Thursday, 13 March 2014

लद गए घिसी –पिटी राजनीति के दिन

दिक्, काल सापेक्षता को बिना समझे इस बार कांग्रेस ने वही गलती की जो कम्युनिस्ट पार्टियाँ या कुछ हद तक भारतीय जनता पार्टी पहले करती रही है. चुनाव के दो महीने पहले जाटों को आरक्षण देने महज इस बात की तस्दीक है कि सवा सौ साल पुरानी पार्टी आज भी यह नहीं समझ पा रही है कि परम्परागत राजनीति के दिन अब लद गए. आरक्षण से जो आम सन्देश गया है वह कांग्रेस की "चालाकी" का है जिसे अब राष्ट्रीय स्तर पर पसंद नहीं किया जा रहा है. जनता सड़क पर आरक्षण के लिए नहीं बल्कि बलात्कार के खिलाफ आने लगी है, भ्रष्टाचार को लेकर जबरदस्त आक्रोश है और महगाई का ना रुकना सरकार की असफलता का सीधा पैमाना बन गया है और विकास किसी पार्टी या पार्टी-समूह का सरकार में जाने या जाने का पासपोर्ट बन चुका है.
कांग्रेस के शीर्षपुरुष राहुल गाँधी का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर गाँधी की हत्या का आरोप लगाना भी उतना हीं बचकाना और स्थितियों को समझ कर बोलने वाला कृत्य था. अतीत की बातें तब उठायी जाती है जब उन्हें मुद्दा बनाने की क्षमता हो. गाँधी की हत्या आज कोई मुद्दा नहीं रहा और किसने किया यह तो बिलकुल हीं नहीं. फिर भ्रष्टाचार के इतने मुद्दे कांग्रेस सरकार की झोली में जा चुके हैं कि अब वह अपने को गाँधी के नज़दीक तो नहीं हीं बता सकती है. ऐसे में गड़े मुर्दे को उखाड़ना कांग्रेस रणनीतिकारों के मानसिक दिवालियेपन को हीं उजागर कर रहा है. राहुल अगर गुजरात में विकास के सही आंकड़े देकर मोदी को घेरे तो वह ज्यादा उपादेय होगा चुनाव में.
क्यों किसी एक काल खंड में एक राजनीतिक दल या एक अवधारणा जनता का समर्थन पाती है और कभी-कभी यह समर्थन यहाँ तक जनता के मन में बस जाता है कि लोग उसके लिए जान तक की बाज़ी लगाने को तैयार हो जाते हैं? क्यों सारी अनुकूल स्थितियों के बावजूद भारत में साम्यवाद अंगीकार नहीं हुआ और अगर कुछ भाग में हुआ भी तो आज हाशिये पर चला गया? दरअसल, जनता की सामूहिक और व्यक्तिगत समझ तथा राजनीतिक सन्देश या विचारधारा में एक तादात्म्य होना चाहिए. इसके होने पर कई बार वह सन्देश या अवधारणा जनता की समझ से ऊपर हो जाती है या पैर की नीचे से निकल जाती है. भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों के हश्र के पीछे भी यही तर्क है.सम्प्रदाय, जाति, उपजाति या अन्य तमाम पहचान समूह में बंटा भारतीय समाज साम्यवाद के सन्देश को ग्रहण नहीं कर पाया और सर्वहारा क्रांति भारत में दम तोड़ती गयी.
आज से २० साल पहले कोई कांग्रेस या कोई भारतीय जनता पार्टी अगर जाति-आधारित आरक्षण का मुद्दा उठाती तो एक तथाकथित लाभ पाने वाले वर्ग खुश होता, सड़कों पर आता और बाकि सब लोग "कोई नृप होहिं हमे का हानी" के भाव में कुछ कुनमुनाते हुआ चुप हो जाता. लेकिन पिछले पांच साल में स्थितियां बदली हैं. इसके पांच कारण हैं. शिक्षा (साक्षरता दर ७४. प्रतिशत) , प्रति-व्यक्ति आमदनी में भारी वृद्धि , प्रतिदिन औसत व्यक्ति का टीवी चैनलों पर डिस्कशन के प्रति रुझान, ट्विटर या सोशल मीडिया में एक बड़े युवा वर्ग की शिरकत और समाज में तर्क-शक्ति का बढना. लिहाज़ा अब जब कोई पार्टी परम्परागत तरीके से वोट हासिल करने के लिए चुनाव के दो महीने पहले गरीबों की बात करती है या महिलाओं के या जाटों आरक्षण के मुद्दे को हवा देती है तो महिलाएं या जाट कोई खास प्रभावित नहीं होते और उसके अलावा एक बड़ा वर्ग उस पार्टी को स्तरीय ना मानता हुआ नज़रन्दाज़ करने लगता है.
संघ और मोदी के बीच भी यही दिक्कत है. जहाँ मोदी को यह बात मालूम है कि नौ करोड़ से ज्यादा मतदाता इस चुनाव में ऐसा है जो पहली बार वोट देगा. उसकी उम्र १८ से २३ साल है. वह पिछले पांच सालों से ट्विटर पर है, मत बनाता बिगाड़ता है सिस्टम के खिलाफ एक जबरदस्त आक्रोश पाले बैठा है. यह युवा ६६ साल पहले हुई गाँधी की हत्या में नहीं बल्कि दिल्ली में हाल में हुए बलात्कार में दिलचस्पी रखता है. लालू यादव जेल में क्यों नहीं इसमें दिलचस्पी रखता है. नौकरियां कम क्यों हो रही हैं इसमें उसका ध्यान लगा है. लेकिन दूसरी ओर संघ की मजबूरी है कि वह खांटी हिंदुत्व के खांचे से बाहर निकल नहीं पा रहा है. ऐसा करने के लिए उसे अपने अस्तित्व के कारण को हीं पुनर्परिभाषित करना पडेगा.
देश में २४ करोड़ परिवार हैं जिसमें से १६ करोड़ के पास टीवी सेट हैं. हर परिवार में . मोबाइल हैं. ८२ करोड़ मोबाइल सेट्स में से १६ करोड़ में इन्टरनेट की सुविधा है. टीवी न्यूज़ चैनल दिन-रात खबर दिखाकर उसका बहुपक्षीय जानकारी बढ़ा रहे है. देश की साक्षरता ७४. करोड़ है और प्रति-व्यक्ति आमदनी बढ़ी है. ये सारे कारक एक नए भारत को जन्म दे रहे हैं जिसमें जाति की राजनीति याने आरक्षण का झुनझुना नहीं चलेगा.
 हमने फर्स्ट पास्ट पोस्ट सिस्टम(एफ.पी.टी.पी यानि जो पहले खंभा छुए वही विजेता या यूं कहें कि जो सबसे ज्यादा वोट पाए वो विजेता) चुनाव पद्धति अपनायी है। जब हम संविधान बना रहे थे तब हमारे सामने कुछ अन्य पद्धतियां भी थीं लेकिन हमने ब्रिटेन के मॉडल को अंगीकार करते हुए इस पद्धति को सर्वश्रेष्ट समझा। नजीज़ा यह हुआ कि चौधरी के कहने पर वोट देने वाला बारम्बार ठगा हुआ किसान हो या प्रजातंत्र की बारीकियां समझने वाला व्यक्ति, दोनों का वोट समान माना गया। 

