Wednesday, 19 June 2013

गठबंधन धर्म नहीं राजनीतिक लाभ का अनैतिक खेल



खेल का नियम पहले किसने बदला –नीतीश ने या भाजपा ने ?  
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तो डेढ़ दशक पुराना राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन एक बार फिर टूट ही गया. भारत की द्वि-ध्रुवीय बहु-दलीय राजनीतिक व्यवस्था एक बार फिर प्रश्नों के घेरे में आ गयी. गठबंधन के इस टूट-जोड़ के खेल को समझने के लिए हमें लोकतांत्रिक व्यवस्था के मूल में जाना होगा. क्या गठबंधन का कोई धर्म होता है जैसा भाजपा अक्सर कहती है या यह एक खेल है जिसमें कुछ “खेल के नियम” होते हैं और अगर एक वह नियम तोड़ता है तो दूसरे की मजबूरी होती है नियम को अपने हित में तोड़ना?

आखिर क्या हो गया है कि सन २००२ के गुजरात दंगों के बाद जब केन्द्रीय मंत्री पद से इस्तीफ़ा दे कर राम बिलास पासवान गठबंधन से हटते हैं तो तत्कालीन रेल –मंत्री नीतीश कुमार उन्हें अवसरवादी व गठबंधन को कमज़ोर करने वाला बताते हैं और जब दंगे के बाद नरेन्द्र मोदी गुजरात का चुनाव जीतते हैं तो नीतीश और अकाली नेता इस अवधारणा को ख़ारिज कर देते हैं कि जीत का कारण सांप्रदायिक ध्रुवीकरण था. गुजरात सरकार के खिलाफ संसद में विपक्ष द्वारा लाये गए निंदा प्रस्ताव के  पक्ष में पासवान की पार्टी खड़ी होती है, फारूक अब्दुल्लाह, जो कि राजग में तब तक थे भी लगभग प्रस्ताव  के पक्ष में जाते हुए सदन से वाकआउट करते हैं. टी डी पी भी बेहद संयत स्वर में अपनी प्रतिक्रया देती है. लेकिन नीतीश कुमार पूरी तरह प्रस्ताव के पक्ष में खड़े रहते है. यहाँ तक की २००७ तक गुजरात, मोदी और दंगों को लेकर नीतीश का लगभग उदार रवैया रहता है.

लेकिन २००७ की मोदी की दुबारा जीत से स्थिति बदल जाती है. राजग सन २००४ का चुनाव हार चुकी होती है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भाजपा को एक बार फिर अपने नियंत्रण में ले लेता है. अटल बिहारी वाजपेयी स्वास्थ्य कारणों से सीन से धीरे –धीरे हटने लगते है और आडवाणी सन २००५ के जिन्ना प्रकरण के बाद संघ द्वारा अशक्त कर दिये जाते हैं. भाजपा संघ के इशारों पर चलने लगती है. सन २००९ के चुनाव में दोबारा हारने के बाद संघ आडवाणी को अवकाश  लेने की सलाह दे डालता है. इसी प्रक्रिया में संघ ना केवल पार्टी में एक अपेक्षाकृत छोटे कद के मराठी नितिन गडकरी को अध्यक्ष बनाता है बल्कि मोदी को उभारने लगता है. गठबंधन के “खेल के नियम” बदलने लगते हैं. मोदी का चेहरा और आक्रामक हिंदुत्व संघ की भाजपा नीति बनने लगती है.

इसी दौरान नीतीश अपनी जमीन तलाशने और जमीन का विस्तार करने के लिए एक प्रयोग करते हैं. मनिहारी चुनाव में मुसलमान मतदाता जद-यू के प्रत्याशी को वोट दे कर जीताता है. नीतीश को जमीन दिखाई देने लगती है. बिक्रमगंज उप-चुनाव में भी मुसलमान मतदाता नितीश पर अपना विश्वास प्रदर्शित करता है. नीतीश अली अनवर सरीखे पसमांदा मुसलमान नेता को तरजीह दे कर राज्य- सभा भेजते हैं. बाद में साबिर अली को भी पासवान से खींच कर अपने पाले में लाते हैं.

प्रश्न यह है कि खेल के नियम किसने पहले बदले. क्या यह सही नहीं है कि वाजपेयी -आडवाणी के सीन से हटने का बाद नियम स्वतः हीं बदल गए? क्या यह सच नहीं कि संघ का नियंत्रण स्वयं हीं खेल के नियम में तब्दील का आभास देता है? क्या यह सच नहीं कि मोदी को राज्य में सीमित रखना और मोदी को राष्ट्रीय सीन पर उभारना नियम बदलना है?

तो अगर नीतीश ने नियम बदले तो गलत क्यों?     

राजनीतिक दलों का गठबंधन कोई मानव-प्रेम से उद्भूत प्रक्रिया नहीं है. इसके मात्र दो उद्देश्य होते हैं –पहला भारतीय चुनाव प्रणाली , फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट (ऍफ़ पी टी पी) याने जो जीता वही सिकंदर की खामियों का लाभ उठाना. इस पध्यती के तहत दलों के मिलकर चुनाव लड़ने से सीटों का संख्या में ज्यामितीय वृद्धि का लाभ मिलता है. दूसरा उद्द्यश्य होता है , सत्ता में साझेदारी. चुनाव-पूर्व गठबंधन पहले उद्देश्य से किया जाता है और अगर स्थितियां अनुकूल रहीं तो दूसरा उद्देश्य स्वतः ही सध जाता है, जैसे वर्तमान यू पी ए -२ का कांग्रेस –एन सी पी गठबंधन. चुनावोपरांत गठबंधन का उद्देश्य मात्र सत्ता का लाभ लेना है. एक तीसरा गठबंधन है जो अनौपचारिक है और जो कई बार परदे के पीछे के खेल के तहत होता है जैसे यू पी ए –समाजवादी पार्टी (या बहुजन समाज पार्टी) गठबंधन.

गठबंधन दरअसल गलत चुनाव पध्यती -- ऍफ़ पी टी पी—का अपरिहार्य प्रतिफल है. यह पध्यती समाज को अंतिम सामजिक पहचान चिन्ह तक विखंडित करती है. कांग्रेस के सर्वसमाहन के नाम पर सेकुलरवाद के नारे से लेकर भाजपा का आक्रामक हिन्दुवाद, पांच साल बाद मंडल के नाम पर अगड़ा-पिछड़ा और फिर विभिन्न जाति के दल और अंत तक आते-आते दलितों में भी महा-दलित खोजना इसी पध्यती की देन है. इसलिए १९९० की बाद से भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में गठबंधन एक अपरिहार्य कारक के रूप में आया और बना रहेगा.

