Monday, 10 June 2013

“कैश फॉर लॉबिंग”: इंग्लैंड और अमरीका हमसे बेहतर नहीं !




ब्रिटेन के संसद, जिसे हम विश्व के सभी संसदों की जननी मानते हैं, के उच्च सदन (हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स) के तीन सदस्य “कैश फॉर लॉबिंग” (पैसे लेकर एक कंपनी के हित में दबाव बनाना ) के मामले में संलिप्त पाए गए. खुलासा एक स्टिंग ऑपरेशन के जरिये अखबार सन्डे टाइम्स ने किया. यह स्थिति उस देश में है जिसमें संसदीय प्रजातंत्र का इतिहास लगभग ४०० साल का रहा है और जहाँ यह माना जाता रहा है कि समाज बेहतर आचरण का प्रतिनिधि रहा है.
प्रजातंत्र की संस्थाओं से भारत में हीं नहीं समूचे विश्व में मोह भंग हुआ है. तीन साल पहले २२ जून, २०१० को प्रकाशित एक व्यापक “गाल-अप” पोल में पाया गया कि ८९ प्रतिशत अमरीकियों को अमरीकी कांग्रेस (संसद ) में विश्वास नहीं है. अगर महात्मा गाँधी भारत में सांसदों के पैसा लेकर सवाल पूछने के मामले में स्वर्ग में आजादी के ६५ सालों में आंसू बहाने को मजबूर कर रहा होगा तो सवा दो साल बाद बेंजामिन फ्रेंक्लिन (अमरीकी आजादी व संविधान के जन्मदाता) की आत्मा भी बहुत खुश नहीं होगी इस तथ्य को जान कर. 
अमरीकी नेताओं व संस्थाओं की अनैतिकता के चरम स्थिति के कुछ नमूने देखिये. ७० वें दशक के पूर्वार्ध का किस्सा है. अपने दूसरे कार्यकाल ले लिए हो रहे चुनाव के दौरान रिचर्ड निक्सन ने अपने चुनावी भाषण में ऐलान किया कि कि अबकी चुने जाने का बाद वह दुग्ध –उद्योग को दी जा रही सहायता राशि, जो प्राइस सपोर्ट (कीमत कम रखने के एवज में सरकार द्वारा दुग्ध उद्योग को दी जाती है) खत्म कर देंगें. अगले दो दिन के अन्दर हीं अमेरिका के दुग्ध-उद्योग संघ ने उन्हें चुनाव फण्ड में दो मिलियन डॉलर (दस करोड़ रुपये) दे दिए. निक्सन जीत गए और दुग्ध उद्योग की बात सत्ता में आने के बाद भूल गए.   
एक अन्य उदाहरण लें. शिकागो यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर रघुराम राजन और लुईजी जिंगल्स ने अपने अध्ययन में पाया कि १९८० के दशक में व्यापर प्रतिबन्ध (तथाकथित जन हित में) के कारण उपभोक्ताओं को करीब ६.८ अरब बिलियन डॉलर (लगभग ३४,००० करोड़ रुपये) ज्यादा देने पड़े जबकि देश के उद्योगों को सब्सिडी ( फिर वही जन- हित का बहाना) के नाम पर सरकार ने ३० अरब डॉलर यानि (करीब १.४० लाख करोड़ रुपये) दिए. कहना ना होगा कि भारत में क्यों हर साल उद्योगों को प्रोत्साहन के नाम पर बजट में ५.५ लाख करोड़ रुपये दिए जाते हैं जबकि किसानों को ऋण माफ़ी के नाम पर सरकार को पसीने आने लगते है और राजस्व घटे की दुहाई दी जाने लगती है.
अमरीका में भी उस सिस्टम में बैठे तमाम लोगों आज यह मान रहे हैं कि सरकारें अपराधी से ज्यादा खतनाक हो गयी है समाज के लिए. सी आई ए के पूर्व निदेशक एवं सांसद लीओन पनेट्टा ने हाल हीं में कहा अपने संसद के बारे में कहा  “ वैध्यिकृत घूस अमरीकी संसद की कार्यप्रणाली बन गया है”. जज रिचर्ड पोस्नेर ने कहा “ विधायिका के कार्यकलाप घूस पर आधारित है”.
तीसरा उदहारण और भी खरतनाक है. सन १९८५ तक टाइप -२ डायबिटीज मात्र १ से २ प्रतिशत अमरीकी बच्चों में होती थी आज यह संख्य ८५ प्रतिशत हो गयी है. कारण: बाजारू ताकतों ने बच्चों के खान –पान की आदत में जबरदस्त परिवर्तन को मजबूर किया है. आज हर अमरीकी बच्चा अपनी कुल कैलोरी का २० प्रतिशत विश्व के दो मशहूर कोल्ड ड्रिंक ब्रांड के पेय से ले रहा है और औसत अमरीकी ९०० ग्राम सॉफ्ट ड्रिंक रोज पीता है.
