आज लगभग ६० प्रतिशत का आंकड़ा छूने लगा है. 
विदेशी बैंकों में इस काले धन का १० प्रतिशत जमा किया जाता है और एक आंकलन के अनुसार अब तक लगभग $२ ट्रिलियन (सवा करोड़ करोड़ रुपये) देश का काला धन विदेशी बैंकों में जमा हो चुका है.  
विदेशों में छिपाया काला धन लाने के मुद्दे पर पहली बार केंद्र सरकार की मंशा पर उंगली उठने लगी है. और इसकी आंच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक पहुँच सकती है. वित्तमंत्री अरुण जेटली का तर्क लोगों को रास नहीं आ रहा है. उदाहरण  के लिए स्विट्ज़रलैंड के साथ जिस डी टी ए ए  (डायरेक्ट टैक्स अवोय्ड़ेंस अग्रीमेंट ) के अनुच्छेद २४ की बात कह कर वित्त मंत्री अरुण जेटली मोदी सरकार को भी पूर्ववर्ती यू पी ए सरकार के समकक्ष खड़ा कर रहे हैं और मोदी के प्रति जनता के मन में शंका उत्पन्न होने लगी है वह एक गलत तर्क है. ७२ लोगों में १७ ऐसे लोग हैं जिन पर पहले से हीं मुकदमे की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. और उनके नाम उजागर करने में कोई अड़चन नहीं है. साथ हीं बाकी के ५५ लोगों पर तत्काल मुकदमें की प्रक्रिया शुरू करके इस अनुच्छेद के प्रावधानों को निरस्त किया जा सकता है. क्योंकि इसी अनुच्छेद के पैरा (२) में जननीति के तहत अगर किसी व्यक्ति पर मुकदमें की प्रक्रिया शुरू हो गयी है तो उसका नाम उजागर किया जा सकता है.
क्या हुआ नरेन्द्र मोदी का १०० दिन में काले धन को विदेश से वापस लेन का वादा? क्या यह अनुच्छेद उस समय नहीं था जब यह वादा किया गया था? क्या जब इसी आधार पर भारतीय जनता पार्टी यू पी ए सरकार को कोस रही थी तो यह अनुच्छेद नहीं पढ़ा गया था.
जनता ने वोट मोदी को दिया है लिहाज़ा आज सवाल भी उन्हीं से पूछे जायेंगे. आज मुद्दा सिर्फ इतना हीं नहीं है कि काला धन वापस कैसे हो. कैसे इसे सफ़ेद कर के उत्पादन में लगाया जाये ताकि देश में अंतर –संरचनात्मक विकास हो, रोजगार बड़े. असली मुद्दा यह है कि आज से इसको रोका कैसे जाये और इसके लिए क्या-क्या कदम उठाये जाये. जब सरकार पुराना कला धन वापस लाने में हीं अपेक्षित दिलचस्पी नहीं ले रही है तो वर्तमान कर ढांचे को सख्त बनाने में कितना सक्रीय होगी यह देखना अभी बाकी है.
सर्वोच्च न्यायालय में जिस बेचारगी के भाव से सरकार ने हलफनामा दायर करते हुए कहा कि दोहरे कर तलने सम्बन्धी समझौते के तहत उसके हाथ बंधे हुए हैं उसने शायद इस अभियान को (अगर यह अभियान का स्वरुप लेता भी है) एक बड़ी क्षति पहुंचाई है. इस हलफनामे के बाद जब कभी भारत की सरकार विदेशी बैंकों से नाम या जमा धन राशि के आंकड़े मांगेगी तो उसका जवाब एक हीं होगा “आपने स्वय हीं अपने सर्वोच्च न्यायलय में इस अनुबंध के प्रावधान को उधृत करते हुए कहा है कि नाम उजागर नहीं किये जा सकते लिहाज़ा हमसे यह क्यों मांग रहे है”?
इस पूरी प्रक्रिया में देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की छवि पर आंच आयी है भले हीं उन्हें “प्रतीक” की राजनीति में मिलाती सफलता के कारण इसका भान न हो. करप्शन और काले धन पर पहले दिन से हीं एक जबरदस्त अभियान शुरू होना चाहिए था ताकि जन-अपेक्षा और सरकार के प्रयास में एक तारतम्य दिखाई देता. लेकिन ऐसे पांच महीने बीतने के बाद भी नहीं दिखाई दिया बल्कि इसकी जगह एक बेचारगी का भाव नज़र आया. महज यह कहने से कि “न खाऊंगा न खाने दूंगा “ जनता हफ्ते-दो हफ्ते तो खुश नज़र आयेगी पर उसका बाद परिणाम के बारे में भी पूछना शुरू करेगी.
यह बात सही है कि आज देश के अधिकांश बुद्धिजीवियों से लेकर सड़क पर खोमचा लगाने वाले तक को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी में एक ऐसा नेता दिखाई दे रहा है जो देश के भविष्य को बदल देगा. बहुत दशकों की बाद किसी नेता के लिए यह भाव आया है अन्यथा देश “कोऊ नृप होहीं हमें का हानि” के मोड में चला गया था. इतिहास गवाह है एक नेता, उसके द्वारा विकसित सिस्टम या उसकी नीतियों ने पूरे समाज को नयी उंचाइयों पर पहुँचाया है. सम्राट अशोक, अकबर माओ, लेनिन, चे ग्वेरा, लूला उनमें से कुछ हैं. गाँधी भी अगर कुछ दिन और रहते तो भारत के विकास का मार्ग बदलना नेहरु की मजबूरी हो गयी होती. लिहाज़ा मोदी का पूरे उत्साह से अनुकरण करना देश की जनता के लिए एक मात्र विकल्प होगा. नेतृत्व को समुचित समय देना भी नेता की पूर्ण उपादेयता के लिए उतना हीं ज़रूरी है.
लेकिन विश्वास और अंध-विश्वास में अंतर होता है. जहाँ तर्क की सीमायें ख़त्म होती हैं वहीं से अंध-विश्वास की सीमा शुरू होती है. ईश्वर तर्कातीत है लिहाजा भक्ति में अंध-विश्वास लाज़मी है. “माम ही पार्थ व्यपाश्रित्य” या “सर्वधर्मान परित्यज्य” कह कर कृष्ण भगवान् ने अंध-विश्वास पर अपनी वैध्यता की मोहर गीता में लगा दी है. लेकिन मनुष्य पूर्ण नहीं है लिहाजा हम उसमें मात्र विश्वास करते है जो दिक्- काल-सापेक्ष होता है. मोदी में हमें भरोसा तो है पर यह भरोसा हर क्षण तर्क की कसौटी पर कसा जाना ज़रूरी है. इसके दो फायदे हैं. एक तो हमें यह समझने का मौका मिलता है कि हमारा अपने नेता का अनुसरण करना कितना ठीक है और कब तक ठीक है. दूसरा नेता को भी अधिनायकवादी होने से बचाता है और उसे सत्ता के समय-सिद्ध जाल में फंसने नहीं देता जिसे अंग्रेजी में “ट्रेपिंग्स ऑफ़ पॉवर” कहते हैं.   

prabhat khabar 

Saturday, 25 October 2014

चलिए मोदी, मीडिया को न्यूज़ वेंडर से प्रोमोट तो किया !



