Saturday, 8 June 2013

उप-चुनाव, नीतीश, मोदी, आडवाणी और संघ



उप-चुनाव के नतीजे साफ़ दिखाते है देश की राजनीति किधर जाएगी. मोदी की बगैर चुनाव प्रचार किये दो लोक- सभा और चार विधान सभा सीटों पर जीत और नीतीश के तीन दिन कैंप करने का बाद भी महाराजगंज लोक सभा चुनाव में हार २०१४ के चुनाव पूर्व- और चुनावोपरांत के गठबंधन के परिदृश्य को निर्धारित करेगा. साथ हीं यह भी पता चलेगा कि भाजपा में आडवानी की स्थिति, गठबंधन में नीतीश का दबदबा और ममता और जयललिता का रूख क्या रहेगा. लेकिन क्या संघ –आडवाणी द्वन्द भी इन स्थिति के सापेक्ष कम होगा?    
कुछ हीं साल पहले एक वरिष्ठ पत्रकार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक शीर्ष अधिकारी से अनौपचारिक बातचीत में कहा “क्या यह सच नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को इस उंचाई तक लाने में आडवाणी का बड़ा हाथ है”? अधिकारी का जवाब था “और आडवाणी को यहाँ तक लाने में किसका हाथ है?”   
भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी और संघ के बीच संबंधों को अगर इस पेर्शेप्श्नल पैराडॉक्स (दृष्टिकोणों का विरोधाभास) के फॉर्मेट में देखा जाये तो कई भ्रम दूर हो जायेंगे. एक नेता है जो दरअसल संघ का उत्पाद था  और जो संघ की अनुशंसा पर हीं राजनीतिक धरातल पर उतरा था लेकिन चूंकि राजनीति में सत्ता के खेल के कारण व्यक्ति का कद तेजी से घटता –बढ़ता है, बड़े कद का स्वामी हो गया. उधर संघ चूंकि सत्ता की चमक से दूर रहा, और चूंकि इस बीच संघ के शीर्ष नेता उम्र व अनुभव में इस नेता से छोटे हैं, दोनों के बीच संबंधों के गुणवत्ता बदलती गयी. आडवाणी-संघ संबंधों को इस परिप्रेक्ष्य में देखने पर स्थिति साफ़ हो जाती है कि क्यों आडवाणी अक्सर विवादों के घेरे में आ जाते हैं. संघ को यह गुस्सा है कि आडवाणी कोई भी हों, नागपुर के साथ नाभि-नाल संबंधों की नजाकत और समर्पण का भाव क्यों नहीं रखते और आडवाणी को यह अहसास है कि बदलते भारत समाज को पहचानने की क्षमता के लिए अपेक्षित गत्यात्मकता (डायनेमिज्म) हार्डकोर (कट्टर) विचारधारा वाले संघ में नहीं हो सकती.
आडवाणी यूं हीं कुछ नहीं बोलते. संघ के कई शीर्ष नेताओं के उम्र के बराबर उनका तजुर्बा है. ग्वालियर में दिया गया वक्तव्य स्पष्टरूप एक सन्देश है--- मोदी के लिए, संघ के लिए पार्टी में उन लोगों के लिए जो संघ के आगे नतमस्तक हैं. और हो भी क्यों नहीं. संघ ने पिछले कुछ वर्षों में या यूं कहें कि पार्टी द्वारा सत्ता खोने के बाद से (और साथ हीं वाजपेयी के सीन से हटने का बाद से ) पार्टी की कमान परोक्ष रूप से अपने हाथ में ले ली. कुछ हीं वर्षों में एक अध्यक्ष थोपा जो कहीं से भी भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टी का नेतृत्व करने में सक्षम नहीं था. उसका गुण नागपुर का और वैचारिक रूप से छोटे कद का होना था. पार्टी की छवि गिरती गयी.
यहाँ एक बात बताना जरूरी है. आडवाणी में पार्टी को प्रशासनिक रूप से लीड करने की नैसर्गिक क्षमता कभी नहीं रही है. ना हीं वह कुशल प्रशासक रहे हैं. लिहाजा वाजपेयी-आडवाणी के काल में १९९८ की सरकार के बाद से पार्टी का जनाधार लगातार गिरता रहा. सन १९९८ में जहाँ पार्टी को सर्वाधिक २५.५८ प्रतिशत वोट मिले थे वहीं अगले तीन चुनावों (१९९९, २००४ और २००९ ) में लगातार इसका वोट प्रतिशत गिरता रहा. २००९ तक आते -आते पार्टी के पास महज १८.६ प्रतिशत वोट रह गए. यानी इन ११ सालों में हर तीसरे मतदाता ने भाजपा का साथ छोड़ दिया. स्पष्ट है कि अगर इसका दोष २००४ तक वाजपेयी –आडवाणी के नेतृत्व पर  जाता है तो बाद के पांच साल के क्षरण के लिए राजनाथ सिंह का नेतृत्व जो संघ से निर्देशित था जिम्मेदार रहा.         
एक और विरोधाभास देखिये. जब २००२ की गुजरात सांप्रदायिक हिंसा जो नरेन्द्र मोदी के मुख्यमंत्रित्व काल में हुई को लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने राजधर्म निभाने की वकालत करते हुए मोदी को पड़ छोड़ने का इशारा किया तो आडवाणी ने एक ढाल बन कर मोदी को बचाया. उस समय मोदी और आडवाणी के बीच शिष्य-गुरु वाले सम्बन्ध थे जबकि संघ को मोदी अपने तौर-तरीकों की वजह से फूटी-आँख नहीं सुहाते थे.
स्थितियां बदली. आज जब संघ मोदी को चुनाव वैतरणी पार करने का नाव समझ रहा है तो आडवाणी को ऐतराज है और उन्हें मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान में वाजपेयी के व्यक्तित्व वाली  खूबियाँ नज़र आ रही हैं. आडवाणी को उनमें विकास का मसीहा और विनम्रता की प्रतिमूर्ति दिखाई दे रही है. कहना न होगा कि मोदी में आखिरी गुण का नितांत अभाव भाजपा के प्रथम व द्वितीय श्रेणी के नेता हीं नहीं, संघ भी मानता है.
जो बात संघ के समझ में नहीं आ रही है और जो आडवाणी बखूबी जानते है वह यह आक्रामक हिंदुत्व के राजनीति भारतीय समाज में खासकर हिन्दुओं के बीच घटे का सौदा है. एक उदाहारण. सन २००९ के चुनाव में ६७.१४ करोड़ चुनावकर्ता (एलेस्टर जिनको मतदान का अधिकार था) थे. इनमें करीब ५६ करोड़ हिन्दू चुनावकर्ता थे. उस चुनाव में  ३८.९९ करोड़ वोटरों ने मतदान किया. इनमें लगभग ३२ करोड़ हिन्दू थे. लेकिन भारतीय जनता पार्टी को वोट मिले आठ करोड़ से कम. यानि हर सात हिन्दू मतदातों में से केवल एक ने हीं भाजपा को वोट दिया. स्पष्ट है कि हिन्दू मतदातों (जिसकी नुमाइंदगी का दावा पार्टी करती है को मंदिर, राष्ट्रवाद से ज्यादा विकास, भ्रष्टाचार, महंगाई सरीखे मुद्दे भाते हैं.
मोदी इन सभी के प्रतीक हैं और इस लिहाज से संघ का निर्णय बिलकुल ठीक है. लेकिन मोदी की एक और छवि है २००२ के दंगों के बाद की. अगर संघ मोदी को हर तीसरे दिन  “अपना हीं आदमी है” कह कर मंच साझा करने लगेगा तो मोदी की बाद वाली छवि कांग्रेस आसानी से जनमानस पर चस्पा कर सकेगी.
ऐसे समय में आडवाणी सरीखे बड़े नेता स्वच्छ , बेदाग, निहायत शालीन, बौद्धिक रूप से परिपूर्ण छवि ना केवल भाजपा को बचाएगी बल्कि नीतीश सरीखे बिगडैल दोस्तों को भी वापस लेन में कामयाब होगी. लेकिन क्या संघ अपना संस्था-जनित अहंकार और आडवाणी क्या व्यक्तिगत अहंकार को छोड़ पाएंगे?
साथ हीं क्या अकेले  मोदी “एकला चलो रे” के भाव में १८.६ प्रतिशत के जनाधार को डेढ़ गुना यानि कम से कम १९९८ के स्तर पर पहुंचा पाएंगे जिसके लिए मोदी खुली छूट चाहते हैं.  इस छूट के प्रतिफल यह होगा कि कांग्रेस को अल्पसंख्यक वोट एकीकृत करने में आसानी होगी. यह बात पार्टी एक अन्य नेता अरुण जेटली ने हाल हीं में एक बैठक में कही भी थी. मोदी में अगर युवाओं के लिए अपील है तो आडवाणी से पार्टी को गरिमा, एक राष्ट्रीय स्वरुप और एक ओम्बड्समैन मिलता है. मोदी की सफलता के एक और शर्त यह है कि या तो वह ऐसा जन-स्वीकार्यता जगाये कि १७५ से अधिक सीटें आयें और नीतीश सरीखे “बिगडैल साथी” घुटने टेकने को मजबूर हों अन्यथा चुनाव के बाद आडवाणी पर हीं गठबंधन का ध्रुवीकरण संभव हो सकेगा. ऐसे में संघ को आडवानी को ख़ारिज करना अदूरदर्शिता होगी.
ऐसे वक़्त जब कि २०१४ के आम चुनाव में १८ वर्ष से २३ वर्ष का दस करोड़ युवा युवा जुड़ने जा रहा हो  मोदी वह जादू पैदा करने में सक्षम हैं. लिहाज़ा आडवाणी को भी गीता का श्लोक “गतासूनगतासूंच नानुशोचन्ति पंडिताः” (जो चला गया उसके लिए विलाप विद्वान् नहीं करते) अमल में लाना बेहतर होगा.    