जो सबसे बड़ा खतरा है वह यह कि इन सॉफ्ट ड्रिंक के नाम पर मिलने वाले पेय पदार्थों में चीनी की जगह हाई –फ्रक्टोज कॉर्न सिरप (एच ऍफ़ सी एस) इस्तेमाल किया जा रहा है जो सस्ता पड़ता है और जो एक बड़ी कम्पनी द्वारा बनाया जा रहा है. इस कम्पनी ने अमरीकी कांग्रेस में सांसदों की जबरदस्त लॉबी तैयार कर राखी है जिसकी वजह से इसके इस्तेमाल के खिलाफ कानून नहीं बन पा रहा है हालाँकि स्वास्थ्य सम्बन्धी रिसर्च संगठनों का कहना है कि बच्चों में मोटापा और टाइप-२ डायबिटीज का मूल कारण एच ऍफ़ सी एस का पेय पदार्थों में प्रयोग है.         
हम औपनिवेशिक मानसिकता के तहत यह मान बैठे हैं कि यूरोप या अमरीकी समाज हमसे नैतिकता के धरातल पर बेहतर है. इस तरह की अवधारणा तब बनती है जब हम सत्य को उसकी फेस वैल्यू पर ना देख कर इस आधार पर देखते हैं कि जो राष्ट्र इतना समृद्ध है, जिस राष्ट्र में इतने नोबेल पुरष्कार विजेता पैदा होते हैं और जो इतना ताकतवर है वह ज़रूर हर मामले में अच्छा होगा.   
कानून के जरिये नैतिकता का क्षरण रोकने की वकालत करने वालों के लिए यह एक बड़ा सबक है. भारत में लगातार इस तरह की घटनाओं को लेकर एक वर्ग है जो यह मानता है कि संस्थाओं में बैठे लोग अगर अनैतिक हों तो सख्त कानून के जरिये उन पर अंकुश लगाया जा सकता है. ब्रिटेन में हीं सन १९९५ में ऐसे हीं घटनाओं के मद्दे नज़र जस्टिस नोलन समिति बनाई गयी जिसकी अनुशंसा पर संसद के लिए आचार समितियां बनी. पर १७ साल बाद वही ढाक के तीन पात.
संसद हो या न्यायपालिका, मीडिया हो या अफसरशाही, अगर कानून बनाना भ्रष्टाचार का समाधान बन सकता तो आज दुनिया में तीन करोड़ तीस लाख कानून है, हत्या, बलात्कार, हिंसा कब के खत्म हो चुके होते. हम एक स्वस्थ समाज में कानून के साये में जी रहे होते. नैतिकता से अनैतिकता की तरफ जाने का प्रश्न तो और भी टेढ़ा है. एक सांसद कब किसी कंपनी के हित में क्या काम कर रहा है और किस रूप में उसका प्रतिफल कब ले रहा है ये बातें कानून की जद आम तौर पर नहीं आ पाती हैं. क्योंकि इन सब का आधार बताया जाता है ---–जन-हित. एक मुख्यमंत्री कब किसानों की जमीन का अधिग्रहण इस आधार पर कर लेता है कि औद्योगिक विकास के लिए जमीन की दरकार है और कब वह जमीन किसी बड़े कोलोनाइज़र को यह कह कर दे दी जाती है कि औद्योगिक विकास तब तक नहीं होगा जबतक रिहाइशी मकान नहीं बनते, हमें पता नहीं चलता अगर मीडिया यह बातें सामने ना लाये. या कोई सी ए जी अपनी रिपोर्ट में ये बातें न कहे. ये सारे परिवर्तन जन हित के नाम पर किये जाते है.
नैतिकता का क्षरण केवल भारत में हो रहा है यह कहना गलत होगा. यह सोचना भी उतना हीं गलत होगा कि कानून बनाने से हम शासन में बैठे व्यक्ति में नैतिकता ला सकेंगे. ऐसा होता तो अमरीका या ब्रिटेन इस स्तर का भ्रष्टाचार न कर रहे होते. ज़रुरत है पूरे विश्व में नैतिक मान डंडों को फिर से प्रतिष्ठापित करने के लिए समाज-दर्शन बदलने की, अच्छे मानदंड स्थापित करने की. तभी जो संसद जाएगा या भेजा जाएगा उसकी नैतिकता फैलाद की तरज होगी जो कंपनियों के दलाल नहीं तोड़ पाएंगे. 

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मोदी, आडवाणी और संघ: प्रसव पीड़ा इतनी कष्टकर क्यों?