प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा एक एक तरफ़ा संवाद में (जो उनकी आदत है) मीडिया की तारीफ करना वह भी मीडिया के सामने एक सुखद परिवर्तन कहा जा सकता है. उनका मानना था कि सफाई अभियान हो या जनमत को सही दिशा में ले जाने का गुरुतर कार्य , मीडिया ने इसे बखूबी किया. हालाँकि मीडिया को किसी सर्टिफिकेट की ज़रुरत नहीं होती और अगर होती भी है तो वह उसके उस योगदान से जो प्रजातंत्र में गुणात्मक परिवर्तन के लिए उसने दिया. साथ हीं यह माना जाता है कि अगर मीडिया पर  हर राजनीतिक पार्टी “बायस्ड” होने का आरोप लगती है तो इसका मतलब होता है कि मीडिया अपना काम सही कर रही है. पर फिर भी मोदी ऐसे बृहद जन स्वीकार्यता वाले नेता से यह टिपण्णी अच्छी लगी.
पांच महीने पहले तक या प्रधानमंत्री बनने के बाद भी अपने भाषणों में नरेन्द्र मोदी का औपचारिक मीडिया को लेकर एक हिकारत का भाव था. उनका कहना था कि मीडिया का एक बड़ा वर्ग है जो न्यूज़ वेंडर है. वेंडर माने छोटी दुकान या ठेले पर माल बेंचने वाला. सत्ता में आने के बाद यह भाव शायद और गहराया और उन्होंने औपचारिक मीडिया और सरकार के बीच अंतर्क्रिया की सभी संस्थाओं या प्रक्रियाओं को लगभग ख़त्म कर दिया था. मंत्रियों को मीडिया से बचने का सन्देश था,  पत्र सूचना कार्यालय पंगु हो चुकी है , प्रधानमंत्री कार्यालय मीडिया के साथ कोई संवाद नहीं करता , विदेश दौरों पर मीडिया को साथ ले जाने की विश्व में प्रचलित परम्परा को मोदी जी के आने के बाद बंद कर दिया गया. सब कुछ “वन वे ट्रैफिक” के तरह ट्विटर पर दिया जाने लगा. प्रेस ब्रीफिंग की सर्व-मानी संस्था नदारत रही. मोदी ने इंटरव्यू भी दिया प्रधानमंत्री बनाने की बाद तो विदेशी पत्रकारों को .
मोदी जी भले हीं मीडिया को न्यूज़ वेंडर मानते रहे हों लेकिन मीडिया ने अद्भुत समझदारी का परिचय देते हुए जन-अपेक्षाओं के अनुरूप मोदी का यथोचित कवरेज किया जैसे अन्ना हजारे का किया था भ्रष्टाचार के आन्दोलन के दौरान. भारत की मीडिया शायद विश्व के किसी भी मीडिया से इन मायनों में ज्यादा परिपक्व रही. अन्ना हजारे के कवरेज को लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का आरोप था कि आन्दोलन मात्र “मीडिया क्रिएशन” है. लेकिन उन्हीं दिनों मीडिया ने कांग्रेस नेता राहुल गाँधी का भट्टा पारसोल (गौतमबुद्ध नगर) का किसान आन्दोलन भी दिखाया. यह अलग बात है कि अन्ना के आन्दोलन में भीड़ बढ़ती गयी पर राहुल के आन्दोलन में ऐसा नहीं हो पाया. यह जनता का फैसला था मीडिया ने तो अन्ना और राहुल गाँधी के कवरेज कोई फर्क नहीं किया.
 मोदी का साथ ऐसा हीं हुआ. मोदी के लगातार मीडिया के प्रति हिकारत के भाव के बावजूद अपमान सह कर भी कवरेज किया जाता रहा.
शायद यही कारण है कि आज मोदी को यह मानना पड़ा कि मीडिया ने जब भी स्थिति समाज को बेहतर बनाने की रही अपना काम बगैर किसी दुराग्रह के किया. आज भी मोदी शायद इस बात को मानेगे कि जनमत और मीडिया कवरेज में अन्योंयाश्रितता का रिश्ता है. जनता ने मोदी में अपनी आकांक्षाओं की पूर्ति देखी . मीडिया ने उसे विस्तार से दिखाया (यह अलग बात है मानव से बनी यह संस्था थोड़ी बहुत कम ज्यादा मुतासिर होने का भाव रख सकती है) . जनमत और बृहद हुआ. मोदी का परचम देश की सीमाओं से बहार चला गया सात समुन्दर पार अमरीका तक.
लेकिन मीडिया को ना तो मोदी की प्रशंसा से अतिरेक में जाने की ज़रुरत है ना हीं उनके नज़रंदाज़ करने के भाव से उनके प्रति दुराव रखने की. यह हकीकत है आज भी जब मोदी मीडिया से मुखातिब हुआ तो प्रक्रिया “वन वे ट्रैफिक “ वाली हीं थी. उन्होंने मीडिया को संबोधित किया, मीडिया ने सुना , उन्होंने तारीफ की , मीडिया खुश हुई , वह उठके आये , मीडिया खडी हो गयी उन्होंने ने हाथ मिलाया , मीडिया की नयी पीढी को लगा ईश्वर स्वयं आ गया है. इसमें ना दो सवाल –जवाब का स्कोप था ना हीं दो-तरफ़ा संवाद.
संभव है मीडिया कुछ दोनों तक इसे मोदी की विनम्रता की संज्ञा दे पर इसे सम्मान्यारूप से लेकर अपना काम करना होगा. मोदी सफाई अभियान चलायें तो ज़रूर मीडिया जन-चेतना जगाये पर साथ यह भी पूछती रहे कि काला धन पर क्या नीति है. यह भी पूछते रहना होगा कि भ्रष्टाचार पर अंकुश कब “न खायेंगे ना खाने देंगे” के सुखद अभिव्यक्ति से आगे कार्यरूप में बदलेगा और कब रेलवे रिजर्वेशन में धांधली ख़त्म होगी. १५० दिन काफी होते हैं इन दो मुद्दों पर एक्शन लेने के लिए. यह कोई पालिसी प्लानिंग नहीं है , इसमें सिर्फ राज्येछा की दरकार है.