लिहाज़ा गठबंधन का कोई धर्म नहीं होता. यह शुद्ध पंजे की लड़ाई है, दलों की स्वार्थ-सिद्धि का एक खेल है. इसकी पहली शर्त है--- अलग-अलग पहचान समूह में बंटे मतदातों का मूल रुझान बाधित ना होने का विश्वास. उदाहरण के तौर पर अगर आंध्र प्रदेश में भाजपा असदुद्दीन ओवैसी की मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल-मुसलमीन से हाथ मिलाये तो दोनों का नुकसान होगा. लेकिन तेलुगु देशम पार्टी (टी डी पी) के साथ आने से दोनों को फायदा. यहाँ अंतर मात्र एक है जहाँ शिव सेना और भाजपा के मतदाताओं में गठबंधन को लेकर विश्वास का स्तर ज्यादा होगा, टी डी पी के मतदाता खासकर मुस्लिम और उदारवादी हिन्दू मतदाताओं को हमेशा गठबंधन को लेकर शक रहेगा और हर कुछ महीनों में टी डी पी को हिंदुत्व के स्थपित एवं आक्रामक मानदंडों को लेकर भाजपा के खिलाफ एक पोसचरिंग (ड्रामे में प्रदर्शित किया जाने वाला भाव) दिखाना पडेगा. 

राजनीति-शास्त्र के स्थापित सिद्धांतों के अनुसार सफल गठबंधन की तीन प्रमुख शर्तें होती हैं. पहला, झगड़े के कम से कम तत्व; दूसरा, झगडा निपटाने के लिए एक सुव्यवस्थित मैकेनिज्म; और तीसरा, गठबंधन में आने के ऊद्देश्यों के प्रति जनता में विश्वास. आडवाणी रहें या मोदी, गठबंधन की ये तीनों शर्तें हाल की घटनाओं ने तोड़ दी हैं. “मोदी भी रहेंगे और आडवाणी भी” का मतलब हुआ कि मोदी के प्रति गठबंधन के जिन दलों को ऐतराज़ है और जो शुरू से हीं एक संशय पाले रहें हैं उनका संशय बरकरार रहेगा. मोदी की दो तस्वीरें में से एक उन्हें सालती रहेंगी. ये दो तस्वीरें हैं --- सन २००२ के दंगों वाली और दूसरी है विकासकर्ता , प्रशासनिक दक्षता और ईमानदार नेता वाली. गठबंधन के उन दलों का  जो, हिंदुत्व की भावना से पैदा नहीं हुए हैं और जो अल्पसंख्यक वोटों के लिए भी लार टपकाते हैं, मोदी के आसपास दिखना स्थायीरूप से घाटे का सौदा है. नीतीश कुमार की पार्टी – जनता दल (यू ) इसी श्रेणी में आती है. ठीक इसके उलट कुछ दल ऐसे हैं जो कट्टर हिन्दुवाद की पैदाइश हैं जैसे शिव सेना. उन्हें मोदी के दूसरे इमेज से कोई आपत्ति नहीं है लेकिन मोदी के आक्रामक स्वभाव से जरूर गुरेज है. लिहाज़ा झगड़े के कम से कम तत्व वाली शर्त खारिज हो जाती है. “मोदी रहेंगे तो संघ रहेगा, संघ रहेगा तो कट्टर हिन्दुवाद दूर नहीं हो सकता और हिन्दुवाद रहेगा तो मुसलमान वोटों का क्या होगा” यह नीतीश की चिंता है.

गठबंधन की दूसरी शर्त है झगडे के निपटारे के लिए एक व्यवस्था. प्रश्न यह है कि मोदी के स्वछंद व्यक्तित्व के मद्दे नज़र क्या कोई इस तरह की व्यवस्था सफल हो सकती है जिसके निर्देश मोदी सरीखे लोगों के लिए बाध्यकारी हो? शायद नहीं.

तीसरी शर्त: क्या जनता को इस तरह पहले हीं से एक दूसरे के प्रति सशंकित दलों के गठबंधन के उद्देश्यों के प्रति विश्वास हो सकता है? यह स्पस्ट है कि जिस तरह मोदी के आने को लेकर नीतीश ने विरोधी स्वर मुखर किये है उससे गठबंधन के मूल उद्देश्यों की विश्वसनीयता को धक्का ज़रूर लगा है.        
jagran

Thursday, 13 June 2013

“हिंदुस्तान की गद्दी पर हमेशा नपुंसक लोग नहीं बैठेंगे”



        “द्वितीयोनास्ति”  ---कैलास यात्रा पर मन को झकझोरने वाली रचना 
 

कभी किसी रचना के पढने के बाद आध्यात्मिक अंतर्यात्रा, उछाह, विरक्ति, थ्रिल करने वाली ख़ुशी, आत्मालोचना का भाव लाने वाला ज्ञान, अपनी अकर्मण्यता के प्रति कुंठा व अपने पूर्व व वर्तमान राजनीतिक पीढ़ी पर कोफ़्त का भाव और सबके बाद एक प्रतिबध्धता की जो नहीं हो सका वह किया जाएगा—आध्यात्मिक स्तर पर और साथ हीं सामाजिक-राजनीतिक उनीदेपन के प्रतिकार के रूप में भी-----   इतने भाव एक साथ शायद हीं कभी आते हों. “द्वितीयोनास्ति” इस एक ऐसी हीं रचना है. स्वयं लेखक एवं पत्रकारिता के स्थापित हस्ताक्षर हेमंत शर्मा का कहना है : इस किताब में कुछ कहा, कुछ अनकहा है. कहीं -कहीं निःशब्द रहा हूँ. यह न यात्रा-वृत्तांत है, न संस्मरण. इस पुस्तक में जितना मैं मौजूद हूँ, उतने आप भी. कैलास और मानसरोवर के साथ...... हमने किस नज़र से देखा? कहाँ से देखा? जितना देखा, क्या उतना व्यक्त कर पाया? शायद नहीं. सच कहूं तो मानसरोवर की यात्रा आज भी कहीं भीतर जारी है. ईश्वर को देखने के लिए मरना होता है. जो इस काया के साथ देखते हैं सिद्ध होते हैं. न हम सिद्ध थे. न मरे. फिर भी अहसास किया. अगर इस अहसास का आपको सहभागी बना पाया तो यह मेरा पुण्य, नहीं बना पाया तो असफलता मेरी.”