तो आखिरकार नरेन्द्र मोदी को भाजपा चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष बना दिया गया. यह फैसला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का है और संघ से ऊपर व्यक्ति नहीं हो सकता. लिहाजा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के शीर्ष नेता लालकृष्ण आडवाणी माने तो ठीक, ना माने तो ठीक. संघ इस समय “खूंटा वहीं गड़ेगा” के भाव में है. भाजपा और देश की अन्य राजनीतिक दलों में यही अंतर है कि भाजपा के पास संघ है (या सच कहें तो संघ के पास भाजपा है). मोदी को शीर्ष पर लाने के फैसले में कोई गलती नहीं हुई है. अगर भाजपा को पिछले ११ साल में हुए तीन आम चुनावों में अपने गिरते जनाधार को फिर से हासिल करना हीं है बल्कि बढा कर २०० सीटों के आस-पास लाना है तो नया और चमत्कारी चेहरा लाना दूरदर्शिता हीं कही जाएगी.
इस बात में दो राय नहीं हो सकती कि भ्रष्टाचार, महंगाई और कुव्यवस्था के आरोप में आकंठ घिरी वर्तमान कांग्रेस नेतृत्व वाली यू पी ए -२ से जनता त्रस्त है और विकल्प चाहती है. भाजपा दूसरी सबसे बड़ी राष्ट्रीय पार्टी है. मोदी उभरते माध्यमवर्गीय भारतवासियों को कई तरह से संतुष्ट करते है और उनकी २००२ के गुजरात दंगों वाली छवि आज बौद्धिक जुगाली से अधिक कुछ नहीं है. देश इस वक्त राजाओं, कलमाडियों, कोयला घोटाला करने वालों से निजात चाहता है, देश महंगाई के बोझ से दबा जा रहा है चाहे हिन्दू हो या मुसलमान. प्रति व्यक्ति खाद्य उपलब्धता सम्प्रदाय नहीं देखती. राजा और शाहिद  बलवा मिलकर १.७६ लाख करोड़ रुपये का चूना दे लगा जाएँ, यह ना हिन्दुओं का सुहाता है ना मुसलमानों को, ना हीं पिछड़े या अति-पिछड़े वर्ग के लोगों को.     
लेकिन ८८ साल पुराने संगठन “संघ” से यह अपेक्षा नहीं थी कि एक छोटा सा नेतृत्व-परिवर्तन इतनी तकलीफदेह और बेपर्दा प्रसव –पीड़ा देगा जिसकी वज़ह से भाजपा का मूल दावा “पार्टी विद अ डिफरेंस” रातो-रात “पार्टी विद डिफरेंसेस” में तब्दील हो जायेगा. क्या इस संकट को आसानी से हल नहीं किया जा सकता था? क्या ज़रूरी था कि मोदी को शीर्ष पर लाने के पहले पार्टी के सबसे बड़े नेता आडवाणी को  ना केवल हाशिये पर रखा जाये बल्कि हर फैसले के बाद उनको इसका अहसास भी दिलाया जाये.
यह बात सही है कि संघ-भाजपा रिश्ते की केमिस्ट्री १९९० की आडवाणी रथ यात्रा के बाद की स्थितियों में बदली. वाजपेयी और आडवाणी का कद बढा जिसका पार्टी को लाभ मिला. नागपुर का वर्चस्व कम हुआ. करीब अगले डेढ़ दशक तक या यूं कहें कि तत्कालीन सरसंघचालक रज्जू भैया के सीन से हटने के  बाद से संघ का नेतृत्व अनुभव में भी और उम्र में भी इन नेता-द्वय से छोटा रहा.
केमिस्ट्री इतने बदली कि हाल के कुछ वर्षों पहले जब एक पत्रकार ने संघ के किसी शीर्ष नेता से बात करते हुआ कहा कि “कुछ भी हो आडवाणी का भाजपा को इस उंचाई तक लाने  में बड़ा योगदान है” तो उस संघ नेता का फौरी प्रश्न था “और आडवाणी को यहाँ तक लाने में किसका योगदान है?” यही समस्या है. संघ यह समझ रहा है कि वह आडवाणी पैदा करता है और आडवाणी को यह लग रहा है कि उनके आजीवन योगदान को संघ के लोग ना केवल नज़रंदाज़ कर रहें हैं बल्कि उसकी भरपाई भी नहीं हो रही है.     
लेकिन, आडवाणी जो हकीक़त आज नहीं समझ पा रहे हैं वह यह कि समय बदला, २००४ में या उसके बाद उनका चेहरा वोट नहीं ला सका है. वह स्टेट्समैन चाहे कितने हीं अच्छे हों, उनकी व्यक्तिगत सुचिता आज के भ्रष्ट राजनीतिक रेगिस्तान में चाहे कितनी हीं नखलिस्तान की तरह हो, भाजपा को इस मौके पर राजनीतिक लाभ नहीं दे सकती. चुनावी राजनीति में अच्छा स्टेट्समैन होना और वोट बटोरना दो अलग-अलग बातें हैं. संघ का प्रयोग इसी दिशा में है.