 भारतीय समाज में गरीबी, अशिक्षा सामंतवादी अवशेषों की वजह से इस पूरी अवधारणा को पटरी से उतार दिया गया। एफ.पी.टी.पी पद्धति की जो सबसे बड़ी खराबी अब तक देखने में आयी वह यह कि, यह पद्धति समाज को विभाजित करती है और यह विखण्डन की प्रक्रिया तब तक नहीं रुकती जब तक कि सबसे छोटा पहचान समूह भी विखण्डित नहीं हो जाता।

 उदाहरण के तौर पर एक विधानसभा क्षेत्र में मान लीजिए नौ प्रत्याशी हैं जिनमें से आठ को 9000 के आस-पास वोट मिले हैं लेकिन नौवें प्रत्याशी को 9005 हज़ार वोट मिले हैं, नौवां प्रत्याशी विजयी घोषित होगा। हालांकि 88 प्रतिशत मतदाताओं ने उसे खारिज किया है। अगले चुनाव में यह सभी आठों प्रत्याशी इस बात की कोशिश में लग जाएंगे कि किसी तरह से छोटे-छोटे पहचान समूहों की भावनाओं को उभारा जाए और कोशिश की जाए कि किस तरह महज : प्रतिशत वोट और बढ़ाए जाएं ताकि अगले चुनाव में जीत हासिल हो।

   चूंकि यह पहचान समूह धार्मिक, जातिगत, क्षेत्रीय, उपजातीय भावनात्मक आधार पर परंपरागत रूप से ही पहले से बने होते हैं इसलिए राजनीतिक दलों के लिए आसान पड़ता है कि उन्हीं में से किसी एक को अपने साथ जोड़े। एक दूसरी दुश्वारी यह भी है कि नए और तार्किक आधार पर पहचान समूह बनाना मसलन प्रोफेश्नल्स का ग्रुप, विकास के मुद्दों के आधार बनाया गया व्यक्ति समूह एक मशक्कत का कार्य होता है इसलिए राजनीतिक पार्टियां पहले विकल्प को चुनती हैं।

   राजनीतिशास्त्र के सर्वमान्य विश्लेषणों के मुताबिक अशिक्षित अतार्किक समाज में भावनात्मक मुद्दे अचानक ही तेजी से उभरते हैं और कई बार इतने प्रबल हो जाते हैं कि मूल मुद्दों से भारी पड़ते हैं और पूरी विधिमान्य और तार्किक व्यवस्था को या संवैधानिक संस्थाओं को अपने अनुरूप ढ़ालना शुरू कर देते हैं। 1984 में शुरू हुआ राममंदिर का उबाल इस संदर्भ में देखा जाना चाहिए।


लेकिन जब समाज में तर्क-शक्ति बढ़ने लगती है तो ये परंपरागत मुद्दे खत्म होने लगते हैं. संभव है कि जाट आरक्षण दे कर कांग्रेस-अजित सिंह गठजोड़ को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कुछ फ़ायदा मिल जाये पर पूरा सन्देश नए तार्किक भारत में कांग्रेस के लिए नुकसानदेह साबित होगा क्योंकि यह चालाकी भरा कदम माना जाएगा.
यही कारण था कि जब जब कांग्रेस की सरकार ने शुरूआती दौर में किसी राजा का समर्थन किया , किसी कलमाडी को सही ठहराया या किसी बंसल को मंत्रिपद से हटाने में आनाकानी की तो जनता का अविश्वास बढ़ता गया. भ्रष्टाचार किसी मनमोहन या किसी सोनिया गाँधी ने भले ना किया हो पर सन्देश यही गया कि यह कांग्रेस भ्रष्टाचार के खिलाफ तो दूर उसकी हिमायती है. यह एक टैक्टिकल गलती थी.

lokmat

Saturday, 8 March 2014

संस्थाओं को ढहाना “आप” के जिंदा रहने की शर्त लेकिन कब तक ?