कहते हैं भाषा भाव का वहन करती है. आध्यात्म के गूढ़ रहस्य की बात करेंगे तो भाषा भी भारी हो जायेगी. और भाषा के जरिये उस सूक्ष्म तक जो अनंत है, पहुँचने के लिए अपने आपको तर्क के कई परतों  ऊपर ले जाना होता है. पर लेखक की, जो हिंदी साहित्य के मूर्धन्य लेखक परिवार से आता है लेखनी में अद्भुत क्षमता है. एक बानगी देखिये. “कैलास  की यात्रा में एक प्रश्न बार-बार जेहन में कौंधता रहा कि आखिर शिव में ऐसा क्या है, जो उत्तर में कैलास से लेकर दक्षिण में रामेश्वरम तक वे एक जैसे पूजे जाते हैं? उनके व्यक्तित्व में कौन सा चुंबक है, जिस कारण समाज के भद्रलोक से लेकर शोषित, वंचित, भिखारी तक उन्हें अपना मानते हैं? वे सर्वहारा के देवता हैं. उनका दायरा इतना व्यापक क्यों है?”  लेखक का यह सहज प्रश्न पाठकों को कहीं दूर तक आध्यात्मिक –सामाजिक जटिलताओं पर सोचने को मजबूर करता है. और प्रश्न उठता है “सर्वहारा का देवता बनाम भद्रलोक का देवता ?” और तब अपने को खोजने की और अपने आध्यात्मिक प्लेसमेंट की जिज्ञासा पैदा होती है.

जब साथ के लोग ठंड के मारे गरम कपड़ों में कमरे में दुबके थे, लेखक गाइड के मना करने के बावजूद लेखक ब्रह्म मुहूर्त में मानसरोवर का रहस्य जानने के लिए निकल पड़ता है. “मैं रात कोई साढ़े तीन बजे उठा. कैमरा लिया और कमरे के बाहर निकला. सामने हीं पवित्र मानसरोवर था. थके-मांदे सभी सो रहे थे. निपट अकेला हीं मैं मानसरोवर की ओर बढ़ा. कोई पचास कदम चलने के बाद हीं सरोवर के किनारे था. नीला पारदर्शी जल, हमारी सभ्यता का पवित्रतम जल. उसे सिर पर रखा. आचमन किया. सामने चमक रहे कैलास  को प्रणाम किया. और मन्त्र-मुग्ध सा खड़ा देखता रहा. इस सन्नाटे का भी एक संगीत था, जिसका सुन्दर वर्णन रामायण, महाभारत और स्कन्दपुराण में मिलता है. बाणभट्ट की कादंबरी कालिदास के रघुवंश और कुमारसंभव के अलावा संस्कृत व पालि ग्रंथों में भी इसके सौन्दर्य का अपूर्व वर्णन है.   

सरोवर के ठन्डे पानी में नहाने का अनुभव बताते हुआ लेखक का कहना था “ मैंने कपडे उतार गमछा पहना, शरीर को तैयार किया. ठंड से लड़ने का मनोबल बढ़ाया. सरोवर को प्रणाम किया. जल का आचमन किया. मीठा अमृत जैसा स्वाद. एक पाँव मानसरोवर में रखा तो करंट दिमाग तक लगा. झट से दूसरा पाँव भी रखा. फिर नाक पकड़ कर डुबकी लगाईं. लगा कि सिर पथरा गया, हाँथ –पाँव अकड़ गए. दूसरी व तीसरी डुबकी से थोड़ी रहत लगी. पर हड्डियां काँप गयीं. लगा कि पुरखों को तारने आया था , कहीं पुरखों में शामिल तो नहीं हो जाऊंगा”. सेन्स ऑफ़ ह्यूमर इस लेखक की लेखनी का आभूषण बना रहा. आगे देखिये “तभी हंसों का एक जोड़ा देखा. राजहंस यानी “बार –हेडेड गूज”, जिसे हिमालयन ग्रीन फ्रिंच भी कहते हैं. .... बड़े भाग्य से हंसों के दर्शन होते हैं. पीछे मुड़ मित्रों को जब तक बताता तब तक वे ओझल हो चुके थे. कबीर याद आये --- उड़ जाएगा हंस अकेला, जग दर्शन का मेला. मित्रगण मानने को तैयार नहीं थे कि मैंने राजहंस देखा”. 

लेखक एक जगह कहता है “राम का व्यक्तित्व मर्यादित है, कृष्ण का उन्मुक्त और शिव असीमित व्यक्तित्व के स्वामी. वे आदि हैं और अंत भी. शायद इसीलिए बाकि सब देव हैं. केवल शिव महादेव. वे उत्सव प्रिय हैं. शोक, अवसाद और अभाव में भी उत्सव मनाने की उनके पास कला है. वे उस समाज में भरोसा करते हैं, जो नाच -गा सकता हो. यह शैव परम्परा है. जर्मन दार्शनिक फ्रेडरिक नीत्शे कहते हैं --- उदास परम्परा बीमार समाज बनाती है. शिव का नृत्य श्मशान में होता है. श्मशान में उत्सव मनाने वाले वे अकेला देवता हैं”.  भारतीय चिंतन के एक पक्ष के बीमार भाव पर शिव का यह उदाहरण कहीं सोचने को मजबूर करता है.