लेकिन क्या इसके लिए आडवाणी को हाशिये पर लाना ज़रूरी था? संघ एक अपेक्षाकृत बौने कद का अध्यक्ष पार्टी को देता है बगैर आडवाणी से कोई सलाह लिए, उसका अध्यक्षीय काल बढाने का उपक्रम करता है भ्रष्टाचार के आरोपों के बावजूद, आडवाणी को फिर हाशिये पर रखा जाता है. मोदी को लाने के पहले कोई वैचारिक मंथन नहीं होता और अगर होता है तो आडवाणी को विश्वास में लिए बगैर. फिर मोदी अपने तरीके से कभी किसी संजय जोशी को हटवाते हैं तो कभी दागी अमित शाह को सीधे ना केवल महामंत्री बनाया जाता है बल्कि उसे उत्तर प्रदेश ऐसे बड़े राज्य की कमान दे दी जाती है. आडवाणी फिर दरकिनार कर दिए जाते हैं अगर मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया जाये तो क्या यह सही नहीं होगा कि इतनी बार नज़रंदाज़ होने का बाद कोई भी रियेक्ट करेगा. आडवाणी तो फिर भी शालीन रहे.      
राजनीतिक दल चूंकि व्यक्ति और उनकी महत्वाकांक्षा का सकल योग होता है लिहाज़ा इसमें बदलाव, झंझावात, व्यक्तित्व की टकराहट, संस्था –व्यक्तित्व रसाकसी और तज्जनित चारित्रिक-सैद्धांतिक  परिवर्तन अपरिहार्य है. चिंता तब होनी चाहिए जब यह सब कुछ न हो रहा हो. क्योंकि तब यह डर रहता है कि दल कहीं अधिनायकवादी तो नहीं हो गया है. यह अलग बात है कि कैडर-आधारित दलों में यह पोलित ब्यूरो के माध्यम से बगैर जनता में जाये होता है और खुले दलों में यह थोडा बेलगाम तरीके से होता है और जनता को भी पता चलता रहता है.
अगर कम्युनिस्ट पार्टी श्रीपाद अमृत डाँगे सरीखे संस्थापक नेता को दरकिनार करती है और तथाकथित  वैचारिक आधार १९६४ में दो टुकड़ों में बाँट सकती है और कालांतर में इसके कई टुकड़े बिखरते है तो आजाद भारत में हीं कांग्रेस में नेहरु-टंडन टकराहट, वाम-दक्षिण धडों के नाम पर इंदिरा बनाम पुराने कांग्रेस नेताओं का झगड़ा, राजीव-वी पी सिंह टकराव, सोनिया-राव टकराव किसी से छिपा नहीं है.    
भारतीय जनता पार्टी में मोदी के नाम पर इतना बवेला मचना पार्टी में हो रहे कई किस्म के क्षरण का प्रतिफल है. हम इसे उदारवादी बनाम कट्टरवादी संघर्ष के रूप में देख सकते है, इसका विश्लेषण  व्यक्तिगत मह्त्वाकांछा बनाम संस्था के वर्चस्व के रूप में कर सकते हैं या फिर हम इसका आंकलन  संस्था की “इस्तेमाल करो और फेंको” की संस्था की नीति के रूप में भी कर सकते हैं. या हम इसे इन सबके सकल योग के रूप में देख सकते हैं. जैसे भी देखें एक बात साफ़ है वह यह कि भारतीय जनता पार्टी “पार्टी विद ए डिफरेंस” नहीं है. सत्ता व्यक्ति की शुचिता पर भारी पड़ता है, संस्था का अहंकार और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की टकराहट होती है.      
भावनात्मक मुद्दों पर आधारित राजनीति में तात्कालिक लाभ तो होता है परन्तु दूरगामी परिणति अपेक्षित नहीं होती. यह “न्याय का बदला” (नेमसिस) के सिद्धांत की शिकार होती है. भारतीय जनता पार्टी शायद इस समय इसी स्थिति से गुज़र रही है. पूरा का पूरा ढांचा इस द्वन्द में ---- आक्रामक हिंदुत्व बनाम उदारवादी (लिबरल) हिंदुत्व या यूं कहें कि विकासवादी हिंदुत्व --- घिरा हुआ है. हम कई बार इसे गलती से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भारतीय जनता पार्टी पर वर्चस्व, पार्टी के आधार स्तम्भ लालकृष्ण आडवाणी की पदलोलुपता-जनित छटपटाहट , या संघ –आडवाणी विभेद या आडवाणी कैंप बनाम मोदी-राजनाथ कैंप मान कर विश्लेषण करते हैं. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की गोवा में रविवार को संपन्न त्रि-दिवसीय राष्ट्रीय सम्मलेन का निष्कर्ष पार्टी के इस भ्रम-द्वन्द को परिलक्षित करता है. 