nayi duniya

Tuesday, 28 May 2013

अरे, अपने हीं लोग हैं डांट –डपट कर ठीक कर लिया जाएगा”




नक्सली समस्या, और सत्ताधारियों का आपराधिकरूप से कैजुअल रवैया 
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कुछ वर्ष पहले की बात है. प्रधानमंत्री नक्सल-प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक ले रहे थे. एक मुख्यमंत्री ने कहा “अरे, यह कोई बड़ी बात नहीं है. कुछ अपने हीं लोग भटक गए हैं, हम उनको समझा -बुझा लेंगे, सब ठीक हो जाएगा”.  दूसरे मुख्यमंत्री ने कहा “ भैय जी, कहाँ है नक्सली समस्या, आप लोग भी बेमतलब बात का बतंगड़ बना रहे हैं, अरे अपने हीं समाज के कुछ लड़के है डांट-डपट कर ठीक कर लिया गया है कोई समस्या नहीं है. हमारे राज्य में तो यह कोई समस्या हीं नहीं है.” ये दोनों मुख्यमंत्री उन दो राज्यों के थे जहाँ नक्सल प्रभाव एक में दो तिहाई क्षेत्र में है और दूसरे में एक तिहाई क्षेत्र में. इन दोनों राज्यों में नक्सलियों के पास राकेट लांचर तक मौजूद हैं.  
यह घटना एक अधिकारी ने जो उस मीटिंग में मौजूद था मुझे बतायी. नक्सली आज देश के ६०० से अधिक जिलों में से एक तिहाई में फ़ैल चुके हैं इनकी संख्या २०,००० से ज्यादा है और इसके करीब चार गुना इनके मददगार है.
एक अन्य घटना लें. बांग्लादेश सीमा पर बी एस ऍफ़ के जवानों ने पांच खूंखार पाकिस्तानी आतंकवादियों को मार गिराया. बड़े उत्साह से बी एस ऍफ़ के अधिकारियों ने तत्कालीन केन्द्रीय गृह मंत्री के साथ मीटिंग में इस घटना का बताना चाहा. जैसे हीं अधिकारी ने अपनी बात ख़त्म की वह गृहमंत्री दार्शनिक अंदाज़ में बोले “वो जिन्हें मारा गया है हमारे हीं भाई –बंधु हैं , हमे उनको मार कर खुश नहीं होना चाहिए”. बैठक ख़त्म होने का बाद सारे के सारे अफसर इस डांट के बाद सर पीटते रहे.
देश की सत्ता पक्ष –वह जाहे केंद्र में हो या राज्य में, कभी भी यह कोशिश नहीं कर सका कि इस घटना की गंभीरता को समझे. राज्य में राजनीतिक दलों ने या तो नक्सलियों से गुप्त समझौता किया या इसे जान-बूझ कर नज़रन्दाज़ करते रहे. कुलमिला कर यह आपराधिक कृत्य सत्ता पक्ष द्वारा चलता रहा.
नक्सली जिनका माओवादियों के २००४ के बाद के अवतार में जबरदस्त वैचारिक क्षरण हुआ है और जो आज महज ठेकेदारों , सरकारी अफसरों से पैसा वसूलने का तंत्र हो गया है, नेतृत्व-विहीन भी हो गया है. नतीजा यह है कि अपने को अस्तित्व में रखने और अपनी स्वीकार्यता व्यापक करने के लिए परेशां नहीं है वह सिर्फ परेशान है तो इस बात के लिए राज्य की हिम्मत इस ओर आँख उठाने की न हो. डरपोक और भ्रष्ट तंत्र व राजनेता में वह इच्छा –शक्ति बन हीं नहीं पा रही है जिससे इस “रेड टेरर” का मुकाबला किया जा सके.
आंध्र प्रदेश की सरकार ने आज से कोई ढाई दशक पहले “ग्रेहाउंड” गुरिल्ला फाॅर्स विकसित की. इस फाॅर्स में प्रतिबद्धता , प्रोफेशनलिज्म और शक्ति का अद्भुत समन्वय था. यह आज भी देश की सबसे अधिक वेतन पाने वाली संस्था है. दस साल के अन्दर इसने अपने राज्य में जिसमे २६ में से २३ जिले जबरदस्त नक्सली प्रभाव में थे , ना केवल नक्सलियों को मार भगाया बल्कि एक ऐसे दहशत पैदा की कि नक्सलियों की ग्रेहाउंड को देख कर रूह काँप जाति है. अभी तीन सप्ताह पहले ग्रेहाउंड ने हेलीकाप्टर से आ कर इसी छत्तीसगढ़ के जंगलों में ना केवल शीर्ष नक्सली नेताओं को मार गिराया बल्कि ऑपरेशन के बाद पूरी सफलता से वापस लौट गए. छत्तीसगढ़ की पुलिस महज तमाशबीन बनी रही और मात्र स्थानीय मदद करती रही. यह अलग बात है कि ग्रेहाउंड का एक इंस्पेक्टर हेलिकॉप्टरो में नहीं चढ़ पाया और नक्सालियों की गोली का शिकार होना पड़ा.
एक तरफ दो मुख्यमंत्रियों का गैर-जिम्मेदाराना रवैया है जो कि अपराध की श्रेणी में आता है और दूसरी तरफ आंकड़े बताते हैं कि पिछले तमाम वर्षों में अगर एक चार जनता के या सुरक्षा बालों के लोग मारे जाते हैं तो महज एक नक्सली मारा जाता है. कश्मीर ऐसी जगह में भी स्थिति उलटी है याने अगर एक सुरक्षा बल या जनता का आदमी मारा जाता है तो एक आतंकवादी भी मारा जाता है.
चिदंबरम ने गृहमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान सी आई आई में भाषण देते भुआ इस समस्या से कारगर तौर पर निपटने के लिए एक सिद्धांत दिया था --- इलाका खाली कराओ, कब्जे में लो और विकास करो (क्लियर, होल्ड एंड डेवेलोप). उनका कहना था कि कांग्रेस के हीं एक नेता दिग्विजय सिंह ने नक्सलियों की समर्थन में ना केवल विरोध किया बल्कि एक लेख लिख मारा. चिदंबरम ने अपने भाषण में स्पष्ट रूप से स्वीकार किया दशकों के शोषण और सरकारी भ्रष्टाचार ने आदिवासियों का राज्य और उनके अभिकरणों में विश्वास ख़त्म कर दिया है. “आज स्थिति यह है कि राज्य के विरोध में जो भी सशक्त संगठन आता है ये आदिवासी उनके साथ हो जाता है. लिहाज़ा हमें सबसे पहले उनका विश्वास जीतना होगा”, चिदंबरम ने कहा था.  
यह एक बड़ा हीं सार्थक , और मुमकिन-उल-अम्ल सिद्धांत था. लेकिन आपराधिक रूप से निकृष्ट राज्य सरकारों ने इसे संभव नहीं होने दिया. उनमें उस किस्म की प्रतिबद्धता नहीं थी जो इस सिद्धांत के अनुपालन के लिए अपेक्षित था. नतीजा यह रहा कि केंद्र का पैसा फिर से भ्रष्ट, आपराधिक और कायर नेता-अफसर के मार्फ़त नक्सलियों का पास पहुँच गया.
धीरे –धीरे सरकार की कायरता से नक्सलियों की हिम्मत बढ़ने लगी और आज आंध्र प्रदेश (छत्तीसगढ़ की सीमा के पास से) से नेपाल तक एक “क्रांतिकारी पट्टी” जिसका आधार “मुक्त क्षेत्र” की माओवादी अवधारणा है लगभग सच होती दिखाई दे रही है.  
विश्व का इतिहास गवाह है कि इस तरह के आतंकवाद को ख़त्म करने का सबसे सटीक तरीका है ---पहले आतंकियों की आपूर्ति लाइन ख़त्म करो, ग्रेहाउंड सरीखे बल का गठन कर इन्हें सामरिक रूप से पंगो करो और फिर वहां के लोगों का विश्वास जीतो, विकास करो. कहने का मतलब यह कि पहला काम है नक्सलियों को पंगु करने वाला पुलिस एक्शन.
इन सबके लिए ज़रुरत है सत्ताधारियों की सोच बदलने की, कायरता छोड़ने की और चुनाव में वोट की ललक से निजात पाने की. क्या आज का सत्ता वर्ग इस थोड़ी सी कुर्बानी के लिए तैयार है? 

