Thursday, 3 October 2013

देश का प्रजातंत्र पुख्ता हो रहा है


नोबेल पुरस्कार विजेता एवं विख्यात अर्थशास्त्री ने कहा था कि क्रियाशील प्रजातंत्र में दुर्भिक्ष नहीं होता क्योंकि मीडिया के जरिये बना हुआ जनमत का दबाव सरकारों को मजबूर करता है कि रसद कहीं से भी लेकर दुर्भिक्ष वाले क्षेत्र में पहुँचाया जाये. दरअसल बंगाल के १९४२ में हुए दुर्भिक्ष जिसमें करीब २० लाख लोग मारे गए थे, का ज़िक्र करते हुए सिद्ध किया था कि यह दुर्भिक्ष और मौतें महज ब्रितानी सरकार की उदासीनता के कारण था अन्यथा सरकार के पास रसद की कमी नहीं थी. अगर प्रजातंत्र रहता तो मीडिया और जनमत सरकार को इस रसद को बंगाल के गांवों में भजने को बाध्य होता.

आज ६३ साल के प्रजातान्त्रिक शासन के बाद सरकारें इस मीडिया के माध्यम से उभरे जनमत को नज़रंदाज़ नहीं कर पा रही है. भ्रष्टाचार के खिलाफ जिस तरह की सामूहिक चेतना उभरी है वह रंग ला रही है. राजनीतिक वर्ग, कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका सभी इससे प्रभावित हैं. और भ्रष्टाचारी नेता को सलाखों के पीछे देख कर इस बदलते भारत को सहज हीं पहचाना जा सकता है. एक और भी स्थिति पनपती है. अगर एक संस्था पुराने ढर्रे पर बने रहना चाहती है या ऐसी हीं कई अन्य संस्थाएं यथास्थिति को बनाये रखना चाहती है तो कोई एक औपचारिक या अनौपचारिक संस्था या ताकतवर व्यक्ति अचानक उठ  खड़ा होता है और जन-समर्थन के बूते यथास्थितिवादी संस्थओं के मंसूबे ढेर कर दिए जाते हैं.

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी का प्रेस कांफ्रेंस में अपनी हीं सरकार के खिलाफ बोलना उसी जन-भावना के प्रभाव का असर था. सुप्रीम कोर्ट का भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम की धारा ८(४) को गैर-कानूनी करार देने भी उसी का हिस्सा था. इसके उलट सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के खिलाफ चुने हुए जन प्रतिनिधियों को जिन्हें अदालत से से दो साल से अधिक की सजा मिल चुकी हो दोबारा बचाना  लोक सभा की यथास्थितिवादी प्रवृति का मुजाहरा करता है. राज्य सभा बेहतर सोच का था और इस बिल पर पानी फेरते हुए स्थायी समिति को सुपुर्द करने का फैसला लिया गया. फिर यथास्थितिवादी जिद के तहत कांग्रेस का एक वर्ग, भारत सरकार का मंत्रिमंडल “खूंटा वहीं गड़ेगा” के भाव में आकर अध्यादेश लाता है तो अचानक देश के राष्ट्रपति तन कर खड़े हो जाते है क्योंकि ६० साल राजनीति में रहने की वजह उन्हें जन-भावना की ताकत का अहसास था. राहुल का तेवर भी उसी लाइन पर था.

यह ठीक है कि प्रधानमंत्री, मंत्रिमंडल,  कांग्रेस की कोर कमिटी की गरिमा गिरी पर जब जन-भावना की क़द्र नहीं होगी तो आज नहीं तो कल यथास्थितिवादी संस्थाओं और व्यक्तियों की इज्ज़त खतरे में तो होगी हीं.

राष्ट्रीय जनता दल के लालू यादव को भी मुख्यमंत्री रहते हुए यही लगा कि संविधान, कानून और सिस्टम तो मेरी चेरी है. तभी तो भ्रष्टाचार करते हुए यह भी नहीं सोचा कि फर्जी बिल में भैंस ढोने के लिए कम से कम स्कूटर के नंबर की जगह ट्रक का नंबर डाल देते.

हाल के दौर में अचानक सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में भ्रष्टाचार निरोधक कानून की धारा ८() रद्द करते हुए कहा कि संसद या विधायिका का सदस्य अगर दो साल से अधिक सजा वाली धारा में सजा पाता है तो वह सदस्य महज इस लिए नहीं रहेगा कि वह चुना गया है और ऊपरी अदालत ने उसकी अपील मंज़ूर कर ली है”. सभी राजनीतिक दल डर गए और एक स्वर में इस आदेश के खिलाफ कानून बनाने पर राज़ी हो गए. लेकिन देश में कई बार शर्म का झीना आवरण बड़े से बड़े बेशर्म हरकत पर भारी पड़ता है. यही हुआ. संसद में यह बिल स्थायी समिति के पास चला गया. कानून नहीं बन सका. लेकिन लालू का दबाव सरकार पर पड़ता रहा मानो लालू पूछ रहे हों --- इतने दिन सेवा का यह सिला क्यों ?. केंद्र सरकार को भी अगले चुनाव में लालू की ज़रुरत थी. लिहाज़ा शासन के लिए बने शर्मो--हया की सभी हदें पार करते हुए मनमोहन सरकार ने अध्यादेश को राष्ट्रपति के पास भेजा. राष्ट्रपति को भी यह बेशर्मी खटकी. बिल वापस भेज दिया गया. दबाव इतना था कि सरकार इसे दुबारा भेज देती और राष्ट्रपति को मजबूरन दस्तखत करना पड़ता. पर इस बीच कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी की नैतिकता जगी, और उन्होंने तीसरी आँख खोल दी. बिल भष्म होने लगा.

कहने का मतलब लालू भ्रष्टाचार की इस यात्रा में कोई मददगार सी बी आई का डी आई जी स्तर  का अधिकारी मिला तो कोई ईमानदार आई जी स्टार का अधिकारी यूं एन विश्वास. कोई प्रधान मंत्री मित्र मिला तो कोई सुप्रीम कोर्ट बेंच इन्साफ की तराजू थामे दिखी. सरकार कोई पूरा का पूरा मंत्रिमंडल मददगार मिला तो कोई उसी सत्ता पक्ष की सबसे बड़ी पार्टी का सबसे ताकतवर व्यक्ति सब बेशर्म हरकतों पर अपने हीं लोगों पर लानत मलानत करता हुए सत्य के पक्ष में इस भाव में खड़ा  कि पार्टी का भविष्य कुछ भी हो चुनाव में, भ्रष्टाचारी को बचने का यह सरकारी नाटक नहीं होने दूंगा .

   यह बात सही है कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी ने जिस आक्रामक तेवर के जरिये सरकार के गलत प्रयास को रोका उससे उनकी छवि एक बार फिर जन-मानस में सकारात्मक रूप से घर कर गयी है. यही तो जनता चाहती है कि उनका लीडर भ्रष्टाचार देख कर क्रुद्ध हो जाये. वह चाहती है कि उनका लीडर ऐसी सस्थाओं या सोच को जो रंचमात्र भी भ्रष्टाचार को प्रश्रय देने चाहती है उन्हें तार-तार कर सड़क पर छोड़ दे (चौराहे पर फंसी देने के भाव में). राहुल ने यह किया. उनकी भ्रष्टाचार को लेकर “जीरो टोलरेंस” (शून्य सहिष्णुता) का यह आलम था कि पार्टी की एक प्रेस कांफ्रेंस में अचानक पहुंचते हैं और वह भी तब जब पार्टी का प्रवक्ता राजनीति में अपराधीकरण को बनाये रखने वाले अध्यादेश के पक्ष में कसीदे काढ रहा था. राहुल इस अध्यादेश को न केवल फाड़ कर फेंकने की बात कहते हैं बल्कि यह भी कहते हैं कि “मैं फिर से दोहराता हूँ –इस अध्यादेश बकवास है और इसे फाड़ कर फेंक देने चाहिए”. “फाड़ना” , “बकवास” या “मैं फिर दोहराता हूँ” यह उसी भाव को प्रतिबिंबित करता है जिसके तहत जनता भ्रष्टाचारी को “चौराहे पर गोली मारने” की बात कहती है. 