शायद मीडिया का ऐसा करना मोदी जी उसी भाव से लेंगे जो भाव उन्होंने आज मीडिया की तारीफ कर के दिखाई है.

lokmat 

Sunday, 19 October 2014

पूरा लाभ नहीं उठा पाई भाजपा





बदलाव की लहर और मोदी की सुनामी दोनों एक ही चीज हैं। कांग्रेस इतनी कमजोर नहीं होती तो मोदी इतने मजबूत नहीं होते। जनता बदलाव  इसीलिए चाहती थी क्योंकि वह कांग्रेस सरकारों के प्रदर्शन से बहुत निराश थी। मोदी ने जनता को विकल्प दिया। हां, अगर भाजपा का नेतृत्व मोदी जैसे सशक्त व्यक्तित्व के पास नहीं होता तो जरूर स्थिति अलग होती। 
मोदी ने इन चुनावों में एक कैलकुलेटिड जोखिम लिया था। महाराष्ट्र में उन्हें इसका वैसे फायदा नहीं मिला जैसी की अपेक्षा की थी। यद्यपि चुनावों में भाजपा का वोट प्रतिशत दो गुना होकर 28 प्रतिशत हो गया है। यह भारी बढ़त है। यह भी साफ है कि यह जनादेश कांग्रेस-एनसीपी सरकार के खिलाफ है। एनसीपी को तो मोदी ने नेचुरली करप्ट पार्टी की संज्ञा तक दी थी। ऎसी पार्टी से मिलकर अब भाजपा सरकार कैसे बना सकती है जिसे कि अभी चार दिन पहले वोट नहीं देने की अपील कर रहे थे? इसी तरह शिवसेना को भाजपा ने हफ्ता वसूल करने वाली पार्टी कहा है। शिवसेना ने भी भाजपा को खूब बुरा-भला कहा है। 

ऎसी स्थिति में बड़ा सवाल यह है कि भाजपा के लिए एनसीपी या शिवसेना के साथ मिलकर सरकार बनाना क्या जनता के साथ धोखा करना नहीं होगा? इसलिए एक विकल्प तो यह हो सकता है वह एनसीपी के बाहर से समर्थन के साथ सरकार बनाए। दूसरा विकल्प शिवसेना के साथ सरकार बनाने का है। पर इसमें शिवसेना का फायदा अधिक है भाजपा का कम। 

rajsthan patrika

Sunday, 12 October 2014

मोदी के अद्भुत प्रयोग की सफलता की शर्तें



विश्व के प्रजातान्त्रिक देशों के इतिहास में यह पहली बार होगा कि धुर राजनीतिक फॉर्मेट के बाड़े को लांघ कर कोई नेता समाज-सुधार की दुनिया में घुसे. गाहे-बी-गाहे बाहर के कुछ राष्ट्राध्यक्षों ने या भारत में कुछ प्रधानमंत्रियों ने कभी अगर यह कोशिश की भी तो जनता ने उसे रिसीव नहीं किया. गाँधी का प्रयोग पहला ऐसा प्रयोग था पर आखिर तक आते-आते उन्हें भी मायूसी हाथ लगी और राजनीतिक स्थितियां उनके हाथ से निकलने लगीं.
भारत के प्रधामं मंत्री नरेन्द्र मोदी ने यह प्रयोग शुरू किया है. पहले लाल किले की प्राचीर से अपने पहले उद्बोधन में बलात्कार की चर्चा में अभिभावकों को यह बता कर कि वे लड़की अगर शाम  को कहीं घर से बाहर जाती है तो दस बार पूछते हैं लेकिन लड़का बाहर जाता है तो नहीं पूछते. याने लड़कों को  अभिभावकीय नियंत्रण की वही बंदिशें नहीं झेलनी पड़ती जो लड़कियों को. दूसरी बार आकाशवाणी से जनता को संबोधित करते हुए उन्होंने “एक राजा था” नुमा दो कहानियों के जरिये जिसमें उन्होंने जनता से अपना आत्म बल को पहचानने और क्रियात्मक होने (आगे बदने ) का भाव दर्शाने को कहा था. सफाई को जनांदोलन का स्वरुप देने का शासकीय उपक्रम भी ऐसा हीं प्रयोग था. ये तीनों कार्य समाज सुधार के परिक्षेत्र में आते हैं. अगर मोदी अपने इस प्रयोग में सफल रहते हैं तो पूरे विश्व प्रजातंत्र के लिए यह एक नया आयाम खोलेगा. और जनता की अपेक्षा राजनेताओं से बढ़ जायेगी. उस राजनेता की व्यक्तिगत सुचिता और सामाजिक सोच की गुणवत्ता जन –स्वीकार्यता बढ़ने में महती भूमिका निभाने लगती है. पूरे राजनीतिक संवाद का धरातल बदल जाएगा , “पैराडाइम शिफ्ट” होगा.
आखिर मोदी को इस समाज सुधारक के फॉर्मेट में घुसने की ज़रुरत क्यों पडी? समाज सुधार का कार्य अलग संस्थाएं करती हैं. धार्मिक संस्थाएं भी कई बार इसमें अपनी भूमिका निभाती हैं. गाँधी के बाद पिछले ६५ सालों से इस देश में सामाजिक नेतृत्व में जबरदस्त शून्यता पायी गयी. एक भी सर्व-मान्य , सार्वभौमिक जन-स्वीकार्यता वाला समाज सुधारक भारत में पैदा नहीं हुआ. धार्मिक संस्थाएं अपनी विश्वसनीयता खोती चली गयी. शंकराचार्य की संस्था से लेकर तमाम शक्तिशाली और उच्च प्रतिबद्धता वाली सस्थाएं देश के चारित्रिक निर्माण में अपनी सार्थक भूमिका निभाने का उपक्रम नहीं कर सकीं. अब कोई राजाराम मोहन राय या दयानंद सरस्वती पैदा नहीं हो पा रहा है और अगर है भी तो उसके विश्वसनीयता का घोर संकट है. गाँधी के बाद से शायद वह कारखाना बंद हो गया जिसमे समाज-सुधारक पैदा होते थे.