प्रजातंत्र की अजब नियति है, कहने को तो यह प्रजा का तंत्र होता है, लेकिन इसमें स्वत: ही एक सुविधाभोगी वर्ग विकसित होता है, जो थोड़ा-थोड़ा भ्रष्ट होने का मौका मिले तो खांटी भ्रष्ट बन सकता है, और ना मिले तो सरकारी गाड़ी में बजरंगबली के मंदिर जाकर नैतिक भी हो जाता है.यहां तक कि अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार के आंदोलन में भी खड़ा दिखाई देता है,लेकिन शाम को सत्ता के नाम  पर उगाहे हुए धन का बंटवारा भी कर लेता है.
अभी हाल में अरविंद केजरीवाल और आप पार्टी की इसने बुराई की. इसको एतराज है कि अरविंद सुरक्षा क्यों नहीं लेते. इसको यह भी ऐतराज है कि अरविंद संविधान की शपथ लेने के बाद दफा 144 तोड़कर धरने पर क्यों बैठते हैं. इसको इस बात का भी मलाल है कि आप पार्टी को मौका मिला तो दिल्ली में शासन क्यों नहीं चलाया. और इसका मानना है कि आप पार्टी लोकसभा चुनाव के बाद मृतप्राय हो जाएगी.
दरअसल, आप 65 साल के सड़े सिस्टम के खिलाफ उपजे जनाक्रोश की पैदाइश है, यह कोई सामान्य राजनीतिक पार्टी नहीं है जिसका परंपरागत तौर पर कैडर होता है, विचार होता है. यथास्थितिवादी सुविधाभोगी वर्ग का यह भी आरोप है कि आप ज्यादा दूर नहीं जा पाएगा,क्योंकि इसमें विचारधारा नहीं है. वास्तव में आप की एक ही विचारधारा है और वह है इस सड़े सिस्टम को बदलना, और यह विचारधारा उसकी अपनी नहीं है बल्कि देश में उपजी उस सामूहिक चेतना की है जो भारत में पहली बार देखने को मिल रही है. जब तक आप के लोग इस सिस्टम से टकराते रहेंगे,कानून व्यवस्था को चुनौती देते रहेंगे,और यथास्थितिवादियों के जनमानस को झकझोरते रहेंगे, तब तक जिंदा रहेंगे.
उदाहरण के लिए संविधान में कहीं भी नहीं लिखा है कि संसद में कानून बनाने के लिए केंद्र की इजाजत चाहिए,लेकिन तत्कालीन सत्ता ने बड़ी ही चालाकी से एनसीटी कानून में इस बात का जिक्र किया है. अब यथास्थितिवादियों के तर्क के अनुसार जबतक यह कानून है तबतक दिल्ली के मुख्यमंत्री को इस कानून का अनुपालन करना होगा. यानि अरविंद केजरीवाल लोकपाल बिल लाने के लिए केंद्र का मुंह तांके या अदालत की चौखट पर जाकर कानून को खारिज कराएं, हम सब हकीकत जानते हैं कि केंद्र इजाजत नहीं देगा और अदालत से फैसला आने में कुछ साल लगेंगे.
एक और उदाहरण लें, मुख्यमंत्री ने चूंकि संविधान की शपथ ली है, इसलिए दफा 144 का उल्लंघन नहीं करना चाहिए. अगर तोड़ना है तो अदालत में जाकर सिद्ध करना होगा कि रेल भवन में धरना देने के खिलाफ केंद्र सरकार द्वारा लगायी गयी दफा 144 गलत है. संविधान के अनुच्छेद (१९(२) में राज्य को लोक-व्यवस्था के तहत अभिव्यक्ति की आज़ादी बाधित करने के अधिकार तो दिए गए हैं लेकिन यह भी कहा गया है कि वह “युक्तियुक्त निर्बंध” (रिजनेबल रेसट्रिकशन”) हो. याने इसमें प्रतिबन्ध लगने के पहले दिमाग का उपयोग किया जाये. इस मामले में दिल्ली व केंद्र के शासन और  प्रशासन ने दिमाग का प्रयोग नहीं किया. केंद्र सरकार अगर चाहती तो रेल भवन के ट्रैफिक को इंडिया गेट की तरफ से निकाल सकती थी, लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री को इसके लिए अदालत जाना पड़ता और कुछ महीने निकल जाते और यही कुछ यथास्थितिवादी चाहते थे.
तीसरा उदहारण लें. जब मीडिया आप पार्टी और अरविन्द केजरीवाल को हाथों –हाथ लेती थी तब वह किसी मोदी या मिकेश अम्बानी के हाथ में नहीं खेलती थी लेकिन जैसे ही मीडिया अरविन्द और आप के सत्तानशीं होने के बाद नकारात्मक विश्लेषण के भाव में आई (जो मीडिया का मूल धर्म है) अरविन्द के लोगों ने पानी पी कर इसे मोदी और मुकेश के पैसे पर बिका बताने लगी. लेकिन फिर भी अरविन्द की पार्टी के लिए यह जिंदा रहने की पहली शर्त है कि वह हर संस्था को ज़मींदोज़ करे. लालू , कांसीराम या तथाकथित सामाजिक न्याय की ९० दशक में उभरी सभी जातिवादी पार्टियों ने भी यही किया था. लेकिन आप को अगर इस जनाक्रोश को बनाये रखना है अपने पक्ष में तो संस्थाओं को गिराने के साथ सार्थक संस्थाएं भी लाना होगा. वरना लालू का हश्र सामने है.
शोले में गब्बर सिंह ने कहा था बसंती जब तक तुम्हारे पैर चलेंगे तब तक इसकी (वीरू) की सांसे चलेंगी, अरविंद या आप की राजनीति के जिंदा रहने की भी यही शर्त है कि हर पल इस सड़ी व्यवस्था को चुनौती देते रहें,जब तक यह चुनौती जनाक्रोश के अनुरूप रहेगी तब तक आप पार्टी जिंदा रहेगी,अन्यथा यह भी किसी बसपा या सपा की तरह सीमित होकर रह जायेगी .
जाने माने विद्वान गिब्बन ने कहा था भ्रष्टाचार संवैधानिक स्वछंदता (लिबर्टी) का अपरिहार्य रोग है कहीं ऐसा तो नहीं कि हम इस लिबर्टी का फायदा व्यक्तियों को देने के चक्कर में पूरे समाज को भ्रष्टाचार के रोग का शिकार बना रहे हैं. बाद के विद्वानों ने गिब्बन की इस अवधारणा को संशोधित करते हुए बताया कि दोष इस संवैधानिक स्वछंदता का नहीं बल्कि प्रजातंत्र में खड़ी की गई संस्थाओं, उनके प्रतिनिधियों व जनता की भ्रष्टाचार को लेकर बनी सहिष्णुता का है। अगर समाज में नैतिकता को लेकर उदासीनता बनी रहेगी तो कानून और संस्थाएं कुछ भी नहीं कर पाएंगी. आज जरूरत इस बात की है कि समाज में व्यक्ति के नैतिक आचरण को लेकर गुणात्मक परिवर्तन किया जाये ताकि शीर्ष पर वही लोग बैठे जिनकी ईमानदारी पर कोई प्रश्नचिह्न लग ही ना सके. फिर ना तो किसी अन्ना की जरूरत होगी ना ही कोई राजा पैदा होगा.सीएजी एक संवैधानिक संस्था है और उस की रिपोर्ट सरकार में बैठे लोग भी उसी सम्मान से लेंगे जो सम्मान अपेक्षित है और फिर गलतियों को दूर करने की कोशिश करेंगे.  
आज प्रश्न यह नहीं है कि मोदी सत्ता पाते है या अरविन्द केजरीवाल या राहुल. जनता को यह सोचना होगा कि उसका भ्रष्टाचार के प्रति उपजा ६५ साल से सुलग रहा गुस्सा जो इस सड़े सिस्टम के खिलाफ “जीरो टोलरेंस” बन कर उभरा है वह वोट दे कर किसी इस या उस नेता को या पार्टी को लाने के बाद शांत तो नहीं हो जाता. अगर ऐसा हुआ तो अगले ५० साल तक हमारी बच्चे  कोयला घोटाला, २-जी घोटाला , या कामनवेल्थ घोटाला के दंश के बीच दम तोड़ते रहेंगे. भावी पीढ़ी शायद हमें माफ़ ना करे.