संघ जैसे अनुभवी और अनुशासित संगठन से प्रतिकार और प्रतिक्रिया के रूप में फैसले लेना अनुचित था. बेहतर तो यह होता कि आडवाणी की स्टेट्समैन की और ईमानदार नेता की छवि और मोदी की विकासपुरुष की इमेज को साथ लेकर चुनाव में भाजपा को उतारता. लेकिन लगता है संगठनों में भी हाड़-मांस के हीं लोग होते हैं , उनमें भी मानवोचित दुर्गुण होते हैं.    

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Saturday, 8 June 2013

उप-चुनाव, नीतीश, मोदी, आडवाणी और संघ



उप-चुनाव के नतीजे साफ़ दिखाते है देश की राजनीति किधर जाएगी. मोदी की बगैर चुनाव प्रचार किये दो लोक- सभा और चार विधान सभा सीटों पर जीत और नीतीश के तीन दिन कैंप करने का बाद भी महाराजगंज लोक सभा चुनाव में हार २०१४ के चुनाव पूर्व- और चुनावोपरांत के गठबंधन के परिदृश्य को निर्धारित करेगा. साथ हीं यह भी पता चलेगा कि भाजपा में आडवानी की स्थिति, गठबंधन में नीतीश का दबदबा और ममता और जयललिता का रूख क्या रहेगा. लेकिन क्या संघ –आडवाणी द्वन्द भी इन स्थिति के सापेक्ष कम होगा?    
कुछ हीं साल पहले एक वरिष्ठ पत्रकार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक शीर्ष अधिकारी से अनौपचारिक बातचीत में कहा “क्या यह सच नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को इस उंचाई तक लाने में आडवाणी का बड़ा हाथ है”? अधिकारी का जवाब था “और आडवाणी को यहाँ तक लाने में किसका हाथ है?”   
भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी और संघ के बीच संबंधों को अगर इस पेर्शेप्श्नल पैराडॉक्स (दृष्टिकोणों का विरोधाभास) के फॉर्मेट में देखा जाये तो कई भ्रम दूर हो जायेंगे. एक नेता है जो दरअसल संघ का उत्पाद था  और जो संघ की अनुशंसा पर हीं राजनीतिक धरातल पर उतरा था लेकिन चूंकि राजनीति में सत्ता के खेल के कारण व्यक्ति का कद तेजी से घटता –बढ़ता है, बड़े कद का स्वामी हो गया. उधर संघ चूंकि सत्ता की चमक से दूर रहा, और चूंकि इस बीच संघ के शीर्ष नेता उम्र व अनुभव में इस नेता से छोटे हैं, दोनों के बीच संबंधों के गुणवत्ता बदलती गयी. आडवाणी-संघ संबंधों को इस परिप्रेक्ष्य में देखने पर स्थिति साफ़ हो जाती है कि क्यों आडवाणी अक्सर विवादों के घेरे में आ जाते हैं. संघ को यह गुस्सा है कि आडवाणी कोई भी हों, नागपुर के साथ नाभि-नाल संबंधों की नजाकत और समर्पण का भाव क्यों नहीं रखते और आडवाणी को यह अहसास है कि बदलते भारत समाज को पहचानने की क्षमता के लिए अपेक्षित गत्यात्मकता (डायनेमिज्म) हार्डकोर (कट्टर) विचारधारा वाले संघ में नहीं हो सकती.
आडवाणी यूं हीं कुछ नहीं बोलते. संघ के कई शीर्ष नेताओं के उम्र के बराबर उनका तजुर्बा है. ग्वालियर में दिया गया वक्तव्य स्पष्टरूप एक सन्देश है--- मोदी के लिए, संघ के लिए पार्टी में उन लोगों के लिए जो संघ के आगे नतमस्तक हैं. और हो भी क्यों नहीं. संघ ने पिछले कुछ वर्षों में या यूं कहें कि पार्टी द्वारा सत्ता खोने के बाद से (और साथ हीं वाजपेयी के सीन से हटने का बाद से ) पार्टी की कमान परोक्ष रूप से अपने हाथ में ले ली. कुछ हीं वर्षों में एक अध्यक्ष थोपा जो कहीं से भी भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टी का नेतृत्व करने में सक्षम नहीं था. उसका गुण नागपुर का और वैचारिक रूप से छोटे कद का होना था. पार्टी की छवि गिरती गयी.