प्रजातान्त्रिक व्यवस्था के स्थापित मूल्यों के खिलाफ एक और भी स्थिति बनी है. राहुल का विद्रोही भाव उन सभी पार्टी के नेताओं की दयनीय स्थिति बताता है. रीढ़-विहीनता की हद थी जब कोई प्रवक्ता राहुल के इस आक्रामक रुख पर यूं-टर्न लेने में दो सेकंड की देरी भी नहीं करता और कहता है कि जो राहुल जी ने कहा वहीं पार्टी की राय  है. कोई पूछे कि अभी दो सेकंड पहले आप  जो कह रहे थे वह क्या था? इस बात की भी होड़ मंत्रियों में लग गयी कि  कौन मंत्रिमंडल में लिए गए अपने हीं फैसले की कितनी निंदा कर सकता है. 

फिर भी एक बात साफ़ है. जब जब राहुल इस भाव में आते हैं जनता में एक नयी आशा की किरण जगती है. उसे यह लगता है कि नेहरु-गाँधी परिवार का कोई युवा सार्थक क्रोध में आता है और इस सड़े सिस्टम को उखड फेंकना चाहता है. दलित के घर खाना खाना और रात बिताना, हजारों साल के सामंती शोषण की मानसिकता को झटका देता है और लगता है कि नहीं ये राजा तो गरीबों का हमदर्द है. मेट्रो में चलना , एस पी जी को धता बता कर भीड़ में घुस कर हाथ मिलाना भी आम जनता को भाता है.

राहुल का भ्रष्टाचार या राजनीति के अपराधीकरण को लेकर यह गुस्से का भाव नरेन्द्र मोदी या भारतीय जनता पार्टी के लिए बचैनी पैदा करने वाला हो सकता है. दरअसल मोदी का भी “यूं एस पी” यही है. बढ़ी दाढ़ी (लेकिन राहुल से सफ़ेद), संस्थाओं और व्यक्तियों की गरिमा को झटके में गिरा देने का हौसला, लीक से हट कर अपनी बात खडी करना मोदी की भी सुनियोजित रणनीति रही है. और इसका लाभ भी मिला है वरना विकास के पैमाने पर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने कुछ कम नहीं किया है. लेकिन उन्हें पाकिस्तान को ललकारते हुए अनुप्रास अलंकार में “छप्पन इंच छाती” कहने की कला नहीं आती जो भारतीय जन-मानस को भाती है. 

शायद यही है परिपक्व होते प्रजातंत्र की खूबसूरती.
patrika

राहुल का विद्रोही भाव जनता को रास आता है



प्रजातंत्र में राजकीय नीति निर्धारण एक जटिल प्रक्रिया है जो बहु-स्तरीय सामूहिक विचार-विमर्श के बाद ली जाती है. इसके लिए शासन तंत्र याने मंत्रिमंडल व शासनेतर संस्थाएं जैसे पार्टी फोरम और जन-संवाद के धरातल, मीडिया की बड़ी भूमिका होती है. लेकिन कई बार शीर्ष मान्यता वाले लोग अचानक इस प्रक्रिया को एक झटके से तोड़ कर तात्कालिक जन-भावना को अपील करने वाली बात के साथ अपने को जोड़ते हुए जनता के चहेते बन जाते हैं. इसका नुकसान यह होता है कि संस्थाओं का कद घट जाता है और जनता का विश्वास इस विधि-सम्मत और “लेजिटिमेट” प्रक्रिया से हट कर व्यक्ति पर चला जाता है. अर्थात उस व्यक्ति का कद तो बढ़ जाता है पर इसकी कीमत प्रजातंत्र को चुकानी पड़ती है. यह कुछ रॉबिनहुड इमेज जैसा होता है.

यह बात सही है कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी ने जिस आक्रामक तेवर के जरिये सरकार के गलत प्रयास को रोका उससे उनकी छवि एक बार फिर जन-मानस में सकारात्मक रूप से घर कर गयी है. यही तो जनता चाहती है कि उनका लीडर भ्रष्टाचार देख कर क्रुद्ध हो जाये. वह चाहती है कि उनका लीडर ऐसी सस्थाओं या सोच को जो रंचमात्र भी भ्रष्टाचार को प्रश्रय देने चाहती है उन्हें तार-तार कर सड़क पर छोड़ दे (चौराहे पर फंसी देने के भाव में). राहुल ने यह किया. उनकी भ्रष्टाचार को लेकर “जीरो टोलरेंस” (शून्य सहिष्णुता) का यह आलम था कि पार्टी की एक प्रेस कांफ्रेंस में अचानक पहुंचते हैं और वह भी तब जब पार्टी का प्रवक्ता राजनीति में अपराधीकरण को बनाये रखने वाले अध्यादेश के पक्ष में कसीदे काढ रहा था. राहुल इस अध्यादेश को न केवल फाड़ कर फेंकने की बात कहते हैं बल्कि यह भी कहते हैं कि “मैं फिर से दोहराता हूँ –इस अध्यादेश बकवास है और इसे फाड़ कर फेंक देने चाहिए”. “फाड़ना” , “बकवास” या “मैं फिर दोहराता हूँ” यह उसी भाव को प्रतिबिंबित करता है जिसके तहत जनता भ्रष्टाचारी को “चौराहे पर गोली मारने” की बात कहती है.     

प्रजातान्त्रिक व्यवस्था के स्थापित मूल्यों के खिलाफ एक और भी स्थिति बनी है. राहुल का विद्रोही भाव उन सभी पार्टी के नेताओं की दयनीय स्थिति बताता है. रीढ़-विहीनता की हद थी जब कोई प्रवक्ता राहुल के इस आक्रामक रुख पर यूं-टर्न लेने में दो सेकंड की देरी भी नहीं करता और कहता है कि जो राहुल जी ने कहा वहीं पार्टी की राय  है. कोई पूछे कि अभी दो सेकंड पहले आप  जो कह रहे थे वह क्या था? इस बात की भी होड़ मंत्रियों में लग गयी कि  कौन मंत्रिमंडल में लिए गए अपने हीं फैसले की कितनी निंदा कर सकता है. 

फिर भी एक बात साफ़ है. जब जब राहुल इस भाव में आते हैं जनता में एक नयी आशा की किरण जगती है. उसे यह लगता है कि नेहरु-गाँधी परिवार का कोई युवा सार्थक क्रोध में आता है और इस सड़े सिस्टम को उखड फेंकना चाहता है. दलित के घर खाना खाना और रात बिताना, हजारों साल के सामंती शोषण की मानसिकता को झटका देता है और लगता है कि नहीं ये राजा तो गरीबों का हमदर्द है. मेट्रो में चलना , एस पी जी को धता बता कर भीड़ में घुस कर हाथ मिलाना भी आम जनता को भाता है.

राहुल का भ्रष्टाचार या राजनीति के अपराधीकरण को लेकर यह गुस्से का भाव नरेन्द्र मोदी या भारतीय जनता पार्टी के लिए बचैनी पैदा करने वाला हो सकता है. दरअसल मोदी का भी “यूं एस पी” यही है. बढ़ी दाढ़ी (लेकिन राहुल से सफ़ेद), संस्थाओं और व्यक्तियों की गरिमा को झटके में गिरा देने का हौसला, लीक से हट कर अपनी बात खडी करना मोदी की भी सुनियोजित रणनीति रही है. और इसका लाभ भी मिला है वरना विकास के पैमाने पर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने कुछ कम नहीं किया है. लेकिन उन्हें पाकिस्तान को ललकारते हुए अनुप्रास अलंकार में “छप्पन इंच छाती” कहने की कला नहीं आती जो भारतीय जन-मानस को भाती है.