क्या कारण है कि एक हीं व्यक्ति ये दोनों कार्य ---राजनीति और समाज सुधार—एक साथ नहीं कर सका है जिसकी वजह से मोदी का प्रयास अनूठा लेकिन दुरूह माना जा रहा है और इसकी सफलता पर प्रश्न चिन्ह लग रहे हैं? मनीषियों ने बताया है कि याचना में शक्ति नहीं होती. दाता उसी को देता है जिसमें दैन्य भाव देख कर वह अभिभूत होता है. दरअसल, प्रजातंत्र में चुनाव एक अहम् प्रक्रिया है. नेता चाहे कितना भी बड़ा हो याचक की तरह जनता से वोट की भीख माँगता है. भीख कभी एक हीं जगह से ज्यादा मिल जाती है तो याचक तृप्त हो जाता है और उसे दर- दर नहीं जाना पड़ता. कालांतर में उस भिखारी नेता और इस ज्यादा देने वाले दाता के बीच एक अप्रगट समझौता हो जाता है. जब बहुत वर्ष बीत जाते हैं तो दाता भी याचक में दैन्य भाव देखने का शौक पाल लेता है. राजनीति में एक प्रक्रिया शुरू होती है जिसमें जो दाता के सामने जितना दैन्य भाव दिखता है (झूठे वादे करना, एक दाता वर्ग को पहचान-समूह के आधार पर दूसरे पहचान-समूह से अधिक तरजीह देना) इसी क्रम में आते हैं. प्रजातंत्र जिसमें जन –सेवा व्यक्ति की बेहद समुन्नत सोच का प्रतिफल होना चाहिए था प्रोफेशनल याचना का भाव ले लेता है.  
मोदी की जन-स्वीकार्यता जबरदस्त है लेकिन वह राजनीतिक फॉर्मेट में है ना कि समाज सुधारक के रूप में. इस नेता में जनता ने सक्षम प्रशासक, कुशल विकासकर्ता, सुदृढ़ आतंकवादविरोधी राजनेता और भ्रष्टाचार के प्रति “शून्य –सहिष्णुता “ रखने वाला मुखिया देखा और उन्हें प्रधानमंत्री के पद पर पहुँचाया. लिहाज़ा मोदी के इस नए फॉर्मेट में याने समाज सुधारक की भूमिका में सफल होने की पहली शर्त यह होगी कि वह अपनी जन-स्वीकार्यता अक्षुण्ण रखें. अगर राजनेता के रूप में उनका परफार्मेंस जन -अपेक्षा से नीचे रह गया तो जनता को लगेगा कि वोट की भीख मांगने वाला यह याचक दैन्य भाव छोड़ कर दाता को हीं सही रस्ते पर आने की शिक्षा देने लगा. करीब ६५ साल पुराने दाता-याचक भाव के सम्बन्ध गड़बड़ाने लगेंगे.
तात्पर्य यह कि जहाँ भ्रष्टाचार रोकने के , महगाई कम करने के , मानव विकास सूचकांक पर देश को बेहतर करने के और देश को ताकतवर बनाने के उपक्रम तत्काल हीं करने होंगे या ऐसा करता हुआ दिखना होगा वहीं जनता के बीच सामाजिक बुराइयों के प्रति शून्य सहिष्णुता का भाव विकसित करना होगा. एक वर्ग आज १३५ दिन बाद पूछने लगा है कि हमने तो भेजा था महगाई कम करने या विकास को नयी गति देने के लिए , ये पलट कर हामी को लेक्चर दिया जा रहा है. उसका अहंकारी दाता भाव आहत हो रहा है. वह अपने अहंकार को आहट देख , खासकर वह वर्ग जो केंद्र सरकार में नौकरी कर रहा है और उसे सबसे ज्यादा यह बुरा लगा कि गाँधी जयंती की छुट्टी ख़राब हो गयी. लेकिन प्रधानमंत्री ऐसा लोगों को नज़रअंदाज कर सकते हैं और आगे बढ़ सकते हैं दोनों कार्यों को सम्पादित करने की दिशा में.

ऐसे में मोदी का प्रयास बेहद समीचीन है. लेकिन चूंकि मोदी राजनीतिक फॉर्मेट की उपज हैं उन्हें यह भी देखना होगा कि जनता का विश्वास उनकी राजनीतिक सार्थकता पर आधारित है लिहाज़ा राज नेता के रूप में वह जनता की अपेक्षाओं को भी उतना हीं मुकम्मल करें जिस शिद्दत से वह छोटी-छोटी सामाजिक बुराइयों को दूर करने का प्रयास कर रहे हैं. राजनीतिक सार्थकता की कीमत पर समाज सुधार का कार्य आगे नहीं बढ़ सकता. नेहरु के बाद शायद मोदी पहले व्यक्ति होंगे जिन्हें इस तरह का जन-विश्वास हासिल है. नेहरु के प्रति इस विश्वास का कारण स्वतन्त्रता आन्दोलन था लेकिन मोदी के प्रति उपजा विश्वास अनुत्पादक और शोषक सिस्टम के मरुस्थल में एक जलाशय की तरह है. मोदी के  अद्भुत प्रयोग की सफलता की शर्तें   
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विश्व के प्रजातान्त्रिक देशों के इतिहास में यह पहली बार होगा कि धुर राजनीतिक फॉर्मेट के बाड़े को लांघ कर कोई नेता समाज-सुधार की दुनिया में घुसे. गाहे-बी-गाहे बाहर के कुछ राष्ट्राध्यक्षों ने या भारत में कुछ प्रधानमंत्रियों ने कभी अगर यह कोशिश की भी तो जनता ने उसे रिसीव नहीं किया. गाँधी का प्रयोग पहला ऐसा प्रयोग था पर आखिर तक आते-आते उन्हें भी मायूसी हाथ लगी और राजनीतिक स्थितियां उनके हाथ से निकलने लगीं.
भारत के प्रधामं मंत्री नरेन्द्र मोदी ने यह प्रयोग शुरू किया है. पहले लाल किले की प्राचीर से अपने पहले उद्बोधन में बलात्कार की चर्चा में अभिभावकों को यह बता कर कि वे लड़की अगर शाम  को कहीं घर से बाहर जाती है तो दस बार पूछते हैं लेकिन लड़का बाहर जाता है तो नहीं पूछते. याने लड़कों को  अभिभावकीय नियंत्रण की वही बंदिशें नहीं झेलनी पड़ती जो लड़कियों को. दूसरी बार आकाशवाणी से जनता को संबोधित करते हुए उन्होंने “एक राजा था” नुमा दो कहानियों के जरिये जिसमें उन्होंने जनता से अपना आत्म बल को पहचानने और क्रियात्मक होने (आगे बदने ) का भाव दर्शाने को कहा था. सफाई को जनांदोलन का स्वरुप देने का शासकीय उपक्रम भी ऐसा हीं प्रयोग था. ये तीनों कार्य समाज सुधार के परिक्षेत्र में आते हैं. अगर मोदी अपने इस प्रयोग में सफल रहते हैं तो पूरे विश्व प्रजातंत्र के लिए यह एक नया आयाम खोलेगा. और जनता की अपेक्षा राजनेताओं से बढ़ जायेगी. उस राजनेता की व्यक्तिगत सुचिता और सामाजिक सोच की गुणवत्ता जन –स्वीकार्यता बढ़ने में महती भूमिका निभाने लगती है. पूरे राजनीतिक संवाद का धरातल बदल जाएगा , “पैराडाइम शिफ्ट” होगा.
आखिर मोदी को इस समाज सुधारक के फॉर्मेट में घुसने की ज़रुरत क्यों पडी? समाज सुधार का कार्य अलग संस्थाएं करती हैं. धार्मिक संस्थाएं भी कई बार इसमें अपनी भूमिका निभाती हैं. गाँधी के बाद पिछले ६५ सालों से इस देश में सामाजिक नेतृत्व में जबरदस्त शून्यता पायी गयी. एक भी सर्व-मान्य , सार्वभौमिक जन-स्वीकार्यता वाला समाज सुधारक भारत में पैदा नहीं हुआ. धार्मिक संस्थाएं अपनी विश्वसनीयता खोती चली गयी. शंकराचार्य की संस्था से लेकर तमाम शक्तिशाली और उच्च प्रतिबद्धता वाली सस्थाएं देश के चारित्रिक निर्माण में अपनी सार्थक भूमिका निभाने का उपक्रम नहीं कर सकीं. अब कोई राजाराम मोहन राय या दयानंद सरस्वती पैदा नहीं हो पा रहा है और अगर है भी तो उसके विश्वसनीयता का घोर संकट है. 