यहाँ एक बात बताना जरूरी है. आडवाणी में पार्टी को प्रशासनिक रूप से लीड करने की नैसर्गिक क्षमता कभी नहीं रही है. ना हीं वह कुशल प्रशासक रहे हैं. लिहाजा वाजपेयी-आडवाणी के काल में १९९८ की सरकार के बाद से पार्टी का जनाधार लगातार गिरता रहा. सन १९९८ में जहाँ पार्टी को सर्वाधिक २५.५८ प्रतिशत वोट मिले थे वहीं अगले तीन चुनावों (१९९९, २००४ और २००९ ) में लगातार इसका वोट प्रतिशत गिरता रहा. २००९ तक आते -आते पार्टी के पास महज १८.६ प्रतिशत वोट रह गए. यानी इन ११ सालों में हर तीसरे मतदाता ने भाजपा का साथ छोड़ दिया. स्पष्ट है कि अगर इसका दोष २००४ तक वाजपेयी –आडवाणी के नेतृत्व पर  जाता है तो बाद के पांच साल के क्षरण के लिए राजनाथ सिंह का नेतृत्व जो संघ से निर्देशित था जिम्मेदार रहा.         
एक और विरोधाभास देखिये. जब २००२ की गुजरात सांप्रदायिक हिंसा जो नरेन्द्र मोदी के मुख्यमंत्रित्व काल में हुई को लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने राजधर्म निभाने की वकालत करते हुए मोदी को पड़ छोड़ने का इशारा किया तो आडवाणी ने एक ढाल बन कर मोदी को बचाया. उस समय मोदी और आडवाणी के बीच शिष्य-गुरु वाले सम्बन्ध थे जबकि संघ को मोदी अपने तौर-तरीकों की वजह से फूटी-आँख नहीं सुहाते थे.
स्थितियां बदली. आज जब संघ मोदी को चुनाव वैतरणी पार करने का नाव समझ रहा है तो आडवाणी को ऐतराज है और उन्हें मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान में वाजपेयी के व्यक्तित्व वाली  खूबियाँ नज़र आ रही हैं. आडवाणी को उनमें विकास का मसीहा और विनम्रता की प्रतिमूर्ति दिखाई दे रही है. कहना न होगा कि मोदी में आखिरी गुण का नितांत अभाव भाजपा के प्रथम व द्वितीय श्रेणी के नेता हीं नहीं, संघ भी मानता है.
जो बात संघ के समझ में नहीं आ रही है और जो आडवाणी बखूबी जानते है वह यह आक्रामक हिंदुत्व के राजनीति भारतीय समाज में खासकर हिन्दुओं के बीच घटे का सौदा है. एक उदाहारण. सन २००९ के चुनाव में ६७.१४ करोड़ चुनावकर्ता (एलेस्टर जिनको मतदान का अधिकार था) थे. इनमें करीब ५६ करोड़ हिन्दू चुनावकर्ता थे. उस चुनाव में  ३८.९९ करोड़ वोटरों ने मतदान किया. इनमें लगभग ३२ करोड़ हिन्दू थे. लेकिन भारतीय जनता पार्टी को वोट मिले आठ करोड़ से कम. यानि हर सात हिन्दू मतदातों में से केवल एक ने हीं भाजपा को वोट दिया. स्पष्ट है कि हिन्दू मतदातों (जिसकी नुमाइंदगी का दावा पार्टी करती है को मंदिर, राष्ट्रवाद से ज्यादा विकास, भ्रष्टाचार, महंगाई सरीखे मुद्दे भाते हैं.
मोदी इन सभी के प्रतीक हैं और इस लिहाज से संघ का निर्णय बिलकुल ठीक है. लेकिन मोदी की एक और छवि है २००२ के दंगों के बाद की. अगर संघ मोदी को हर तीसरे दिन  “अपना हीं आदमी है” कह कर मंच साझा करने लगेगा तो मोदी की बाद वाली छवि कांग्रेस आसानी से जनमानस पर चस्पा कर सकेगी.
ऐसे समय में आडवाणी सरीखे बड़े नेता स्वच्छ , बेदाग, निहायत शालीन, बौद्धिक रूप से परिपूर्ण छवि ना केवल भाजपा को बचाएगी बल्कि नीतीश सरीखे बिगडैल दोस्तों को भी वापस लेन में कामयाब होगी. लेकिन क्या संघ अपना संस्था-जनित अहंकार और आडवाणी क्या व्यक्तिगत अहंकार को छोड़ पाएंगे?
साथ हीं क्या अकेले  मोदी “एकला चलो रे” के भाव में १८.६ प्रतिशत के जनाधार को डेढ़ गुना यानि कम से कम १९९८ के स्तर पर पहुंचा पाएंगे जिसके लिए मोदी खुली छूट चाहते हैं.  इस छूट के प्रतिफल यह होगा कि कांग्रेस को अल्पसंख्यक वोट एकीकृत करने में आसानी होगी. यह बात पार्टी एक अन्य नेता अरुण जेटली ने हाल हीं में एक बैठक में कही भी थी. मोदी में अगर युवाओं के लिए अपील है तो आडवाणी से पार्टी को गरिमा, एक राष्ट्रीय स्वरुप और एक ओम्बड्समैन मिलता है. मोदी की सफलता के एक और शर्त यह है कि या तो वह ऐसा जन-स्वीकार्यता जगाये कि १७५ से अधिक सीटें आयें और नीतीश सरीखे “बिगडैल साथी” घुटने टेकने को मजबूर हों अन्यथा चुनाव के बाद आडवाणी पर हीं गठबंधन का ध्रुवीकरण संभव हो सकेगा. ऐसे में संघ को आडवानी को ख़ारिज करना अदूरदर्शिता होगी.