लेकिन एक बात साफ़ है कि अगर राहुल आज भी अपनी इस “एंग्री यंगमैन” की इमेज को स्थायी भाव बना लें तो मोदी को गिरती हुई साख वाले कांग्रेस के बीच से हीं  ना केवल एक दमदार विपक्षी मिलेगा बल्कि मोदी से ज्यादा अपील और सर्वस्वीकार्य चेहरा भी जनता को विकल्प के रूप में मिलेगा. मुश्किल यह है कि राहुल एक बार यह कहने की बाद नेपथ्य में चले जाती हैं. जयपुर में जब राहुल ने अपनी हीं पार्टी के चरित्र पर जबरदस्त प्रहार किया तो जन-मानस में इस युवराज के लिए विश्वास पनपा. लेकिन अगले कुछ महीनों तक राहुल का यह भाव नहीं देखने को नहीं मिला. इधर मोदी चुनाव के अखाड़े में हर दूसरे दिन ताल ठोकते रहे तो भी जनता ने सोचा कि पीढ़ी के अंतर वाले दो प्रतिद्वंद्वियों के बीच मुकाबला होगा जन धरातल पर. पर कुछ समय में लगने लगा कि एक पहलवान ने वॉकओवर दे कर मैदान हीं छोड़ दिया है . प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह से मुकाबले की अपेक्षा न तो पहले थी ना अब है.

आज भी कांग्रेस के लिए एक हीं रास्ता बच रहा है. भ्रष्टाचार, कुशासन, महंगाई और राजनीति के अपराधीकरण से त्रस्त लोगों को कांग्रेस रंच मात्र भी नहीं भा रही है लेकिन अगर राहुल का अपने हीं लोगों के खिलाफ विद्रोही भाव में आकर जनता में विश्वास दिलाते हैं तो  मोदी के लिए महंगा पड़ सकता है.

यही वजह है कि भारतीय जनता पार्टी एक बार फिर राहुल पर चौतरफा हमला करने को अपनी रणनीति का सबसे बड़ा हिस्सा मानने लगी है.

ध्यान देने की बात यह है कि पिछले तीन चुनावों में (याने सन १९९८ से २००९ के बीच ) भारतीय जनता पार्टी ने हर तीसरे मतदाता को खोया है जबकि कांग्रेस पिछले २० सालों में कमोबेश २८ प्रतिशत का वोट पाती रही है. लिहाज़ा यह सोचना कि कांग्रेस पूरी तरह से ख़ारिज की जायेगी गलत होगा. आखिर वो कौन १२ करोड़ मतदाता हैं जिन्होंने कांग्रेस को २००९ में वोट दिया जबकि भारतीय जनता पार्टी मात्र आठ करोड़ पर सिमट गयी. क्या मोदी यह खाई भर पाएंगे ?        
जहाँ तक राहुल के अपने हीं प्रधान मंत्री के खिलाफ सिद्धे जनता में जाने या अपनी हीं सरकार व मंत्रिमंडल  को नीचा दिखने का भाव है यह बौद्धिक जुगाली का विषय तो हो सकता है पर जनता में इसका सन्देश अच्छा गया है.          

lokmat

Monday, 16 September 2013

मोदी: चाय की दुकान से रायसीना हिल्स चौराहे तक


किसी व्यक्ति को समझने और मूल्यांकन करने के दो तरीके होते हैं. एक तरीका है आप उसके द्वारा किये गए कार्यों और उनके निष्पादन के लिए हुआ बलिदान नज़र में रख कर बेबाक मूल्यांकन परिणाम को लक्ष्य में रखते हुए करें, इस फॉर्मेट के विश्लेषण की शर्त है कि व्यक्तिकी उपलब्धियों को गौण माना जाये. दूसरा तरीका है आप उसके जीवन में प्राप्त ऊँचाइयों को देखते हुए यह मान कर चलें कि इतनी उंचाई हासिल करने वाला शख्स कोई सामान्य तो होगा नहीं और तब उसने जो-जो किया उसे हीं सत्य और औचित्य का प्रतिमान मान लें और उसकी उपलब्धि के आधार पर उसके कार्यों की विवेचना करें. यह दूसरा तरीका तर्क-निष्ठ नहीं होता और जिसकी वजह से कई बार व्यक्ति का सही विश्लेषण या मूल्यांकन नहीं हो पाता.
नरेन्द्र भाई मोदी देश की सबसे बड़ी पार्टी, भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार घोषित हो गए. जाने अनजाने में जन –संवाद के धरातल पर चाय की दूकान से चौपाल तक और सी आई आई के एयरकंडीशंड मीटिंग हॉल से टीवी चैनलों के स्टूडियो तक यह चर्चा हो रही है कि “मोदी माने क्या?” प्रजातंत्र के लिए इससे अच्छा संकेत कोई हो हीं नहीं सकता. इस तरह के मूल्यांकन से हम यह समझ पाते हैं कि अगर यह व्यक्ति पूर्व में ऐसा रहा है तो आगे क्या-क्या करेगा. लेकिन कोई भी मूल्यांकन दिक्-काल-स्थिति – सापेक्ष होता है लिहाज़ा तज्जनित पूर्वाग्रह दोष से ग्रसित होता है. कोशिश यह होनी चाहिए कि ये पूर्वाग्रह कम से कम हों.
मोदी के व्यक्तित्व से चार अवधारणायें जुडी हैं. “मोदी के आने से शासन में भ्रष्टाचारियों की तो शामत आ जायेगी”. “मोदी आये तो आतंकियों को पाकिस्तान में हीं शरण के लिए जाना पड़ेगा”. “मोदी के शासन में अब तक सुस्त प्रशासन की तो ऐसी-तैसी हो जायेगी”. और “ मोदी के ज़माने में विकास के पंख लग जायेंगे”. याने मोदी के इमेज में चार पहलू “भ्रष्टाचार के खिलाफ जेहादी, आतंकवादियों का नाशक , विकासकर्ता और अच्छा शासक” चस्पा हो गए हैं. और चस्पा भी इसलिए हुए क्योंकि यू पी ए -२ की मनमोहन सरकार इन सभी मुद्दों पर असफल रही या ऐसा जन-मानस में सन्देश गया. कई बार काम करने से ज्यादह उसके सार्थक प्रचार से सत्ता पक्ष सन्देश भेजता है मनमोहन सरकार उसमें भी बुरी तरह असफल रही. कोयला घोटाला हीं नहीं हुआ , घोटाले को लेकर जो “शून्य-सहिष्णुता” का सन्देश जाना चाहिए था उसकी जगह सन्देश गया “ दोषियों को बचाने का” (सी बी आई निदेशक को बुलाकर जांच रिपोर्ट में बदलाव करवाने से लेकर फाइलें गायब करने तक).  
सत्ता पक्ष अगर अक्षम हो तो विपक्ष का काम कितना सहज हो जाता है यह वर्तमान परिदृश्य साफ़ बताता है. ऐसा नहीं कि विकास नहीं हुआ या जन-कल्याण के कार्य नहीं हुए. मनरेगा, सर्वशिक्षा, राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य योजना, मिड-डे मील अपने –आप में विश्व में अनूठे कार्यक्रम रहे हैं, खाद्य सुरक्षा कानून, सूचना व शिक्षा का अधिकार किसी भी विकसित समाज में नागरिक सशक्तिकरण का सर्वोत्तम जरिया होते हैं जो इस सरकार ने दिया. लेकिंज सन्देश यह गया कि यह सरकार भष्ट और निकम्मी हीं नहीं है बल्कि इन दुर्गुणों को छुपाने के लिए संस्थाओं को शक्तिहीन भी करना चाहती है.
ऐसे में मोदी का राष्ट्रीय जन धरातल पर आंकलन होता है. अपने हीं पार्टी में बेहतर काम करनेवाले, विकास की अच्छी समझ रखने वाले छत्तीसगढ़ के मुख्मंत्री पीछे छूट जाते हैं. नीतीश भी इसी इमेज बिल्डिंग के जरिये विकासकर्ता की छवि लेकर बढ़ते हैं पर मोदी से टकराने पर एक विज्ञापन में सीमेंट वाले हाथी की मानिंद चूर-चूर हो जाते हैं.
राजनीति- शास्त्र के सिद्धांत के अनुसार अर्ध-शिक्षित व अल्प तर्क-शक्ति वाले समाज में भावनात्मक  मुद्दे वास्तविक मुद्दों पर भारी पड़ जाते हैं और ऐसे में नेताओं और पार्टियों का मूल्यांकन गलत हो जाता है. इसमें दो राय नहीं है कि विकल्पहीनता की स्थिति में मोदी हीं देश की समस्या का जवाब हैं, राहुल उस फॉर्मेट में आ सकते थे पर वह चुनौती स्वीकार नहीं कर रहे हैं.
पर मोदी को अपने नकारात्मक पहलू भी समझने होंगे. यह मान लेना कि चाय की दूकान से रायसीना हिल्स चौराहा (प्रधानमंत्री कार्यालय के पास का चौराहा) मात्र उनकी क्षमता और गुणों का परिणाम है गलत होगा. मोदी सन २००२ में उस दिन हीं राजनीतिक रूप से ख़त्म हो जाते जिस दिन दंगे भड़के लेकिन केंद्र में भी भारतीय जनता पार्टी की सरकार ढाल बन गयी. मोदी उस दिन भी ख़त्म थे जिस दिन वाजपेयी ने उन्हें जन मंच से “राजधर्म” निभाने की सलाह दी थी लेकिन अडवाणी ढाल बन कर खड़े हो गए.
मोदी की इमेज जहाँ भ्रष्टाचार के खिलाफ “जोरे टॉलरेंस” की है वहीं यह भी इमेज है कि अपनी बात के खिलाफ किसी भी आवाज़ के प्रति उनमें “जीरो टॉलरेंस” (बर्दाश्त ना करना)  है. एक प्रजातान्त्रिक व्यवस्था में नेता का विरोधी स्वर को लेकर जीरो टॉलरेंस मात्र दुश्मन हीं पैदा करता है आज नहीं तो कल. मोदी का आगाज़ हीं विरोध से हुआ है यह अच्छा नहीं है. देखने में चाहे कितना हीं गौण लगे और यह भाव मन में घर करे कि आडवाणी को हैसियत दिखा दी गयी , मोदी को निर्विरोध (आडवाणी को छोड़ कर) चुना गए, लेकिन यह आने वाले दिनों में यह सन्देश ज़रूर देगा कि मोदी “निर्विरोध” नेता नहीं थे.
दूसरा, मीडिया के प्रति मोदी का भाव हमेशा हिकारत का रहा है. जबकि यहाँ तक आने में जाने-अनजाने में मीडिया की बड़ी भूमिका रही है. अहंकार और जन-अभिमत में नेता कई बार भूल जाते हैं कि मीडिया या ऐसी हीं कई संस्थाओं का सत्ता विरोध शाश्वत भाव होता है और वह मोदी या मनमोहन में फर्क नहीं करता. लिहाज़ा मोदी को यह सन्देश देना होगा कि उनके अहंकार में  कमी आई है. अभी तक यह भाव देखने में नहीं आया है. मोदी केशूभाई पटेल के यहाँ जीतने का बाद “आशीर्वाद” लेने जाते हैं.आडवाणी के तब तक पैर-छूने नहीं जाते जब तक नाम की घोषणा नहीं की जाती. दरअसल यह विनम्रता नहीं विनम्रता का ड्रामा होता है जिसमें प्रतिद्वंद्वी को चिढाने का भाव ज्यादा होता है.
व्यक्तित्व के यह दोष नेता का सर्वमान्यता में हमेशा बाधक बनते है. यही वजह है कि सुषम स्वराज को भी वही डर सता रहा है जो संघ को. फिर भी संघ ने जुआ खेला है. साझा सरकार के इस युग में यही डर अन्य पार्टियों को अपने साथ जोड़ने में मोदी को झेलना होगा. संघ और भारतीय जनता पार्टी का आडवाणी के घर तीन दिन सजदा करना मात्र इसलिए था कि संघ को भी आडवाणी की ज़रुरत इसलिए है कि जुए का दांव अगर गलत हो गया तो मोदी के बरअक्स खड़ा होने के लिए एक बड़े कद का नेता चाहिए और वह कद सिर्फ आडवाणी का हीं है.
फिर भी आम जन का विश्वास है कि मोदी हीं देश को ऊँचाइयों तक ले जा सकते हैं मोदी को इस विश्वास पर खरा उतरना एक बड़ी चुनौती है.  
rajsthan patrika 