lokmat

बदलते जन-संवाद के कारण अलग होगा यह आम चुनाव



कई मायनों में यह आम चुनाव जो १६वीं लोक सभा को चुनने (यानि कौन दल या दल समूह अगले पांच साल रु. १८ लाख करोड़ बजट वाले देश को शासित करेगा तय करने) के लिए हो रहां है, महत्वपूर्ण होगा. पहली बार देश में सामूहिक चेतना ने व्यवस्था के खिलाफ अंगड़ाई ली है. आबादी में युवाओं का प्रतिशत बढना, शिक्षा का प्रसार , समाज में मीडिया द्वारा लाये गए बहु-पक्षीय तथ्य और उससे पैदा हुई   तर्क –शक्ति सबने मिल कर इस चेतना में सामूहिक व व्यक्तिगत स्तर पर गुणात्मक परिवर्तन किया है. नतीजा यह हुआ कि जनता का ६५ साल से सड़ रहे सिस्टम पर जबरदस्त आक्रोश पनप गया है.  राजनीतिक संवाद पिटे –पिटाए मंदिर, मस्जिद से हट कर या जाति-आधारित आरक्षण या दाढ़ी वाले मुल्ला बनाम चन्दन वाले पंडित से हट कर आई एम् आर (बाल मृत्यू दर ) और एम् एम् आर (मातृ मृत्यू दर ) तक पहुंचा. चर्चा होने लगी विकास का मोदी माडल सही या नितिश माडल या फिर सशक्तिकरण के लिए केंद्र द्वारा बनाया गया सूचना का अधिकार ज्यादा जनोपादेय या खाद्य सुरक्षा कानून.     
राजनीति-शास्त्र की अवधारणा के अनुसार “अशिक्षित या अर्ध-शिक्षित समाज में भावनात्मक मुद्दे वास्तविक मुद्दों पर हावी हो जाते हैं”.  राजनीतिक दलों को विचारधारा के तलवार की धार  पर चलने की जगह तर्क-सम्मत या वैज्ञानिक सोच की जगह क्रोध, प्रतिशोध, रोबिन हुड इमेज (जिसमें डकैत इसलिए स्वीकार्य होता है कि वह राज्य अभिकरणों से लड़ता है और सीधे अपने जाति के चुनिन्दा गरीबों की मदद करता है याने अमीरों को लूट कर गरीब की बेटी की शादी में कुछ पैसा खर्च करता है) अंगीकार करना आसान होता है . इसके ठीक उल्टा समाज की सोच बदल रही है. पहली बार १८ से ३५ साल के मताधिकार प्राप्त युवाओं के ४७ प्रतिशत होना. इनमें १८ से २३ साल के करीब नौ करोड़ युवा पहली बार वोट देंगे.
ये ३९ करोड़ युवा उस नए युग के हैं जिसमें पिछले पांच वर्षों में फेसबुक और ट्विटर पर अपना अधिकाँश समय बिताना शुरू किया है. जिसके पास सूचना का विस्फोट है. देश में इस दौरान कुल २४ करोड़ परिवारों में से १६ करोड़ के पास टीवी सेट हैं , हर घर में ३.५ मोबाइल सेट्स है, हर पांच मोबाइल सेटों में एक इंटरनेट सुविधायुक्त है. सूचना की बाढ़ उसके पास आती हीं नहीं है , उसको बहा ले जाती है और वह उसमें डूबता-उतराता एक दूसरे के साथ अपना विचार –व्यक्त करता है. नतीजा यह होता है कि सिस्टम की खराबी जब किसी आदर्श घोटाले या कोयला आबंटन में गड़बड़ी के रूप में उसके पास आती है तो वह ना केवल अपना विचार बनाता है बल्कि शाम तक टीवी चैनलों पर उसके तर्क शक्ति को बढाने वाले हर पक्ष के तमाम तर्क वाक्य भी उसे उपलब्ध रहते हैं. उदाहरण के तौर पर, आप नेता अरविन्द केजरीवाल गुजरात में पुलिस द्वारा रोके गए. दिल्ली में आप के लोगों ने भारतीय जनता पार्टी के ऑफिस पर प्रदर्शन के लिए आधे घंटे में नेट के जरिये सौ-डेढ़ सौ कार्यकर्ता बुला लिए. पहला तथ्य आया कि अरविन्द को गलत रूप से हिरासत में लिया गया. दूसरा तथ्य आया कि अरविन्द ने राज्य सरकार से मीटिंग की इज़ाज़त नहीं ली थी जब कि आचार संहिता लागू हो चुकी थी. तीसरा तथ्य आया कि भारतीय जनता पार्टी कार्यालय से पत्थर और कुर्सियां फेंकी गयी जिसमें कुछ कार्यकर्त्ता –मीडिया कर्मी घायल हुआ. चौथा तथ्य आया कि आप के लोगों ने भी पत्थर फेंका. उधर लखनऊ में बी जे पी –आप कार्यकर्ताओं में झड़प हुई जिसमें भाजपाइयों ने आप के लोगों को जमकर पीटा. ये सारे तथ्य विसुअल के साथ थे याने झूठ नहीं हो सकते. चलते –चलते पता चला कि एक कलेक्टर ने कहा कि अरविन्द ने कोई गलती नहीं कि थी और उन्हें तो अहतियातन रोह कर सलाह और सुरक्षा दी गयी थी.
ये तमाम तथ्य महज चार घंटों के अन्दर पूरी दुनिया को मिल चुके थे. अब प्रश्न था राय बनाने का. क्या दूसरी पार्टी के कार्यालय पर आप को प्रदर्शन करना चाहिए. प्रजातंत्र यह कितना भौंडा स्वरुप होगा कि मंत्री से नाराज लोग उसके घर पर प्रदर्शन करें या दो दलों के लोग आपस में कार्यालय के सामने भिड़ें. क्या यही ६५ साल की परिपक्वता की परिणति है? सक्दक न्याय चलेगा. भाजपा के लोग मजबूत और पत्थर से लैस हों तो वो जीती नहीं तो दूसरा  पक्ष ईंटा बरसा कर अपने सत्य को खडा  करेगा? फिर मुद्दा आया कि पहले ईंट किस तरफ से चला (जबकि अशोक रोड में दूर-दूर तक ईंट –पत्थर नहीं दिखाई देते). क्या पहला पत्थर कार्यालय से आया तो अगले चार पत्थर फेंकने का लाइसेंस आप के कार्यकर्ताओं को मिल जाता है?
८१ करोड़ मताधिकार प्राप्त लोगों ने इसे देखा. अपनी राय  बनाई. युवाओं ने उस राय  पर ट्वीट किया और प्रजातंत्र में मत –निर्माण की प्रक्रिया मजबूत हुई. भ्रष्टाचार के खिलाफ उभरा जनाक्रोश भी इसी प्रक्रिया की उपज है. और यही वजह है कि मतदान का प्रतिशत , जो यूरोप के देशों में भी कम हो रहा है, भारत में बढ़ रहा है.
इस आक्रोश का एक पक्ष और है. धीरे-धीरे ट्विटर या अन्य साधनों के ज़रिये पारस्परिक संवाद के कारण संकुचित सोच भी ख़त्म हो रही है. जातिवाद की जगह सिस्टम के खिलाफ गुस्से ने ले ली है. कोयला घोटाले या आदर्श घोटाले से हर जाति का युवा रंज है. उसे यह लग रहा है कि यह ना होता तो उसकी नौकरी लग गयी होती , उसकी माँ का इलाज भी हो गया होता और गाँव की सड़क भी बन गयी होती.
ध्यान रहे कि इसी भारत के झारखण्ड में हर तीसरे दिन मनोविकार से पीड़ित भटकते हुए आयी महिला  को गाँव के लोग ईंट –पत्थर से मार डालते है यह कह कर कि डायन है और पूरे गाँव को खा जायेगी. इसी देश में पंचायत का फैसला आता है कि पीडिता से जिस युवक ने बलात्कार किया उसके भाई को इज़ाज़त है कि आरोपी की बहन के साथ वह भी बलात्कार करे.