ऐसे वक़्त जब कि २०१४ के आम चुनाव में १८ वर्ष से २३ वर्ष का दस करोड़ युवा युवा जुड़ने जा रहा हो  मोदी वह जादू पैदा करने में सक्षम हैं. लिहाज़ा आडवाणी को भी गीता का श्लोक “गतासूनगतासूंच नानुशोचन्ति पंडिताः” (जो चला गया उसके लिए विलाप विद्वान् नहीं करते) अमल में लाना बेहतर होगा.    

nayi duniya

Tuesday, 28 May 2013

अरे, अपने हीं लोग हैं डांट –डपट कर ठीक कर लिया जाएगा”




नक्सली समस्या, और सत्ताधारियों का आपराधिकरूप से कैजुअल रवैया 
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कुछ वर्ष पहले की बात है. प्रधानमंत्री नक्सल-प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक ले रहे थे. एक मुख्यमंत्री ने कहा “अरे, यह कोई बड़ी बात नहीं है. कुछ अपने हीं लोग भटक गए हैं, हम उनको समझा -बुझा लेंगे, सब ठीक हो जाएगा”.  दूसरे मुख्यमंत्री ने कहा “ भैय जी, कहाँ है नक्सली समस्या, आप लोग भी बेमतलब बात का बतंगड़ बना रहे हैं, अरे अपने हीं समाज के कुछ लड़के है डांट-डपट कर ठीक कर लिया गया है कोई समस्या नहीं है. हमारे राज्य में तो यह कोई समस्या हीं नहीं है.” ये दोनों मुख्यमंत्री उन दो राज्यों के थे जहाँ नक्सल प्रभाव एक में दो तिहाई क्षेत्र में है और दूसरे में एक तिहाई क्षेत्र में. इन दोनों राज्यों में नक्सलियों के पास राकेट लांचर तक मौजूद हैं.  
यह घटना एक अधिकारी ने जो उस मीटिंग में मौजूद था मुझे बतायी. नक्सली आज देश के ६०० से अधिक जिलों में से एक तिहाई में फ़ैल चुके हैं इनकी संख्या २०,००० से ज्यादा है और इसके करीब चार गुना इनके मददगार है.
एक अन्य घटना लें. बांग्लादेश सीमा पर बी एस ऍफ़ के जवानों ने पांच खूंखार पाकिस्तानी आतंकवादियों को मार गिराया. बड़े उत्साह से बी एस ऍफ़ के अधिकारियों ने तत्कालीन केन्द्रीय गृह मंत्री के साथ मीटिंग में इस घटना का बताना चाहा. जैसे हीं अधिकारी ने अपनी बात ख़त्म की वह गृहमंत्री दार्शनिक अंदाज़ में बोले “वो जिन्हें मारा गया है हमारे हीं भाई –बंधु हैं , हमे उनको मार कर खुश नहीं होना चाहिए”. बैठक ख़त्म होने का बाद सारे के सारे अफसर इस डांट के बाद सर पीटते रहे.
देश की सत्ता पक्ष –वह जाहे केंद्र में हो या राज्य में, कभी भी यह कोशिश नहीं कर सका कि इस घटना की गंभीरता को समझे. राज्य में राजनीतिक दलों ने या तो नक्सलियों से गुप्त समझौता किया या इसे जान-बूझ कर नज़रन्दाज़ करते रहे. कुलमिला कर यह आपराधिक कृत्य सत्ता पक्ष द्वारा चलता रहा.
नक्सली जिनका माओवादियों के २००४ के बाद के अवतार में जबरदस्त वैचारिक क्षरण हुआ है और जो आज महज ठेकेदारों , सरकारी अफसरों से पैसा वसूलने का तंत्र हो गया है, नेतृत्व-विहीन भी हो गया है. नतीजा यह है कि अपने को अस्तित्व में रखने और अपनी स्वीकार्यता व्यापक करने के लिए परेशां नहीं है वह सिर्फ परेशान है तो इस बात के लिए राज्य की हिम्मत इस ओर आँख उठाने की न हो. डरपोक और भ्रष्ट तंत्र व राजनेता में वह इच्छा –शक्ति बन हीं नहीं पा रही है जिससे इस “रेड टेरर” का मुकाबला किया जा सके.