Monday, 9 September 2013

कैसे, क्यों और कौन होते है “बाबाओं” के भक्त ?



हम अगर प्लेग, हैजा, चेचक और पोलियो ऐसी बीमारियों से निकल पाए हैं, खाना-बदोश जीवन, गुलाम परंपरा या सती प्रथा से छुटकारा पा सके हैं, क्रूरतम शासकों के शोषक व्यवस्था से निकल पाए है तो यह किसी भभूत बेंचने वाले बाबा की वजह से नहीं बल्कि वैज्ञानिक-तार्किक सोच की वजह से. फिर क्या वजह है कि बाबाओं की दूकान में न केवल अशिक्षित लोगों का बल्कि कुछ तथाकथित पढ़े –लिखे लोगों का भी सर्वस्व न्योछावर करने” के भाव में जमवाड़ा लगा रहता है?

मेरे ऑफिस का ड्राईवर एक दिन छुट्टी चाहता था, बच्चे के ईलाज के लिए. पूछा कि क्या बीमारी है ताकि किसी परिचित अच्छे डॉक्टर से दिखवाया जा सके. उसने अन्यमनस्क भाव से कहा “नहीं डॉक्टर से नहीं होगा, पडोसी ने कुछ कर दिया है एक ओझा के यहाँ ले जाना है”. मुझे मालूम है कि इसके खिलाफ मैंने जो भी तर्क दिए वह उनसे मुतासिर नहीं हुआ होगा. ओझा मेरे तर्कों पर भारी पड़ा होगा. लेकिन इस घटना के कुछ दिन बाद हीं मैंने एक भारतीय प्रशासन सेवा के एक अधिकारी को एक बाबा के यहाँ नतमस्तक होते और अपने बच्चे के ईलाज का उपाय पूछते देखा तब लगा शिक्षा और वैज्ञानिक सोच का कोई अपरिहार्य सम्बन्ध नहीं होता. व्यक्तिगत स्वार्थ-सिद्धि के वशीभूत यहाँ आकर कम पढ़े-लिखे ड्राइवर और अपेक्षाकृत शिक्षित अफसर में एक समभाव दिखाई देते है.

जिस देश में तर्क-शास्त्र की एक परंपरा रही हो , जहाँ अद्वैतवाद से लेकर चार्वाक दर्शन को समान रूप से प्रश्रय देते हुए तर्क की परम्परा को आगे बढाया गया हो उसमें समाज के एक बड़े वर्ग में सामूहिक और व्यक्तिगत सोच इतनी कुंठित होना कहीं बीमारी की जबरदस्त गहराई का संकेत देती है. ठीक है कि ईश्वर पर आस्था विज्ञान की उस कमजोरी की परिणति है जिसके तहत हम एक सीमा से आगे नहीं बढ़ पाते. याने अगर एलोपैथी कैंसर ठीक नहीं कर पा रहा तो निश्चित हीं लोग बाबा की ओर रुख करेंगे भले हीं उसका वैज्ञानिक आधार हो या नहीं. अगर ईश्वर की सत्ता साइंस आज तक नकार नहीं पाया है और दूसरी ओर उसके अस्तित्व पर दुनिया में व्याप्त शोषण के बरअक्स शेखों की अय्यासी के किस्से, प्राचीन की गुलाम परम्परा, सती प्रथा या बलात्कार की चीत्कार प्रश्न चिन्ह लगाते हैं. ऐसे में कम शिक्षा, तार्किक ज्ञान के अभाव ने भूत ,प्रेत और उनसे झुटकारादिलाने वाले बाबाओं और मौलवियों को जन्म दिया.

नतीजा यह हुआ कि डायन मानकर देश में पिछले १५ सालों  में करीब २५०० महिलाओं की हत्या हुई याने हर दूसरे दिन एक हत्या, जिनमें समूह में लोगों ने यह कुकृत्य किया यह मानते हुए कि यह गाँव या घर को खाने आयी है. केवल झारखण्ड के पांच ब्लोकों में २००१-२००८ के बीच ४५४ महिलाओं को डायन समझ कर मारा गया याने हर पांच दिन में एक.