गाँधी के बाद से शायद वह कारखाना बंद हो गया जिसमे समाज-सुधारक पैदा होते थे.

क्या कारण है कि एक हीं व्यक्ति ये दोनों कार्य ---राजनीति और समाज सुधार—एक साथ नहीं कर सका है जिसकी वजह से मोदी का प्रयास अनूठा लेकिन दुरूह माना जा रहा है और इसकी सफलता पर प्रश्न चिन्ह लग रहे हैं? मनीषियों ने बताया है कि याचना में शक्ति नहीं होती. दाता उसी को देता है जिसमें दैन्य भाव देख कर वह अभिभूत होता है. दरअसल, प्रजातंत्र में चुनाव एक अहम् प्रक्रिया है. नेता चाहे कितना भी बड़ा हो याचक की तरह जनता से वोट की भीख माँगता है. भीख कभी एक हीं जगह से ज्यादा मिल जाती है तो याचक तृप्त हो जाता है और उसे दर- दर नहीं जाना पड़ता. कालांतर में उस भिखारी नेता और इस ज्यादा देने वाले दाता के बीच एक अप्रगट समझौता हो जाता है. जब बहुत वर्ष बीत जाते हैं तो दाता भी याचक में दैन्य भाव देखने का शौक पाल लेता है. राजनीति में एक प्रक्रिया शुरू होती है जिसमें जो दाता के सामने जितना दैन्य भाव दिखता है (झूठे वादे करना, एक दाता वर्ग को पहचान-समूह के आधार पर दूसरे पहचान-समूह से अधिक तरजीह देना) इसी क्रम में आते हैं. प्रजातंत्र जिसमें जन –सेवा व्यक्ति की बेहद समुन्नत सोच का प्रतिफल होना चाहिए था प्रोफेशनल याचना का भाव ले लेता है.  
मोदी की जन-स्वीकार्यता जबरदस्त है लेकिन वह राजनीतिक फॉर्मेट में है ना कि समाज सुधारक के रूप में. इस नेता में जनता ने सक्षम प्रशासक, कुशल विकासकर्ता, सुदृढ़ आतंकवादविरोधी राजनेता और भ्रष्टाचार के प्रति “शून्य –सहिष्णुता “ रखने वाला मुखिया देखा और उन्हें प्रधानमंत्री के पद पर पहुँचाया. लिहाज़ा मोदी के इस नए फॉर्मेट में याने समाज सुधारक की भूमिका में सफल होने की पहली शर्त यह होगी कि वह अपनी जन-स्वीकार्यता अक्षुण्ण रखें. अगर राजनेता के रूप में उनका परफार्मेंस जन -अपेक्षा से नीचे रह गया तो जनता को लगेगा कि वोट की भीख मांगने वाला यह याचक दैन्य भाव छोड़ कर दाता को हीं सही रस्ते पर आने की शिक्षा देने लगा. करीब ६५ साल पुराने दाता-याचक भाव के सम्बन्ध गड़बड़ाने लगेंगे.
तात्पर्य यह कि जहाँ भ्रष्टाचार रोकने के , महगाई कम करने के , मानव विकास सूचकांक पर देश को बेहतर करने के और देश को ताकतवर बनाने के उपक्रम तत्काल हीं करने होंगे या ऐसा करता हुआ दिखना होगा वहीं जनता के बीच सामाजिक बुराइयों के प्रति शून्य सहिष्णुता का भाव विकसित करना होगा. एक वर्ग आज १३५ दिन बाद पूछने लगा है कि हमने तो भेजा था महगाई कम करने या विकास को नयी गति देने के लिए , ये पलट कर हामी को लेक्चर दिया जा रहा है. उसका अहंकारी दाता भाव आहत हो रहा है. वह अपने अहंकार को आहट देख , खासकर वह वर्ग जो केंद्र सरकार में नौकरी कर रहा है और उसे सबसे ज्यादा यह बुरा लगा कि गाँधी जयंती की छुट्टी ख़राब हो गयी. लेकिन प्रधानमंत्री ऐसा लोगों को नज़रअंदाज कर सकते हैं और आगे बढ़ सकते हैं दोनों कार्यों को सम्पादित करने की दिशा में.