यात्रांत के चरण में लेखक भी उस कुंठा-मिश्रित-आक्रोश की जद में आ कर कहता है ”रह-रह कर एक बात कचोट रही थी. हमारे प्रभु का निवास विदेश में! यह क्यों? हम कैसे काहिल और निक्कमे हैं. ऐसी गलती क्यों और कैसे हुई कि प्रभु का घर विदेश में चला गया? मैंने हिमालय नीति पर डा. राम मनोहर लोहिया को पढ़ा था. उन्होंने इस सवाल पर नेहरु से पूछा था , “कौन कौम है , जो अपने बड़े देवी-देवताओं को परदेश में बसाया करती है. छोटे-मोटे को बसा भी दे , लेकिन शिव-पार्वती को विदेश में बसा दें. यह कभी हुआ नहीं, हो भी नहीं सकता......... क्योंकि तिब्बत हमारा भाई है नेपाल की तरह. लेकिन अगर तिब्बत आज़ाद नहीं रहता तो हिंदुस्तान और चीन की सीमा मैकमोहन न होकर ७०-८० मील और उत्तर में कैलास  मानसरोवर के उस पार होनी चाहिए थी. जो इसे नहीं मानते, उनके लिए मेरा छोटा सा जवाब होगा –हिंदुस्तान की गद्दी पर हमेशा नपुंसक लोग नहीं बैठेंगे”        

 प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस किताब में लेखक ने स्वयं के कैमरे से ली गयी तस्वीर से यात्रा-वृतांत (?) को सजीव कर दिया है. एक कमी यह थी कि इन चित्रों का परिचय कहीं किसी रूप में आता तो पाठक और जगह के बीच तादात्म्य और बढ़ जाता. फिर भी पुस्तक पढ़ने व चित्रों को देखने के बाद यही प्रश्न मन को कचोटता है कि हम कैसे काहिल हैं कि जमीन पर इस आध्यात्मिक स्वर्ग के सशरीर दर्शन नहीं कर सके? अगर लेखक के प्रयास की एक मात्र और कमी है तो वह यह  कि इतने प्रखर लेखक की यात्रा अभिजात्य-वर्गी नहीं होनी चाहिए थी—याने हेलीकाप्टर की जगह जन-सामान्य वाला रास्ता दुरूह तो होता लेकिन लेखक के रास्ते के अनुभव हमें और उद्वेलित करते—आध्यात्मिक रूप से और सामाजिक चेतना के स्तर पर भी.
bhaskar

Monday, 10 June 2013

“कैश फॉर लॉबिंग”: इंग्लैंड और अमरीका हमसे बेहतर नहीं !