bhaskar   

Friday, 17 May 2013

पाक आवाम की जम्हूरियत पसंदगी एक शुभ संकेत



पाकिस्तान में पहली बार चुनाव के जरिये सत्ता परिवर्तन और नवाज शरीफ का तीसरी बार प्रधानमंत्री बनना भारत में एक वर्ग में उत्साह और दूसरे वर्ग में संशयपूर्ण आशावादिता से देखा जा रहा है. दोनों भाव के यथोचित तार्किक कारण हैं. उत्साह इसलिए कि इस चुनाव में भारत-विरोध पूर्णतः गायब था, मुद्दा बिजली, स्वास्थ्य, भ्रष्टाचार और शिक्षा था, सेना को नागरिक प्रशासन के अधीन लाने का इन्तखाबी ऐलान था और ताकतवर तहरीक-ए-तालिबान –ए पाकिस्तान की चेतावनी के बावजूद (बलूचिस्तान और फाटा क्षेत्र को छोड़ कर) अच्छे प्रतिशत में मतदान हुआ. ये सारे संकेत पाकिस्तानी समाज की सोच में बदलाव की ओर इंगित करता है. मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा है जो नयी हवा में सांस लेना चाहता है, बारूद की गंध में नहीं. संशय इसलिए कि जिस मुल्क ने अकारण पडोशी से तीन युद्ध किये हों, जिस देश के सेना और आतंकी संगठनों ने मिलकर भारत में दहशतगर्दी के तीन दशक का इतिहास रचा हो वह क्या अचानक गुलाब का फूल हाथों में लेकर दिल्ली पहुंचेगा.  
मानव सभ्यता गवाह है कि सामूहिक जन-चेतना में उत्तरोत्तर गुणात्मक परिवर्तन होता है. गुलाम परंपरा ख़त्म हुई, सती प्रथा का अंत हुआ, स्त्री-प्रताड़ना अवसान पर है. साथ हीं जर्मनी एक हुआ, छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटे यूरोप का संगठन यूरोपियन यूनियन बना. आदमी तासीरन अमन पसंद होता है केवल कुछ स्थिति- व काल- विशेष कारक और कुछ सामूहिक सोच में सही-गलत पहचानने की क्षमता का अभाव उसे दो-दो विश्व युद्ध करने पर आमादा करते है. राजाओं ने अपने रियासत बचने या बढ़ाने के लिए जंग किये तो कभी मूंछ या महिला के लिए. लोकतंत्र की खूबी यही है कि इसमें सामूहिक सोच ना केवल फैसले लेती है बल्कि इस सोच में भी गुणात्मक बदलाव आता है.    
यह तर्क बिलकुल सही है कि जो देश ६६ साल में ३० साल फौजी हुकूमत में रहा हो और जिसमें पहली बार सत्ता परिवर्तन बन्दूक से नहीं बल्कि बैलट से हुआ हो उसमें दहशतगर्दों को आवाम की जम्हूरियत पसंदगी अच्छी लगेगी? पूरे विश्व में और खासकर पडोसी भारत में हर कोई यह सवाल पूछ रहा है और हकीकत यह है कि उसके मन में संशय है. चुनाव जीतने के बाद पाकिस्तान मुस्लिम लीग (एन) के नेता और दो बार प्रधान मंत्री रहे नवाज शरीफ को अपनी पहली प्रतिक्रिया में कहना पड़ा कि वह भारत के साथ बेहतर सम्बन्ध बनायेंगे और भारत के लोगों को अमन का सन्देश भी दिया. उनकी जेहन से कश्मीर गायब था और पडोसी से बेहतर सम्बन्ध का जज्बा था. लेकिन यह भी उतना हीं सच है कि पंजाब सूबे से जीतने के लिए उन्हें और उनकी पार्टी को गुप्त रूप से कुछ आतंकी संगठनों –खासकर जमात-उद-दावा-- को साधना पड़ा है पिचले साल के पंजाब के बजट में अच्छा धन परोक्ष रूप से इन संगठनों की नज़र करना पड़ा है.  
यहाँ यह समझना भूल होगी कि एक प्रजातान्त्रिक चुनाव में नवाज शरीफ कोई क्रांति ला सकेंगे क्योंकि दशकों पुरानी जेहनियत व शासन का किरदार बदलने में वक्त लगता है. कुछ अवाम आगे आया कुछ सरकार (जिसे लगभग पूर्ण बहुमत मिला है ना कि बैसाखी पर चलने का  जनादेश). लेकिन एक मौक़ा है जब इस देश को भ्रष्ट सैन्य तंत्र-आई एस आई –दहशतगर्दी की शक्तिशाली गठजोड़ से निकाला जाये और पाकिस्तान को आधुनिक राज्य के रूप में विकास के रास्ते पर ले जाया जाये.
यह भी सच है कि पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति बेहद खराब है. वित्तीय घाटे का यह आलम है कि गत वर्ष यह ८.५ के आस –पास था. उद्योग ख़त्म हो गए है और शहरीकरण की दर केवल २० प्रतिशत है. याने ८० फीसदी लोग गाँव में रहते हैं जिनका देश के सकल घरेलू उत्पाद में योगदान मात्र २० प्रतिशत है. फाटा , नार्थ वजीरिस्तान, साउथ वजीरिस्तान  और बलूचिस्तान में आज भी दहशतगर्दों की साम्राज्य है , सेना या कानून का राज्य कहीं दूर-दूर तक नज़र नहीं आता. लेकिन इन सब के बावजूद अवाम में जो कुछ भी हो रहा है उसे लेकर बचैनी साफ़ मनर आती है. जनता अब तालिबानी ऐलानों से ऊब चुकी है. टी टी पी ने जिस तरह ऐलान किया कि लडकिय पड़ने घर से बहार नहीं जाएँगी और पुरुष डॉक्टर औरतों के शरीर को छूएंगे नहीं उससे महिलाओं की असमय मौत होने लगी. मलाला के किस्से ने पाकिस्तानी अवाम की चेतना को झकझोर दिया. कट्टरपंथी सोच पर तार्किक सोच हावी होने लगी.