 परन्तु ईश्वर पर आस्था रखना, व्यक्तिगत जीवन में आध्यात्म की ओर झुकाव रखना एक बात है, बाबा के कहने पर अपनी बेटी को उसके साथ अकेले छोड़ना ताकि यह बाबा उस पर आयी प्रेत बाधा को दूर करे बिलकुल अलग. इस प्रक्रिया में हम अपनी आत्मा को और अपनी तर्क-शक्ति को गिरवी रखते हैं, सोच को कुंठित होने देते हैं और अज्ञानता के उस गर्त में गिरते चले जाते हैं जहाँ से हम तो बाहर निकलते हीं नहीं अपने परिवार को भी नहीं निकलने देते. बड़ा होकर वह बच्चा भी अपने बच्चे को वहीं सोच रखने पर मजबूर करता है.

जिस देश में गीता ऐसा महान तार्किक ग्रन्थ हो जो आत्मोत्थान के हर आयाम को सपष्ट रूप से निर्दिष्ट करता हो उस देश में बाबाओं की भरमार एक ऐसा सामाजिक-सांस्कृतिक व्याधि है जो पूरे समाज को फिर उसी जड़ता की ओर ले जा रहा है जिसकी जकड में हम सारे मानव विकास को खो रहे हैं.

महात्मा गाँधी के करोड़ों अनुयाइयों ने देश की आज़ादी के लिए के लिए क़ुरबानी देने की कसम खाई, हजारों ने दी. महर्षि दयानंद, विवेकानंद, नेहरु, इंदिरा सब के अनुयायी थे. समाज में विभिन्न धरातलों के नेता होते हैं और उनके अनुयायी होते हैं. यह परम्परा सनातन काल से चली आई है. हिटलर के भी अनुयाई थे, मार्क्स और लेनिन के भी. वर्तमान में कुछ लोग सोनिया गाँधी को तो कुछ लोग मोदी को अपना नेता मानते हैं. मंदिर को लेकर १९९२ में एक बड़ा जन सैलाब विश्व हिन्दू परिषद् के नेताओं, भारतीय जनता पार्टी के नेताओं और गेरुआधारी साध्वियों को नेता मानने लगा था तो २०११ से एक जनसैलाब भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के साथ हो लिया. आज भारत में कोई साईं बाबा का भक्त है; कोई बाबा राम देव का और कोई श्री श्री रवि शंकर. एक अन्य वर्ग आसाराम बापू को देख कर भगवत दर्शन मान लेता है तो एक अन्य वर्ग मोरारी बापू जहाँ से जाते हैं उस रास्ते की धूल को माथे लगाता है.  

इन सब नेताओं और अनुयाइयों के बीच सम्बन्ध में मूल अंतर क्या है? इनमें नेताओं का व्यापक तौर पर तीन वर्ग है. एक जो देश की आज़ादी या समाज की भलाई का सन्देश देता है. गाँधी, विवेकानंद, दयानंद इस वर्ग में आते हैं. नेहरु और इंदिरा विकास का सन्देश दे कर जन-मानस अपनी ओर करते हैं. हिटलर भी करता कुछ ऐसा हीं हैं पर मूल सोच में व्यापक समाज नहीं एक पक्ष होता है जो अन्य पक्ष को ख़त्म करने तक की बात करता है. कहने का मतलब यह कि जिनता व्यापक उद्देश्य उतनी हीं उसकी नैतिक व कानूनी मान्यता. दूसरा वर्ग होता है उन संतों का जो प्रचलित भक्ति मार्ग पर लोगों को ले जा कर भजन वगैरह करते हैं.

समस्या तब आती है जब हम अपने व्यक्तिगत स्वार्थों के लिए “मुक़दमा जीतने, बेटा पाने, धन अर्जित करने के लिए” किसी बाबा के दरबार में जाते हैं यह समझे बिना कि कैसे कोई संत चाहे कितनी भी ईश्वरीय शक्ति रखता हो, यह काम नहीं कर सकता क्योंकि स्वयं ईश्वरीय व्यवस्था ऐसा करने से ध्वस्त हो जायेगी जिसकी इजाज़त भगवान भी नहीं देगा. ना हीं इस बाबा को इसकी इज़ाज़त मिलेगी कि भक्त मुकदमा जीत जाये और गैर-भक्त हार जाये (दोनों उसी भगवान् के बनाये हैं). लिहाज़ा जब वह भक्त “दरबार” में जा कर व्यापार बढ़ने की भीख मांगता है तो यह तथाकथित बाबा समझ जाता है कि इस “भक्त” के पास  औसत तर्क-शक्ति भी नहीं हैं या स्वार्थ ने इसे अँधा कर दिया है. बस फ़ौरन हीं वह भरे दरबार में उसे हरी चटनी के साथ समोसा खाने की सलाह दे देता है. अगले बार यह दरबार कहीं और लगता है. कोई ३२.८० लाख वर्ग किमी के और १२५ करोड़ आबादी वाले इस देश में बेवकूफ बनाना और आसान हो जाता है जब उसके गुर्गे आने के पहले हीं इस स्वार्थ में अंधे भक्त का दरबार के गेट पर हीं ब्रेनवाश कर चुका हो. इसके बाद किसी भक्त की जवान बीबी या जवान बेटी का भूत उतरना और उसके लिए रात में अकेले बुलाना सहज हो जाता है.

आज ज़रुरत है देश में वैज्ञानिक सोच समृद्ध करने की. यह सोच अगर विकसित हो गया तो ना तो भक्त बनेगे ना बाबा रहेगा. बाबा बनने की शर्त होगी समाजोत्थान की बात करना गाँधी, विवेकानंद की तरह ना कि वर्तमान में दूकान लगाये दर्ज़नों बाबाओं कि तरह कोई भूत बाधा दूर करने का ठेका लेगा और फिर कुकर्म करेगा. यही सोच पूरे समाज को भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े होने को मजबूर करेगी और जाति, धर्म , उपजाति के नाम पर वोट ना देने को प्रेरित करेगी.  

  hindustan

Saturday, 7 September 2013

भारतीय इंटेलिजेंस, आतंकवाद और पाकिस्तान


युवा यासीन भटकल और कुछ हीं दिन पहले ७१ वर्षीय टुंडा की गिरफतारी में एक मौलिक अंतर है. टुंडा अब रोज-रोज भारत में होने वाली पाक-प्रायोजित आतंकवादी घटनाओं में शामिल नहीं है. उससे मिली जानकारी विश्व समुदाय में पाकिस्तान का आतंकवादी चेहरा बेनकाब करने में भारत को मदद मिलेगी जबकि यासीन आज भी इन आतंकवादी का प्रमुख नियोक्ता रहा है और अधिकांश “माड्यूल्स” और “स्लीपर सेल्स” की जानकारी रखता है. साथ हीं बहुत सारे अनसुलझे मामले भी पुलिस सुलझा सकती है.        

हम अक्सर अमेरिका से तुलना करते हैं यह कहते हुए कि अगर वह ९/११ की आतंकी घटना के बाद यह सुनिश्चित कर सकता है कि अगले १२ सालों में फिर कोई इस तरह की हिम्मत न कर सके तो भारत क्यों नहीं? या अगर हमले का बाद वहां का राष्ट्रपति दुनिया को सख्त सन्देश दे सकता है कि “इस घटना के लिए जिम्मेंदार जो कोई भी हो, जहाँ कहीं भी हों उन्हें बिल से चूहे की तरह निकाल लाओ” या “इस मामले में दुनिया के लोग या तो हमारे साथ हैं या आतंकियों के साथ हैं”. और वाकई आतंक के पर्याय ओसामा बिन लादेन को बिल से हीं निकाला.