भारत में इस समय प्रजातंत्र का बेहतर युग शुरू होने जा रहा है जिसमें राजनीति या तो स्वस्थ होगी या नेता भाग जायेंगे. अच्छा आचरण नेता बनने की पहली शर्त होगी. हो सकता है इस चुनाव में इसका पूरा मुज़ाहरा न हो पाए क्योंकि तीन हज़ार साल की दकियानूसी रातो-रात नहीं जा सकती परन्तु इस चुनाव में नेताजी “अपने लोग” की राजनीति कर चुनाव वैतरणी नहीं पार कर पाएंगे. साथ हीं बाहुबलियों या पैसे के दम पर चुनाव लड़ने वालों को टिकट देने शायद पार्टियों को महंगा पड़ सकता है.   

jagran

Thursday, 13 February 2014

जब नशे में तमंचा साथ लाए सांसद

प्रजातंत्र जब समृद्ध होता है, तो उसकी पहचान होती है कि वह प्रतीकात्मकता से हटकर वस्तुस्थिति से प्रभावित होने लगता है। भारत में अभी भी प्रजातंत्र में वह गुणवत्ता नहीं आई है, जिससे वह प्रतीकात्मकता को छोड़ सके। नतीजतन होता यह है कि जो सोनिया गांधी की जय-जयकार करे, नरेंद्र मोदी की हुंकार भरे, जो अरविंद केजरीवाल के स्वर में स्वर मिलाकर मीडिया पर हमला करे, वह अपने नेता का चहेता हो जाता है। यही वजह है कि गुरूवार को संसद में जो घटना घटी, वह किसी भी उन्नत प्रजातंत्र के लिए शर्म की स्थिति है। इसने फिर सोचने पर मजबूर कर दिया है कि शायद हम प्रजातंत्र के लिए परिपक्व नहीं हुए हैं।

जिस तरह, प्रजांतत्र में एक-दूसरे के मत में सहिष्णुता पाई जाती है, लेकिन यहां पर तो जिस प्रकार काली मिर्च फेंकी गई, उसका सिर्फ यही मकसद था कि वापस जाकर माननीय सांसद महोदय चुनाव में अपने मतदाताओं को यह बता सकें कि मैं तुम्हारा भगतसिंह हूं। संसद में चाकू ले जाना, हालांकि इस बात से इनकार किया गया है, उस व्याधि या रोग को बताता है कि जिस संसद में 162 सदस्यों पर आपराधिक मुकदमे लगे हैं, यानी हर तीसरा सांसद अपराध का आरोपी है, वह स्थिति बढ़ती जा रही है। अब फैसला जनता को लेना होगा। वो संसद में चाकूबाज चाहती है या अपना सही रहनुमा, जो कि नेता के प्रति निष्ठा व्यक्त करने की बजाय अपनी जनता के प्रति व्यक्तकरे।