ब्रिटेन के संसद, जिसे हम विश्व के सभी संसदों की जननी मानते हैं, के उच्च सदन (हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स) के तीन सदस्य “कैश फॉर लॉबिंग” (पैसे लेकर एक कंपनी के हित में दबाव बनाना ) के मामले में संलिप्त पाए गए. खुलासा एक स्टिंग ऑपरेशन के जरिये अखबार सन्डे टाइम्स ने किया. यह स्थिति उस देश में है जिसमें संसदीय प्रजातंत्र का इतिहास लगभग ४०० साल का रहा है और जहाँ यह माना जाता रहा है कि समाज बेहतर आचरण का प्रतिनिधि रहा है.
प्रजातंत्र की संस्थाओं से भारत में हीं नहीं समूचे विश्व में मोह भंग हुआ है. तीन साल पहले २२ जून, २०१० को प्रकाशित एक व्यापक “गाल-अप” पोल में पाया गया कि ८९ प्रतिशत अमरीकियों को अमरीकी कांग्रेस (संसद ) में विश्वास नहीं है. अगर महात्मा गाँधी भारत में सांसदों के पैसा लेकर सवाल पूछने के मामले में स्वर्ग में आजादी के ६५ सालों में आंसू बहाने को मजबूर कर रहा होगा तो सवा दो साल बाद बेंजामिन फ्रेंक्लिन (अमरीकी आजादी व संविधान के जन्मदाता) की आत्मा भी बहुत खुश नहीं होगी इस तथ्य को जान कर. 
अमरीकी नेताओं व संस्थाओं की अनैतिकता के चरम स्थिति के कुछ नमूने देखिये. ७० वें दशक के पूर्वार्ध का किस्सा है. अपने दूसरे कार्यकाल ले लिए हो रहे चुनाव के दौरान रिचर्ड निक्सन ने अपने चुनावी भाषण में ऐलान किया कि कि अबकी चुने जाने का बाद वह दुग्ध –उद्योग को दी जा रही सहायता राशि, जो प्राइस सपोर्ट (कीमत कम रखने के एवज में सरकार द्वारा दुग्ध उद्योग को दी जाती है) खत्म कर देंगें. अगले दो दिन के अन्दर हीं अमेरिका के दुग्ध-उद्योग संघ ने उन्हें चुनाव फण्ड में दो मिलियन डॉलर (दस करोड़ रुपये) दे दिए. निक्सन जीत गए और दुग्ध उद्योग की बात सत्ता में आने के बाद भूल गए.   
एक अन्य उदाहरण लें. शिकागो यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर रघुराम राजन और लुईजी जिंगल्स ने अपने अध्ययन में पाया कि १९८० के दशक में व्यापर प्रतिबन्ध (तथाकथित जन हित में) के कारण उपभोक्ताओं को करीब ६.८ अरब बिलियन डॉलर (लगभग ३४,००० करोड़ रुपये) ज्यादा देने पड़े जबकि देश के उद्योगों को सब्सिडी ( फिर वही जन- हित का बहाना) के नाम पर सरकार ने ३० अरब डॉलर यानि (करीब १.४० लाख करोड़ रुपये) दिए. कहना ना होगा कि भारत में क्यों हर साल उद्योगों को प्रोत्साहन के नाम पर बजट में ५.५ लाख करोड़ रुपये दिए जाते हैं जबकि किसानों को ऋण माफ़ी के नाम पर सरकार को पसीने आने लगते है और राजस्व घटे की दुहाई दी जाने लगती है.
अमरीका में भी उस सिस्टम में बैठे तमाम लोगों आज यह मान रहे हैं कि सरकारें अपराधी से ज्यादा खतनाक हो गयी है समाज के लिए. सी आई ए के पूर्व निदेशक एवं सांसद लीओन पनेट्टा ने हाल हीं में कहा अपने संसद के बारे में कहा  “ वैध्यिकृत घूस अमरीकी संसद की कार्यप्रणाली बन गया है”. जज रिचर्ड पोस्नेर ने कहा “ विधायिका के कार्यकलाप घूस पर आधारित है”.
तीसरा उदहारण और भी खरतनाक है. सन १९८५ तक टाइप -२ डायबिटीज मात्र १ से २ प्रतिशत अमरीकी बच्चों में होती थी आज यह संख्य ८५ प्रतिशत हो गयी है. कारण: बाजारू ताकतों ने बच्चों के खान –पान की आदत में जबरदस्त परिवर्तन को मजबूर किया है. आज हर अमरीकी बच्चा अपनी कुल कैलोरी का २० प्रतिशत विश्व के दो मशहूर कोल्ड ड्रिंक ब्रांड के पेय से ले रहा है और औसत अमरीकी ९०० ग्राम सॉफ्ट ड्रिंक रोज पीता है.
जो सबसे बड़ा खतरा है वह यह कि इन सॉफ्ट ड्रिंक के नाम पर मिलने वाले पेय पदार्थों में चीनी की जगह हाई –फ्रक्टोज कॉर्न सिरप (एच ऍफ़ सी एस) इस्तेमाल किया जा रहा है जो सस्ता पड़ता है और जो एक बड़ी कम्पनी द्वारा बनाया जा रहा है. इस कम्पनी ने अमरीकी कांग्रेस में सांसदों की जबरदस्त लॉबी तैयार कर राखी है जिसकी वजह से इसके इस्तेमाल के खिलाफ कानून नहीं बन पा रहा है हालाँकि स्वास्थ्य सम्बन्धी रिसर्च संगठनों का कहना है कि बच्चों में मोटापा और टाइप-२ डायबिटीज का मूल कारण एच ऍफ़ सी एस का पेय पदार्थों में प्रयोग है.         
हम औपनिवेशिक मानसिकता के तहत यह मान बैठे हैं कि यूरोप या अमरीकी समाज हमसे नैतिकता के धरातल पर बेहतर है. इस तरह की अवधारणा तब बनती है जब हम सत्य को उसकी फेस वैल्यू पर ना देख कर इस आधार पर देखते हैं कि जो राष्ट्र इतना समृद्ध है, जिस राष्ट्र में इतने नोबेल पुरष्कार विजेता पैदा होते हैं और जो इतना ताकतवर है वह ज़रूर हर मामले में अच्छा होगा.   
कानून के जरिये नैतिकता का क्षरण रोकने की वकालत करने वालों के लिए यह एक बड़ा सबक है. भारत में लगातार इस तरह की घटनाओं को लेकर एक वर्ग है जो यह मानता है कि संस्थाओं में बैठे लोग अगर अनैतिक हों तो सख्त कानून के जरिये उन पर अंकुश लगाया जा सकता है. ब्रिटेन में हीं सन १९९५ में ऐसे हीं घटनाओं के मद्दे नज़र जस्टिस नोलन समिति बनाई गयी जिसकी अनुशंसा पर संसद के लिए आचार समितियां बनी. पर १७ साल बाद वही ढाक के तीन पात.
संसद हो या न्यायपालिका, मीडिया हो या अफसरशाही, अगर कानून बनाना भ्रष्टाचार का समाधान बन सकता तो आज दुनिया में तीन करोड़ तीस लाख कानून है, हत्या, बलात्कार, हिंसा कब के खत्म हो चुके होते. हम एक स्वस्थ समाज में कानून के साये में जी रहे होते. नैतिकता से अनैतिकता की तरफ जाने का प्रश्न तो और भी टेढ़ा है. एक सांसद कब किसी कंपनी के हित में क्या काम कर रहा है और किस रूप में उसका प्रतिफल कब ले रहा है ये बातें कानून की जद आम तौर पर नहीं आ पाती हैं. क्योंकि इन सब का आधार बताया जाता है ---–जन-हित. एक मुख्यमंत्री कब किसानों की जमीन का अधिग्रहण इस आधार पर कर लेता है कि औद्योगिक विकास के लिए जमीन की दरकार है और कब वह जमीन किसी बड़े कोलोनाइज़र को यह कह कर दे दी जाती है कि औद्योगिक विकास तब तक नहीं होगा जबतक रिहाइशी मकान नहीं बनते, हमें पता नहीं चलता अगर मीडिया यह बातें सामने ना लाये. या कोई सी ए जी अपनी रिपोर्ट में ये बातें न कहे. ये सारे परिवर्तन जन हित के नाम पर किये जाते है.
नैतिकता का क्षरण केवल भारत में हो रहा है यह कहना गलत होगा. यह सोचना भी उतना हीं गलत होगा कि कानून बनाने से हम शासन में बैठे व्यक्ति में नैतिकता ला सकेंगे. ऐसा होता तो अमरीका या ब्रिटेन इस स्तर का भ्रष्टाचार न कर रहे होते. ज़रुरत है पूरे विश्व में नैतिक मान डंडों को फिर से प्रतिष्ठापित करने के लिए समाज-दर्शन बदलने की, अच्छे मानदंड स्थापित करने की. तभी जो संसद जाएगा या भेजा जाएगा उसकी नैतिकता फैलाद की तरज होगी जो कंपनियों के दलाल नहीं तोड़ पाएंगे. 

hindustan

मोदी, आडवाणी और संघ: प्रसव पीड़ा इतनी कष्टकर क्यों?