 नवाज शरीफ के लिए देश को एक आधुनिक राज्य के रूप में बदलना कोई एक दिन का काम नहीं होगा. जो सेना पिछले कई दशकों से भारत –विरोध के नाम पर अमरीकी इमदाद हड़प रही थी वह  आसानी से हथियार डाल देगी यह सोचना गलत होगा. सेना, आई एस आई , कट्टरपंथी एक साथ मिल कर सरकार को झुकाने की कोशिश करेंगे. जिस सेना ने पिछले २००१ -२००८ के बीच अमरीकी इमदाद में आये ११८० करोड़ डॉलर या प्रति वर्ष कोई १२ हज़ार करोड़ पाकिस्तानी रुपये में से ८० प्रतिशत ना केवल हड़प ले रही हो बल्कि उसका कोई लेखा जोखा पाकिस्तानी संसद तक को ना देती हो वह नवाज की सरकार को आसानी से अपने वादे पूरा करने के लिए छोड़ देगी यह सोचना गलत होगा. पाकिस्तान में सेना के अफसरों का रहन-सहन भारत के किसी पुराने ज़माने के राजा से ज्यादा शानदार है.
 . पाकिस्तान एक असफल राज्य है. उसे खोने को कुछ नहीं है. औसतन हर रोज १० आदमी आतंकवादी हमलों में मारे जाते हैं, हर तीसरे दिन एक धमाका होता है, उद्योग-शून्यता के कारण बेरोजगार युवक आत्मा-घाती दस्तों का कच्चा माल बन रहे हैं, “फाटा” क्षेत्र में “आत्मघाती बेल्ट” बनाने के कुटीर उद्योग में बदल चुका है. पिछले ६५ सालों में शिक्षा दर ५२ प्रतिशत से मात्र ५६ प्रतिशत हुई है. बजट का ३० प्रतिशत रक्षा के नाम पर ताकतवर सेना उदरस्थ कर लेती है. सिंध-पंजाब झगडा, बलूच समस्या, मुहाजिर (जो भारत से गए हैं) के प्रति मूल पाकिस्तानियों का रवैया, शियाओं और अन्य सम्प्रदायों के प्रति हिंसा और सबसे बढकर फाटा (फेडरली एडमिनिस्टर्ड ट्राइबल एरिया ) क्षेत्र से फैलते हुए तहरीक-ए-तालिबान का पाकिस्तान के अन्य भागों में खूंखार वर्चस्व आदि कुछ ऐसी समस्याएं हैं जिन्होंने इस देश के अंतर को खोखला कर दिया है.  नतीजा यह हुआ कि विकास की दौड़ में देश पीछे होता गया. आजादी से आज तक साक्षरता का स्तर मात्र पांच प्रतिशत हीं बढ़ सका. जाने-अनजाने में धर्म जिसे गैर-राजनीतिक सामाजिक सीमा क्षेत्र में होना चाहिए था राज्य का मूल मन्त्र बन गया और पाकिस्तान एक इस्लामिक देश हो गया.
ऐसा नहीं कि भारत में यह प्रवृति नहीं उभरी. इमरजेंसी, धार्मिक कट्टरवाद की कोशिशें यहाँ भी हुई पर वे परवान नहीं चढ़ पायीं. जन-भावना और संस्थागत मजबूती के तहत ऐसे ताक़तों को मुंहकी खानी पड़ी या यह अहसास हो गया कि यहाँ उन्हें दूर तक ज़िंदा रहने के कारक नहीं मिलेंगे. वह बहुसंख्यक अतिवाद हो या अल्पसंख्यक आतंकवाद जनता ने बैलट के जरिये हमेशा इन्हें ख़ारिज किया. चुनाव का आंकड़ा गवाह है कि बहुसंख्यक अतिवाद से स्वयं बहुसंख्यक हिन्दुओं को इतना परहेज़ था कि भारतीय जनता पार्टी को आज तक के इतिहास में सात मतदातायों में से मात्र एक ने हीं वोट दिया. सन्देश साफ़ था. मंदिर ह्रदय के पास है पर मस्जिद गिरा कर नहीं. जबकि  पाकिस्तान में इंन्होनें स्थाई भाव अख्तियार कर लिया. जनता को ना चाहते हुए भी इसमें बन्दूक के डर से लोगों को शरीक होना पडा. नतीजा यह रहा कि पूरे राज्य का चरित्र बदल गया.  
साथ हीं आधुनिक पाकिस्तान में कट्टरपंथ को दम तोड़ना हीं होगा ऐसे में जो लोग कट्टरवाद की दूकाने  चला रहे है और पूरे समाज को खोखला कर रहें है वे भी नयी सरकार के लिए अडचने पैदा करेंगे लेकिन जन-भावना का ताक़त और सोची-समझी कूटनीति के जरिये इन्हें काबू में लाया जा सकता है उसी तरह  जिस तरह भारत के पंजाब में आतंकवाद को काबू में कर लिया गया.  
हमें भूलना नहीं चाहिए कि भारत और पाकिस्तान के बीच एक अजीब प्यार और घृणा का मिश्रित सम्बन्ध है नवाज शरीफ के भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पाकिस्तान-स्थित पंजाब सूबे के है जबकि पाकिस्तान के भावी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ भारत –स्थित पंजाब प्रांत के हैं. पाकिस्तान एक जम्हूरियत के रूप में विकसित करे यह दोनों देशों के लिए कई मायनों में फायदेमंद रहेगा. 
sahara(hastakshep)   