जो कुछ भी गुरूवार को संसद में हुआ, वह याद दिलाता है, आज से कुछ साल पहले की एक घटना। उस वक्त मैं संसद कवर करता था, बालयोगी स्पीकर हुआ करते थे। तब एक दिन बिहार के एक सांसद लोकसभा में गतिरोध उत्पन्न कर रहे थे और स्पीकर की बात नहीं मान रहे थे। अंत में मजबूर होकर स्पीकर को कहना पड़ा कि इन्हें बाहर ले जाया जाए। जब वह सांसद बाहर जा रहे थे, तो उनकी कमर से एक चीज गिरी, जो रंग में काली थी। हम में से अधिकांश लोगों ने देखा कि वह क्या थी? दरअसल, वह सांसद आपराधिक छवि के थे और जो वस्तु उनकी जेब से गिरी थी, वह रिवॉल्वर (तमंचा) थी। संसद के लोगों ने हमसे गुजारिश की, कृपया यह बात जनता में न ले जाएं और वह बाहर नहीं आई। बाद में सिक्योरिटी स्टाफ के मार्शल ने अपनी रिपोर्ट में यह लिखा था कि वह वस्तु न केवल हथियार थी, बल्कि सांसद महोदय नशे में भी थे।

इस बात को तो छिपा लिया गया, लेकिन आज संसद में आपराधिक प्रवृत्ति के लोग ज्यादा आने लगे हैं। इसलिए ऎसे लोगों को रोकने की सख्त जरूरत है। हम सब प्रजातंत्र में यकीन रखते हैं और उस विश्वास को सुनिश्चित करें। आज मिर्च फेंकना, चाकू लहराना, नशे में जाना या हथियार लेकर संसद में घुसना प्रजातंत्र पर धीरे-धीरे जनता के विश्वास को खत्म करता जा रहा है।

कल की घटना ने पूरे विश्व में भारत का सिर शर्म से झुका दिया है। उस भारत का जो सहिष्णुता और सम्यक आचरण के लिए विश्व में अपने इतिहास का दावा करता है।

rajsthan patrika

Sunday, 8 December 2013

पांच राज्यों के चुनाव: मोदी के लिए केजरीवाल के रूप में नई चुनौती


पांच राज्यों के चुनाव: मोदी के लिए केजरीवाल के रूप में नई चुनौती
एन के सिंह, एडिटर इन चीफ, लाइव इंडिया
पांच राज्यों के चुनाव नतीजे इस बात की तस्दीक करते हैं कि प्रजातंत्र तार्किक हो रहा है, तथ्यपरक हो रहा है और सार्थक सही-गलत की समझ  वाले जनमत में बदल रहा है। राजनीतिशास्त्र का मूल सिद्धांत कि अशिक्षित या अर्धशिक्षित समाज में भावनात्मक मुद्दे असली मुद्दों पर भारी पड़ते हैं और संवैधानिक व्यवस्था कई बार उसकी वजह से लचीली हो जाती है,इन चुनाव नतीजों से एक तरह से सिद्ध होते हैं। अगर मध्य प्रदेश में सत्ताविरोधी लहर यदि दूर-दूर तक नजर नहीं आती, और राजस्थान में यह मतदाता के सिर पर चढ़कर बोलती है...तो इसका राजनीतिक मतलब साफ है। कुल मिलाकर लब्बोलुआब ये है कि मंदिर वहीं बनाएंगेसे लेकर इंडिया शाइनिंग और अब देखो कितने फ्लाईओवर दिएकी जगह प्याज, महंगाई, भ्रष्टाचार ही जनता को ज्यादा प्रभावित करते हैं।
पर यह तो हुआ एक फौरी विश्लेषण...अरविंद केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी का 92 प्रतिशत शहरी मतदाता वाली दिल्ली में इतना जबर्दस्त समर्थन भारत में उभरते एक नए राजनैतिक परिदृश्य की ओर इंगित करता है। एक साल पहले पैदा हुई पार्टी किसी मंदिर-मस्जिद मुद्दे पर नहीं, किसी जातिजनित उद्वेग का प्रतिफल नहीं, किसी फिल्मी चेहरे के आकर्षण की पैदाइश नहीं, बल्कि शुद्ध बिजली, पानी, भ्रष्टाचार, कुशासन के 45 साल के दबे आक्रोश की उपज थी। परिदृश्य इसलिए बदला है, क्योंकि 2014 के आम चुनावों ने भारतीय जनता पार्टी की प्रतिमूर्ति के रूप में उभरे नरेंद्र मोदी का भी यही यूएसपी है। मोदी भी जिन चार तत्वों पर राष्ट्रीय जनमानस को प्रभावित करना चाहते हैं, वे हैं-कुशल प्रशासन, भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस, सक्षम विकासकर्ता और आतंकवाद का खात्मा। इनमें पहले तीन मुद्दों पर ही अरविंद केजरीवाल की आप पार्टी की बुनियाद है। लिहाजा अगले पांच महीनों में होने वाले आम चुनाव में मोदी के बरक्स केजरीवाल एक बड़ी ताकत के रूप में उभरने जा रहे हैं। अरविंद केजरीवाल का नया चेहरा, जिसके पीछे 2002 की कालिख नहीं है, बल्कि पहली बार मतदान करने जा रहे दस करोड़ युवाओं को नया भविष्य देने का वादा है।