तो आखिरकार नरेन्द्र मोदी को भाजपा चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष बना दिया गया. यह फैसला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का है और संघ से ऊपर व्यक्ति नहीं हो सकता. लिहाजा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के शीर्ष नेता लालकृष्ण आडवाणी माने तो ठीक, ना माने तो ठीक. संघ इस समय “खूंटा वहीं गड़ेगा” के भाव में है. भाजपा और देश की अन्य राजनीतिक दलों में यही अंतर है कि भाजपा के पास संघ है (या सच कहें तो संघ के पास भाजपा है). मोदी को शीर्ष पर लाने के फैसले में कोई गलती नहीं हुई है. अगर भाजपा को पिछले ११ साल में हुए तीन आम चुनावों में अपने गिरते जनाधार को फिर से हासिल करना हीं है बल्कि बढा कर २०० सीटों के आस-पास लाना है तो नया और चमत्कारी चेहरा लाना दूरदर्शिता हीं कही जाएगी.
इस बात में दो राय नहीं हो सकती कि भ्रष्टाचार, महंगाई और कुव्यवस्था के आरोप में आकंठ घिरी वर्तमान कांग्रेस नेतृत्व वाली यू पी ए -२ से जनता त्रस्त है और विकल्प चाहती है. भाजपा दूसरी सबसे बड़ी राष्ट्रीय पार्टी है. मोदी उभरते माध्यमवर्गीय भारतवासियों को कई तरह से संतुष्ट करते है और उनकी २००२ के गुजरात दंगों वाली छवि आज बौद्धिक जुगाली से अधिक कुछ नहीं है. देश इस वक्त राजाओं, कलमाडियों, कोयला घोटाला करने वालों से निजात चाहता है, देश महंगाई के बोझ से दबा जा रहा है चाहे हिन्दू हो या मुसलमान. प्रति व्यक्ति खाद्य उपलब्धता सम्प्रदाय नहीं देखती. राजा और शाहिद  बलवा मिलकर १.७६ लाख करोड़ रुपये का चूना दे लगा जाएँ, यह ना हिन्दुओं का सुहाता है ना मुसलमानों को, ना हीं पिछड़े या अति-पिछड़े वर्ग के लोगों को.     
लेकिन ८८ साल पुराने संगठन “संघ” से यह अपेक्षा नहीं थी कि एक छोटा सा नेतृत्व-परिवर्तन इतनी तकलीफदेह और बेपर्दा प्रसव –पीड़ा देगा जिसकी वज़ह से भाजपा का मूल दावा “पार्टी विद अ डिफरेंस” रातो-रात “पार्टी विद डिफरेंसेस” में तब्दील हो जायेगा. क्या इस संकट को आसानी से हल नहीं किया जा सकता था? क्या ज़रूरी था कि मोदी को शीर्ष पर लाने के पहले पार्टी के सबसे बड़े नेता आडवाणी को  ना केवल हाशिये पर रखा जाये बल्कि हर फैसले के बाद उनको इसका अहसास भी दिलाया जाये.
यह बात सही है कि संघ-भाजपा रिश्ते की केमिस्ट्री १९९० की आडवाणी रथ यात्रा के बाद की स्थितियों में बदली. वाजपेयी और आडवाणी का कद बढा जिसका पार्टी को लाभ मिला. नागपुर का वर्चस्व कम हुआ. करीब अगले डेढ़ दशक तक या यूं कहें कि तत्कालीन सरसंघचालक रज्जू भैया के सीन से हटने के  बाद से संघ का नेतृत्व अनुभव में भी और उम्र में भी इन नेता-द्वय से छोटा रहा.
केमिस्ट्री इतने बदली कि हाल के कुछ वर्षों पहले जब एक पत्रकार ने संघ के किसी शीर्ष नेता से बात करते हुआ कहा कि “कुछ भी हो आडवाणी का भाजपा को इस उंचाई तक लाने  में बड़ा योगदान है” तो उस संघ नेता का फौरी प्रश्न था “और आडवाणी को यहाँ तक लाने में किसका योगदान है?” यही समस्या है. संघ यह समझ रहा है कि वह आडवाणी पैदा करता है और आडवाणी को यह लग रहा है कि उनके आजीवन योगदान को संघ के लोग ना केवल नज़रंदाज़ कर रहें हैं बल्कि उसकी भरपाई भी नहीं हो रही है.     
लेकिन, आडवाणी जो हकीक़त आज नहीं समझ पा रहे हैं वह यह कि समय बदला, २००४ में या उसके बाद उनका चेहरा वोट नहीं ला सका है. वह स्टेट्समैन चाहे कितने हीं अच्छे हों, उनकी व्यक्तिगत सुचिता आज के भ्रष्ट राजनीतिक रेगिस्तान में चाहे कितनी हीं नखलिस्तान की तरह हो, भाजपा को इस मौके पर राजनीतिक लाभ नहीं दे सकती. चुनावी राजनीति में अच्छा स्टेट्समैन होना और वोट बटोरना दो अलग-अलग बातें हैं. संघ का प्रयोग इसी दिशा में है.