आंध्र प्रदेश की सरकार ने आज से कोई ढाई दशक पहले “ग्रेहाउंड” गुरिल्ला फाॅर्स विकसित की. इस फाॅर्स में प्रतिबद्धता , प्रोफेशनलिज्म और शक्ति का अद्भुत समन्वय था. यह आज भी देश की सबसे अधिक वेतन पाने वाली संस्था है. दस साल के अन्दर इसने अपने राज्य में जिसमे २६ में से २३ जिले जबरदस्त नक्सली प्रभाव में थे , ना केवल नक्सलियों को मार भगाया बल्कि एक ऐसे दहशत पैदा की कि नक्सलियों की ग्रेहाउंड को देख कर रूह काँप जाति है. अभी तीन सप्ताह पहले ग्रेहाउंड ने हेलीकाप्टर से आ कर इसी छत्तीसगढ़ के जंगलों में ना केवल शीर्ष नक्सली नेताओं को मार गिराया बल्कि ऑपरेशन के बाद पूरी सफलता से वापस लौट गए. छत्तीसगढ़ की पुलिस महज तमाशबीन बनी रही और मात्र स्थानीय मदद करती रही. यह अलग बात है कि ग्रेहाउंड का एक इंस्पेक्टर हेलिकॉप्टरो में नहीं चढ़ पाया और नक्सालियों की गोली का शिकार होना पड़ा.
एक तरफ दो मुख्यमंत्रियों का गैर-जिम्मेदाराना रवैया है जो कि अपराध की श्रेणी में आता है और दूसरी तरफ आंकड़े बताते हैं कि पिछले तमाम वर्षों में अगर एक चार जनता के या सुरक्षा बालों के लोग मारे जाते हैं तो महज एक नक्सली मारा जाता है. कश्मीर ऐसी जगह में भी स्थिति उलटी है याने अगर एक सुरक्षा बल या जनता का आदमी मारा जाता है तो एक आतंकवादी भी मारा जाता है.
चिदंबरम ने गृहमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान सी आई आई में भाषण देते भुआ इस समस्या से कारगर तौर पर निपटने के लिए एक सिद्धांत दिया था --- इलाका खाली कराओ, कब्जे में लो और विकास करो (क्लियर, होल्ड एंड डेवेलोप). उनका कहना था कि कांग्रेस के हीं एक नेता दिग्विजय सिंह ने नक्सलियों की समर्थन में ना केवल विरोध किया बल्कि एक लेख लिख मारा. चिदंबरम ने अपने भाषण में स्पष्ट रूप से स्वीकार किया दशकों के शोषण और सरकारी भ्रष्टाचार ने आदिवासियों का राज्य और उनके अभिकरणों में विश्वास ख़त्म कर दिया है. “आज स्थिति यह है कि राज्य के विरोध में जो भी सशक्त संगठन आता है ये आदिवासी उनके साथ हो जाता है. लिहाज़ा हमें सबसे पहले उनका विश्वास जीतना होगा”, चिदंबरम ने कहा था.  
यह एक बड़ा हीं सार्थक , और मुमकिन-उल-अम्ल सिद्धांत था. लेकिन आपराधिक रूप से निकृष्ट राज्य सरकारों ने इसे संभव नहीं होने दिया. उनमें उस किस्म की प्रतिबद्धता नहीं थी जो इस सिद्धांत के अनुपालन के लिए अपेक्षित था. नतीजा यह रहा कि केंद्र का पैसा फिर से भ्रष्ट, आपराधिक और कायर नेता-अफसर के मार्फ़त नक्सलियों का पास पहुँच गया.
धीरे –धीरे सरकार की कायरता से नक्सलियों की हिम्मत बढ़ने लगी और आज आंध्र प्रदेश (छत्तीसगढ़ की सीमा के पास से) से नेपाल तक एक “क्रांतिकारी पट्टी” जिसका आधार “मुक्त क्षेत्र” की माओवादी अवधारणा है लगभग सच होती दिखाई दे रही है.  
विश्व का इतिहास गवाह है कि इस तरह के आतंकवाद को ख़त्म करने का सबसे सटीक तरीका है ---पहले आतंकियों की आपूर्ति लाइन ख़त्म करो, ग्रेहाउंड सरीखे बल का गठन कर इन्हें सामरिक रूप से पंगो करो और फिर वहां के लोगों का विश्वास जीतो, विकास करो. कहने का मतलब यह कि पहला काम है नक्सलियों को पंगु करने वाला पुलिस एक्शन.
इन सबके लिए ज़रुरत है सत्ताधारियों की सोच बदलने की, कायरता छोड़ने की और चुनाव में वोट की ललक से निजात पाने की. क्या आज का सत्ता वर्ग इस थोड़ी सी कुर्बानी के लिए तैयार है? 

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