हमारे विश्लेषण में एक अपवाद जरूर है छत्तीसगढ़ का चुनाव परिणाम। चाउर बाबा रमन सिंह मानव विकास सूचकांक के लगभग सभी मानदंडों पर किसी भी गुजरात या बिहार से बेहतर रहे हैं। फिर भी कांग्रेस का अपेक्षाकृत अधिक समर्थन राजनीतिशास्त्र के उपरोक्त सिद्धांत को ही पुख्ता करता है, जिसके तहत अशिक्षित समाज में भावनाएं कई बार बलवती हो जाती हैं। अपने नेता का नक्सलियों द्वारा मारा जाना राज्य के 32 प्रतिशत आदिवासियों को कत्तई स्वीकार्य नहीं था और चूंकि नेता कांग्रेस का था, इसलिए कांग्रेस को समर्थन मिला। महंगाई मध्य प्रदेश में भी थी पर मुख्यमंत्री पर जनता को विकास के प्रति विश्वास था। राजस्थान में ऐसा नहीं हुआ। कुल मिलाकर केंद्र के खिलाफ कुशासन, भ्रष्टाचार, महंगाई और राज्य सरकार का हर दो महीने पर एक मंत्री के चरित्र पर आरोप लगना जनता को उद्वेलित करता रहा।
यहां यह सोचना गलत होगा कि 32 लाख वर्ग किलोमीटर और 80 करोड़ मतदाताओं वाला भारत अरविंद केजरीवाल या उनकी पार्टी के खैरमकदम के लिए तैयार नहीं है क्योंकि उसमें पार्टी का चरित्र नहीं है, अतार्किक होगा। टेलीविजन के इस युग में जहां अन्ना का आंदोलन कर्नाटक के सुदूर गांव से लेकर कश्मीर की वादियों तक कुछ क्षणों में संदेश पहुंचाता हो, सीमाएं, वैविध्य या संख्या बहुत मायने नहीं रखती। भ्रष्टाचार को लेकर जिस तरह पिछले तीन सालों में सामूहिक चेतना विकसित हुई है, वह अपने आप में अप्रतिम है। अन्ना का आंदोलन रहे ना रहे, यह चेतना अब स्थायीभाव बन गई है। आप पार्टी में जनमानस वे सभी महत्वाकांक्षाएं देख पा रहा है, जो पिछले साल से देखना चाहता था। यह सही है कि भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय फैलाव, कार्यकर्ताओं का व्यापक ढांचा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रतिबद्धता मोदी को जबर्दस्त मदद देगी। लेकिन अगर यही सबकुछ होता तो दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की पार्टी का यह उभार नहीं होता और भारतीय जनता पार्टी को बेहद आसानी से जीत हासिल हो जाती। दिल्ली के चुनाव नतीजों पर अगर नजर डालें तो आप को झुग्गी-झोपड़ियों से वही जनसमर्थन मिला है, जो लाल-नीली बत्ती लगाने वाले अधिकारियों से मिला है, मध्यम वर्ग से मिला है और अभिजात्यवर्गीय चरित्र वाले रोटी जीत चुके समुदाय से मिला है। यहां तक कि जो भ्रष्ट था, उसने भी आप पार्टी को यह कहकर वोट दिया कि कम से कम हमारे बच्चों को एक अच्छी और स्वस्थ सरकार मिलेगी। मायावती की बहुजन समाज पार्टी, जिसे दिल्ली के पिछले चुनाव में साढे़ चौदह फीसदी वोट मिला था, काफी नीचे रही। यह वोट भी आम आदमी पार्टी को गया है।
यहां मोदी और अरविंद केजरीवाल में एक सादृश्यता दिखाई देती है। ये दोनों ही नेता, कहीं न कहीं जाति का दंश झेल रहे भारतीय समाज को इस दोष से निकालते हुए दिखाई दे रहे हैं। बिहार में अगर नीतीश की स्थिति अगर बहुत अच्छी नहीं है या उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव का मुस्लिम-यादव समीकरण प्रभावित हो रहा है तो साफ है कि अरविंद-मोदी नेतृत्व भारत के लिए एक नई राजनीति का आगाज है। राजस्थान में तीन चौथाई सीटें और मध्य प्रदेश में दो तिहाई सीटें हासिल करके भारतीय जनता पार्टी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में अगले चुनाव में जाति आधारित पार्टियों को एक झटका मिल सकता है। पिछले तेईस सालों में जिस तरह दोनों राष्ट्रीय पार्टियों का जनाधार खिसकता हुआ तथाकथित जातिवादी पार्टियों में समाहित हो गया था, वहां देश के कोने-कोने से अगले चुनावों में शायद एक बार फिर से वास्तविक मुद्दे किसी मुलायम, किसी लालू के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं।
कुल मिलाकर भारतीय प्रजातंत्र और जनता की प्रजातांत्रिक प्रक्रिया में आस्था और तद्जनित समझ एक नए आयाम पर पहुंचती दिखाई दे रही है। जिसमें वोट उसी को मिलेगा, जो अच्छा शासन दे सकता हो। भले ही 65 साल लगे हों, लेकिन अगले चुनाव में नया राजनीतिक क्षितिज उभरता दिखाई दे रहा है। जातिवाद और भावनात्मक मुद्दों का भले ही पूरी तरह खात्मा न हो, लेकिन मोदी और अरविंद केजरीवाल की राजनीति एक नई दिशा की तरफ प्रजातंत्र को ले जाएगी। देखना यह होगा कि मोदी या केजरीवाल।