Wednesday, 15 May 2013

बुद्धिमानों की सजा है ---- बुरे लोगों का शासन





कांग्रेस के सेल्फ-गोल का नया नमूना है दिग्विजय-कपिल का न्यायपालिका पर आक्षेप
कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में यू पी ए -२ का शासन लगभग अवसान पर है. भ्रष्टाचार, कुशासन और संस्थाओं को तोड़ने-मरोड़ने के आरोपों के बीच इसके दो नेताओं – दिग्विजय सिंह और मंत्री कपिल सिब्बल में सेल्फ-गोल की अद्भुत क्षमता है. दोनों ने अबकी बार सुप्रीम कोर्ट को अपने निशाने पर लिया है –कुतर्कों के सहारे. दिग्विजय का कहना है कि सर्वोच्च न्यायलय ने अपनी टिप्पणियों के ज़रिये (तोता प्रकरण) सी बी आई जैसी संस्था का मनोबल नीचा किया है जबकि सिब्बल ने इस बात पर जोर दिया है कि न्यायपालिका में जनता का विश्वास और मजबूत करना होगा. मतलब यह कि फिलवक्त  न्यायपालिका में  जन-विश्वास अपेक्षित नहीं है. तर्क-शास्त्रीय रूप से इसका मतलब यह भी है कि कार्यपालिका और विधायिका में जनता का अपेक्षित विश्वास जनता का है.
क्या दोनों नेताओं का कथन हास्यास्पद नहीं है. सी बी आई का मनोबल तब गिरता है जब कमरे में बुलाकर मजमून बदलवाए जाते है और तब भी जब भ्रष्टाचार का आरोप दो-दो मंत्रियों पर हीं नहीं परोक्ष रूप से कार्यपालिका के सर्वोच्च पद –प्रधान मंत्री -पर लगता है. सिब्बल ने यह भी कहा कि कानून की प्रक्रिया आर्थिक विकास में बाधक नहीं होनी चाहिए. मतलब कि न्यायपालिका वर्तमान आर्थिक विकास की नीतियों में बाधक है. यानि राजा हो या बंसल, इन्हें खुली छूट होनी चाहिए “आर्थिक विकास करने देने की.  
कोई ढाई हज़ार साल पहले विख्यात दार्शनिक प्लेटो की  ताकीद थी “ बुद्दिमानों की सबसे बड़ी सजा यह होती है कि वे बुरे लोगों का शासन झेलें क्योंकि उन्होंने स्वयं शासन में भाग लेने से इनकार किया”. गाँधी ने इसे प्रकारांतर से कहा “ आप जिस तरह की दुनिया चाहते हैं उसके लिए स्वयं अपने को बदलें”.
इस प्रजातंत्र के मंदिर --लोक सभा-- में ५४३ सदस्यों में १६३ आपराधिक मुकदमों में फंसे हैं. ये लोग बन्दूक के बल पर नहीं आ गए हैं. ये जनता द्वारा चुने गए हैं. इनमें १०३ पर गंभीर किस्म के आरोप हैं और इनमे से ७४ पर जघन्य (हीनस) किस्म के. “एथिक्स” शब्द यूनानी मूल शब्द “एथिकोस” से बना है जिस का मतलब होता है “आदत से पैदा हुआ”. शायद हमारी आदत बदल गयी है. अन्यथा ९० वें दशक के पूर्वार्ध में हवाला काण्ड में केंद्र के सात मंत्री और एक नेता विरोधी दल (लोक सभा) एक झटके में इस्तीफा न देते. मामले का नतीजा अदालत में सिफर इसलिए रहा कि सी बी आई ने जांच में “अपेक्षित साक्ष्य” नहीं दिए और जिसके लिए सर्वोच्च न्यायलय ने सन १९९७ में सी बी आई को कड़ी फटकार हीं नहीं लगायी इसे सीधे केंट्रीय सतर्कता आयोग के अधीन काम करने को कहा और एक जबरदस्त दिशा- निर्देश भी दिए. यह फैसला अपने आप में कानून की ताक़त रखता था. लेकिन चूंकि आदत राज्य अभिकरणों को अंगूठे के नीचे रखने की थी इसलिए सुरमे कोर्ट के फैसले को रद्दी की टोकरी के हवाले कर दिया गया. नैतिकता का पैमाना भी इस दौरान बदल गया इसलिए वह क़ानून खोजा जा रहा है जिसके तहत सरकार के कानून मंत्री को हीं नहीं आरोप में घिरे कोयला मंत्रालय और प्रधान मंत्री कार्यालय को भी यह अधिकार हो कि सी बी आई को आदेश दे सके. सर्वोच्च न्यायलय के आदेश के बावजूद  सी बी आई भी वहीं, संस्थाएं भी वहीं और समूची सरकार भी वहीं और ज़ाहिरन प्रधानमंत्री भी वहीं.