लेकिन क्या इसके लिए आडवाणी को हाशिये पर लाना ज़रूरी था? संघ एक अपेक्षाकृत बौने कद का अध्यक्ष पार्टी को देता है बगैर आडवाणी से कोई सलाह लिए, उसका अध्यक्षीय काल बढाने का उपक्रम करता है भ्रष्टाचार के आरोपों के बावजूद, आडवाणी को फिर हाशिये पर रखा जाता है. मोदी को लाने के पहले कोई वैचारिक मंथन नहीं होता और अगर होता है तो आडवाणी को विश्वास में लिए बगैर. फिर मोदी अपने तरीके से कभी किसी संजय जोशी को हटवाते हैं तो कभी दागी अमित शाह को सीधे ना केवल महामंत्री बनाया जाता है बल्कि उसे उत्तर प्रदेश ऐसे बड़े राज्य की कमान दे दी जाती है. आडवाणी फिर दरकिनार कर दिए जाते हैं अगर मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया जाये तो क्या यह सही नहीं होगा कि इतनी बार नज़रंदाज़ होने का बाद कोई भी रियेक्ट करेगा. आडवाणी तो फिर भी शालीन रहे.      
राजनीतिक दल चूंकि व्यक्ति और उनकी महत्वाकांक्षा का सकल योग होता है लिहाज़ा इसमें बदलाव, झंझावात, व्यक्तित्व की टकराहट, संस्था –व्यक्तित्व रसाकसी और तज्जनित चारित्रिक-सैद्धांतिक  परिवर्तन अपरिहार्य है. चिंता तब होनी चाहिए जब यह सब कुछ न हो रहा हो. क्योंकि तब यह डर रहता है कि दल कहीं अधिनायकवादी तो नहीं हो गया है. यह अलग बात है कि कैडर-आधारित दलों में यह पोलित ब्यूरो के माध्यम से बगैर जनता में जाये होता है और खुले दलों में यह थोडा बेलगाम तरीके से होता है और जनता को भी पता चलता रहता है.
अगर कम्युनिस्ट पार्टी श्रीपाद अमृत डाँगे सरीखे संस्थापक नेता को दरकिनार करती है और तथाकथित  वैचारिक आधार १९६४ में दो टुकड़ों में बाँट सकती है और कालांतर में इसके कई टुकड़े बिखरते है तो आजाद भारत में हीं कांग्रेस में नेहरु-टंडन टकराहट, वाम-दक्षिण धडों के नाम पर इंदिरा बनाम पुराने कांग्रेस नेताओं का झगड़ा, राजीव-वी पी सिंह टकराव, सोनिया-राव टकराव किसी से छिपा नहीं है.    
भारतीय जनता पार्टी में मोदी के नाम पर इतना बवेला मचना पार्टी में हो रहे कई किस्म के क्षरण का प्रतिफल है. हम इसे उदारवादी बनाम कट्टरवादी संघर्ष के रूप में देख सकते है, इसका विश्लेषण  व्यक्तिगत मह्त्वाकांछा बनाम संस्था के वर्चस्व के रूप में कर सकते हैं या फिर हम इसका आंकलन  संस्था की “इस्तेमाल करो और फेंको” की संस्था की नीति के रूप में भी कर सकते हैं. या हम इसे इन सबके सकल योग के रूप में देख सकते हैं. जैसे भी देखें एक बात साफ़ है वह यह कि भारतीय जनता पार्टी “पार्टी विद ए डिफरेंस” नहीं है. सत्ता व्यक्ति की शुचिता पर भारी पड़ता है, संस्था का अहंकार और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की टकराहट होती है.      
भावनात्मक मुद्दों पर आधारित राजनीति में तात्कालिक लाभ तो होता है परन्तु दूरगामी परिणति अपेक्षित नहीं होती. यह “न्याय का बदला” (नेमसिस) के सिद्धांत की शिकार होती है. भारतीय जनता पार्टी शायद इस समय इसी स्थिति से गुज़र रही है. पूरा का पूरा ढांचा इस द्वन्द में ---- आक्रामक हिंदुत्व बनाम उदारवादी (लिबरल) हिंदुत्व या यूं कहें कि विकासवादी हिंदुत्व --- घिरा हुआ है. हम कई बार इसे गलती से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भारतीय जनता पार्टी पर वर्चस्व, पार्टी के आधार स्तम्भ लालकृष्ण आडवाणी की पदलोलुपता-जनित छटपटाहट , या संघ –आडवाणी विभेद या आडवाणी कैंप बनाम मोदी-राजनाथ कैंप मान कर विश्लेषण करते हैं. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की गोवा में रविवार को संपन्न त्रि-दिवसीय राष्ट्रीय सम्मलेन का निष्कर्ष पार्टी के इस भ्रम-द्वन्द को परिलक्षित करता है. 
संघ जैसे अनुभवी और अनुशासित संगठन से प्रतिकार और प्रतिक्रिया के रूप में फैसले लेना अनुचित था. बेहतर तो यह होता कि आडवाणी की स्टेट्समैन की और ईमानदार नेता की छवि और मोदी की विकासपुरुष की इमेज को साथ लेकर चुनाव में भाजपा को उतारता. लेकिन लगता है संगठनों में भी हाड़-मांस के हीं लोग होते हैं , उनमें भी मानवोचित दुर्गुण होते हैं.    