ऐसे में मोदी का प्रयास बेहद समीचीन है. लेकिन चूंकि मोदी राजनीतिक फॉर्मेट की उपज हैं उन्हें यह भी देखना होगा कि जनता का विश्वास उनकी राजनीतिक सार्थकता पर आधाawरित है लिहाज़ा राज नेता के रूप में वह जनता की अपेक्षाओं को भी उतना हीं मुकम्मल करें जिस शिद्दत से वह छोटी-छोटी सामाजिक बुराइयों को दूर करने का प्रयास कर रहे हैं. राजनीतिक सार्थकता की कीमत पर समाज सुधार का कार्य आगे नहीं बढ़ सकता. नेहरु के बाद शायद मोदी पहले व्यक्ति होंगे जिन्हें इस तरह का जन-विश्वास हासिल है. नेहरु के प्रति इस विश्वास का कारण स्वतन्त्रता आन्दोलन था लेकिन मोदी के प्रति उपजा विश्वास अनुत्पादक और शोषक सिस्टम के मरुस्थल में एक जलाशय की तरह है.  
lokmat

Tuesday, 2 September 2014

भाजपा में आडवाणी युग के अंत के मायने



आरम्भ और अंत एक शाश्वत प्रक्रिया है—“गीता के वासांसि जीर्णानि यथा विहाय” की तरह. यह व्यक्तियों के लिए भी होता है, समाज के लिए भी और संस्थाओं के लिए भी. भारतीय जनता पार्टी में आये बदलाव को शीर्ष पर मात्र एक व्यक्ति के आने और एक व्यक्ति के जाने के रूप में नहीं लिया जा सकता. प्रश्न यह है कि यह प्रसव पीड़ा इतनी तकलीफदेह क्यों है? अगर आडवाणी इस नए जन्म के अपरिहार्य शर्त  के रूप में किसी की अपरिहार्य मौत का अहसास एक साल पहले कर लेते और धीरे से अपने को दूर कर लेते तो ना तो यह प्रसव पीड़ा इतनी दुखदायी होती ना हीं मौत इतनी अगरिमामय और गुमनाम.  

भाजपा के संविधान के अनुच्छेद २५ में पार्टी के संसदीय बोर्ड को निर्बाध शक्तियां दी गयी हैं. यह १२-सदस्यीय संस्था वर्तमान हीं नहीं भविष्य की नीति और नीति-परिवर्तन कर सकती है. इस अनुच्छेद के अनुसार “बोर्ड को पार्टी द्वारा भविष्य में अपनायी जाने वाली नीतियों और नीति परिवर्तन के विषय में निर्णय लेने का अधिकार होगा”, याने बोर्ड के पास असीमित शक्तियां हैं. साथ हीं इसी अनुच्छेद में दो बार बोर्ड को मार्गदर्शक बताया गया है.

अब प्रश्न यह है कि अगर आडवाणी की मार्गदर्शक के रूप में उपादेयता है तो फिर वह इस बोर्ड में क्यों नहीं? बोर्ड से बड़ा मार्गदर्शक मंडल कौन हो सकता है? फिर बोर्ड को पार्टी के संविधान से शक्तियां मिली हैं जो कि नए पांच –सदस्यीय मार्गदर्शक मंडल को नहीं है. इसलिए भाजपा के लोगों का यह कहना कि “आडवाणी जी हमारे पिता के रूप में , परिवार के मुखिया की रूप में और दिशा देने वाले ध्रुव तारे के रूप में बने रहेंगे” आम लोगों की समझ को कम आंकना होगा. सभी समझ रहे हैं कि आडवाणी के दिन गए. मार्गदर्शक मंडल दरअसल बाँझ संस्था रहेगी. फिर भाजपा कितने मार्गदर्शक रखेगी? राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मातृ –संगठन के रूप में मार्ग दिखाती है , बोर्ड पार्टी के संविधान के अनुसार मार्गदर्शक है और एक पिटे-लुटे लोगों को ठिकाने लगाने की मानिंद पांच-सदस्यीय मार्गदर्शक मंडल बनाया गया है जिसमें अटल बिहारी वाजपेयी , आडवाणी . मुरली मनोहर जोशी हैं और साथ हीं प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी और राजनाथ सिंह भी.

लिहाज़ा यह बात स्वयं सिद्ध है कि मोदी को अभी भी मीडिया और जन आलोचना की कहीं ना कहीं चिंता रहती है. वह आडवाणी को दूध की मक्खी की तरह ना निकल कर धीरे से अशक्त करना चाहते हैं. यह एक अच्छी नीति है , और कुछ हद तक शालीन भी. स्वयं अपने को और साथ हीं राजनाथ सिंह को उस मंडल में डालना भी इसी बात के संकेत हैं कि मीडिया इसे पुराना समान रखने वाला घर का कोना न समझे इसलिए कुछ नए सामान भी साथ में रख दो.

अब प्रश्न है कि इतना हो –हंगामा क्यों. क्या मीडिया मोदी के प्रति दुराग्रह के भाव से यह सब कुछ कर रहा है? यह सच है कि इस देश की जनता ने मोदी को नेता स्वीकार किया है और उनसे उनके वादे के मुताबिक तमाम अपेक्षाएं रखी हैं. मोदी पर यह नैतिक दबाव है कि वह “परफॉर्म “ करें. जाहिर है कि मोदी अपने रास्ते में कोई अवरोध नहीं चाहेंगे. पार्टी भी ठीक रहे इसलिए एक अमित शाह की ज़रुरत है, जो आँख के इशारे पर कुछ भी करने को तैयार हो, सरकार ठीक रहे इसलिए मंत्रियों पर लगाम की ज़रुरत है और सब कुछ ठीक रहे इसलिए संघ का वरदहस्त की ज़रुरत है.

इस पैरामीटर पर मोदी बिलकुल ठीक हैं. आडवाणी ने पार्टी को बुरी स्थिति में ला दिया था. सन १९९८ के आम चुनाव में अधिकतम (इस साल के परिणाम को छोड़ कर) २५.६ प्रतिशत वोट मिले थे लेकिन आडवानी की सरपरस्ती में २००४ और २००९ के चुनावों में यह प्रतिशत लगातार घटता हुआ पार्टी को जहाँ मात्र १८.८ प्रतिशत पर ला आया वहीं मोदी के आने से यह प्रतिशत ३१.३ तक पहुँच गया और पार्टी पूर्ण बहुमत हासिल कर इतिहास बनाने लगी. तो यह साफ़ है आडवाणी की बदलते समाज में उपादेयता ख़त्म होने लगी. सर्वस्वीकार्य वाक्य हो गया “मोदी हीं बचा सकते हैं गिरती भाजपा को, ख़त्म होते देश को”. लिहाज़ा अगर मोदी अपने मन की टीम लाते है तो कोई गलत बात नहीं है.