“आदत से पैदा हुआ भ्रष्टाचार” हमरे खून में शुरूआती दौर के “रिटेल में भ्रष्टाचार” से बढ़ सिस्टमिक भ्रष्टाचार” बनकर दौड़ता रहा. यह जीवन-पध्यती बन गया. भारत सरकार की २००७ की “शासन में नैतिकता” सम्बन्धी रिपोर्ट में इसे “कोल्युसिव” (मिलजुल कर) भ्रष्टाचार की संज्ञा दी. आज़ादी के प्रारंभ के कुछ दशकों तक यह भ्रष्टाचार “कोएर्सिव” (भयादोहन) के रूप में रहा जिसके तहत कमजोरों या गरीबों से उनके सही काम करने के पैसे लिए जाते थे यह कह कर कि “नहीं करेंगे तो क्या कर लोगे”. बाद में जब सत्ता के हाथ में “विकास” का कार्य आ गया और बजट के माध्यम से लाखों करोड़ रुपये आने लगे तो अफसर-नेता गठजोड़ को लगा “क्या मिलता है भोली-भाली जनता से चार-चार पैसे लूटने में और फिर हल्ला भी ज्यादा होता ”. और तब जन्म हुआ “कोल्युसिव” (मिल-जुल कर) किस्म के भ्रष्टाचार का. २-जी, सी डब्ल्यू जी, कोयला घोटाला इसी अफसर-नेता कोल्युसिव ज्ञान की उपज हैं. इस किस्म के भ्रष्टाचार में एक कमजोर या गरीब व्यक्ति नहीं बल्कि पूरा समाज हीं परोक्ष रूप से प्रभावित होता है लेकिन इसमें कोई एक व्यक्ति नहीं शिकार होता. चूंकि नार्थ ब्लाक के कार्यालय में (जहाँ परिंदा भी पर नीहें मार सकता) डीलें होती है इसलिए गवाह नहीं होता. हमारी अपराध न्याय प्रणाली गवाह, व साक्ष्य पर आधारित है और जज सत्य का खोज नहीं बल्कि अंपायर का काम ज्यादा करता है इसलिए भ्रष्टाचारी  मंत्री को मौका मिलता है “दूध का दूध” का जुमला फेंक कर पद बने रहने का.
सुशासन के सिद्धांतों में एक के अनुसार नैतिक मान-दंड अगर संस्थाओं का बल ना मिले तो धीरे-धीरे दम तोड़ देते हैं. चूंकि भारत का भ्रष्टाचार नए स्वरूप  --- कोल्युसिव – में फलने –फूलने लगा अतः यह ज़रूरी हो गया कि इन संस्थाओं को पंगु बनाया जाये. ये पंगु होंगे तो नैतिक मान-डंडों को सहारा देने वाला कोई नहीं होगा. नतीज़तन जजों को, आई बी और सी बी आई निदेशकों को, “बात-मानने के लिए विश्वसनीय” अफसरों को रिटायरमेंट के बाद पांच साल के लिए घोड़ा-गाडी और लाल-बत्ती के साथ हीं मोटी आय की व्यवस्था की जाने लगी. जब सर्वोच्च अदालत ने हवाला फैसले में “सिंगल डायरेक्टिव” (जिसके तहत सी बी आई संयुक्त सचिव या ऊपर के अधिकारी के खिलाफ जांच के पहले सरकार से अनुमति लेनी होती है) को गैर-कानूनी बताया तो तत्कालीन संसदीय समिति ने फिर से सी वी सी विधेयक में दुबारा इस प्रावधान को ला कर २००३ में कानून बना  दिया. सी बी आई फिर दन्त –विहीन संस्था हो गयी. मायावती के खिलाफ जांच के लिए सी बी आई की अपील पर तत्कालीन राज्यपाल ने अनुमति नहीं दी .      
हमने आज़ादी मिलने के साथ हीं व्यापक तौर पर ब्रिटेन के प्रजातंत्र व प्रशासनिक व्यवस्था का अनुकरण किया. लेकिन उनके समाज का “एथिक्स” या “आदत से पैदा हुई नैतिकता”  और हमारी “आदत से पैदा हुई नैतिकता में फर्क था और है. एक उदाहरण लें. कुछ साल पहले टोनी ब्लेयर की सरकार के दो मंत्रियों को महज इस आरोप पर इस्तीफा देना पड़ा कि एक मंत्री के कार्यालय से एक फ़ोन किया गया था जिसमें मंत्री के बच्चे की आया (दाई) को वीसा जल्दी देने की सिफारिश की गयी थी और दूसरे मंत्री के कार्यालय से यह सिफारिश की गयी थी कि एक व्यक्ति को जो सरकार के एक जनोपयोगी कार्यक्रम में चंदा देता था, उसे ब्रिटेन की नागरिकता दे दी जाये. इन मंत्रियों ने ना तो “दूध का दूध , पानी का पानी” होने का या  जांच रिपोर्ट का इंतज़ार किया ना हीं “अंतिम अदलत के फैसले का”, ना हीं “मैं स्वयं किसी भी जांच के लिए तैयार हूँ “ का भाव ले कर देश की छाती पर मूंग दलते रहे.
 ६२ साल पहले नेहरु ने एच जी मुद्गल को ना केवल संसद सदस्यता से निकाला बल्कि यह भी सुनिश्चित किया कि यह इस्तीफ़ा दे कर ना निकलने पाए. मुद्गल पर आरोप इतना हीं था कि उन्होंने पैसे लेकर सर्राफा व्यापारियों के लिए संसद में सवाल पूछा था.
इन ६२ सालों में देश का जी डी पी बढ़ता गया, कारें बदती गयी और आदतों से पैदा हुए  नैतिकता का अवसान और तज्जनित भ्रष्टाचार भी बढ़ता गया. “भारत महान” के कर्णभेदी नारे में गरीब की चीत्कार दबाती रही. शासन की गुणवत्ता तिरोहित होती गयी.
आज ज़रुरत है कि अच्छे लोग शासन प्रक्रिया से भागें नहीं बल्कि भाग लें ताकि बुरे लोगों को इससे छुटकारा दिलाया जा सके. 
bhaskar