bhaskar

Saturday, 8 June 2013

उप-चुनाव, नीतीश, मोदी, आडवाणी और संघ



उप-चुनाव के नतीजे साफ़ दिखाते है देश की राजनीति किधर जाएगी. मोदी की बगैर चुनाव प्रचार किये दो लोक- सभा और चार विधान सभा सीटों पर जीत और नीतीश के तीन दिन कैंप करने का बाद भी महाराजगंज लोक सभा चुनाव में हार २०१४ के चुनाव पूर्व- और चुनावोपरांत के गठबंधन के परिदृश्य को निर्धारित करेगा. साथ हीं यह भी पता चलेगा कि भाजपा में आडवानी की स्थिति, गठबंधन में नीतीश का दबदबा और ममता और जयललिता का रूख क्या रहेगा. लेकिन क्या संघ –आडवाणी द्वन्द भी इन स्थिति के सापेक्ष कम होगा?    
कुछ हीं साल पहले एक वरिष्ठ पत्रकार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक शीर्ष अधिकारी से अनौपचारिक बातचीत में कहा “क्या यह सच नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को इस उंचाई तक लाने में आडवाणी का बड़ा हाथ है”? अधिकारी का जवाब था “और आडवाणी को यहाँ तक लाने में किसका हाथ है?”   
भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी और संघ के बीच संबंधों को अगर इस पेर्शेप्श्नल पैराडॉक्स (दृष्टिकोणों का विरोधाभास) के फॉर्मेट में देखा जाये तो कई भ्रम दूर हो जायेंगे. एक नेता है जो दरअसल संघ का उत्पाद था  और जो संघ की अनुशंसा पर हीं राजनीतिक धरातल पर उतरा था लेकिन चूंकि राजनीति में सत्ता के खेल के कारण व्यक्ति का कद तेजी से घटता –बढ़ता है, बड़े कद का स्वामी हो गया. उधर संघ चूंकि सत्ता की चमक से दूर रहा, और चूंकि इस बीच संघ के शीर्ष नेता उम्र व अनुभव में इस नेता से छोटे हैं, दोनों के बीच संबंधों के गुणवत्ता बदलती गयी. आडवाणी-संघ संबंधों को इस परिप्रेक्ष्य में देखने पर स्थिति साफ़ हो जाती है कि क्यों आडवाणी अक्सर विवादों के घेरे में आ जाते हैं. संघ को यह गुस्सा है कि आडवाणी कोई भी हों, नागपुर के साथ नाभि-नाल संबंधों की नजाकत और समर्पण का भाव क्यों नहीं रखते और आडवाणी को यह अहसास है कि बदलते भारत समाज को पहचानने की क्षमता के लिए अपेक्षित गत्यात्मकता (डायनेमिज्म) हार्डकोर (कट्टर) विचारधारा वाले संघ में नहीं हो सकती.
आडवाणी यूं हीं कुछ नहीं बोलते. संघ के कई शीर्ष नेताओं के उम्र के बराबर उनका तजुर्बा है. ग्वालियर में दिया गया वक्तव्य स्पष्टरूप एक सन्देश है--- मोदी के लिए, संघ के लिए पार्टी में उन लोगों के लिए जो संघ के आगे नतमस्तक हैं. और हो भी क्यों नहीं. संघ ने पिछले कुछ वर्षों में या यूं कहें कि पार्टी द्वारा सत्ता खोने के बाद से (और साथ हीं वाजपेयी के सीन से हटने का बाद से ) पार्टी की कमान परोक्ष रूप से अपने हाथ में ले ली. कुछ हीं वर्षों में एक अध्यक्ष थोपा जो कहीं से भी भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टी का नेतृत्व करने में सक्षम नहीं था. उसका गुण नागपुर का और वैचारिक रूप से छोटे कद का होना था. पार्टी की छवि गिरती गयी.
यहाँ एक बात बताना जरूरी है. आडवाणी में पार्टी को प्रशासनिक रूप से लीड करने की नैसर्गिक क्षमता कभी नहीं रही है. ना हीं वह कुशल प्रशासक रहे हैं. लिहाजा वाजपेयी-आडवाणी के काल में १९९८ की सरकार के बाद से पार्टी का जनाधार लगातार गिरता रहा. सन १९९८ में जहाँ पार्टी को सर्वाधिक २५.५८ प्रतिशत वोट मिले थे वहीं अगले तीन चुनावों (१९९९, २००४ और २००९ ) में लगातार इसका वोट प्रतिशत गिरता रहा. २००९ तक आते -आते पार्टी के पास महज १८.६ प्रतिशत वोट रह गए. यानी इन ११ सालों में हर तीसरे मतदाता ने भाजपा का साथ छोड़ दिया. स्पष्ट है कि अगर इसका दोष २००४ तक वाजपेयी –आडवाणी के नेतृत्व पर  जाता है तो बाद के पांच साल के क्षरण के लिए राजनाथ सिंह का नेतृत्व जो संघ से निर्देशित था जिम्मेदार रहा.         
एक और विरोधाभास देखिये. जब २००२ की गुजरात सांप्रदायिक हिंसा जो नरेन्द्र मोदी के मुख्यमंत्रित्व काल में हुई को लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने राजधर्म निभाने की वकालत करते हुए मोदी को पड़ छोड़ने का इशारा किया तो आडवाणी ने एक ढाल बन कर मोदी को बचाया. उस समय मोदी और आडवाणी के बीच शिष्य-गुरु वाले सम्बन्ध थे जबकि संघ को मोदी अपने तौर-तरीकों की वजह से फूटी-आँख नहीं सुहाते थे.
स्थितियां बदली. आज जब संघ मोदी को चुनाव वैतरणी पार करने का नाव समझ रहा है तो आडवाणी को ऐतराज है और उन्हें मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान में वाजपेयी के व्यक्तित्व वाली  खूबियाँ नज़र आ रही हैं. आडवाणी को उनमें विकास का मसीहा और विनम्रता की प्रतिमूर्ति दिखाई दे रही है. कहना न होगा कि मोदी में आखिरी गुण का नितांत अभाव भाजपा के प्रथम व द्वितीय श्रेणी के नेता हीं नहीं, संघ भी मानता है.
जो बात संघ के समझ में नहीं आ रही है और जो आडवाणी बखूबी जानते है वह यह आक्रामक हिंदुत्व के राजनीति भारतीय समाज में खासकर हिन्दुओं के बीच घटे का सौदा है. एक उदाहारण. सन २००९ के चुनाव में ६७.१४ करोड़ चुनावकर्ता (एलेस्टर जिनको मतदान का अधिकार था) थे. इनमें करीब ५६ करोड़ हिन्दू चुनावकर्ता थे. उस चुनाव में  ३८.९९ करोड़ वोटरों ने मतदान किया. इनमें लगभग ३२ करोड़ हिन्दू थे. लेकिन भारतीय जनता पार्टी को वोट मिले आठ करोड़ से कम. यानि हर सात हिन्दू मतदातों में से केवल एक ने हीं भाजपा को वोट दिया. स्पष्ट है कि हिन्दू मतदातों (जिसकी नुमाइंदगी का दावा पार्टी करती है को मंदिर, राष्ट्रवाद से ज्यादा विकास, भ्रष्टाचार, महंगाई सरीखे मुद्दे भाते हैं.
मोदी इन सभी के प्रतीक हैं और इस लिहाज से संघ का निर्णय बिलकुल ठीक है. लेकिन मोदी की एक और छवि है २००२ के दंगों के बाद की. अगर संघ मोदी को हर तीसरे दिन  “अपना हीं आदमी है” कह कर मंच साझा करने लगेगा तो मोदी की बाद वाली छवि कांग्रेस आसानी से जनमानस पर चस्पा कर सकेगी.
ऐसे समय में आडवाणी सरीखे बड़े नेता स्वच्छ , बेदाग, निहायत शालीन, बौद्धिक रूप से परिपूर्ण छवि ना केवल भाजपा को बचाएगी बल्कि नीतीश सरीखे बिगडैल दोस्तों को भी वापस लेन में कामयाब होगी. लेकिन क्या संघ अपना संस्था-जनित अहंकार और आडवाणी क्या व्यक्तिगत अहंकार को छोड़ पाएंगे?
साथ हीं क्या अकेले  मोदी “एकला चलो रे” के भाव में १८.६ प्रतिशत के जनाधार को डेढ़ गुना यानि कम से कम १९९८ के स्तर पर पहुंचा पाएंगे जिसके लिए मोदी खुली छूट चाहते हैं.  इस छूट के प्रतिफल यह होगा कि कांग्रेस को अल्पसंख्यक वोट एकीकृत करने में आसानी होगी. यह बात पार्टी एक अन्य नेता अरुण जेटली ने हाल हीं में एक बैठक में कही भी थी. मोदी में अगर युवाओं के लिए अपील है तो आडवाणी से पार्टी को गरिमा, एक राष्ट्रीय स्वरुप और एक ओम्बड्समैन मिलता है. मोदी की सफलता के एक और शर्त यह है कि या तो वह ऐसा जन-स्वीकार्यता जगाये कि १७५ से अधिक सीटें आयें और नीतीश सरीखे “बिगडैल साथी” घुटने टेकने को मजबूर हों अन्यथा चुनाव के बाद आडवाणी पर हीं गठबंधन का ध्रुवीकरण संभव हो सकेगा. ऐसे में संघ को आडवानी को ख़ारिज करना अदूरदर्शिता होगी.
ऐसे वक़्त जब कि २०१४ के आम चुनाव में १८ वर्ष से २३ वर्ष का दस करोड़ युवा युवा जुड़ने जा रहा हो  मोदी वह जादू पैदा करने में सक्षम हैं. लिहाज़ा आडवाणी को भी गीता का श्लोक “गतासूनगतासूंच नानुशोचन्ति पंडिताः” (जो चला गया उसके लिए विलाप विद्वान् नहीं करते) अमल में लाना बेहतर होगा.    

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