प्रश्न है कि हम क्यों नहीं आतंकवादी घटनाओं को ख़त्म कर पाते या दाऊद के साथ वही कर पाते जो अमेरिका ने ओसामा के साथ किया? इस प्रश्न को ड्राइंग रूम आउटरेज (टीवी के सामने बैठे गुस्से) से देखना गलत होगा. यह सही है कि जहाँ अमरीका में इस घटना के बाद सख्त कानून बने –होम लैंड सिक्यूरिटी एक्ट बनाया जिसके तहत खुफिया एजेंसियों को निर्बाध शक्तियां मिलीं और किसी भी अमरीकी राज्य ने इसका विरोध नहीं किया जबकि वहां के संविधान में भारत के संघीय ढांचे के मुकाबले राज्यों के पास अधिक शक्तियां है. भारत में एक राष्ट्रीय आतंक-निरोधी केंद्र को लेकर सारे राज्य तन कर खड़े हो गए यह कह कर कि इससे राज्य की शक्तियों का केंद्र द्वारा अतिक्रमण होगा. भारत में सत्ता पक्ष, वह राज्य में हों या केंद्र में वैसी इच्छा-शक्ति राजनीतिक अवसरवाद की चौखट पर दम तोड़ देती है. हम इस तरह के प्रयास को सीधे वोट की राजनीति से जोड़ लेने की जबरदस्त कला में माहिर हैं. आतंकवाद इसीलिए जिन्दा है.

दूसरा अमेरिका में नस्ली वैविध्य के कारण गैर-श्वेत और श्वेत के बीच रंग का फर्क है लिहाज़ा सुरक्षा एजेंसियों को गैर –अमरीकी को पहचानने में दिक्कत नहीं होती. भारत में किये जाने वाले आतंक में इस तरह के पहचान की सहूलियत नहीं है. वह पाकिस्तानी हो या भारतीय , बोली-खान-पान . चेहरे से फर्क करना मुश्किल होता है. पाकिस्तान का से भेजे गए उपद्रवी या भारत में हीं जन्मे  पाक –प्रशिक्षित आतंकवादी सहज भाव से देश के उन जगहों पर जहाँ अफ्रीकी “घेटो” की तरह आबादी का एक भाग जबरदस्त घनत्व में वाले मुहल्लों में रहते है. ये आतंक घटना करने के पहले या बाद में अपने को व्यापक समाज में विलोपित कर लेते हैं. इंटेलिजेंस एजेंसियों के लिए अन्दर तक जा कर अपने इनफॉर्मर पैदा करना बेहद मुश्किल काम होता है.

तीसरा पाक-प्रायोजित आतंकवाद के पिछले तीस सालों में तीन चरण रहे हैं. १९८० के दशक से शुरू हुआ यह सिलसिला प्रथम चरण में पाकिस्तान में हीं प्रशिक्षित पाकिस्तानी नागरिकों “पाक-ट्रेंड पाक मिलिटेंट्स” (पी टी पी एम) का था. हमारी इंटेलिजेंस एजेंसियों का कमाल हीं था कि जब भी इनको पकडती थी तो दुनिया में हम पाकिस्तान का यह विद्रूप चेहरा दिखा लेते थे. पाकिस्तान को जवाब देते नहीं बनता था. पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आई एस आई ने पैंतरा बदला और पाकिस्तान में हीं भारत के गुमराह युवाओं की ट्रेनिंग करने लगी. भारतीय इंटेलिजेंस की भाषा में इसे पाक-ट्रेंड इंडियन मिलिटेंट (पी टी आई एम) कहा गया. इसमें में पाकिस्तान की सरकार को मुश्किल आई जब हमने उन्हें पकड़ कर दुनिया को बताया कि सचाई क्या है और कैसे कराची में ना केवल ट्रेनिंग दे कर, हथियार सप्लाई का और धन मुहैया करा कर भारत के इन युवकों का इस्तेमाल किया गया. इन पकडे गए युवकों के बयान का रिकॉर्ड जब अमेरिका को दिया गया तो पाकिस्तानी शासकों के पास कोई जवाब नहीं था.

आई एस आई ने फिर पैंतरा बदला और “माड्यूल” सिस्टम पर आ गया. औसतन एक मादुले में तीन से चार आदमी होते हैं और एक माड्यूल को यह नहीं मालूम होता कि दूसरा माड्यूल क्या कर रहा है. चूंकि ये टास्क “असाइनमेंट”-बेस्ड (एक कार्य –विशेष पर आधारित) होते हैं लिहाज़ा पुलिस को यह नहीं पता चल पाता कि बारूद कौन लाया, बम किसने बनाया, जगह पर प्लांट किसने किया और मास्टरमाइंड कौन है.  कड़ियाँ मिला कर दोष-सिद्ध करना मुश्किल होता है. हमारा अपराध न्याय-शास्त्र भी गवाह व साक्ष्य पर आधारित है लिहाज़ा जब डर के मारे ना गवाह मिलते हैं न साक्ष्य पुख्ता तो जज साहेबान पुराने चश्में से देखते हरोपी को दोष-मुक्त कर देते हैं.   

वर्तमान में ना केवल भारत में हीं इस तरह के आतंकवादी संगठनों को आर्थिक मदद दे कर पैसा किया बल्कि उनकी ट्रेनिंग भी पाकिस्तान में न करा कर नेपाल और बांग्लादेश में करने लगी. ऐसे युवाओं को जो गरीबी व अज्ञानता की गर्त से राष्ट्रीय मुख्यधारा में नहीं आ सके हैं धर्म के नाम पर, कुछ पैसे देकर या महिमामंडन के सब्जबाग़ दिखाकर गुमराह करना आई एस आई –समर्थित भारतीय प्रतिबंधित संस्थाओं के लिए मुश्किल काम नहीं है.        

ऐसे में आज ज़रुरत है कि इंटेलिजेंस एजेंसियों की इस सफलता के मद्दे नज़र राजनीतिक वर्ग, खासकर सत्ता पक्ष इन्हें प्रोत्साहित करे , एक स्पष्ट सन्देश दे कि “आतंकवाद को लेकर देश में शून्य सहिष्णुता है और उनके प्रयास में सरकार उनके साथ है”. इसके साथ हीं गुमराह युवकों को मुख्यधारा में लाने के लिए उनकी शिक्षा व रोजगार की सार्थक व्यवस्था करे ना कि उन्हें बरगला कर ठीक आई एस आई की तर्ज पर छद्म रूप से अपने को भी उनका “संरक्षक” बताये. जैसा कुछ राजनीतिक दल कर रहे हैं.  

यासीन भटकल से मिली जानकारी के आधार पर सुरक्षा एजेंसियां देश में आतंकवाद की कमर तोड़ने में कामयाब हो सकती हैं बशर्ते राजनीतिक वर्ग इस पर वोट की गिद्ध-दृष्टि ना डाले.
rajsthan patrika

Wednesday, 28 August 2013

नेता, बाबा और जनता : गलत कौन ?

गोवा के एक डांस-बार कुछ बार-बालाओं के साथ रंगरेलियां मानते हुए जो विधायक पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया गया वह “लोहिया के सिद्धांतों को मानने वाली” राजनीतिक पार्टी का था. वह चार बार विधायक का चुनाव जीत चुका है. समझ में नहीं आता कि लोहिया से चूक हुई या सिद्धांत पर अमल करनेवालों से या फिर वोट देने वाली जनता से. कर्नाटक विधान- सभा में कुछ माह पहले जब गरीब किसानों को मदद देने के मुद्दे पर बहस चल रही थी तो उस सरकार के तीन मंत्री (मात्र विधायक नहीं) मोबाइल पर पोर्नो फिल्म (नंगी फिल्म) देख रहे थे. लगता है संविधान निर्माताओं से कहीं चूक हुई कि केन्द्रीय व राज्य विधायिकाओं को प्रजातंत्र का मंदिर बना दिया. या तो मंदिर की परिभाषा बदलनी पड़ेगी या प्रजातंत्र की. एक संत पर आरोप लगा है कि उसने किसी अपने भक्त परिवार की नाबालिग लड़की से अनैतिक छेड़-छाड़ की. यह संत जब भगवान् के बारे में बोलता है तो हजारों की तादाद में लोग श्रद्धा से आँख बंद कर लेते हैं और परिवार सहित (जिसमें अबोध बच्चे भी हैं) उसके चरणों में समर्पित हो जाते हैं. चूंकि उनकी मान्यता है कि ऐसे संत में भगवान् का हीं रूप होता है और भगवान तो गलत होता नहीं लिहाज़ा संत के लिए सब कुछ समर्पित करने को तैयार रहते हैं. शक होता है आदिकाल से चली आ रही संत नामक संस्था पर. प्रश्न उठता है कि आज संत कैसे बनते हैं? कैसे लोग अपने परिवार के साथ अपने संत तय करते हैं?