Tuesday, 7 May 2013

भ्रष्टाचार, कानून और “दूध-पानी” का रिश्ता



डी एम् के नेता करूणानिधि की ८० वर्षीय पत्नी हीं नहीं बेटी और तमाम नजदीकी रिश्तेदार कुछ कंपनियों में डायरेक्टर हैं. भारत के मंत्री का बेटा भी कुछ कम्पनियों में डायरेक्टर है,  ए मंत्री का भांजा इतना प्रतिभाशाली है कि तीन साल पहले दो कमरे किराये के मकान से “आर्थिक विकास “ करता हुआ ६० करोड़ का आलिशान बंगला बनवा लेता है. बसपा उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के भाई से लेकर तमाम रिश्ते-नातेदार जमीन के धंधे में “अपना आर्थिक विकास” करते हैं. सोनिया गाँधी क दामाद रोबर्ट वाड्रा भी रियल एस्टेट के धंधे में व्यापार कौशल दिखाते हैं. भाजपा के पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी भी अपना व्यापार कौशल दिखाते हुए, और वह भी विदर्भा में जहाँ किसान पानी के बिना त्राहि-त्राहि कर रहा है, आत्म-हत्या कर रहा है, पूर्ति ग्रुप को एक साधारण रिटेलर की स्थिति से इतना ऊपर पहुंचा देते हैं कि इनकम टैक्स को बताना पड़ता है कि कंपनी ने ७००० करोड़ रुपये की कर चोरी की है.
भारतीय संविधान में अनुच्छेद १९ (जी) में सभी नागरिकों को व्यापार करने का अधिकार है. रिश्तेदार होने से नागरिक अधिकार ख़त्म नहीं होते ना हीं बूढ़े होने, महिला होने या फिर रियल एस्टेट का धंधा करने से ये मौलिक अधिकार बाधित होते हैं. कानून से दो और अधिकार भी मिले हैं ---- एक व्यक्ति तब तक दोषी नहीं जब तक अदालत के अंतिम चौखट से ऐसा ऐलान नहीं दिया जाता. और चूंकि दोषी नहीं तो फिर मीडिया क्यों ऐसे “तेजस्वियों” की,  जिनकी भूमिका देश के जी डी पी को  बढाने में “अप्रतिम” है , पगड़ी उछलती है? वाड्रा के मामले में कांग्रेस के मनीष तिवारी को तब बताना पडा कि “भारत के नागरिक के रूप में उन्हें भी बिज़नेस करने का अधिकार है” .  
यही वजह है कि आज सरकार के लोगों को हीं नहीं मुख्य सत्ताधारी पार्टी  को हर बार जब बेजा “पगड़ी उछलती” है तो कुछ जुमले निर्विकार भाव से कहने पड़ते हैं. “जब मंत्री ने (या पार्टी अध्यक्ष ने) खुद कह दिया कि वह हर जांच के लिए तैयार हैं तो फिर क्यों हंगामा?” या “मामले  की जांच हो रही है कृपया इस तरह के सवालों से जांच प्रभावित ना करें” या “मामला अदालत के विचाराधीन है इसलिए कुछ भी कहना गलत होगा” या “जांच के बाद दूध का दूध, पानी का पानी हो जायेगा, अभी से क्यों शोर मचा रहे हैं?”.
समसे जोरदार तर्क तो यह रहा कि जब मीडिया ने कांग्रेस के एक सांसद व “आमतौर पर” प्रवक्ता सत्यव्रत चतुर्वेदी से पूछा “सी बी आई डायरेक्टर क्यों गए कानून मंत्री के यहाँ सलाह लेने?” तो उनका “आत्म-श्लाघा-जनित-क्रोध” (सेल्फ-राइटिअस इन्डिग्नेसन)  दिखने लगा. रिपोर्टर को हिकारत से देखते  हुए उन्होंने कहा “सी बी आई डायरेक्टर अगर कानून मंत्री के पास नहीं जाएगा तो क्या नेता विरोधी दल से सलाह लेगा?” कितना पावरफुल तर्क है. कुछ ऐसा हीं जैसा अगर जेबकतरे से पुछा जाये कि “क्या तुमने सेठ की जेब काटी? और जेबकतरे का जवाब हो “सेठ की ना कटता तो क्या किसी भिखमंगे की काटता?”. इस जवाब में साम्यवाद का भाव भी है, विचारात्मक नैतिकता भी है और सिस्टम पर अटूट विश्वास भी है. सत्ता में बैठे लोगों को जी डी पी बढ़ने की चिंता भी है ताकि भारत खुशहाल हो और यही वजह है मंत्री का बेटा या भांजा रातों-रात अरबपति बन जाता है. साथ हीं सिस्टम पर अगाध विश्वास भी. तभी तो कोई जनार्दन द्विवेदी या कोई सत्यव्रत चतुर्वेदी को कहना पड़ता है “भाजपा को इस्तीफा माँगने की बीमारी हो गयी है या फिर लोगों को न्याय-व्यवस्था पर भी विश्वास नहीं है”. मायावती का भी यही मानना है कि जाँच से पहले इस्तीफा मांगना गलत है. उन्हें याद है कि किस तरह एक राज्यपाल ने नियम का सहारा लेता हुए उनके खिलाफ आय से अधिक संपत्ति के मामले में सी बी आई को मुकदमा चलने की इज़ाज़त नहीं दी और किस तरह सी बी आई ने लालू के मामले अदालत के निर्णय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील नहीं की लेकिन नरेन्द्र मोदी के खिलाफ की. यह सब “करने या ना करना के लिए” के “उपयुक्त” कानून का हीं तो सहारा लिया गया.  क्यों विपक्ष या मीडिया यह बात नहीं समझता कि कानून अपना काम करता है कुछ साल में जांच होगी और कुछ दशक में फैसला फिर भी हंगामा क्यों?