Saturday, 2 November 2013

पिछले पांच संस्तुतियों पर राजनीतिक वर्ग ने मात्र लीपापोती की है

सुप्रीम कोर्ट के फैसले की चुनाव सुधार में अहम् भूमिका संभव
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मेरुदंड –विहीन अफसरशाही की चाहत है राजनीतिक वर्ग को 
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देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर अपने एक अहम् फैसले में उस नासूर पर नश्तर चलाया है जिसका मवाद पूरे शरीर में फ़ैल चुका था और जो शरीर के हर अंग में पिछले ६६ साल से टीस मार रहा था. अदालत ने कहा कि अफसर नेताओं (मंत्रियों) के मौखिक आदेश न माने. और अगर ऐसे आदेश आते है तो उन्हें अमल करते वक़्त यह बात भी लिख दें कि मंत्री ने मौखिक रूप से क्या कहा था. साथ ही केंद्र व राज्य की सरकारों को भी आदेश दिया गया है कि वे जब तक संसद कानून नहीं बना देता, तब तक के लिए सिविल सर्विसेज बोर्ड (सी एस बी) का गठन करें जिसमें वरिष्ठ और बेदाग़ चरित्र वाले अधिकारी हों. यह संस्था अफसरों के ट्रान्सफर और पोस्टिंग का प्रबंधन करेगी ताकि कोई भी अफसर अपने निर्धारित अवधि तक अपना काम करे और ट्रान्सफर के खंजर को हर क्षण सर पर लटकता देख कर मंत्री का गुलाम न बने. “प्रजातंत्र के मंदिर” पार्लियामेंट से भी अपेक्षा की गयी है कि वह जल्द हीं इस सम्बन्ध में कानून बनाये.
दरअसल, यह आदेश फौरी तौर पर देखने देखने में जैसा सहज सुधारात्मक प्रयास लगता है गौर से देखने पर उतना हीं क्रांतिकारी है. इससे न केवल देश की अफसरशाही अपनी स्टीलफ्रेम (फौलादी ढांचे) को  फिर से हासिल कर पायेगी जो ६३ सालों में मोम  का बन गया था, बल्कि पूरे प्रजातंत्र की गुणवत्ता खासकर चुनाव सुधार के प्रयासों में आशातीत सफलता मिलेगी. आने वाले चुनावों में भी इसकी झलक देखने को मिल सकती है क्योंकि अफसरों पर मंत्री का या मुख्यमंत्री का खौफ जाता रहेगा. अगर गौर से देखें तो चुनाव में धांधली के लिए हीं नहीं धमकाने, समझाने और राय बनाने में सत्ता पक्ष हीं नहीं समूचा राजनीतिक वर्ग इस तंत्र का इस्तेमाल करता रहा है. सौदा साफ़ रहा है—“तुम मेरी मदद आज करो मैं तुम्हें अगले पांच साल के लिए अभयदान देता हूँ, मलाईदार पद पर माल काटो और कटवाओ” . इसका प्रतिलोम सन्देश यह होता था—“अगर नहीं, तो सत्ता में आने के बाद ऐसी जगह पटके जाओगे कि एक फॉलोअर (दैनिक वेतन पर काम करने वाला घरेलू पर सरकारी नौकर) के लिए तरस जाओगे”.
सर्वोच्च न्यायलय के इस आदेश का सबसे बड़ा पहलू है राजनीतिक कार्यपालिका अफसरशाही पर नियंत्रण ख़त्म होना. मंत्री की भूमिका मात्र नीति बनाने तक महदूद रहेगी और उसका अमल अफसरों पर. अफसर ना तो तबादले के खौफ से बंगले पर जा कर सजदा करेगा ना हीं मलाईदार पोस्टिंग मंत्री के कहने पर होगी. चूंकि यह अवैध सम्बन्ध विकसित हीं नहीं होंगे नहीं लिहाज़ा अफसर चुनाव पूरी निष्पक्षता से कराएगा. हाँ , अगर कोई अफसर इन सबके बावजूद नेता से गलबहियां डालता है तो सी एस बी या आने वाला कानून उसे भविष्य में भी कोई लाभ हासिल नहीं करने देगा क्योंकि ट्रान्सफर और पोस्टिंग एक संस्था के हाथ में और कुछ नियमों के आधार पर होगी.
लेकिन यहाँ पर एक प्रश्न अभी भी अनुत्तरित रहा है. वह है क्या केंद्र या राज्य की सरकारें इस पर अमल करेंगी? प्रकाश  सिंह की याचिका पर पुलिस सुधार को लेकर इसी अदालत द्वारा सन २००६ में दिए गए एक अहम् फैसले में कुल सात  अनुशंसाएं की थी जिनमें छः का अनुपालन राज्य सरकारों को और एक का केंद्र सरकार को करना था. १५ राज्यों ने कानून तो बना दिए लेकिन वह कानून फैसले की मूल भावना के अनुरूप नहीं है. अन्य राज्यों ने  अपने यहाँ कार्यकारी आदेश बना दिए है. सबने यह कह दिया है कि आदेश का अनुपालन हो गया है परन्तु हकीकत यह है कि उसके प्रावधान ऐसे हैं जो नेता-अफसर अवैध गठ-जोड़ को और पुख्ता करते हैं. बिहार इसका ज्वलंत उदहारण है. ट्रान्सफर , पोस्टिंग का फैसला मुख्यमंत्री, मुख सचिव और पुलिस महानिदेशक की एक समिति करती है. कहना न होगा कि समिति के बाकि दोनों सदस्यों की हिम्मत नहीं कि मुख्य-मंत्री की बात काट सकें.
क्या वजह है कि सुप्रीम कोर्ट को ऐसे आदेश देने पड़ रहे हैं जो पहले से हीं मौजूद हैं. मसलन अफसर ऐसे किसी भी आदेश को जो मौखिक है या कानून –सम्मत नहीं है मना कर सकता है. कानून की मंशा के अनुरूप कार्य करने की बात उस पुलिस या अन्य अफसर को शपथ पत्र में हीं बताई जाती है. इसी तरह पहले से हीं अफसरों के तबादले को लेकर अवधि सम्बन्धी नियम बने हैं. पर क्या उनका अनुपालन होता है? पिछले चार दशकों में नेशनल पुलिस कमीशन (१९७७), रेबेरिओ समिति (९८) पद्मनाभ कमिटी (२०००) , हाल में सोली सोराबजी समिति, सुप्रीम कोर्ट का २००६ का फैसला और अब यह ताज़ा फैसला . क्या सरकारें  वास्तव में इन्हें अमल में लायेंगी? राजनीतिक वर्ग को सत्ता मद और तज्जनित सुख सबसे ज्यादह तब मिलता है जब अफसर उनके आगे नत-मस्तक होकर भक्ति भाव से गलत सही करते हैं. यह एक दुरभि संधि है जो सिस्टम को भ्रष्ट बनाती है , प्रजातंत्र को खोखला करती  है और समाज में संविधान के प्रति आस्था को डिगाती है.        
संस्थाओं की जन-स्वीकार्यता और तज्जनित सम्मान दिक्-काल सापेक्ष होता है शाश्वत नहीं. इस फॉर्मेट पर देखें तो राजनीतिक वर्ग के प्रति एक अनादर का भाव दूर तक जन मानस में घर कर चुका है. देश में एक सफाई अभियान चल रहा है. लाज़मी है ६५ साल की गर्द साफ़ करने में धूल उडेगी. सफाई करने वालों पर आरोप लगेगा कि झाड़ू हाथ दबाके नहीं चला रहे हैं. कुछ नाक दबा कर बगावती तेवर दिखायेंगे तो कुछ इसे नए रोगों का आगाज़ मानेंगे जिसके बैक्टीरिया धूल के कणों के साथ लोगों की नासिका रंध्र में घुस रहे होंगे.

सामान्य जन के मैन में एक हीं जिज्ञासा है क्या धूल साफ़ हो पायेगी, क्या कई दशकों का कीचड़ जो परत दर परत जमता हुआ स्वयं पत्थर का स्वरुप ले चुका है हट पायेगा. विरोध वे लोग कर रहे हैं जो इन्हीं पत्थर से अपनी इमारतें तामीर कर चुके है.   

rajsthan patrika