देश के अधिकांश लोग अब एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ए डी आर) की उस रिपोर्ट से वाकिफ हैं जिसमें बताया गया है कि वर्तमान लोक-सभा में १६२ सदस्य ऐसे हैं जिन पर आपराधिक मुकदमें हैं. यह भी मालूम होगा कि इनमें ७६ ऐसे हैं जिनपर जघन्य अपराध के मुकदमें हैं. लेकिन शायद यह नहीं मालूम होगा कि जिस २००९ के चुनाव में ये जीते थे उसका एक और सत्य है. वह यह कि आम उम्मीदवारों के मुकाबले इस चुनाव में अपराध के आरोपी उम्मीदवारों का जितने का प्रतिशत दूना था. मतलब यह कि अगर आप अपराध के आरोपी हैं तो जनता आपको अधिक चुनना चाहेगी. यह है हमारा प्रजातंत्र. लिहाज़ा अगर चुना हुआ व्यक्ति संसद या विधान सभा में जा कर पोर्नो देखता है तो दोष किसका? अगर उम्मीदवार के अपराध आरोप (जो उसे जन धरातल पर घोषित करना हीं होता है) के बारे में जानते हुए भी मतदाता उसको चुनता है तो यह समझने में मशक्कत करने की ज़रुरत नहीं होगी कि देश किस किस्म का प्रजातंत्र चाहता है. फिर ऐसे में जब कोई शासन में बैठे भ्रष्ट नेता लाखों करोड़ का चूना देश को लगा जाते हैं तो विलाप क्यों?

एक मशहूर कहावत है “ अगर कोई एक बार धोखा देता है तो भगवान उसे माफ़ कर देते हैं, अगर दुबारा हमें धोखा देता है दयालु भगवान उसे फिर भी माफ़ कर देते हैः लेकिन अगर तीसरी बार भी वह हमें धोखा देता है तो भगवान् उसे तो माफ़ कर देते हैं पर मुझे नहीं”. ६६ साल के प्रजातंत्र में हमने १५ आम चुनाव के अलावा दर्ज़नों विधान सभा चुनावों में मत दे कर सरकारें बनाई हैं, उन सरकारों की उपादेयता का अहसास किया है. कहा जाता है प्रजातंत्र एक जटिल परन्तु अभी तक की उपलब्ध व्यवस्थाओं में सबसे अच्छी शासन व्यवस्था हीं नहीं है यह व्यक्ति का सम्यक विकास भी करती है. यह भी मान्यता है कि समय के साथ प्रजातंत्र मजबूत होता है क्योंकि जनता में तर्क –शक्ति बदती है , मीडिया के जरिये तथ्य हासिल कर उन्हें विश्लेषित करने की सलाहियत बढ़ती है लेकिन केंद्र व राज्य की विधायिकाओं को देखने से यह अवधारणा गलत साबित होने लगे है. आज जो राजनीतिक वर्ग हम देख रहे हैं या जिनसे हम प्रभावित हो रहे हैं उसे देख कर लगता नहीं कि अच्छे लोग इस प्रक्रिया में आयेंगे और अगर आये तो हम उन्हें अपराध के आरोपी से ज्यादा तवज्जह देंगें.

यह समाज में तार्किक सोच के आभाव का हीं नतीजा है कि एक बाबा जब समोसे के साथ हरी चटनी खाने का ईश्वरीय आदेश देता है और आश्वस्त करता है कि हमारा कल्याण हो जाएगा तो हम श्रद्धा –भाव से आंखे बंद कर उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण कर लेते हैं. बाबा ईश्वर का स्वरुप बन जाता है. ईश्वर ने हमें भेजा था दिमाग देकर, सोचने की शक्ति दे कर, तर्क करने की क्षमता दे कर जो उसने चौपायों को नहीं दिया था. लेकिन हमने तर्क को किनारे छोड़ कर धर्मं , जाति, उपजाति के आधार पर अपने को बाँट लिया नेता चुना , बाबा चुना और अज्ञानता की गर्त में हीं प्रजातंत्र को भी खींच लाये.

६६ साल के प्रजातंत्र में यह अपेक्षा की जाती थी कि प्रजातंत्र की गुणवत्ता बेहतर होगी, सिद्धान्तविहीन राजनीति का अंत होगा लेकिन हुआ ठीक इसके उल्टा। यह सही है कि नेहरू ने भारतीय लोकतंत्र की जो कल्पना की थी वह यूरोप के आयातित सिद्धान्तों पर आधारित थी और जिसमें पिरामिड संरचना शीर्ष से आधार की तरफ आती थी जबकि गांधी की परिकल्पना आधार से शीर्ष की तरफ जाने की थी। नतीजा यह हुआ कि शुरुआती दौर से ही राजनीतिक वर्ग चालाकी भरे संदेश में विश्वास रखने लगा और समाज की सोच समुन्नत होने के बजाय जाति, धर्म, उपजाति में बटती रही। राजनीतिक पार्टियाँ और उनके तथाकथित नेता इन्हीं आधार पर फलते-फूलते रहे और स्थिति यहां तक बिगड़ी कि नेता भ्रष्टाचार एक –दूसरे के पर्याय बन गए.

बिहार में हर दूसरे सप्ताह एक मनोविकार से ग्रस्त महिला को इंटों-पत्थरों से गाँव के लोग मार देते है यह सोच कर कि “डायन है पूरे गाँव को खाने आई है”. इस समझ वाला वर्ग चुनाव में अपना सांसद  भी चुनता है. और इसी के मत से प्रजातंत्र की भव्य इमारत दिल्ली में संसद के रूप में खड़ी कर दी जाती है यह कह कर कि सब कुछ संविधान के अनुरूप चल रहा है.

ऐसा नहीं है कि देश में प्रजातंत्र आयातित है यह तब से है जब यूरोप के लोग जंगल में रहते थे और हम वैशाली में जनमत के आधार पर शासन चलाते थे. लेकिन शायद संविधान निर्माता यह भूल गए कि छोटी ग्रामीण स्तर की संस्थाएं पहले बनायी जाये फिर प्रजातंत्र का भव्य मंदिर –संसद. जो डायन कह कर विक्षिप्त महिला को पत्थरों से मार देते हों उनकी समझ को बेहतर किये बिना प्रजातंत्र की इमारत तामीर करने का नतीजा है कि लालबत्ती लगाने वाला हत्या करता है, मंत्री जेल में रहता है और भ्रष्टाचार उजागर करने वाले सी ए जी को कटघरे में खडा करने को कोशिश की जाती है.        
rajsthan patrika

Tuesday, 20 August 2013

प्रश्न पत्रकारिता में नैतिकता का है ज्ञान का नहीं ?