मीडिया की इन्हीं बेवकूफियों की वजह से दो दिन पहले खांटी वकील, भारत सरकार के मंत्री और कांग्रेस के “इंटेलेक्चुअल संकटमोचन” कपिल सिब्बल को कहना पड़ा कि “मीडिया भ्रष्ट है और इसे सरकार के अच्छे काम नज़र हीं नहीं आते”. शायद उनका इशारा इस बात पर था कि इस भ्रष्ट मीडिया में ऐसे पाकसाफ सरकार का यही हश्र होना है. लगभग यही आरोप गडकरी के लोगों ने भी मीडिया पर लगाये थे यह कहते हुए कि जब गडकरी स्वयं जांच मांग रहे हैं तो मीडिया कुछ लोगों के इशारे पर वितंडा क्यों खड़ा कर रही है? शायद सरकार की नाराजगी इस बात पर भी हो कि सी बी आई का डायरेक्टर तो कानून मंत्री के चौखट तक सजदा करता है पर यह (मीडिया) कौन सी चिड़िया है जो “व्यक्ति के आर्थिक विकास” को लेकर देश को “गुमराह” कर रही है और विदेश में “भारत महान” के साख पर बट्टा  लगा रही है. कोई ताज्जुब नहीं इस विकास की विरोधी मीडिया पर एक बार फिर से अंकुश लगने की कोशिश की जाये. इस तरह की “भ्रष्ट” मीडिया को बेलगाम छोड़ने का मतलब तो होगा कि एक साल बाद होने वाले चुनाव में जनता को भ्रमित हो जाये गी और नतीजतन  “एक विकास-परक” सरकार को सत्ता से हाथ धोना पडेगा. साथ हीं नैतिकता से ओतप्रोत सिस्टम को बदलने का दवाब बढ़ जायेगा.
एक अन्य तर्क भी सत्ता पक्ष दे रहा है. “इन लोगों को जनता के चुने प्रतिनिधियों और प्रजातंत्र के मंदिर रुपी संसद पर विश्वास नहीं है लेकिन गैर-चुने अफसरों की स्वतंत्र संस्था पर ज्यादा विश्वास है”. सत्ता पक्ष का दृढ विश्वास है कि स्वतंत्र जांच एजेंसी में कोई गाँधी तो होगा नहीं और अगर बाई-चांस हो गया तो वह “वर्तमान प्रजातंत्र” के लिए घातक  भी होगा यही वजह है कि एन डी ए की सरकार हो या यू पी ए की किसी ने भी १९९७ में सुप्रीम कोर्ट द्वारा विनीत नारायण केस में सी बी आई को जांच में स्वतंत्र रहने के लिए दी गयी व्यवस्था को कूड़े की टोकरी में डाल दिया. आखिर देश को प्रजातंत्र के रास्ते पर ले जाना जो था.
अब संसद की स्थिति पर गौर करें. दुनिया के किसी भी परिपक्व प्रजातंत्र में दल-बदल कानून नहीं है. लेकिन भारत में कोई सांसद (जनता का प्रतिनिधि) अपनी मर्जी से अगर वोट देता है तो उसकी सदस्यता ख़त्म करने का स्पष्ट कानून है. यानि संसद में चाहे कुछ भी बहस करा लें अंत में नतीजा वही होगा जो दल का नेता चाहेगा. और नेता क्या चाहेगा यह इस बात से तय होगा कि उसका बेटा या रिश्तेदार “अपने (और देश के ) आर्थिक विकास” में क्या योगदान कर रहें हैं. अभिव्यक्ति की आज़ादी का इतना बड़ा मखौल भारतीय प्रजातंत्र में हीं हो सकता है. चूंकि प्रजातंत्र में बहुमत हीं अहम् होता है लिहाज़ा जिस दल या दल समूह का बहुमत है वही जनता की आवाज है वही कानून है और वही सत्य है. अगर मायावती या मुलायम इस बहुमत को बदल दें तो जनता की आवाज की व्याख्या बदल जायेगी, सत्य बदल जाएगा लेकिन वे भी ऐसा क्यों करें आखिर उनके और उनके परिवार के लोगों की आय से अधिक संपत्ति के मामले में सी बी आई की जांच भी तो एक सत्य है.
लिहाजा आने वाले वर्षों या दशकों तक हम “दूध का दूध” , “कानून अपना काम कर रहा है” “हम जांच के लिए तैयार हैं” “मामला अदालत के विचाराधीन है” और “मीडिया भ्रष्ट है , नकारात्मक है” या संसद में विश्वास रखें” के भाव में सत्ता पक्ष के करुनानिधियों, बंसलों, राजाओं, कलामाडियों या उनके रिश्तेदारों के “व्यापारिक कुशलताओं” को झेलते रहेंगे और प्रजातंत्र मजबूत होता रहेगा.      
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