आडवाणी उस समय भी गरिमामाय नहीं दिखे जब मोदी के केन्द्रीय चुनाव समिति में आने के बाद उन्होंने पत्र लिखा , मीडिया को दिया और पूछा कि “ कहाँ गयी श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पंडित दीनदयाल की पार्टी”. दरअसल यह सवाल तो उनसे पूछा जाना चाहिए था. पार्टी की जन-स्वीकार्यता उनके काल में घटी थी ना कि मोदी की वज़ह से. उनका आरोप कि मोदी के आने से मुखर्जी और पंडित दीनदयाल की पार्टी बदल गयी , गले के नीचे नहीं उतरता. अगर उनका ऐसा मानना था तो एक हीं दिन में इस्तीफ़ा वापस क्यों? क्या उनके घर जा कर किया गए मान-मनव्वल से पार्टी फिर पटरी पर आ गयी? यहीं पर आडवाणी अपने गरिमा से नीचे आते दिखाई देते हैं.

मोदी के आलोचकों का , जिनमें मैं भी हूँ, यह मानना है कि मोदी विरोध के स्वर के प्रति सहनशील नहीं हैं और यही वजह है आडवाणी के सीन से गायब होने की. लेकिन शायद आलोचक यह नहीं समझ पते हैं कि अगर शीर्ष पर बैठा नेता पूरी तरह से जनोपदेय है, सही दिशा में सोच रहा है और जनता उस सोच को मौन समर्थन दे रही है तो फिर विरोध के स्वर हैं हीं क्यों? हम विरोध के मूल कारणों में जाएँ तो पता चलेगा कि वह विरोध स्वयं स्वार्थ-सिद्धि के लिए था हालाँकि नाम पार्टी में भटकाव का दिया गया. हर विरोधी यही तर्क देता है. इंदिरा गाँधी ने भी आपातकाल लगाया तो यही तर्क दिया था.

लेकिन मोदी के फॉर्मेट की एक समस्या है. जब तक वह उपादेय हैं, जब तक जनता को वह “परफॉर्म” करते हुए लगते हैं तब तक “एकल व्यक्ति” प्रभाव के औचित्य को कोई चुनौती नहीं है लेकिन जैसे हीं कुछ गलतियाँ होने लगती हैं और मोह –भंग की स्थिति आती है तब एकल नेतृत्व का सिद्धांत ढहने लगता है और इस गिराव को रोकना मुश्किल हो जाता है. यही वजह है कि एक विश्वसनीय सपोर्ट-सिस्टम समानांतररूप से रखना ज़रूरी होता है. मोदी के पास वह मज़बूत सिस्टम संघ के समर्थन के रूप में मौजूद है.

आडवाणी के संसदीय बोर्ड में ना लेने पर मीडिया का मुद्दा बनाना गलत इसलिए नहीं है कि भारत के एक उभरते जन-अवलंबन के प्रतीक मोदी के हर पहलू का विश्लेषण करना मीडिया का काम है ताकि सफलता नेतृत्व को बेलगाम न कर दे. इसे मीडिया के दुराग्रह के रूप में नहीं देखना चाहिए.
patrika/lokmat

Sunday, 24 August 2014

जजों की नियुक्ति: इस बदलाव के मूल कारणों पर जाएँ



है साहेब-ए-इंसाफ खुद इंसाफ का तालिब
मुहर उसकी है मीजान बदस्ते दीगरां है.

(आज न्याय का मालिक खुद न्याय चाह रहा है क्योंकि मुहर तो उसकी है लेकिन तराजू दूसरे के हाथ में है)
          ----------- फैज़ अहमद फैज़