संघ लोक सेवा की सिविल परीक्षा और आई आई टी के इंजीनियरिंग की परीक्षा देश की सबसे कठिन मानी जाती है. लेकिन अपने बैच का एक टॉपर आई ए एस अधिकारी और कई आई आई टी पास इंजिनियर भ्रष्टाचार के मामले में फंसे पाए गए. क्रिपस मिशन की असफलता के पॉइंट्स या चीन का सकल घरेलू उत्पाद रट लेना या रोटेशनल मैकेनिक्स के सवाल कर लेना यह सुनिश्चित नहीं करता कि व्यक्ति नैतिक भी होगा. अगर ऐसा होता तो देश की अफसरशाही आज भ्रष्टाचार और रीढ़-विहीनता का प्रतिमूर्ति ना बनी होती और एक रुपये में ८७ पैसे (नए आंकलन के अनुसार) नेता-अफसर अनैतिक गठजोड़ की भेंट न चढ़ रहे होते. बल्कि भ्रष्टाचार में सजा की गिरती दर यह साबित करती है इनके तथाकथित ज्ञान का नुकसान यह हुआ है कि इन्होने भष्टाचार के ऐसे तरीके खोज लिए हैं जिससे ये और सत्ताधारी नेता कानून की जद से निकल जाएँ. “   

केन्द्र के एक मंत्री  की सलाह है कि वकीलों की तरह मीडिया के लिए भी एक उद्योग की हीं बॉडी हो जो उनका इम्तिहान ले और तब उन्हें खबरें लिखने (पत्रकारिता करने) का लाइसेंस दे (या सरकार से दिलाये?). यह सलाह इस बात पर आधारित है कि मीडिया में पत्रकारिता की शिक्षा का मानकीकरण नहीं हो रहा है और रोज़गार के अभाव में युवाओं को लुभाने कर पैसा कमाने के लिए कुकुरमुत्ते की तरह मास कॉम इंस्टिट्यूट खुले हैं जिनमें घटिया स्तर की मीडिया शिक्षा दी जा रही है, नतीज़तन पत्रकारिता की गुणवत्ता गिर रही है.

कुछ ऐसी हीं नीति प्रेस कौंसिल ने बनायीं है. सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व जज का (चूंकि उनकी राय व्यक्तिगत है इसलिए उनका वर्तमान ओहदा नहीं दिया जा रहा है) मानना है कि ९० प्रतिशत भारतीय जाहिल हैं. अगर इस तर्क -वाक्य का विस्तार किया जाये (जो तर्क-शास्त्र में एक मान्य प्रक्रिया है) तो भारत में बमुश्किल-तमाम केवल १० प्रतिशत हीं “जाहिल नहीं” हैं. इस शास्त्र के   “आल एस इज नॉट पी”  के सिद्धांत के मुताबिक ज़रूरी नहीं कि जो जाहिल नहीं वो जहीन. बीच का भी हो सकता है. इसका मतलब यह कि इन १० प्रतिशत गैर-जाहिल में से कुछ आई आई टी में तो कुछ डाक्टरी में, कुछ न्यायपालिका में और कुछ अफसरी में और एक बड़ा भाग राजनीति में (जिनमें ३१ प्रतिशत लोक सभा के वो माननीय भी शामिल हैं जिन पर अपराध के मुक़दमे हैं) चले जाते होंगे. बचे हुए में एक-आध प्रतिशत अन्य पेशों को अंगीकार करता होगा. अब इतने की बाद पत्रकारिता में कोई आसमान से लोग टपक तो नहीं पड़ेंगें. लिहाज़ा लब्बो-लुआब यह कि पत्रकार जाहिल होते हैं एक-आध जैसे पी साईनाथ (अभी तक उनकी साख बची हुई है) को छोड़ कर. इसलिए मंत्री जी की और न्यायमूर्ति की चिंता वाजिब लगती है.       

पर प्रॉब्लम है कहाँ पत्रकार के अशिक्षित होने की या इस बात की  कि देश का पत्रकार लेक्मे फैशन शो तो कवर करता है देश के किसानों की समस्या नहीं. मीडिया में गिरावट को सुधारने के पक्ष में खड़े इन दोनों उपरोक्त लोगों का मानना है (और हमारा भी) कि ग्रामीण भारत इस २४X७ के कवरेज से बाहर है. हम भी न्यायमूर्ति की इस बात से इत्तेफाक रखते हैं कि मीडिया की समस्या नैतिकता की है वैसे हीं जैसे अन्य संस्थाओं में है. क्या इसके लिए यह जानना जरूरी है कि ब्राज़ील का “बोलसा फेमिलिया” स्कीम क्या है ? क्या यह जानता जरूरी है कि पहला बम नागासाकी में गिरा कि हिरोशिमा में या टोडरमल का भू-राजस्व सिस्टम अच्छा था या ब्रितानी हुकूमत का? क्या यह भी जानना ज़रूरी है कि जब लार्ड क्लाइव ने भारत को ज्यादा लूटा तो ब्रितानी संसद में हेस्टिंग्स पर महाभियोग क्यों लगा?

क्या पत्रकारिता में जनोपादेयता के ह्रास को रोकने के लिए उसे यह भी जानना ज़रूरी है कि संविधान के अनुच्छेद १९(१)(अ) में प्रदत्त अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य और १९ (१) (छ) में प्रदत्त व्यापर स्वातंत्र्य में मूल अंतर क्या है ताकि कोई सत्ता में बैठा मंत्री या कानूनी पदों पर बैठे उनके लोग धीरे से पत्रकारिता को पेशा बता कर इसे चालाकी से १९(१)(अ) से हटाने और १९(१)(छ) में लाने की कोशिश करें. ध्यान रखे कि सत्ता पर बैठे लोगों को इससे यह लाभ मिलेगा कि १९(१)(अ) के प्रतिबंधों में जिनका जिक्र (१९ (२) में है राज्य को जनहित तय करने का अधिकार नहीं है लेकिन जैसे हीं पत्रकारिता पेशे में आ जाएगा यानि १९(१)(छ) में तन राज्य को १९ (६) में यह अधिकार मिल जाएगा कि वह जनहित में फैसला कर सके. मीडिया की आज़ादी की वह आखिरी दिन होगा.

वकीलों के परीक्षा के जिस मॉडल की बात हो रही है वह २०१० में लागू हुआ था.और आज भी बार कौंसिल ऑफ़ इंडिया की वह परीक्षा कानून के सामान्य –ज्ञान पर आधारित है जिसमें ८५ प्रतिशत लॉ ग्रेजुएट पास हो जाते हैं. क्या इससे वकालत के पेशे में चार-चंद लग गए हैं? फिर प्रोफेशन और मीडिया में एक आधारभूत अंतर है. यही वजह है कि संविधान निर्माताओं ने दोनों को मौलिक आजादी के १९ (१) में तो रखा लेकिन दोनों को अलग –अलग उप-बंध में. साथ हीं अमरीका का उदाहरण सामने होते हुए भी उन्होंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में मीडिया या प्रेस (उस समय प्रेस हें था) शब्द शामिल नहीं किया. प्रेस की आज़ादी उसी नागरिकों की आज़ादी से निसर्ग होती है अलग से नहीं. मतलब यह कि किसी अन्ना हजारे का जंतर-मंतर से भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलना या किसी अर्नब गोस्वामी का स्टूडियो में भारतीय शासक वर्ग को “कंट्री वांट्स टू नो टुनाइट” कह कर चुनौती देना या किसी रविश का व्यंग्यात्मक  मुस्कुराहट के साथ सत्ता पर घातक  सवाल उठाना एक हीं संवैधानिक अधिकार की उपज हैं और वह है अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता.

अन्ना किसी भ्रष्ट आई ए एस अधिकारी या हिंदी से ज्यादा अंग्रेजी जानने वाले मंत्री के सामने ज्ञान (जिस मंत्री ज्ञान समझ रहे हैं) में एक क्षण भी नहीं टिक सकते. जयप्रकाश नारायण ने भी कोई प्रोफेशनल परीक्षा नहीं दी थी. गाँधी –नेहरु के ज़माने में भी बार कौंसिल की परीक्षा की व्यवस्था नहीं थी. आज पत्रकारिता में नैतिकता की समस्या है न कि ज्ञान की. अगर एक तथाकथित अज्ञानी पत्रकार नैतिकता के मानदंडों पर तन कर खड़ा हो जाता है तो वह किसी भी ज्ञानी एडिटर से लाख गुना अच्छा है, अगर कोई एडिटर मालिक को खबरों से समझौता ना करने का सन्देश देता है तो वह पत्रकारिता का आभूषण है और अगर कोई मालिक विज्ञापन के लिए या किसी मंत्री के कहने पर खबरों से समझौता ना करने के लिए किसी हद तक घाटा सहने को तैयार है तो वह पत्रकारिता का अन्ना हजारे है. और ऐसा बनने के लिए किसी मीडिया कौंसिल की नीम-परीक्षा पास करने की ज़रुरत नहीं है. यह आत्म-बल और शुचिता से आता है.   
dainik bhaskar