न्यायिक नियुक्ति बिल संसद की दोनों सदनों से पारित हो चुका है. राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद अधिसूचना जरी कर जल्द हीं कानून बना दिया जाएगा. और उसके बाद फिर एक बार साहेब इंसाफ (न्याय का मालिक) के हाथ से न्याय की तराजू निकल जायेगी. प्रश्न मात्र बदलाव का नहीं है. उसके कारणों पर जाये तो पता चलेगा कि कैंसर कहीं ज्यादा गहरे चला गया है और मेटा- एस्टासिस के स्टेज पर पहुँच चुका है जिससे अन्य अंग भी प्रभावित होने लगे हैं.
यहाँ यह कहना गलत होगा कि न्यायपालिका में सब कुछ सही था और विधायिका और कार्यपालिका ने मिलकर इसके अधिकारों को हासिल करना चाहा. जिस देश की सर्वोच्च अदलत के तीन-तीन मुख्य न्यायाधीशों पर भ्रष्टाचार के आरोप लग रहें हो वह संस्था सही कार्य कर रही है यह कहना गलत होगा. आज़ादी के कोई ५० सालों में कम से कम सर्वोच्च न्यायलय की विश्वसनीयता पर आंच नहीं आयी थी. यह  सब गिरावट पिछले १५ सालों में सुनने को मिला. अगर किसी दो साल में सर्वोच्च न्यायलय के जो २३ जज रिटायर होते हैं उनमें २१ को अवकाश- प्राप्ति के तत्काल बाद कोई न कोई पद दे कर सारी सुविधाएँ और पगार सरकारों द्वारा बहाल कर दी जाती हैं तो सब न्यायपालिका में सब कुछ अच्छा नहीं है.
अगर गुजरात हाई कोर्ट का का एक मुख्य न्यायाधीश भास्कर भट्टाचार्य सार्वजानिक रूप से भारत के एक मुख्य न्यायाधीश पर आरोप लगता है कि चूंकि उनकी बहन को कलकत्ता हाई कोर्ट में हमने जज बनाने का विरोध किया इसलिए मुझे सर्वोच्च न्यायलय में जज नहीं बनने दिया गया, तो न्यायपालिका की छवि को चार चंद नहीं लगते. अगर कोई सुप्रीम कोर्ट का हीं रिटायर्ड जज जस्टिस काटजू कहता है कि अमुक मुख्य न्यायाधीश को हमने इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक जज के बारे में बताया और जांच में उसके एक दलाल से सम्बन्ध और भ्रष्टाचार के बारे में आई बी ने टेप भी दिए फिर भी वह जज बना रहा, तो न्यायपालिका किसी अन्य अवमानना की ज़रुरत नहीं है. जनता में भरोसा उठा इसके लिए “साजिशकर्ता” ढूँढने की ज़रुरत नहीं है. देश के सर्वोच्च न्यायलय की गरिमा गिरी है जो अदालत की अवमानना कानून के अनुसार अपराध है फिर भारत के वर्तमान मुख्य न्यायाधीश का यह रुदन क्यों? गलत है तो जस्टिस भट्टाचार्य और जस्टिस काटजू पर मुकदमा क्यों नहीं ? दरअसल ये आरोप सहीं हैं और न्यायाधीशों में नैतिकता का लोप जबरदस्त ढंग से पिछले कुछ सालों में हुआ है.
यह सही है कि एडवोकेट्स ऑन रिकार्ड्स एसोसिएशन बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया के क्रांतिकारी फैसले के पहले जजों की नियुक्ति सरकार के हाथ में थी और न्यायपालिका की भूमिका नगण्य थी. नतीजा यह होता था मुख्यमंत्री और मुख्य न्यायाधीश अगर पांच पद  खाली है तो “दो-मेरे, दो -आपके” का समझौता कर लेते थे और एक केंद्र की सरकार का आदमी जज हो जाता था. उत्तर प्रदेश में एक मुख्य मंत्री ने अपने जिले के एक वकील को जिसकी जिले में हीं साख बेहद खराब थी हाई कोर्ट का जज बना दिया.
लेकिन पिछले २१ सालों से यह काम न्यायपालिका के हाथों में है और वहां भी इसी तरह के आरोप देखने को मिल रहे हैं. तो फिर फर्क क्या है बदनाम राजनीतिक वर्ग में और अवमानना के अधिकार से सुसज्जित “मी लार्डों” में?
फिर अगर कोई संस्था नैतिक रूप से इतनी कमज़ोर हो जायेगी तो अन्य संस्थाएं चाहे खुद कितनी भी बुरी हों , भारी तो पड़ेंगी हीं. विधायिका या यूं कहिये कि राजनीतिक वर्ग को एक अच्छा मौका मिला, काटजू के खुलासे से. फिर क्या था. कांग्रेस, मायावती, मुलायम सिंह, लालू यादव , जयललिता की पार्टी से और क्या उम्मीद कर सकते हैं. इनमें से अधिकांश अदालतों में अपने कर्मों से अपने भाग्य को गिरवी रख आये हैं.      
न्यायपालिका पर नकेल कसने की ललक आज की नहीं है. संविधान निर्माताओं से लेकर ६५ साल तक राजनीतिक वर्ग इसको नियंत्रित करने की जुगत लगता रहा है. संविधान के अनुच्छेद १२४ की व्याख्या करते हुए डॉक्टर अम्बेदकर ने कहा था “जजों के अन्दर भी मानवोचित दुर्गुण हो सकते हैं लिहाज़ा नियुक्ति की पूरी जिम्मेदारी इन पर नहीं छोड़ी जा सकती है. कितनी विडम्बना है. जिस सर्वोच्च न्यायालय के जज की बुद्दिमत्ता पर पूरा देश, संविधान और व्यवस्था पूरा भरोसा रखते हुए उसके  फैसले पर व्यक्ति को अंतिम रूप से फंसी पर लटका देते है और जिन पांच-सदस्यीय जजों की संविधान पीठ के फैसले में कानून की ताकत होती है उन्हीं में से पांच सबसे सीनियर जजों में इतनी समझ नहीं है कि वे जजों की नियुक्ति कर सकें ? अगर ये जज अपने को भाई –भातीजावाद से ऊपर नहीं ले जा सकते, भ्रष्टाचारी जज को हटाना तो दूर उन्हें सत्ता के किसी  दबाव में प्रोन्नत कर देते हैं तो ६५ साल से जो लोग सजा पा चुके हैं या छूट गए है उनको लेकर समाज क्या सोचेगा?
१६ मई, १९५१ को (संविधान अंगीकार करने के मात्र १७ माह बाद पहले संविधान संशोधन पर बोलते हुए प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरु ने कहा था “हमने एक भव्य संविधान बनाया लेकिन वकीलों ने उसे अगवा कर लिया” .......  और “हम सर्वोच्च न्यायालय को संसद का तीसरा सदन नहीं बनने देंगे”. (पार्लियामेंट डिबेट , वॉल्यूम १२, भाग २, कॉलम ८८३२).
कम से कम उस समय तो जजों पर कदाचार के आरोप नहीं थे ना हीं वे जजों की नियुक्ति करते थे फिर यह दुराव क्यों?
एक अध्ययन में पाया गया कि १९६०वेन दशक के मध्य तक पाया गया कि सर्वोच्च न्यायलय में लगभग ७० प्रतिशत ऐसे मामले थे जिन में सरकार एक पक्ष होता था और व्यक्ति या निजी पार्टी दूसरा पक्ष. यह भी पाया गया कि इन मामलों में लगभग ४० प्रतिशत फैसलों में सरकारी को हारना पड़ा. उस दौरान जो ३२७२ फैसले देश की सबसे बड़ी अदलत में हुए उनमें ४८७ में किसी ना किसी कानून को चुनौती दी गयी थी और उनमें १२८ फैसलों में सर्वोच्च न्यायलय ने कानून को असंवैधानिक ठहराया.
शोधकर्ता जॉर्ज गड्बोईस के अनुसार दुनिया के किसी भी अन्य मुल्क में देश की सबसे बड़ी अदालत में सरकार को अपनी हीं जनता की मुखालफत वाले मामलों में देश की सबसे बड़ी अदालत में इतनी शिकस्त नहीं मिली.  
और फिर अगर यह बुद्दिमता या नैतिकता इन जजों में नहीं तो बंद कीजिये न्यायपालिका की दूकान और प्रजातंत्र का ड्रामा. छोड़ दीजिये पूरी न्याय-व्यवस्था ताकतवर के हाथों में. कम से कम यह तो पता चलेगा कि जो जीता वह किसी ताकतवर का आदमी था और उससे पंगा नहीं लेना चाहिए.
जूलियस सीज़र में एक कैसियस ब्रूटस से कहता है “ गलती हमारे भाग्य में नहीं है ब्रूटस, हमारे अपने अन्दर है क्योंकि हम सब बौने (अनैतिक) हैं”. आज शायद पूरा आंवा का आवां हीं ख़राब हो चुका है जिससे जज, मंत्री , संतरी और हमारे रहनुमा पैदा होता हैं.

rajsthan patrika